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जैविक खेत यार्ड खाद कैसे बनाएं

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जैविक खेत यार्ड खाद (Farm Yard Manure) मूलत: मवेशियों के गोबर, मूत्र, कूड़े, अपशिष्ट पुलाव और अन्य डेयरी कचरे का उपयोग कर के तैयार किया जाता है. यह अत्यधिक उपयोगी होता है. इसके गुण इस प्रकार है. जैविक खेत यार्ड खाद (Farm Yard Manure) में पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते है, पौधों को इस मिश्रण द्वारा संतुलित पोषक तत्व उपलब्ध होते है, इसमें पोटेशियम और फास्फोरस की उपलब्धता अकार्बनिक स्रोतों से मिलती जुलती है और इसका उपयोग मिट्टी की उर्वरता में सुधार लाता है.

तो आप समज सकते है की जिन पदार्थो से ये जैविक खेत यार्ड खाद तैयार होती है वो एक किसान के यहां आसानी से उपलब्ध है. इनको इधर उधर फैकने से अच्छा है. आप इस मिश्रण को एक बार खाद में तब्दील कर के अपनी फसल में उपयोग कर के देखे इसे आप को बहुत फायदे होगें. एक तो आप को फसल में लागत कम मुनाफा ज्यादा होगा, आप के खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी, आप के स्वस्थ्य के लिए अच्छा है जो रासायनिक खादों और कीटनाशकों से खराब होता जा रहा है और आप के आस पास का प्रदुषण कम होगा. तो अब आइए जानते है की जैविक खेत यार्ड खाद कैसे बनाए.

जैविक खेत यार्ड खाद कैसे तैयार करे -

किसान भाई अपने खेत में जैविक खेत यार्ड खाद (Farm Yard Manure) बड़ी आसानी से बना सकते है. इसके लिए आप को 0.9 मीटर गहरा, 2.4 मीटर चौड़ा, और अपने मिश्रित पदार्थो के अनुपात में 5 मीटर तक लम्बा एक गड्ढा बना ले. यदि किसान के पास ज्यादा पशु है और गर्म धुप और ज्यादा बारिश से जैविक खेत यार्ड खाद (Farm Yard Manure) के गड्ढे को बचा सकता है या छत का प्रबंध है तो वह इसका क्षेत्र बढ़ा भी सकता है या दो गड्ढे बना सकता है. अब गड्ढा बनाने के बाद मवेशियों के गोबर, मूत्र और अन्य पदार्थो के मिश्रण को समान रूप से गड्ढे में फैला देना चाहिए.

अब यदि गोबर का मिश्रण अच्छे से गिला नही है तो उसमे आवश्यकता अनुसार पानी डालें. अब मवेशियों के गोबर और अन्य मिश्रित पदार्थो को एक समान समतल कर लेना चाहिए और इसके उपर 30 सेंटीमीटर रेत की परत बना दे अब इसको छोड़ दे.

अब आप देखेगे की 6 महीने बाद उस कचरे की एक उपयोगी जैविक खेत यार्ड खाद (Farm Yard Manure) तैयार है जिसके अंदर खनिज इस प्रकार होते है नाइट्रोजण 0.32 से 0.50, फास्फोरस 0.10 से 0.25, पोटाशियम 0.25 से 0.40, कैल्शियम 0.80 से 1.20, मैग्निशियम 0.33 से 0.70 और जिंक 0.040 शुष्क पदार्थ के रूप में मिलना चाहिए. अब किसान भाई सोच रहें होंगे की इसका उपयोग कैसे करे तो आइए जानते है की इसका उपयोग फसल के लिए कैसे करे.

जैविक खेत यार्ड खाद का उपयोग कैसे करे -

आंशिक रूप से सड़े हुए जैविक खेत यार्ड खाद (Farm Yard Manure) को आम तौर फसल की बुआई के 3 से 4 सप्ताह पहले खेत में डालना चाहिए. खेत की मिट्टी में नमी होनी चाहिए ताकि यह खेत यार्ड खाद मिट्टी की संरचना में सुधार करने और फसल के विकास के धुलनशील रूप में इसमें निहित पोषक तत्वों को जारी करने के लिए नाम मिट्टी में सड़ जाएगा.

यदि खेत यार्ड खाद (Farm Yard Manure) को किसान बहुत पहले खेत में डालता है तो बारिश या अन्य कारणों से इसके पोषक तत्व नष्ट हो सकते है. इसलिए उसको समय पर ही डाले और खेत की मिट्टी में खाद को अच्छे से मिला दे किसी भी यंत्र द्वारा ताकि खाद के पोषक तत्व खेत की पूरी मिट्टी में फ़ैल जाए. और खाद अपना अच्छी तरह फसल के लिए काम कर सके.

ताजी सब्जी और फलों पौधों के लिए जैविक खेत यार्ड खाद (Farm Yard Manure) और उर्वरकों के प्रयोग ने सबसे अच्छे परिणाम दिए है. हालाँकि इस खाद में अन्य की अपेक्षाकृत कम मात्रा में फास्फोरस होता है. इसका उपयोग एकल सुपरफास्फेट के साथ सयोंजन के रूप में किया जाना चाहिए क्योंकी बुनियादी खुराक और नाइट्रोजन उर्वरक को शीर्ष मरहम पट्टी के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए. जिसे बेहतर पैदावार हो सके.

तो इस तरह आप जैविक खेत यार्ड खाद स्वयं ही अपने खेत में बना सकते है और अपने खेत में इस्तेमाल कर सकते है जो फसल और पैदावार के लिए बहुत ही उपयोगी है. और आप की फसल की लागत भी कम आएगी और पैदावार भी ज्यादा होगी.


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जैविक खेती कैसे करें ?

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जैविक खेती देशी खेती का आधुनिक तरीका है| जहां प्रकृति एवं पर्यावरण को संतुलित रखते हुए खेती की जाती है| इसमें रसायनिक खाद कीटनाशकों का उपयोग नहीं कर खेत में गोबर की खाद, कम्पोस्ट, जीवाणु खाद, फसल अवशेष, फसल चक और प्रकृति में उपलब्ध खनिज जैसे रॉक फास्फेट, जिप्सम आदि द्वारा पौधों को पोषक तत्व दिए जाते हैं| फसल को प्रकृति में उपलब्ध मित्र कीटों, जीवाणुओं और जैविक कीटनाशकों द्वारा हानिकारक कीटों तथा बीमारियों से बचाया जाता है|

जैविक खेती की आवश्यकता

आजादी के समय खाने के लिए अनाज विदेशों से लाया जाता था, खेती से बहुत कम पैदा होता था, किन्तु जनसंख्या में अप्रत्याशित वृद्धि होती गई, अनाज की कमी महसूस होने लगी| फिर हरित क्रान्ति का दौर आया इस दौर में 1966-67 से 1990-91 के बीच भारत में अन्न उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई| अधिक अनाज उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अंधाधुंध उर्वरकों, कीटनाशकों और रसायनों का प्रयोग किया जाने लगा, जिसके कारण भूमि की विषाक्तता भी बढ़ गई| मिट्टी से अनेक उपयोगी जीवाणु नष्ट हो गए और उर्वरा शक्ति भी कम हो गई|

आज संतुलित उर्वरकों की कमी के कारण उत्पादन स्थिर सा हो गया है, अब हरित क्रान्ति के प्रणेता भी स्वीकारने लगे हैं, कि इन रसायनों के अधिक मात्रा में प्रयोग से अनेक प्रकार की वातावरणीय समस्याएं और मानव तथा पशु स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं उत्पन्न होने लगी हैं एवं मिटटी की उर्वरा शक्ति में कमी होने लगी है, जिसके कारण मिटटी में पोषक तत्वों का असंतुलन हो गया हैं| मिटटी की घटती उर्वरकता के कारण उत्पादकता का स्तर बनाए रखने के लिए अधिक से अधिक जैविक खादों का प्रयोग आवश्यक हो गया है|

किसान महंगे उर्वरकों और कीटनाशकों को खरीदने से कर्ज में डूब रहे हैं, जिससे उसकी आर्थिक स्थिति में गिरावट आ रही है| मानव द्वारा रसायनयुक्त खाद्य पदार्थों के प्रयोग से शारीरिक विकलांगता एवं कैंसर जैसी भयंकर बीमारी होने लगी है| इस समस्या के निराकरण के लिए आधुनिक जैविक खेती अवधारणा एक उचित विकल्प के रूप में उभरकर सामने आई है| चूंकि जैविक कृषि में किसी भी प्रकार के रसायनिक आदानों का प्रयोग वर्जित है तथा फसल उत्पादन के लिए वांछित सभी संसाधन किसानों द्वारा ही जुटाने होते हैं|

इसलिए किसानों को संसाधनों के उत्पादन, उनका उचित प्रयोग और जैविक खेती प्रबंधन तकनीकी के बारे में प्रशिक्षित करना बहुत आवश्यक है| कुछ अन्य कारण इस प्रकार है, जैसे-
  • कृषि उत्पादन में टिकाऊपन लाया जा सके|
  • मिटटी की जैविक गुणवत्ता बनाए रखी जा सके|
  • प्राकृतिक संसाधनों को बचाया जा सके|
  • वातावरण प्रदूषण को रोका जा सके|
  • मानव स्वास्थ्य की रक्षा की जा सके|
  • उत्पादन लागत को कम किया जा सके|

पर्यावरण को बिना हानि पहुंचाए खेती और प्राकृतिक संसाधनों को भविष्य के लिए संचित रखते हुए उनका सफल उपयोग करके फसलों के उत्पादन में लगातार वृद्धि करना एवं मानव की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करना ही टिकाऊ खेती कहलाता है|

जैविक खेती, टिकाऊ खेती का प्रमुख घटक है, जिसका मुख्य उद्देश्य रसायनों का कम से कम उपयोग और उनके स्थान पर जैविक उत्पादों का प्रयोग अधिक से अधिक हो जिससे पर्यावरण संतुलन बना रहे व भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़े| जैविक खेती का मुख्य घटक जैविक खाद, जैव उर्वरक है, जो कि रसायनिक खादों का एक उत्तम विकल्प है|

जैविक खेती के मुख्य घटक

जैविक खाद- जैविक खादों का तात्पर्य कार्बनिक पदार्थों से है, जो कि सड़ने पर कार्बनिक पदार्थ पैदा करते हैं| इसमें मुख्यतः खेती के अवशेष, पशुओं का मलमूत्र आदि होता है| इसमें फसलों के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व कम मात्रा में ही सही, उपस्थित होते है| इनमें मिटटी को सभी पोषक तत्व, जो फसलें अपनी बढ़वार के लिए ले लेती हैं, पुनः प्राप्त हो जाते है| आधुनिक कृषि में खेती की सघन पद्धतियाँ अपनाई जा रही हैं, जिनसे एक ही खेत में लगातार कई फसलें लेने से मिटटी में कार्बनिक पदार्थ की कमी हो जाती है|

जिससे मिटटी की संरचना और उर्वरा शक्ति पर बुरा असर पड़ता है| इसलिए मिटटी कार्बनिक पदार्थ को स्थिर रखने के लिए जैविक खादों का उपयोग अति आवश्यक है| साथ ही साथ जैविक खाद मिटटी की संरचना, वायु, तापमान, जलधारण क्षमता, जीवाणु संख्या तथा उनकी अभिक्रियाओं, बेस विनिमय क्षमता और भूमि कटाव को रोकने पर अच्छा प्रभाव डालती हैं|

हमारे देश में काफी समय से जैविक खादों का प्रयोग परम्परागत खेती में होता आया है| इनमें प्रमुख कम्पोस्ट खाद है, जो नगरों में कूड़े-करकट, दूसरी खेती अवशेष और गोबर से तैयार की जाती है| गोबर की खाद में अन्य कम्पोस्ट की अपेक्षा नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस अधिक मात्रा में पाये जाते हैं| जैविक खादों में लगभग सभी आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा पाई जाती है|

गोबर की खाद- भारत में प्रत्येक किसान खेती के साथ-साथ पशुपालन भी करता है| यदि किसान अपने उपलब्ध खेती अवशेषों और पशुओं के गोबर का प्रयोग खाद बनाने के लिए करें तो स्वयं ही उच्च गुणवता की खाद तैयार कर सकता है| अच्छी खाद बनाने के लिए 1 मीटर चौड़ा, 1 मीटर गहरा या आवश्यकतानुसार 5 से 10 मीटर लम्बाई का गड्ढा खोदकर उसमें उपलब्ध खेती अवशेष की एक परत पर गोबर तथा पशुमूत्र की एक पतली परत दर परत चढ़ा दें| उसे अच्छी तरह नम करके गड्ढे को उचित ढंग से ढककर मिट्टी और गोबर से बंद कर दें| इस प्रकार दो महीने में 3 पलटाई करने पर अच्छी गुणवता की खाद बनकर तैयार हो जायेगी|

वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद)- इसमें केंचुओं द्वारा गोबर और अन्य अवशेष को कम समय में उत्तम गुणवत्ता की जैविक खाद में बदल देते हैं| इस तरह की जैविक खाद से मिटटी जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है| यह भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने, दीमक के प्रकोप को कम करने और पौधों को सन्तुलित मात्रा में आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करने के लिए उत्तम है|

हरी खाद- जैविक खेती हेतु वर्षाकाल में जल्दी बढ़ने वाली दलहनी फसलें जैसे ढेचा, सनई, लोबिया, ग्वार आदि उगाकर कच्ची अवस्था में लगभग 50 से 60 दिन बाद खेत में जुताई करके मिटटी में मिला दें| इस प्रकार हरी खाद भूमि सुधारने, मिटटी कटाव को कम करने, नाइट्रोजन स्थिरीकरण, मिटटी संरचना और जलधारण क्षमता को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी|

गोबर गैस स्लरी खाद- जैविक खेती में गोबर गैस संयन्त्र से निकली हुई स्लरी को सीधे ही तरल गोबर की खाद के रूप में खेत में दी जा सकती है| यह शीघ्र ही फसल को लाभ पहुंचाती है, गोबर की खाद मिटटी में मिलाने पर एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरने के बाद उसके पोषक तत्व फसल को उपलब्ध हो पाते हैं| जबकि स्लरी स्वयं ही सड़ने से इसमें विद्यमान सभी पोषक तत्व फसल या पौधों को शीघ्र ही प्राप्त हो जाते हैं| एकत्रित स्लरी खाद का चूरा करके उसे सीधे ही कूड़ों में डाला जा सकता है| दो घन मीटर गैस संयत्र से प्रति वर्ष 10 टन बायौ गैस स्लरी का खाद प्राप्त होती है|

इसमें नाइट्रोजन 1. 5 से 2 प्रतिशत, फॉस्फोरस 1.0 प्रतिशत तथा पोटाश 1.0 प्रतिशत पाया जाता है| पतली स्लरी में 2 प्रतिशत नाइट्रोजन, अमोनिकल नाइट्रोजन के रूप में होता है| इसलिए इसे सिंचाई जल के साथ नालियों में दिया जाये तो इसका तत्काल प्रभाव फसल पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है| सूखी स्लरी में से नाइट्रोजन का कुछ भाग हवा में उड़ जाता है, प्रति हैक्टेयर 5 टन स्लरी की मात्रा असिंचित खेती में तथा 10 टन स्लरी सिंचित खेती में डालना चाहिए|

जैव उर्वरक- जैव उर्वरक सूक्ष्म जीवों की जीवित कोशिकाओं को किसी वाहक केरियर में मिश्रित करके तैयार किए जाते हैं| इसमें राइजोबियम कल्चर सबसे अधिक उपयोग में आने वाला जैव उर्वरक है| इसके जीवाणु दलहनी फसलों की जड़ों में गांठे बनाकर उसमें रहते हुए वायुमंडलीय नत्रजन को भूमि में स्थिरीकरण कर फसल को उपलब्ध कराते हैं| प्रत्येक दलहनी फसल का अलग अलग कल्चर होता है| यह जीवाणु 50 किलोगतं से 135 किलोग्राम नत्रजन प्रति हैक्टेयर मिटटी में स्थिरीकरण करते हैं| राइजोबिया की 750 ग्राम मात्रा 80 से 100 किलोग्राम बीज के लिए पर्याप्त होती है|

एजोटोबेक्टर, खाद्यान फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण का कार्य करते हैं| खाद्यान फसलों तथा सब्जियों आदि में इसके उपयोग से 15 से 20 प्रतिशत अधिक पैदावार मिलती है| घोलक जीवाणु (पीएसबी) में सुक्ष्म जीवाणु होते हैं| इसके प्रयोग से भूमि में अघुलनशील स्फुर घुलनशील स्फुर में परिवर्तित हो जाता है और 15 से 25 प्रतिशत तक पैदावार में वृद्धि होती है|

जैविक खेती के फायदे

  • इस से ना केवल भूमि की उर्वरक शक्ति बनी रहती है बल्कि उसमें वृद्धि भी होती है|
  • इस पद्धति से पर्यावरण प्रदूषण रहित होता है|
  • इसमें कम पानी की आवश्यकता होती है जैव खेती पानी का संरक्ष्ण करती है|
  • इस खेती से भूमि की गुणवत्ता बनी रहती है और सुधार होता रहता है|
  • यह किसान के पशुधन के लिए भी बहुत महत्व रखती है और अन्य जीवों के लिए भी|
  • फसल अवशेषों को नष्ट करने की आवश्यकता नही होती है|
  • उत्तम गुणवत्ता की पैदावार का होना|
  • जैविक खाद्यान महंगे मूल्य पर बिकते है|
  • कृषि के सहायक जीव न केवल सुरक्षित होंगे बल्कि उनमें बढ़ोतरी भी होगी|
  • इसमें कम लागत आती है और मुनाफा ज्यादा होता है|
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कंपोस्ट खाद क्या है,कैसे बनाये ?

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अच्छी तरह सड़े हुए पौधों और पशु अवशेषों को कम्पोस्ट खाद कहा जाता है| कम्पोस्ट (Compost) खाद का मतलब है, की खेतो में प्रयोग से पहले उसको अच्छी तरह सड़ा लेना चाहिए, कम्पोस्ट (Compost) की अवश्यक आवश्यकताओं में हवा, नमी, अनुकूल तापमान और नाइट्रोजन की एक छोटी मात्रा है| यह सूक्ष्मजीवों का एक क्रिया कलाप है और वही सामग्री को कमजोर करने के लिए सूक्ष्म जीवों को पेश करने के लिए उपयुक्त तैयार इनोकुल्मो को जोड़ने की सिफारिस करते है|

कम्पोस्ट (Compost) खाद फसक व पौधों के पोषक तत्वों में उच्च जैविक उर्वरता संचार करता है, जो मिट्टी की भौतिक विशेषताओं में सुधार करता है, खेत में जैव अपशिष्ट को कम करता है और रोगजनकियों को खत्म करता है| 

कम्पोस्ट खाद कैसे काम करता है 

  • कम्पोस्ट (Compost) खाद प्रभावी तब होता है, जब आप एसी परिस्थिति बनाते है, जो सूक्ष्म जीवों के नाम पर मिट्टी में छोटे छोटे जीवों के विकास का समर्थन करते है| ये वैक्टैरिया और कवक है, इनको केवल एक सूक्ष्मदंशक का उपयोग कर के देखा जा सकता है|
  • इन सूक्ष्म जीवों को पौधे और पशु अपशिष्ट पदार्थो को तोड़ने के लिए आवश्यक है| वे पौधे और पशु के कचरे के टूटने के दोरान गर्मी का उत्पादन करते है|
  • कुछ दिनों के बाद, तैयार कम्पोस्ट ढेर गर्म हो जाएगा और जब उसको खोला जाएगा तो भाप भी दिखाई दे सकती है| कचरे की सामग्री के रूप में विघटित होने पर वे ऐसे पदार्थो में पोषक तत्वों को छोड़ते है, जिनका उपयोग फसल और पौधों में किया जा सकता है|

कम्पोस्ट खाद की प्रक्रिया 

  • फसल के अवशेषों, पशु और घरेलू कार्बनिक अपशिष्ट को गड्ढे में डाल दिया जाता है| उसको उचित नमी के साथ 4 से 5 महीने तक विघटित होने के लिए छोड़ दिया जाता है| इसके बाद आप देखेंगे की फसल में उपयोग के लिए खाद तैयार है|
  • अपशिष्ट पदार्थो को छाया के निचे ढक कर छोड़ दिया जाता है और उपरोक्त तरीके से विघटित होने के लिए छोड़ दिया जाता है| दोनों तरीकों से खाद का उत्पादन होता है, लेकिन इस प्रक्रिया में आप देखेगे की खाद में पोषक तत्वों की गुणवत्ता कम है|
  • हालाँकि प्रयोजनपूर्ण तरीकों से उच्च गुणवत्ता वाले खाद का करने के लिए नियोजित किया जा सकता है| जो किसानों को महंगा अकार्बनिक उर्वरक का उपयोग किए बिना फसल की पैदावार में वृद्धि कर सकती है| इस प्रकार की खाद को समृद्ध खाद कहा जाता है|

कम्पोस्ट खाद के लिए आवश्यक 

  • कम्पोस्ट के लिए उस स्थान का चयन करे जहा हवा, धुप और पानी का प्रभाव ज्यादा नही होना चाहिए यानि की संतुलित मात्रा में हो, मिश्रण या कचरा न तो ज्यादा गिला होना चाहिए और ना ही सुखा होना चाहिए|
  • खाद बनाने के लिए जगह का चयन जमीन के उपर या गड्ढे के रूप दोनों तरह से किया जा सकता है, अगर जमीन के उपर कर रहें है तो उस जगह से खरपतवार को साफ करे और मिट्टी की एक कुछ सेंटीमीटर परत बनाए उसको पानी से गीलाकर के उसपर कचरा डाले इसी तरह यदि गड्ढे का उपयोग कर रहें है तो वहा भी मिट्टी की परत बनाए और पानी का छिडकाव करे|
  • कचरा डालने के बाद उसके उपर एक 15 सेंटीमीटर रेत की परत तैयार करनी चाहिए और उसको पूरी तरह से पानी से गिला कर देना चाहिए|

कम्पोस्ट खाद बनाने की प्रक्रिया
  • इसके लिए एक उचित आकर का गड्ढा बनाए 20 से 25 फुट लम्बा, 5 से 7 फुट चौड़ा और 3 से 10 फिट तक गहरा हो सकता है| यदि आप की पास ज्यादा मिश्रण है तो इसको बड़ा कर सकते है और कम है तो छोटा कर सकते है|
  • यदि हो सके तो अधिक नाइट्रोजन के लिए मिश्रण में पौधों या फसल के अवशेष ज्यादा डाले जिसे नाइट्रोजन की मात्रा ज्यादा मिल सकती है|
  • मिश्रण को डालते समय ध्यान दे की उसमे कोई खाली स्थान नही होना चाहिए अच्छी तरह दबा कर गड्डे को भरे और ऊपर गोबर का लेप करे इसके बाद उसपर 15 सेंटीमीटर मिट्टी की परत बना दे जिसको पानी से गिला कर देना चाहिए|
  • कचरे को नमी युक्त कर के गड्डे में डाले और 4 से 5 महीने के लिए छोड़ दे अब इतने समय के बाद आप देखेगे की कम्पोस्ट (Compost) खाद फसल के आवश्यक पोषक तत्वों के साथ तैयार है|
  • कम्पोस्ट खाद को फसल बुआई से 3 से 4 सप्ताह पहले नमी युक्त खेत में डाले और उसकों किसी भी यंत्र से मिट्टी में अच्छे से मिला दे| ताकि पोषक तत्व भूमि में अच्छे तरीके से प्रगतिशील हो सके और एक बेहतर पैदावार किसान को मिल सके|

कम्पोस्ट खाद के लाभ 
  • यह सस्ता है, क्योंकी यह फसल के अवशेषों, गोबर, घास और अन्य घरेलू कचरे से बनती है|
  • पौधे इसके पोषक तत्वों को अधिक दुटने की बजाय सीधे ग्रहण कर लेते है|
  • इससे फसल की पैदावार में तुरंत प्रभाव पड़ता है|
  • मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है जिससे फसल को समर्थन मिलता है और पानी की बचत होती है|
  • भूमि की पोषण शक्ति प्रभावित नही होती है|
  • पर्यावरण पर दूषित प्रभाव नही पड़ता यानि की पर्यावरण प्रदुषण से छुटकारा मिलता है|
  • जैविक खादों से बने उत्पादों से स्वास्थ्य प्रभावित नही होता|

इस तरह किसान भाई समज सकते है की कम्पोस्ट (Compost) खाद बनाना कितना सस्ता और आसान है और साथ ही फसल पैदावार, भूमि, मानव जाती के स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए भी कितना उपयोगी और गुणकारी हो सकता है| 

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कृषि में ट्राइकोडर्मा का महत्व

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हमारे मिट्टी में कवक (फफूदीं) की अनेक प्रजातियाँ पायी जाती है इनमें से एक ओर जहाँ कुछ प्रजातियाँ फसलों को हानि (शत्रु फफूदीं)  पहॅचाते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ प्रजातियाँ लाभदायक  (मित्र फफूदीं) भी हैं जैसे कि द्राइकोडरमा ।

ट्राइकोडर्मा पौधों के जड़ विन्यास क्षेत्र (राइजोस्फियर)  में खामोशी से अनवरत कार्य करने वाला सूक्ष्म कार्यकर्ता है। यह एक अरोगकारक मृदोपजीवी कवक है जो प्रायः कार्बनिक अवशेषों पर पाया जाता है। इसलिए मिट्टी में फफूदों के द्वारा उत्पन्न होने वाले कई प्रकार की फसल बिमारीयों के प्रबंधन के लिए यह एक महत्वपूर्ण फफूदीं है।

यह मृदा में पनपता है एवं वृध्दि करता है तथा जड़ क्षेत्र के पास पौधों की तथा फसल की नर्सरी अवस्था से ही रक्षा करता है। ट्राईकोडर्मा की लगभग 6 स्पीसीज ज्ञात हैं लेकिन केवल दो ही ट्राईकोडर्मा विरिडी व ट्राईकोडर्मा हर्जीयानम मिट्टी में बहुतायत मिलता है।

यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं कृषि की दृष्टि से उपयोगी है। यह एक जैव कवकनाशी है और विभिन्न प्रकार की कवक जनित बीमारियों को रोकने में मदद करता है। इससे रासायनिक कवकनाशी के ऊपर निर्भरता कम हो जाती है। इसका प्रयोग प्रमुख रूप से रोगकारक जीवों की रोकथाम के लिये किया जाता है। इसका प्रयोग प्राकृतिक रूप से सुरक्षित माना जाता है क्योंकि इसके उपयोग का प्रकृति में कोई दुष्प्रभाव देखने को नहीं मिलता है।

ट्राइकोडर्मा उत्पादन विधि

ट्राइकोडर्मा के उत्पादन की ग्रामीण घरेलू विधि में कण्डों (गोबर के उपलों) का प्रयोग करते हैं। खेत में छायादार स्थान पर उपलों को कूट- कूट कर बारिक कर देते हैं। इसमें  28 किलो ग्राम या लगभग 85 सूखे कण्डे रहते हैं। इनमें पानी मिला कर हाथों से भली भांति मिलाया जाता है। जिससे कि कण्डे का ढेर गाढ़ा भूरा दिखाई पड़ने लगे।

अब उच्च कोटी का ट्राइकोडर्मा शुद्ध कल्चर 60 ग्राम इस ढेर में मिला देते हैं। इस ढेर को पुराने जूट के बोरे से अच्छी तरह ढक देते है और फिर बोरे को ऊपर से पानी से भिगो देते हैं। समय-समय पर पानी का छिड़काब बोरे के ऊपर करने से उचित नमी बनी रहती है।

12 से 16 दिनों के बाद ढ़ेर को फावडे से नीचे तक अच्छी तरह से मिलाते हैं। और पुनः बोरे से ढ़क देते है। फिर पानी का छिड़काव समय-समय पर करते रहते हैं। लगभग 18 से 20 दिनों के बाद हरे रंग की फफूंद ढ़ेर पर दिखाई देने लगती है। लगभग 28 से 30 दिनों में ढे़र पूर्णतया हरा दिखाई देने लगता है। अब इस ढे़र का उपयोग मृदा उपचार के लिए कर सकते हैं ।

इस प्रकार अपने घर पर सरल, सस्ते व उच्च गुणवत्ता युक्त ट्राइकोडर्मा का उत्पादन कर सकते है। नया ढे़र पुनः तैयार करने के लिए पहले से तैयार ट्राइकोडर्मा का कुछ भाग बचा कर सुरक्षित रख सकते हैं और इस प्रकार इसका प्रयोग नये ढे़र के लिए मदर कल्चर के रूप में कर सकते हैं। जिससे बार बार हमें मदर कल्चर बाहर से नही लेना पडेगा।

ट्राईकोडर्मा के प्रयोग से कुछ मुख्य रोगों का प्रबन्धन-

  •     दलहनी व तिलहनी फसलों से उकठा रोग
  •     अदरक का प्रकंद विगलन
  •     कपास का उकठा, आद्रपतन, सूखा, जड़गलन विगलन ।
  •     चुकन्दर का आद्रपतन।
  •     मूगंफली में कालर राट।
  •     फूलों में कार्म सड़न
  •     सब्जियों में आद्रपतन , उकठा, जड़गलन, कालर राट

ट्राइकोडर्मा के प्रयोग की विधि


बीज का उपचार -
बीज के उपचार के लिये 5 ग्राम पाउडर प्रति किलो बीज में मिलाते  हैं । यह पाउडर बीज में चिपक जाता है  बीज को भिगोने की जरूरत नहीं है क्योंकि पाउडर में कार्बक्सी मिथाइल सेल्यूलोज मिला होता है।

बीज के जमने के साथ.साथ द्राइकोडर्मा भी मिट्टी में चारो तरफ बढ़ता है और जड़ को चारों तरफ से घेरे रहता है जिससे कि उपरोक्त कोई भी कवक आसपास बढ़ने नहीं पाता। जिससे फसल के अन्तिम अवस्था तक बना रहता है।

मिट्टी का उपचार -
एक किग्रा ट्राईकोडर्मा पाउडर को 25 किग्रा गोबर की खाद (एफ वाई एम) में मिलाकर एक हफ्ते के लिये छायेदार स्थान पर रख देते हैं जिससे कि स्पोर जम जाय फिर इसे एक एकड़ खेत की मिट्टी में फैला देते हैं तथा इसके उपरान्त बोवाई कर सकते हैं।

बोने के 5 दिन पहले 150 ग्राम पाउडर को 1 घन मीटर मिट्टी में 4 से 5 सेमी गहराई तक अच्छी तरह मिला लें फिर बोवाई करें। बाद में यदि समस्या आवे तो पेड़ों के चारो ओर गडढा या नाली बनाकर पाउडर को डाला जा सकता है जिससे कि पौधों के जड़ तक यह पहँचु जाय।

सीड प्राइमिंग-
बीज बोने से पहले खास तरह के घोल की बीजों पर परत चढ़ाकर छाया में सुखाने की क्रिया को सीड प्राइमिंग कहा जाता है। ट्राइकोडर्मा से सीड प्राइमिंग करने हेतु सर्वप्रथम गाय के गोबर का गारा (स्लरी) बनाएँ। प्रति लीटर गारे में 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा उत्पाद मिलाएँ और इसमें लगभग एक किलोग्राम बीज डुबोकर रखें।

इसे बाहर निकालकर छाया में थोड़ी देर सूखने दें फिर बुवाई करें। यह प्रक्रिया खासकर अनाज, दलहन और तिलहन फसलों की बुवाई से पहले की जानी चाहिए।

पर्णीय छिड़काव -
कुछ खास तरह के रोगों जैसे पर्ण चित्ती, झुलसा आदि की रोकथाम के लिये पौधों में रोग के लक्षण दिखाई देने पर 5 से 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

जड़ उपचार-
250 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति 10 से 20 लीटर पानी में मिलाये व प्रत्यारोपित किये जाने वाले पौधों की जड़ों को 30 मिनट तक कन्द, राइजोम एवं कलम को उस घोल में 15 से 30 मिनट तक डुबोकर रखे, उसके पश्चात् खेत में लगाएं।

ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से लाभ
  • यह रोगकारक जीवों की वृद्धि को रोकता है या उन्हें मारकर पौधों को रोग मुक्त करता है। यह पौधों की रासायनिक प्रक्रियाओं को परिवर्तित कर पौधों में रोगरोधी क्षमता को बढ़ाता है। अतः इसके प्रयोग से रासायनिक दवाओं विशेषकर कवकनाशी पर निर्भरता कम होती है।
  • यह पौधों में रोगकारकों के विरुद्ध तंत्रगत अधिग्रहित प्रतिरोधक क्षमता (सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेसिस्टेन्स) की क्रियाविधि को सक्रिय करता है। यह मृदा में कार्बनिक पदार्थों के अपघटन की दर बढ़ाता है अतः यह जैव उर्वरक की तरह काम करता है।
  • यह पौधों में एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि को बढ़ाता है। टमाटर के पौधों में ऐसा देखा गया कि जहाँ मिट्टी में ट्राइकोडर्मा डाला गया उन पौधों के फलों की पोषक तत्वों की गुणवत्ता, खनिज तत्व और एंटीऑक्सीडेंट, गतिविधि अधिक पाई गई।
  • यह पौधों की वृद्धि को बढ़ाता है क्योंकि यह फास्फेट एवं अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों को घुलनशील बनाता है। इसके प्रयोग से घास और कई अन्य पौधों में गहरी जड़ों की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई जो उन्हें सूखे में भी बढ़ने की क्षमता प्रदान करती है।
  • ये कीटनाशकों, वनस्पतिनाशकों से दूषित मिट्टी के जैविक उपचार (बायोरिमेडिएशन) में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें विविध प्रकार के कीटनाशक जैसे ऑरगेनोक्लोरिन, ऑरगेनोफास्फेट एवं कार्बोनेट समूह के कीटनाशकों को नष्ट करने की क्षमता होती है।

सावधानियां-
  • मृदा में ट्राइकोडर्मा का उपयोग करने के 4 से 5 दिन बाद तक रासायनिक फफूंदीनाशक का उपयोग न करें।
  • सूखी मिट्टी में ट्राइकोडर्मा का उपयोग न करें।
  • ट्राइकोडर्मा के विकास एवं अस्तित्व के लिए उपयुक्त नमी बहुत आवश्यक है।
  • ट्राइकोडर्मा उपचारित बीज को सीधा धूप की किरणों में न रखें।
  • ट्राइकोडर्मा द्वारा उपचारित गोबर की खाद को लंबे समय तक न रखें।


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दोगुना पैदावार बढ़ाएँ ट्राइकोडर्मा कल्चर से

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खेती किसानी में ट्राइकोडर्मा कवक के फ़ायदे जानकर आप अचरज में ज़रूर पड़ जाएँगे । ट्राइकोडर्मा के खेती में प्रयोग करने के बेशुमार लाभ हैं । ट्राइकोडर्मा एक कवक यानी फ़ंगस है । यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं कृषि की दृष्टि से उपयोगी है। इसका प्रयोग प्रमुख रूप से रोगकारक जीवों की रोकथाम के लिये किया जाता है। ट्राइकोडर्मा फसलों में विभिन्न प्रकार की कवक जनित बीमारियों को रोकने में कारग़र है।

केचुये की तरह किसानो का दोस्त होता है ट्राईकोडमा

ट्राइकोडर्मा न सिर्फ़ फसलों की पैदावार बढ़ता है । बल्कि कवक से फसलों से होने वाली बीमारियों को भी ख़त्म करता है । खेतों की मिट्टी में कई कवक यानी फफूँदी की बहुत की प्रजातियाँ पायी जाती है । जिसमें कुछ फसलों में बीमारी पैदा करती करती हैं । जिसे शत्रु फफूँदी कह सकते है ।

वहीं फफूँदी की ऐसी प्रजाति भी होती है जो फसलों व मिट्टी के लिए लाभदायक होती हैं । ऐसी फफूँदी को मित्र फफूँदी कह सकते हैं । इन्हें आप केचुये की तरह यह Garden friendly fungi है । उन्ही मित्र फफूँदी में एक है ट्राइकोडर्मा Trichoderma की 6 प्रजातियाँ की खोजी जा चुकी हैं । लेकिन सिर्फ़ दो प्रजातियाँ ही मृदा में सबसे ज़्यादा मिलती है । इनमें से एक है – ट्राईकोडर्मा विरिडी व दूसरी ट्राईकोडर्मा हर्जीयानम ।

ट्राइकोडर्मा अरोगकारक मृदोपजीवी कवक है जो प्रायः कार्बनिक अवशेषों पर पाया जाता है kheti me trichoderma ke fayde समझने के लिए हमें ट्राइकोडर्मा के काम करने के ढंग को समझना होगा । यह पौधों के जड़ों के विन्यास क्षेत्र में रहता है । पौधें की जड़ों के विन्यास क्षेत्र को राइजोस्फियर कहा जाता है । मिट्टी में अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए लगातार कड़ा परिश्रम करते हैं । ट्राईकोडरमा पौधे के बॉडीगार्ड का काम करता है । यह पौधें की नर्सरी की अवस्था से बड़े होने तक फफूँदजनित बीमारियों से रक्षा करता रहता है । ट्राइकोडर्मा के व्यवहार के कारण जैविक खेती में जैव कवकनाशी के रूप में इसका प्रयोग किया जाने लगा है ।

खेती में ट्राइकोडर्मा के फायदे व ट्राइकोडर्मा उत्पादन तकनीक के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करें – 

खेतों में रासायनिक कीटनाशक व दवाओं से जहां स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है वहीं मिट्टी के गठन पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है । खेतों में जैव कवक नाशी के रूप में kheti me trichoderma ke fayde के रूप में बड़ा फ़ायदा यही है कि इस जैव रसायन से बिना केमिकल रहित अनाज व सब्ज़ी व फल उगाए जा सकते हैं ।

साथ ही मिट्टी के कणों का गठन भी सुधरता है । जिससे मिट्टी में जल धारण की क्षमता बढ़ती है । सिंचाई के साथ साथ साल भर में हज़ारों रुपए फसलों की बीमारियों की रोकथाम हेतु जो खर्च होते हैं वो भी हम बचा सकते हैं । ट्राइकोडर्मा का जैव कवकनाशी के रूप में इस्तेमाल ईकोफ़्रेंडली है । इसका अभी तक कोई साइड इफ़ेक्ट देखने को नही मिला है ।

खेती में ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से लाभ ही लाभ

  • – Trichoderma रोगकारक जीवों को नष्ट करता है जिससे पौधे निरोगी रहते हैं और अच्छी बढ़वार करते हैं ।
  • – यह पौधों के इम्यून सिस्टम को बढ़ाता है, पौधे में रोग प्रतिरोधी क्षमता के कारण रासायनिक दवाओं विशेषकर कवकनाशी पर खर्च कम हो जाता है ।
  • – पौधों में रोगकारकों के विरुद्ध तंत्रगत अधिग्रहित प्रतिरोधक क्षमता (सिस्टेमिक एक्वायर्ड रेसिस्टेन्स) की क्रियाविधि को सक्रिय करता है।
  • – लगातार रासायनिक खादों व दवाइयों के प्रयोग से दूषित हो गयी मिट्टी का बायो उपचार (bio remediation) भी होता है ।
  • – मिट्टी में पौधों की पत्तियों फसलों के अवशेष व सड़े – गले कार्बनिक पदार्थों की अपघटन की क्रिया में तेज़ी लाता है । यह अपघटक जैव उर्वरक बनकर पौधे में एंटीऑक्सीडेंट रेट को बढ़ाता है । जिससे पौधें में रोग कम लगता है ।
  • – Trichoderma पौधे में micro nutrition elements- सूक्ष्म पोषक तत्वों को घुलनशील Trichoderma का रिज़ल्ट सब्ज़ी वाली फसलों में अच्छा पाया गया है। – ऑरगेनोक्लोरिन, ऑरगेनोफास्फेट एवं कार्बोनेट समूह के कीटनाशकों के समूह को Trichoderma करता है । जिससे मिट्टी की संरचना में सुधार होता है ।
  • – Trichoderma के कारण पौधे के आस-पास गहरी जड़ वाली घास उग आती है । जिससे पानी संचयन क्षमता बढ़ती है । और पौधों में नमी काफ़ी समय तक बनी रहती है ।
  • टमाटर की खेती में टमाटर के फलों में nutrition quality मसलन फल में खनिज तत्व और एंटीऑक्सीडेंट अपेक्षाकृत अधिक पायी गयी । जिससे पौधों की वृद्धि बढ़ती है और फलों की गुणवत्ता भी अच्छी होती है ।

घर पर ट्राईकोडरमा कल्चर बनाने की विधि
Trichoderma बनाने की विधि बहुत सरल है, Trichoderma उत्पादन तकनीक को एक बार समझने के बाद इसे घर पर ही बनाया जा सकता है । ट्राइकोडर्मा कवक बनाने के बारे में पूरी जानकारी आपको खेती किसानी के इस आलेख में दी जाएगी

ट्राइकोडर्मा बनाने के लिए आवश्यक सामग्री
  • – 28-30 किलो गोबर के कंडे जो गिनती में ये 85-90 होंगे । जिसे कुछ स्थानों पर उपले भी कहा जाता है । अपनी स्थानीय भाषा के हिसाब से इसे समझ लें ।
  • – हाईक्वालिटी का ट्राइकोडर्मा कल्चर -(उच्च गुणवत्ता वाला शुद्ध ट्राईकोडरमा कल्चर से बेस्ट ट्राईकोडरमा तैयार होता है ।)
  • जूट के पुराने बोरे ( ये आमतौर पर घर पर ही मिल जाते हैं )
  • – प्लास्टिक के दस्ताने (कंडे के मिश्रण व ट्राईकोडरमा कल्चर को कंडे के ढेर में अच्छे से मिलाने के लिए )

ट्राइकोडर्मा के बनाने की ग्रामीण घरेलू विधि
गोबर के कंडो को किसी छायादार स्थान पर कूट कर बिलकुल बारीक कर लें । फिर कंदों के बारीक मिश्रण में ट्राइकोडर्मा के उत्पादन की ग्रामीण घरेलू विधि में कण्डों (गोबर के उपलों) का प्रयोग करते हैं। खेत में छायादार स्थान पर उपलों को कूट- कूट कर बारिक कर देते हैं। कंडे को भली प्रकार बारीक कर लें । कूटने के बाद जो गाँठे रह जाएँ उसे दस्ताने पहनकर हाथों से मसल कर बारीक कर लें । बारीक मिश्रण में पानी का छिड़काव कर फिर उसे हाथों से मिलाएँ ताकि उसमें नमी आ जाएँ । पानी मिलाने व मसलने के बाद कंडे का मिश्रण गाढ़ा भूरा रंग का दिखने लगेगा ।

इसके बाद ट्राइकोडर्मा शुद्ध कल्चर 60 ग्राम मात्रा को उसी कंडे के ढेर में मिला दें । ट्राईकोडरमा कल्चर को अच्छे ढंग से कंडे के मिश्रण में मिला दें । अब आपने 100 फ़ीसदी काम पूरा कर लिया है । अब ढेर को पुराने जूट के बोरे से ढक कर कुछ दिन के लिए छोड़ दें । ढेर में नमी बनाए रखने के लिए समय समय पर उनके पानी का छिड़काव करते रहें । 2 सप्ताह में ढेर के बोरे हटाकर एक बार फिर से फावड़े से मिलाएँ ।

पानी का छिड़काव करके फिर उसे बोरों से धक दें । लगभग 20-22 दिनो में हरे रंग की फफूँद दिखने लगेगी । यही है ट्राइकोडर्मा । महीने भर में ये पोर तरह हरी दिखायी देनें लगेगी । अब ट्राइकोडर्मा तैयार हो गया है । अब इसका इस्तेमाल का भूमि शोधन के लिए कर सकते हैं । इस तरह से आप घर पर ही बड़ी आसानी से सस्ते व उच्च गुणवत्ता युक्त ट्राइकोडर्मा का उत्पादन कर सकते है। तैयार ट्राइकोडर्मा का कुछ भाग कच्चे माल के लिए बचा कर रख दीजिए यह दुबारा ट्राइकोडर्मा बनाने के लिए मदर कल्चर के रूप प्रयोग कर सकते हैं । जिसके लिए आपको बाज़ार से ट्राइकोडर्मा कल्चर नही ख़रीदना पड़ेगा । आपके पैसे भी बचेंगे ,

ट्राईकोडर्मा कल्चर के प्रयोग के तरीके
ट्राइकोडर्मा को कैसे इस्तेमाल करना है यह जानकारी होना बहुत ज़रूरी है । ट्राइकोडर्मा के इस्तेमाल की अच्छी जानकारी होने पर ही आप kheti me trichoderma ke fayde ले सकेंगे । ट्राइकोडर्मा का प्रयोग भूमि उपचार, बीज उपचार, पर्णीय छिड़काव, व जड़ उपचारित करने में किया जाता हैं । ट्राइकोडर्मा का इस्तेमाल पादप रोग प्रबंधन में किया जाता है । इसके प्रयोग से जड़गलन विगलन,अदरक का प्रकंद विगलन,चुकन्दर का आद्रपतन,दलहनी व तिलहनी फसलों से उकठा रोग,दलहनी व तिलहनी फसलों से उकठा रोग,का उपचार किया जाता है । बीज के उपचार के लिये 5 ग्राम पाउडर प्रति किलो बीज में मिलाते  हैं । यह पाउडर बीज में चिपक जाता है  बीज को भिगोने की जरूरत नहीं है क्योंकि पाउडर में कार्बक्सी मिथाइल सेल्यूलोज मिला होता है। बीज के जमने के साथ.साथ द्राइकोडर्मा भी मिट्टी में चारो तरफ बढ़ता है और जड़ को चारों तरफ से घेरे रहता है जिससे कि उपरोक्त कोई भी कवक आसपास बढ़ने नहीं पाता। जिससे फसल के अन्तिम अवस्था तक बना रहता है।

ट्राइकोडर्मा से भूमि शोधन करें
चलिए बात करते हैं ट्राइकोडर्मा से मिट्टी को उपचारित करने की, मिट्टी में ही तमाम तरह की Harmful fungus and bacteria होते हैं । जो पौधों को रोगी बनाते हैं । खेत को शोधित करने के लिए गोबर की खाद जिसे farm yard manure भी कहा जाता है । इसकी 25 किलोग्राम मात्रा में ट्राइकोडर्मा की किलोग्राम मात्रा अच्छी प्रकार मिक्स करके छाया वाली जगह पर स्पोर जमने के लिए रख दें । 7-10 दिन में स्पोर जम जाते है । 10 दिन बाद इसको खेत की मिट्टी में मिला दें । इसके अलावा 150 पाउडर को चार से पाँच सेमी गहराई पर एक घन मीटर मिट्टी में भी मिला दें । इसके बाद बुवाई कर करें । ट्राइकोडर्मा पौधे की जड़ों के आसपास एक ईको बना लेता हैं । जिससे कवक जनित रोग पौधे को नुक़सान नही पहुँचा पाते ।

बीज उपचारित करने से मिलता है अधिक लाभ
इसके लिए सबसे पहले गाय के गोबर का गारा या घोल (स्लरी – Slurrygation) बना तैयर कर लें । इसक इसके लिए गाय का गोबर व गोमूत्र सबको मिला लिया जाता है । इस तरह गाय के गोबर का गारा या स्लरी तैयार हो जाता है । फिर हर लीटर स्लरी के हिसाब से 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा मिला दें । अच्छे से हिलाकर मिक्स कर दें । इसके बाद एक किलोग्राम बीज को उसी घोल में मिलाकर बीज शोषित करें बीज को घोल के बाहर निकाल कर छाया में सुखाने के लिए रख दें । अनाज, दलहन और तिलहन फसलों की बुवाई से पहले इस तरह से Seed treatment कर लेना चाहिए । Language of agriculture में इस तरह बीज बोने से पहले खास तरह के घोल की बीजों पर परत चढ़ाकर छाया में सुखाने की प्रक्रिया को सीड प्राइमिंग कहा जाता है।

पत्तियों पर पर्णीय छिड़काव से करें रोगों का सफ़ाया
हमारी फसलों पर कुछ ऐसे रोग होते हैं जो भूमि के शोधन व बीज को उपचारित करने के बाद भी फसलों पर हो जाते हैं । इसके फसल पर लक्षण दिखने पर तुरंत ट्राइकोडर्मा का पौधों की पत्तियों पर छिड़काव करें । इसके लिए 5 से 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा पाउडर प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे मशीन से पर्णीय छिड़काव करें । ट्राइकोडर्मा के लीफ़ स्प्रे से पौधों में लगने वाले कुछ खास तरह के रोगों जैसे पर्ण चित्ती, झुलसा आदि की रोकथाम की जा सकती है ।

ट्राइकोडर्मा से रोपे जाने वाले कंद व जड़ उपचार करने का आसान तरीक़ा
रोपे जानी वाली फसलों व पौधों को आप ट्राइकोडर्मा से जड़ शोधित कर बीमारियों से बचा सकते हैं । इसके लिए 10 से 20 लीटर पानी में 250 ग्राम ट्राइकोडर्मा मिलाकर घोल बना लें । उसके बाद प्रत्यरोपित किए जाने वाले कंद (राइजोम), जड़ों , अथवा कलम को इस घोल में आधे घंटे तक डुबाने के बाद ये उपचारित हो जाएँगे । अब इन्हें खेत में लगाएँ ।

ट्राइकोडर्मा के इस्तेमाल से जुड़ी ज़रूरी कुछ ज़रूरी बातों का ध्यान रखें
  • – kheti me trichoderma ke fayde के लिए ट्राइकोडर्मा के इस्तेमाल से पहले कुछ कंडीशन भी हैं । इनको समझना बहुत ज़रूरी है । अन्यथा kheti me trichoderma ke fayde की जगह नुक़सान अथवा मनमाफ़िक लाभ नही मिलेगा ।
  • – ट्राइकोडर्मा के विकास एवं अस्तित्व के लिए उपयुक्त नमी बहुत आवश्यक है इसलिए trichoderma के इस्तेमाल से पहले देख लें की मिट्टी सूखी ना हो ।
  • – जिस खेत में आपने ट्राइकोडर्मा का डाली हो उस खेत में एक सप्ताह तक कोई भी फ़ंगीसाइड या फफूँदीनाशक का इस्तेमाल ना करें ।

अगर आप ट्राइकोडर्मा से बीज को उपचारित कर रहे हैं तो ध्यान रखें की सूर्य की किरणें उस पर सीधें ना पड़ें । एक बात और ट्राइकोडर्मा से उपचारित गोबर की खाद अधिक दिनो के लिए न रखें । मसलन चार छ: महीने तक अन्यथा यह उतनी असरदार नही रह जाएगी । उपचारित गोबर की खाद का इस्तेमाल अधिकतम 3-4 माह तक करना अच्छा रहता है ।


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जानिए, नीम का कृषि में महत्व,उर्वरक, कीटनाशी एवं रोगनाशी में उपयोग

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भारत देश की मिट्टी में पैदा होने वाला लोक मंगलकारी तथा सर्व व्याधि निवारक बहुउपयोगी वृक्ष नीम भारत की ग्रामीण सभ्यता और संस्कति की पहचान बन चुका है| नीम ग्रामीण समाज में इस कदर रच बस गया है, कि इसके बगैर हमारे नित्य प्रतिदिन के कार्य कल्पना के बाहर हैं| इस लेख में नीम का कृषि में महत्व,  उर्वरक, कीटनाशी एवं रोगनाशी में इसका उपयोग पर विवरण प्रस्तुत है|

नीम की सामान्य जानकारी

नीम 30 से 50 फीट ऊँचा शीतल छायादार वृक्ष है| इसकी छाल स्थूल, खुदरी एवं तिरछी लम्बी धारियों से युक्त होती है| नीम की छाल बाहर से भूरी परन्तु अन्दर से लाल रंग की होती है| इसमें बसन्त ऋतु में सफेद छोटे-छोटे फूल मंजरी गुच्छों के रूप में खिलते हैं| इसके फल 1.5 से 1.7 सेंटीमीटर लम्बे गोल अंडाकार होते हैं| पतझड़ में पत्तियाँ गिर जाती हैं, बसन्त में ताम्रलोहित पल्लव निकलते हैं|

इसके फल ग्रीष्म ऋतु के अन्त में वर्षा ऋतु के प्रारंभ में पकते हैं| आमतौर पर एक पूर्ण विकसित नीम से 37 से 100 किलोग्राम बीज प्राप्त होता है| एक किलोग्राम बीज में लगभग 2000 से 3000 तक के बीच की संख्या पाई जाती हैं, नीम के 100 किलोग्राम पके फल में छिलका लगभग 23.8 प्रतिशत गूदा 47.5 प्रतिशत प्राप्त होता है| एवं गिरी से 45 प्रतिशत तेल और 55 प्रतिशत खली प्राप्त होती है|

नीम का रासायनिक प्रयोग 

नीम में एजाडिरैक्टीन नामक रसायन पाया जाता है| इस रसायन में कीटनाशक एवं कवकनाशक गुण होता है| इसी का प्रयोग करके बाजार में अनेक कीटनाशी दवाइयां उपलब्ध हैं| नीम वृक्ष के उत्पाद का रासायनिक संगठन इस प्रकार है, जैसे- निम्बान- 0.04 प्रतिशत, निम्बीनीन- 0.001 प्रतिशत, एजोडिरेक्टीन- 0.4 प्रतिशत, निम्बोसिटेरोल- 0.03 प्रतिशत, उड़नशील तेल- 0.02 प्रतिशत, टैनिन- 6.00 प्रतिशत|

कृषि में नीम का उपयोग
हमारा स्वदेशी कृषि तकनीक नीम पर ही आधारित है| फसलों को हानिकारक कीटों से बचाना हो या अनाज को भंडारित करना हो इन सब में नीम ही सहायक होता है| कृषि के दृष्टिकोण से देखा जाए तो खेती-बाड़ी, भंडारण, पशुपालन इत्यादि में नीम का व्यापक उपयोग है| फसल सुरक्षा की दृष्टिकोण से कीटों में वृद्धि नियंत्रकों को नियंत्रित करने के लिए नीम का प्रयोग किया जाता है|

जैसे खाद्य अवरोधक के रूप में और अण्ड अवरोधक के रूप में इसके कारण हानिकारक कीटों में प्रजनन क्षमता अवरूद्ध हो जाती है| नीम के प्रभाव से कीटों के लार्वा तथा वयस्क प्रतिकर्षित होकर भाग जाते हैं| इसके प्रभाव से वयस्क कीट बन्ध्य यानि नपुंसक हो जाते हैं| इसलिए उनमें वंशवृद्धि की क्षमता में कमी आ जाती है

बक्से में रखे कपड़ो को हानिकारक कीटों से बचाने के लिए भी नीम के पत्तों का प्रयोग होता है| इसी वजह से हमारे आदि ग्रन्थों में नीम को लोक मंगलकारी और सर्व व्याधि निवारक की संज्ञा दी गई है| नीम एक जीवनोपयोगी वृक्ष है| ग्रामीण समाज में इसका वृक्ष लगाने की परंपरा है| इसका कारण यह है, कि इसका वृक्ष वायु को शुद्ध रखता है| हानिकारक कीटों, मच्छरों को दूर भगाता है| नीम का गोंद, छाल एवं पत्ते सभी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह औषधीय गुणों से परिपूर्ण हैं|

इसके सूखे पत्तों को जलाकर पशुशाला को मच्छर एवं कीटरोधी बनाया जाता है| घरों से मच्छर भगाने के लिए इसके पत्तों को जलाया जाता है| नीम के विभिन्न भागों से चर्म रोग, परजीवी रोग, गर्भ निरोधक, मलेरिया, चेचक, दमा इत्यादि की दवा और सर्प बिच्छू आदि के विषैले प्रभाव को कम करने की दवा भी बनायी जाती है| नीम के तेल और खली का प्रयोग कीटनाशी और मिट्टी शोधक जैविक खाद के रूप में किया जाता है|

एकीकृत नाशीजीव प्रबधंन में उपयोग
आई पी एम यानि एकीकृतनाशी जीव प्रबन्धन में नीम का बहुत योगदान है| एकीकृत नाशी जीव प्रबन्धन में यह एक वरदान है, क्योंकि इसमें इसका प्रयोग सर्वथा निरापद और अत्यन्त प्रभावी है|

पोषक तत्व के रूप में उपयोग
इसकी खली में ये 5 से 8 प्रतिशत तक नाइट्रोजन और अधिक मात्रा में पोटेशियम मिलता है| जिसका उपयोग मिट्टी सुधारक के रूप में किया जाता है| इससे नाइट्रोजन का सूक्ष्मीकरण होता है, फलस्वरूप नाइट्रोजन गैस के रूप में नष्ट नहीं होता हैं| नीम की खली का प्रयोग करने से मिट्टी में उपस्थित रोगजनित कीटाणु, जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और कार्बनिक तत्वों की बढ़ोत्तरी के कारण मिट्टी शोधक सूक्ष्म जीवाणुओं में सक्रियता आ जाती है|

आलू में उपयोग- आलू की फसल में नीम खली के प्रयोग से ब्लैक स्कार्फ रोग का नियन्त्रण होता है|

1. इसका उर्वरक के रूप में खली का प्रयोग करने से भूमि के अन्दर पाये जाने वाले सभी प्रकार के कीट जैसे- दीमक, कटुआ, सफेद गिडार, आम की गुजिया, टिड्डे आदि खत्म हो जाते हैं| इससे फसल स्वस्थ रहती है, कीटों से फसलों की सुरक्षा भी होती है| इस प्रकार हम देखते हैं, कि इसकी खली का प्रयोग अनेक फसलों के रोग-नियन्त्रण में भी प्रभावी पाया गया है|

2. इसकी पत्ती 5 किलोग्राम 10 लीटर पानी में तब तक उबाले जब तक यह ढाई लीटर ना रह जाए| अब इस ढाई लीटर नीमयुक्त पानी में 100 लीटर पानी मिलाकर प्रति एकड़ धान की फसल पर छिड़काव करें| इस छिड़काव से धान का गंधी कीट, हरा फदका, भूरा फुदका, रस चूसने वाले कीटों से धान की फसल को बचाया जा सकता है| नीम के इसी घोल से बैगन के तना छेदक और फलछेदक कीट से बचाया जा सकता है| इसके अतिरिक्त टमाटर में फलीछेदक कीट का भी नियंत्रण किया जाता है| नीम की पत्तियों के अर्क से कपास, सब्जी और दलहनी बीजों का उपचार करने से बीज जनति रोगों का नियंत्रण होता है|

3. इसका तेल दुर्गन्धयुक्त और उसमें कडुवापन होने के कारण सभी फसलों तथा पौधों के पत्ती, फूल या फल पर कीड़ों को विकर्सित करता है| नीम का तेल 1 से 2 लीटर की मात्रा प्रति एकड़ छिड़काव करने से काटने, चबाने और रस चूसने वाले कीड़े नष्ट हो जाते हैं व कीटों के अंडों से बच्चे भी नहीं निकल पाते|

4. नीम तेल के 2 प्रतिशत घोल का प्रयोग कर चुर्णित आसिता यानि पाउडरी मिल्ड्यू रोग का नियंत्रण कुछ हद तक किया जा सकता है| नीम के 0.5 प्रतिशत घोल का प्रयोग कद्दूवर्गीय फसलों में 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें| इससे कद्दूवर्गीय फसलों में रोग-नियन्त्रण के साथ ही साथ 50 से 70 प्रतिशत तक फसल वृद्धि भी होती है|

5. ढाई किलोग्राम इसका बुरादा ढाई से तीन किलोग्राम लहसुन और 250 से 300 ग्राम खाने वाला तम्बाकू, इन तीनों का पेस्ट बना लें, इस पेस्ट में दो लीटर गोमूत्र या मिट्टी का तेल मिलाकर धान या गेहूं की फसल पर छिड़काव करें| इस छिड़काव से सभी हानिकारक कीट एवं रोगों का प्रभावी ढंग से नियंत्रण होता है|

6. पांच किलोग्राम निम्बौली रातभर के लिए शाम को भिगो दें, इस निम्बौली को सुबह उबाल लें तथा गाढ़ा पेस्ट बना लें| इस पेस्ट में 100 लीटर पानी मिलाकर घोल बना लें व प्रति एकड़ की दर से फसलों पर छिड़काव करें, सभी फसल, सब्जी और बागों में कीट-नियन्त्रण के लिए यह एक उपयुक्त कीटनाशी है|

7. 5 किलोग्राम इसके सूखे बीजों को साफ करके उसके छिलके को हटाकर नीम की गिरी निकाल लें| इस नीम की गिरी को पीस कर पाउडर बना लें, इस पाउडर को दस लीटर पानी में डालकर रात भर रखें| इस घोल को सुबह किसी लकड़ी के डंडे से हिलाकर मिलायें और महीन कपड़े से छान लें, इस घाल में 100 ग्राम कपड़ा धोने वाला पाउडर मिलाकर फिर 150 से 200 लीटर पानी में मिलायें| यह एक उपयुक्त कीटनाशी है, जो कि एक एकड़ की फसल के छिड़काव हेतु पर्याप्त है|

8. 25 से 30 किलोग्राम इसकी ताजी पत्तियाँ ले लें, इन पत्तियों को रातभर पानी में भिगो दें| सुबह इन्हें पीसकर पत्तियों का सत बना लें, अब इसमें 100 ग्राम कपड़ा धोने वाला पाउडर मिलाकर 150 लीटर पानी मिलाकर प्रति एकड़ फसल पर छिड़काव करें| यह भी एक उपयुक्त कीटनाशी है|

9. 10 किलोग्राम नीम की खली ले लें, इसे रात भर पानी में भिगो दें| सुबह इसके घाले में 100 लीटर पानी एवं 100 ग्राम कपड़ा धोने वाला पाउडर मिलाकर फसलों पर छिड़काव करें| एक एकड़ क्षेत्रफल की फसल के लिए यह एक उपयुक्त कीटनाशी है|

10. एक लीटर नीम का तेल ले लें, इसमें 100 ग्राम कपड़ा धोने वाला पाउडर मिलाएं और 100 लीटर पानी में घोलकर फसल पर छिडकाव करें, एक एकड़ क्षेत्रफल की फसल के लिए यह पर्याप्त कीटनाशी है|

11. अनाज भंडारण के लिए प्रयोग किए जाने वाले जूट के बोरों को 10 प्रतिशत इसकी गिरी के घोल में 15 मिनट तक बोरों को डुबाये व इन्हें छाया में अच्छी तरह सुखाकर अन्न भंडारण करें और बचे घोल को अनाज भंडारण वाले स्थान पर छिड़काव करें, इससे भंडारित अनाज कीटों से सुरक्षित रहेगा|

12. पादप विषाणु सूत्रकृमि तथा कवक के दुष्प्रभाव से फसल को बचाया जा सकता है| इसके प्रयोग से गन्धी, तनाछेदक, जैसिडस, फुदके, हेलियोथिस, सफेद मक्खी, माहूं, फलोवेधक, तम्बाकू सूड़ी इत्यादि कीटों का नियंत्रण किया जा सकता है|

नीम के विभिन्न रूपों के उपयोग में सावधानियाँ
नीमयुक्त कीटनाशी के छिड़काव में सावधानी बरतनी चाहिए| छिड़काव प्रातः काल या देर शाम को करने से अच्छे परिणाम मिलते हैं| सर्दियों में 10 दिन बाद और वर्षा ऋतु में दो तीन दिनों में छिड़काव की सलाह दी जाती है| छिड़काव इस प्रकार करें, कि पत्तियों के निचले सिरों पर भी नीमकीटनाशी पहुंचे| अधिक गाढ़े घोल की अपेक्षा हल्के घोल का कम दिनों के अन्तराल पर छिड़काव करें| नीमयुक्त कीटनाशी का प्रयोग यथाशीघ्र कर लेना चाहिए|

इस प्रकार देखा जाए तो नीम वास्तव में औषधीय दृष्टिकोण से, व्यापारिक दृष्टिकोण से, वातावरण के परिष्करण के लिए, फसलों को रोग कीटों से बचाने के लिए आदि हर प्रकार से मानव जीवन के हितार्थ सर्वथा लाभकारी है| आज आवश्यकता इस बात की है, कि अधिक से अधिक नीम के वृक्षों का रोपण करके नीम के गुणों का अधिक से अधिक फायदा उठाकर, पर्यावरण सुरक्षित रखकर पौधों को रोगों कीटों से बचाया जाये और इसके विविध उपयोग का लाभ उठाया जाये|

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चना फसल के रोग एवं कीटों की जानकारी और टिप्स

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चने की खेती सिंचित एवं असिंचित दोनों परिस्थितियों में की जाती है। धान और गेहूं फसल चक्र के कारण इन खेतों की उर्वरकता में कमी आई है, धान की खेती के बाद चने की फसल बोने पर चने की बुवाई देर से होती है, जिससे कि तना छेदक कीटों तथा शुष्क मूल विगलन इत्यादि का प्रकोप अधिक होते है, संरक्षण के उपायों को अपना कर मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने या बनाये रखने के साथ – साथ कीटों एवं रोगों के संक्रमण से बचाया जा सकता है ताकि फसलों का कम से कम आर्थिक क्षति हों। पारंपारिक, यांत्रिक, जैविक एवं रासायनिक जीवनाशकों का प्रयोग इस प्रकार से किया जाता है की नाशीजीवों का प्रकोप फसलों में कम से कम हो, और पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचे और आर्थिक दृष्टि से स्वीकार्य हों। और ये ध्यान दिया जाता है कि रासायनिक दवाओं का कम से कम एवं अत्यंत आवश्यकता पड़ने पर ही उपयोग किया जाए।

यांत्रिक कीट प्रबंधन-

फली भेदक कीट की निगरानी हेतु 5 फेरोमोन ट्रैप/हेक्टेयर का प्रयोग करना चाहिए। हेलिकोवेरपा कीट के संदर्भ में संख्या आर्थिक हानि स्तर 1 सुंडी प्रति 1.5  मी. फसल लाइन है या 5 प्रतिशत ग्रसित फली या 8-10 मौथ/ट्रैप/लगातार 3 रात्रि तक। इस कीट का नियंत्रण कीट के आर्थिक हानि स्तर पर पहुँचतें ही तुरंत कर देना चाहिए अन्यथा कीट की संख्या आर्थिक हानि स्तर से अधिक हो जाने पर कीट नियंत्रण की लागत अत्यधिक हो सकती है।

नियंत्रण फसल की निगरानी करने से उकठा एवं सड़न से प्रभावित पौधों का पता प्रारंभिक अवस्था में ही लग जाता है, पक्षियों को आकर्षित करने के लिए T आकार के 3 – 5  फीट लंबे 20 खूँटी/हेक्टेयर लगाने चाहिए, जिससे कीटभक्षी पक्षियों को शिकार करने में सहायता पहुंचे। कुछ कीट भक्षी पक्षी बूबूलक्स इबीस, एक्रीडोथेरस ट्रिस्टिस, पेशन डोमेष्टिक्स, सिटेकुला क्रमेरी इत्यादि हैं।

जैविक कीट प्रबंधन-

चने के रोगों के रोकथाम के लिए सूक्ष्मजीवीय जीवनाशक जैसे ट्राईकोडर्मा एवं सूडोमोनास का उपयोग बीजोपचार के लिए करना चाहिए।

खेतों में एनपीवी, बीटी का प्रयोग करें। एचएएनपीवी/250 एल/ ई/हे. (1×109 पीओबी) अकेले या टिनोपाल (0.1 प्रतिशत पराबैंगनी किरणों के प्रभाव को रोकने के लिए) उपयोग करना चाहिए। अन्य समय के अपेक्षा शाम के समय में छिड़काव करने से अधिक प्रभावी होता है। बीटी फार्मूलेशन का 1.0 – 1.5 किलो ग्राम/ हे. के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।

इस फसल में प्राकृतिक शत्रु का अध्ययन मुख्यत: हेलिकोवर्पा पर केन्द्रित है। अंडा पारासिटाइड ट्राईकोग्रमा इस फसल पर अम्ल की उपस्थिति के कारण नहीं मिलते हैं।  कैम्पोलेटिस क्लोरिडी, यूसेलाटोनिया ब्रायेनी और कारसेलिया इलोटा के साथ जैव नियंत्रण में सीमित सफलता प्राप्त हुई है। खेतों में एनवीपी एवं बीटी हेलिकोवर्पा के नियंत्रण में कारगार पाए गये हैं।

रासायनिक कीट नियंत्रण-

वर्तमान में रासायनिक दवाओं का उपयोग नाशीजीव कीट एवं रोगों से ग्रसित पौधों को बचाने के लिए किया जा रहा है।

इससे न केवल नाशीजीव कीट एवं रोगों के प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है बल्कि इसका बुरा असर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हमारे देश से होने वाले चने के निर्यात पर पड़ता है आवश्यकता पड़ने पर ही रासायनिक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए और हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि एक ही रासायनिक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए और हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि एक ही रासायनिक दवा के बार- बार उपयोग के बजाय दवाओं के बदल – बदल कर विभिन्न तरह गुणों वाली दवाओं का प्रयोग करना चाहिए।

कीटनाशकों के कई समूह प्रमुख कीटों के खिलाफ कीटनाशकों का संयोजन प्रभावी पाए गये हैं। प्रतिरोधी उत्पन्नता, पुनरुत्थान और द्वितीयक प्रकोपों के कारण कीटनाशकों का संयोजन प्रभावी पाया गया है, विशेषकर नीम पर आधारित कीटनाशकों, जैविक कीटनाशकों जैसे बीटी और एनपीवी का सम्मिलित प्रभाव होता है।  इमामेकटीन  0.02 प्रतिशत के हिसाब पहली बार फूल खिलने के प्रारंभिक अवस्था में और दूसरी बार 15 दिनों के पश्चात् छिड़काव से फली छेदक का प्रकोप रूक जाता है। इसके अलावा साइप्रमेथ्रिन या क्लोरपाइरिफ़ास या फेनबेलरेट का भी प्रयोग कर सकते हैं।

चना में उकठा या उखेड़ा रोग-
यह चना की खेती का प्रमुख रोग है| उकठा रोग का प्रमुख कारक फ्यूजेरियम ऑक्सीस्पोरम प्रजाति साइसेरी नामक फफूद है| यह सामान्यतः मृदा तथा बीज जनित बीमारी है, जिसकी वजह से 10 से 12 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आती है| यह एक दैहिक व्याधि होने के कारण पौधे के जीवनकाल में कभी भी ग्रसित कर सकती है| वैसे तो यह व्याधि सभी क्षेत्रों में फैल सकती है, परन्तु जहाँ ठण्ड अधिक और लम्बे समय तक पडती है, वहाँ पर कम होती है| यह व्याधि पर्याप्त मृदा नमी होने पर और तापमान 25 से 30 डिग्री सेन्टिग्रेड होने पर तीव्र गति से फैलती है|

इस बीमारी के प्रमुख लक्षण –
इसके नियंत्रण के लिए ट्राइकोड्रर्मा पाउडर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोंपचार करें। साथ ही चार किलोग्राम ट्राइकोड्रर्माको 100 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद मे मिलाकर बुवाई से पहले प्रति हैक्टयर की दर से खेत मे मिलाएं। खड़ी फसल मे रोग के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेन्डाजिम 50 डब्लयू.पी.0.2 प्रतिशत घोल का पौधों के जड़ क्षेत्र मे छिड़काव करें।
  • रोग ग्रसित चना के पौधे के उपरी हिस्से की पत्तियाँ और डंठल झुक जाते हैं|
  • चना का पौधा सूखना शुरू कर देता है और मरने के लक्षण दिखाई देने लगते हैं|
  • सूखने के बाद पत्तियों का रंग भूरा या तने जैसा हो जाता है|
  • वयस्क और अंकुरित पौधे कम उम्र में ही मर जाते हैं एवं भूमि की सतह वाले क्षेत्र में आंतरिक ऊतक भूरे या रंगहीन हो जाते हैं|
  • यदि तने को लम्बवत् चीरा लगाएगें तो तम्बाकू के रंग की तरह धारी दिखाई पड़ती है| लेकिन, यह पतली और लम्बी धारी तने के ऊपर दिखाई नहीं देता 

उपाय–
  • चना की बुवाई उचित समय यानि अक्टूबर से नवम्बर के प्रथम सप्ताह तक करें|
  • गर्मियों मई से जून में गहरी जुताई करने से फ्यूजेरियम फफूंद का संवर्धन कम हो जाता है| मृदा का सौर उपचार करने से भी रोग में कमी आती है|
  • पाच टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट का प्रयोग करें|
  • बीज को मिट्टी में 8 से 10 सेंटीमीटर गहराई में गिराने से उखड़ा रोग का प्रभाव कम होता है
  • एक ग्राम कार्बेन्डाजिम (बाविस्टीन) या कार्बोक्सिन या 2 ग्राम थिराम और 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरीडि प्रति किलोग्राम चना बीज की दर से बीजोपचार करें| इसी प्रकार, 1.5 ग्राम बेन्लेट टी (30 प्रतिशत बेनोमिल तथा 30 प्रतिशत थिराम) प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार मिट्टी जनित रोगाणुओं को मारने में लाभप्रद है|
  • चना की उकठा रोग प्रतिरोधी किस्में उगाएं जैसे- डी सी पी- 92-3, हरियाणा चना- 1, पूसा- 372, पूसा चमत्कार (काबुली), जी एन जी 663, के डब्ल्यू आर- 108, जे जी- 315, जे जी- 16 (साकी 9516), जे जी- 74, जवाहर काबुली चना- 1 (जे जी के- 1, काबुली), विजय, फूले जी- 95311 (काबुली)|

चाँदनी रोग-
चना में एस्कोकाइटा पत्ती धब्बा रोग एस्कोकाइटा रेबि नामक फफूंद द्वारा फैलता है| उच्च आर्द्रता और कम तापमान की स्थिति में यह रोग फसल को क्षति पहुँचाता है| पौधे के निचले हिस्से पर गेरूई रंग के भूरे कत्थई रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और संक्रमित पौधा मुरझाकर सूख जाता है| पौधे के धब्बे वाले भाग पर फफूद के फलनकाय (पिकनीडिया) देखे जा सकते हैं| ग्रसित पौधे की पत्तियों, फूलों और फलियों पर हल्के भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं|

उपाय-
  • चाँदनी से प्रभावित या ग्रसित बीज को नहीं उगाएँ|
  • गर्मियों में गहरी जुताई करें और ग्रसित फसल अवशेष तथा अन्य घास को नष्ट कर दें|
  • कार्बेन्डाजिम 50 प्रतिशत और थिराम 50 प्रतिशत 1:2 के अनुपात में 3.0 ग्राम की दर से या ट्राइकोडर्मा 4.0 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज शोधन करें|
  • चना में केप्टान या मेंकोजेब या क्लोरोवेलोनिल 2 से 3 ग्राम प्रति लीटर पानी का 2 से 3 बार छिड़काव करने से रोग को रोका जा सकता है|

धूसर फफूंद-
यह रोग चना में वोट्राइटिस साइनेरिया नामक फफूद से होता है| अनुकूल वातावरण होने पर यह रोग आमतौर पर पौधों में फूल आने और फसल के पूर्णरूप से विकसित होने पर फैलता है| वायुमण्डल और खेत में अधिक आर्द्रता होने पर पौधों पर भूरे या काले भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं| फूल झड़ जाते हैं और संक्रमित पौधों पर फलियाँ नही बनती हैं| शाखाओं एवं तनों पर जहाँ फफूद के संक्रमण से भूरे या काले धब्बे पड़ जाते हैं, उस स्थान पर पौधा गल या सड़ जाता है

उपाय-
  • चना की बुवाई देर से करने पर रोग का प्रकोप कम होता है|
  • चना की रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का चयन करें|
  • इस रोग से प्रभावित क्षेत्रों में कतार से कतार की दूरी बढ़ाकर 45 सेंटीमीटर पर बुवाई करें, ताकि फसल को अधिक धूप और प्रकाश मिले तथा आर्द्रता में कमी आए|
  • बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही तुरन्त केप्टान या काबेंडाजिम या मेंकोजेब या क्लोरोथेलोनिल का 2 से 3 बार एक सप्ताह के अन्तराल पर छिड़काव करें ताकि प्रकोप से बचा जा सके|

हरदा रोग-
चना का यह रोग यूरोमाईसीज साइसरीज (एरोटीनी) नामक फफूद से होता है| पौधों में वानस्पतिक वृद्धि ज्यादा होने, मिट्टी में नमी बहुत बढ़ जाने और वायुमंडलीय तापमान बहुत गिर जाने पर इस रोग का आक्रमण होता है| पौधों के पत्तियों, तना, टहनियों और फलियों पर गोलाकार प्यालिनुमा सफेद भरे रंग का फफोले बनते हैं| बाद में तना पर के फफोले काले हो जाते हैं एवं पौधे सूख जाते हैं|

उपाय-
  • चना की रोगरोधी किस्मों का चुनाव करना चाहिए|
  • चना बीज का फफूदनाशी से बीजोपचार करना चाहिए|
  • फफूद के उपयुक्त वातावरण बनते ही मेनकोजेब 75 प्रतिशत घुलन चूर्ण 2 किलोग्राम का सज्ञात्मक छिड़काव करना चाहिए|

पाला रोग-
वातावरण का तापमान बहुत कम हो जाने और रात में पछुआ हवा चलने पर पाला गिरने की संभावना बढ़ जाती है। तापमान बढ़ने पर कम प्रभावित चना के पौधे स्वस्थ रह जाते हैं, लेकिन अधिकतर मर जाते हैं|

उपाय –
जिस खेत में सूत्रकृमि की संख्या ज्यादा हो उसमें कार्बोफ्यूरान 3 जी 25 से 30 किलोग्राम या फोरेट 10 जी 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला देना लाभप्रद होगा|
चना का कार्बोसल्फान की उचित मात्रा से बीज उपचार करना लाभप्रद होगा|

मोजेक और बौना रोग-
मोजेक रोग में ऊपर की फुनगियाँ मुड़कर सूख जाती हैं एवं फलन कम होती हैं, जबकि बौना विषाणु रोग में पौधे छोटे, पीले, नारंगी या भूरा दिखाई पड़ते हैं| यह रोग लाही द्वारा स्वस्थ्य पौधे तक पहुँचाया जाता है| इसके अलावे मिट्टी में लोहे की कमी और लवण की अधिकता भी पौधे में रोग के लक्षण के रूप में प्रकट होते हैं, जो समान रूप से नजर नहीं आते हैं|

उपाय-
विषाणु रोग के फैलाव को रोकने के लिए लाही कीट का नियंत्रण हेतु एलो-स्टीकी-ट्रैप (पीला फंदा) एक हेक्टर में 20 फंदा लगावें|
यदि इस कीट का पौधों पर एक समूह बन गया हो तो किसी अन्र्तव्यापि कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए|
लोहे के कमी वाले क्षेत्र में 10 से 12 किलोग्राम फेरम सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला देना चाहिए|

चने के खेत पर पादप जीवाणु रोगों की जैव रोगनाशी से रोकथाम कैसे करें ? 
चने के खेत पर पादप जीवाणु रोगों की जैव रोगनाशी से रोकथाम कैसे करें ? – यह जीवाणु चने की फसल में उपयोगी पाया गया है। यह जीवाणु पौधों में लगने वाले तीन रोगकारक कवाकों फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम प्रजाति साइसेरी, राइजोक्टोनिया वटारीकोला व पाइथियम को रोकने में सक्षम हैं।
चने के खेत पर पादप जीवाणु रोगों की जैव रोगनाशी से रोकथाम –

जैव रोगनाशी  के प्रयोग करने की विधि –
बीज उपचार –
500 ग्राम सूखी गोबर की खाद केा 2.5 लीटर पानी में डालकर गाढ़ा घोल (स्लरी) बनाने के बाद 500 ग्राम स्यूडोमोनास को डाल कर इस गाढ़े घोल में पौधों की जड़ को डुबो कर उपचारित करने के उपरान्त लगाना चाहिए। इस प्रकार के उपचारकण अधिकांशतः सब्जियों वाली फसलों यथा फूलगोभी, टमाटर बैंगर, मिर्चा व प्याज मे तथा धान की पौधों की जड़ों पर करना चाहिए।

पौधों की जड़ का उपचार –
सवा एक लीटर पानी में 115 ग्राम गुड़ अथवा 55 ग्राम चीनी को गरम करके चिपचिपा घोल तैयार करने के उपरान्त उसमें 500 ग्राम स्यूडोमोनास का संवर्धन डाल कर गाढ़ा घोल तैयार कर लेना चाहिए, यह गाढ़ा घोल 10 किग्रा० बीज को उपचारित करने के लिए पर्याप्त होता है। बीज में घोल अच्छी तरह से मिलाने के बाद छाया में सुखाकर ही बुवाई करना चाहिए।

मृदा उपचार –
स्यूडोमोनास के संवर्धन की 800 ग्राम मात्रा विभिन्न फसलों के अनुसार 10-20 किग्रा० महीन पिसी हुई मृदा या बालू में मिलाकर प्रति हैक्टेयर की दर से खेतों में फसलों की बुवाई के पूर्व उर्वरकों की तरह छिड़काव करना लाभप्रद होता है।

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तम्बाकू की सूंडी का जैविक कीटनाशक से कैसे करे रोकथाम

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न्यूक्लियर पॉलीहेड्रासिस वायरस (एन.पी.वी.) पर आधारित हरी सूंडी़ (हेलिकोवर्पा आर्मीजे़रा) अथवा तम्बाकू सूंड़ी (स्पोडाप्टेरा लिटूरा) काजैविक कीटनाशक है जो तरल रूप में उपलब्ध है। इसमें वायरस कण होते हैं जिनसेसूंडी द्वारा खाने या सम्पर्क में आने पर सूंडियों का शरीर 2 से 4 दिन केभीतर गाढ़ा भूरा फूला हुआ व सड़ा हो जाता हे, सफेद तरल पदार्थ निकलता है व मृत्यु हो जाती है। रोग ग्रसित तथा मरी हुई सूंडियां पत्तियों एवं टहनियोंपर लटकी हुई पाई जाती हैं।

एन.पी.वी. कपास, फूलगोभी, टमाटर, मिर्च, भिण्डी, मटर, मूंगफली, सूर्यमुखी, अरहर, चना, मोटा अनाज, तम्बाकू एवं फूलों को नुकसान से बचाताहै। प्रयोग करने से पूर्व 1 मिली एन.पी.वी. को 1 लीटर पानी में घोल बनायेतथा ऐसे घोल को 250 से 500 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से 12 से 15 दिनों केअंतराल पर 2 से 3 छिड़काव फसलों के लिए उपयोगी हैं। छिड़काव सांयकाल को कियाजाय तथा ध्यान रहे कि लार्वा की प्रारम्भिक शैशवावस्था में अथवा अंडा देनेकी स्थिति में प्रथम छिड़काव किया जाय। एन.पी.वी. की सेल्फ लाइफ 01 माह है।


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जैविक एजेंट एवं जैविक कीटनाशकों के प्रयोग द्वारा कृषि रक्षा प्रबन्धन

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प्रदेश में फसलों को कीटों, रोगों एवं खरपतवारों आदि से प्रतिवर्ष 7 से 25 प्रतिशत तक क्षति होती है, जिसमें 33 प्रतिशत खरपतवारों द्वारा, 26 प्रतिशत रोगों द्वारा, 20 प्रतिशत कीटों द्वारा, 7 प्रतिशत भण्डारण, 6 प्रतिशत चूहों द्वारा तथा 8 प्रतिशत अन्य कारण सम्मिलित हैं। यह क्षति दलहन में 7 प्रतिशत, ज्वार में 10 प्रतिशत गेहूँ में 11.4 प्रतिशत, गन्ना में 15 प्रतिशत, धान में 18.6 प्रतिशत, कपास में 22 प्रतिशत तथा तिलहन में 25 प्रतिशत तक होती है। फसलों, फलों एवं सब्जियों पर इनके प्रकोप को कम करने के उद्देश्य से कृषकों द्वारा कृषि रक्षा रसायनों का प्रयोग किया जा रहा है।

प्रदेश में कीटनाशकों की औसत खपत 279.60 ग्राम प्रति हेक्टर हैं, जो देश के औसत खपत 288 ग्राम प्रति हेक्टर से कम है। इस औसत खपत में 58.7 प्रतिशत कीटनाशक, 22.0 प्रति तृणनाशक, 16.0 प्रतिशत रोगनाशक तथा 3.3 प्रतिशत चूहा विनाशक/धूम्रक सम्मिलित है। इन रसायनों का प्रयोग करने से जहाँ कीटों, रोगों एवं खरपतवारों में सहनशक्ति पैदा होती है और कीटों के प्राकृतिक शत्रु (मित्र कीट) प्रभावित होते हैं, वहीं कीटनाशकों का अवशेष खाद्य पदार्थों, मिट्टी, पानी, एवं वायु को प्रदूषित करने लगते हैं। कीटनाशक रसायनों के हानिकारक प्रभावों से बचने के लिए जैविक कीटनाशकों का प्रयोग करना नितान्त आवश्यक है।

जैविक एजेन्ट एवं जैविक कीटनाशक

जैविक एजेन्ट तथा जैविक पेस्टीसाइड जीवों यथा कीटों, फफूदों, जीवाणुओं एवं वनस्पतियों पर आधारित उत्पाद हैं, जो फसलों, सब्जियों एवं फलों को कीटों एवं व्याधियों से सुरक्षित कर उत्पादन बढ़ाने में सहयोग करते हैं। ये जैविक एजेण्ट/जैविक कीटनाशक 20-30 दिनों के अंदर भूमि एवं जल से मिलकर जैविक क्रिया का अंग बन जाते है तथा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण को कोई भी हानि नहीं पहुंचाते हैं।

नीम एक प्राकृतिक पेस्टीसाइड है, जिसमें एजाडिरेक्टिन एवं सैलानिन तत्व पाये जाते हैं जो फसलों को कीड़ो द्वारा खाने से बचाता है तथा फसलों को सुरक्षा को प्रदान करता है। इसका तेल, खली एवं पत्तियों, पौध संरक्षण एवं कीट नियंत्रण में प्रयोग की जाती है।

जैविक कीटनाशकों से लाभ

जीवों एवं वनस्पतियों पर आधारित उत्पाद होने के कारण, जैविक कीटनाशक लगभग एक माह में भूमि में मिलकर अपघटित हो जाते है तथा इनका कोई अंश अवशेष नहीं रहता। यही कारण है कि इन्हें पारिस्थितकीय मित्र के रूप में जाना जाता है।
  • जैविक कीटनाशक केवल लक्षित कीटों एवं बीमारियों को मारते है, जब कि रासायनिक कीटनाशकों से मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं।
  • जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों/व्याधियों में सहनशीलता एवं प्रतिरोध नहीं उत्पन्न होता जबकि अनेक रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों में प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न होती जा रही है, जिनके कारण उनका प्रयोग अनुपयोगी होता जा रहा है।
  • जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से कीटों के जैविक स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता जब कि रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग से ऐसे लक्षण परिलक्षित हुए हैं। सफेद मक्खी अब अनेक फसलो तथा चने का फली छेदक अब कई अन्य फसलों को भी नुकसान पहुंचाने लगा है।
  • जैविक कीटनाशकों के प्रयोग के तुरन्त बाद फलियों, फलों, सब्जियों की कटाई कर प्रयोग में लाया जा सकता है, जबकि रासायनिक कीटनाशकों के अवशिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए कुछ दिनों की प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
  • जैविक कीटनाशकों के सुरक्षित, हानिरहित तथा पारिस्थितकीय मित्र होने के कारण विश्व में इनके प्रयोग से उत्पादित चाय, कपास, फल, सब्जियों, तम्बाकू तथा खाद्यान्नों, दलहन एवं तिलहन की मांग एवं मूल्यों में वृद्धि हो रही है, जिसका परिणाम यह है कि कृषकों को उनके उत्पादों का अधिक मूल्य मिल रहा है। ट्राइकोडर्मा, जैविक कीटनाशकों के विषहीन एवं हानिरहित होने के कारण ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में इनके प्रयोग से आत्महत्या की सम्भावना शून्य हो गयी है, जबकि कीटनाशी रसायनों से अनेक आत्म हत्याएं हो रही है। जैविक कीटनाशक पर्यावरण, मनुष्य एवं पशुओं के लिए सुरक्षित तथा हानिरहित हैं। इनके प्रयोग से जैविक खेती को बढ़ावा मिलता है जो पर्यावरण एवं परिस्थितकीय का संतुलन बनाये रखने में सहायक हैं।

1. ट्राइकोग्रामा (ट्राईकोकार्ड)

यह ट्राइकोग्रामा जाति की छोटी ततैया जो अंड परजीवी है, जोकि लैपीडोप्टेरा परिवार के लगभग 200 प्रकार के नुकसानदेह कीड़ों के अंडों को खाकर जीवित रहता है। इस ततैया की लम्बाई 0.4 से 0.7 मिमी. होती है तथा इसका जीवनचक्र निम्न प्रकार है-

अंडा देने की अवधि
16-24 घण्टे
लार्वा अवधि
2-3 दिन
प्यूपा पूर्व अवधि
दिन
प्यूपा अवधि
2-3 दिन
कुल अवधि
8-10 दिन (गर्मी)
9-12 दिन (जाड़ा)
  • मादा ट्राइकोग्रामा अपने अंडे हानि पहुंचाने वाले कीड़ों के अंडों के बीच देती है तथा वहीं पर इनकी वृद्धि होती है एवं ट्राइकोग्रामा का जीवन चक्र पूरा होता है। ततैया अंडो. में छेंदकर बाहर निकलता है। ट्राइकोग्रामा की पूर्ति कार्ड के रूप में होती है, जिसमें एक कार्ड पर लगभग 20000 अंडे होते हैं। धान, मक्का, गन्ना, सूरजमुखी, कपास, दलहन, फलों एवं सब्जियों के नुकसानदायक तनाछेदक, फलवेधक, पत्ती लपेटक प्रकार के कीड़ो का जैविक विधि से नाश करने हेतु ट्राइकोग्रामा का प्रयोग किया जाता है। इससे 80 से 90 प्रतिशत क्षति को रोका जा सकता है।
  • ट्राइकोकार्ड को विभिन्न फसलों में 10 से 15 दिन के अंतराल पर 3 से 4 बार लगाया जाता है। खेतों में जैसे ही हानिकारक कीड़ों के अंडे दिखाई दें, तुरन्त ही कार्ड को छोट-छोटे समान टुकड़ों में कैंची से काट कर खेत के विभिन्न भागों में पत्तियों की निचली सतह पर या तने पत्तियों के जोड़ पर धागे से बांध दे। सामान्य फसलों में 5 किन्तु बड़ी फसलों जैसे गन्ना में 10 कार्ड प्रति हेक्टेयर का प्रयोग किया जाय। इसे सांयकाल खेत में लगाया जाय किन्तु इसके उपयोग के पहले उपयोग के पहले, उपयोग के दौरान व उपयोग के बाद खेत में रासायनिक कीटनाशक का छि़कावा न किया जाय।
  • ट्राइकोकार्ड को खेत में प्रयोग करने से पूर्व तक 5 से 10 डिग्री से तापक्रम पर बर्फ के डिब्बे या रेफ्रिजरेटर में रखना चाहिए।

2. ट्राइकोडरमा
ट्राइकोडरमा एक घुलनशील जैविक फफूँदीनाशक है जो ट्राइकोडरमा विरिडी या ट्राइकोडरमा हरजिएनम पर आधारित है। ट्राइकोडरमा फसलों में जड़ तथा तना गलन/सड़न, उकठा (फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम, स्क्लेरोशिया डायलेक्टेमिया) जो फफूंद जनित है, के नियंत्रण हेतु लाभप्रद पाया गया है। धान, गेहूं, दलहनी फसलें, गन्ना, कपास, सब्जियों, फलों एवं फल वृक्षों पर रोगों से यह प्रभावकारी रोकथाम करता है।

ट्राइकोडरमा के कवक तन्तु फसल के नुकसानदायक फफूँदी के कवक तन्तुओं को लपेट कर या सीधे अन्दर घुसकर उनका जीवन रस चूस लेते है और नुकसानदायक फफूंदों का नाश करते हैं। इसके अतिरिक्त भोजन स्पर्धा के द्वारा कुछ ऐसे विषाक्त पदार्थ का स्राव करते हैं जो बीजों के चारो और सुरक्षा दीवार बनाकर हानिकारक फफूंदों से सुरक्षा देते हैं। ट्राइकोडरमा से बीजों में अंकुरण अच्छा होकर फसलें फफूंद जनित रोगों से मुक्त रहती हैं एवं उनकी नर्सरी से ही वृद्धि अच्छी होती है।

ट्राइकोडरमा का प्रयोग निम्न रूप से किया जाना उपयोगी है:-
  • कन्द/कॉर्म/राइजोम/नर्सरी पौध का उपचार 5 ग्राम ट्राइकोडरमा को एक लीटर पानी में घोल बनाकर डुबोकर करना चाहिए तत्पश्चात् बुवाई/रोपाई की जाय।
  • बीज शोधन हेतु 4 ग्राम ट्राइकोडरमा प्रति किलोग्राम बीज में सूखा मिला कर बुवाई की जाय।
  • भूमि शोधन हेतु एक किलोगा्रम ट्राइकोडरमा केा 25 किलोग्राम गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छींटा देकर एक सप्ताह तक छाया में सुखाने के उपरान्त बुवाई के पूर्व प्रति एकड़ प्रयोग किया जाय।
  • बहुवर्षीय पेड़ों के जड़ के चारो ओर गड्ढा खोदकर 100 ग्राम ट्राइकोडरमा पाउडर केा मिट्टी में सीधे या गोबर/कम्पोस्ट की खाद के साथ मिला कर दिया जाय।
  • खड़ी फसल में फफूंदजनित रोग के नियंत्रण हेतु 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर सायंकाल छिडकाव करें। जिससे आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर दोहराया जा सकता है।
  • यह एक जैविक उत्पाद है  लेकिन खुले घावों, श्वसन तंत्र एवं आंखों के लिए नुकसानदायक है। अतः इसके प्रयोग समय सावधानियां बरतनी चाहिए। इसके प्रयोग से पहले या बाद में किसी रासायनिक फफूँदनाशक का प्रयोग न किया जाय। ट्राइकोडरमा की सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

3. एन.पी.वी (न्यूक्लियर पॉलीहेड्रासिस वायरस) –
न्यूक्लियर पॉलीहेड्रासिस वायरस (एन.पी.वी.) पर आधारित हरी सूंडी़ (हेलिकोवर्पा आर्मीजे़रा) अथवा तम्बाकू सूंड़ी (स्पोडाप्टेरा लिटूरा) का जैविक कीटनाशक है जो तरल रूप में उपलब्ध है। इसमें वायरस कण होते हैं जिनसे सूंडी द्वारा खाने या सम्पर्क में आने पर सूंडियों का शरीर 2 से 4 दिन के भीतर गाढ़ा भूरा फूला हुआ व सड़ा हो जाता हे, सफेद तरल पदार्थ निकलता है व मृत्यु हो जाती है। रोग ग्रसित तथा मरी हुई सूंडियां पत्तियों एवं टहनियों पर लटकी हुई पाई जाती हैं।

एन.पी.वी. कपास, फूलगोभी, टमाटर, मिर्च, भिण्डी, मटर, मूंगफली, सूर्यमुखी, अरहर, चना, मोटा अनाज, तम्बाकू एवं फूलों को नुकसान से बचाता है। प्रयोग करने से पूर्व 1 मिली एन.पी.वी. को 1 लीटर पानी में घोल बनाये तथा ऐसे घोल को 250 से 500 मिली प्रति हेक्टेयर की दर से 12 से 15 दिनों के अंतराल पर 2 से 3 छिड़काव फसलों के लिए उपयोगी हैं। छिड़काव सांयकाल को किया जाय तथा ध्यान रहे कि लार्वा की प्रारम्भिक शैशवावस्था में अथवा अंडा देने की स्थिति में प्रथम छिड़काव किया जाय। एन.पी.वी. की सेल्फ लाइफ 01 माह है।

4. ब्यूवेरिया बैसियाना-
यह एक फफूंदी जनित उत्पाद है, जो विभिन्न प्रकार के फुदकों को नियंत्रित करता है। यह लेपीडोप्टेरा कुल के कैटरपिलर, जिसमें फली छेदक (हेलियोथिस), स्पोडाप्टेरा, छेदक तथा बाल वाले कैटरपिलर सम्मिलित हैं, पर प्रभावी है तथा छिड़काव होने पर उनमें बीमारी पैदा कर देता है जिससे कीड़े पंगु हो जाते है और निष्क्रिय होकर मर जाते हैं। यह विभिन्न प्रकार के फसलों फलों एवं सब्जियों में लगने वाले फली बेधक पत्ती लपेटक, पत्ती खाने वाले कीट, भूमि में दीमक एवं सफेद गीडार आदि की रोकथाम के लिए लाभकारी है।

प्रयोग विधि
  • भूमि शोधन हेतु ब्यूवेरिया बैसियान की 2.5 किग्रा० प्रति हे० लगभग 25 किग्रा० गोबर की खाद् में मिलाकर अन्तिम जोताई के समय प्रयोग करना चाहिये।
  • खाई फसल में कीट नियंत्रण हेतु 2.5 किग्रा० प्रति हे० की दर से 400-500 लीटर पानी में घोलकर सायंकाल छिड़काव करें। जिस आवश्यकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर दोहराया जा सकता है। इसकी सेल्फ लाईफ 1 वर्ष है।

5. स्यूडोमोनास फ्लोरेसेन्स
यह जीवाणु चने की फसल में उपयोगी पाया गया है। यह जीवाणु पौधों में लगने वाले तीन रोगकारक कवाकों फ्यूजेरियम आक्सीस्पोरम प्रजाति साइसेरी, राइजोक्टोनिया वटारीकोला व पाइथियम को रोकने में सक्षम हैं।

प्रयोग करने की विधि
बीज उपचार
500 ग्राम सूखी गोबर की खाद केा 2.5 लीटर पानी में डालकर गाढ़ा घोल (स्लरी) बनाने के बाद 500 ग्राम स्यूडोमोनास को डाल कर इस गाढ़े घोल में पौधों की जड़ को डुबो कर उपचारित करने के उपरान्त लगाना चाहिए। इस प्रकार के उपचारकण अधिकांशतः सब्जियों वाली फसलों यथा फूलगोभी, टमाटर बैंगर, मिर्चा व प्याज मे तथा धान की पौधों की जड़ों पर करना चाहिए।

पौधों की जड़ का उपचार
सवा एक लीटर पानी में 115 ग्राम गुड़ अथवा 55 ग्राम चीनी को गरम करके चिपचिपा घोल तैयार करने के उपरान्त उसमें 500 ग्राम स्यूडोमोनास का संवर्धन डाल कर गाढ़ा घोल तैयार कर लेना चाहिए, यह गाढ़ा घोल 10 किग्रा० बीज को उपचारित करने के लिए पर्याप्त होता है। बीज में घोल अच्छी तरह से मिलाने के बाद छाया में सुखाकर ही बुवाई करना चाहिए।

मृदा उपचार
स्यूडोमोनास के संवर्धन की 800 ग्राम मात्रा विभिन्न फसलों के अनुसार 10-20 किग्रा० महीन पिसी हुई मृदा या बालू में मिलाकर प्रति हैक्टेयर की दर से खेतों में फसलों की बुवाई के पूर्व उर्वरकों की तरह छिड़काव करना लाभप्रद होता है।

6. क्राइसोपर्ला
क्राइसोपर्ला नामक हरे कीट जिनकी लम्बाई 1 से 1.3 सेमी० ०, पंख लम्बे हल्के रंग के पारदर्शी, सुनहरी आंखे तथा 5 एन्टिना धारक होते है, के लार्वा सफेद मक्खी, माहूँ जैसिड थ्रिप्स आदि के अंडो तथा लार्वा को खा जाते है, को प्रभावित खेतों में डाला जाता है, इनका जीवन चक्र निम्न प्रकार है:-
अंडा अवधि
3-4 दिन
लार्वा अवधि
11-13 दिन
प्यूपा अवधि
5-7 दिन
व्यस्कता
35 दिन
अंड क्षमता
300-400 अंडे
  • क्राइसोपर्ला के अंडों को कोरसियरा के अंडों के साथ लकड़ी के बुरादे में बाक्स में आपूर्ति किया जाता है। इनके लार्वा कोरसियरा के अंडो को खाकर वयस्क बनते है। विभिन्न फसलों में क्राइसोपर्ला के 50000 से 100000 लार्वा या 500 से 1000 वयस्क प्रति हेक्टर डालने से कीटो का नियंत्रण भली प्रकार से होता है। सामान्यतः दो बार इन्हें छोड़ना चाहिए।
  • क्राइसोपर्ला के अंडों को 10 से 15 डिग्री से पर रेफ्रीजेरेटर में 15 दिनों तक रखा जा सकता है। सामान्य तापमान पर इनका जीवन चक्र प्रारम्भ हो जाता है।

7. एजाडिरेक्टिन (नीम का तेल)
यह नीम के बीच एवं गूदा के तत्वो पर आधारित तरल वानस्पतिक कीटनाशक है। इसकी गंध एवं स्वाद कीड़ों को भगाती है, खाने की अनिच्छा उत्पन्न करती है एवं जीवन चक्र को धीमा एवं प्रजननशीलता को कमजोर बनाकर अंडे तथा बच्चों की संख्या में कमी लाती है।

नीम का तेल कपास, चना, धान, अरहर, तिलहन तथा टमाटर में नुकसान पहुंचाने वाले गोलवर्म, तेलाचेंपा (माहूँ), सफेद मक्खियां भृंग, फुदका, कटुआ सूंडी तथा फल बेधक सूंडी पर प्रभावशाली है। खड़ी फसल में कीट नियंत्रण हेतु एजाडिरेक्टिन (नीम का तेल) 0.15 प्रतिशत ई.सी. की 2.5 ली० मात्रा प्रति हे० की दर से 15 दिन के अन्तराल पर सायंकाल छिडकाव करना चाहिये। इसकी सेल्फ लाइफ एक वर्ष है।

8. बी. टी. (बेसिलस थ्यूनिरजिएन्सिस)
5 प्रतिशत डब्लू.पी. बी.टी. एक बैक्टिरिया आधारित जैविक कीटनाशक है जो सूंडियों पर तत्काल प्रभाव डालता है। इससे सूंड़ियों पर लकवा, आंतों का फटना, भूखापन तथा संक्रमण होता है तथा वे दो से तीन दिन में मर जाती है। यह पाउडर एवं तरल दोनों रूपों में उपलब्ध है। इसका प्रयोग मटर, चना, कपास, अरहर, मूंगफली, सुरजमुखी, धान फूलगोभी, पत्ता गोभी, टमाटर, बैंगन, मिर्च तथा भिण्डी में उपयोगी एवं प्रभावशाली है।

बी.टी. का प्रयोग छिड़काव द्वारा किया जाता है। प्रति हेक्टर 0.5 से 1.0 किग्रा० मात्रा को 500 से 700 लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल पर दो से तीन बार छिड़काव लाभकारी है। इसकी सेल्फ लाइफ 1 वर्ष है।

9. फेरोमोन ट्रेप (गंध पाश)
फेरोमोन ट्रेप फसलों को नुकसान करने वाली सूंडियों के नर पतंगों के फंसाने के लिए चमकीले प्लास्टिक का बना होता है। इसमें कीप के आकार के मुख्य भाग पर लगे ढक्कन के मध्य में मादा कीट की गंध (ल्योर) लगाया जाता है, जो नर पतंगों को आकर्षित करता है। कीप के निचले भाग पर पालीथीन की थैली लगायी जाती है, जिसमें पतंगे जाते है। थैली के निचले मुख पर से रबर बैंड हटाकर फंसे पतंगे निकाल कर मार दिये जाते है।
फेरोमोन ट्रेप को खेत में पतंगों की उपस्थिति पता करने के लिए 5-6 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से तथा अधिक संख्या में पकड़ने के लिए 15 से 20 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाया जाता है। इसे खेत में कीप पर लगे हत्थे द्वारा डंडे पर फसल की ऊंचाई से 1-2 फुट ऊपर लगाया जाता है।

ल्यूर (गंध रबर) में गंधक रहित रबर पर मादा पतंगों की विशेष गंध (फेरोमोन) भरी होती है। विभिन्न प्रकार के पतंगों के लिए अलग-अलग ल्यूर उपयोग किये जाते है। ल्यूर थैली में बंद मिलता है। जिसे खोल कर ट्रैप के ढक्कन में बने स्थान पर लगाया जाता है। कपास, चना, अरहर, टमाटर, गोभी, बन्दगोभी, मूंग, उर्द, भिण्डी तथा धान के लिए विभिन्न प्रकार के ल्यूर का प्रयोग करते हुए फेरोमोन ट्रैप लगाये जाते है। ल्यूर 3-4 सप्ताह तक कार्य करता है।

10. जैविक एजेन्ट/कीटनाशक की उपलब्धता
प्रदेश में जैविक एजेन्ट-ट्राइकोकार्ड, ट्राइकोडरमा तथा एन.पी.वी. का उत्पादन कृषि विभाग की नौ आई.पी.एम. प्रयोगशालाओं हरदोई, आजमगढ़, वाराणसी, उरई (जालौन), बरेली, मथुरा, मुरादाबाद, सैनी (कोशाम्बी) एवं कैराना (मुजफ्फजरनगर) कृषि विश्वविद्यालयों की तीन प्रयोगशालाओं कानपुर, मोदीपुरम (मेरठ) एवं फैजाबाद तथा भारत सरकार की दो प्रयोगशालाओं लखनऊ एवं गोरखपुर में किया जा रहा है। क्राइसोपर्ला का उत्पादन कृषि विश्वविद्यालय, मेरठ की प्रयोगशाला में हो रहा है। इसी प्रकार जैविक एजेन्ट एवं जैविक कीटनाशकों का उत्पादन/विक्रय प्रदेश में अनेक फर्मो द्वारा भी किया जा रहा है। इनकी उपलब्धता में कठिनाई नहीं है।

इस प्रकार जैविक एजेन्ट एवं जैविक कीटनाशकों के प्रयोग से शुद्ध एवं मितव्ययी तथा अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है तथा स्वस्थ पर्यावरण में कृषि का सतत् विकास सुनिश्चित हो सकता है।
भूमिशोधन
क्र०सं०
कीट का नाम
प्रभावितफसल
रोकथाम
मात्रा/हे०
भूमिगत कीट
1
दीमक
समस्त फसल
ब्यूवेरिया बैसियाना अथवा दानेदार कीटनाशी अथवा क्लोरोपायरीफास 20 % ई०सी०
2.5 किग्रा०  10-20 किग्रा० 2.5 लीटर
2
सफेद गिडार
समस्त फसल
ब्यूवेरिया बैसयाना अथवा मेटाराइजियम अथवा क्लोरोपायरीफास 20% ई०सी० अथवा दानेदार कीटनाशी
 2.5 किग्रा० 2.5 किग्रा०/ 500 मिली०     2.5 लीटर 10-20 किग्रा०
3
सूत्रकृमि
समस्त फसल
तदैव
तदैव
4
जड़ की सूड़ी
धान
तदैव
तदैव
5
कटवर्म
सब्‍जियॉ
तदैव
तदैव
6
कद्दू का लालकीट
कद्दू वर्गीय सब्‍जियॉ
क्लोरोपायरीफास 20% ई०सी० अथवा ब्यूवेरिया बैसियाना अथवा मेटाराइजियम
2.5 लीटर 2.5 लीटर 2.5 किग्रा०/500 मिली०
7
अर्ली सूट बोरर
गन्ना
दानेदार कीटनाशी अथवा क्लोरापायरीफास 20 % ई०सी० अथवा मेटाराइजियम
10-20 किग्रा० 2.5 किग्रा०  2.5 किग्रा०/500 मिली०
8
लेपीडोप्टेरस कीट
खरीफ की
दानेदार कीटनाशी समस्त फसल ब्यूवेरिया बैसियाना अथवा मेटाराइजियम
10-20 किग्रा० 2.5 किग्रा० अथवा 2.5 किग्रा०/500 मिली०
9
मिलीबग
भिण्डी‚ कपास ब्यूवेरिया बैसियाना आम‚ कटहल अथवा मेटाराइजियम अथवा क्लोरोपायरीफास 1.5 %डी०पी०
 2.5 किग्रा० अथवा 2.5 किग्रा०/500 मिली० 20-25 किग्रा०/150-200 ग्राम/पेड़
भूमिजनितरोग
1
खैरा
धान
जिंक सल्फेट
20-25 किग्रा०
2
जीवाणु झुलसा/पत्तीधारी रोग
धान
स्यूडामोनास
2.5 किग्रा०/250 मिली०
3
फाल्स स्मट/शीथ ब्लाइट
धान
ट्राईकोडरमा अथवा स्यूडोमोनास
2.5 किग्रा० 2.5 किग्रा०/250 मिली०
4
उकठा
दलहनी फसलें‚ तिल गन्ना‚ सब्‍जियॉ औद्यानिक व वन वृक्ष
तदैव
तदैव
5
रूटरॉट स्टम्पकॉलर रॉट
दलहनी फसलें‚ मूँगफली एवं सब्‍जियॉ
तदैव
तदैव
6
बैक्टीरियल विल्ट
दलहनी‚ तिलहनी
स्यूडामोनास औद्यानिक फसलें एवं सब्‍जियों
2.5 किग्रा०/250 मिली०
7
डैम्‍पिंग ऑफ डाउनी मिल्ड्यू
सब्‍जियॉ
ट्राईकोडरमा अथवा स्यूडोमोडरमा
2.5 किग्रा० 2.5 किग्रा०/250 मिली०
8
डाउनी मिल्ड्यू
ज्वार‚                    बाजरा        मक्का
ट्राइकोडरमा अथवा स्यूडोमोनास
2.5 किग्रा०/250 मिली०
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