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नाभि पर तेल या देसी घी लगाने के फायदे

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मित्रो आज हम आपको रात को सोते वक़्त नाभि में गाय का देशी घी या नीम के तेल, सरसों के तेल, बादाम के तेल, नारियल या जैतून के तेल आदि की सिर्फ़ 2 बूँद लगाने से जो 14 चमत्कारी फ़ायदे होंगे उसके बारे में बताएँगे। आप अपनी त्वचा को अच्छा बनाने के लिए और अपनी दर्दो के लिए और प्रज*नन के लिए पता नहीं क्या-क्या नुस्खे अपनाते होंगे और आप कई सारी दवाओं का उपयोग भी करते होंगे।

लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि पेट की नाभि पर तेल की कुछ बूंदें लगाने से आपको कितना फायदा हो सकता है क्या आप जानते है यहाँ तेल रगड़ने से जोड़ों के दर्द, घुटने का दर्द, सर्दी, जुकाम, नाक बहने और त्वचा संबंधी परेशानियों से निजात मिल सकती है

यहाँ हम आपको बतायेंगे की किस प्रकार आप अपनी नाभि इन तेलों को डाल कर दूर कर सकते हैं अपनी इन समस्याओ को जो आपके लिए मुश्किल भी नहीं हैं करना और जिसके द्वारा आपको इन चीजों से बहुत जल्दी आराम मिल जाएगा, तो चलिए जानते हैं कौन से है वो तेल जो करेंगे आपको रोग मुक्त।

नाभि में इन चीजों को लगाने के फायदे :-

जोड़ो का दर्द करे सही : 
फटे होंठ या जोड़ों का दर्द है अगर आप इन चीजों से परेशान है तो आपको ज़रूरत है सरसों के तेल की जिसके द्वारा आप अपनी इस समस्या से छुटकारा पा सकेंगे, अपने पेट की नाभि पर सरसों के तेल की कुछ बूंदें लगाएँ. हाँ यह आपको अजीब लग रहा होगा लेकिन ये प्राचीन औषधि बहुत फायदेमंद है।

सर्दी ज़ुकाम से राहत : क्या आपको सर्दी, जुकाम है, तो यह आपके लिए काफी फायदेमंद है, हममे से कुछ लोग ऐसे होते है जिन्हें बारो मॉस ज़ुकाम की शिकायत रहती है तो आपको बस इतना करना है की रुई के फ़ोहे को एल्को*हल में डुबोए और पेट की नाभि पर लगाएँ, बस हो गया। ये सर्दी और जुकाम की अचूक दवा है इससे आपका पुरान से पुराने ज़ुकाम ठीक हो जाएगा।

मासिक धर्म : लडकियों को मासिक धर्म में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं इन दिनों बहुत सारे होर्मोनेल चेंजेस भी होते है  जिसके कारण ना उनका मूड ठीक रहता हैं और उनका स्वस्थ्य लेकिन अगर आप मासिक धर्म होने वाली इन सम्सायो से बचना चाहती है तो रुई के फ़ोहे को ब्रां*डी में भिगोएँ और इसे पेट की नाभि पर रखें, इससे आपको इन चीजों से मुक्ति मिलेगी।

मुहासे के लिए :लड़का हो फिर चाहे लड़की हो हर कोई मुहासे की समस्या से परेशान रहता हैं अगर आप भी इसी समस्या से परेशान हैं और कोई भी उपाय काम नहीं आ रहा हैं तो नीम के तेल की कुछ बूंदें पेट के बीच में डालकर और आस-पास मसाज करने से आपके कील-मुहाँसे ठीक हो सकते हैं, और आपकी त्वचा बेदाग़ वा सुंदर हो जायेगी।

चेहरे पर निखार :अगर आपका चेहरा दागरहित वा सुंदर हो तो क्या कहने ऐसा कहा जाता है कि बादाम के तेल की कुछ बूंदें पेट की नाभि पर लगाने से चेहरे पर निखार आता है और आपकी रंगत भी अच्छी होती हैं।


प्रजनन क्षमता :नारियल या जैतून के तेल की कुछ बूंदें नाभि पर लगाएँ और धीरे-धीरे मसाज करें. इससे प्रज*नन क्षमता बढ़ती है और आपकी प्रज*नन से रिलेटेड समस्याए भी खत्म होती हैं।

मुलायम त्वचा : हर किसी को बेबी सॉफ्ट त्वचा चाहिए क्या आपको स्वस्थ और मुलायम त्वचा चाहिए अगर हां  तो आपको बस गाय का घी नाभि पर लगाना होगा और आप भी पा सकेंगे बेबी सॉफ्ट त्वचा।

मनुष्य के शरीर में हर बॉडी पार्ट्स का कनेक्शन नाभि से जुड़ा हुआ होता है। नाभि में रोज चुटकी भर घी की दो बूंदे लगाना ही हमें कई बीमारियों से बचाने के लिए पर्याप्त होता है। इस नेचुरल थैरेपी से कई हेल्थ प्रॉब्लम को ठीक किया जा सकता हैं। साथ ही यह खूबसूरती को बढ़ाने में भी फायदेमंद होता है।

तो आइये जाने हेल्थकेयर एक्सपर्ट्स के अनुसार नाभि में घी की दो बूंदे लगाकर हल्की मालिश करने से होने वाले फायदों के बारे में
  • स्किन : इसे नाभि में लगाने से स्किन में नमी बनी रहती है जिससे फेयरनेस बढती है।
  • चेहरे ही चमक : इससे स्किन की ड्राईनेस दूर होती होती है और चेहरे ही चमक बढती है।
  • बालों का झड़ना : इससे बालों का झड़ना रुकता है और बालों किस शाइनिंग बढती है।
  • घुटनों का दर्द : यह घुटनों का दर्द दूर करने में फ़ायदेमंद है और जॉइंट पैन से बचाता है।
  • पिम्पल्स और दाग-धब्बे : इससे चेहरे के पिम्पल्स ठीक होते है और दाग-धब्बे दूर होते है।
  • कटे-फटे होंठ : नाभि में घी लगाने से कटे-फटे होंठ नही ठीक हो जाते है।
  • कब्ज : इससे पेट की प्रॉब्लम दूर होती है और कब्ज से बचाव होता है
अन्य फायदे -
  1. आयुर्वेद के अनुसार नाभि में देसी घी की मालिश करने से शरीर को ताकत मिलती है क्योंकि घी में मौजूद पोषक तत्व को नाभि अवशोषित कर लेता है. इससे पूरे शरीर को एनर्जी मिलती है.जो बालों को प्राकृतिक काले रंग पाने में मददगार होता है।
  2. जिन लोगों को अर्थराइटिस यानी जोड़ों का दर्द हो उन्हें रात में सोने से पहले नाभि में देसी घी की कुछ बूंदे डालनी चाहिए. साथ ही हल्के हाथों से मसाज करनी चाहिए. इससे अवशोषित होकर पूरे शरीर तक पहुंचती है. और हड्डियों को मजबूत बनाती है. जिससे दर्द से राहत मिलता है।
  3. जिन लोगों को रूखी त्वचा होने से परेशानी है. उन्हें देसी घी ग्लिसरीन मिलाकर नाभि में लगाना फायदेमंद होता है. ऐसा करने से त्वचा चमकदार बनती है।
  4. घी में मौजूद फैटी एसिड आपकी त्वचा को गहराइयों से हाइड्रेट करने में मदद करता है. इसे आंखों के नीचे लगाने से डार्क सर्कल की समस्या से छुटकारा मिलती है।
  5. अगर आपके बाल झड़ रहे हैं या सफेद हो रहे हैं तो देसी घी में शिकाकाई पाउडर मिलाकर लगाना चाहिए. ऐसा करने से आपके बाल मजबूत घने और काले हो जाएंगे।

नाभि थेरेपी ,नाभि चिकित्सा -

नाभि में 72000 नाड़िया जुड़ी है इसीलिए नाभि शरीर का केंद्र होती है नाभि थैरेपी से कई रोगों को ठीक किया जा सकता है जैसे जोड़ो और घुटनों का दर्द, गठिया को, पेट के सभी रोगो को, चेहरे की चमक और सौंदर्यीकरण बढ़ती है। नाभि से ही माँ के गर्भ में पल रहे 9 महीने तक बच्चे का पालन-पोषण होता है। इस लिए जिसने नाभि को शुद्ध  रखा वो कई रोगों से दूर रहता है।

अक्सर आपने महसूस किया होगा या सुना होगा कि नाभि अपने स्थान से हट जाती है तो शरीर में कई दिक्कतें आने लगती है जैसे पेट के रोग, मुह में लार सुखना और भूख नही लगना, कमजोरी आना आदि। क्योंकि अगर नाभि में कोई दिक्कत आती है तो 72000 नाड़िया भी प्रभावित होती है जो शरीर के प्रत्येक अंग से जुड़ी है। 

अगर आप रीढ़ की शारीरिक बनावट के बारे में जानते हैं, तो आप जानते होंगे कि रीढ़ के दोनों ओर दो छिद्र होते हैं, जो वाहक नली की तरह होते हैं, जिनसे होकर सभी धमनियां गुजरती हैं। ये इड़ा और पिंगला, यानी बायीं और दाहिनी नाड़ियां हैं।

शरीर के ऊर्जा‌-कोष में, जिसे प्राणमयकोष कहा जाता है, 72,000 नाड़ियां होती हैं। ये 72,000 नाड़ियां तीन मुख्य नाड़ियों- बाईं, दाहिनी और मध्य यानी इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना से निकलती हैं। ‘नाड़ी’ का मतलब धमनी या नस नहीं है। नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह होती हैं जिनसे प्राण का संचार होता है।

इन 72,000 नाड़ियों का कोई भौतिक रूप नहीं होता। यानी अगर आप शरीर को काट कर इन्हें देखने की कोशिश करें तो आप उन्हें नहीं खोज सकते। लेकिन जैसे-जैसे आप अधिक सजग होते हैं, आप देख सकते हैं कि ऊर्जा की गति अनियमित नहीं है, वह तय रास्तों से गुजर रही है। प्राण या ऊर्जा 72,000 अलग-अलग रास्तों से होकर गुजरती है।

आज हम बताएंगे पेट से जुड़ी हर समस्या का समाधान, दोस्तों यदि आप नाभि के ऊपर दो बूंद किसी भी तेल या घी की लगाते हैं, तो आपके पेट से जुड़ी हर दुख, तकलीफ जड़ से खत्म हो जाएगी यह कुछ इस तरह से काम करता है, कि नाभि के द्वारा दी गई दवा शरीर के अंग तक जाती है जिससे शरीर को काफी फायदा मिलता है, यदि आप तेल की जगह किसी दवा का प्रयोग करते हैं तो वह है सीधे ही पेट पर असर करती हैं तो आइए जानते हैं नाभि पर तेल लगाने अर्थात नाभि थेरेपी से होने वाले फायदे के बारे में…

नाभि थेरेपी कैसे करे-

नाभि पर आप किसी भी तेल का उपयोग कर सकते हैं जैसे कि सरसों का तेल, जैतून का तेल या नारियल का तेल आदि लगाने के लिए आपको दो बूंद रात को सोने से पहले नाभि के गड्ढे में दो या चार बूंदें डालकर हल्के हाथ से मालिश कर सकते हैं या फिर उड़द के आटे की दीवार बनाकर नाभि में तेल भरकर आधे घंटे के लिए उड़द के आटे की दीवार को लगा सकते हैं।

नाभि थेरेपी के फायदे -

  • नाभि पर तेल लगाने से अच्छी नींद आती है और पेट दर्द सिर दर्द आदि की शिकायत भी दूर हो जाती है|
  • त्वचा खूबसूरत वे मुलायम हो जाती है नाभि पर दो बूंद तेल लगाने से चेहरे की चमक भी बढ़ने लग जाती है|
  • जोड़ों में होने वाले हर प्रकार के दर्द का को खत्म कर देता है।
  • स्त्रियों के मासिक धर्म से होने वाले दर्द को भी कम कर देता है।
  • बालों के झड़ने की समस्या से भी छुटकारा मिल जाता है।
  • क्या होता है? जब नाभि पर 2 घंटे के लिए आँवले का चूर्ण अदरक के रस में मिलाकर बाँध दिया जाता है
क्या होता है? जब नाभि पर 2 घंटे के लिए आँवले का चूर्ण अदरक के रस में मिलाकर बाँध दिया जाता है, अगर पेट से सम्बंधित कोई भी विकार हो उन सभी रोगों में रामबाण उपाय बताने जा रहे है। मरीज को सीधा (चित्त) सुलाकर उसकी नाभि के चारों ओर सूखे आँवले का आटा बनाकर उसमें अदरक का रस मिलाकर बाँध दें एवं उसे दो घण्टे चित्त ही सुलाकर रखें। दिन में दो बार यह प्रयोग करने से नाभि अपने स्थान पर आ जाती है तथा दस्त और सभी पेट के विकारों आदि उपद्रव शांत हो जाते हैं।

नाभि खिसक जाने पर व्यक्ति को मूँगदाल की खिचड़ी के सिवाय कुछ न दें। दिन में एक-दो बार अदरक का 2 से 5 मिलिलीटर रस पिलाने से लाभ होता है।

नाभि थेरेपी

आप अपनी त्वचा को अच्छा बनाने के लिए और अपनी दर्दो के लिए और प्रजनन के लिए पता नहीं क्या-क्या नुस्खे अपनाते होंगे और आप कई साड़ी दवाओं का उपयोग भी करते होंगे  लेकिन आपको आश्चर्य होगा कि पेट की नाभि पर तेल की कुछ बूंदें लगाने से आपको कितना फायदा हो सकता है क्या आप जानते है यहाँ तेल रगड़ने से जोड़ों के दर्द, घुटने का दर्द, सर्दी, जुकाम, नाक बहने और त्वचा संबंधी परेशानियों से निजात मिल सकती है।

यहाँ हम आपको बतायेंगे की किस प्रकार आप अपन नाभि इन तेलों को डाल कर दूर कर सकते हैं अपनी इन समस्याओ को जो आपके लिए मुश्किल भी नहीं हैं करना और जिसके द्वारा आपको इन चीजों से बहुत जल्दी आराम मिल जाएगा, तो चलिए जानते हैं कौन से है वो तेल जो करेंगे आपको रोग मुक्त।

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महुआ के फायदे और नुकसान

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आदिवासी भारतीयों के लिए महुआ का पेड़ बहुत महत्व रखता है। आदिवासी लोग न सिर्फ खाने के लिए बल्कि ईंधन के रूप में भी महुआ का उपयोग करते हैं। क्या आपने कभी महुआ का नाम सुना है, अगर नहीं तो आज इस लेख में हम आपको महुआ के फायदों और नुकसान के बारे में बताने जा रहे हैं।

महुआ क्या है?

महुआ का वैज्ञानिक नाम मधुका लोंगिफोलिया है। यह पेड़ बहुत तेजी से बढ़ता है और लगभग 12 से 15 मीटर तक इसकी लंबाई पहुंच सकती है। इसमें मार्च के माह में सफेद रंग के छोटे-छोटे फूल लगते हैं। यूं तो इसके फूल के असंख्य गुण हैं, लेकिन मध्य भारत में इस फूल का इस्तेमाल मशहूर पेय महुआ वाइन बनाने के लिए किया जाता है।

महुआ में औषधीय और चिकित्सकीय गुणों से भरपूर तत्‍व मौजूद हैं। यह मौसमी फ्लू, बुखार, मिर्गी, कैंसर जैसी तमाम समस्याओं का एक समाधान है। आयुर्वेद में यह बात कही गई है कि पूरे विश्व में महुआ का इस्तेमाल किया जाता है।

महुआ से जुड़े तथ्य

  • वैज्ञानिक नाम: मधुका लोंगिफोलिया
  • कुल: सेपोटेसी
  • सामान्य नाम: महुवा, महआ, माहवा, मोहूलो, लुप्पई और इप्पा
  • अंग्रेजी नाम: बटरनट ट्री
  • हिस्से: छाल, बीज और फूल
  • भौगोलिक विवरण: महुआ एक उष्णकटिबंधीय वृक्ष है जो भारत, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार के साथ-साथ मध्य और उत्तरी भारत के कई हिस्सो में पाया जाता है।

महुआ में पोषक तत्व

महुआ के बीज स्वस्थ वसा (हैल्दी फैट) का अच्छा स्रोत हैं। इसका इस्तेमाल मक्खन बनाने के लिए किया जाता है। महुआ के हर हिस्से में विभिन्न पोषक तत्व मौजूद हैं। आइए जानते हैं महुआ के बीजों में मौजूद पोषक तत्वों के बारे में।

प्रत्येक 100 ग्राम के महुआ में पोषक तत्व
  • कुल वसा: 50 से 31 फीसदी
  • प्रोटीन: 16.9 फीसदी
  • कार्बोहाइड्रेट: 22 फीसदी
  • फाइबर: 3.2 फीसदी

महुआ का प्रयोग कैसे करें -

मक्खन बनाने के लिए महुआ के बीज का उपयोग पुराने समय से किया जा रहा है। सौंदर्य प्रसाधनों और फार्मेसी में कोको बटर की जगह तथा चॉकलेट और घी में मिलावट के लिए कुकिंग ऑयल की जगह इसका उपयोग किया जाता है।
  • मौसमी अनाज के विकल्प के रूप में महुआ के बीज से बने आटे से रोटी और पूड़ी बनाई जाती है।
  • चूंकि, महुआ के बीज वसा का अच्छा स्रोत होते हैं इसलिए शोध में इसके जैव ईंधन (बायोफ्यूल) के रूप में कार्य करने के संकेत मिले हैं।
  • शुगर की मात्रा ज्यादा होने के कारण महुआ के फूलों का इस्तेमाल भारतीय मिठाईयों जैसे कि बर्फी, खीर, हलवा और मीठी पूड़ी बनाने में किया जाता है। 
  • महुआ के फलों का इस्तेमाल शराब बनाने के लिए भी किया जाता है। इसके अलावा महुआ के फूलों को पशु जैसे गाय के चारे के तौर पर भी दिया जाता है, इससे उनमें दूध का उत्पादन बढ़ता है।

महुआ के फायदे - 

महुआ के पेड़ में मौजूद औषधीय गुण असंख्य बीमारियों का इलाज करने में सहायक हैं। महुआ के फूल का रस हृदय रोग, लिकोरिया (योनि से सफेद पानी आना), मीनोरेजिया (मासिक धर्म में अधिक रक्त स्राव होना), पॉलीयूरिया (बार-बार पेशाब आना), ब्रोंकाइटिस और टाॅन्सिलाइटिस में फायदेमंद है।

महुआ की छाल का इस्तेमाल क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, डायबिटीज मेलिटस और ब्लीडिंग में किया जाता है। गठिया और बवासीर की दवाई के रूप में महुआ की पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसकी जड़ सूजन, दस्त और बुखार में बहुत असरकारक होती है।

आइए जानते हैं महुआ के कुछ ऐसे फायदों के बारे में जिनकी वैज्ञानिक रूप से भी पुष्टि हो चुकी है।

महुआ के फूल खाने के फायदे अल्सर में - 

गैस्ट्रिक जूस के अत्यधिक बनने की वजह से पेट की म्यूकस लाइनिंग (ये पेट में मौजूद पाचक रसों से पेट की सुरक्षा करने में मदद करती है) में अवरोध उत्पन्न होता है जिसके कारण पेट की अंदरूनी परत में घाव बनता है। अल्सर-रोधी गुणों के कारण महुआ को पेप्टिक अल्सर के लक्षणों से राहत पाने में असरकारी पाया गया है।

ये हिस्टामाइन (पेट में एसिड के उत्पादन को कंट्रोल करने वाला तत्व) के स्राव को रोकता है जिससे इसके कारण होने वाली पेट से संबंधित दिक्कत में कमी आती है और अल्सर को ठीक होने में मदद मिलती है।

महुआ पेट के म्यूकस मेंब्रेन के ऊपर एक सुरक्षात्मक परत बनाता है जो कि अत्यधिक एसिड बनने के नकारात्मक प्रभावों से बचाती है।

महुआ का लाभ दांतों के लिए - 
  • स्वस्थ मसूड़ों और टॉन्सिलाइटिस के लिए महुआ को लाभकारी माना गया है। इसके इस्तेमाल के लिए महुआ के पेड़ की छाल से निकले 4 मि.ली रस को 300 मि.ली पानी में मिलाएं।
  • मसूड़ों से खून निकलने की समस्या से छुटकारा पाने के लिए इस मिश्रण से नियमित कुल्ला करें। (और पढ़ें - मसूड़ों से खून आने के घरेलू उपाय)
  • गंभीर टाॅन्सिलाइटिस और फेरिंजाइटिस (गले में सूजन) के लक्षणों से राहत पाने के लिए भी यह मिश्रण उपयोगी है।
  • लैब में हुए अध्ययनों के अनुसार महुआ की छाल में एंटी-माइक्रोबियल गुण मौजूद होते हैं, जिस वजह से यह दांतों से जुड़ी समस्याओं में लाभकारी है। 
महुआ के औषधीय गुणों से पाएं ब्रोंकाइटिस से दूरी - 
ब्रोंकाइटिस की गंभीर स्थिति से आराम पाने के लिए महुआ के फूल से निकले रस को एक गिलास दूध के साथ मिलाकर पीएं। ब्रोंकाइटिस में श्वास नलियां जैसे मुंह और नाक में सूजन आ जाती है। बलगम बनने की वजह से पहले खांसी और फिर घरघराहट एवं सांस लेने में तकलीफ होती है।

महुआ के फूल बलगम को पतला कर इसे बाहर निकालने में मदद करते हैं। एंटीऑक्सीडेंट और सूजन-रोधी गुणों से युक्त जड़ी-बूटी होने के कारण महुआ सूजन को कम कर तुरंत आराम दिलाती है।

महुआ का उपयोग करें मिर्गी में - 
मिर्गी एक केंद्रीय तंत्रिका तंत्र संबंधी रोग है। यह बीमारी होने पर व्यक्ति को दौरे पड़ने लगते हैं। वैसे तो मिर्गी के लिए कई तरह की दवाईयां मौजूद हैं लेकिन आदिवासी लोग इस बीमारी के इलाज के लिए अब भी प्राकृतिक तरीकों का ही इस्तेमाल करते हैं। आपको बता दें कि महुआ मिर्गी से निपटने का एक बेहतरीन प्राकृतिक स्रोत है।

शोधों से यह पता चला है कि महुआ की पत्तियों का मेथनॉलिक (मेथनॉल से युक्‍त) अर्क गामा अमीनो ब्यूटिरिक (GABA) के रिलीज़ को बढ़ा देता है, GABA एक न्‍यूरोट्रांसमीटर है जो कि मिर्गी के मरीज़ों में उत्तेजित निओरोनल एक्टिविटी को रोकता है। यह न सिर्फ मिर्गी के दौरों में कमी लाता है बल्कि इससे मिर्गी के दौरे कम समय के लिए पड़ते हैं।


महुआ का प्रयोग रखे त्वचा को स्वस्थ - 
महुआ फूल के रस को कई तरह की त्वचा संबंधी समस्याओं में इस्तेमाल किया जाता है। इसमें त्वचा को चिकना करने के गुण होते हैं जो खासकर खुजली से राहत दिलाने में मदद करते हैं।

महुआ की पत्तियों पर तिल का तेल लगाकर, इसे गर्म करें और प्रभावित हिस्से पर लगाएं। इससे एक्जिमा से राहत मिलती है।

पशुओं पर हुए अध्ययनों से पता चला है कि महुआ में सैपोनिन और फ्लेवोनोइड्स मौजूद होते हैं जिस वजह से ये जलन को कम करने में सहायक हैं। ये घटक घाव को ठीक करने में मदद करते हैं। एक अध्ययन से यह भी पता चला है कि घाव और जलने पर दर्द से राहत पाने में महुआ असरकारी है।

महुआ खाने का फायदा बुखार में - 
बुखार आने का मतलब है कि शरीर संक्रमण के खिलाफ लड़ रहा है। बुखार की वजह से कभी-कभी जी मतली और कमजोरी भी आ जाती है। अध्ययनों से इस बात का खुलासा हुआ है कि महुआ की छाल के रस में ज्वर-रोधी, दर्द निवारक और सूजन-रोधी गुण होते हैं जो बुखार, दर्द और सूजन के लक्षणों को कम कर सकते हैं। महुआ पोषक तत्वों से भरपूर है और इसलिए बुखार में जल्दी रिकवर करने के लिए इसका सेवन किया जा सकता है।

महुआ का उपयोग डायबिटीज में - 
डायबिटीज मेटाबाॅलिक बीमारियों का एक समूह है जो हाइपरग्लाइसीमिया (हाई ब्‍लड शुगर) की स्थिति को दर्शाता है। यह शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंगों के कार्यों को प्रभावित करती है। वैसे तो डायबिटीज के लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए कई तरह की दवाईयां मोजूद हैं लेकिन आधुनिक दवाईयों से इस बीमारी में होने वाली समस्याओं से पूरी तरह से बचा नहीं जा सकता है।

पशुओं पर हुए अध्ययनों से पता चला है कि महुआ की छाल से निकले अर्क में मधुमेह को रोकने वाले तत्व होते हैं। हालांकि, यह डायबिटीज में किस तरह काम करती है, इसका अब तक पता नहीं चल पाया है लेकिन ऐसा पता चला है कि इन अर्कों की एक निर्धारित खुराक से शरीर में संचारित ग्लूकोज की मात्रा को कम करने में मदद मिल सकती है।

अन्य तथ्यों के अनुसार महुआ का अर्क इंसुलिन की कमी और हाई ब्लड ग्लूकोज का खतरा पैदा करने वाले कोलेस्ट्रॉल के स्तर को घटाने में असरकारी है। महुआ को डायबिटीज से ग्रस्त पशुओं की किडनी के कार्य में सुधार लाने में उपयोगी पाया गया है। डायबिटीज से संबंधित नेफ्रोपैथी को महुआ से रोका जा सकता है।

महुआ का लाभ कृमि संक्रमण में - 
पेट में कीड़े होने से पैदा हुए संक्रमणों में कृमि संक्रमण सबसे सामान्य है। हालांकि, इस बीमारी से सबसे ज्यादा गरीब तबके के लोग प्रभावित होते हैं लेकिन विकसित देशों में भी इसके कुछ मामले देखने को मिले हैं। यह बीमारी एनीमिया और आंतों से जुड़े विकारों के खतरे को बढ़ा देती है। अतः जल्द से जल्द इस समस्या का इलाज करवाना जरूरी है।

महुआ परजीवी संक्रमण से लड़ने में भी मदद करता है। अन्य पेड़ों के रस की तुलना में मधुका लोंगिफोलिया के दोनों मेथनॉलिक और एथनोलिक अर्क पेट में कीड़े होने से पैदा हुए संक्रमणों से लड़ने में मददगार पाए गए हैं।

एक शोध के अनुसार 60 मि.ग्रा महुआ के मेथनॉलिक अर्क की खुराक विषाक्तता और लकवे का इलाज या कीड़ों को मारती है। हालांकि, अभी इस विषय पर पर्याप्त शोध नहीं हुए हैं, इसलिए इंसानी शरीर पर इसके प्रभाव के बारे में ज्यादा कुछ कहा नहीं जा सकता है।

महुआ का फायदा लिवर में विषाक्‍ता होने में - 
शरीर के लिए लिवर एक महत्वपूर्ण अंग है। यह न सिर्फ खाना पचाने में मदद करता है बल्कि शरीर से विषाक्त पदार्थ भी बाहर निकालता है और संपूर्ण स्वास्थ्य को बेहतर रखता है। महुआ लिवर के लिए अमृत है।

इसमें लिवर को सुरक्षा प्रदान करने वाले गुण होते हैं एवं यह लिवर की परतों को मजबूती देता है और खून में हानिकारक रसायनों के रिलीज़ को रोकता है, जो कि लिवर को नुकसान पहुंचने का संकेत है। इसके साथ ही यह लिवर को बेहतर तरीके से कार्य करने में मदद करता है।

महुआ का इस्‍तेमाल कैसे करें - 
  • महुआ के ताजा फूलों के रस से साइनस, सिरदर्द, पित्त दोष और आंखों में जलन से राहत मिलती है। (और पढ़ें - पित्त दोष क्या है)
  • स्तनपान करवाने वाली महिलाओं में दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए महुआ के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है।
  • 30 से 40 मि.ली की मात्रा में महुए के सूखे फूलों और दूध के मिश्रण को उबालकर पिएं। ये नसों की कमजोरी और न्यूरोमस्कुलर डिजीज से लड़ने में मदद करता है।
  • महुआ के फूलों से बने ताजा रस की 20 से 25 मि.ली की खुराक लेने से हिचकी, हाई ब्‍‍‍‍लड प्रेशर और खांसी कम होने में मदद मिलती है।
  • महुआ के फूलों को चीनी के साथ 30 मि.ली की खुराक में लेने से कम शुक्राणु बनने, शीघ्रपतन और स्‍तनपान के दौरान दूध न बनने की समस्‍या दूर होती है। महुआ की छाल का पाउडर ताकत और शक्‍ति को भी बढ़ाता है। 
  • महुआ के पेड़ की छाल से बने ठंडे अर्क की 30 से 40 मि.ली की खुराक लेने से पेशाब में जलन और शरीर में जलन महसूस होने की दिक्कत दूर होती है।
  • महुआ की छाल से तैयार 30 से 40 मि.ली काढ़ा लेने से दस्त और इर्रिटेबल बाउल सिंड्रोम के इलाज में उपयोगी है। 
  • महुआ की छाल को उबालकर तैयार गाढ़े काढ़े से रूमेटिज्म का इलाज किया जाता है। महुआ के बीज से निकला तेल रूमेटाइड अर्थराइटिस के कारण हुए दर्द और जलन से छुटकारा दिलाने में मददगार है।

महुआ के फल (कोलिया) की सब्जी -
कोलिया मध्य भारत और उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश के राज्यों में खाई जाने वाली एक प्रसिद्ध सब्जी है। यह महुआ के वृक्ष के फलों से बनती है। कोलिया की सब्जी बनाने की विधिः

सामग्री:
  • कोलिया: 500 ग्राम (छिली हुई, बीज निकाली हुई और कटी हुई)
  • बेसन: 50 ग्राम
  • कटा प्याज: 1 (मध्यम आकार)
  • कटा टमाटर: 1 (मध्यम आकार)
  • पिसी हुई अदरक: 1 छोटा चम्मच और लहसुन का पेस्ट

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मुनक्का खाने के फायदे और नुकसान

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अंगूर को जब विशेष रूप से सुखाया जाता है तब उसे मुनक्का कहते हैं। अंगूर के सभी गुण मुनक्का में होते हैं। मुनक्का दो प्रकार का होता है- लाल मुनक्का और काला मुनक्का। मुनक्का खाने से खून बढ़ता है और वायु दोष भी दूर होता है। इसको खाने से रक्त की वृद्धि होती है और वायु, पित्त, कफ दोष दूर होते हैं। चलिए आज हम मुनक्का के बारे में और जानते हैं। ये सूखे मेवे शरीर की ऊर्जा को बढ़ाते हैं। इनमे कैलोरी की मात्रा अधिक होती है इसलिए आमतौर पर पर्वत निवासी और पर्यटक के लिए मुनक्का खाना फायदेमंद रहता है।

मुनक्का खाने का सही समय और तरीका -

मुनक्के को रातभर पानी में भिगो के रखें और सुबह खली पेट इसका सेवन करें। मुनक्के को पानी में भिगोकर खाना स्वास्थ के लिए लाभदायक माना जाता है। ऐसा करने से आपका पेट साफ़ रहेगा और आपको दस्त जैसी समस्या नहीं होगी। मुनक्के को दूध में भिगोकर भी आप इसका सेवन कर सकते हैं।


मुनक्के की तासीर - 

मुनक्के की तासीर गरम होती है। इसलिए इसका सेवन सर्दियों के मौसम में करने की सलाह दी जाती है। मुनक्के का सेवन आप गर्मियों में भी कर सकते हैं पर नियंत्रित मात्रा में ही इसका सेवन करें। इसका अधिक उपयोग करने से आपको दस्त, बुखार आदि जैसी समस्या हो सकती है।

मुनक्का खाने के फायदे -

मुनक्का के कई स्वास्थ्य लाभ हैं। एक चौथाई कप किशमिश या 60-70 किशमिश में फाइबर और पोटेशियम की काफी मात्रा होती है। किशमिश में कोई वसा नहीं होता है। मुनक्का कई आवश्यक विटामिन और खनिजों से भरी हुई होती है जो शरीर के स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक होते हैं। मुनक्का खाना इसलिए भी फायदेमंद है क्योंकि यह एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करती है और इसमें सोडियम भी कम होता है। आइए जानें मुनक्का के इन लाभों के बारे में और भी बहुत कुछ।

मुनक्का के फायदे दांतो के लिए -
मुनक्के का सेवन करने से आपके दांतों की समस्या भी कम हो सकती है। मुनक्के का एक और बड़ा लाभ यह है कि इसमें एक फाइटोकेमिकल होता है जिसे ओलेनोलिक एसिड (oleanolic acid) कहा जाता है यह सभी प्रकार की दंत समस्याओं के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है। यदि आप दाँतों की किसी भी समस्या से परेशान है तो मुनक्का खाने से ये समस्याएं ठीक हो सकती है। मुनक्का मुँह में बैक्टीरिया को खत्म करने का काम करता है।

मुनक्का का फायदा नींद न आने के लिए - 
मुनक्के का सेवन करने से इंसोम्निया (नींद न आना) जैसी समस्या भी ठीक हो सकती है। यदि आपको नींद नहीं आती है तो आप मुनक्के का सेवन करें।

मुनक्का के फायदे हृदय के लिए - 
मुनक्का के सेवन से हार्ट की समस्या से भी निजात मिलता है। इस का नियमित सेवन हार्ट अटैक की समस्या को दूर रखने में मदद करता है। अमेरिकी कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी ( American College of Cardiology) को पेश किए गए एक 2012 के अध्ययन के मुताबिक, मुनक्का उच्च रक्तचाप को कम करने में मददकरता हैं। मुनक्के में पोटैशियम की अधिक मात्रा होती है, जो उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद करती है और प्रतिरक्षा-बढ़ाने वाले एंटीऑक्सीडेंट को बढ़ाती है। एक गिलास दूध में 8 से 10 मुनक्का उबाल लें। अब इसमें एक चम्मच घी डालकर सुबह शाम पियें। इससे ह्रदय रोगों से आराम मिलता है। 1 मुनक्के में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग भुनी हुई हींग डालकर सुबह पानी के साथ लें। यह दिल में खिंचाव, बोझ, अधिक धड़कन में लाभदायक है।

मुनक्का खाने के फायदे कब्ज में - 
मुनक्का पेट में जाने के बाद पानी को सोख लेता है जिस वजह से यह फूल जाता है और कब्ज में राहत देता है। इसके सेवन से पाचन तंत्र में सुधार होता है। मुनाका फाइबर के साथ-साथ एंटी-ऑक्सीडेंट्स और कैल्शियम का एक अच्छा स्रोत है जो स्वाभाविक रूप से कब्ज को नियंत्रित करने में मदद करता है। मुनाका (विशेष रूप से काला मुनक्का) का नियमित सेवन करने से आपको कब्ज़ में राहत मिल सकती है। इसमें मौजूद फाइबर जठरांत्र (gastrointestinal) मार्ग से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करते हैं। 10 मुनक्का को सुबह दूध में अच्छे से उबालकर दूध को पी लें। इस का एक हफ्ते तक सेवन करें, आप को कब्ज़ की समस्या से छुटकारा मिल जाएगा।

मुनक्का के बेनिफिट्स वजन बढ़ाने में - 
हर मेवे की तरह मुनक्का भी वजन बढ़ाने में मदद करता है क्योंकि इसमे फ्रुक्टोज़ और ग्लूकोस (fructose aur glucose) पाया जाता है जो हमें एनर्जी प्रदान करता है।

मुनक्का का सेवन करे एनीमिया मे - 
मुनक्का में भारी मात्रा मे आयरन पाया जाता है जो एनीमिया से लड़ने की शक्ति रखता है। मुनक्का खून को बनाने के लिए विटामिन बी कॉम्प्लेक्स की ज़रूरत को पूरा करता है। इसके अलावा मुनक्का में भरपूर मात्रा में कॉपर पाया जाता है जो लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है। सोते समय लगभग 10 से 12 मुनक्का को धोकर पानी में भिगो दें। इसके बाद सुबह उठकर मुनक्का के बीजों को निकालकर अच्छी तरह से चबाकर खाने से शरीर में खून बढ़ता है। मुनक्का खाने से खून भी साफ होता है और नाक से खून बहना भी बंद हो जाता है। मुनक्का का सेवन 2 से 4 हफ्ते तक करना चाहिए। 

बुखार में मुनक्का खाने के लाभ - 
मुनक्का में मौजूद फिनोलिक पायथोन्यूट्रिएंट (phinolic pythonutrient), जर्मीशिडल और एंटीऑक्सीडेंट (germicidal aur antioxidant) तत्वों की वजह से जाने जाते हैं। यह जीवाणु संक्रमण और वायरल से लड़कर बुखार को जल्दी ठीक करने में मदद करते हैं। रात को 10 मुनक्का और अंजीर को पानी में भिगोकर रख दें। सुबह एक गिलास दूध में इसे उबाल लें। एक हफ्ते तक इस का सेवन करें। बुखार में फायदा मिलेगा। मुनक्के को अदरक के साथ पीसकर 1 घंटे के लिए पानी में भिगो के रख दें, उसके बाद इस मिश्रण को उबालें और इसका सेवन करें। 

मुनक्का खाने से लाभ यौन दुर्बलता में - 
यौन दुर्बलता की समस्या होने पर रोजाना मुनक्का खाएं क्योंकि यह कामेच्छा (sex power) को बढ़ाता है। मुनक्का में मौजूद एमिनो एसिड यौन दुर्बलता को दूर करता है। इस लिए तो शादी शुदा लोगों को पहली रात दूध का गिलास दिया जाता है जिसमें मुनक्का और केसर मिला होता है। रोजाना 10 मुनक्का को दूध में उबाल कर सेवन करें, इससे आपकी यौन दुर्बलता दूर हो जाएगी।

हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए मुनक्का खायें - 
कैल्शियम का भरपूर स्रोत होने के कारण मुनक्का हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है। इसमें बोरान (boran) नामक सूक्ष्म पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो कैल्शियम सोखने और हड्डियों तक कैल्शियम को पहुँचाने में मदद करता है। मुनक्का महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस (osteoporosis) की समस्या को रोकने में विशेष रूप से सहायक होता है। यह हड्डियों और जोड़ों के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। मुनक्के में पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है, जो हड्डियों को मजबूत करने में और उनके विकास में मदद करता है, जिससे ऑस्टियोपोरोसिस की संभावना कम हो जाती है। इसलिए आप रोज मुनक्का का उचित मात्रा में सेवन करें।

मुनक्का के फायदे आँखों के लिए - 
मुनक्का में विटामिन ए, बीटा कैरोटीन होता है जो आँखों के स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक होता है। इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं जो आँखों को फ्री रेडिकल्स से लड़ने में मदद करते हैं। मुनक्का को खाने से आँखों की कमज़ोरी, मांसपेशियों की क्षति, मोतियाबिंद आदि नहीं होते हैं। 10 मुनक्का को रात में पानी में भिगोकर रख दें। सुबह उठकर अच्छे से चबा कर खाएं, इस से आप की आँखों की रौशनी तेज़ होने लगेगी।

मुनक्का के लाभ त्वचा पर - 

मुनक्का पौष्टिक होता है। यह कम वसा और उच्च ऊर्जा प्रदान करता है। मुनक्का त्वचा को स्वस्थ और सुंदर रखने में मदद करता है। मुनक्का त्वचा की कोशिकाओं की रक्षा करता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट फ्री रेडिकल्स से त्वचा की कोशिकाओं को नुकसान होने से बचाते हैं। काला मुनक्का शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है और त्वचा को साफ और चमकदार बनाये रखता है। मुनक्का में विटामिन ए और ई की मात्रा होती है जो त्वचा की बाहरी परत में नई कोशिकाओं के विकास में मदद करती हैं।

मुनक्का में रेस्वेराट्रोल (resveratrol) पाया जाता है जो त्वचा के स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। यह रक्त से जहरीले और काले रंग की कोशिकाओं को हटा कर रक्त को शुद्ध करता है और त्वचा को साफ और चमकदार बनाता है। इसलिए आप रोज़ 5 से 10 मुनक्का खाएं।

मुनक्का के उपयोग बालों के लिए - 
मुनक्का में भारी मात्रा मे आयरन पाया जाता है जो बालों के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। आयरन की कमी के कारण बाल बेजान और झड़ने शुरू हो जाते हैं। मुनक्का में विटामिन सी बड़ी मात्रा में होता है जो बालों में प्राकृतिक रंग बनाए रखने में मदद करता है। मुनक्के का नियमित रूप से सेवन करना बालों को चमकदार और मोटा बनाने में मदद करता है क्योंकि इसमें विटामिन सी मौजूद होता है जो कोशिका की क्षति को रोकता है। इसकी वजह से स्केलप पर जलन और डैंड्रफ नहीं होते हैं।


मुनक्का के नुकसान - 

मुनक्का के नुकसान इस प्रकार हैं - जिस तरह मुनक्का का सेवन हमारे लिए फायदेमंद होता है, उसी तरह इस का अधिक सेवन कर नुकसानदायक हो सकता है। मुनक्का के अधिक सेवन से शरीर में कैलोरी की मात्रा अधिक हो जाती है और आप का वजन ज्यादा बढ़ सकता है जो आपके लिए अनेकों समस्याओं का कारण बन सकता है। मुनक्का में उच्च मात्रा में ट्राइग्लिसराइड्स होता है। मुनक्का के अधिक सेवन से मधुमेह, हृदय रोग, और फैटी लीवर की समस्याएँ हो सकती हैं। मुनक्के का अधिक सेवन करने से आपको उलटी, दस्त और बुखार जैसी समस्या भी हो सकती है।


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धुंधला दिखने के लक्षण, कारण, इलाज, दवा, उपचार

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धुंधला दिखने के लक्षण, कारण, इलाज, दवा, उपचार और परहेज

अचानक  से आंखों के सामने धूंधला सा छा जाता है और कुछ भी देखने से हमें वह चीजें साफ नहीं दिखती हैं। आंखों के यह धूंधला दिखाई देने के कई कारण हो सकते हैं, अगर यह समस्या बार- बार हो तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवाना बहुत जरूरी है।

धुंधला दिखना क्या होता है?

धुंधला व साफ न दिखना एक बहुत आम समस्या है और आमतौर पर इसमें चिंता करने की कोई बात नहीं होती है। धुंधला दिखने का मतलब यह हो सकता है कि आपको अपना चश्मा या कांटेक्ट लेंस बदलवाने की आवश्यकता है। हालांकि, थोड़े-थोड़े समय में धुंधला दिखना किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है और कुछ बीमारियों के कारण भी आपको अचानक से धुंधला दिखने लग सकता है। यह समस्या कुछ समय के लिए भी रह सकती है या लम्बे समय तक भी आपको प्रभावित कर सकती है व समय के साथ और भी बिगड़ सकती है।

ज़्यादातर मामलों में धुंधली दृष्टि किसी सामान्य कारण की वजह से होती है और इसका इलाज संभव होता है। लेकिन कुछ मामलों में यह किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है।

धुंधला दिखने के साथ आपको कुछ अन्य लक्षण भी हो सकते हैं, जैसे आंखों में दर्द, आंखों में सूखापन और आँखों के साइड में न देख पाना।

धुंधला दिखने का इलाज इसके कारण पर निर्भर करता है। निकट दृष्टि दोष (मायोपिया), दूर दृष्टि दोष (हाइपरमेट्रोपिया) और एस्टिग्मेटिज़्म जैसे विकारों के लिए चश्मे और लेंस का उपयोग किया जाता है।अगर आपको धुंधला दिख रहा है और आप इसके लिए कोई उपचार नहीं लेते, तो स्थिति बिगड़ सकती है और आपकी आँखों की रौशनी हमेशा के लिए जा सकती है।

धुंधला दिखने के लक्षण 

कुछ मामलों में, धुंधला दिखने के साथ-साथ एक या दोनों आंखों में कुछ अन्य लक्षण भी हो सकते हैं जिसका कोई न कोई कारण होता है। यह लक्षण निम्नलिखित हैं –
  • आंखों में दर्द होना
  • आंखों से रिसाव होना
  • आंखों के साइड से न देख पाना
  • सीधा न देख पाना
  • रात में ठीक से न देख पाना
  • आंख अधिक लाल होना
  • आंखों का सूखना
  • आंखों में खुजली होना
  • अधिक आंसू निकलना
  • आंखों से खून निकलना
  • पास की नज़र कमजोर होना
  • प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता (Photophobia)
  • आंखों के सामने धब्बे या तैरती हुई चीज़ें दिखना (Floaters or spots)

डॉक्टर को कब दिखाएं?

अगर आपको अचानक धुंधला दिखने लगता है और और निम्नलिखित लक्षण होते हैं, तो तुरंत अपने डॉक्टर के पास जाएं –
  • शरीर के एक साइड की मांसपेशियों को नियंत्रित न कर पाना
  • चेहरे की त्वचा का लटक जाना
  • तेज सिरदर्द होना
  • बोलने में दिक्कत
  • देखने में कठिनाई
  • अचानक दिखना बंद हो जाना
  • आंखों में बहुत तेज़ दर्द होना
  • यह लक्षण स्ट्रोक के जैसे होते हैं।

धुंधला दिखने के कारण और जोखिम कारक 

धुंधला दिखने की वजह मामूली या किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकती है। इसके कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

  • आंखों में सूखापन – “ड्राई आई सिंड्रोम” (आंखों में सूखापन) में आपकी ऑंखें पर्याप्त आंसू नहीं बनाती हैं, जिससे आपको धुंधला दिखने लगता है।
  • आंखों पर दबाव – कभी-कभी नींद पूरी न होने या ज़्यादा देर धूप में रहने से आंखों पर बहुत अधिक दबाव बनता है, जिससे कुछ समय के लिए धुंधला दिखने लगता है। यह आराम करने से ठीक हो जाता है।
  • नज़र कमजोर होना – दूर या पास की चीज़ें देखने में समस्या होने से धुंधला दिख सकता है।
  • एस्टिग्मेटिज़्म (Astigmatism) – “एस्टिग्मेटिज़्म” में “कॉर्निया” (Cornea) की गोलाई सामान्य नहीं होती, जिससे दूर की चीज़ें धुंधली दिखने लगती हैं।
  • प्रेगनेंसी – प्रेगनेंसी के दौरान हॉर्मोन के कारण आँखों की आकृति बदलती है, जिससे धुंधला दिख सकता है।
  • माइग्रेन – माइग्रेन में सिरदर्द होने से नज़र पर भी असर पड़ता है, जिससे धुंधला दिख सकता है।
  • दवाएं और सर्जरी – कुछ खाने वाली व आंख में डालने वाली दवाओं से धुंधला दिख सकता है। यह समस्या नज़र के लिए की जाने वाली “लेसिक” (LASIK) सर्जरी के कारण भी हो सकती है।
  • फ्लोटर्स (Floaters) – आँखों के सामने तैरती हुई चीज़ें दिखने से धुंधला दिख सकता है। यह समस्या ज़्यादातर उम्र के साथ होती है लेकिन अचानक से फ्लोटर्स दिखने पर अपने डॉक्टर के पास जाएं।
  • लेंस या चश्मा – गलत नंबर के लेंस या चश्मे पहनने से या अधिक समय तक लेंस लगा कर रखने से धुंधला दिखने की समस्या हो सकती है।

धुंधला दिखने के कुछ अन्य गंभीर कारण निम्नलिखित हैं –

  • स्ट्रोक
  • मल्टीप्ल स्क्लेरोसिस
  • अन्य कारण (जैसे ब्रेन ट्यूमर)
  • आंखों के संक्रमण और बीमारियां
  • मोतियाबिंद
  • ग्लूकोमा (काला मोतिया)
  • शुगर
धुंधला दिखने के जोखिम कारक क्या होते हैं?
  • हाल ही में आंख की सर्जरी होना या चोट लगना
  • आंखों की दवाएं लेना
  • धूम्रपान करना
  • बुढ़ापा
  • शुगर होना
  • गर्भावस्था
  • हृदय रोग होना
  • चिंता या तनाव होना
  • सही आहार न लेना
  • तंत्रिकाओं से सम्बन्धी समस्याएं होना
  • आंखों पर दबाव पड़ना
  • माइग्रेन या बार-बार सिरदर्द होना
  • आंखों का सूखापन होना
  • गर्भावस्था के दौरान माँ को कोई संक्रमण होना
  • तीस हफ़्तों के समय से पहले जन्म होना
  • जन्म के समय वज़न 1500 ग्राम से कम होना
  • “सिकल सेल एनीमिया” (Sickle cell anemia: शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी से लाल रक्त कोशिकाओं का सख्त हो जाना)
  • हाई बीपी होना
  • थायराइड होना
  • आंख का संक्रमण होना
  • ज़्यादा समय के लिए धूप में रहना
  • परिवार में से किसी को आंखों से सम्बंधित समस्याएं होना
  • परिवार में से किसी को चयापचय (Metabolic) या अनुवांशिक सम्बन्धी समस्याएं होना
धुंधला दिखने से बचाव 
धुंधली दृष्टि के कुछ कारणों से बचने का कोई तरीका नहीं है, लेकिन अपनी आंखों की देखभाल करने से जीवनशैली के कारण होने वाला दृष्टि का धुंधलापन रोका जा सकता है

स्वस्थ नज़र बनाए रखने के लिए निम्नलिखित उपाय करें –
  • बहुत अधिक या कम रौशनी में काम करने से आंखों पर दबाव पड़ता है। ऐसी रौशनी में काम करें जिसमें
  • आपकी ऑंखें पूरी तरह से खुल पाए और उनपर कोई दबाव न बने।
  • धूप में बाहर जाते समय आँखों पर धूप का चश्मा पहनें।
  • एंटीऑक्सीडेंट, ओमेगा 3 फैटी एसिड और विटामिन ए से भरपूर आहार लें।
  • सिगरेट न पिएं।
  • अपनी आंखों की नियमित जाँच कराएं। खासकर अगर आपके परिवार में किसी को कोई आंखों से सम्बंधित समस्या है या थी।
  • संक्रमण से बचने के लिए लेंस लगाते और उतारते समय अपने हाथ धोएं।
  • घर में पेंट व रिपेयर जैसे काम करते समय और भरी मशीन चलाते समय आँखों पर चश्मा पहनें।
  • अगर आप कंप्यूटर पर लगातार काम करते हैं या किताब पढ़ते हैं, तो हर 15 मिनट में अपनी आंखें उनसे हटाकर कहीं और देखें, जिससे आंखों को आराम मिलेगा।
  • नींद पूरी न होने से धुंधला दिख सकता है, इसीलिए पर्याप्त नींद लें।
  • अगर चिंता के कारण आपको धुंधला दिखता है, तो चिंता कम करने के लिए मनोचिकित्सक से बात करें, व्यायाम करें और डॉक्टर से बात पूछ कर दवाएं लें।
  • मैडिटेशन करें।
धुंधला दिखने का परीक्षण 
धुंधला दिखना अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, यह किसी समस्या का लक्षण होता है।

इस समस्या का पता लगाने के लिए आपके डॉक्टर सबसे पहले आपके लक्षणों की जांच करेंगे और आपकी व आपके परिवार के सदस्यों की आंखों से सम्बंधित समस्याओं की भी पूछताछ करेंगे।धुंधली दृष्टि की वजह का पता लगाने के लिए आपके डॉक्टर निम्नलिखित परीक्षण कर सकते हैं –

ब्लड टेस्ट (Blood test) – ब्लड टेस्ट से यह पता चलता है कि खून में कोई बैक्टीरिया मौजूद है या नहीं। आपके डॉक्टर ब्लड टेस्ट से सफ़ेद रक्त कोशिकाओं की गिनती का भी पता लगा सकते हैं, जिससे संक्रमण का पता चलता है। 
रेफ्रेक्शन टेस्ट (Refraction test) – इस टेस्ट से लेंस और चश्मे के लिए आपकी आँखों के नंबर का पता चलता है। इसमें आपको एक चार्ट पढ़ने के लिए कहा जाता है जिससे यह पता चलता है कि आपको चश्मे की ज़रूरत है या नहीं।
टोनोमेट्री (Tonometry) – इस परीक्षण में आपको पूरी ऑंखें खोलकर सामान्य तरह से साँस लेने के लिए कहा जाता है। डॉक्टर एक उपकरण के प्रयोग से एक-एक कर के आपकी दोनों आंखों के दबाव को देखते हैं।
स्लिट-लैंप टेस्ट (Slit-lamp test) – इस परीक्षण में आपके डॉक्टर एक मशीन की मदद से आंख के आगे और पीछे की बनावट को देखेंगे। इस परीक्षण से उन्हें यह पता चलता है कि आंख ठीक से काम कर रही है या नहीं।

धुंधला दिखने का इलाज 
धुंधला दिखने का उपचार इसकी वजह से पर निर्भर करता है।

  • फ्लोटर्स (Floaters) –  आँखों के सामने तैरती हुई वस्तुएं दिखना अक्सर अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन ठीक न होने पर इसके लिए लेज़र सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। इस सर्जरी में लेज़र की किरणों का उपयोग कर के फ्लोटर्स को ठीक किया जाता है जिससे या तो वह गायब हो जाते हैं या फिर उनसे होने वाली परेशानी कम हो जाती है।
  • मायोपिया (Myopia)/ हाइपरमेट्रोपिया (Hypermetropia)/ एस्टिग्मेटिज़्म (Astigmatism)/ प्रेस्बायोपिया (Presbyopia) – इन समस्याओं के कारण दृष्टि में होने वाले धुंधलेपन को आमतौर पर चश्मे या लेंस से ठीक किया जाता है। इनके इलाज के लिए सर्जरी का भी उपयोग किया जा सकता है, जिससे चश्मा या लेंस लगाने की आवश्यकता नहीं रहती।
  • ड्राई आई सिंड्रोम (Dry eye syndrome) –  आँखों के सूखने पर आर्टिफीशीयल (Artificial) आंसुओं के उपयोग से आँखों में नमी बढ़ाई जा सकती है, लेकिन कुछ गंभीर मामलों में दवाओं की और ऐसे उपकरणों की आवश्यकता होती है जो आंसू बाहर निकालने वाली नली को बंद करते हैं और आँख की नमी बढ़ाते हैं।
  • थकान – पूरी नींद लें और कोशिश करें कि आपकी ऑंखें सूखे नहीं व थकान न हो। अगर आवश्यकता है तो अपने डॉक्टर से पूछ कर आंखों में नमी बनाने वाली दवाओं का प्रयोग करें। (और पढ़ें – थकान दूर करने के घरेलू उपाय)
  • शुगर – अगर आपको शुगर के कारण अचानक धुंधला दिखने लगा है, तो आपको दवाओं या अन्य उपायों से शुगर को नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है।
​अचानक धुंधला दिखना एक सामान्य समस्या हो सकती है जो अपने आप ठीक हो जाती है। हालांकि, दोहरा दिखना या एक सीध के अलावा साइड में कुछ न देख पाने का मतलब एक गंभीर समस्या हो सकती है जिसका तुरंत इलाज होना चाहिए।

धुंधला दिखने की जटिलताएं 
अगर आपको किसी नज़र की समस्या के कारण धुंधला दिख रहा है, तो यह आसानी से ठीक किया जा सकता है। हालांकि, अगर आपको शुगर, ग्लूकोमा या मोतियाबिंद के कारण धुंधला दिख रहा है और आप इसके लिए कोई इलाज नहीं ले रहे हैं, तो इससे गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं और आपकी आंखों की रौशनी भी जा सकती है।

आंखों से धुंधला दिखाई देने पर घरेलू उपाय
आंवला जूस – अगर आंखों से धुंधला दिखाई देता है तो प्रतिदिन आंवला जूस का सेवन करना चाहिए आंवला जूस पीने से आंखों की रोशनी तेज होती है इसके लिए दो चम्मच आंवला जूस आधे कप पानी में मिलाकर पीने से शीघ्र ही आंखों की ज्योति बढ़ती है।

गुलाबजल  – पूरी तरह से ठीक नींद नहीं ले पाने के कारण कभी-कभी आंखें लाल हो जाती है और दर्द करने लगती है इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए दिन में 3 बार आंखों में गुलाबजल डालने से आंखों की लाली दूर होती है और दर्द में आराम मिलता है.

मिश्री काली मिर्च और सौंफ – आंखों में जलन होने पर मिश्री काली मिर्च और सौंफ को पीसकर समान मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें अब इस जून को प्रतिदिन दिन में दो बार सेवन करें ईश्वर आंखों की जलन दूर होगी और आंखों की ज्योति बढ़ेगी.

ज्यादा टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल आदि चलाने के कारण या, धूप में जाने पर प्रदूषण के कारण आंखों से पानी निकलता हैं तो रात को त्रिफला के चूर्ण को पानी में भिगोकर रख दें और सुबह उठकर इस पानी छानकर इस पानी से आंखों में छींटे मारे इससे आंखों की ज्योति बढ़ेगी और आंखों के कई रोग जैसे कम दिखाई देना, धुंधलापन, पीलापन, आँखो की लाली ओर आँखो की जलन आदि दूर होंगे। यह एक रामबाण उपाय है।

आंवला और गाजर के जूस – किसी किसी को आंखों में तेज जलन होती है जिसका कारण है आंखों में सूखापन आंखों में पानी का ना बनना इस समस्या से निदान के लिए प्रतिदिन आंवला और गाजर के जूस का सेवन करने से आंखों की रोशनी बढ़ती है और आंखों का सूखापन दूर हो जाता है।

आंखों के लिए ऐक्सरसाइज
कमजोर आंख की मसल्स को ठीक करने के लिए एक उपकरण द्वारा आंख से इमेज देखने को कहा जाता है और फिर उन्हें दोनों आंखों से जोड़ने को कहा जाता है.

नाक की सीध में हाथ को तानते हुए उस में पैन या पैंसिल पकड़ते हैं. पैन की नोक पर नजर टिका कर उसे धीरेधीरे नाक के पास लगभग 10 सैंटीमीटर दूर तक लाते हैं. फिर वापस हाथ ताने हुए नाक की सीध में ले जाते हैं. इस प्रक्रिया से भी आंख की मसल्स में ताकत आती है.

जिस आंख से ठीक दिख रहा है, उसे हाथ से बंद करने को कहा जाता है और जिस से कम दिख रहा है उस से देखने को कहा जाता है ताकि देखने की ताकत डैवलप हो.

इस के अलावा यदि आंख चोटग्रस्त हुई है या उस में कैटरैक्ट या अन्य कोई दोष हो गया है, तो उसे सर्जरी द्वारा दूर किया जाता है पर ध्यान देने वाली बात यह है कि आंख में कोई बीमारी हो या कम दिखे तो तुरंत डाक्टर से संपर्क करें ताकि आंख ठीक हो सके. डाक्टर चश्मे के लिए कहें तो सही चश्मे का प्रयोग करें. आंखें अनमोल हैं, इन्हें संभाल कर रखें.

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आंखों की रोशनी बढ़ाने के घरेलू उपाय

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स्वस्थ रहना, आकर्षक शरीर पाना यह सब आजकल बहुत ही लोकप्रिय शब्द बन गए हैं जो हमें सुनने को मिलते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं वजन घटना, दिल की सेहत का ख्याल रखने के साथ-साथ आँखों की देखभाल भी बेहद ज़रूरी है। एक स्वस्थ जीवनशैली के लिए आँखों का भी महत्वपूर्ण योगदान है।

आँखें हमारे शरीर का बहुत ही ज़रूरी अंग हैं। इसी के ज़रिए हम इस खूबसूरत दुनिया को देख सकते हैं। इतना ही नहीं यह हमारी खूबसूरती को बढ़ाने में भी काम आती हैं। खूबसूरत आँखें हमें एक अलग पहचान देती हैं।

हमारी आँखों का स्वास्थ्य हम किस तरह का भोजन करते हैं इस पर निर्भर करता है और इस बात को कोई झुठला नही सकता। खाद्य पदार्थो में पोषक तत्वों का समावेश हमारी आँखों से संबंधित कई समस्याओं को रोकने में मदद करती है। यहा तक की सही पोषक तत्वों के लेने से आँखों पर उम्र का असर भी कम होता है। आइए जानते हैं आँखों के लिए कुछ अच्छे आहार जिनकी मदद से प्राकृतिक रूप से आँखों की रोशनी में वृद्धि की जा सकती है।

प्रकृति ने हमें वो सब कुछ दिया है जो हमारे स्वास्थ्य को सही रखने के लिए ज़रूरी है। इसलिए अपने आहार के द्वारा उन चीजों को ज़्यादा से ज़्यादा लेने की कोशिश करें। अपने आहार में एंटीऑक्सीडेंट (antioxidant) से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन करें।

हमें अपने आहार में ऐसे खाद्य पदार्थों को शामिल करना है जिसमें विटामिन्स, जिंक, सेलेनियम, ओमेगा 3 फैटी एसिड आदि शामिल हों। रोज अपने खाने में सलाद को ज़रूर शामिल करें, साथ ही साथ नाश्ते में फल खाने से बेहतर और कुछ नहीं है।

आंखों की रोशनी बढ़ाने के उपाय - 
आँखें आपके शरीर का सबसे ज़रूरी और खूबसूरत हिस्सा हैं। देखने की क्षमता मानव जाति के लिए एक असाधारण उपहार है। इसलिए आँखों की देखभाल अत्यंत आवश्यक है। दृष्टि होने से हम अपने चारों ओर एक रंगीन और विविध दुनिया देख पाते हैं और स्पष्ट रूप से देखने की क्षमता सब कुछ बेहतर बना देती है। आँखों की माशपेशियां शरीर में सबसे अधिक क्रियाशील होती हैं। तो आइए आंखों की रोशनी बढ़ाने के उपाय और तरीके के बारे में जानते हैं -

आँखों की रोशनी बढ़ाने के उपाय आंवला है - 
आंवला आँखों की रोशनी बढ़ाने के लिए बहुत ही अच्छा घरेलु उपाय है। इसमें कई पोषक तत्व मौजूद होते हैं, खासकर विटामिन सी और अन्य एंटीऑक्सीडेंट। विटामिन सी कई स्वस्थ कोशिकाओं को बढ़ावा देता है।

आंवला का इस्तेमाल दो तरीकों से करें -

पहला तरीका -
  • सबसे पहले दो से चार चम्मच आंवला के जूस को आधा कप पानी में डाल लें।
  • इस मिश्रण को पूरे दिन में दो बार पियें।
  • आप इस जूस को शहद के साथ भी मिलाकर पी सकते हैं।
दूसरा तरीका -
  • इसके अलावा आप आंवला मुरब्बा भी खा सकते हैं, जो स्वाद में मीठा होता है।
  • इस उपाय को रोजाना कुछ महीने के लिए दोहराएं।
आँखों की रोशनी बढ़ाने के घरेलू उपाय में वाइल्ड एस्परगस का इस्तेमाल करें - 
वाइल्ड एस्परगस जिसे शतावरी भी कहाँ जाता है, आँखों की रोशनी को ठीक करने के लिए यह एक और बेहतरीन उपाय है। आयुर्वेद के अनुसार, यह जड़ी बूटी आँखों को लम्बे समय तक स्वस्थ रखती है।

वाइल्ड एस्परगस का इस्तेमाल कैसे करें -
  • सबसे पहले एक चम्मच वाइल्ड एस्परगस को एक चौथाई शहद के साथ मिला लें।
  • इस मिश्रण को पूरे दिन में दो बार गर्म-गर्म गाय के दूध के साथ पियें।
  • कुछ महीने के लिए इस उपाय का सेवन करते रहें।
आँखों की रोशनी बढ़ाने के लिए सौंफ का उपयोग करें - 
सौंफ में पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं जो आँखों को स्वस्थ रखते हैं। यह मोतियाबिंद के असर को भी कम करते हैं। प्राचीन रोम में, सौंफ को रौशनी के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था।

सौंफ को इस्तेमाल कैसे करें -
  • सबसे पहले एक कप बादाम, सौंफ और मिश्री या साधारण चीनी को मिक्सर में डाल लें।
  • अब पूरी सामग्री का एक पाउडर बना लें।
  • रात को सोने से पहले एक चम्मच पाउडर को एक ग्लास गर्म दूध के साथ पियें।
  • इस उपाय को 40 दिन के लिए रोजाना दोहराएं।
आँखों की रोशनी बढ़ाने में बादाम करे मदद - 
बादाम को आँखों की रौशनी बढ़ाने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि बादाम ओमेगा3 फैटी एसिड से समृद्ध होता है, इसमें विटामिन ई और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। इससे यादाश्त और एकाग्रता बढ़ाने में भी मदद मिलती है।

बादाम का इस्तेमाल कैसे करें -
  • सबसे पहले रातभर पांच से दस बादाम को पानी में भिगोकर रख दें।
  • फिर सुबह बादाम को छील लें और छीलने के बाद उन्हें मिक्सर में डाल दें।
  • इस पेस्ट को एक ग्लास दूध के साथ रोजाना पियें।
आँखों की रौशनी बढ़ाने के नुस्खे में बिलबेरी उपयोगी है -
बिलबेरी आँखों की रौशनी बढ़ाने के लिए एक और बेहतरीन उपाय है। यह रात में भी आँखों की रौशनी की समस्या को ठीक करता है। साथ ही यह मोतियाबिंद और ग्लूकोमा से भी आँखों को बचाता है।

बिलबेरी का इस्तेमाल कैसे करें -
  • एक चौथाई कप बिलबेरी के फल को छीलकर रोजाना खाएं।
  • आप डॉक्टर से सलाह लेने के बाद बिलबेरी के सप्लीमेंट्स भी ले सकते हैं। आमतौर पर, बिलबेरी को पूरे दिन में दो बार हफ्ते में चार दिन 160 मिलीग्राम खाने की सलाह दी जाती है।
नोट - इस उपाय का इस्तेमाल करने से पहले अपने डॉक्टर से बात ज़रूर करें।

आँखों की रौशनी बढ़ाने के घरेलू उपाय में जिन्कगो बिलोबा फायदेमंद है - 
जिन्कगो बिलोबा परिसंचरण और आँखों के रक्त प्रवाह को सुधारता है। साथ ही, आँखों की रौशनी को सुधारने के लिए, यह ग्लूकोमा और मैक्युलर डीजेनेरेशन की समस्या से भी आपको बचाता है। एक रिसर्च के अनुसार कहाँ गया है कि यह रेटिनोपैथी के लिए भी बेहद फायदेमंद है।

जिन्कगो बिलोबा चिंता से भी राहत दिलाता है और यादाश्त और एकाग्रता को भी सुधारता है, खासकर जो लोग डिमेंशिया और अल्जाइमर बिमारी से पीड़ित होते हैं। 120 मिलीग्राम जिन्कगो बिलोबा के कैप्सूल्स रोजाना दो से तीन खुराक में बाँट लें।

नोट - यह जड़ी बूटी बच्चों को नहीं दी जाती। साथ ही, जो लोग शुगर से पीड़ित होते हैं वो इस जड़ी बूटी को लेने से पहले डॉक्टर से बात कर लें।

आंखों की रोशनी बढ़ाने का उपाय है अच्छी नींद - 
आपको यह बताने की ज़रूरत नही कि आपकी कीमती आँखों को समुचित आराम चाहिए होता है। आपको यह सुनिश्चित करने की ज़रूरत है कि आप उन्हें सीमा से परे थकने ना दें। उचित विश्राम के लिए दैनिक 7-8 घंटे की एक अच्छी नींद लें। नींद आँखों के तनाव से छुटकारा पाने और आपको ताज़ा रखने में मदद करती है। रात में देर तक जागना आपकी दृष्टि खराब कर सकता है।

आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए करना चाहिए व्यायाम - 
आँखों के लिए बहुत व्यायाम हैं जो आप अपनी दृष्टि को बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। ऐसे ही एक अभ्यास के लिए, एक आरामदायक स्थिति में बैठें और अपने अंगूठे के साथ अपने हाथ को बाहर खींछे। अब अपने अंगूठे पर ध्यान केंद्रित करें। धीरे-धीरे अपने अंगूठे को अपने करीब लाएं, हर समय ध्यान केंद्रित करते हुए, जब तक आपका अंगूठा आपके चेहरे के सामने लगभग 3 इंच तक ना आ जाए और फिर दूर करें जब तक आपका हाथ पूरी तरह से फैल ना जाए। कुछ मिनटों के लिए यह करें। यह व्यायाम ध्यान केंद्रित करने और आंख की मांसपेशियों में सुधार लाने में मदद करता है। एक और उपयोगी व्यायाम है, अपनी आँखो को बाएं किनारे से दाहिने किनारे तक ले जाएं, फिर ऊपर की तरफ भौं केंद्रित करें और फिर नीचे की ओर नाक की नोंक पर देखें। आप ये अभ्यास दैनिक रूप से दिन में कई बार कर सकते हैं।

आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए क्या खाना चाहिए - 
आंखों के लिए खाना चाहिए शकरकंद - 
आपने हमेशा से सुना होगा कि आँखों की रोशनी बढ़ाने के लिए गाजर का सेवन करना चाहिए। लेकिन हम आपको बता दें की शकरकंद में भी गाजर की तरह बीटा कैरोटीन (Beta Carotene) पाया जाता है। आप शकरकंद का सेवन अपनी पसंद के अनुसार कर सकते हैं। या तो आप इसे थोड़े से जैतून के तेल में तल लें या फिर इसे उबाल कर छिलकें उतार लें। फिर दूध और चीनी के साथ मिलाकर खाएं। इसमें विटामिन सी और फाइबर भी मौजूद होता है जो कि आँखों को डैमेज होने से बचाता है। साथ ही साथ डैमेज सेल्स कि मरम्मत भी करता है।

आंखों के लिए आहार है सूखे मेवे - 
सूखे मेवे सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं। यह बात तो हम सभी जानते हैं। यह आँखों के लिए भी फायदेमंद हैं क्योंकि सूखे मेवे में विटामिन मौजूद होतें हैं जो की कोलेस्ट्रॉल को संतुलित रखने में मदद करतें हैं। यह आँखों में विटामिन ए की ज़रूरत को पूरा करतें हैं। सूखे मेवे में काजू, बादाम, मूँगफली, अखरोट, किशमिश, पिस्ता सभी फायदेमंद हैं।

आँखों की रौशनी तेज करने के लिए खाना चाहिए ब्रोकोली - 
ब्रोकोली में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स (antioxidants) ब्रोकोली को विटामिन ए का अच्छा स्रोत बनाती हैं। इसलिए यह आँखों की सेहत के लिए बहुत ही अच्छा आहार है। आँखों के स्वास्थ्य के लिए आप इसे उबाल कर भी खा सकते हैं या फिर सलाद के रूप में भी खा सकतें हैं।

आंखों की रोशनी बढ़ाने के तरीके के लिए खाएं गाजर - 
आँखों की रोशनी बढ़ाने की जब बात आती है तो उस सूची में गाजर का नाम सबसे ऊपर आता है। यह आँखों के लिए एक स्वास्थ्यवर्धक आहार है। इसमे बीटा कैरोटीन (Beta Carotene) मौजूद होता है जो आँखों की मांसपेशी के पतन को रोकने के लिए बहुत आवश्यक है। गाजर के अलावा संतरे, नींबू और खट्टे फल भी विटामिन बी-12 और बीटा कैरोटीन (Beta Carotene) के अच्छे स्रोत हैं जो आपकी आँखों की रोशनी बढ़ाने में मदद करतें हैं।

आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए खाएं मछली - 
ताजी सालमोन मछली का सेवन भी आँखों के लिए बहुत फायदेमंद होती है। क्योकि यह ओमेगा 3 फैटी एसिड का एक अच्छा स्रोत माना जाता है। यह आँखों की छोटी छोटी रक्त वाहिकाओं को मजबूत बनाती है। साथ ही साथ यह ड्राइ आइ सिंड्रोम (dry eye syndrome) और मोतियाबिंद जैसे लक्षणों से भी बचाव करती है। इसलिए हफ्ते में दो बार मछली का सेवन ज़रूर करना चाहिए।

आंखों की रोशनी बढ़ाने के नुस्खे में खाएं आँवला -
आँवला विटामिन ए, विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट के साथ समृद्ध होता है और आँखों की देखभाल के लिए बहुत अच्छा है। आँवला रेटिना की कोशिकाओं के समुचित कार्य को भी सुनिश्चित करता है। आप आँवले का कच्चे रूप में या एक अचार के रूप में भी उपभोग कर सकते हैं। आप स्वस्थ आँखों के लिए एक गिलास आँवले का रस हर दिन पी सकते हैं।

ब्लूबेरी का सेवन है नेत्र ज्योति बढ़ाने का उपाय - 
यह एक जड़ी बूटी है जो एंटीऑक्सीडेंट के साथ भरी हुई है। यह रेटिना को उत्तेजित करती है और दृष्टि में सुधार भी करती है। इसके अलावा, यह विभिन्न नेत्र विकारों से भी सुरक्षा प्रदान करती है जैसे मांसपेशियों का अध: पतन। यह फल विशेष रूप से अच्छा है और बेहतर नेत्र दृष्टि के लिए आहार में शामिल किया जा सकता है।

आंखों की रोशनी तेज करने के लिए खाएं नट्स - 
सूखे मेवे और नट्स खाना भी आँखों के लिए फायदेमंद होता है। नट्स जैसे बादाम में ओमेगा -3 फैटी एसिड और विटामिन ई होता है जो आंखों के लिए अच्छा है। यह भूख को संतुष्ट कर जंक फूड की जगह इस्तेमाल किया जा सकता है।

दृष्टि में सुधार के लिए आहार है सौंफ - 
सौंफ एक महान जड़ी बूटी है जो प्राचीन रोम के लोगों द्वारा 'दृष्टि की जड़ी बूटी' के रूप में बुलाई जाती थी। यह पोषक तत्वों और एंटीऑक्सीडेंट के साथ भरी हुई है जो दृष्टि में सुधार कर सकते हैं। रात का खाना खाने के बाद, आप हर रात कुछ चीनी के साथ सौंफ खा सकते हैं और इसके बाद गर्म दूध का एक गिलास ले सकते हैं।

आँखों की रौशनी तेज करने के घरेलू उपाय है हरी सब्ज़ियों का सेवन - 
एक बहुत अच्छे नेत्र स्वास्थ्य को बनाए रखने में पालक, चुकंदर, मीठे आलू, शतावरी, ब्रोकोली, वसायुक्त मछली, अंडा आदि अन्य खाद्य पदार्थ भी फायदेमंद होते हैं।

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आंखों के लिए कौन सा विटामिन आवश्यक होता है ?

 
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हम में से ज्यादातर लोग वेट लॉस के लिए या फिर खुद को बेहतर शेप में स्लिम-ट्रिम रखने के लिए तो डाइट का पूरा ध्यान रखते हैं। लेकिन हमारे शरीर के बाकी हिस्से जिसमें हमारी आंखें और दृष्टि सबसे महत्वपूर्ण है, उसका क्या? हमारी आंखें बेहतर तरीके से काम कर सकें, इसके लिए उन्हें कई अलग-अलग तरह के विटामिन्स और पोषक तत्व की जरूरत होती है।

खासकर जब हमारी उम्र बढ़ने लगती है तो इस दौरान आंखों का ख्याल रखना और भी जरूरी हो जाता है क्योंकि उम्र से जुड़ी कई तरह की बीमारियां हैं जो हमारी आंखों पर बुरा असर डालती हैं जैसे - डायबिटीज की वजह से होने वाली डायबिटिक रेटिनोपैथी की समस्या, उम्र से जुड़ा मैक्युलर डीजेनेरेशन, मोतियाबिंद, ग्लूकोमा आदि। वैसे तो कई अलग-अलग फैक्टर्स हैं जिनकी वजह से इस तरह की बीमारियां हो सकती हैं, लेकिन इनमें पोषण की भी अहम भूमिका होती है। 

ऐसे कई विटामिन हैं जो हमारी आंखों की सेहत को बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं। इसके अलावा कई एंटीऑक्सीडेंट भी हैं जो शरीर में मौजूद फ्री रैडिकल्स की वजह से होने वाले इन्फ्लामेशन और ऑक्सिडेटिव डैमेज के कारण आंखों को होने वाले नुकसान से सुरक्षित रखने में मदद करते हैं। अगर किसी खास तरह के विटामिन की शरीर में कमी हो जाए तो इसकी वजह से भी मोतियाबिंद और एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजेनरेशन जैसी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। कई रिसर्च में यह बात साबित भी हो चुकी है कि ऐसे कई विटामिन और मिनरल हैं जो इन बीमारियों से बचाने में मदद कर सकते हैं। 

इस आर्टिकल में हम आपको आंखों की सेहत के लिए कौन से विटामिन्स और पोषक तत्व सबसे जरूरी हैं उनके बारे में बता रहे हैं।

आंखों के लिए जरूरी है विटामिन ए - 

आंखों का बाहरी आवरण जिसे कॉर्निया कहते हैं उसे मेन्टेन रखकर हमारे विजन को क्लीयर बनाने में अहम भूमिका निभाता है विटामिन ए। अगर व्यक्ति के शरीर में विटामिन ए की कमी हो जाए और समय पर इसका इलाज न हो तो जीरोफ्थैल्मिया (शुष्काक्षिपाक रोग) नाम की गंभीर बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। जीरोफ्थैल्मिया, तेजी से बढ़ने वाली आंखों की बीमारी है जिसकी शुरुआत रतौंधी (नाइट ब्लांइनेस) से होती है। अगर विटामिन ए की कमी जारी रहे तो आंखों में मौजूद आंसू की थैली और आंखें सूखने का खतरा बढ़ जाता है।

कई रिसर्च में यह बात साबित हो चुकी है कि विटामिन ए से भरपूर डाइट का सेवन करने से मोतियाबिंद और एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजेनेशन (एएमडी) जैसी बीमारियों के खतरे को कम किया जा सकता है। लिहाजा हमें अपनी डाइट में विटामिन ए से भरपूर चीजों को शामिल करना चाहिए और अगर शरीर में विटामिन ए की ज्यादा कमी हो जाए तो इसके लिए विटामिन ए सप्लिमेंट्स का भी सेवन करने की सलाह दी जाती है। 

गाजर, लाल शिमला मिर्च, कद्दू, शकरकंद, पालक, केला, लेटस ये कुछ ऐसी सब्जियां है जो विटामिन ए से भरपूर होती हैं। इसके अलावा कॉड लिवर ऑयल, सैल्मन, गोट चीज, क्रीम चीज, अंडा आदि में भी विटामिन ए होता है।

आंखों के लिए जरूरी है विटामिन ई -

हमारे शरीर में जब फ्री रैडिकल्स और एंटीऑक्सिडेंट्स के बीच असंतुलन हो जाता है तो इसकी वजह से ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस की समस्या होने लगती है और इस कारण भी आंखों से जुड़ी कई तरह की बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। विटामिन ई एक शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट है जो कोशिकाओं को सुरक्षित रखने में मदद करता है जिसमें आंखों की कोशिकाएं भी शामिल हैं। कई स्टडीज में यह सुझाव दिया गया है कि विटामिन ई से भरपूर डाइट का सेवन करने से उम्र बढ़ने के कारण होने वाले मोतियाबिंद को रोकने में मदद मिलती है।

लिहाजा पर्याप्त मात्रा में विटामिन ई से भरपूर चीजों का सेवन करना आंखों की सेहत के लिए बेहतर माना जाता है। सूखे मेवे और बीज, कुकिंग ऑइल, सैल्मन, एवोकाडो और हरी पत्तेदार सब्जियों को विटामिन ई का अच्छा सोर्स माना जाता है।

आंखों के लिए जरूरी है विटामिन सी - 

विटामिन ई की ही तरह विटामिन सी भी एक बेहद शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट है जो ऑक्सिडेटिव डैमेज के खिलाफ आंखों को सुरक्षित रखने में मदद करता है। ऑक्सिडेटिव डैमेज की वजह से कोर्टिकल मोतियाबिंद और न्यूक्लियर मोतियाबिंद ये 2 बीमारियां हो सकती हैं। विटामिन सी कोलेजन बनाने में भी मदद करता है। यह एक प्रोटीन है जो हमारी आंखों को आकार देने में मदद करता है खासकर कॉर्निया और स्क्लेरा को। कई रिसर्च में यह बात सामने आ चुकी है कि विटामिन सी मोतियाबिंद होने के खतरे को कम करने में मदद करता है। एक ऑब्जर्वेशनल स्टडी में दिखाया गया है कि अगर रोजाना 490 एमजी विटामिन सी का सेवन किया जाए तो इससे मोतियाबिंद होने के खतरे को 75 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। 

संतरा, मौसंबी, आंवला, किवी, स्ट्रॉबेरी, नींबू जैसे खट्टे फलों के अलावा लाल-पीली और हरी शिमला मिर्च, ब्रोकली, हरा साग और केल जैसी सब्जियों में विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है और इसलिए इन्हें हमें अपनी रोजाना की डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए।

आंखों के लिए जरूरी है विटामिन बी -

कई अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने पाया है कि विटामिन बी6, बी9 और बी12 भी आंखों की सेहत पर पॉजिटिव असर डालने का काम करता है। इन अलग-अलग विटामिन बी का कॉम्बिनेशन होमोसिस्टिन के लेवल को कम करने में मदद करता है। यह हमारे शरीर में मौजूद एक प्रोटीन है जिसका संबंध इन्फ्लामेशन और एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजेनेशन के बढ़े हुए खतरे से है। महिलाओं में हुई एक क्लिनिकल स्टडी में यह बात सामने आयी कि जिन महिलाओं ने विटामिन बी6 और बी9 के साथ विटामिन बी12 के 1 हजार एमसीजी का सेवन किया उनमें एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजेनेशन बीमारी का खतरा 34 प्रतिशत कम हो गया।

लिहाजा हमें अपनी डाइट में दूध, चीज, अंडा, मीट जैसे- चिकन और रेड मीट, टूना, मैकेरेल और सैल्मन जैसी मछलियां और पालक और केल जैसी हरी पत्तेदार सब्जियों को जरूर शामिल करना चाहिए ताकि शरीर में विटामिन बी की कमी न हो।

आंखों के लिए जरूरी है ओमेगा-3 फैटी एसिड - 

ओमेगा-3 फैटी एसिड एक प्रकार का पॉलीअनसैचुरेटेड फैट है। हमारी आंखों में मौजूद रेटिना की कोशिका झिल्ली (सेल मेम्ब्रेन) में डीएचए की सघनता अधिक होती है। डीएचए एक विशेष प्रकार का ओमेगा-3 ही है। आंखों की कोशिकाएं बनाने में मदद करने के अलावा, ओमेगा-3 फैटी एसिड में एंटी-इन्फ्लामेटरी प्रॉपर्टीज भी होती हैं जो डायबिटिक रेटिनोपैथी की बीमारी को होने से रोकने में मदद करती है।

इसके अलावा बहुत से लोगों में ड्राई आइज यानी आंखों में सूखेपन की भी बीमारी होती है। इसमें आंसू की कमी की वजह से आंखों में धुंधलापन, असहजता और सूखापन जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। ऐसे लोगों में आंसू का अधिक उत्पादन करने में भी मदद करता है ओमेगा-3 फैट। अपनी डाइट में ओमेगा-3 फैटी एसिड की मात्रा को बढ़ाने के लिए हमें अलसी के बीज, चिया के बीज, सोया, नट्स खासकर अखरोट, सैल्मन, टूना और सार्डिन जैसी मछलियां और कैनोला ऑइल जैसी चीजों का सेवन करना चाहिए।

आंखों के लिए जरूरी है लूटिन - 

लूटिन, कैरोटेनॉयड फैमिली का हिस्सा है जो हमारी आंखों के रेटिना और मैक्युला में पाया जाता है। लूटिन, हानिकारक ब्लू लाइट को फिल्टर करके आंखों को होने वाली हानि से बचाने में मदद करता है। कई अध्ययनों में यह बात साबित भी हो चुकी है कि लूटिन, जो कि पौधों से मिलने वाला कम्पाउंड है वह मोतियाबिंद और एज-रिलेटेड मैक्युलर डीजेनेरेशन जैसी बीमारियां होने से भी बचाता है।

एक कंट्रोल्ड स्टडी में मोतियाबिंद से पीड़ित मरीजों में लूटिन के संभावित फायदे देखने को मिले। यह स्टडी करीब 2 साल तक हुई जिसमें यह बात सामने आयी कि जिन लोगों ने हफ्ते में 3 बार 15 एमजी लूटिन सप्लिमेंट्स का सेवन किया उनकी दृष्टि में सुधार देखने को मिला। हालांकि, इसके लिए जरूरी नहीं है कि आप सप्लिमेंट्स का ही सेवन करें। फल और सब्जियां जिसमें लूटिन पाया जाता है उनके सेवन से भी आप इसकी कमी को पूरा कर सकते हैं।

हरी पत्तेदार सब्जियां जैसे- केल और पालक और ब्रोकली के अलावा अंडे का पीला भाग (जर्दी), शिमला मिर्च और अंगूर आदि लूटिन का बेहतरीन सोर्स है।

आंखों के लिए जरूरी है जिंक - 
जिंक एक ऐसा मिनरल है जो रेटिना, कोशिका झिल्ली और आंखों की प्रोटीन संरचना की सेहत को बनाए रखने में मदद करता है। जिंक की मदद से विटामिन ए, लिवर से रेटिना तक पहुंचता है ताकि मेलेनिन का उत्पादन हो सके। मेलेनिन एक ऐसा पिग्मेंट है जो यूवी लाइट से आंखों की रक्षा करता है। अमेरिकन ऑप्टोमेट्रिक एसोसिएशन की मानें तो जिन लोगों को एएमडी की बीमारी होती है या जिनमें इसका खतरा अधिक होता है उन्हें जिंक सप्लिमेंट का सेवन करना चाहिए। रोजाना करीब 40 सेस 80 एमजी जिंक को अगर कुछ निश्चित एंटीऑक्सिडेंट्स के साथ लिया जाए तो एएमडी बीमारी के बढ़ने का खतरा 25 प्रतिशत तक कम हो जाता है। यह दृष्टि हानि को भी 19 प्रतिशत तक कम कर सकता है।

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अगर आंखों से जुड़ी हो रही है ये समस्याएं तो हो जाएं सावधान,करे यह उपाय

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हमारे शरीर के हर हिस्से के लिए किसी न किसी विटामिन की जरूरत पड़ती है तो ठीक इसी तरह आंखों के लिए भी विटामिन-बी (Vitamin-B) जरूरी होता है। अगर इसकी कमी हो जाती है तो इसका सीधा असर हमारी आंखो पर पड़ता है।
आजकल के भागदौड़ भरे जीवन में इंसान अपनी सेहत का ख्याल रखना ही भूल जाता है। उसे खुद के प्रति होश तब आता है जब बीमारी उसके शरीर को पूरी तरह अपने वश में कर चुका होता है। ऐसे में अगर हम पहले ही अपनी सेहत के लिए सर्तक हो जाएं तो कई बीमारी की चपेट में आने से बचा जा सकता है। आज हम आपके आंखों से जुड़ी समस्या के बारें में बताने जा रहे हैं यदि आपको भी ऐसे कुछ लक्षण की शिकायत दिखें तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

दरअसल, हमारे शरीर के हर हिस्से के लिए किसी न किसी विटामिन की जरूरत पड़ती है तो ठीक इसी तरह आंखों के लिए भी विटामिन-बी (Vitamin-B) जरूरी होता है। अगर इसकी कमी हो जाती है तो इसका सीधा असर हमारी आंखो पर पड़ता है।

बता दें अभी हाल ही में एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसके मुताबिक केवल गरीब देशों में ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली और विकसित देश में 40% लोगों को आंखों से जुड़ी ऐसी समस्याएं हैं, जो शरीर में विटमिन बी-12 की कमी के कारण होती हैं। लेकिन शोधकर्ताओं का ये भी कहना है कि ऐसा सिर्फ डायट के पोषण के कारण नहीं हो सकता है।

विटामिन-बी की कमी से होती ये समस्याएं-
  • आंखों का पीला होना।
  • चीजें ब्लर यानि की धुंधली सी दिखना।
  • आंख की पुतलियां लगातार ब्लिंक करते रहना।
  • आंखों को स्थिर रखने में परेशानी होना।
  • जल्द बरतें सावधानी, नहीं तो...
अगर सही समय पर शरीर के जरूरत के हिसाब से विटामिन बी-12 का सेवन ना किया गया तो इस स्थिति में आंखों की रोशनी भी जा सकती है, क्योंकि यह दिक्कत हमारे नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती है।

विटामिन-बी की कमी सबसे अधिक बुजुर्गों में देखने को मिलती है। इसका सबसे ज्यादा असर उनके आंखों पर पड़ता है. वहीं अगर इनके शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिलता है तो उन्हें कई और बीमारियां भी हो सकती है।

ये भी पढ़ें: विंटर में हो रही ड्राई आई से रहें एलर्ट, आंखों को डायरेक्ट हवा के संपर्क में न आने दें

ऐसे करें विटामिन बी-12 की कमी को दूर-
  • वेजेटेरियन चीजों से ज्यादा नॉनवेज पदार्थों से इस विटामिन की कमी को दूर किया जा सकता है।
  • मीट या अन्य नॉनवेज चीजें अधिक खाएं।
  • डेयरी प्रॉडक्ट्स जैसे, दूध, दही, मक्खन, पनीर के सेवन से इस कमी को दूर किया जा सकता है।
  • चिंता की बात यह भी है कि हमारी बॉडी लंबे समय तक इस विटमिन को स्टोर करके नहीं रखती है तो हमें इसके सप्लिमेंट्स लेते रहने की जरूरत होती है।
शोध के मुताबिक, 'ऐसा इसलिए होता है क्योंकि विटमिन बी-12 का संबंध ब्लड में मौजूद रेड ब्लड सेल्स से होता है और इसके कारण शरीर में इन रेड ब्लड सेल्स की कमी हो जाती है ।

वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि केवल विटमिन बी-12 की कमी के कारण ही आंखों में आंख की पुतली का हिलते हुए महसूस होना या आंख की पलक में ऐंठन जैसी समस्या नहीं होती है। कई बार ऐसा किसी एलर्जी के कारण और अल्कोहल के अधिक सेवन के कारण भी होता है।

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थायराइड के लक्षण, कारण, इलाज और घरेलू उपाय

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विश्वभर में थायराइड तेजी से अपने पांव पसार रहा है, जो चिंताजनक विषय है। यही कारण है कि इस लेख से हम थाइराइड की जानकारी देने जा रहे हैं, ताकि आप इससे जागरूक हो सकें। इस लेख में हम थायराइड क्या है, थायराइड क्यों होता है, थायराइड के लक्षण और थायराइड के प्रकार से जुड़ी जानकारी देने का प्रयास करेंगे। इसके अलावा, यहां आपको थायराइड के घरेलू उपचार भी जानने को मिलेंगे। हालांकि, यह घरेलू उपचार थायराइड बीमारी को पूरी तरह ठीक तो नहीं कर सकते, लेकिन इसके लक्षणों व अन्य शारीरिक समस्याओं से राहत जरूर दिला सकते हैं। साथ ही यह थायराइड की दवाई के असर को बढ़ाने में भी मददगार हो सकते हैं। वहीं, थायराइड ऐसी समस्या है, जिसमें मेडिकल ट्रीटमेंट सबसे अहम है। इसलिए, लेख में थायराइड की दवाई से जुड़े कुछ सुझाव भी शामिल किए गए हैं।

थायराइड क्या है? – 
थायराइड बीमारी नहीं, बल्कि गले में आगे की तरफ पाए जाने वाली एक ग्रंथि होती है। यह तितली के आकार की होती है। यही ग्रंथि शरीर की कई जरूरी गतिविधियों को नियंत्रित करती है। यह भोजन को ऊर्जा में बदलने का काम करती है। थायराइड ग्रंथि टी3 यानी ट्राईआयोडोथायरोनिन और टी4 यानी थायरॉक्सिन हार्मोंन का निर्माण करती है। इन हार्मोंस का सीधा असर सांस, हृदय गति, पाचन तंत्र और शरीर के तापमान पर पड़ता है। साथ ही ये हड्डियों, मांसपेशियों व कोलेस्ट्रॉल को भी नियंत्रित करते हैं। जब ये हार्मोंस असंतुलित हो जाते हैं, तो वजन कम या ज्यादा होने लगता है, इसे ही थायराइड की समस्या कहते हैं ।

इसके अलावा, मस्तिष्क में पिट्यूरी ग्रंथि से एक अन्य हार्मोन निकलता है, जिसे थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (टीएसएच) कहते हैं। यह हार्मोन शरीर में अन्य दो थायराइड हार्मोंस टी3 और टी4 के प्रवाह को नियंत्रित करता है। यह वजन, शरीर के तापमान, मांसपेशियों की ताकत और यहां तक ​​कि मूड को भी नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को और बुजुर्गों को थायराइड होने की आशंका ज्यादा होती है । साथ ही अगर परिवार में पहले किसी को यह समस्या रही हो, तो भी इसके होने की आशंका ज्यादा रहती है ।

थायराइड के प्रकार – 
मुख्य रूप से थायराइड के प्रकार छह माने गए हैं, जो इस प्रकार हैं  :
  • हाइपोथायरायडिज्म (Hypothyroidism)– जब थायरॉयड पिंड (ग्रंथि) जरूरत से कम मात्रा में हार्मोंस का निर्माण करती है।
  • हाइपरथायरॉइडज्म (Hyperthyroidism)– जब थायरॉयड पिंड (ग्रंथि) जरूरत से ज्यादा हार्मोंस का निर्माण करती है।
  • गॉइटर (Goiter) – भोजन में आयोडीन की कमी होने पर ऐसा होता है, जिससे गले में सूजन और गांठ जैसी नजर आती है।
  • थायराइडिटिस (Thyroiditis)– इसमें थायराइड ग्रंथि में सूजन आती है।
  • थायराइड नोड्यूल (Thyroid nodules)– इसमें थायराइड ग्रंथि में गांठ बनने लगती है।
  • थायराइड कैंसर (Thyroid cancer)

थायराइड के लक्षण – 
अगर शरीर में नीचे बताए गए निम्न प्रकार के लक्षण नजर आते हैं, तो ये थायराइड के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। ध्यान रहे कि थायराइड के लक्षण सामान्य बीमारी जैसे भी नजर आ सकते हैं, इसलिए बेहतर है कि शरीर में आए किसी भी परिवर्तन को गंभीरता से लेना चाहिए। खासकर गर्भावस्था में महिलाओं में थायराइड लक्षण दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए ।
  • कब्ज
  • थकावट
  • तनाव
  • रूखी त्वचा
  • वजन का बढ़ना या कम होना
  • पसीना आना कम होना
  • ह्रदय गति का कम होना
  • उच्च रक्तचाप
  • जोड़ों में सूजन या दर्द
  • पतले और रूखे-बेजान बाल
  • याददाश्त कमजोर होना
  • मासिक धर्म का असामान्य होना
  • प्रजनन क्षमता में असंतुलन
  • मांसपेशियों में दर्द
  • चेहरे पर सूजन
  • समय से पहले बालों का सफेद होना

थायराइड के कारण और जोखिम कारक- 
नीचे बताए गए जोखिम कारक थाइराइड के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं :
  • अगर पहले कभी थाइराइड हुआ हो।
  • गोइटर होने से।
  • 30 साल से ज्यादा उम्र होने पर।
  • टाइप 1 मधुमेह या अन्य ऑटोइम्यून विकारों का इतिहास।
  • गर्भपात, बच्चे का समय से पहले पूर्व जन्म या बांझपन का इतिहास।
  • ऑटोइम्यून थायराइड रोग या थायरायड रोग का पारिवारिक इतिहास।
  • टाइप 2 डायबिटीज के कारण।
  • महिलाओं को इसका खतरा ज्यादा होता है।
  • गलत खान-पान, जैसे अधिक तला हुआ खाना।
  • जंक फूड व मैदे से बने खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन।
  • बढ़ता वजन या मोटापा।

नोट : महिलाओं को थायराइड होने का जोखिम ज्यादा हो सकता है। इसके अलावा, अगर किसी अन्य को थायराइड रोग के लक्षण या संकेत दिखे, तो भी इसका खतरा बढ़ सकता है।

थायराइड के घरेलू उपचार – 
यहां हम थायराइड के घरेलू उपचार के बारे में बताने जा रहे हैं, जोकि काफी हद तक इस समस्या में राहत पहुंचाने का काम कर सकते हैं। स्पष्ट कर दें कि ये घरेलू नुस्खे हर किसी पर असर करें संभव नहीं है, क्योंकि हर किसी की शारीरिक क्षमता व थायराइड अवस्था अलग-अलग होती है। ऐसे में कुछ नुस्खे किसी पर असर कर सकते हैं और किसी पर नहीं। इसलिए, इलाज के साथ-साथ इन घरेलू नुस्खों को इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से जरूर बात करनी चाहिए।

1. अश्वगंधा
सामग्री :
  • अश्वगंधा कैप्सूल (500mg)

प्रयोग का तरीका :
  • डॉक्टरी परामर्श पर रोज अश्वगंधा का कैप्सूल खा सकते हैं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • प्रतिदिन एक या दो कैप्सूल का सेवन कर सकते हैं।

इस प्रकार है फायदेमंद :
अश्वगंधा से थायरायड का देसी इलाज किया जा सकता है। अश्वगंधा को एडापोजेनिक (तनाव कम करने वाली) जड़ी-बूटियों की श्रेणी में रखा गया है। एडाप्टोजेन शरीर को तनाव से लड़ने में मदद कर सकता है। जानवरों पर हुए एनसीबीआई के एक शोध में यह स्पष्ट रूप से माना गया है। शोध में जिक्र मिलता है कि अश्वगंधा थाइराइड हार्मोन को बढ़ाने में मदद कर सकता है । वहीं, एक अन्य वैज्ञानिक शोध के अनुसार अश्वगंधा हाइपोथायराइड (थायराइड हार्मोन न बनना) के मरीजों के इलाज में मददगार साबित हो सकता है । इसके बावजूद यह ध्यान रखना जरूरी है कि थायराइड से बचने के उपाय के तौर पर इसका इस्तेमाल व्यक्ति के थाइराइड की स्थिति पर भी निर्भर करता है। इसलिए, थायराइड रोग का उपचार करने के लिए इसके इस्तेमाल से पूर्व डॉक्टर की सलाह जरूर ले लेनी चाहिए।

2. एसेंशियल ऑयल्स
सिम्पटम्स ऑफ थाइराइड की स्थिति में एसेंशियल ऑयल्स का उपयोग सहायक हो सकता है। एरोमाथेरेपी से जुड़े एसेंशियल ऑयल्स पर किए गए एक शोध में माना गया है कि इन्हें सूंघने से हाइपोथायराइड (थायराइड हार्मोन का कम बनना) की समस्या के कारण होने वाली थकान से राहत मिल सकती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि एसेंशियल ऑयल्स की मदद से प्रभावित थायराइड ग्रंथि की हल्की मालिश करना और उनकी महक को सूंघना काफी हद तक प्रभावी साबित हो सकता है । हालांकि, यह बात कहीं भी स्पष्ट नहीं है कि कौन से एसेंशियल ऑयल को इस समस्या में राहत के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है। हां, थायराइड से संबंधित एक अन्य शोध में कुछ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों को थायराइड से बचने के उपाय के तौर पर फायदेमंद माना गया है, जिनके एसेंशियल ऑयल आसानी से बाजार में मिल जाते हैं। इनमें लेमन बाम, सेज और रोज मेरी जैसे कई नाम शामिल हैं । अच्छा होगा थायराइट की समस्या में एसेंशियल का उपयोग करने से पहले एक बार डॉक्टरी परामर्श जरूर लें।

3. मिनरल्स
गले में थायराइड के लक्षण दिखने की एक वजह मिनरल्स की कमी भी हो सकती है। वहीं, यह बात सभी अच्छी तरह से जानते होंगे कि पोषक तत्वों की कमी की वजह से कई शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं। थायराइड भी ऐसी समस्या है, जो आयोडीन की कमी का एक नतीजा हो सकती है। इसके साथ ही आयरन, सेलेनियम, विटामिन-ए, थियोसीनेट और आइसोफ्लेविंस जैसे कुछ जरूरी पोषक तत्वों के अभाव में भी यह समस्या जन्म ले सकती है। इटली की बारी यूनिवर्सिटी के एक शोध में इस बात का साफ जिक्र किया गया है। साथ ही यह भी माना गया है कि भोजन में आयोडाइज्ड नमक या तेल को शामिल करना सहायक साबित हो सकता है । इस तथ्य के आधार पर माना जा सकता है कि इन सभी पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य को आहार में शामिल कर सिम्पटम्स ऑफ थाइरोइड को कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही थायराइड रोग का उपचार और प्रभावी बनाया जा सकता है। साथ ही इस समस्या के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

4. केल्प
सामग्री :
  • केल्प सप्लीमेंट, जिसमें 150-175 माइक्रोग्राम आयोडीन हो।

प्रयोग का तरीका :
  • डॉक्टरी परामर्श पर केल्प के इस सप्लीमेंट का सेवन कर सकते हैं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • कुछ हफ्तों या महीनों तक प्रतिदिन एक बार इसका सेवन कर सकते हैं।

इस प्रकार है फायदेमंद :
गले मे थायराइड के लक्षण दिखने पर केल्प से भी थायरायड का देसी इलाज किया जा सकता है। यह एक प्रकार की समुद्री खरपतवार होती है, जो समुद्र की गहराई में पाई जाती है। इसे आयोडीन का प्रमुख स्रोत माना जाता है । अगर किसी को आयोडीन की कमी से होने वाली थाइराइड की समस्या है, तो केल्प इस पर प्रभावी साबित हो सकता है । इस आधार पर इसे थायराइड का आयुर्वेदिक उपचार माना जा सकता है। फिलहाल, इस संबंध में अभी और शोध की आवश्यकता है।

5. गुग्गुल
सामग्री :
  • गुग्गुल का 25mg सप्लीमेंट

प्रयोग का तरीका :
  • प्रतिदिन 25mg सप्लीमेंट का सेवन कर सकते हैं।

कितनी बार करें प्रयोग?
वैसे तो प्रतिदिन एक से दो बार इसका सेवन किया जा सकता है, लेकिन बेहतर होगा कि इस्तेमाल से पहले एक बार डॉक्टर से पूछ लिया जाए।

इस प्रकार है फायदेमंद :
थायराइड का आयुर्वेदिक उपचार के तौर पर गुग्गुल को भी इस्तेमाल में लाया जा सकता है। इसे गुग्गुल के पेड़ से प्राप्त किया जाता है। गुग्गुल में गुग्गुलुस्टेरोन पाया जाता है, जिसमें एंटी-इन्फ्लेमेटरी व कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाले गुण के साथ-साथ थायराइड को सामान्य रूप से काम करने में मदद करने की क्षमता होती है । यह थाइराइड हार्मोन को सही तरीके से काम करने में मदद कर सकता है। जानवरों पर हुए शोध में पाया गया है कि गुग्गुल का उपयोग हायपोथायरॉडिज्म में सुधार कर सकता है । इस आधार पर यह माना जा सकता है कि गुग्गुल से थायराइड का घरेलू इलाज लाभकारी साबित हो सकता है।

6. विटामिन्स
विटामिन्स की मदद से थायराइड का घरेलू इलाज किया जा सकता है। दरअसल, थायराइड की समस्या में विटामिन की भूमिका पर किए गए एक अध्ययन में माना गया कि कुछ खास विटामिन इस समस्या के जोखिम को कम करने में सहायक साबित हो सकते हैं। शोध में जिन विटामिन का जिक्र है, उनमें मुख्य रूप से विटामिन ए, सी, ई, बी-6, बी-12 के साथ विटामिन डी शामिल है । इस आधार पर यह माना जा सकता है कि इन विटामिन से भरपूर खाद्य या इनके सप्लीमेंट की सहायता से काफी हद तक थाइरोइड के सिम्पटम्स के साथ-साथ थायराइड की समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है। ध्यान रहें, विटामिन सप्लीमेंट लेने से पूर्व एक बार अपने डॉक्टर से परामर्श जरूर कर लेना चाहिए।

7. अलसी
सामग्री :
  • एक चम्मच अलसी का पाउडर
  • एक गिलास फलों का रस

प्रयोग का तरीका :
  • अलसी के पाउडर को पानी या फिर फलों के रस में डालें।
  • अब इसे अच्छी तरह मिक्स करें और पिएं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • इस मिश्रण को प्रतिदिन एक से दो बार पिया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
थाइराइड ग्लैंड के सही तरीके से काम करने के लिए अलसी का भी योगदान हो सकता है। इसलिए, इसे थायराइड का आयुर्वेदिक उपचार माना जा सकता है। दरअसल, इसमें ओमेगा 3 फैटी एसिड होता है, जो हायपोथायरॉडिज्म के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है । ऐसे में हायपोथायरॉडिज्म के मरीज डॉक्टर की सलाह के अनुसार अलसी का सेवन कर सकते हैं। हालांकि, एक अन्य मेडिकल रिसर्च के अनुसार अलसी का ज्यादा या लंबे वक्त तक उपयोग गॉइटर या आयोडीन कमी के कारण होने वाली समस्या का कारण भी हो सकता है । इसलिए, अलसी से थायराइड का घरेलू इलाज करने से पूर्व डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह जरूर ले लें।

8. नारियल तेल
सामग्री :
  • एक से दो चम्मच शुद्ध नारियल तेल
  • एक गिलास गर्म पानी

प्रयोग का तरीका :
  • रोज एक गिलास पानी में शुद्ध नारियल तेल मिलाकर सेवन कर सकते हैं।
  • अगर ऐसे नहीं पसंद, तो नारियल के तेल का उपयोग खाना बनाने के लिए कर सकते हैं।

इस प्रकार है फायदेमंद :
थायराइड रोग का उपचार करने के लिए नारियल तेल अच्छा उपाय साबित हो सकता है। यह थाइरोइड के सिम्पटम्स को कम कर थायरायड ग्रंथि को सही तरीके से काम करने में मदद कर सकता है । अगर कोई मरीज थाइराइड की दवा ले रहा है, तो बेहतर होगा वर्जिन नारियल तेल के इस्तेमाल से थायराइड का घरेलू इलाज करने से पहले डॉक्टर से इस बारे परामर्श जरूर कर लें।

9. अदरक
सामग्री :
  • अदरक का मध्यम आकार का एक टुकड़ा
  • एक कप पानी
  • एक चम्मच शहद (स्वाद के लिए)

प्रयोग का तरीका :
  • सबसे पहले अदरक को बारीक टुकड़ों में काट लें।
  • इसके बाद पानी को गर्म करें और अदरक के टुकड़े उसमें डाल दें।
  • अब पानी को हल्का गर्म होने के लिए रख दें। फिर उसमें शहद डालकर मिक्स करें और चाय की तरह पिएं।
  • इसके अलावा, खाना बनाने में भी अदरक का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • अदरक को ऐसे ही साबुत चबाकर भी खाया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
अदरक की मदद से भी थायराइड का आयुर्वेदिक उपचार संभव है। दरअसल, अदरक में जिंक, पोटेशियम और मैग्नीशियम होता है। साथ ही इसमें एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण मौजूद होते हैं, जो इसे थायराइड का एक अच्छा घरेलू उपचार बनाते हैं। थायराइड के इलाज के लिए अदरक का उपयोग विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है। हालांकि, थायराइड बीमारी का इलाज करने के लिए इसके साथ डॉक्टर द्वारा बताए गई दवा का सेवन करना भी जरूरी है।

10. काली मिर्च
सामग्री :
  • 5 से 6 काली मिर्च के दाने
  • एक कप गुनगुना पानी

प्रयोग का तरीका :
  • सबसे पहले काली मिर्च के दानों को कुचलकर पीस लें।
  • अब कुचली हुई काली मिर्च को एक कप गुनगुने पानी में मिलाएं और सिप करके पिएं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • इस प्रक्रिया को प्रतिदिन एक बार इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
काली मिर्च के उपयोग से भी थायराइड बीमारी का इलाज संभव है। इंदौर के देवी अहिल्या इंस्टिट्यूट द्वारा किए गए एक शोध से इस बात की पुष्टि होती है कि काली मिर्च का सेवन करने से थायराइड की समस्या में राहत मिल सकती है। चूहों पर आधारित इस शोध में बताया गया है कि काली मिर्च में पिपरिन नाम का एक खास तत्व पाया जाता है। यह तत्व थायराइड हार्मोन को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। वहीं, पिपरिन की अधिक मात्रा थायरायड ग्रंथि की सक्रियता को कम भी कर सकती है । इस आधार पर माना जा सकता है कि काली मिर्च घरेलू तौर पर थायराइड कम होने के लक्षण को दूर करने और थायराइड रोग का उपचार करने में सहायक साबित हो सकती है। बशर्ते इसका सेवन संतुलित मात्रा में किया जाए।

11. धनिया की पत्तियां
सामग्री :
  • आवश्यकतानुसार धनिया की पत्तियां
  • एक गिलास गुनगुना पानी

प्रयोग का तरीका :
  • सबसे पहले धनिया की पत्तियों को पीसकर उसका पेस्ट बना लें।
  • अब इस पेस्ट को एक गिलास गुनगुने पानी में मिलाएं और पी जाएं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • इस प्रक्रिया को प्रतिदिन सुबह खाली पेट इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
धनिया से संबंधित एक शोध में इस बात का जिक्र मिलता है कि धनिया के पौधे और बीज के अर्क में एंटी थायराइड (थायराइड हार्मोन को कम करने वाला) गुण पाया जाता है। यह गुण धनिया में मौजूद फ्लेवोनोइड के कारण होता है। इस आधार पर धनिया के बीज के साथ-साथ धनिया की पत्तियों के अर्क को भी हाइपरथायराइड की समस्या में उपयोगी माना जा सकता है। हालांकि, शोध में इस बात का भी जिक्र मिलता है कि धनिया की पत्तियों में फ्लेवोनोइड की मात्रा बीज के मुकाबले काफी अधिक होती है। इसलिए धनिया की पत्तियों का अधिक उपयोग समस्या को बिगाड़ भी सकता है। ऐसे में सुरक्षित घरेलू थायराइड के उपचार के तौर पर धनिया के बीज को इस्तेमाल में लाना बेहतर विकल्प साबित हो सकता है। ऐसे में यह घरेलू उपचार सूखा थायराइड के लक्षण को दूर करने में मदद कर सकता है।

12. लौकी का जूस
सामग्री :
  • 100 ग्राम छोटे टुकड़ों में कटी हुई लौकी
  • 4 या 5 पुदीने की पत्तियां
  • एक चुटकी काली का मिर्च पाउडर
  • एक चुटकी नमक (स्वाद के लिए)
  • 3 या 4 बूंद नींबू का रस
  • एक गिलास पानी

प्रयोग का तरीका :
  • सबसे पहले पानी, लौकी के टुकड़े और पुदीना की पत्तियां मिक्सर में डालकर अच्छे से पेस लें।
  • अब तैयार हुए जूस को छन्नी की सहायता से छानकर एक गिलास में निकाल लें।
  • अब इसमें नींबू, नमक और काली मिर्च डालकर मिलाएं और फिर पी जाएं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • सुबह खाली पेट प्रतिदिन इस जूस को पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
दो अलग-अलग शोध से स्पष्ट होता है कि लौकी और लौकी के छिलके का सेवन बढ़े हुए थायराइड को कम करने में सहायक हो सकता है। लौकी से संबंधित एनसीबीआई के एक शोध में जिक्र मिलता है कि लौकी के छिलके में मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट प्रभाव के कारण यह एंटीथायराइड (थायराइड हार्मोन को कम करने वाला) गुण प्रदर्शित कर सकता है । वहीं इंदौर के देवी अहिल्या विश्विद्यालय द्वारा किए शोध में पाया गया कि लौकी से अलग किए गए खास तत्व पेरीप्लोगेनिन  में एंटीथायराइड प्रभाव पाया जाता है, जो बढ़े हुए थायराइड हार्मोन को कम कर सकता है । इन दोनों तथ्यों को देखते हुए यह माना जा सकता है कि हाइपर थायराइड के लक्षण को कम कर थायराइड के उपचार के लिए लौकी के साथ-साथ लौकी का छिलका भी काफी हद तक उपयोगी साबित हो सकता है।

13. दही
सामग्री :
  • एक कप दही
  • एक चुटकी काला नमक (स्वाद के लिए)

प्रयोग का तरीका :
  • एक कप दही में एक चुटकी काला नमक मिलाकर खाने के लिए इस्तेमाल में लाएं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • दिन में करीब दो बार खाने के साथ या अकेले ही इसे खाने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
आयोडीन युक्त खाद्य पदार्थों में दही भी शामिल है, जो शरीर में आयोडीन की पूर्ति कर आयोडीन की कमी के कारण होने वाली थायराइड की समस्या में सहायक हो सकता है । साथ ही यह थायराइड बीमारी के लक्षण को दूर करने में भी मदद कर सकता है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि आयोडीन की कमी को पूरा करने के लिए इसे एक विकल्प के तौर पर इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

14. सेब का सिरका
सामग्री :
  • एक गिलास पानी
  • एक से दो चम्मच सेब का सिरका

प्रयोग का तरीका :
  • सेब के सिरके को पानी में मिलाएं और इसे पी जाएं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • सुबह और शाम के खाने से करीब एक घंटे पहले इसे पीने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
सेब के सिरका को थायराइड का रामबाण इलाज कहा जा सकता है। एनसीबीआई के एक शोध के मुताबिक सेब का सिरका बढ़े हुए लिपिड और ब्लड शुगर को नियंत्रित कर मोटापे की समस्या को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है । वहीं लेख में आपको पहले ही बताया जा चुका है कि मोटापा थायराइड के जोखिम कारकों में से एक है। इस आधार पर यह माना जा सकता है कि शरीर की बिगड़ी उपापचय प्रक्रिया को ठीक कर यह कुछ हद तक थायरोइड के जोखिम को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। साथ ही यह थायराइड बीमारी के लक्षण को भी कम करने में भी सहायक हो सकता है। हालांकि स्पष्ट प्रमाण न होने के कारण यह थायराइड के उपचार में कितना प्रभावी होगा इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कह पाना थोड़ा मुश्किल है।

15. आंवला
सामग्री :
  • एक चम्मच आंवला चूर्ण
  • एक गिलास गुनगुना पानी

प्रयोग का तरीका :
  • एक गिलास गुनगुने पानी में आंवला चूर्ण मिलकर पिएं।

कितनी बार करें प्रयोग?
  • इस प्रक्रिया को दिन में एक से दो बार तक दोहराया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
हाइपर थायराइड के घरेलू उपचार के तौर पर आंवला को भी उपयोग में लाया जा सकता है। इसे हाइपर थायराइड का रामबाण इलाज भी कहा जा सकता है। इंदौर के देवी अहिल्या विश्विद्यालय के एक शोध से इस बात की पुष्टि होती है कि आंवला का सेवन बढ़े हुए थायरोइड को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। शोध में माना गया कि आंवला में मौजूद हेप्टोप्रोटेक्टिव (लिवर को सुरक्षा प्रदान करने वाला) गुण इस काम में अहम भूमिका निभा सकता है । इस आधार पर माना जा सकता है कि आंवला हाइपर थायराइड के लक्षण को कम कर थायराइड के उपचार में सहायक हो सकता है।

16. एलोवेरा
सामग्री :
  • एक चम्मच एलोवेरा जूस
  • एक गिलास गुनगुना पानी

प्रयोग का तरीका :
  • एक गिलास गुनगुने पानी में एलोवेरा जूस मिलाकर पीने के लिए इस्तेमाल में लाएं।

कितनी बार प्रयोग करें?
  • इसे प्रतिदिन एक बार पीने के लिए इस्तेमाल में लाया जा सकता है।

इस प्रकार है फायदेमंद :
एलोवेरा को थायराइड का रामबाण इलाज माना जा सकता है। एलोवेरा पर प्रकाशित एक रिसर्च जर्नल में एलोवेरा जूस को हाइपोथायराइड (थायराइड हार्मोन का न बनना) की समस्या में कारगर बताया गया है। रिसर्च में पाया गया कि 50 मिली एलोवेरा जूस का प्रतिदिन सेवन थायरोइड ग्लैड की सक्रियता को बढ़ाकर थायराइड हार्मोन बनने की प्रक्रिया को सुधारने का काम कर सकता है । इस आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि हाइपो थायराइड के लक्षण को कम कर थायराइड के उपचार के लिए एलोवेरा जूस एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

थायराइड का निदान – 
जैसा कि हम आपको लेख में पहले ही थायराइड के प्रकार बता चुके हैं और इसका इलाज भी इन्हीं प्रकारों के आधार पर किया जाता है। ऐसे में मरीज थायराइड के कौन से प्रकार से पीड़ित है यह जानने के लिए डॉक्टर ब्लड टेस्ट कराने की सलाह देता है, जिसमें थायराइड हार्मोन के निम्न स्तरों पर जांच की जाती है, जो कुछ इस प्रकार हैं :

टीएसएच टेस्ट : इस टेस्ट में पिट्यूटरी ग्लैंड (दिमाग का एक अहम हिस्सा) में बनने वाले टीएसएच (थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन) की जांच की जाती है। जिसके माध्यम से शरीर में टी-3 और टी-4 थायराइड हार्मोन की स्थिति का पता लगाया जाता है। अगर जांच में टीएसएच लेवल हाई होता है, तो यह हाइपोथायराइड (थायरोइड हार्मोन का कम होना या न बनना) की स्थिति को दर्शाता है। वहीं टीएसएच लेवल कम होना हाइपरथायराइड (थायराइड हार्मोन की अधिकता) का इशारा देता है।

टी-4 टेस्ट : खून में टी-4 हार्मोन की अधिकता हाइपरथायराइड (बढ़े हुए थायराइड) को दर्शाती है। वहीं खून में टी-4 का कम होना हाइपोथायराइड (थायरायड हार्मोन की कमी) का इशारा देती है।

टी-3 टेस्ट : टी-4 हार्मोन के सामान्य होने की अवस्था में अगर डॉक्टर को लगता है कि मरीज को हाइपरथायराइड की समस्या है। तो इस स्थिति में डॉक्टर टी-3 हार्मोन के लेवल के आधार पर बढ़े हुए थायराइड के कारण को समझ सकता है। टी-3 के स्तर की अधिकता के कारण भी मरीज को हाइपरथायराइड की शिकायत हो सकती है।

थायराइड एंटीबॉडी टेस्ट : इस टेस्ट के जरिये डॉक्टर प्रतिरोधक क्षमता संबंधी विकार जैसे :- ग्रेव्स डिजीज और हाशीमोटोज डिजीज का पता लगाने का प्रयास करता है। ग्रेव्स डिजीज बढ़े हुए थायराइड हार्मोन का एक आम कारण है। वहीं, हाशीमोटोज डिजीज के कारण थायराइड हार्मोन न बनने की समस्या होती है।

इन सभी टेस्ट के माध्यम से थायराइड की स्थिति का पता लगाने के बाद कुछ विशेष स्थितियों में डॉक्टर कुछ अन्य टेस्ट कराने की सलाह दे सकता है। इनमें अल्ट्रासाउंड, थायराइड स्कैन और रेडियोएक्टिव आयोडीन टेस्ट शामिल हैं। इन टेस्ट के माध्यम से डॉक्टर को थायराइड की समस्या होने के कारण को जानने में मदद मिल सकती है।

थायराइड का इलाज – 
थायराइड का इलाज मरीज की उम्र, थायराइड ग्रंथि कितने हार्मोन बना रही है और मरीज की स्थिति के अनुसार किया जा सकता है। हमने ऊपर थायराइड के कुछ प्रकारों के बारे में बताया था, तो अब यहां हम उसी के अनुसार इलाजों बता रहे हैं । ध्यान रहे कि ये सिर्फ सुझाव हैं, क्योंकि किस मरीज को कैसे ट्रीटमेंट की जरूरत है, इस बारे में डॉक्टर ही बेहतर बता सकते हैं।

हाइपो थायराइड : इसका इलाज दवा के जरिए किया जा सकता है। दवा के सेवन से शरीर को जरूरी हार्मोंस मिलते हैं। इसमें डॉक्टर सिंथेटिक थायराइड हार्मोन टी-4 लेने की सलाह देते हैं, जिससे शरीर में हार्मोंस का निर्माण शुरू हो सकता है। यही वजह है कि हाइपो थायराइड के लक्षण दिखने की अवस्था में कुछ मरीजों को यह दवा जीवन भर लेनी पड़ सकती है।

हाइपर थायराइड : डॉक्टर थायराइड रोग के लक्षण और कारणों के आधार पर हाइपर थायराइड का इलाज कर सकते हैं। यह इलाज कुछ इस प्रकार से हो सकता है :

एंटीथायराइड – डॉक्टर एंटीथायराइड दवा दे सकते हैं, जिसके सेवन से थायराइड ग्रंथि नए हार्मोन का निर्माण करना बंद कर सकती है ।

बीटा-ब्लॉकर दवा – इसके सेवन से थायराइड हार्मोन का शरीर पर असर होना बंद हो सकता है। साथ ही दवा हृदय गति को भी सामान्य कर सकती है। इसके अलावा, जब तक अन्य किसी इलाज का असर शुरू नहीं होता, तब तक यह दवा दूसरे लक्षणों के असर को भी कम कर सकती है। एक खास बात यह है कि इस दवा के सेवन से जरूरी थायराइड हार्मोन बनने में कोई कमी नहीं आती।

रेडियोआयोडीन : इस उपचार से थायराइड हार्मोंस बनाने वाले थायराइड सेल को नष्ट किया जा सकता है, लेकिन यह हाइपो थायराइड का कारण बन सकता है।

सर्जरी : सर्जरी की जरूरत तब हो सकती है, जब मरीज को कुछ निगलने या फिर सांस लेने में तकलीफ हो। सर्जरी में थायराइड का कुछ हिस्सा या पूरा हिस्सा निकाला जा सकता है। ऐसे में हमेशा के लिए हाइपो थायराइड होने की अंदेशा हो सकती है।

थायराइडिटिस : एनीसीबीआई (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रतिदिन 20 मिलीग्राम प्रेडनिसोलोन -एक स्टेरॉयइड दवा) के सेवन से थायराइडिटिस का असर कुछ हद तक कम हो सकता है ।

गॉइटर : अगर थायराइड ग्रंथि सही प्रकार से काम कर रही है, तो इसमें कोई इलाज की जरूरत नहीं भी पड़ सकती है। कुछ समय में यह अपने आप ही ठीक हो सकता है। वहीं, अगर इलाज किया भी जाता है, तो डॉक्टर ऐसी दवा दे सकते हैं, जिससे थायराइड ग्रंथि सिकुड़ कर अपने सामान्य आकार में आ सकती है। सिर्फ कुछ गंभीर मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है।

थायराइड नोड्यूल : इसका इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज की ग्रंथि की स्थिति किस प्रकार की है। यह इलाज इस प्रकार से किया जा सकता है :
  • अगर ग्रंथि ने कैंसर का रूप नहीं लिया है, तो डॉक्टर सिर्फ मरीज की स्थिति पर नजर रखेंगे। मरीज की नियमित रूप से जांच की जा सकती है और ब्लड टेस्ट व थायराइड अल्ट्रासाउंड टेस्ट किए जा सकते हैं। अगर ग्रंथि में किसी भी प्रकार का बदलाव नहीं आता है, तो हो सकता है कि कोई उपचार न किया जाए।
  • अगर ग्रंथि का आकार बड़ा हो जाता है या फिर कैंसर का रूप ले लेता है, तो डॉक्टर सर्जरी के विकल्प को चुन सकते हैं। ग्रंथि का आकार बड़ा होने से सांस लेने या कुछ निगलने में परेशानी हो सकती है।
  • अगर ग्रंथि जरूरत से ज्यादा हार्मोन का निर्माण करती है, तो रेडियोआयोडीन का सहारा लिया जा सकता है। रेडियोआयोडीन के जरिए ग्रंथि को सिकोड़ने में मदद मिल सकती है, ताकि वह कम मात्रा में थायराइड हार्मोन का निर्माण कर सके।


थायराइड कैंसर : कैंसर का एकमात्र इलाज सर्जरी है। सर्जरी के जरिए या तो पूरी थायराइड ग्रंथि को निकाला जा सकता है या फिर आराम से जितने हिस्से को निकाला जा सके उतने को निकाला जा सकता है। अगर कैंसर छोटा है और लिम्फ नोट्स में नहीं फैला है, तो सर्जरी बेहतर विकल्प हो सकता है। इस बारे में डॉक्टर ही बेहतर राय दे सकते हैं। इसके अलावा, डॉक्टर सर्जरी के बाद रेडियोआयोडीन थेरेपी भी इस्तेमाल कर सकते हैं। सर्जरी के दौरान जो कैंसर सेल अंदर ही रह जाते हैं या अन्य जगह फैल जाते हैं, उन्हें रेडियोआयोडीन थेरेपी के जरिए नष्ट किया जा सकता है। थायराइड कैंसर का इलाज करने से पहले एक बार डॉक्टर मरीज से उपचार के संबंध में बात कर सकते हैं।

थायराइड के लिए सर्जरी की जरूरत कब होती है? क्या इसका कोई दुष्प्रभाव है?
इस संबंध में आपको लेख में थायराइड के इलाज वाले भाग में पहले ही बताया जा चुका है। हाइपर थायराइड या थायराइड नोड्यूल की स्थिति में अगर मरीज को सांस लेने या खाद्य पदार्थ निगलने में तकलीफ होती है, तो डॉक्टर सर्जरी कराने की सलाह दे सकते हैं। ऐसे में मरीज को जीवन भर के लिए हाइपोथायराइड यानी थायराइड हार्मोन की कमी की शिकायत हो सकती है ।

थायराइड चार्ट – 
  • थायराइड का पता लगाने के लिए थायराइड स्टिमुलेटिंग हार्मोन (टीएसएच) के स्तर की जांच की जाती है। सामान्य टीएसएच (TSH) के स्तर के बारे में हम नीचे जानकारी देने की कोशिश कर रहे हैं (23)।
  • सामान्य टीएसएच (TSH) 0.45 से – 5.0 mIU/L (मिली-इंटरनैशनल यूनिट पर लीटर) होता है।
  • अगर टीएसएच का यह स्तर सामान्य से ज्यादा हो, तो इसका मतलब यह है कि हार्मोंस का निर्माण कम हो रहा है। इसे हाइपोथायरॉइडज्म कहा जाता है।
  • वहीं, अगर टीएसएच सामान्य से कम हो, तो इसका मतलब यह है कि हार्मोंस का निर्माण ज्यादा हो रह है। इसे हाइपरथायरॉइडज्म कहा जाता है।

थायराइड में क्या खाएं, क्या न खाएं – 
थायराइड की समस्या में अगर सुधार करना है, तो थायराइड का उपचार करने के साथ-साथ कुछ घरेलू उपाय और थायराइड में परहेज भी जरूरी है। नीचे हम थायराइड में परहेज के लिए क्या खाना चाहिए और क्या नहीं इस बारे में जानकारी दे रहे हैं।

  • पोषक तत्व युक्त खाद्य पदार्थ जैसे – हरी सब्जियां, फल या फलों के जूस व नट्स का सेवन किया जा सकता है।
  • मछली और बीन्स के जरिए प्रोटीन का सेवन करें।
  • खाना बनाने के लिए ऑलिव आयल यानी जैतून का तेल व वर्जिन नारियल तेल का इस्तेमाल कर सकते हैं।
  • खाने में डाइटरी फाइबर की मात्रा को बढ़ाएं, क्योंकि यह पाचन क्रिया में मदद कर सकता है।
  • ऐसे फैट का चुनाव करें, जो एलडीएल (LDL) यानी हानिकारक कोलेस्ट्रॉल को कम कर सके। इसके लिए बीज, नट्स व फलियों का चुनाव कर सकते हैं।

क्या न खाएं :
  • कार्बोहाइड्रेट युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से बचें या कम से कम सेवन करें। ये हृदय संबंधी समस्याओं और कैंसर का कारण हो सकते हैं।
  • सैचुरेटेड फैट जो मीट और चीज प्रोडक्ट से मिलता है, उसका सेवन न करें।
  • सॉफ्ट ड्रिंक या ऐसे ही अन्य पेय पदार्थों का सेवन न करें।
  • दूध का सेवन न करें या कम से कम करें। ऐसा इसलिए, क्योंकि कुछ लोगों को लैक्टोज इनटॉलेरेंस की समस्या होती है। थायराइड की अवस्था में दूध का सेवन करने से टीएसएच का स्तर प्रभावित हो सकता है ।
  • जंक फूड जैसे – चिप्स, कैंडी, बर्गर व पिज्जा आदि खाद्य पदार्थों का थायराइड में परहेज आवश्यक है।

थायराइड के लिए योग और एक्सरसाइज
योग और एक्सरसाइज को भी थायराइड की समस्या से निपटने का आसान विकल्प माना जा सकता है। इस बात के पुष्टि एनसीबीआई के दो अलग-अलग शोध से स्पष्ट होती है। दिल्ली के डिफेंस इंस्टिट्यूट और फिजियोलोजी के एक शोध में जिक्र मिलता है कि योग और एक्सरसाइज के माध्यम से थायराइड के इलाज को और भी प्रभावी बनाया जा सकता है। वहीं, महिलाओं पर आधारित दूसरे शोध में माना गया कि योग के माध्यम से थायराइड हार्मोन को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है । थायराइड के लिए योग लेख के माध्यम से आप इस समस्या में मददगार कई योग एक्सरसाइज के बारे में विस्तार से जान सकते हैं।

थायराइड के अन्य दुष्प्रभाव – 
थायराइड रोग के लक्षण के अलावा थायराइड का इलाज न होने की स्थिति में कुछ अन्य दुष्प्रभाव भी देखने को मिल सकते हैं। निम्न बिंदुओं के माध्यम से आइए अब हम उन दुष्प्रभावों पर भी एक नजर डाल लेते हैं।
  • हाई कोलेस्ट्रोल।
  • माइक्जेडेमा कोमा , थायराइड हार्मोन बहुत अधिक कम होने की स्थिति में होने वाला दिमागी विकार, जो घातक और जानलेवा साबित हो सकता है।
  • गर्भवती महिलाओं में समय पूर्व प्रसव, हाई ब्लड प्रेशर, भ्रूण का विकास न होना और गर्भपात की समस्या।
  • हृदय रोग जैसे :- असामान्य हृदय गति, दिल की धड़कन तेज होना और हृदय का काम करना बंद कर देना।
  • ओस्टियोपोरेसिस (हड्डियों का कमजोर होना या जोड़ों में सूजन)।
  • अत्यधिक तनाव।
  • ध्यान केन्द्रित न कर पाना।
  • पेट में दर्द की समस्या।

थायराइड से बचाव – 
निम्न उपायों के माध्यम से थायराइड की समस्या से बचाव किया जा सकता है, जो कुछ इस प्रकार हैं  
  • तंबाकू या सिगरेट जैसे उत्पादों से दूर रहे।
  • एल्कोहल का इस्तेमाल न करें।
  • आयोडीन युक्त खाद्य का सेवन करें।
  • ग्लूटेन युक्त खाद्य (जैसे :- व्हीट, बार्ले, ओट्स और मिलेट्स) का इस्तेमाल न करें।
  • दुग्ध उत्पादों का प्रयोग कम करें।
  • विषैले या हानिकारक रसायनों के संपर्क में आने से बचें।
  • तली भुनी चीजों का उपयोग न करें।
  • नियमित व्यायाम या योग करें। इसके लिए भुजंगासन, हलासन, विपरीत-करणी, मत्स्यासन व धनुरासन आदि किए जा सकते हैं। बेहतर होगा कि ये योगासन प्रशिक्षित योग ट्रेनर की देखरेख में ही किए जाएं।
  • समय-समय पर वजन चेक करते रहें और वजन में बदलाव आने पर थायराइड की जांच कराएं।

अब तो आप अच्छे से समझ चुके होंगे कि थायराइड क्या है, थायराइड किसे कहते हैं और थायराइड कैसे होता है। साथ ही थायराइड की जानकारी के साथ लेख से आपने यह भी जाना कि सही खान-पान और दिनचर्या में सुधार कर थायराइड के जोखिमों को दूर रखने में मदद मिल सकती है। वहीं, अगर किसी को थायराइड के लक्षण नजर आते हैं, तो ऐसे में बिना देर किए थायराइड की जांच करानी चाहिए, ताकि सही समय पर थायराइड रोग और उसके लक्षण की पुष्टि हो सके। फलस्वरूप, थायराइड का इलाज कर समस्या को बढ़ने से रोका जा सके। इस समस्या से पीड़ित व्यक्ति राहत पाने के लिए लेख में सुझाए गए थायराइड के घरेलू उपचार को भी इस्तेमाल में ला सकते हैं। उम्मीद है कि थायराइड के लक्षण और घरेलू उपचार के आधार पर स्थायी समाधान हासिल करने में यह लेख काफी हद तक उपयोगी साबित होगा। 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या थायराइड की बीमारी ठीक हो सकती है?
थायराइड की समस्या को पूरी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता। हां, सही खान-पान और दवाओं की मदद से इसे नियंत्रित जरूर किया जा सकता है ।

महिलाओं में थायराइड होने के लक्षण क्या हैं?
सामान्य तौर महिलाओं में थायराइड लक्षण के रूप में थकान, कमजोरी और वजन का बढ़ना या घटना जैसी शिकायत देखी जा सकती है ।

गर्भावस्था के दौरान हाइपोथायरायडिज्म का इलाज कैसे करें?
गर्भावस्था में महिलाओं में थायराइड लक्षण दिखाई दें और हाइपोथायरायडिज्म (थायराइड हार्मोन न बनना) की पुष्टि हो, तो डॉक्टर हार्मोन की टैबलेट लेने का सुझाव दे सकते हैं। इससे इस समस्या को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है ।

हाइपरथायरायडिज्म या हाइपोथायरायडिज्म में से कौन सी समस्या अधिक आम है?
हाइपरथायरायडिज्म के मुकाबले हाइपोथायरायडिज्म की समस्या अधिक आम है ।

थायराइड विकारों को कभी-कभी रजोनिवृत्ति (menopause) के लिए गलत माना जाता है। सही या गलत?
हां, कभी-कभी महिलाओं में थायराइड लक्षण और थायराइड विकारों को रजोनिवृत्ति के लिए गलत माना जाता है (40)।

थायरॉइड सप्लीमेंट कितने मददगार हैं?
जैसा कि आपको लेख में पहले ही बताया जा चुका है कि थायराइड के इलाज के लिए डॉक्टर थायरॉइड सप्लीमेंट यानी थायराइड हार्मोन की दवा लेने की सलाह देते हैं। इस आधार पर इन्हें इस समस्या में काफी हद तक उपयोगी और मददगार माना जा सकता है।

क्या थायराइड के कारण बाल झड़ सकते हैं?
हां, हाइपोथायराइड की समस्या में बाल झड़ने की शिकायत देखी जा सकती है ।

कौन सा थायराइड प्रकार अधिक खतरनाक है?
हाइपोथायरायडिज्म के मुकाबले हाइपरथायरायडिज्म की समस्या अधिक खतरनाक है ।

क्या थायराइड और कोलेस्ट्रॉल के बीच कोई संबंध है?
हाइपोथायरायडिज्म के मरीजों में कोलेस्ट्रोल के बढ़ने की समस्या आम हो सकती है ।

क्या थायरॉयड और पीसीओएस (PCOS) के बीच कोई संबंध है?
PCOS (Polycystic ovarian syndrome) की महिलाओं में हाइपोथायराइड होने की संभावना प्रबल होती है। वहीं, हाइपो थायराइड का उपचार कर ऐसे मरीजों में गर्भधारण की समस्या में सुधार किया जा सकता है ।

क्या थायराइड बुखार या सिरदर्द का कारण हो सकता है?
लेख में आपको पहले ही बताया जा चुका है कि थाइरायड के रोगियों में चिंता के साथ ही ठंड सहने की क्षमता कम होने के लक्षण दिखना आम है । इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस समस्या के कारण मरीजों को बुखार और सिरदर्द का अनुभव हो सकता है। फिलहाल, इस पर अभी और शोध की आवश्यकता है।

थायराइड कैंसर क्या है?
थायराइड ग्रंथि के टिशू में कैंसर कोशिकाओं के पनपने की स्थिति को थायराइड कैंसर कहा जाता है ।

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