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अक्ल और भैंस (व्यंग्य लेख) फणीश्वरनाथ रेणु

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जब अखबारों में 'हरी क्रान्ति’ की सफलता और चमत्कार की कहानियाँ बार-बार विस्तारपूर्वक प्रकाशित होने लगीं, तो एक दिन श्री अगमलाल 'अगम’ ने भी शहर का मोह त्यागकर, खेती करने का फैसला कर लिया। गाँव में, उनके चार-पाँच बीघे जमीन थी जिन्हें बटाईदारी पर उठाकर, अगमलाल जी 'अगम’ आज से सात साल पहले ही गाँव छोड़कर जिला के सदर शहर में आ बसे थे। चूँकि उनके नाम के साथ उनका 'उपनाम’ भी लगा हुआ था, इसलिए शहर के लोगों को यह जानने में देरी नहीं लगी कि 'अगमजी’ एक साहित्यिक प्राणी हैं। एक मित्र से किसी वकील की मुहर्रिरी करने की पैरवी करवाई तो वकील साहब ने उनके उपनामयुक्त नाम पर ही एतराज किया-''एक ही साथ दो नाम रहना गैरकानूनी है। और जिसका नाम ही गैरकानूनी हो वह कानूनी कारबार कैसे कर सकता है ?’’

….एक सेठजी के घर बच्चों को पढ़ाने का टप्पस लगाया तो सेठजी भी उनके नाम और उपनाम से भड़के। पूछा क्यों जी ? गाणा-वाणा तो नहीं बजाते हो ?…नहीं जी, हमें ऐसा मास्टर नहीं चाहिए। चारों-ओर से हारकर आखिर एक दिन 'अगम’ जी अपने नाम की कुर्बानी करने को तैयार हो गए। अपने नाम के अतिरिक्त अंश को कतरकर अलग करना चाहते थे कि नौकरी दिलाने वाले देवता अचानक प्रसन्न हो गए, मानो। एक पुराने प्रेस में प्रूफ देखने की नौकरी मिल गई और तब से अगमलालजी 'अगम’ अपने अखण्ड नाम के साथ ही प्रूफ देखते हुए साहित्य सेवा में संलग्न थे। किन्तु इस हरी क्रान्ति की हवा ने अगम जी के हृदय को ऐसा हरा बना दिया कि उन्हें चारों ओर हरी-हरी ही सूझने लगी। और अन्ततः एक दिन शहर छोड़कर बोरिया बिस्तर समेत गाँव वापस आ गए।गाँव के लोगों ने जब अगम जी के ग्राम प्रत्यागमन का समाचार कारण सहित सुना, तो उन्हें खुशी नहीं, अचरज हुआ। कई निकट के सम्बन्धियों और शुभचिन्तकों ने उन्हें नेक-से-नेक सलाह देकर शहर वापस भेजना चाहा। किन्तु 'अगम’ जी की आँखों के आगे सदैव उन्नत किस्म के गेहूँ की बालियाँ झूमती रहतीं, 'शंकर मकई’ के भूरे-भूरे बाल लहराते रहते। और जब आँखों में नींद आती, तो अपने साथ नए किस्म के उन्नत सपने ले आती-आलू की ढेरी, ऊख के अम्बार और हरे चने और मटर की मखमली खेती वाले सपने ! सो 'अगम’ पर किसी की सलाह का कोई असर नहीं हुआ और वे उत्साहपूर्वक अपने जीवन की 'प्रूफ रीडिंग’ यानी भूलों को सुधारने में लगे गए।खेती करने के लिए सबसे पहले हल, बैल और हलवाहे की आवश्यकता होती है। हल और बैल तो खरीद लिए गए। किन्तु हलवाहा की समस्या जटिल प्रतीत हुई। अव्वल तो आजकल गाँव का सबसे निकम्मा आदमी ही हलवाही करता है। निकम्मा अर्थात् जिसे 'घर-घरहट’, 'छौनी-छप्पर’ और 'कोड़-मकान’ का कोई 'लूर’ नहीं, जो गाड़ी बैल भी हाँक सकता-ऐसे फूहड़ आदमी के लिए गाँव में हलवाही के सिवा और कोई धन्धा नहीं। ऐसे लोग, किसी भी गाँव में, आजकल बहुत कम ही मिलते हैं। एकाध हुए भी तो ऐसे लोगों को गाँव के बड़े-बड़े किसान बहुत पहले से ही चारा पानी खिलाकर यानी 'अग्रिम पारिश्रमिक’ (कर्ज नहीं) देकर अनुबन्धित कर लेते हैं, सो बहुत खोज ढूँढ़ करने के बाद, गाँव का सबसे अपाहिज और काहिल पुरुष बिल्लू दास-अगम जी कि किस्मत में आकर जुटा। बहुत 'खुशामद-दरामद’ और प्रलोभन के बाद नित्य सुबह-शाम एक गिलास गर्म चाय पिलाने की शर्त पर बिल्लू महाराज राजी हुए। 'अगम’ जी ने सबसे पहले उनके नाम को 'प्रूफ रीडिंग’ करके सुधारा-बिल्लूदास नहीं, बिलोमंगल। बिलोमंगल जी गाँव के सर्वश्रेष्ठ आलसी माने जाते थे। किन्तु 'मुहूरत’ के दिन ही 'अगम’ जी ने उनके एक गिलास औरेंज पिकोदार्जिलिंग चाय पिलाकर उनकी सारी सुस्ती इस तरह दूर कर दी कि वे तत्काल ही इतने चुस्त हो गए कि उनके अंग-अंग फिल्मी गीतों पर डोलने लगे। हल जोतते समय जब गाँव के अन्य हलवाहे-मजदूर 'बिरहा-बारहमासा’ गाते तो बिलोमंगल जी के पैर 'मस्तानी महबूबा’ के तर्ज पर थिरकते रहते। इसी प्रकिया में एक दिन दाहिने बैल के पिछले पैर में 'फाल’ लग गया। 'अगम’ जी को यह नहीं मालूम था कि हल का फाल भी इतना खतरनाक हो सकता है कि जरा-सा लग जाने पर महीनों तक बैल लँगड़ा होकर बैठा रहे !खैर, शुभचिन्तकों और सम्बन्धियों से बैल और भैंसा मँगनी करके, 'अगम’ जी ने किसी तरह खेतों को तैयार करवाया। कस्बे से रासायनिक खाद खरीद लाए और 'बीज-वपन’ के लिए शुभ दिन देखकर गेहूँ की 'बोवाई’ हो गई। 'बोवाई’ के बाद दोनों अगम और बिलोमंगल इतने प्रसन्न हुए कि रात-भर मिल-जुलकर डुएट-भाव से-मिट्टी में सोना उपजाने वाले गीत गाते रहे। उसी दिन 'अगम’ जी ने अपने शहरी साहित्यिक मित्रों को कई लम्बी-लम्बी चिट्ठियाँ लिखीं, जिनमें नई खेती के नए अनुभवों के आधार पर उन्होंने घोषित किया कि खेती करने में, कविता और चित्रकारी करने का आनन्द, एक ही साथ प्राप्त होता है।
कई दिनों तक स्वामी-सेवक 'बोआई’ के आनन्द में मग्न रहे। कि एक दिन सूर्योदय के एक घण्टा पहले ही एक शुभचिन्तक ने आकर दरवाजा पीटना शुरू कर दिया। सुबह के सुनहले सपने को खोकर 'अगम’ जी अत्यन्त अप्रसन्न हुए। शुभचिन्तक जी को भला-बुरा कहना चाहते थे किन्तु, इसके पहले ही शुभचिन्तक जी ने सूचना दी-''तुम सोए हो ! जाकर देखो, तुम्हारे खेत में गेहूँ का एक भी दाना बचा भी है या नहीं।’’

'अगम’ जी समझ गए, सुबह-सुबह दिल्लगी करके चाय पीने आया है। वे बोले-''क्यों ? गेहूँ के दाने कहाँ चले जाएँगे ?’’
शुभचिन्तक बोले-''अरे जाकर देखो ना, हजारों हजार कौआ, मैना और दुनिया भर की चिड़ियों का झुण्ड तुम्हारे ही खेतों में पड़े हैं। गेहूँ के दाने चुग रहे हैं।’’
''क्या सुबह-सुबह दिल्लगी करने आ गए ?’’-'अगमजी’ ने कहा।
''मैं दिल्लगी करने नहीं आया, तुमको चेताने आया हूँ।’’
अगम जी ने तकिए के नीचे से 'गेहूँ की सफल खेती’ नामक पुस्तिका शुभचिन्तक के सामने फेंकते हुए कहा-''मुझे इतना उल्लू मत समझना। मैंने गेहूँ की सफल खेती के बारे में एक-एक शब्द पढ़ लिया है और जहाँ-जहाँ 'प्रूफ’ की गलतियाँ थीं उन्हें शुद्ध भी कर दिया है। समझे ? इस किताब को खोलकर कहीं भी किसी अध्याय की किसी भी पंक्ति में खोजकर निकाल दो कि गेहूँ की 'बोआई’ के बाद 'चिड़िया-उड़ाई’ भी आवश्यक…।’’

शुभचिन्तक जी ने अप्रसन्न होकर जवाब दिया-''तुम्हारी इस किताब में क्या लिखा है और क्या नहीं लिखा है-यह मैं नहीं जानता। सामने तुम्हारे खेत हैं। जाकर, खुद देखते क्यों नहीं कि खेतों में चिड़ियों के कितने अध्याय और कितनी पंक्तियाँ हैं…।’’

'बोआई’ के बाद सभी किसानों के हलवाहे-रखवाले, सूर्योदय के बहुत पहले ही खेतों पर चले जाते हैं। दुनिया-भर की चिड़ियों की टोलियाँ कचर-कचर करती हुई खेतों में उतरना चाहती हैं। किन्तु वे पटाखे छोड़कर तथा फटे कनस्तरों को पीट-पीटकर उन्हें उड़ाते रहते हैं-हा, हा-ए।
अगमलालजी 'अगम’ ने गाँव से बाहर जाकर देखा-सचमुच अद्भुत व्यापार ! …जो बात किताब के किसी पृष्ठ पर नहीं, वह खेत पर लिखी है…..आधुनिक कविता की पंक्तियों की तरह। और जिस तेजी से उन पखेरुओं के चोंच चल रहे थे, उतनी तेजी से किसी प्रेस में ऑटोमेटिक कम्पोजिंग भी नहीं होती होगी। एक ही घण्टा में सब गेहूँ चुनकर खत्म कर देंगे !…'अगम’ जी के अन्तर से पूरी शक्ति के साथ बस एक ही शब्द अनायास निकल पड़ा…'हा-हाय !’

किन्तु उनके 'हाय’ का कोई खास असर नहीं हुआ और हाथ की तालियों से जब पंछियों के एक पंख भी नहीं फड़के, तो उन्होंने एक ढेला उठाकर फेंका। ढेला खेत में गिरा, तो इधर चरती हुई चिड़ियाँ उड़कर उधर जा बैठीं और चुगने लगीं। अगम जी दौड़कर उस मेंड़ पर गए। तो पंछियों के दल उड़कर दूसरे तरफ बैठ गए। तब तक बिलोमंगलजी भी सहायता के लिए पहुँच गए थे। अगम जी को राहत मिली। पटाखे या कनस्तर तो थे नहीं इसलिए दोनों बहुत देर तक इस मेंड़ से उस मेंड़ पर दौड़कर-दौड़कर 'ढेलेबाजी’ करते रहे। सूरज बाँस भर चढ़ आया और पूस की सुबह का कुहासा तनिक छँटा और चिड़ियों के पेट भर गए तो वे स्वयं ही उड़कर बाँसों तथा पेड़ों की फुनगियों पर जा बैठीं।
उस दिन लौटकर 'अगम’ जी ने गेहूँ की 'सफल खेती’ नामक पुस्तिका के अन्तिम पृष्ठ पर नोट लिखा-''बीज की 'बोआई’ के बाद ही…'चिड़िया-उड़ाई’ पर विस्तारपूर्वक एक अध्याय लिखकर पुस्तिका के अगले संस्करण में जोड़ दिया जाए।’’
नोट लिखने के बाद अगम जी ने बिलोमंगल से कहा-कल सूरज से दो घड़ी पहले ही खेत पर एक फूटा कनस्तर लेकर पहुँच जाना।’’

''फूटा कनस्तर कहाँ से लावेंगे ?’’-बिलोमंगल का सवाल था।
''कनस्तर ? तुमको कहीं फूटा हुआ कनस्तर भी नहीं मिलेगा ?’’
जवाब मिला-''जी हमारी नजर में तो कहीं कोई फूटा कनस्तर नहीं पड़ा। आपने कहीं देखा हो तो कहिए ले आता हूँ-…हाँ सहुआइन की दूकान में साबुत कनस्तर जरूर मिल सकता है।’’
बिलोमंगल लौटकर एक रुपया में एक कनस्तर उधार ले आए। कनस्तर को अगम जी को कान के पास पीटकर परीक्षा देते हुए कहा…देखिए एकदम साबूत है।’’

कनस्तर की समस्या हल करने के बाद ही बिलोमंगल ने दूसरा सवाल पैदा कर दिया-''लेकिन हमसे यह काम नहीं होगा।’’
''क्यों ?’’
बिलोमंगल ने सर्वप्रथम कारण बतलाया, ''बात यह है कि बाबू साहेब कि हम ठहरे बैस्नव आदमी। भोरे-भोरे इतने प्राणी के मुँह का आहार छीनने का काम हमसे मत करवाइए।’’
अगम लाल जी को अचरज हुआ…क्या कहता है यह आदमी ! झुँझलाए,…''तो क्या चिड़िया उड़ाने के लिए दूसरा आदमी रखना होगा ?’’
बिलोमंगल ने भी झुँझलाकर जवाब दिया, '…एक तो जाड़े का मौसम तिस पर सूरज उगने के दो घड़ी पहले ही उठना। इसके बाद, खेत पर पाँव-पैदल जाना। आजकल सुबह-सुबह ऐसी कनकनी वाली पछिया हवा चलती है कि देश क्या जीभ भी सुन हो जाता है…’’

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श्रीमती गजानंद शास्त्रिणी (व्यंग्य) -सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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श्रीमती गजानन्‍द शास्त्रिणी श्रीमान् पं. गजानन्‍द शास्‍त्री की धर्मपत्‍नी हैं। श्रीमान् शास्‍त्री जी ने आपके साथ यह चौथी शादी की है, धर्म की रक्षा के लिए। शास्त्रिणी के पिता को षोडशी कन्‍या के लिए पैंतालीस साल का वर बुरा नहीं लगा, धर्म की रक्षा के लिए। वैद्य का पेशा अख्यितार किए शास्‍त्री जी ने युवती पत्‍नी के आने के साथ 'शास्त्रिणी' का साइन-बोर्ड टाँगा, धर्म की रक्षा के लिए। शास्त्रिणी जी उतनी ही उम्र में गहन पातिव्रत्‍य पर अविराम लेखनी चलाने लगीं, धर्म की रक्षा के लिए। मुझे यह कहानी लिखनी पड़ रही है, धर्म की रक्षा के लिए।
इससे सिद्ध है, धर्म बहुत ही व्‍यापक है। सूक्ष्‍म दृष्टि से देखने वालों का कहना है कि नश्‍वर संसार का कोई काम धर्म के दायरे से बाहर नहीं। संतान पैदा होने के पहले से मृत्‍यु के बाद पिंडदान तक जीवन के समस्‍त भविष्‍य, वर्तमान और भूत को व्‍याप्‍त कर धर्म-ही-धर्म है।
जितने देवता हैं, चूँकि देवता हैं, इसलिए धर्मात्‍मा हैं। मदन को भी देवता कहा है। यह जवानी के देवता हैं। जवानी जीवनभर का शुभ मुहूर्त है, सबसे पुष्‍ट, कर्मठ और तेजस्‍वी सम्‍मान्‍य, फलत: क्रियाएं भी सबसे अधिक महत्‍वपूर्ण, धार्मिकता लिए हुए। मदन को कोई देवता न माने तो न माने पर यह निश्‍चय है कि आज तक कोई देवता इन पर प्रभाव न डाल सका। किसी धर्म, शास्‍त्र और अनुशासन के मानने वालों ने ही इनकी अनुवर्तिता की है। यौवन को भी कोई कितना निंद्य कहे, चाहते सब हैं, वृद्ध सर्वस्‍व भी स्‍वाहा कर। चिह्न तक लोगों को प्रिय हैं - खिजाब की कितनी खपत! धातु-पुष्टि की दवा सबसे ज्‍यादा बिकती है। साबुन, सेंट, पाउडर, क्रीम, हेजलीन, वेसलीन, तेल-फुलेल के लाखों कारखानें हैं और इस दरिद्र देश में। जब न थे, रामजी और सीताजी उबटन लगाते थे। नाम और प्रसिद्धि कितनी है - संसार के सिनेमा-स्‍टारों को देख जाइए। किसी शहर में गिनिए - कितने सिनेमा-हाउस हैं। भीड़ भी कितनी - आवारागर्द मवेशी काइन्‍ज हाउस में इतने न मिलेंगे। देखिए -‍ हिंदू, मुसलमान, सिख, पारसी, जैन, बौद्ध, क्रिस्‍तान, सभी; साफा, टोपी, पगड़ी, कैप, हैट और पाग से लेकर नंगा सिर - घुटना तक, अद्वैतवादी, विशिष्‍टतावादी, द्वैतवादी, द्वैताद्वैतवादी, शुद्धाद्वैतवादी, साम्राज्‍यवादी, आतंकवादी, समाजवादी, काजी, सूफी से लेकर छायावादी तक; खड़े-बेड़े, सीधे-टेढ़े सब तरह के तिलक-त्रिपुंड; बुरकेवाली, घूंघटवाली, पूरे और आधे और चौथाई बाल वाली, खुली और मुंदी चश्‍मेवाली आंखें तक देख रही हैं। अर्थात संसार के जितने धर्मात्‍मा हैं, सभी यौवन से प्‍यार करते हैं। इसलिए उसके कार्य को भी धर्म कहना पड़ता है। किसी के न कहने, न मानने से वह अधर्म नहीं होता।

अस्‍तु, इस यौवन के धर्म की ओर शास्त्रिणी जी का धावा हुआ, जब वे पंद्रह साल की थीं अविवाहिता। यह आवश्‍यक था, इसलिए पाप नहीं। मैं इसे आवश्‍यकतानुसार ही लिखूंगा। जो लोग विशेष रूप से समझना चाहते हों, वे जितने दिन तक पढ़ सकें, काम-विज्ञान का अध्‍ययन कर लें। इस शास्‍त्र पर जितनी पुस्‍तकें हैं, पूर अध्‍ययन के लिए पूरा मनुष्‍य-जीवन थोड़ा है। हिंदी में अनेक पुस्‍तकें इस पर प्रकाशित हैं, बल्कि प्रकाशन को सफल बनाने के लिए इस विषय की पुस्‍तकें आधार मानी गई हैं। इससे लोगों को मालूम हो‍गा कि यह धर्म किस अवस्‍था से किस अवस्‍था तक किस-किस रूप में रहता है।
शास्त्रिणी जी के पिता जिला बनारस के रहने वाले हैं, देहात के, प्रयासी, सरयूपारीण ब्राह्मण; मध्‍यमा तक संस्‍कृत पढ़े; घर के साधारण जमींदार, इसलिए आचार्य भी विद्वता का लोहा मानते हैं। गांव में एक बाग कलमी लंगड़े का है। हर साल भारत-सम्राट को आम भेजने का इरादा करते हैं, जब से वायुयान-कंपनी चली। पर नीचे से ऊपर को देखकर ही रह जाते हैं, सांस छोड़कर। जिले के अंग्रेज हाकिमों को आम पहुंचाने की पितामह के समय से प्रथा है। ये भी सनातन धर्मानुयायी हैं। नाम पं. रामखेलावन है।
रामखेलावन जी के जीवन में एक सुधार मिलता है। अपनी कन्‍या का, जिन्‍हें हम शास्त्रिणी जी लिखते हैं, नाम उन्‍होंने सुपर्णा रखा है। गांव की जीभ में इसका रूप नहीं रह सका; प्रोग्रसिव राइटर्स की साहित्यिकता की तरह 'पन्‍ना' बन गया है। इस सुधार के लिए हम पं. रामखेलावन जी को धन्‍यवाद देते हैं। पंडित जी समय काटने के विचार से आप ही कन्‍या को शिक्षा देते थे, फलस्‍वरूप कन्‍या भी उनके साथ समय काटती गई और पंद्रह साल की अवस्‍था तक सारस्‍वत में हिलती रही। फिर भी गांव की वधू-वनिताओं पर, उसकी विद्वता का पूरा प्रभाव पड़ा। दूसरों पर प्रभाव डालने का उसका जमींदारी स्‍वभाव था, फिर संस्‍कृत पढ़ी, लोग मानने लगे। गति में चापल्‍य उसकी प्रतिभा का सबसे बड़ा लक्षण था।
उन दिनों छायावाद का बोलबाला था, खास तौर से इलाहाबाद में लड़के पन्‍त के नाम का माला जपते थे। ध्‍यान लगाए कितनी लड़ाइयां लड़ीं प्रसाद, पन्‍त और माखनलाल के विवेचन में। भगवतीचरण बायरन के आगे हैं, पीछे रामकुमार, कितनी ताकत से सामने आते हुए। महादेवी कितना खीचती हैं।
मोहन उसी गांव का इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में बी.ए. (पहले साल) में पढ़ता था। यह रंग उस पर भी चढ़ा और दूसरों से अधिक। उसे पन्‍त की प्रकृति प्रिय थी, और इस प्रियता से जैसे पन्‍त में बदल जाना चाहता था। संकोच, लज्‍जा, मार्जित मधुर उच्‍चारण, निर्भिक नम्रता, शिष्‍ट अलाप, सजधज उसी तरह। रचनाओं से रच गया। साधना करते सधी रचना करने लगा। पर सम्‍मेलन शरीफ अब तक नहीं गया। पिता हाई कोर्ट में क्‍लर्क थे। गर्मी की छुट्टियों में गांव आया हुआ है।
सुपर्णा से परिचय है जैसे पर्ण और सुमन का। सुमन पर्ण के ऊपर है, सुपर्णा नहीं समझी। जमींदार की लड़की, जिस तरह वहां की समस्‍त डालों के ऊपर अपने को समझती थी, उसके लिए भी समझी। ज्‍यों-ज्‍यों समय की हवा से हिलती थी, सुमन की रेणु से रंग जाती थी; वह उसी का रंग है। मोहन शिष्‍ट था, पर अपना आसन न छोड़ता था।
सुपर्णा एक दिन बाग में थी। मोहन लौटा हुआ घर आ रहा था। सुपर्णा रंग गई। बुलाया। मोहन फिर भी घर की तरफ चला।
'मोहन! ये आम बाबूजी दे गए हैं, ले जाओ। तकवाहा बाजार गया है।'
मोहन बाग की ओर चला। नजदीक गया तो सुपर्णा हंसने लगी, 'कैसा धोखा देकर बुलाया है? - आम बाबूजी ने तुम्‍हारे यहां कभी और भिजवाए हैं? मोहन लजाकर हंसने लगा।
'लेकिन तुम्‍हारे लिए कुछ आम चुनकर मैंने रखे हैं। चलो।'
मोहन ने एक बार संयत दृष्टि से उसे देखा। सुपर्णा साथ लिए बीच बाग की तरफ चली, 'मैंने तुम्‍हें आते देखा था, तुमसे मिलने को छिपकर चली आई। तकवाहे को सौदा लेने बाजार (दूसरे गांव) भेज दिया है। याद है मोहन ?'
'क्‍या?'
'मेरी गुइंइयों ने तुम्‍हारे साथ, खेल में।'
'वह तो खेल था।'
'नहीं वह सही था। मैं अब भी तुम्‍हें वही समझती हूं।'
'लेकिन तुम पयासी हो। शादी तुम्‍हारे पिता को मंजूर न होगी।'
'तो तुम मुझे कहीं ले चलो। मैं तुमसे कहने आई हूं। दूसरे से ब्‍याह करना मैं नहीं चाहती।'
मोहन की सुंदरता गांव की रहने वाली सुपर्णा ने दूसरे युवक में नहीं देखी। उसका आकर्षण उसकी मां को मालूम हो चुका था। उसका मोहन के घर जाना बंद था। आज पूरी शक्ति लड़ाकर, मौका देखकर मोहन से मिलने आई है। मोहन खिंचा। उसे वहां वह प्रेम न दिखा, वह जिसका भक्त था, कहा -
'लेकिन मैं कहां ले चलूं?'
'जहां रहते हो।'
'वहां तो पिताजी हैं।'
'तो और कहीं।'
'खाएंगे क्‍या?'
खाना पड़ता है, यह सुपर्णा को याद न था। मोहन से लिपटी जा रही थी। इसी समय तकवाहा बाजार से आ गया था। देखकर सचेत करने के लिए आवाज दी। सुपर्णा घबराई। मोहन खड़ा हो गया।
तकवाहा सौदा देकर मोहन को जमींदार की ही दृष्टि से घूरता रहा। मतलब समझकर मोहन धीरे-धीरे बाग से बाहर निकला और घर की ओर चला।
तकवाहा धार्मिक था। जैसा देखा था, पं. रामखेलावन जी से व्‍याख्‍या समेत कहा। साथ ही इतना उपदेश भी दिया कि मालिक! पानी की भरी खाल है, कल क्‍या हो जाए! बिटिया रानी का जल्‍द से ब्‍याह कर देना चाहिए।
पं. रामखेलावन जी भी धार्मिक थे। धर्म की सूक्ष्‍मतम दृष्टि से देखने लगे तो मालूम पड़ा कि सुपर्णा के गर्भ है, नौ-दस महीने में लड़का होगा। फिर? इस महीने लगन है - ब्‍याह हो जाना चाहिए।
जल्‍दी में बनारस चले।
पं. गजानन्‍द शास्‍त्री बनारस के बैद्य हैं। वैदकी साधारण चलती है, बड़े दांव-पेंच करते हैं तब। पर आशा बहुत बढ़ी-चढ़ी है। सदा बड़े-बड़े आदमियों की तारीफ करते हैं और ऐस स्‍वर से, जैसे उन्‍हीं में ऐ एक हों। वैदकी चले इस अभिप्राय से शाम को रामायण पढ़ते-पढ़वाते हैं तुलसी कृत; अर्थ स्‍वयं कहते हैं। गोस्‍वामी जी के साहित्‍य का उनसे बड़ा जानकार - विशेषकर रामायण का, भारतवर्ष में नहीं, यह श्रद्धापूर्वक मानते हैं। सुनने वाले ज्‍यादातर विद्यार्थी हैं, जो भरसक गुरु के यहां भोजन करके विद्याध्‍ययन करने काशी आते हैं। कुछ साधारण जन हैं, जिन्‍हें असमय पर मुफ्त दवा की जरूरत पड़ती है। दो-चार ऐसे भी आदमी, जो काम तो साधारण करते हैं, पर असाधारण आदमियों में गप लड़ाने के आदी हैं। मजे की महफिल लगती है। कुछ महीने हुए, शास्‍त्री जी की तीसरी पत्‍नी का असच्चिकित्‍सा के कारण देहांत हो गया है। बड़े आदमी की तलाश में मिलने वाले अपने मित्रों से शास्‍त्री जी बिना पत्‍नी वाली अड़चनों का बयान करते हैं, और उतनी बड़ी गृहस्‍थी आठाबाठा जाती है - इसके लिए विलाप। सुपात्र सरयूपारीण ब्राह्मण हैं; मामखोर सुकुल।
पं. रामखेलावन जी बनारस में एक ऐसे मित्र के यहां आकर ठहरे, जो वैद्य जी के पूर्वोक्‍त प्रकार के मित्र हैं। रामखेलावन जी लड़की के ब्‍याह के लिए आए हैं, सुनकर मित्र ने उन्‍हें ऊपर ही लिया, और शास्‍त्री जी की तारीफ करते हुए कहा, 'सुपात्र बनारस शहर में न मिलेगा। शास्‍त्री जी की तीसरी पत्‍नी अभी गुजरी हैं; फिर भी उम्र अभी अधिक नहीं, जवान हैं।' शास्‍त्री, वैद्य, सुपात्र और उम्र भी अधिक नहीं - सुनकर पं. रामखेलावन जी ने मन-ही-मन बाबा विश्‍वनाथ को दंडवत की और बाबा विश्‍वनाथ ने हिंदू-धर्म के लिए क्‍या-क्‍या किया है, इसका उन्‍हें स्‍मरण दिलाया - वे भक्‍तवत्‍सल आशुतोष हैं, यह यहीं से विदित हो रहा है - मर्यादा की रक्षा के लिए अपनी पुरी में पहले से वर लिए बैठे हैं - आने के साथ मिला दिया। अब यह बंधन न उखड़े, इसकी बाबा विश्‍वनाथ को याद दिलाई।
पं. रामखेलावन जी के मित्र पं. गजानन्‍द शास्‍त्री के यहां उन्‍हें लेकर चले। जमींदार पर एक धाक जमाने की सोची; कहा, 'लेकिन बड़े आदमी हैं, कुछ लेन-देन वाली पहले से कह दीजिए, आखिर उनकी बराबरी के लिए कहना ही पड़ेगा कि जमींदार हैं।'
'जैसा आप कहें।'
'कुल मिलाकर तीन हजार तो दीजिए, नहीं तो अच्‍छा न लगेगा।'
'इतना तो बहुत है।'
'ढाई हजार? इतने से कम में न होगा। यह दहेज की बात नहीं, बनाव की बात है।'
'अच्‍छा, इतना कर दिया जाएगा। लेकिन विवाह इसी लगन में हो जाना चाहिए।'
'मित्र चौंका। संदेह मिटाने के लिए कहा, 'भई, इस साल तो नहीं हो सकता।'
पं. रामखेलावन जी घबराकर बोले, 'आप जानते ही हैं ग्‍यारह साल के बाद लड़की जितना ही पिता के यहां रहती है, पिता पर पाप चढ़ता है। पंद्रह साल की है। सुंदर जोड़ी है। लड़की अपने घर जाए, चिंता कटे। जमाना दूसरा है।'
मित्र को आशा बंधी। सहानुभूतिपूर्वक बोले, 'बड़ा जोर लगाना पड़ेगा, अगले साल हो तो बुरा तो नहीं?'
पं. रामखेलावन जी चलते हुए रुककर बोले, 'अब इतना सहारा दिया है, तो खेवा पार ही कर दीजिए। बड़े आदमी ठहरे, कोई हमसे भी अच्‍छा तब तक आ जाएगा।'
मित्र को मजबूती हुई। बोले, 'उनकी स्‍त्री का देहांत हुआ है, अभी साल भी पूरा नहीं हुआ। बरखी से पहले मंजूर न करेंगे। लेकिन एक उपाय है, अगर आप करें।'
'आप जो भी कहें, हम करने को तैयार हैं, भला हमें ऐसा दामाद कहां मिलेगा?'
'बात यह कि कुल सराधें एक ही महीने में करवानी पड़ेगीं, और फिर ब्रह्मभोज भी तो है, और बड़ा। कम-से-कम तीन हजार खर्च होंगे। फिर तत्‍काल विवाह। आप तीन हजार रुपए भी दीजिए। पर उन्‍हें नहीं। अरे रे! - इसे वे अपमान समझेंगे। हम दें। इससे आपकी इज्‍जत बढ़ेगी, और आखिर हमें बढ़कर उनसे कहना भी तो है कि बराबर की जगह है? हजार जब उनके हाथ पर रखेंगे कि आपके ससुरजी ने बरखी के खर्च के लिए दिए हैं, तब यह दस हजार के इतना होगा, यही तो बात थी। वे भी समझेंगे।'
पं. रामखेलावन जी दिल से कसमसाए, पर चारा न था। उतरे गले से कहा, 'अच्‍छा बात है।' मित्र ने कहा, 'तो रुपए कब तक भेजिएगा? अच्‍छा, अभी चलिए : देख तो लीजिए, विवाह की बातचीत न कीजिएगा, नहीं तो निकाल ही देंगे। समझिए - पत्‍नी मरी हैं।'
रामखेलावन दबे। धीरे-धीरे चलते गए। 'लड़की कुछ पढ़ी भी है? पढ़ती थी - तीन साल हुए, जब मैं गया था, गवाही थी - मौका देखने के लिए?' मित्र ने पूछा।
'लड़की तो सरस्‍वती है। आपने देखा ही है। संस्‍कृत पढ़ी है।'
'ठीक है। देखिए, बाबा विश्‍वनाथ हैं।' मित्र की तरह पर उतरे गले से कहा।
रामखेलावन जी डरे कि बिगाड़ न दे। दिल से जानते थे, बदमाश है, उनकी तरफ से झूठ गवाही दे चुका है रुपए लेकर; लेकिन लाचार थे; कहा, 'हम तो आपमें बाबा विश्‍वनाथ को ही देखते हैं। यह काम आपका बनाया बनेगा।'
मित्र हंसा। बोला, 'कह तो चुके। गाढ़े में काम न दे, वह मित्र नहीं, दुश्‍मन है।' सामने देखकर, 'वह शास्‍त्री जी का ही मकान है, सामने।' था वह किराये का मकान। अच्‍छी तरह देखकर कहा, 'हैं नहीं बैठक में; शायद पूजा में हैं।'
दोनों बैठक में गए। मित्र ने पं. रामखेलावन जी को आश्‍वासन देकर कहा, 'आप बैठिए। मैं बुलाए लाता हूं।'
पं. रामखेलावन जी एक कुर्सी पर बैठे। मित्रवर आवाज देते हुए जीने पर चढ़े।
जिस तरह मित्र ने यहां रोब गांठा था, उसी तरह शास्‍त्री जी पर गांठना चाहा। वह देख चुका था, शास्‍त्री खिजाब लगाते हैं, अर्थ - विवाह के सिवा दूसरा नहीं। शास्‍त्री जी बढ़-चढ़कर बातें करते हैं, यह मौका बढ़कर बातें करने का है। उसका मंत्र है, काम निकल जाने पर बेटा बाप का नहीं होता। उसे काम निकालना है।
शास्‍त्री जी ऊपर एकांत में दवा कूट रहे थे। आवाज पहचानकर बुलाया। मित्र ने पहुंचने के साथ देखा - खिजाब ताजा है। प्रसन्‍न होकर बोला, 'मेरी मानिए, तो वह ब्‍याह कराऊं, जैसा कभी किया न हो, और बहू अप्‍सरा, संस्‍कृत पढ़ी, रुपया भी दिलाऊं।'
शास्‍त्री जी पुलकित हो उठे। कहा, 'आप हमें दूसरा समझते हैं? - इतनी मित्रता रोज की उठक-बैठक, आप मित्र ही नहीं - हमारे सर्वस्‍व हैं। आपकी बात न मानेंगे तो क्‍या रास्‍ता-चलते की मानेंगे? - आप भी !'
'आपने अभी स्‍नान नहीं किया शायद? नहाकर चंदन लगाकर अच्‍छे कपड़े पहनकर नीचे आइए। विवाह करने वाले जमींदार साहब हैं। वहीं परिचय कराऊंगा। लेकिन अपनी तरफ से कुछ कहिएगा मत। नहीं तो, बड़ा आदमी है, भड़क जाएगा। घर की शेखी में मत भूलिएगा। आप जैसे उसके नौकर हैं। हां, जन्‍म-पत्र अपना हरगिज न दीजिएगा। उम्र का पता चला तो न करेगा। मैं सब ठीक कर दूंगा। चुपचाप बैठे रहिएगा। नौकर कहां है?'
'बाजार गया है।'
'आने पर मिठाई मंगवाइएगा। हालांकि खाएगा नहीं। मिठाई से इंकार करने पर नमस्‍कार करके सीधे ऊपर का रास्‍ता नापिएगा। मैं भी यह कह दूंगा, शास्‍ती तजी ने आधे घंटे का समय दिया है।'
शास्‍त्री गजानन्‍द जी गदगद हो गए। ऐसा सच्‍चा आदमी यह पहला मिला है, उनका दिल कहने लगा। मित्र नीचे उतरा और मित्र से गंभीर होकर बोला, 'पूजा में हैं, मैं तो पहले ही समझ गया था। दस मिनट के बाद आंख खोली, जब मैंने घंटी टिनटिनाई। जब से स्‍त्री का देहांत हुआ है, पूजा में ही तो रहते हैं। सिर हिलाकर कहा - चलो। देखिए, बाबा विश्‍वनाथ ही हैं। हे प्रभो! शरणागत-शरण! तुम्‍हीं हो - बाबा विश्‍वनाथ!' कहते हुए मित्र ने पलकें मूंद लीं।
इसी समय पैरों की आहट मालूम थी। देखा, नौकर आ रहा था। डांटकर कहा, 'पंखा झल। शास्‍त्री जी अभी आते हैं।'
नौकर पंखा झलने लगा। वैद्य का बैठका था ही। पं. रामखेलावन जी प्रभाव में आ गए। आधे घंटे बाद जीने में खड़ाऊं की खटक सुन पड़ी। मित्र उठकर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, उंगली के इशारे पं. रामखेलावन जी को खड़े हो जाने के लिए कहकर। मित्र की देखा-देखी पंडित जी ने भी भक्तिपूर्वक हाथ जोड़ लिए। नौकर अचंभे से देख रहा था। ऐसा पहले नहीं देखा था।
शास्‍त्री जी के आने पर मित्र ने घुटने तक झुककर प्रणाम किया। पं. रामखेलावन जी ने भी मित्र का अनुसरण किया। 'बैठिए, गदाधर जी' कोमल सभ्‍य कंठ से कहकर गजानंद जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। वैद्यजी की बढिया गद्दीदार कुर्सी बीच में थी। पं. रामखेलावन जी आश्‍चर्य और हर्ष से देख रहे थे। आश्‍चर्य इसलिए कि शास्‍त्री जी बड़े आदती तो हैं ही, उम्र भी अधिक नहीं, 25 से 30 कहने की हिम्‍मत नहीं पड़ती।
शास्‍त्री जी ने नौकर को पान और मिठाई ले आने के लिए भेजा और स्‍वाभाविक बनावटी विनम्रता के साथ मित्रवर गदाधर ने आगंतुक अपरिचित महाशय का परिचय पूछने लगे। पं. गदाधर जी बड़े दात्त कंठ से पं. रामखेलावन जी की प्रशंसा कर चले, पर किस अभिप्राय से वे गए थे, यह न कहा। कहा, 'महाराज! आप एक अत्‍यंत आवश्‍यक गृहधर्म से मुक्‍त होना चाहते हैं।
पलकें मूंदते हुए, भावावेश मे, शास्‍त्री जी ने कहा, 'काशी तो मुक्ति के लिए प्रसिद्ध है।'
'हां, महाराज!' मित्र ने और आविष्‍ट होते हुए कहा, 'वह छूट तो सबसे बड़ी मुक्ति है, पर यह साधारण मुक्ति ही है, जैसे बाबा विश्‍वनाथ के परमसिद्ध भक्‍त स्‍वीकारमात्र से इस भव-बंधन से मुक्ति दे सकते हैं।' कहकर हाथ जोड़ दिए। पं. रामखेलावन जी ने भी साथ दिया।
हां, नहीं, कुछ न कहकर एकांत धार्मिक दृष्टि को परम सिद्ध पं. गजानन्‍द जी शास्‍त्री पलकों के अंदर करके बैठ रहे।
इसी समय नौकर पान और मिठाई ले आया। शास्‍त्री जी ने खटक से आंखें खोलकर देखा, नौकर को शुद्ध जल ले आने के लिए कहकर बड़ी नम्रता से पं. रामखेलावन जी को जलपान करने के लिए पूछा। पं. रामखेलावन जी दोनों हाथ उठाकर जीभ काटकर सिर हिलाते हुए बोले, 'नहीं महराज, नहीं, यह तो अधर्म है। चाहिए तो हमें कि हम आपकी सेवा करें, बल्कि आपके सेवा संबंध में सदा के लिए -'
'अहाहा! क्‍या कही! - क्‍या कही!' कहकर, पूरा दोना उठाकर एक रसगुल्‍ला मुंह में छोड़ते हुए मित्र ने कहा, 'बाबा विश्‍वनाथ जी के वर से काशी का एक-एक बालक अंतर्यामी होता है, फिर उनकी सभा के परिषद शास्‍त्री जी तो -''
शास्‍त्री जी अभिन्‍न स्‍नेह की दृष्टि से प्रिय मित्र को देखते र‍हे। मित्र ने, स्‍वल्‍पकाल मे रामभवन का प्रसिद्ध मिष्‍ठान्‍न उदरस्‍थ कर जलपान के पश्‍चात मगही बीड़ों की एक नत्‍थी मुखव्‍यादान कर यथा स्‍थान रखी। शास्‍त्री जी विनयपूर्वक नमस्‍कार कर जीना तै करने को चले। उनके पीठ फेरने पर मित्र ने रामखेलावन जी को पंजा दिखाकर हिलाते हुए आश्‍वासन दिया। शास्‍त्री जी के अदृश्‍य होने पर इशारे से पं. रामखेलावन जी को साथ लेकर वासस्‍थल की ओर प्रस्‍थान किया।
रामखेलावन जी के मौन पर शास्‍त्री जी का पूरा-पूरा प्रभाव पड़ चुका था। कहा, 'अब हमें इधर से जाने दीजिए; कल रुपए लेकर आएंगे। लेकिन इसी महीने विवाह हो जाएगा?'
'इसी महीने - इसी महीने', गंभीर भाव से मित्र ने कहा, 'जन्‍मपत्र लड़की का लेते आइएगा। हां, एक बात और है। बाकी डेढ़ हजार में बाहर सौ का जेवर होना चाहिए, नया; आइएगा हम खरीदवा देंगे', दलाली की सोचते हुए - कहा, 'आपको ठग लेगा। आप इतना तो समझ गए होंगे कि इतने के बिना बनता नहीं, तीन सौ रुपए रह जाएंगे। खिलाने-पिलाने और परजों को देने की बहुत है। बल्कि कुछ बच जाएगा आपके पास। फिजूल खर्च हो यह मैं नहीं चाहता। इसीलिए, ठोस-ठोस काम वाला खर्च कहा। अच्‍छा, नमस्‍कार!'
शास्‍त्री जी का ब्‍याह हो गया। सुपर्णा पति के साथ है। शास्‍त्री जी ब्‍याह करते-करते कोमल हो गए थे। नवीना सुपर्णा को यथाभ्‍यास सब प्रकार प्रीत रखने लगे।
बाग से लौटने पर सुपर्णा के हृदय में मोहन के लिए क्रोध पैदा हुआ। घरवालों ने सख्‍त निगरानी रखने के अलावा, डर के मारे उससे कुछ नहीं कहा। उसने भी विरोध किए बिना विवाह के बहाव में अपने को बहा दिया। मन में यह प्रतिहिंसा लिए हुए, कि मोहन इस बहते में मिलेगा। और उसे हो सकेगा तो उचित शिक्षा देगी। शास्‍त्री जी को एकांत भक्‍त देखकर मन में मुस्‍कराई।
सुपर्णा का जीवन शास्‍त्री जी के लिए भी जीवन सिद्ध हुआ। शास्‍त्री जी अपना कारोबार बढ़ाने लगे। सुपर्णा को वैदक की अनुवादित हिंदी पुस्‍तकें देने लगे, नाड़ी-विचार चर्चा आदि करने लगे। उस आग में तृण की तरह जल-जलकर जो प्रकाश देखने लगे, वह मर्त्‍य में उन्‍हें दुर्लभ मालूम दिया। एक दिन श्रीमती गजानन्‍द शास्त्रिणी के नाम से स्त्रियों के लिए बिना फीस वाला रोग परीक्षणालय खोल दिया - इस विचार से कि दवा के दाम मिलेंगे, फिर प्रसिद्धि होने पर फीस भी मिलेगी।
लेकिन ध्‍यान से सुपर्णा के पढ़ने का कारण कुछ और है। शास्‍त्री जी अपनी मेज की सजावट तथा प्रतीक्षा करते रोगियों के समय काटने के विचार से 'तारा' के ग्राहक थे। एक दिन सुपर्णा 'तारा' के पन्‍ने उलटने लगी। मोहन की एक रचना छिपी थी। यह उसकी पहली प्रकाशित कविता थी। विषय था 'व्‍यर्थ प्रणय'। बात बहुत कुछ मिलती थी। लेकिन कुछ निंदा थी - जिस प्रेस से कवि स्‍वर्ग से गिरा जाता है - उसकी। काव्‍य की प्रेमिका का उसमें वहीं प्रेम दर्शाया गया था। सुपर्णा चौंकी। फिर संयत हुई और नियमित रूप से 'तारा' पढ़ने लगी।
एक साल बीत गया। अब सुपर्णा हिंदी में मजे में लिख देती है। मोहन से उसका हाड़-हाड़ जल रहा था। एक दिन उसने पातिव्रत्‍य पर एक लेख लिखा। आजकल के छायावाद के संबंध में भी पढ़ चुकी थी और बहुत कुछ अपने पति से सुन चुकी थी। काशी हिंदी के सभी वादों की भूमि है। प्रसाद काशी के ही हैं। उनके युवक पाठक शिष्‍य अनेक शास्त्रियों को बना चुके हैं। पं. गजानन्‍द शास्‍त्री गंगा नहाते समय कई बार तर्क कर चुके हैं, उत्तर भी भिन्‍न मुनि के भिन्‍न मत की तरह अनेक मिल चुके हैं। एक दिन शास्‍त्री जी के पूछने पर एक ने कहा, 'छायावाद का अर्थ है शिष्‍टतावाद; छायावादी का अर्थ है सुंदर साफ वस्‍त्र और शिष्‍ट भाषा धारण करने वाला; जो छायावादी है, वह सुवेश और मधुरभाषी है; जो छायावादी नहीं है वह काशी के शास्त्रियों की तरह अंगोछा पहनने वाला है या नंगा है।' दूसरे दिन दो थे। नहा रहे थे। शास्‍त्री जी भी नहा रहे थे। 'छायावाद क्‍या है?' - शास्‍त्री जी ने पूछा। उन्‍होंने शास्‍त्री जी को गंगा में गहरे ले जाकर डुबाना शुरू किया, जब कई कुल्‍ले पानी पी गए, तब छोडा; शिथिल होकर शास्‍त्री जी किनारे आए, तब लड़कों ने कहा, 'यही है छायावाद।' फलत: शास्‍त्री जी छायावाद और छायावादी से मौलिक घृणा करने लगे थे और जिज्ञासु षोडशी प्रिया को समझाते रहे कि छायावाद वह है, जिसमें कला के साथ व्‍यभिचार किया जाता है तरह-तरह से। आइडिया के रूप में, सुपर्णा जैसी ओजस्विनी लेखिका के लिए इतना बहुत था। आदि से अंत तक उसके लेख में प्राचीन पतिव्रत धर्म और नवीन छायावादी व्‍यभिचार प्रचारक के कंठ से बोल रहा था। शास्‍त्री जी ने कई बार पढ़ा और पत्‍नी को सती समझकर मन-ही-मन प्रसन्‍न हुए। वह लेख संपादकजी के पास भेजा गया। संपादकजी लेखिका मात्र को प्रोत्‍साहित करते हैं ताकि हिंदी की मरुभूमि सरस होकर आबाद हो, इसलिए लेख या कविता के साथ चित्र भी छापते हैं। शास्त्रिणी जी को लिखा। प्रसिद्धि के विचार से शास्‍त्री जी ने एक अच्‍छा सा चित्र उतरवाकर भेज दिया। शास्त्रिणी जी का दिल बढ़ गया। साथ में उपदेश देने वाली प्रवृत्ति भी।

इसी समय देश में आंदोलन शुरू हुआ। पिकेटिंग के लिए देवियों की आवश्‍यकता हुई - पुरुषों का साथ देने के लिए भी। शास्त्रिणी जी की मारफत शास्‍त्री जी का व्‍यवसाय अब तक भी न चमका था। शास्‍त्री जी ने पिकेटिंग में जाने की आज्ञा दे दी। इसी समय महात्‍माजी बनारस होते हुए कहीं जा रहे थे, कुछ घंटों के लिए उतरे। शास्‍त्री जी की सलाह से एक जेवर बेचकर, शास्त्रिणी जी ने दो सौ रुपए की थैली उन्‍हें भेंट की। तन, मन और धन से देश के लिए हुई इस सेवा का साधारण जनता पर असाधारण प्रभाव पड़ा। सब धन्‍य-धन्‍य कहने लगे। शास्त्रिणी जी पूरी तत्‍परता से पिकेटिंग करती रहीं। एक दिन पुलिस ने दूसरी स्त्रियों के साथ उन्‍हें भी लेकर एकांत में, कुछ मील शहर से दूर, संध्‍या समय छोड़ दिया। वहां से उनका मायका नजदीक था। रास्‍ता जाना हुआ। लड़कपन में वहां तक वे खेलने जाती थीं। पैदल मायके चली गईं। दूसरे देवियों से नहीं कहा, इसलिए कि ले जाना होगा और सबके लिए वहां सुविधा न होगी। प्रात:काल देवियों की गिनती में यह एक घटी, संवाद-पत्रों ने हल्‍ला मचाया। ये तीन दिन बाद विश्राम लेकर मायके से लौटीं, और शोक-संतप्‍त पतिदेव को और उच्‍छृंखल रूप से बड़बड़ाते हुए संवाद पत्रों को शां‍त किया - प्रतिवाद लिखा कि संपादकों को इस प्रकार अधीर नहीं होना चाहिए।

आंदोलन के बाद इनकी प्रैक्टिस चमक गई। बड़ी देवियां आने लगीं। बुलावा भी होने लगा। चिकित्‍सा के साथ लेख लिखना भी जारी रहा। ये बिल्‍कुल समय के साथ थीं। एक बार लिखा, 'देश को छायावाद से जितना नुकसान पहुंचा है, उतना गुलामी से नहीं।' इनके विचारों का आदर नीम-राजनीतिज्ञों में क्रमश: जोर पकड़ता गया। प्रोग्रेसिव राइटर्स ने भी बधाइयां दीं और इनकी हिंदी को आदर्श मानकर अपनी सभा में सम्मिलित हाने के लिए पूछा। अस्‍तु शास्त्रिणी जी दिन-पर-दिन उन्‍नति करती गईं। इस समय नया चुनाव शुरू हुआ। राष्‍ट्रपति ने कांग्रेस को वोट देने के लिए आवाज उठाई। हर जिले में कांग्रेस उम्‍मीदवार खड़े हुए। देवियां भी। वे मर्दों के बराबर हैं। शास्त्रिणी जी भी जौनपुर से खड़ी होकर सफल हुईं। अब उनके सम्‍मान की सीमा न रही। एम.एल.ए. हैं। 'कौशल' में उनके निबंध प्रकाशित होते थे। लखनऊ आने पर 'कौशल' के प्रधान संपादक एक दिन उनसे मिले और 'कौशल' कार्यालय पधारने के लिए प्रार्थना की। शास्त्रिणी जी ने गर्वित स्‍वीकारोक्ति दी।
'कौशल' कार्यालय सजाया गया। शास्त्रिणी जी पधारीं। मोहन एम.ए. होकर यहां सहकारी है, लेकिन लिखने में हिंदी में अकेला। शास्त्रिणी जी ने देखा। मोहन ने उठकर नमस्‍कार किया। 'आप यहां', शास्त्रिणी जी ने प्रश्‍न किया। 'जी हां', मोहन ने नम्रता से उत्तर दिया, 'यहां सहायक हैं।' शास्त्रिणी जी उद्धत भाव से हंसी। उपदेश के स्‍वर में बोलीं, 'आप गलत रास्‍ते पर थे!'

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अध्यक्ष महोदय (मिस्टर स्पीकर) (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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विधानमंडलों में थोड़ी नोंक-झोंक, दिलचस्प टिप्पणी, रिमार्क, हल्की-फुल्की बातें सब कहीं चलती हैं। जब अंग्रेज सरकार थी, तब केंद्र में 'सेंट्रल असेंबली' थी। इसमें बड़े जबरदस्त लोग थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल के बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल अध्यक्ष थे। असेंबली के अधिवेशन के पहले उन्होंने देखा, मेरा अध्यक्ष का आसन नीचे है और ब्रिटिश वायसराय का ऊपर। विट्ठल भाई ने एतराज किया कि अध्यक्ष मैं हूं। आपकी कुर्सी मेरी कुर्सी से ऊंचे पर नहीं हो सकती। आखिर वायसराय का आसन बराबरी पर किया गया।

इस असेंबली में बड़े ऊंचे व्यक्तित्व थे। एस। सत्यमूर्ति और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे लोग थे। मोतीलाल नेहरु थे। जिन्ना जब पहली बार बोलने को खड़े हुए तो उन्होंने कहा- मिस्टर चेयरमैन, दिस इस माई मेडन स्पीच। अंग्रेजी में 'मेडन' के दो अर्थ होते हैं। पर सत्यमूर्ति ने तपाक से कहा- मेडन्स शुड बी मॉडेस्ट! कुमारियों को शर्मीली होना चाहिए। तब एक अब्दुल कयूम खां भी सदस्य थे। घोर काले थे। उन्हें 'कोयले की खदान का कुली' कह देते थे और वे बुरा नहीं मानते थे। गंभीर सदस्यों में हल्की- फुल्की छेड़छाड़ अच्छी रहती है। प्रो।हीरेन मुखर्जी ने अपनी पुस्तक 'पोर्टेट ऑफ पार्लियामेंट' में एक घटना लिखी है। डॉ। श्यामा प्रसाद मुख़र्जी कांग्रेस सरकार की आलोचना कर रहे थे। एक कांग्रेसी मंत्री ने खड़े होकर कहा- आपको सच्चाई भी देखनी चाहिए। श्यामा प्रसाद ने कहा- मैं सच्चाई कैसे देख सकता हूं, जब आप मेरे सामने खड़े हैं।

इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। अरब के शाह ने उन्हें हीरों का हार भेंट किया था। ऐसे उपहार व्यक्तिगत नहीं होते। वे सरकारी खजाने में रख दिए जाते हैं। लोहिया ने हंगामा खड़ा कर दिया था संसद में- गर्दन का वह हार कहां है। लोहिया के बाद एस।ए।डांगे बोले- मैं उन लोगों में नहीं हूं जो प्रधानमंत्री की गरदन देखते रहते हैं। मैं उनकी गरदन के ऊपर देखता हूं कि उनके दिमाग में क्या है। फिर डांगे दूसरे विषय पर बोले।

हमारे यहां आम शिकायत है कि हमारी विधायिकाओं का स्तर बहुत गिर गया है। लोग याद करते हैं, पंडित नेहरु के जमाने की संसद की और आज की संसद की गिरावट पर चिंतित हैं। नेहरु के समय जो संसदीय मर्यादाएं थीं वे अब भंग होती गयीं और संसदीय आचरण में लगातार गिरावट आयी। एक कारण यह हो सकता है। पहली, दूसरी संसद में तथा विधान सभाओं में वे लोग थे, जो स्वाधीनता संग्राम में भाग ले चुके थे। वे समर्पित लोग थे। त्याग-भावना उनमें विशेष थी। वे अनुशासित सिपाही रहे थे स्वाधीनता संग्राम के और उनमें उदात्तता, सहनशीलता थी। स्वाधीनता संग्राम में गांधीजी के नेतृत्व में गांव के अपढ़ भारतीय से लेकर बड़े-से-बड़े बुद्धिवादी शामिल थे। वे एक महान 'मिशन' से कार्य कर रहे थे। सत्ता आने के बाद भी यह मिशन की भावना उनमें रही। वे लोग त्याग की राजनीति जिंदगी भर करते रहे थे, प्राप्ति की राजनीति नहीं।

बाद में प्राप्ति की राजनीति हावी हो गयी। राजनीती धंधा हो गयी। 'पोलिटिकल करियर' आ गया, बिजनेस करियर या मिलिटरी करियर या एजुकेशनल करियर की तरह। बर्नार्ड शॉ ने कहा था- पॉलिटिक्स इज द लास्ट रेफ्यूज ऑफ ए स्काउन्ड्रल। बदमाश आदमी का आखिरी मुकाम राजनीति है। बर्नार्ड शॉ का कथन अतिवादी है। पूरी तरह ठीक नहीं। पर यह सही है कि राजनीति में घटिया से घटिया आदमी आने लगे। पोलिटिकल करियर दूसरे देशों में भी होता है, पर उनकी जीविका का साधन दूसरा होता है। राजनीति उनकी जीविका नहीं होती। हमारे यहां राजनीति देश सेवा और धंधा दोनों हो गयी। इन धंधे में किन गंदे तरीकों से धन कमाया जाता है यह सबको मालूम है। जैसे यह सब जानते हैं कि तबादलों का मौसम राजनेताओं के पैसा कमाने का मौसम है।

फिर हमारी चुनाव-पद्धति ऐसी है कि पहले उसमें धन आया और फिर अपराधी आए। धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते ऐसा आज हो गया कि विधान-सभा की सीट जीतने के लिए पंद्रह-बीस लाख रूपए और दो हजार किराए के गुंडे चाहिए। बिहार की नेकनामी है कि यहां हर नेता के पास अपराधी गिरोह होता है। काला पैसा होता है। लुटेरे लूटते भी हैं और चुनाव प्रचार भी करते हैं। धन भी बांटा जाता है- तेरा तुझको सौंपत का लागते है मोर।

सदनों की कार्यवाही का हाल ये है कि राज्य सभा के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ। शंकरदयाल शर्मा रो पड़े थे। इतनी हुल्लड़, अनुशासनहीनता और अराजकता। एक बात कही जा सकती है- ये हमारे समाज के प्रतिनिधि हैं, इस नाते समाज में जो हो रहा है, नहीं करें तो झूठे प्रतिनिधि होंगे। मगर ये हमारे माननीय सदस्य पान के ठेले पर खड़े होकर और चाय की गुमटी में घंटा-भर बैठकर लोगों की बातें सुनें। वे क्या कहते हैं। उनकी शिकायतें क्या हैं। उनका दुःख-दर्द क्या है। यह भी सुनें कि वे अपने भाग्य-विधाताओं को बहुत गाली देते हैं।

सदन की बैठक शुरू होते ही काम रोको के 4-5 प्रस्ताव जरूरी भी और गैर-जरूरी भी। फिर बात-बात पर रोक-टोक, बहिर्गमन, अध्यक्ष को चुनौती, घूंसे तानकर एक दूसरे पर झपटना, अध्यक्ष के आसन के सामने इकट्ठे बैठ जाना, कोई कार्यवाही नहीं होने देना। देश की समस्याओं पर विचार कम, एक-दूसरे को उखाड़ने की कार्यवाही अधिक। इनकी एक अलग छोटी-सी दुनिया है। सदन में वे अपनी ही प्रतिध्वनि सुनते हैं और खुश होते हैं। बाहर की ध्वनियां वहां नहीं पहुंचतीं।

एक तो राजनीति में अपराधियों का प्रवेश और उनकी प्रतिष्ठा। दूसरे सांसदों और विधायकों की यह अराजकता। संसदीय लोकतंत्र के लिए खतरा बढ़ रहा है।

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अनुशासन (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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एक अध्यापक था। वह सरकारी नौकरी में था ।मास्टर की पत्नी बीमार थी । अस्पताल में थी। तभी उसके तबादले का ऑर्डर हो गया। शिक्षा विभाग के बड़े साहब उसी मुहल्ले में रहते थे। उसका बंगला मास्टर के घर से दिखता था। वह उनजे बंगले के सामने से निकलता तो उन्हें सादर ' नमस्ते' कर लेता। मास्टर ने सोचा, साहब से कहूँ तो वे फिलहाल मेरा तबादला रोक देंगे
वह साहब के घर गया । बरामदे में बड़े साहब ने पूछा - क्यों ? क्या बात है ?
- साहब एक प्राथना है।
- बोलो
- मेरी पत्नी अस्पताल में भर्ती है। वह बहुत बीमार है।
- तो ?
- मेरा तबादले का ऑर्डर हो गया है।
- तो ?
- सर, कृपा कर फिलहाल मेरा तबादला कैंसिल कर दे।

साहब नाराज हो हुए। बोले - तुम्हे अनुशासन के नियम मालूम हैं ? तुम सीधे मुझसे मिलने क्यों आ गए ? तुम्हे आवेदन करना चाहिए थ्रू प्रॉपर चैनल । तुम्हे अपने हैडमास्टर की लिखित अनुमति के साथ मुझसे मिलना चाहिए। जाओ, तबादला कैंसिल नहीं होगा। तुम्हें अनुशासन भंग करने के लिये डाँट भी पड़ेगी।
मास्टर को डाँट पड़ी। आइंदा साहब से सीधे नहीं मिलने की चेतावनी मिली। मास्टर ने दो महीने की छुट्टी ले ली।
एक शाम साहब के घर में आग लग गयी। आसपास के लोग आग बुझा रहे थे।
मास्टर बरामदे में खड़े हुए देख रहे थे। आग बुझ गयी। अधिक नुकसान नहीं हुआ।
दूसरे दिन मास्टर साहब निकले तो साहब फाटक पर खड़े थे। साहब में कहा - मास्टर साहब, कल शाम को मेरे घर में आग लगी थू तो तुम खड़े खड़े देखते रहे। बुझाने नहीं आये।

मास्टर ने नम्रता से कहा - सर, मैं मजबूर था। हेडमास्टर साहब बाहर गए हैं। उनकी लिखित अनुमति के बिना कैसे आता ? आपकी आग बुझाने के लिये थ्रू प्रॉपर चेनल आना चाहिए !

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अपनी अपनी बीमारी (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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हम उनके पास चंदा माँगने गए थे। चंदे के पुराने अभ्यासी का चेहरा बोलता है। वे हमें भाँप गए। हम भी उन्हें भाँप गए। चंदा माँगनेवाले और देनेवाले एक-दूसरे के शरीर की गंध बखूबी पहचानते हैं। लेनेवाला गंध से जान लेता है कि यह देगा या नहीं। देनेवाला भी माँगनेवाले के शरीर की गंध से समझ लेता है कि यह बिना लिए टल जाएगा या नहीं। हमें बैठते ही समझ में आ गया कि ये नहीं देंगे। वे भी शायद समझ गए कि ये टल जाएँगे। फिर भी हम दोनों पक्षों को अपना कर्तव्य तो निभाना ही था। हमने प्रार्थना की तो वे बोले - आपको चंदे की पड़ी है, हम तो टैक्सों के मारे मर रहे हैं। सोचा, यह टैक्स की बीमारी कैसी होती है। बीमारियाँ बहुत देखी हैं - निमोनिया, कालरा, कैंसर; जिनसे लोग मरते हैं। मगर यह टैक्स की कैसी बीमारी है जिससे वे मर रहे थे! वे पूरी तरह से स्वस्थ और प्रसन्न थे। तो क्या इस बीमारी में मजा आता है ? यह अच्छी लगती है जिससे बीमार तगड़ा हो जाता है। इस बीमारी से मरने में कैसा लगता होगा ?

अजीब रोग है यह। चिकित्सा-विज्ञान में इसका कोई इलाज नहीं है। बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाइए और कहिए - यह आदमी टैक्स से मर रहा है। इसके प्राण बचा लीजिए। वह कहेगा - इसका हमारे पास कोई इलाज नहीं है। लेकिन इसके भी इलाज करनेवाले होते हैं, मगर वे एलोपैथी या होमियोपैथी पढ़े नहीं होते। इसकी चिकित्सा पद्धति अलग है। इस देश में कुछ लोग टैक्स की बीमारी से मरते हैं और काफी लोग भुखमरी से।

टैक्स की बीमारी की विशेषता यह है कि जिसे लग जाए वह कहता है - हाय, हम टैक्स से मर रहे हैं। और जिसे न लगे वह कहता है - हाय, हमें टैक्स की बीमारी ही नहीं लगती। कितने लोग हैं कि जिनकी महत्त्वाकांक्षा होती है कि टैक्स की बीमारी से मरें, पर मर जाते हैं निमोनिया से। हमें उन पर दया आई। सोचा, कहें कि प्रापर्टी समेत यह बीमारी हमें दे दीजिए। पर वे नहीं देते। यह कमबख्त बीमारी ही ऐसी है कि जिसे लग जाए, उसे प्यारी हो जाती है।

मुझे उनसे ईर्ष्या हुई। मैं उन जैसा ही बीमार होना चाहता हूँ। उनकी तरह ही मरना चाहता हूँ। कितना अच्छा होता अगर शोक-समाचार यों छपता - बड़ी प्रसन्नता की बात है कि हिंदी के व्यंग्य लेखक हरिशंकर परसाई टैक्स की बीमारी से मर गए। वे हिंदी के प्रथम लेखक हैं जो इस बीमारी से मरे। इस घटना से समस्त हिंदी संसार गौरवान्वित है। आशा है आगे भी लेखक इसी बीमारी से मरेंगे ! मगर अपने भाग्य में यह कहाँ ? अपने भाग्य में तो टुच्ची बीमारियों से मरना लिखा है।

उनका दुख देखकर मैं सोचता हूँ, दुख भी कैसे-कैसे होते हैं। अपना-अपना दुख अलग होता है। उनका दुख था कि टैक्स मारे डाल रहे हैं। अपना दुख है कि प्रापर्टी नहीं है जिससे अपने को भी टैक्स से मरने का सौभाग्य प्राप्त हो। हम कुल 50 रु. चंदा न मिलने के दुख में मरे जा रहे थे।

मेरे पास एक आदमी आता था, जो दूसरों की बेईमानी की बीमारी से मरा जाता था। अपनी बेईमानी प्राणघातक नहीं होती, बल्कि संयम से साधी जाए तो स्वास्थ्यवर्द्धक होती है। कई पतिव्रताएँ दूसरी औरतों के कुलटापन की बीमारी से परेशान रहती हैं। वह आदर्श प्रेमी आदमी था। गांधीजी के नाम से चलनेवाले किसी प्रतिष्ठान में काम करता था। मेरे पास घंटो बैठता और बताता कि वहाँ कैसी बेईमानी चल रही है। कहता, युवावस्था में मैंने अपने को समर्पित कर दिया था। किस आशा से इस संस्था में गया और क्या देख रहा हूँ। मैंने कहा - भैया, युवावस्था में जिनने समर्पित कर दिया वे सब रो रहे हैं। फिर तुम आदर्श लेकर गए ही क्यों ? गांधीजी दुकान खोलने का आदेश तो मरते-मरते दे नहीं गए थे। मैं समझ गया, उसके कष्ट को। गांधीजी का नाम प्रतिष्ठान में जुड़ा होने के कारण वह बेईमानी नहीं कर पाता था और दूसरों की बेईमानी से बीमार था। अगर प्रतिष्ठान का नाम कुछ और हो जाता तो वह भी औरों जैसा करता और स्वस्थ रहता। मगर गांधीजी ने उसकी जिंदगी बरबाद की थी। गांधीजी विनोबा जैसों की जिंदगी बरबाद कर गए। बड़े-बड़े दुख हैं ! मैं बैठा हूँ। मेरे साथ 2-3 बंधु बैठे हैं। मैं दुखी हूँ। मेरा दुख यह है कि मुझे बिजली का 40 रु. का बिल जमा करना है और मेरे पास इतने रुपए नहीं हैं।

तभी एक बंधु अपना दुख बताने लगता है। उसने 8 कमरों का मकान बनाने की योजना बनाई थी। 6 कमरे बन चुके हैं। 2 के लिए पैसे की तंगी आ गई है। वह बहुत-बहुत दुखी है। वह अपने दुख का वर्णन करता है। मैं प्रभावित नहीं होता। मगर उसका दुख कितना विकट है कि मकान को 6 कमरों का नहीं रख सकता। मुझे उसके दुख से दुखी होना चाहिए, पर नहीं हो पाता। मेरे मन में बिजली के बिल के 40 रु. का खटका लगा है।

दूसरे बंधु पुस्तक-विक्रेता हैं। पिछले साल 50 हजार की किताबें पुस्तकालयों को बेची थीं। इस साल 40 हजार की बिकीं। कहते हैं - बड़ी मुश्किल है। सिर्फ 40 हजार की किताबें इस साल बिकीं। ऐसे में कैसे चलेगा ? वे चाहते हैं, मैं दुखी हो जाऊँ, पर मैं नहीं होता। इनके पास मैंने अपनी 100 किताबें रख दी थीं। वे बिक गईं। मगर जब मैं पैसे माँगता हूँ, तो वे ऐसे हँसने लगते हैं जैसे मैं हास्यरस पैदा कर रहा हूँ। बड़ी मुसीबत है व्यंग्यकार की। वह अपने पैसे माँगे, तो उसे भी व्यंग्य-विनोद में शामिल कर लिया जाता है। मैं उनके दुख से दुखी नहीं होता।

मेरे मन में बिजली कटने का खटका लगा हुआ है। तीसरे बंधु की रोटरी मशीन आ गई। अब मोनो मशीन आने में कठिनाई आ गई है। वे दुखी हैं। मैं फिर दुखी नहीं होता। अंतत: मुझे लगता है कि अपने बिजली के बिल को भूलकर मुझे इन सबके दुख में दुखी हो जाना चाहिए। मैं दुखी हो जाता हूँ। कहता हूँ - क्या ट्रेजडी है मनुष्य-जीवन की कि मकान कुल 6 कमरों का रह जाता है। और कैसी निर्दय यह दुनिया है कि सिर्फ 40 हजार की किताबें खरीदती है। कैसा बुरा वक्त आ गया है कि मोनो मशीन ही नहीं आ रही है।

वे तीनों प्रसन्न हैं कि मैं उनके दुःखों से आखिर दुखी हो ही गया।
तरह-तरह के संघर्ष में तरह-तरह के दुख हैं। एक जीवित रहने का संघर्ष है और एक संपन्नता का संघर्ष है। एक न्यूनतम जीवन-स्तर न कर पाने का दुख है, एक पर्याप्त संपन्नता न होने का दुख है। ऐसे में कोई अपने टुच्चे दुखों को लेकर कैसे बैठे ?
मेरे मन में फिर वही लालसा उठती है कि वे सज्जन प्रापर्टी समेत अपनी टैक्सों की बीमारी मुझे दे दें और मैं उससे मर जाऊँ। मगर वे मुझे यह चांस नहीं देंगे। न वे प्रापर्टी छोड़ेंगे, न बीमारी, और मुझे अंततः किसी ओछी बीमारी से ही मरना होगा।

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अपील का जादू (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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एक देश है! गणतंत्र है! समस्याओं को इस देश में झाड़-फूँक, टोना-टोटका से हल किया जाता है! गणतंत्र जब कुछ चरमराने लगता है, तो गुनिया बताते हैं कि राष्ट्रपति की बग्घी के कील-काँटे में कुछ गड़बड़ आ गई है। राष्ट्रपति की बग्घी की मरम्मत कर दी जाती है और गणतंत्र ठीक चलने लगता है। सारी समस्याएँ मुहावरों और अपीलों से सुलझ जाती हैं। सांप्रदायिकता की समस्या को इस नारे से हल कर लिया गया - हिंदू-मुस्लिम, भाई-भाई!

एक दिन कुछ लोग प्रधानमंत्री के पास यह शिकायत करने गए कि चीजों की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं। प्रधानमंत्री उस समय गाय के गोबर से कुछ प्रयोग कर रहे थे, वे स्वमूत्र और गाय के गोबर से देश की समस्याओं को हल करने में लगे थे। उन्होंने लोगों की बात सुनी, चिढ़कर कहा - आप लोगों को कीमतों की पड़ी है! देख नहीं रहे हो, मैं कितने बड़े काम में लगा हूँ। मैं गोबर में से नैतिक शक्ति पैदा कर रहा हूँ। जैसे गोबर गैस ‘वैसे गोबर नैतिकता’। इस नैतिकता के प्रकट होते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। तीस साल के कांग्रेसी शासन ने देश की नैतिकता खत्म कर दी है। एक मुँहफट आदमी ने कहा - इन तीस में से बाइस साल आप भी कांग्रेस के मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री रहे हैं, तो तीन-चौथाई नैतिकता तो आपने ही खत्म की होगी! प्रधान मंत्री ने गुस्से से कहा - बको मत, तुम कीमतें घटवाने आए हो न! मैं व्यापारियों से अपील कर दूँगा। एक ने कहा - साहब, कुछ प्रशासकीय कदम नहीं उठाएँगे? दूसरे ने कहा - साहब, कुछ अर्थशास्त्र के भी नियम होते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा - मेरा विश्वास न अर्थशास्त्र में है, न प्रशासकीय कार्यवाही में, यह गांधी का देश है, यहाँ हृदय परिवर्तन से काम होता है। मैं अपील से उनके दिलों में लोभ की जगह त्याग फिट कर दूँगा। मैं सर्जरी भी जानता हूँ। रेडियो से प्रधानमंत्री ने व्यापारियों से अपील कर दी - व्यापारियों को नैतिकता का पालन करना चाहिए। उन्हें अपने हृदय में मानवीयता को जगाना चाहिए। इस देश में बहुत गरीब लोग हैं। उन पर दया करनी चाहिए। अपील से जादू हो गया। दूसरे दिन शहर के बड़े बाजार में बड़े-बड़े बैनर लगे थे - व्यापारी नैतिकता का पालन करेंगे। मानवता हमारा सिद्धांत है। कीमतें एकदम घटा दी गई हैं। जगह-जगह व्यापारी नारे लगा रहे थे - नैतिकता! मानवीयता! वे इतने जोर से और आक्रामक ढंग से ये नारे लगा रहे थे कि लगता था, चिल्ला रहे हैं -हरामजादे! सूअर के बच्चे!

गल्ले की दुकान पर तख्ती लगी थी - गेहूँ सौ रुपए क्विंटल! ग्राहक ने आँखें मल, फिर पढ़ा। फिर आँखें मलीं फिर पढ़ा। वह आँखें मलता जाता। उसकी आँखें सूज गईं, तब उसे भरोसा हुआ कि यही लिखा है। उसने दुकानदार से कहा - क्या गेहूँ सौ रुपए क्विंटल कर दिया? परसों तक दो सौ रुपए था। सेठ ने कहा - हाँ, अब सौ रुपए के भाव देंगे। ग्राहक ने कहा - ऐसा गजब मत कीजिए। आपके बच्चे भूखे मर जाएँगे। सेठ ने कहा - चाहे जो हो जाए, मैं अपना और परिवार का बलिदान कर दूँगा, पर कीमत नहीं बढ़ाऊँगा। नैतिकता, मानवीयता का तकाजा है।

ग्राहक गिड़गिड़ाने लगा - सेठजी, मेरी लाज रख लो। दो सौ पर ही दो। मैं पत्नी से दो सौ के हिसाब से लेकर आया हूँ, सौ के भाव से ले जाऊँगा, तो वह समझेगी कि मैंने पैसे उड़ा दिए और गेहूँ चुरा कर लाया हूँ। सेठ ने कहा - मैं किसी भी तरह सौ से ऊपर नहीं बढ़ाऊँगा। लेना हो तो लो, वरना भूखों मरो। दूसरा ग्राहक आया। वह अक्खड़ था। उसने कहा - ऐ सेठ, यह क्या अंधेर मचा रखा है, भाव बढ़ाओ वरना ठीक कर दिए जाओगे। सेठ ने जवाब दिया - मैं धमकी से डरने वाला नहीं हूँ। तुम मुझे काट डालो; पर मैं भाव नहीं बढ़ाऊँगा। नैतिकता, मानवीयता भी कोई चीज है। एक गरीब आदमी झोला लिए दुकान के सामने खड़ा था। दुकानदार आया और उसे गले लगाने लगा। गरीब आदमी डर से चिल्लाया - अरे, मार डाला! बचाओ! बचाओ! सेठ ने कहा - तू इतना डरता क्यों है?

गरीब ने कहा - तुम मुझे दबोच जो रहे हो! मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? सेठ ने कहा - अरे भाई, मैं तो तुझसे प्यार कर रहा हूँ। प्रधान मंत्री ने मानवीयता की अपील की है न! एक दुकान पर ढेर सारे चाय के पैकेट रखे थे। दुकान के सामने लगी भीड़ चिल्ला रही थी - चाय को छिपाओ। हमें इतनी खुली चाय देखने की आदत नहीं है। हमारी आँखें खराब हो जाएँगी। उधर से सेठ चिल्लाया - मैं नैतिकता में विश्वास करता हूँ। चाय खुली बेचूँगा और सस्ती बेचूँगा। कालाबाजार बंद हो गया है।

एक मध्यमवर्गीय आदमी बाजार से निकला। एक दुकानदार ने उसका हाथ पकड़ लिया। उस आदमी ने कहा - सेठजी, इस तरह बाजार से बेइज्जत क्यों करते हो! मैंने कह तो दिया कि दस तारीख को आपकी उधारी चुका दूँगा। सेठ ने कहा - अरे भैया, पैसे कौन माँगता है? जब मर्जी हो, दे देना। चलो, दुकान पर चलो। कुछ शक्कर लेते जाओ। दो रुपए किलो।

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अफसर कवि (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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एक कवि थे। वे राज्य सरकार के अफसर भी थे। अफसर जब छुट्‌टी पर चला जाता, तब वे कवि हो जाते और जब कवि छुट्‌टी पर चला जाता, तब वे अफसर हो जाते।

एक बार पुलिस की गोली चली और दस-बारह लोग मारे गए। उनके भीतर का अफसर तब छुट्‌टी पर चला गया और कवि इस कांड से क्षुब्ध हुआ। उन्होंने एक कविता लिखी और छपवाई। कविता में इस कांड की और मुख्यमंत्री की निंदा की।

किसी ने मुख्यमंत्री को यह कविता पढ़ा दी। अफसर तब तक छुट्‌टी से लौटकर आ गया। उसे मालूम हुआ तो वह घबड़ाया और उसने कवि को छुट्‌टी पर भेज दिया।

अफसर कवि ने एक प्रभावशाली नेता को पकड़ा। कहा- मुझे मुख्यमंत्री जी के पास ले चलिए। उनसे क्षमा दिला दीजिए। नेता उन्हें मुख्यमंत्री के पास ले गए। उन्होंने परिचय दिया ही था कि कवि ने मुख्यमंत्री के चरणों पर सिर रख दिया।
मुख्यमंत्री ने कहा- यह वह कवि नहीं हो सकते जिन्होंने वह कविता लिखी है।

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अयोध्या में खाता-बही (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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पोथी में लिखा है – जिस दिन राम, रावण को परास्त करके अयोध्या आए, सारा नगर दीपों से जगमगा उठा। यह दीपावली पर्व अनन्तकाल तक मनाया जाएगा। पर इसी पर्व पर व्यापारी बही-खाता बदलते हैं और खाता-बही लाल कपड़े में बांधी जाती है।

प्रश्न है – राम के अयोध्या आगमन से खाता-बही बदलने का क्या सम्बन्ध? और खाता-बही लाल कपड़े में ही क्यों बांधी जाती है?

बात यह हुई कि जब राम के आने का समाचार आया तो व्यापारी वर्ग में खलबली मच गई। वे कहने लगे – “सेठ जी, अब बड़ी आफत है। भरत के राज में तो पोल चल गई। पर राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। वे टैक्स की चोरी बर्दाश्त नहीं करेंगे। वे अपने खाता-बही की जांच करेंगे। और अपने को सजा होगी।”
एक व्यापारी ने कहा, “भैया, अपना तो नम्बर दो का मामला भी पकड़ लिया जाएगा।”
अयोध्या के नर-नारी तो राम के स्वागत की तैयारी कर रहे थे, मगर व्यापारी वर्ग घबरा रहा था।

अयोध्या पहुंचने के पहले ही राम को मालूम हो गया था कि उधर बड़ी पोल है। उन्होंने हनुमान को बुलाकर कहा – सुनो पवनसुत, युद्ध तो हम जीत गए लंका में, पर अयोध्या में हमें रावण से बड़े शत्रु का सामना करना पड़ेगा – वह है, व्यापारी वर्ग का भ्रष्टाचार। बड़े-बड़े वीर व्यापारी के सामने परास्त हो जाते हैं। तुम अतुलित बल – बुद्धि निधान हो। मैं तुम्हें इनफोर्समेंट ब्रांच का डायरेक्टर नियुक्त करता हूं। तुम अयोध्या पहुंचकर व्यापारियों की खाता-बहियों की जांच करो और झूठे हिसाब पकड़ो। सख्त से सख्त सजा दो।

इधर व्यापारियों में हड़कंप मच गया। कहने लगे – अरे भैया, अब तो मरे। हनुमान जी इनफोर्समेंट ब्रांच के डायरेक्टर नियुक्त हो गए। बड़े कठोर आदमी हैं। शादी-ब्याह नहीं किया। न बाल, न बच्चे। घूस भी नहीं चलेगी।

व्यापारियों के कानूनी सलाहकार बैठकर विचार करने लगे। उन्होंने तय किया कि खाता-बही बदल देना चाहिए। सारे राज्य में 'चेंबर ऑफ़ कामर्स' की तरफ से आदेश चला गया कि ऐन दीपोत्सव पर खाता-बही बदल दिए जाएं।
फिर भी व्यापारी वर्ग निश्चिन्त नहीं हुआ। हनुमान को धोखा देना आसान बात नहीं थी। वे अलौकिक बुद्धि संपन्न थे। उन्हें खुश कैसे किया जाए ? चर्चा चल पड़ी :
– कुछ मुट्ठी गरम करने से काम नहीं चलेगा?
– वे एक पैसा नहीं लेते।
– वे न लें, पर मेम साब?
– उनकी मेम साब ही नहीं हैं। साहब ने ‘मैरिज ‘ नहीं की। जवानी लड़ाई में काट दी।
-कुछ और शौक तो होंगे ? दारु और बाकी सब कुछ ?
– वे बाल ब्रह्मचारी हैं। काल गर्ल को मारकर भगा देंगे। कोई नशा नहीं करते। संयमी आदमी हैं।
– तो क्या करें ?
– तुम्हीं बताओ, क्या करें ?

किसी सयाने वकील ने सलाह दी – देखो, जो जितना बड़ा होता है वह उतना ही चापलूसी पसंद होता है। हनुमान की कोई माया नहीं है। वे सिन्दूर शरीर पर लपेटते हैं और लाल लंगोट पहनते हैं। वे सर्वहारा हैं और सर्वहारा के नेता। उन्हें खुश करना आसान है। व्यापारी खाता-बही लाल कपड़ों में बांध कर रखें। रातों-रात खाते बदले गए और खाता-बहियों को लाल कपड़े में लपेट दिया गया।
अयोध्या जगमगा उठी। राम-सीता-लक्ष्मण की आरती उतारी गई। व्यापारी वर्ग ने भी खुलकर स्वागत किया। वे हनुमान को घेरे हुए उनकी जय भी बोलते रहे।
दूसरे दिन हनुमान कुछ दरोगाओं को लेकर अयोध्या के बाज़ार में निकल पड़े।
पहले व्यापारी के पास गए। बोले, खाता-बही निकालो। जांच होगी।
व्यापारी ने लाल बस्ता निकालकर आगे रख दिया। हनुमान ने देखा – लंगोट का और बस्ते का कपड़ा एक है। खुश हुए,
बोले – मेरे लंगोट के कपड़े में खता-बही बांधते हो?
व्यापारी ने कहा – हां, बल-बुद्धि निधान, हम आपके भक्त हैं। आपकी पूजा करते हैं। आपके निशान को अपना निशान मानते हैं।
हनुमान गद्गद हो गए।
व्यापारी ने कहा – बस्ता खोलूं। हिसाब की जांच कर लीजिए।
हनुमान ने कहा – रहने दो। मेरा भक्त बेईमान नहीं हो सकता।
हनुमान जहां भी जाते, लाल लंगोट के कपडे में बंधे खाता-बही देखते। वे बहुत खुश हुए। उन्होंने किसी हिसाब की जांच नहीं की।
रामचंद्र को रिपोर्ट दी कि अयोध्या के व्यापारी बड़े ईमानदार हैं। उनके हिसाब बिलकुल ठीक हैं।
हनुमान विश्व के प्रथम साम्यवादी थे। वे सर्वहारा के नेता थे। उन्हीं का लाल रंग आज के साम्यवादियों ने लिया है।
पर सर्वहारा के नेता को सावधान रहना चाहिए कि उसके लंगोट से बुर्जुआ अपने खाता-बही न बांध लें।


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अश्लील (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।

उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा - आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।

दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा - किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।

किताब कोई लाया नहीं था।

एक ने कहा - कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।

दूसरे ने कहा - अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।

उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।

तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।

एक ने कहा - अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।

दूसरे ने कहा - अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊँगा।

तीसरे ने कहा - भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी।

चौथे ने कहा - अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।

अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।

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असहमत (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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यह सिर्फ़ दो आदमियों की बातचीत है -
“भारतीय सेना लाहौर की तरफ़ बढ़ गई- अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार करके।”
“हाँ, सुना तो। छम्ब में पाकिस्तानी सेना को रोकने के लिए यह ज़रुरी है।” “खाक ज़रूरी है! जहाँ वे लड़ें, वहां लड़ना चाहिए या हर कहीं घुसना चाहिए?”
“हाँ उधर नहीं बढ़ना था।” “मगर मैं कहता हूँ क्यों नहीं बढ़ना था? उधर से दबाव पड़ेगा तो इधर तुम्हारे बाप रोक सकते हैं उन्हें?”“फिर तो उधर बढ़ना ही ठीक हुआ।”
“ठीक हुआ! ठीक हुआ! कुछ समझते भी हो इसका क्या मतलब होता है? इसका मतलब होता है – टोटल वार! पूर्ण युद्ध! हमला!”
“हाँ जी, यह तो हमला जैसा ही हो गया।”
“मगर मैं कहता हूँ, जो इसे हमला कहता है, वह बेवक़ूफ़ है। हम तो हमले का मुक़ाबला करने के लिए बढे हैं।” “इस दृष्टि से तो हमारा बढ़ना सुरक्षात्मक कार्रवाई हुआ।”
“मगर सुरक्षात्मक कार्रवाई कहकर तुम दुनिया की नज़रों में धूल नहीं झोंक सकते जो हुआ है, वह सबको दिख रहा है।”
“हाँ, विल्सन ने तो ऐसा कुछ कहा भी है।”
“तुम विल्सन के कहने की परवाह क्यों करते हो? जो तुम्हें सही दिखे, करो।” “बिलकुल ठीक है। जो देश के हित में हो, वही हमें करना चाहिए।”
“देशहित की बात करते हो! देशहित कोई समझता भी है? सिर्फ़ देशहित देखोगे या अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया का भी ख्याल रखोगे?” “ठीक कहते हो। आज की दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया देखना भी ज़रूरी है।”
“मगर मैं कहता हूँ, अंतर्राष्ट्रीय रुख ही देखते रहोगे या देश के भले की भी कुछ सोचोगे? अंतर्राष्ट्रीयता की धुन में ही तो तुम लोगों ने देश को गर्त में डाल रखा है।”

इस बातचीत में जो लगातार सहमत होने की कोशिश करता रहा, वह मैं हूँ। मैं उससे बहस नहीं करता, मतभेद ज़ाहिर नहीं करता, सिर्फ़ सहमत होना चाहता हूँ। पर वह सहमत होने नहीं देता। वह कभी किसी को सहमत नहीं होने देता। अगर कोई सहमत होने लगता है तो वह झट से असहमति पर पहुँच जाता है। सहमति से भी वह नाराज़ होता है और असहमति से भी। पर असहमति का विस्फोट बड़ा भयंकर होता है। इसलिए मैं सहमत होते-होते निकल जाता हूँ, जैसे आंधी आने पर आदमी ज़मीन पर लेट जाये। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैं कुछ नहीं बोला। दूसरी तरफ़ देखने लगा। वह खिसियाया- कैसे बेवक़ूफ़ से पाला पड़ा है! खीजा-कैसे बेईमान लोग हैं। क्रोधित हुआ- सबको देखूँगा! तना- मैं किसी की परवाह नहीं करता! ढीला हुआ- कैसा दुर्भाग्य है! दुखी हुआ-ऐसों की चलती है, मेरी नहीं चलती, मन में फिर तनाव आया। वह अँगुलियों के कटाव गिनता हुआ जल्दी-जल्दी चला गया।

सारी दुनिया ग़लत है। सिर्फ़ मैं सही हूँ, यह अहसास बहुत दुःख देता है। इस अहसास में आगे की अपेक्षा होती है कि मुझे सही होने का श्रेय मिले, मान्यता मिले, क़ीमत भी मिले। दुनिया को इतनी फ़ुर्सत होती नहीं है कि वह किसी कोने में बैठे उस आदमी को मान्यता देती जाए जो सिर्फ़ अपने को हमेशा सही मानता है। उसकी अवहेलना होती है।

अब सही आदमी क्या करे। वह सबसे नफ़रत करता है। खीजा रहता है। दुःख भरे तनाव में दिन गुज़ारता है। इसकी दुनिया से इसी तरह की लड़ाई है। पर वह मुझसे ही क्यों उलझता है? हर बार मुझे ही ग़लत क्यों सिद्ध करता है? बात यह है कि पूरी दुनिया से एक साथ लड़ा नहीं जा सकता। दुनिया के हज़ारों मोर्चे हैं और करोड़ों लड़ने वाले हैं। मगर दो देशों की लड़ाई में पूरे देश आपस में नहीं लड़ते। सिपाही से सिपाही लड़ता है। लड़ने के मुआमले में सिपाही देश का प्रतिनिधि होता है। उन कुछ लोगों को, जिनसे उसकी अक्सर भेंट होती है, उसने दुनिया का प्रतिनिधि मान लिया है। इनमें भी सबसे ज़्यादा मुलाक़ात मुझसे होती है, इसलिए इन कुछ का प्रतिनिधि मैं हुआ। इस तरह दुनिया का प्रतिनिधि मैं बन गया। मुझे ग़लत बताता है तो दुनिया ग़लत होती है। मुझे गाली देता है तो दुनिया को गाली लगती है। मुझ पर नाराज़ होता है तो दुनिया पर नाराज़गी ज़ाहिर होती है। मैं दबता हूँ तो दुनिया को दबा देने का सुख उसे मिलता है। सारी दुनिया की तरफ़ से इस मोर्चे पर मैं खड़ा हूँ और पिट रहा हूँ। वह मुझसे नफ़रत करता है। मगर मुझे ढूँढता है। कुछ दिन नहीं मिलूँ, तो वह परेशान होता है। जिससे नफ़रत है, उससे मिलने की इतनी ललक प्रेम-सम्बन्ध में भी नहीं होती। मुझसे मिलकर मुझे ग़लत बता कर, मुझ पर खीजकर और मुझे दबाकर जो सुख उसे मिलता है, उसके लिए वह मुझे तलाशता है। विश्व-विजय के गौरव और संतोष के लिए योद्धा दुनिया भर की खाक छानते थे। वह कुल चार-पांच मील सड़कों पर मुझे खोजता है तो दुनिया को जीतने के लिए कोई ज़्यादा नहीं चलता।

अगर सारी दुनिया ग़लत और वह सही है तो मैं ग़लत हूँ और वह सही है। मैं पहले उससे असहमत भी हो जाता था। तब वह भयंकर रूप से फूट पड़ता था। उसे ग़लत माने जाने पर गुस्सा आता था। वह लड़ बैठता था। गाली-गलौज पर आ जाता था। मैंने सहमत होने की नीति अपनाई। मैं सहमत होता हूँ तो वह सोचता है, यह कैसे हो सकता है कि मैं और दुनिया, दोनों ही सही हों। दुनिया सही हो ही नहीं सकती। वह झट से ठीक उलटी बात कहकर असहमत हो जाता है। तब वह एकमात्र सही आदमी और दुनिया ग़लत हो जाती है। मैं फिर सहमत हो जाता हूँ तो वह फिर उस बात पर आ जाता है जिसे वह खुद काट चुका है।

“बहुत भ्रष्टाचार फैला है।” “हाँ, बहुत फैला है।”
“लोग हल्ला ज़्यादा मचाते हैं। इतना भ्रष्टाचार नहीं है। यहाँ तो सब सियार हैं। एक ने कहा, भ्रष्टाचार! तो सब कोरस में चिल्लाने लगे भ्रष्टाचार!”
“मुझे भी लगता है, लोग भ्रष्टाचार का हल्ला ज़्यादा उड़ाते हैं।” ” मगर बिना कारण लोग हल्ला नहीं मचाएँगे जी? होगा तभी तो हल्ला करते हैं। लोग पागल थोड़े ही हैं।”
“हाँ, सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट तो हैं।” “सरकारी कर्मचारी को क्यों दोष देते हो? उन्हें तो हम-तुम ही भ्रष्ट करते हैं।”
“हाँ, जनता खुद घूस देती है तो वे लेते हैं।” “जनता क्या ज़बरदस्ती उनके गले में नोट ठूंसती है? वे भ्रष्ट न हों तो जनता क्यों दे?”

कोई घटना होती है तो वह उसके बारे में एक दृष्टिकोण बना लेता है और उससे उसका उल्टा दृष्टिकोण पहले ही मन में हमारे ऊपर मढ़ देता है। फिर वह हमसे उस आरोपित दृष्टिकोण के लिए नफ़रत करता है। नफ़रत इतनी इकट्ठी हो जाती है कि वह उस घटना के लिए ज़िम्मेदार भी हमें मान लेता है। चीन ने भारत को तीन दिन का अल्टीमेटम दिया तो उसे लगा, जैसे अल्टीमेटम हमने दिया हो। बस्तर में आदिवासियों पर गोली हमने ही चलायी। रोडेशिया में गोरी तानाशाही क़ायम हो गई तो, उसे लगा, जैसे हमने ही इयान स्मिथ की सरकार बनवा दी हो। वियतनाम पर अमेरिकी बमबारी फिर शुरू हो गई तो उसने मान लिया कि हमने ही बम-वर्षा का हुक्म दिया है। कुछ दिन वह ख़ूब भन्नाता रहा। मिला नहीं। एक दिन वह मिल गया। ऐसे मिला, जैसे युद्ध-अपराधियों से मिल रहा हो। मिलते ही फूट पड़ा- “तुम्हारे अमेरिका ने फिर बम बरसाना शुरू कर दिया है।” उसने हमें ऐसे देखा, जैसे पुलिस हत्यारे को देखती है।

हमने कहा, “यह बहुत बुरा किया। इससे क्रांति की आशा फिर नष्ट हो गई।” वह एक क्षण को सहम गया। वह कई दिनों से हमें बमबारी का समर्थक मानकर हमसे नफ़रत कर रहा था। मगर हम तो बमबारी की निंदा कर रहे थे। अब वह क्या रुख अपनाये! उसे सँभालने में ज़्यादा देर नहीं लगी। खीजकर बोला, “शांति? व्हाट डू यू मीन बाई शांति? यह शब्द झूठा है। सब साले शांति की बात करते हैं और लड़ाई की तैयारी करते हैं!”

हम चुप। उसे संतोष नहीं हुआ। उसने साफ़ रुख अपना लिया, “कह दिया, बुरा किया क्या बुरा किया? उत्तर से दक्षिण में फ़ौज आती हैं, चीनी हथियार आते हैं। उसके ठिकानों पर बम गिराए बिना कैसे काम चलिएगा?” “इस दृष्टि से तो बमबारी ठीक मालूम होती है।”
“क्यों ठीक है? नागरिक क्षेत्रों पर बम बरसाना ठीक है, यह कहते शर्म आनी चाहिए!”
“हाँ, नागरिक क्षेत्र पर अलबत्ता बम नहीं गिरना चाहिए।”
“मैं कहता हूँ, कहीं भी क्यों गिराना चाहिए? अमेरिका को क्या हक़ है इधर आने का? यह उसके राज्य का हिस्सा नहीं है।” “ठीक कहते हो। एशिया में अमेरिका को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।”

“मगर बहुत से बेवक़ूफ़ इस नारे को बिना समझे लगाते हैं। वे भूल जाते हैं कि इधर चीन बैठा है जो सबको निगल जाएगा।” हम चुप हो गए। वह कुछ भुनभुनाता रहा। फिर झटके से उठा और अँगुलियों के कटाव गिनता हुआ फुर्ती से चला गया।

गोरे और सुडौल इस जवान के कपाल पर तीन रेखाएँ खिंची रहती हैं। हमेशा तनाव में रहता है। नौकरी उसकी साधारण है। एक कॉलेज में पढ़ाता है। कॉलेज से नफ़रत करता है। लौटता है तो जैसे पाप करके लौट रहा हो। प्रिंसिपल से, साथियों से, विद्यार्थियों से नफ़रत करता है। बगीचे में खिले फूलों से भी उसे नफ़रत है। मकानमालिक से इसलिए नाराज़ है कि मकान उसका है। नगरपालिका से सड़क के लिए नाराज़ है। नाले से मच्छरों के लिए नाराज़ है। दुनिया से क्यों नाराज़ है, यह ठीक वही जानता होगा। मैं अंदाज़ ही लगा सकता हूँ। शुरू में ही उसने दुनिया से कुछ ज़्यादा ही उम्मीद कर ली होगी। बहुत से नौजवान मौजूदा हालात के सन्दर्भ में महत्वाकांक्षा नहीं बनाते। वह अनुपात से ज़्यादा हो जाती है। बहुत से तो अपने पिता के ज़माने के सन्दर्भ में महत्वाकांक्षा बना लेते हैं – पिता के ज़माने में हर एम. ए. पास प्रोफ़ेसर हो जाता था, अब नहीं होता। मगर उस सन्दर्भ में जो एम.ए. होकर प्रोफ़ेसर बनने का तय कर लेता है, वह अक्सर निराश होता है। इस आदमी ने भी जवानी के शुरू में तय कर लिया होगा कि मुझे दुनिया से इतना मिलना चाहिए, यह मेरा हक़ है। इस हिसाब से कहीं वह गड़बड़ कर गया। उसने योग्यता के हिसाब से महत्वाकांक्षा नहीं बनाई। अपने मूल्य-निर्धारण में वह ज़्यादा ही उदार हो गया। उसने शुरू में ही विशिष्टता से अपने को मण्डित कर लिया। साधारण से विशिष्ट बनने की ज़रूरत उसने नहीं समझी। उसने मौजूदा ज़माने की स्पर्धा, पक्षपात और चतुरता को भी नज़रंदाज़ कर दिया। कॉलेज में पढ़ाना चाहता था तब इस घटिया कॉलेज में नौकरी मिली। उसने मान लिया कि दुनिया ने उसकी क़ीमत नहीं दी। उसके साथ अन्याय किया और सिर्फ़ उसी के साथ। वह आसपास आगे बढ़ते हुए तुच्छ लोगों की भीड़ देखता और सबसे नफ़रत करता है। उसका व्यक्तित्व टूटता है, वह उसे जैसे-तैसे समेटकर दुनिया के सामने चुनौती देकर खड़ा होता है। स्थायी असहमति उसका अपने आपको जोड़ने का प्रयत्न है। इससे वह विशिष्ट बने रहने की कोशिश करता है क्योंकि विशिष्ट हुए बिना वह जी नहीं सकता। एक बार ही मैंने उसे सहमत होते पाया है। उसने केन्द्रीय सरकार में किसी बड़ी नौकरी के लिए आवेदन किया था। वह उसे नहीं मिली। मुझे मिला तो मैंने पूछा।
उसने कहा, “नहीं मिली”

मैं डर रहा था कि कहीं इसने इसके लिए भी मुझे ही ज़िम्मेदार न मान लिया हो। पर उसकी आँखों में ऐसा आरोप-भाव नहीं था। मेरी हिम्मत बढ़ी। मैंने कहा, “आजकल पक्षपात बहुत चलता है।” वह सहमत हो गया। बोला, “ठीक कहते हो। ऊपर के लोग अपनों को अच्छी जगह फ़िट करते हैं।”
“और योग्य आदमियों की अवहेलना होती है।” “हाँ, और नालायक ऊँचे पदों पर बिठाये जाते है।”
“तभी तो सब जगह स्तर गिर रहा है।” “अरे भाई! स्तर तो कुछ रहा ही नहीं।” “पता नहीं, कब तक यह अंधेर चलेगा!”
“मैं भी यही सोचता हूँ कि आखिर ऐसा कब तक!”
सहमति के इस दुर्लभ क्षण को मैं बिगड़ने नहीं देना चाहता था। इसलिए इससे पहले कि वह किसी बात पर असहमत हो उठे, मैं चल दिया। वही भी मुड़ा। मगर वह अँगुलियों के कटाव नहीं गिन रहा था।

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आध्यात्मिक पागलों का मिशन (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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भारत के सामने अब एक बड़ा सवाल है - अमेरिका को अब क्या भेजे? कामशास्त्र वे पढ़ चुके, योगी भी देख चुके। संत देख चुके। साधु देख चुके। गाँजा और चरस वहाँ के लड़के पी चुके। भारतीय कोबरा देख लिया। गिर का सिंह देख लिया। जनपथ पर 'प्राचीन' मूर्तियाँ भी खरीद लीं। अध्यात्म का आयात भी अमेरिका काफी कर चुका और बदले में गेहूँ भी दे रहा है। हरे कृष्ण, हरे राम भी बहुत हो गया।

महेश योगी, बाल योगेश्वर, बाल भोगेश्वर आदि के बाद अब क्या हो? मैं देश-भक्त आदमी हूँ। मगर मैं अमेरिकी पीढ़ी को भी जानता हूँ। मैं जानता हूँ, वह 'बोर' समाज का आदमी हैं - याने बड़ा बोर आदमी। शेयर अपने आप डॉलर दे जाते हैं। घर में टेलीविजन है, दारू की बोतलें हैं। शाम को वह दस-पंद्रह आदमियों से 'हाउ डु यू डू' कर लेता है। पर इससे बोरियत नहीं मिटती। हनोई पर कितनी भी बम-वर्षा अमेरिका करे, उत्तेजना नहीं होती। कुछ चाहिए उसे। उसे भारत से ही चाहिए।

मुझे चिंता जितनी बड़ी अमेरिका की है उतनी ही भारतीय भाइयों की। इन्हें भी कुछ चाहिए।

अब हम भारतीय भाई वहाँ डॉलर और यहाँ रुपयों के लिए क्या ले जाएँ? रविशंकर से वे बोर हो चुके। योगी, संत वगैरह भी काफी हो चुके। अब उन्हें कुछ नया चाहिए - बोरियत खत्म करने और उत्तेजना के लिए। डॉलर देने को वे तैयार हैं।

मेरा विनम्र सुझाव है कि इस बार हम भारत से 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' ले जाएँ। ऐसा मिशन आज तक नहीं गया। यह नायाब चीज होगी - भारत से 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' याने आध्यात्मिक पागलों का मिशन।

मैं जानता हूँ। आम अमेरिकी कहेगा - वी हेव सीन वन। हिज नेम इज कृष्ण मेनन। (हमने एक पागल देखा है। उसका नाम कृष्ण मेनन है।) तब हमारे एजेंट कहेंगे - वह 'डिवाइन' (आध्यात्मिक) नहीं था। और पागल भी नहीं था। इस वक्त सच्चे आध्यात्मिक पागल भारत से आ रहे हैं।

मैं जानता हूँ, आध्यात्मिक मिशनें 'स्मगलिंग' करती रहती हैं। पर भारत सरकार और आम भारतीयों को यह नहीं मालूम कि लोगों को 'स्वर्ग' में भी स्मगल किया जाता है।

यह अध्यात्म के डिपार्टमेंट से होता है। जिस महान देश भारत में गुजरात के एक गाँव में एक आदमी ने पवित्र जल बाँटकर गाँव उजाड़ दिया, वह क्या अमेरिकी को स्वर्ग में 'स्मगल' नहीं कर सकता?

तस्करी सामान की भी होती है - और आध्यात्मिक तस्करी भी होती है। कोई आदमी दाढ़ी बढ़ाकर एक चेले को लेकर अमेरिका जाए और कहे, ‘मेरी उम्र एक हजार साल है। मैं हजार सालों से हिमालय में तपस्या कर रहा था। ईश्वर से मेरी तीन बार बातचीत हो चुकी है।’ विश्वासी पर साथ ही शंकालु अमेरिकी चेले से पूछेगा - क्या तुम्हारे गुरु सच बोलते हैं? क्या इनकी उम्र सचमुच हजार साल है? तब चेला कहेगा, ‘मैं निश्चित नहीं कह सकता, क्योंकि मैं तो इनके साथ सिर्फ पाँच सौ सालों से हूँ।’

याने चेले पाँच सौ साल के वैसे ही हो गए और अपनी अलग कंपनी खोल सकते हैं। तो मैं भी सोचता हूँ कि सब भारतीय माल तो अमेरिका जा चुका - कामशास्त्र, अध्यात्म, योगी, साधु वगैरह।

अब एक ही चीज हम अमेरिका भेज सकते हैं - वह है भारतीय आध्यात्मिक पागल - इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक। इसलिए मेरा सुझाव है कि 'इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' की स्थापना जल्दी ही होनी चाहिए। यों मेरे से बड़े-बड़े लोग इस देश में हैं। पर मैं भी भारत की सेवा के लिए और बड़े अमेरिकी भाई की बोरियत कम करने के लिए कुछ सेवा करना चाहता हूँ। यों मैं जानता हूँ कि हजारों सालों से 'हरे राम हरे कृष्ण' का जप करने के बाद भी शक्कर सहकारी दुकान से न मिलकर ब्लैक से मिलती है - तो कुछ दिन इन अमरीकियों को राम-कृष्ण का भजन करने से क्या मिल जाएगा? फिर भी संपन्न और पतनशील समाज के आदमी के अपने शांति और राहत के तरीके होते हैं - और अगर वे भारत से मिलते हैं, तो भारत का गौरव ही बढ़ता है। यों बरट्रेंड रसेल ने कहा है - अमेरिकी समाज वह समाज है जो बर्बरता से एकदम पतन पर पहुँच गया है - वह सभ्यता की स्टेज से गुजरा ही नहीं। एक स्टेप गोल कर गया। मुझे रसेल से भी क्या मतलब? मैं तो नया अंतरराष्ट्रीय धंधा चालू करना चाहता हूँ - 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन'। दुनिया के पगले शुद्ध पगले होते हैं - भारत के पगले आध्यात्मिक होते हैं।

मैं 'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' बनाना चाहता हूँ। इसके सदस्य वही लोग हो सकते हैं, जो पागलखाने में न रहे हों। हमें पागलखाने के बाहर के पागल चाहिए याने वे जो सही पागल का अभिनय कर सकें। योगी का अभिनय करना आसान है। ईश्वर का अभिनय करना भी आसान है। मगर पागल का अभिनय करना बड़ा ही कठिन है। मैं योग्य लोगों की तलाश में हूँ। दो-एक प्रोफेसर मित्र मेरी नजर में हैं जिनसे मैं मिशन में शामिल होने की अपील कर रहा हूँ।

मिशन बनेगा और जरूर बनेगा। अमेरिका में हमारी एजेंसी प्रचार करेगी - सी रीयल इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स (सच्चे भारतीय आध्यात्मिक पागलों को देखो।) हम लोगों के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर उतरने की खबर अखबारों में छपेगी। टेलीविजन तैयार रहेगा।

मिसेज राबर्ट, मिसेज सिंपसन से पूछेगी, ‘तुमने क्या सच्चा आध्यात्मिक भारतीय पागल देखा है?’ मिसेज सिंपसन कहेगी, ‘नो, इज देअर वन इन दिस कंट्री, 'अंडर गाड'?’ मिसेज राबर्ट कहेगी, ‘हाँ, कल ही भारतीय आध्यात्मिक पागलों का एक मिशन न्यूयार्क आ रहा है। चलो हम लोग देखेंगे : इट विल बी ए रीअल स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस। (वह एक विरल आध्यात्मिक अनुभव होगा।)’

न्यूयार्क हवाई अड्डे पर हमारे भारतीय पागल आध्यात्मिक मिशन के दर्शन के लिए हजारों स्त्री-पुरुष होंगे - उन्हें जीवन की रोज ही बोरियत से राहत मिलेगी। हमारा स्वागत होगा। मालाएँ पहनाई जाएँगी। हमारे ठहराने का बढ़िया इंतजाम होगा।

और तब हम लोग पागल अध्यात्म का प्रोग्राम देंगे। हर गैरपागल पहले से शिक्षित होगा कि वह सच्चे पागल की तरह कैसे नाटक करे। प्रवेश-फीस 50 डॉलर होगी और हजारों अमेरिकी हजारों डॉलर खर्च करके 'इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स' के दर्शन करने आएँगे।

हमारा धंधा खूब चलेगा। मैं मिशन का अध्यक्ष होने के नाते भाषण दूँगा, ‘वी आर रीअल इंडियन डिवाइन ल्यूनेटिक्स। अवर ऋषीज एंड मुनीज थाउज़ेंड ईअर्स एगो सेड दैट दि वे टु रीअल इंटरनल पीस एंड साल्वेजन लाइज थ्रू ल्यूनेसी।’ (हम लोग भारतीय आध्यात्मिक पागल हैं। हमारे ऋषि–मुनियों ने हजारों साल पहले कहा था कि आंतरिक शांति और मुक्ति पागलपन से आती है।)

इसके बाद मेरे साथी तरह-तरह के पागलपन के करतब करेंगे और डॉलर बरसेंगे।

जिन लोगों को इस मिशन में शामिल होना है, वे मुझसे संपर्क करें। शर्त यह है कि वे वास्तविक पागल नहीं होने चाहिए। वास्तविक पागलों को इस मिशन में शामिल नहीं किया जाएगा - जैसे सच्चे साधुओं को साधुओं की जमात में शामिल नहीं किया जाता।

अमेरिका से लौटने पर, दिल्ली में रामलीला ग्राउंड या लाल किले के मैदान में हमारा शानदार स्वागत होगा। मैं कोशिश करूँगा कि प्रधानमंत्री इसका उद्‌घाटन करें।

वे समय न निकाल सकीं तो कई राजनैतिक वनवास में तपस्या करते नेता हमें मिल जाएँगे। दिल्ली के 'स्मगलर' हमारा पूरा साथ देंगे। कस्टम और एनफोर्स महकमे से भी हमारी बातचीत चल रही है। आशा है वे भी अध्यात्म में सहयोग देंगे।

स्वागत समारोह में कहा जाएगा, ‘यह भारतीय अध्यात्म की एक और विजय है, जब हमारे आध्यात्मिक पगले विश्व को शांति और मोक्ष का संदेश देकर आ रहे हैं। आशा है आध्यात्मिक पागलपन की यह परंपरा देश में हमेशा विकसित होती रहेगी।’

'डिवाइन ल्यूनेटिक मिशन' को जरूर अमेरिका जाना चाहिए। जब हमारे और उनके राजनैतिक संबंध सुधर रहे हैं तो पागलों का मिशन जाना बहुत जरूरी है।

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आवारा भीड़ के खतरे (व्यंग्य)- हरिशंकर परसाई

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एक अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया - पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर काँच के केस में सुंदर साड़ी से सजी एक सुंदर मॉडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच टूट गया। आसपास के लोगों ने पूछा कि तुमने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया - हरामजादी बहुत खूबसूरत है।

हम 4-5 लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ये सवाल दुनिया भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं - पश्चिम से संपन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी। अमेरिका से आवारा हिप्पी और ‘हरे राम और हरे कृष्ण’ गाते अपनी व्यवस्था से असंतुष्ट युवा भारत आते हैं और भारत का युवा लालायित रहता है कि चाहे चपरासी का नाम मिले, अमेरिका में रहूँ। ‘स्टेट्स’ जाना यानि चौबीस घंटे गंगा नहाना है। ये अपवाद हैं। भीड़-की-भीड़ उन युवकों की है जो हताश, बेकार और क्रुद्ध हैं। संपन्न पश्चिम के युवकों के व्यवहार के कारण भिन्न हैं। सवाल है -उस युवक ने सुंदर मॉडल पर पत्थर क्यों फेंका? हरामजादी बहुत खूबसूरत है - यह उस गुस्से का कारण क्यों? वाह, कितनी सुंदर है - ऐसा इस तरह के युवक क्यों नहीं कहते?

युवक साधारण कुरता पाजामा पहिने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त। शिक्षित था। बेकार था। नौकरी के लिए भटकता रहा था। धंधा कोई नहीं। घर की हालत खराब। घर में अपमान, बाहर अवहेलना। वह आत्म ग्लानि से क्षुब्ध। घुटन और गुस्सा एक नकारात्क भावना। सबसे शिकायत। ऐसी मानसिकता में सुंदरता देखकर चिढ़ होती है। खिले फूल बुरे लगते हैं। किसी के अच्छे घर से घृणा होती है। सुंदर कार पर थूकने का मन होता है। मीठा गाना सुनकर तकलीफ होती है। अच्छे कपड़े पहिने खुशहाल साथियों से विरक्ति होती है। जिस भी चीज से, खुशी, सुंदरता, संपन्नता, सफलता, प्रतिष्ठा का बोध होता है, उस पर गुस्सा आता है।

बूढ़े-सयाने स्कूल का लड़का अब मिडिल स्कूल में होता है तभी से शिकायत होने लगती है। वे कहते हैं - ये लड़के कैसे हो गए? हमारे जमाने में ऐसा नहीं था। हम पिता, गुरु, समाज के आदरणीयों की बात सिर झुकाकर मानते थे। अब ये लड़के बहस करते हैं। किसी को नहीं मानते। मैं याद करता हूँ कि जब मैं छात्र था, तब मुझे पिता की बात गलत तो लगती थी, पर मैं प्रतिवाद नहीं करता था। गुरु का भी प्रतिवाद नहीं करता था। समाज के नेताओं का भी नहीं। मगर तब हम छात्रों को जो किशोरावस्था में थे, जानकारी ही क्या थी? हमारे कस्बे में कुल दस-बारह अखबार आते थे। रेडियो नहीं। स्वतंत्रता संग्राम का जमाना था। सब नेता हमारे हीरो थे - स्थानीय भी और जवाहर लाल नेहरू भी। हम पिता, गुरु, समाज के नेता आदि की कमजोरियाँ नहीं जानते थे। मुझे बाद में समझ में आया कि मेरे पिता कोयले के भट्टों पर काम करने वाले गोंडों का शोषण करते थे। पर अब मेरा ग्यारह साल का नाती पाँचवी कक्षा का छात्र है। वह सवेरे अखबार पढ़ता है, टेलीवीजन देखता है, रेडियो सुनता है। वह तमाम नेताओं की पोलें जानता है। देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला की आलोचना करता है। घर में उससे कुछ ऐसा करने को कहो तो वह प्रतिरोध करता है। मेरी बात भी तो सुनो। दिन भर पढ़कर आया हूँ। अब फिर कहते ही कि पढ़ने बैठ जाऊँ।

थोड़ी देर खेलूँगा तो पढ़ाई भी नहीं होगी। हमारी पुस्तक में लिखा है। वह जानता है घर में बड़े कब-कब झूठ बोलते हैं।

ऊँची पढ़ाईवाले विश्वविद्यालय के छात्र सवेरे अखबार पढ़ते हैं, तो तमाम राजनीति और समाज के नेताओं के भ्रष्टाचार, पतनशीलता के किस्से पढ़ते हैं। अखबार देश को चलानेवालों और समाज के नियामकों के छल, कपट, प्रपंच, दुराचार की खबरों से भरे रहते हैं। धर्माचार्यों की चरित्रहीनता उजागर होती है। यही नेता अपने हर भाषण हर उपदेश में छात्रों से कहते हैं - युवकों, तुम्हें देश का निर्माण करना है (क्योंकि हमने नाश कर दिया है) तुम्हें चरित्रवान बनना है (क्योंकि हम तो चरित्रहीन हैं) शिक्षा का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, नैतिक चरित्र को ग्रहण करना है - (हमने शिक्षा और अशिक्षा से पैसा कमाना और अनैतिक होना सीखा) इन नेताओं पर छात्रों-युवकों की आस्था कैसे जमे? छात्र अपने प्रोफेसरों के बारे सब जानते हैं। उनका ऊँचा वेतन लेना और पढ़ाना नहीं। उनकी गुटबंदी, एक-दूसरे की टाँग खींचना, नीच कृत्य, द्वेषवश छात्रों को फेल करना, पक्षपात, छात्रों का गुटबंदी में उपयोग। छात्रों से कुछ नहीं छिपा रहता अब। वे घरेलू मामले जानते हैं। ऐसे गुरुओं पर छात्र कैसे आस्था जमाएँ। ये गुरु कहते हैं छात्रों को क्रांति करना है। वे क्रांति करने लगे, तो पहले अपने गुरुओं को साफ करेंगे। अधिकतर छात्र अपने गुरु से नफरत करते हैं।

बड़े लड़के अपने पिता को भी जानते हैं। वे देखते हैं कि पिता का वेतन तो सात हजार है, पर घर का ठाठ आठ हजार रुपयों का है। मेरा बाप घूस खाता है। मुझे ईमानदारी के उपदेश देता है। हमारे समय के लड़के-लड़कियों के लिए सूचना और जानकारी के इतने माध्यम खुले हैं, कि वे सब क्षेत्रों में अपने बड़ों के बारे में सबकुछ जानते हैं। इसलिए युवाओं से ही नहीं बच्चों तक से पहले की तरह की अंध भक्ति और अंध आज्ञाकारिता की आशा नहीं की जा सकती। हमारे यहाँ ज्ञानी ने बहुत पहले कहा था - प्राप्तेषु षोडसे वर्षे पुत्र मित्र समाचरेत। उनसे बात की जा सकती है, उन्हें समझाया जा सकता है। कल परसों मेरा बारह साल का नाती बाहर खेल रहा था। उसकी परीक्षा हो चुकी है और एक लंबी छुट्टी है। उससे घर आने के लिए उसके चाचा ने दो-तीन बार कहा। डाँटा। वह आ गया और रोते हुए चिल्लाया हम क्या करें? ऐसी तैसी सरकार की जिसने छुट्टी कर दी। छुट्टी काटना उसकी समस्या है। वह कुछ तो करेगा ही। दबाओगे तो विद्रोह कर देगा। जब बच्चे का यह हाल है तो किशोरों और तरुणों की प्रतिक्रियाएँ क्या होंगी।

युवक-युवतियों के सामने आस्था का संकट है। सब बड़े उनके सामने नंगे हैं। आदर्शों, सिद्धांतों, नैतिकताओं की धज्जियाँ उड़ते वे देखते हैं। वे धूर्तता, अनैतिकता, बेईमानी, नीचता को अपने सामने सफल एवं सार्थक होते देखते हैं। मूल्यों का संकट भी उनके सामने है। सब तरफ मूल्यहीनता उन्हें दिखती है। बाजार से लेकर धर्मस्थल तक। वे किस पर आस्था जमाएँ और किस के पदचिह्नों पर चलें? किन मूल्यों को मानें?

यूरोप में दूसरे महायुद्ध के दौरान जो पीढ़ी पैदा हुई उसे ‘लास्ट जनरेशन’ (खोई हुई पीढ़ी) का कहा जाता है। युद्ध के दौरान अभाव, भुखमरी, शिक्षा चिकित्सा की ठीक व्यवस्था नहीं। युद्ध में सब बड़े लगे हैं, तो बच्चों की परवाह करनेवाले नहीं। बच्चों के बाप और बड़े भाई युद्ध में मारे गए। घर का, संपत्ति का, रोजगार का नाश हुआ। जीवन मूल्यों का नाश हुआ। ऐसे में बिना उचित शिक्षा, संस्कार, भोजन कपड़े के विनाश और मूल्यहीनता के बीज जो पीढ़ी बनकर जवान हुई, तो खोई हुई पीढ़ी इसके पास निराशा, अंधकार, असुरक्षा, अभाव, मूल्यहीनता के सिवाय कुछ नहीं था। विश्वास टूट गए थे। यह पीढ़ी निराश, विध्वंसवादी, अराजक, उपद्रवी, नकारवादी हुई। अंग्रेज लेखक जार्ज ओसबर्न ने इस क्रुद्ध पीढ़ी पर नाटक लिखा था जो बहुत पढ़ा गया और उस पर फिल्म भी बनी। नाटक का नाम ‘लुक बैक इन एंगर’। मगर यह सिलसिला यूरोप के फिर से व्यवस्थित और संपन्न होने पर भी चलता रहा। कुछ युवक समाज के ‘ड्राप आउट’ हुए। ‘वीट जनरेशन’ हुई। औद्योगीकरण के बाद यूरोप में काफी प्रतिशत बेकारी है। ब्रिटेन में अठारह प्रतिशत बेकारी है। अमेरिका ने युद्ध नहीं भोगा। मगर व्यवस्था से असंतोष वहाँ पैदा हो हुआ। अमेरिका में भी लगभग बीस प्रतिशत बेकारी है। वहाँ एक ओर बेकारी से पीड़ित युवक है, तो दूसरी ओर अतिशय संपन्नता से पीड़ित युवक भी। जैसे यूरोप में वैसे ही अमेरिकी युवकों, युवतियों का असंतोष, विद्रोह, नशेबाजी, यौन स्वच्छंदता और विध्वंसवादिता में प्रगट हुआ। जहाँ तक नशीली वस्तुओं के सेवन के सवाल है, यह पश्चिम में तो है ही, भारत में भी खूब है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यवेक्षण के अनुसार दो साल पहले सत्तावन फीसदी छात्र नशे के आदी बन गए थे। दिल्ली तो महानगर है। छोटे शहरों में, कस्बों में नशे आ गए हैं। किसी-किसी पान की दुकान में नशा हर जगह मिल जाता है। ‘स्मैक’ और ‘पॉट’ टॉफी की तरह उपलब्ध हैं।

छात्रों-युवकों को क्रांति की, सामाजिक परिवर्तन की शक्ति मानते हैं। सही मानते हैं। अगर छात्रों युवकों में विचार हो, दिशा हो संगठन हो और सकारात्मक उत्साह हो। वे अपने से ऊपर की पीढ़ी की बुराइयों को समझें तो उन्हीं बुराइयों के उत्तराधिकारी न बने, उनमें अपनी ओर से दूसरी बुराइयाँ मिलाकर पतन की परंपरा को आगे न बढ़ाएँ। सिर्फ आक्रोश तो आत्मक्षय करता है। एक हर्बर्ट मार्क्यूस चिंतक हो गए हैं, जो सदी के छठवें दशक में बहुत लोकप्रिय हो गए थे। वे ‘स्टूडेंट पावर’ में विश्वास करते थे। मानते हैं कि छात्र क्रांति कर सकते हैं। वैसे सही बात यह है कि अकेले छात्र क्रांति नहीं कर सकते। उन्हें समाज के दूसरे वर्गों को शिक्षित करके चेतनाशील बनाकर संघर्ष में साथ लाना होगा। लक्ष्य निर्धारित करना होगा। आखिर क्या बदलना है यह तो तय हो। अमेरिका में हर्बर्ट मार्क्यूस से प्रेरणा पाकर छात्रों ने नाटक ही किए। हो ची मिन्ह और चे गुएवारा के बड़े-बड़े चित्र लेकर जुलूस निकालना और भद्दी ,भौंड़ी, अश्लील हरकतें करना। अमेरिकी विश्विद्यालय की पत्रिकाओं में बेहद फूहड़ अश्लील चित्र और लेख कहानी। फ्रांस के छात्र अधिक गंभीर शिक्षित थे। राष्ट्रपति द गाल के समय छात्रों ने सोरोबोन विश्वविद्यायल में आंदोलन किया। लेखक ज्याँ पाल सार्त्र ने उनका समर्थन किया। उनका नेता कोहने बेंडी प्रबुद्ध और गंभीर युवक था। उनके लिए राजनैतिक क्रांति करना संभव नहीं था। फ्रांस के श्रमिक संगठनों ने उनका साथ नहीं दिया। पर उनकी माँगें ठोस थी जैसे शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन। अपने यहाँ जैसी नकल करने की छूट की क्रांतिकारी माँग उनकी नहीं थी। पाकिस्तान में भी एक छात्र नेता तारिक अली ने क्रांति की धूम मचाई। फिर वह लंदन चला गया।

युवकों का यह तर्क सही नहीं है कि जब सभी पतित हैं, तो हम क्यों नहीं हों। सब दलदल में फँसे हैं, तो जो नए लोग हैं, उन्हें उन लोगों को वहाँ से निकालना चाहिए। यह नहीं कि वे भी उसी दलदल में फँस जाएँ। दुनिया में जो क्रांतियाँ हुई हैं, सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उनमें युवकों की बड़ी भूमिका रही है। मगर जो पीढ़ी ऊपर की पीढ़ी की पतनशीलता अपना ले क्योंकि वह सुविधा की है और उसमें सुख है तो वह पीढ़ी कोई परिवर्तन नहीं कर सकती। ऐसे युवक हैं, जो क्रांतिकारिता का नाटक बहुत करते हैं, पर दहेज भरपूर ले लेते हैं। कारण बताते हैं - मैं तो दहेज को ठोकर मारता हूँ। पर पिताजी के सामने झुकना पड़ा। यदि युवकों के पास दिशा हो, संकल्पशीलता हो, संगठित संघर्ष हो तो वह परिवर्तन ला सकते हैं। पर मैं देख रहा हूँ एक नई पीढ़ी अपने से ऊपर की पीढ़ी से अधिक जड़ और दकियानूसी हो गई है। यह शायद हताशा से उत्पन्न भाग्यवाद के कारण हुआ है। अपने पिता से तत्ववादी, बुनियादपरस्त (फंडामेंटलिस्ट) लड़का है।

दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है। इसका प्रयोग महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारावाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया था। यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे। फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है।

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