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गोण्डा-पत्रकार पर फर्जी मुकदमा लिखे जाने से पत्रकारों में आक्रोश, मुख्यमन्त्री को सम्बोधित सौंपा ज्ञापन

 


गोण्डा। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मुजेहना में एक नवजात बच्चे को किसी अज्ञात जानवर द्वारा नोच कर खा जाने का प्रकरण प्रकाशित किये जाने के बाद चिकित्सा अधीक्षक द्वारा पहले धानेपुर थाने में करीब साठ स्वास्थ्य कर्मियों के साथ थाने में जा कर तीन महिलाओं से तहरीर दिलाई गयी थी। उसी तहरीर पर शासन प्रशासन के दबाव में अदद एक पत्रकार उमानाथ तिवारी पर हरिजन एक्ट, खेड़खानी सहित कई धाराओं में फर्जी मुकदमा दर्ज किया गया था। इसी को ले कर धानेपुर, बाबागंज इटियाथोक, मोतीगंज सहित सभी क्षेत्रों के पत्रकारो के साथ मुजेहना ब्लॉक के सरयू सभागार में बैठक आयोजित की गयी। बैठक में महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। इस दौरान पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को संबोधित 3 सूत्रीय ज्ञापन खंड विकास अधिकारी व थाना प्रभारी संजय कुमार गुप्ता को सौंपा गया है। दिए गए ज्ञापन में कहा गया है कि बीते 27-28 अगस्त 2022 को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मुजेहना में एक नवजात की किसी जानवर के नोचने से हुई मौत की खबर प्रकाशित करने के बदले पत्रकार उमानाथ तिवारी पर दर्ज फर्जी मुकदमे को वापस लिया जाए। दूसरी मांग हुई कि पूरे प्रकरण की न्यायिक जांच कराई जाए और दोषी पाए गए समस्त कर्मचारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। अंतिम मांग हुई कि वर्तमान सीएचसी अधीक्षक डॉ सुमन मिश्रा पिछले 8 वर्ष व उनके पति डॉ विवेक मिश्रा विगत 11 वर्षों से यहां तैनात है। तत्काल प्रभाव से इन दोनों चिकित्सकों को यहां से अन्य कहीं तबादला किया जाए। मांगे पूरी ना होने की दशा में सभी पत्रकार मिलकर आंदोलन को बाध्य होंगे। इस अवसर पर मुजेहना और इटियाथोक सहित आसपास क्षेत्र के दर्जनों पत्रकार मौके पर मौजूद रहे। पत्रकारों में भारी आक्रोश व्याप्त है।


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साइट्रिक एसिड उपयोग, फायदे और नुकसान

 
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साइट्रिक एसिड, सिट्रिक एसिड या टाटरी- इसका नाम तो आपने जरूर सुना होगा। खाने-पीने की चीजों में खट्टापन लाने के लिए एडिटिव्स के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन खट्टे फलों में विशेष रूप से नींबू और चकोतरा जैसे फलों में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला साइट्रिक एसिड एक कमजोर एसिड है जिससे इन फलों को इनका खट्टा स्वाद मिलता है। अगर आपने कभी नींबू को चखा हो तो इसका मतलब है कि आपको साइट्रिक एसिड का स्वाद पता है। 

खट्टे फलों में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले साइट्रिक एसिड को आर्टिफिशियल तरीके से मैन्यूफैक्चर भी किया जाता है और खाने-पीने की चीजों में खासकर प्रोसेस्ड फूड में इसका इस्तेमाल होता है। इसके अलावा क्लीनिंग एजेंट के तौर पर, दवाइयों में और पोषक तत्वों वाले सप्लिमेंट्स के तौर पर भी साइट्रिक इस्तेमाल किया जाता है। साइट्रिक एसिड युक्त दवाइयां किडनी में स्टोन जैसी सेहत की समस्याएं को दूर करने में मदद करती हैं। निम्नलिखित खट्टे फलों में प्राकृतिक रूप से उच्च मात्रा में साइट्रिक एसिड पाया जाता है:
  •     नींबू
  •     चकोतरा (लाइम)
  •     संतरा
  •     मौसंबी
  •     बेरीज
खट्टे फलों में प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला साइट्रिक एसिड आर्टिफिशयल या मैन्यूफैक्चर्ड साइट्रिक एसिड से अलग होता है। मैन्यूफैक्चर होने वाले साइट्रिक एसिड को टाटरी या नींबू का फूल भी कहा जाता है जो सफेद रंग का और बेहद दरदरा (चीनी से भी बारीक) कण वाला होता है। खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों को खट्टा स्वाद देने के लिए इसे पानी में मिलाकर डाला जाता है। 

आप सोच रहे होंगे कि आखिर नैचरल और मैन्यूफैक्चर्ड साइट्रिक एसिड में अंतर क्या है और इसका इस्तेमाल करना आपकी सेहत के लिए अच्छा है या बुरा। तो इस आर्टिकल में हम आपको बता रहे हैं कि साइट्रिक एसिड क्या है, इसका उपयोग कहां और कैसे होता है और यह सेहत के लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह।

साइट्रिक एसिड को साल 1784 में पहली बार स्वीडन के एक शोधकर्ता ने नींबू के रस से प्राप्त किया था। 1900 के दशक की शुरुआत तक इस गंधहीन और रंगहीन यौगिक साइट्रिक एसिड का उत्पादन नींबू के रस से होता था लेकिन उसके बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि यह काले रंग के मोल्ड (फफूंद), एस्परगिलस निइगर, से भी बनाया जा सकता है, जो चीनी का सेवन करने पर साइट्रिक एसिड बनाता है। 

इसके एसिडिक और खट्टे-स्वाद वाली प्रकृति के कारण, साइट्रिक एसिड मुख्य रूप से फ्लेवरिंग (स्वाद बढ़ाने वाले) और प्रिजर्विंग (लंबे समय तक संरक्षित रखने वाले) एजेंट के रूप में उपयोग किया जाता है- खासकर सॉफ्ट ड्रिंक और कैंडीज में। यह दवाओं को संरक्षित करने या मजबूत बनाने में भी इस्तेमाल होता है और वायरस या बैक्टीरिया के खिलाफ कीटाणुनाशक के रूप में भी उपयोग किया जाता है।

साइट्रिक एसिड का उपयोग -
खाने-पीने की चीजों में, दवाइयों में, व्यक्तिगत देखभाल के उत्पादों में और सफाई से जुड़े उत्पादों में इस्तेमाल होने वाला साइट्रिक एसिड कृत्रिम या मैन्यूफैक्चर्ड होता है। खाद्य और पेय पदार्थ इंडस्ट्री कृत्रिम साइट्रिक एसिड के अनुमानित 70% का उपयोग करती है, दवा और पूरक आहार 20% का उपयोग करते हैं और बाकी बचे 10% कृत्रिम साइट्रिक एसिड का इस्तेमाल सफाई और कीटाणुनाशक एजेंटों में किया जाता है। इस प्रकार के साइट्रिक एसिड का उपयोग निम्नलिखित चीजों में होता है:

साइट्रिक एसिड का उपयोग खाद्य पदार्थों में - 

साइट्रिक एसिड को अक्सर पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स में मिलाया जाता है क्योंकि यह डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक ताजा रखने में मदद करता है। 

अगर सेब को काटते ही उसका रंग भूरा होने लगे तो ऐसे होने से रोकने में भी साइट्रिक एसिड आपकी मदद कर सकता है यानी आप कटे हुए फलों का रंग खराब होने से रोकने में भी साइट्रिक एसिड का इस्तेमाल कर सकते हैं।

साइट्रिक एसिड खाद्य पदार्थों को गाढ़ा करने या उन्हें थोड़ा खट्टा स्वाद देने में मदद कर सकता है। यही कारण है कि आप साइट्रिक एसिड को कुछ आइसक्रीम, जूस, शरबत या सोडे में भी एक सामग्री के तौर पर देख सकते हैं। 

साइट्रिक एसिड का उपयोग दवाइयों में -

स्किन पर लगाने के लिए इस्तेमाल होने वाली कुछ क्रीम्स में भी साइट्रिक एसिड होता है जो त्वचा के संक्रमण को दूर करने में मदद करता है। अन्य साइट्रिक एसिड युक्त दवाइयां जिन्हें आप ओरली मुंह से लेते हैं, वे दवाइयां आपके यूरिन में एसिड की मात्रा को कम करने में मदद करती हैं। यह किडनी में स्टोने की समस्या को होने से रोकने में मदद कर सकता है। शरीर में मेटाबॉलिक एसिडोसिस (शरीर के अंदर एसिड का जमा होना) की समस्या को दूर करने के लिए भी साइट्रिक एसिड का इस्तेमाल कर सकते हैं।

साइट्रिक एसिड का उपयोग सप्लिमेंट के तौर पर - 

मैग्नीशियम और कैल्शियम जैसे मिनरल सप्लिमेंट में भी साइट्रिक एसिड हो सकता है- साइट्रेट के रूप में- क्योंकि यह अवशोषण को बढ़ाने में मदद करता है और किडनी स्टोन को भी होने से रोकता है।

साइट्रिक एसिड का उपयोग सफाई उत्पादों में - 
चूंकि साइट्रिक एसिड खारे पानी के दाग को साफ कर सकता है इसलिए आप अक्सर इसे बर्तन धोने वाले डिटर्जेंट में सामग्री के तौर पर जरूर देखेंगे। अन्य घरेलू सफाई उत्पादों में भी साइट्रिक एसिड अहम घटक के रूप में शामिल होता है क्योंकि यह दाग धब्बे और दुर्गंध को दूर करने में मदद करता है। इसके अलावा चूंकि साइट्रिक एसिड कुछ प्रकार के बैक्टीरिया और वायरस को भी मार सकता है, इसलिए आप इसे कीटाणुओं वाले स्प्रे में पाएंगे, ऐसे उत्पादों में भी पाएंगे जो फंगस आदि को मारता है और कई बार हैंड सैनिटाइज़र में भी।

साइट्रिक एसिड के फायदे - 
1. किडनी स्टोन से बचाता है साइट्रिक एसिड
साइट्रिक एसिड- पोटैशियम साइट्रेट के रूप में- किडनी में नई पथरी के गठन को रोकता है और अगर पहले से ही पथरी बनी हुई हो तो उसे तोड़ने में मदद करता है। साइट्रिक एसिड आपके यूरिन को पथरी के गठन के लिए कम अनुकूल बना देता है जिससे किडनी में स्टोन नहीं बन पाता। किडनी में पथरी का इलाज अक्सर साइट्रिक एसिड के साथ पोटैशियम साइट्रेट के रूप में किया जाता है। हालांकि, वैसे खाद्य पदार्थ जिनमें प्राकृतिक रूप में साइट्रिक एसिड उच्च मात्रा में पाया जाता हो उनका सेवन करना- जैसे खट्टे फल- पथरी की रोकथाम के लिए फायदेमंद हो सकता है।

2. पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण
साइट्रिक एसिड खनिजों की जैवउपलब्धता को बढ़ाता है, जिससे आपका शरीर उन्हें बेहतर तरीके से अवशोषित कर सकता है। उदाहरण के लिए, कैल्शियम साइट्रेट को अवशोषण के लिए पेट में एसिड की आवश्यकता नहीं होती। कैल्शियम कार्बोनेट की तुलना में कैल्शियम साइट्रेट के कम साइड इफेक्ट्स भी होते हैं जैसे- पेट में गैस, पेट फूलना और कब्ज आदि। इसी तरह, साइट्रेट रूप में मैग्नीशियम पूरी तरह से अवशोषित होता है और मैग्नीशियम ऑक्साइड और मैग्नीशियम सल्फेट की तुलना में अधिक जैव उपलब्ध भी है। साइट्रिक एसिड जिंक सप्लिमेंट के अवशोषण को भी बढ़ाता है।

3. स्किन के लिए फायदेमंद है साइट्रिक एसिड
हमारी स्किन के ऊपरी लेयर में मौजूद मृत कोशिकाएं (डेड स्किन सेल्स) को एक्सफोलिएट करके हटाने और रोमछिद्रों को साफ करने में मदद करता है साइट्रिक एसिड। इसके अलावा यह स्किन टोन यानी त्वचा के रंग को एक समान बनाने, त्वचा को नरम और चिकना बनाने में भी मदद करने का काम करता है। साइट्रिक एसिड सभी उम्र और स्किन टाइप के लिए उचित माना जाता है।

साइट्रिक एसिड के नुकसान - 
साइट्रिक एसिड भोजन और त्वचा उत्पादों में "आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है" फिर भी, कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे पूरी तरह से सुरक्षित मानने से पहले अधिक शोध की आवश्यकता है क्योंकि अगर अधिक मात्रा में इस्तेमाल किया जाए तो साइट्रिक एसिड के कारण निम्नलिखित नुकसान भी हो सकते हैं:
  • त्वचा में जलन - साइट्रिक एसिड जब लंबे समय तक आपकी त्वचा को छूता है, तो यह त्वचा में चुभन, सूजन या पित्ती का कारण बन सकता है। 
  • आंखों में दर्द और जलन - अगर साइट्रिक एसिड आंखों में चला जाए तो आंखों में जलन होने लगती है। यदि ऐसा हो तो आंखों को पानी से कुछ मिनट के लिए अच्छी तरह से धोएं। यदि आप कॉन्टैक्ट लेंस पहनते हैं, तो जितनी जल्दी हो सके उन्हें उतार दें।
  • दांतों की समस्या - पेय पदार्थ और कैंडीज में मौजूद साइट्रिक एसिड दांतों के इनैमल यानी बाहरी परत को खराब कर सकता है जिस कारण आपके दांत अधिक संवेदनशील बन जाते हैं, उनमें पीलापन आ जाता है और कैविटीज का खतरा भी बढ़ जाता है। 
  • पेट खराब - अगर आप साइट्रिक एसिड युक्त किसी दवा का सेवन करते हैं तो आपको जी मिचलाना या उल्टी आना जैसे दुष्प्रभाव का भी सामना करना पड़ सकता है।


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60 तत्व व उनके आविष्कारक



aavishkaarak


1ऑक्सीजनशीले तथा प्रीस्टले
2फ्लोरीनएच.म्वायसन (फ्रांस)
3नियानसौजे और ट्रैवर्स (यू.के.)
4सोडियमडेवी (यू.के.)
5मैग्नीशियमडेवी (यू.के.)
6एल्युमीनियमओसर्टेड और बोलर
7सिलिकॉनबर्जीलियस (स्वीडन)
8फास्फोरसएच. ब्रैंड (जर्मनी)
9सल्फरप्रागैतिहासिक
10क्लोरीनसी. डब्ल्यू. शीले (स्वीडन)
11ऑर्गनरेमजे और रैले (यू.के.)
12पोटेशियमडेवी (यू.के.)
13कैल्शियमडेवी (यू.के.)
14स्कैंडियमएल. एफ.निल्सन (स्वीडन)
15टाइटेनियमक्लैप्रोथ (जर्मनी)
16मैगनीजजे. जी. जान (स्वीडन)
17आयरनप्रागैतिहासिक
18कोबाल्टजी.क्रेन्स
19निकिलए. एफ. क्रासटेड्स (स्वीडन)
20कॉपरप्रागैतिहासिक
21जिंकए. एस. मारग्राफ (जर्मनी)
22जर्मेनियमसी. ए. विंकलर
23आर्सइनिकअलबर्टस मैग्रस
24ब्रोमीनए. जे. बैलार्ड (फ्रांस)
25क्रिप्टनरैमजे और ट्रेवर्स  (यू.के.)
26रुबैडियमवुनसेन और किरचौफ
27स्ट्रांशियमक्रुकशेक (यू.के.)
28मोलिब्डेनमपी. जे. जेम (स्वीडन)
29सिल्वरप्रागैतिहासिक
30कैडमियमएफ. स्ट्रोमेयर
31टिनप्रागैतिहासिक
32एप्टीमनीऐतिहासिक
33आयोडीनवी. कोर्टोइज (फ्रांस)
34जिनानरैमजे ट्रेवर्स  (यू.के.)
35सीजियमबुनसेन, किरचौफ
36बोरियमएच. डेवी  (यू.के.)
37टंगस्टनडब्ल्यू. आर. ब्रदर्स
38इरीडियमएस. टीनैन्ड (यू.के.)
39प्लेटिनमए.डी. ओलव
40गोल्डप्रागैतिहासिक
41मरकरीऐतिहासिक
42लेडप्रागैतिहासिक
43विस्मिथसी.एफ. ज्योफ्रे
44पोलिनियममैडम क्यूरी
45एस्टेटीनकोर्सन और मैकेंजी
46रेडानएफ. ई. डार्न
47रेडियमपियरे क्यूरी, मैडम क्यूरी, बेमोण्ड (फ्रांस)
48थोरियमजे. जे.बर्जीलियस
49प्रोटैक्टीनियमह्वान, मिटनर, सोडी और क्रैंसटन क्लैप्रौथ (जर्मनी)
50यूरेनियमक्लैप्रौथ (जर्मनी)
51नेप्यूनियम तत्वमिलन और एवेल्सन (अमेरिका)
52प्लूटोनियमसीवोर्ग जेम्स, मोर्गन
53फार्मियमघीओसो (अमेरिका)
54हाइड्रोजनएच. कैवेंडिस (यू.के.)
55हिलियमलोकेयर  (यू.के.)
56लिथियमजे.ए. अफेंडसन (स्वीडन)
57बेरिलियमएच. एल. वाक्वेलिन (फ्रांस)
58बोरानगेलुसाक, मेनार्ड, डेनी (स्वीडन)
59कार्बनप्रागैतिहासिक
60नाइट्रोजनरदरफोर्ड (यू.के.)


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आधुनिक भारतीय के वैज्ञानिकों की सूची

 
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यह सूची भारत के आधुनिक वैज्ञानिकों के बारे में है, प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों के लिए देखें : प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक व गणितज्ञ । विज्ञान ने हमारे जीवन को अद्भुत आयाम दिया है। विज्ञान के बिना एक दिन की भी कल्पना करना अब मुश्किल है। हमारे फ़ास्ट कम्प्यूटर्स और वाहनों से लेकर एक छोटे से खिलौने तक, सब कुछ विज्ञान और प्रौद्योगिकी की देन है। वैज्ञानकों ने इनका आविष्कार अपनी कड़ी मेहनत और लगन से किया है। इन साइंटिस्टों ने ही हमारे जीवन को आसान बनाया है। यहां कुछ ऐसे ही आधुनिक भारतीय वैज्ञानिकों की सूची दी गई है जिन्होंने अपने आविष्कार और शोध से पुरे विश्व में नाम कमाया है। आधुनिक भारत में विज्ञान के विस्तार का श्रेय भी इन महान साइंटिस्टों को ही जाता है। इन वैज्ञानिकों ने रसायन विज्ञान, गणित, भौतिकी, चिकित्सा, क्वांटम भौतिकी, वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान आदि कई क्षेत्रो में अपने ज्ञान का डंका बजाया है। इनमें से कुछ वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में अपने शोध को फ़ैलाया है और अद्भुत आविष्कार किए है। इन वैज्ञानको को हमारा सलाम है।

अबुल पाकिर जैनुलअब्दीन अब्दुल कलाम (अंग्रेज़ी: A P J Abdul Kalam), (15 अक्टूबर 1931 – 27 जुलाई 2015) इन्हे मिसाइल मैन और जनता के राष्ट्रपति के नाम से जाना जाता है, भारतीय गणतंत्र के ग्यारहवें निर्वाचित राष्ट्रपति थे। वे भारत के पूर्व राष्ट्रपति, जानेमाने वैज्ञानिक और अभियंता (इंजीनियर) के रूप में विख्यात थे। उन्होंने सिखाया जीवन में चाहें जैसे भी परिस्थिति क्यों न हो पर जब आप अपने सपने को पूरा करने की ठान लेते हैं तो उन्हें पूरा करके ही रहते हैं। अब्दुल कलाम मसऊदी के विचार आज भी युवा पीढ़ी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। इन्होंने मुख्य रूप से एक वैज्ञानिक और विज्ञान के व्यवस्थापक के रूप में चार दशकों तक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) संभाला व भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सैन्य मिसाइल के विकास के प्रयासों में भी शामिल रहे। इन्हें बैलेस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास के कार्यों के लिए भारत में 'मिसाइल मैन' के रूप में जाना जाता है। इन्होंने 1974 में भारत द्वारा पहले मूल परमाणु परीक्षण के बाद से दूसरी बार 1998 में भारत के पोखरान-द्वितीय परमाणु परीक्षण में एक निर्णायक, संगठनात्मक, तकनीकी और राजनैतिक भूमिका निभाई। कलाम सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी व विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों के समर्थन के साथ 2002 में भारत के राष्ट्रपति चुने गए।पांच वर्ष की अवधि की सेवा के बाद, वह शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक सेवा के अपने नागरिक जीवन में लौट आए। इन्होंने भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त किये।

अनिल काकोदकर (जन्म:11 नवम्बर 1943) एक भारतीय परमाणु भौतिक विज्ञानी एवं यांत्रिक अभियन्ता है। नवम्बर, २००९ तक वे भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष एवं भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव थे। इसके पूर्व वे सन् १९९६ से २००० तक भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के निदेशक थे। वे भारतीय रिज़र्व बैंक में भी निदेशक हैं। डॉ. अनिल काकोडकर भारत के एक प्रसिद्ध (न्यूक्लियर) वैज्ञानिक हैं। फिलहाल वह भारतीय अणु ऊर्जा आयोग (एईसीआई) के चेयरमैन तथा भारत सरकार के अधीन अणु ऊर्जा विभाग के सचिव पद पर कार्यरत हैं। भारत के अग्रणीय परमाणु कार्यक्रम का नेतृत्व करने का अवसर मिलने से पूर्व 1996 से 2000 तक वह ट्राम्बे स्थित भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर के निदेशक भी रहे हैं।  डॉ. काकोडकर का जन्म 11 नवंबर, 1943 को मध्यप्रदेश राज्य में स्थित बारावानी नामक गांव में हुआ। उनके पिता श्री पी. काकोडकर तथा माता श्रीमती कमला काकोडकर, दोनों ही गांधीजी के स्वतन्त्रता आंदोलन में सिपाही रहे हैं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बारावानी और खरगौन में हुई। मैट्रिक के आगे की पढ़ाई करने के लिए वह बंबई चले गए, जहां उन्होंने रूपारेल कॉलेज में स्नातक शिक्षा पूरी की।  मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने 1963 में बंबई विश्वविद्यालय में वीजेटीआई संस्थान में प्रवेश लिया। 1964 में उन्हें भाभा एटोमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (बार्क) में नियुक्ति मिल गई। कुछ समय बाद वह शोधपरक अध्ययन हेतु इंग्लैंड चले गए तथा 1969 में नॉटिंघम विश्वविद्यालय से प्रायोगिक गुरुत्व विश्लेषण (एक्सपेरिमेंटल स्ट्रेस एनालिसिस) में मास्टर डिग्री प्राप्त की। परमाणु वैज्ञानिक के तौर पर उनका अगला कदम बार्क के रिएक्टर इंजीनियरिंग डिवीजन में था। 

बीरबल साहनी का जन्म नवंबर, 1891 को पश्चिमी पंजाब (पाकिस्तान) के शाहपुर जिले के भेड़ा नामक एक छोटे से व्यापारिक नगर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। इनके पिता रुचि राम साहनी रसायन के प्राध्यापक थे। उनका परिवार वहां डेरा इस्माइल खान से स्थानांतरित हो कर बस गया था। इनको १९१९ ई. में लन्दन विश्वविद्यालय से और १९२९ ई. में केंब्रिज विश्वविद्यालय से डी.एस-सी. की उपाधि मिली थी। भारत लौट आने पर ये पहले बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के प्राध्यापक नियुक्त हुए। १९३९ ई. में ये रॉयल सोसायटी ऑव लन्दन के सदस्य (एफ.आर.एस.) चुने गए और कई वर्षों तक सायंस कांग्रेस और नेशनल ऐकेडेमी ऑव सायंसेज़ के अध्यक्ष रहे। इनके अनुसंधान जीवाश्म (फॉसिल) पौधों पर सबसे अधिक हैं। इन्होंने एक फॉसिल 'पेंटोज़ाइली' की खोज की, जो राजमहल पहाड़ियों में मिला था। इसका दूसरा नमूना अभी तक कहीं नहीं मिला है। हिंदू विश्वविद्यालय से डा. साहनी लाहौर विश्वविद्यालय गए, जहाँ से लखनऊ में आकर इन्होंने २० वर्ष तक अध्यापन और अन्वेषण कार्य किया।

होमी जहांगीर भाभा (30 अक्टूबर, 1909 - 24 जनवरी, 1966) भारत के एक प्रमुख वैज्ञानिक और स्वप्नदृष्टा थे जिन्होंने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना की थी। उन्होने मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में नाभिकीय उर्जा पर अनुसन्धान आरम्भ किया। उन्होंने नाभिकीय विज्ञान में तब कार्य आरम्भ किया जब अविछिन्न शृंखला अभिक्रिया का ज्ञान नहीं के बराबर था और नाभिकीय उर्जा से विद्युत उत्पादन की कल्पना को कोई मानने को तैयार नहीं था। उन्हें 'आर्किटेक्ट ऑफ इंडियन एटॉमिक एनर्जी प्रोग्राम' भी कहा जाता है। भाभा का जन्म मुम्बई के एक सभ्रांत पारसी परिवार में हुआ था। उनकी कीर्ति सारे संसार में फैली। भारत वापस आने पर उन्होंने अपने अनुसंधान को आगे बढ़ाया। भारत को परमाणु शक्ति बनाने के मिशन में प्रथम पग के तौर पर उन्होंने 1945 में मूलभूत विज्ञान में उत्कृष्टता के केंद्र टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (टीआइएफआर) की स्थापना की। डा. भाभा एक कुशल वैज्ञानिक और प्रतिबद्ध इंजीनियर होने के साथ-साथ एक समर्पित वास्तुशिल्पी, सतर्क नियोजक, एवं निपुण कार्यकारी थे। वे ललित कला व संगीत के उत्कृष्ट प्रेमी तथा लोकोपकारी थे। 1947 में भारत सरकार द्वारा गठित परमाणु ऊर्जा आयोग के प्रथम अध्यक्ष नियुक्त हुए। १९५३ में जेनेवा में अनुष्ठित विश्व परमाणुविक वैज्ञानिकों के महासम्मेलन में उन्होंने सभापतित्व किया। भारतीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक का २४ जनवरी सन १९६६ को एक विमान दुर्घटना में निधन हो गया था।

डॉ॰ प्रेम चंद पाण्डेय भारतीय वैज्ञानिक और शिक्षाविद हैं। वे राष्ट्रीय अंटार्कटिक एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र के संस्थापक निदेशक है और वर्तमान में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर में आचार्य के पद पर कार्यरत हैं । पाण्डेय भारतीय विज्ञान के सर्वोच्च पुरस्कार, शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार से सम्मानित हैं । उन्होने सुदूर संवेदन, उपग्रह महासागरीय विज्ञान, वायुमण्डलीय विज्ञान, अंटार्कटिक और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में कार्य किया है

प्रोफेसर कैलास (कैलाश) नाथ कौल, एफएलएस (1905-1983) एक भारतीय वनस्पतिशास्त्री, कृषि विज्ञानी, कृषि वैज्ञानिक, बागवान, जड़ी-बूटी, और प्रकृतिवादी, और 1950 के दशक में अरेकेसी पर एक विश्व प्राधिकरण थे। उन्हें फाइटोमॉर्फोलॉजी, फाइटोफिजियोलॉजी, फाइटोगोग्राफी, फाइकोलॉजी, लाइकेनोलॉजी, ब्रायोलॉजी, पैलिनोलॉजी, फार्मास्युटिकल बॉटनी, एथनोबोटनी, हर्पेटोलॉजी, पैलियोबोटनी, पैलियोकोलॉजी, पैलियोवल्केनोलॉजी, हाइड्रोजोलॉजी, लिम्नोलॉजी, एंथ्रोपोलॉजी, एपिस्टेमोलॉजी और सौंदर्यशास्त्र में उनकी रुचि के लिए पहचाना गया है। पॉलीपोडियासी के एक जीनस कौलिनिया का नाम उनके नाम पर रखा गया है।

श्रीराम शंकर अभयंकर (२२ जुलाई १९३० - २ नवम्बर २०१२)  बीजगणितीय ज्यामिति में उनके योगदान के लिए विख्यात भारतीय गणितज्ञ हैं। अभयंकर का जन्म एक महाराष्ट्रीय कोकणस्थ ब्राह्मण परिवार के घर में उज्जैन में हुआ। सम्मान- अभयंकर को विभिन्न अवसरों पर अनेक सम्मान एवं पुरस्कार से नवाजा गया है -भारतीय विज्ञान अकादमी के फेलो। इंडो--अमेरिकन गणित। बीजगणित और बीजगणितीय ज्यामिति में अपने अभूतपूर्व शोध के लिए प्रसिद्ध, अभ्यंकर का जन्म उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत में हुआ था। उनके पिता पहले उज्जैन में और बाद में ग्वालियर कॉलेज में गणित के प्रोफेसर थे। श्रीराम अभ्यंकर की शिक्षा इंटर तक ग्वालियर में हुई। उन्होंने भौतिकी में डिग्री हासिल करने के लिए मुंबई में रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (अब विज्ञान संस्थान) में दाखिला लिया। लगभग उसी समय, उन्हें मुंबई में नए लॉन्च किए गए टाटा फंडामेंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (टीआईएफआर) में कई गणमान्य व्यक्तियों द्वारा गणित पर व्याख्यान सुनने का अवसर मिला। वहाँ आमंत्रित व्याख्याताओं में मार्शल स्टोन ने अभ्यंकर को भारत से बाहर जाकर आगे की पढ़ाई करने के लिए प्रेरित किया। हालांकि, उन्होंने टीआईएफआर के गणितज्ञ दामोदर धर्मानंद कोसंबी और रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में गणित विभाग के प्रमुख पेसी मसानी के साथ चर्चा के बाद भौतिकी के बजाय गणित में आगे की पढ़ाई करने का फैसला किया। मसानी ने १९४६ में गणित में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। हार्वर्ड विश्वविद्यालय से स्नातक, अभ्यंकर ने उसी विश्वविद्यालय में आगे की पढ़ाई की और पीएच.डी. प्रोत्साहित।

चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव (कन्नड़: ಚಿಂತಾಮಣಿ ನಾಗೇಶ ರಾಮಚಂದ್ರ ರಾವ್) जिन्हें सी॰ एन॰ आर॰ राव के नाम से भी जाना जाता है, एक भारतीय रसायनज्ञ हैं जिन्होंने घन-अवस्था और संरचनात्मक रसायन शास्त्र के क्षेत्र में मुख्य रूप से काम किया है। वर्तमान में वह भारत के प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के प्रमुख के रूप में सेवा कर रहे हैं। डॉ॰ राव को दुनिया भर के 60 विश्वविद्यालयों से मानद डॉक्टरेट प्राप्त है। उन्होंने लगभग 1500 शोध पत्र और 45 वैज्ञानिक पुस्तकें लिखी हैं। वर्ष 2013 में भारत सरकार ने उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित करने का निर्णय लिया। सी वी रमण और ए पी जे अब्दुल कलाम के बाद इस पुरस्कार से सम्मानित किये जाने वाले वे तीसरे ऐसे वैज्ञानिक हैं।

सीवी रामन (तमिल: சந்திரசேகர வெங்கட ராமன்) (७ नवंबर, १८८८ - २१ नवंबर, १९७०) भारतीय भौतिक-शास्त्री थे। प्रकाश के प्रकीर्णन पर उत्कृष्ट कार्य के लिये वर्ष १९३० में उन्हें भौतिकी का प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार दिया गया। उनका आविष्कार उनके ही नाम पर रामन प्रभाव के नाम से जाना जाता है। १९५४ ई. में उन्हें भारत सरकार द्वारा भारत रत्न की उपाधि से विभूषित किया गया तथा १९५७ में लेनिन शान्ति पुरस्कार प्रदान किया था।

भारत के पहले सुपर कम्प्यूटर परम के निर्माता डॉ. विजय भटकर का जन्म 11 अक्टूबर, 1946 को महाराष्ट्र में हुआ था। वह आई. टी. लिडर के नाम से प्रसिद्ध हैं। डॉ. भटकर ने 1965 में बैचलर ऑफ़ इंजीनियरिंग और 1968 में मास्टर ऑफ़ इंजीनियरिंग की डिग्री आई. आई. टी. दिल्ली, सर विश्वेश्वरैया राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नागपुर और एम. एस. यूनिवर्सिटी, वड़ोदरा से ग्रहण की थी। डॉ भटकर 1987 में पुणे स्थित सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ़ एडवांस्ड कम्प्यूटिंग (सी-डैक) में सुपर-कंप्यूटर बनाने की परियोजना का नेतृत्व कर चुके हैं।

हरगोविंद खुराना (जन्म: ९ जनवरी १९२२ मृत्यु ९ नवंबर २०११) एक नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भारतीय वैज्ञानिक थे। हरगोविंद खुराना एक भारतीय अमेरिकी जैव रसायनज्ञ थे। विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय,अमरीका में अनुसन्धान करते हुए , उन्हें १९६८ में मार्शल डब्ल्यू निरेनबर्ग और रॉबर्ट डब्ल्यू होली के साथ फिजियोलॉजी या मेडिसिन के लिए नोबेल पुरस्कार सयुक्त रूप से मिला ,उनके द्वारा न्यूक्लिक एसिड में न्यूक्लियोटाइड का क्रम खोजा गया, जिसमें कोशिका के अनुवांशिक कोड होते हैं और प्रोटीन के सेल के संश्लेषण को नियंत्रित करता है । हरगोविंद खुराना और निरेनबर्ग को उसी वर्ष कोलंबिया विश्वविद्यालय से लुइसा ग्रॉस हॉर्वित्ज़ पुरस्कार भी दिया गया था। ब्रिटिश भारत में पैदा हुए, हरगोविंद खुराना ने उत्तरी अमेरिका में तीन विश्वविद्यालयों के संकाय में कार्य किया। वह १९६६ में संयुक्त राज्य अमेरिका के नागरिक बन गए और १९८७ में विज्ञान का राष्ट्रीय पदक प्राप्त किया।

तेज पाल सिंह (जन्म 1944) एक भारतीय बायोफिजिसिस्ट हैं, जिन्हें रैशनल स्ट्रक्चर-बेस्ड ड्रग डिजाइन, प्रोटीन स्ट्रक्चर बायोलॉजी और एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी के क्षेत्र में उनके काम के लिए जाना जाता है। उन्होंने जीवाणुरोधी चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में दवा डिजाइन के विकास में सक्रिय भूमिका निभाई है, तपेदिक,  सूजन, कैंसर  और गैस्ट्रोपैथी। वह देश के सभी छह रामचंद्रन पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय हैं। वे छह अकादमियों के फेलो हैं, अर्थात् थर्ड वर्ल्ड एकेडमी ऑफ साइंसेज, इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज, अलेक्जेंडर वॉन हंबोल्ट फाउंडेशन और बायोटेक रिसर्च सोसाइटी ऑफ इंडिया। 

हरीश चंद्र महरोत्रा (११ अक्टूबर १९२३ - १६ अक्टूबर १९८३) भारत के महान गणितज्ञ थे। वह उन्नीसवीं शदाब्दी के प्रमुख गणितज्ञों में से एक थे। इलाहाबाद में गणित एवं भौतिक शास्त्र का प्रसिद्ध केन्द्र "मेहता रिसर्च इन्सटिट्यूट" का नाम बदलकर अब उनके नाम पर हरीशचंद्र अनुसंधान संस्थान कर दिया गया है। 'हरीश चंद्र महरोत्रा' को सन १९७७ में भारत सरकार द्वारा साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

मणींद्र अग्रवाल कंम्प्यूटर विज्ञान और इंजिनियरींग विभाग मे प्रोफेसर है |  मणिंद्र अग्रवाल का जन्म 20 मई 1966 को भारत के  इलाहाबाद शहर मे हुआ |  मणींद्र ने सन 1986 मे आई:आईटी कानपूर से बीटेक किया है | उसके बाद उन्होंने आई:आईटी कानपूर विश्वाविदयालय से ही पीएचडी की उपाधि प्रापता कि है | मणींद्र को एकेएस प्राइमलिटी टेस्टा यानि अग्रवाल कायल सक्सेना  Prrmality test और Cyclotomic test  के लिए जाना जाता है | नीरल कयाल और नितिन सक्सेना यह उनके डॉक्टरल छात्र है | सोमनाथ विश्वास उनके डॉक्टरल सलाहकार है |

नरेंद्र कृष्ण कर्मकार  (जन्म 1955) एक भारतीय गणितज्ञ हैं।कर्मकार ने कर्मकार के एल्गोरिथ्म को विकसित किया।उन्हें आईएसआई के उच्च शोधकर्ता के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। उन्होंने रैखिक प्रोग्रामिंग के लिए सबसे पहले बहुपद समय के एल्गोरिदम में से एक का आविष्कार किया, जिसे आमतौर पर एक आंतरिक बिंदु विधि के रूप में संदर्भित किया जाता है।एल्गोरिथ्म रैखिक प्रोग्रामिंग के क्षेत्र में एक आधारशिला है।उन्होंने अपना प्रसिद्ध परिणाम 1984 में प्रकाशित किया जब वह न्यू जर्सी में बेल लेबोरेटरीज के लिए काम कर रहे थे।

डॉ॰ (सर) जगदीश चन्द्र बसु (बंगाली: জগদীশ চন্দ্র বসু जॉगोदीश चॉन्द्रो बोशु) (30 नवंबर 1858 – 23 नवंबर, 1937) भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिन्हें भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान तथा पुरातत्व का गहरा ज्ञान था। वे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य किया। वनस्पति विज्ञान में उन्होनें कई महत्त्वपूर्ण खोजें की। साथ ही वे भारत के पहले वैज्ञानिक शोधकर्त्ता थे। वे भारत के पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने एक अमरीकन पेटेंट प्राप्त किया। उन्हें रेडियो विज्ञान का पिता माना जाता है। वे विज्ञानकथाएँ भी लिखते थे और उन्हें बंगाली विज्ञानकथा-साहित्य का पिता भी माना जाता है।उन्होंने अपने काम के लिए कभी नोबेल नहीं जीता। इनके स्थान पर 1909 में मारकोनी को नोबेल पुरस्कार दे दिया गया।

जयन्त विष्णु नार्लीकर (मराठी: जयन्त विष्णु नारळीकर ; जन्म 19 जुलाई 1938) प्रसिद्ध भारतीय भौतिकीय वैज्ञानिक हैं जिन्होंने विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी में अनेक पुस्तकें लिखी हैं। ये ब्रह्माण्ड के स्थिर अवस्था सिद्धान्त के विशेषज्ञ हैं और फ्रेड हॉयल के साथ भौतिकी के हॉयल-नार्लीकर सिद्धान्त के प्रतिपादक हैं। इनके द्वारा रचित एक आत्‍मकथा चार नगरातले माझे विश्‍व के लिये उन्हें सन् 2014 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

डॉ लालजी सिंह कुलपति बनारस हिंदू विश्वविद्यालय"" (5 जुलाई 1947 – 10 दिसम्बर 2017) हैदराबाद स्थित 'कोशिकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केन्द्र' (CCMB) के भूतपूर्व निदेशक थे। सम्प्रति वे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। वह भारत के नामी नू-जीवविज्ञानी थे। लिंग निर्धारण का आणविक आधार, डीएनए फिंगरप्रिंटिंग, वन्यजीव संरक्षण, रेशमकीट जीनोम विश्लेषण, मानव जीनोम एवं प्राचीन डीएनए अध्ययन आदि उनकी रुचि के प्रमुख विषय रहे।

मेघनाद साहा (६ अक्टूबर १८९३ - १६ फरवरी, १९५६) सुप्रसिद्ध भारतीय खगोलविज्ञानी (एस्ट्रोफिजिसिस्ट्) थे। वे साहा समीकरण के प्रतिपादन के लिये प्रसिद्ध हैं। यह समीकरण तारों में भौतिक एवं रासायनिक स्थिति की व्याख्या करता है। उनकी अध्यक्षता में गठित विद्वानों की एक समिति ने भारत के राष्ट्रीय शक पंचांग का भी संशोधन किया, जो २२ मार्च १९५७ (१ चैत्र १८७९ शक) से लागू किया गया। इन्होंने साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान तथा इण्डियन एसोसियेशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साईन्स नामक दो महत्त्वपूर्ण संस्थाओं की स्थापना की।

वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान निगम के पूर्व अध्यक्ष रघुनाथ अनंत माशेलकर का आज जन्मदिन है। उनका जन्म 1 जनवरी 1943 को हुआ था। रघुनाथ अनंत माशेलकर को रमेश माशेलकर के नाम से भी जाना जाता है। रघुनाथ माशेलकर का जन्म कोंकण के माशेल गांव में हुआ था। बचपन मुंबई चला गया। माशेलकर के जीवन को मुंबई के एक म्यूनिसिपल स्कूल के शिक्षकों ने आकार दिया। उसकी माँ, यही उसकी मुख्य प्रेरणा है! माशेलकर की माँ सिलाई करके या जो कुछ भी मिल सकता था, कुछ पैसे कमाती थी। एक बार वह नौकरी मांगने गिरगांव के कांग्रेस भवन में गई थी। रिलेशनशिप के दिन वहीं खड़े रहने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं दी गई। उस नौकरी के लिए तीसरा पास होना जरूरी था और माशेलकर की मां ने ज्यादा पढ़ाई नहीं की थी। हो सकता है कि झूठ बोलकर उन्हें नौकरी मिल गई हो। इसके बजाय, उसने अपना मन बना लिया। मुझे आज नौकरी नहीं मिली क्योंकि मेरे पास शिक्षा नहीं है, लेकिन मैं अपने बेटे को दुनिया की सबसे ऊंची शिक्षा दूंगा। उन्होंने इस निर्णय को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत की।

सर शांति स्वरूप भटनागर, OBE, FRS (२१ फरवरी १८९४ – १ जनवरी १९५५) जाने माने भारतीय वैज्ञानिक थे। इनका जन्म शाहपुर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। इनके पिता परमेश्वरी सहाय भटनागर की मृत्यु तब हो गयी थी, जब ये केवल आठ महीने के ही थे। इनका बचपन अपने ननिहाल में ही बीता। इनके नाना एक इंजीनियर थे, जिनसे इन्हें विज्ञान और अभियांत्रिकी में रुचि जागी। इन्हें यांत्रिक खिलौने, इलेक्ट्रानिक बैटरियां और तारयुक्त टेलीफोन बनाने का शौक रहा। इन्हें अपने ननिहाल से कविता का शौक भी मिला और इनका उर्दु एकांकी करामाती प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाया था।

सुब्रह्मण्यन् चन्द्रशेखर (१९ अक्टूबर, १९१०-२१ अगस्त, १९९५) विख्यात भारतीय-अमेरिकी खगोलशास्त्री थे। भौतिक शास्त्र पर उनके अध्ययन के लिए उन्हें विलियम ए. फाउलर के साथ संयुक्त रूप से सन् १९८३ में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। चन्द्रशेखर सन् १९३७ से १९९५ में उनके देहांत तक शिकागो विश्वविद्यालय के संकाय पर विद्यमान थे। जीवन डॉ॰ सुब्रह्मण्याम चंद्रशेखर का जन्म 19 अक्टूबर 1910 को लाहौर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा मद्रास में हुई। 18 वर्ष की आयु में चंद्रशेखर का पहला शोध पत्र `इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स' में प्रकाशित हुआ। मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक की उपाधि लेने तक उनके कई शोध पत्र प्रकाशित हो चुके थे। उनमें से एक `प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी' में प्रकाशित हुआ था, जो इतनी कम उम्र वाले व्यक्ति के लिए गौरव की बात।

डॉ शंकर अबाजी भिसे (२९ अप्रैल १८६७ - ७ अप्रैल १९३५) भारत के एक वैज्ञानिक एवं अग्रणि आविष्कारक थे जिन्होने २०० के लगभग आविष्कार किये। उन्होने लगभग ४० आविष्कारों पर पेटेन्ट लिया था। उन्हें "भारतीय एडिसन" कहा जाता है। उन्होने भारतीय मुद्रण प्रौद्योगिकी में महत्वपूर्ण योगदान दिया जिससे छपाई की गति पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ायी जा सकी। अन्तरराष्ट्रीय निवेशकों का मानना था कि उनके खोजें वैश्विक प्रिटिंग उद्योग में क्रांति ला देंगी। उन्हें अपने समय के अग्रणी भारतीय राष्ट्रवादियों का सहयोग और प्रशंसा मिली थी। उन्होंने बॉम्बे (वर्तमान में मुंबई) में एक साइंटिफ़िक क्लब खोला था और 20 साल की उम्र तक वो गेजेट और मशीनें बनाने लगे थे जिनमें टैंपर-प्रूफ बोतल, इलैक्ट्रिकल साइकिल कॉन्ट्रासेप्शंस, बॉम्बे की उपनगरीय रेलवे प्रणाली के लिए एक स्टेशन संकेतक शामिल थे।

श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (तमिल ஸ்ரீனிவாஸ ராமானுஜன் ஐயங்கார்) (22 दिसम्बर 1887 – 26 अप्रैल 1920) एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया। ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।

सत्येन्द्रनाथ बोस का जन्म 1 जनवरी 1894 को कोलकाता में हुआ था । उनकी आरंभिक शिक्षा उनके घर के पास ही स्थित साधारण स्कूल में हुई थी। इसके बाद उन्हें न्यू इंडियन स्कूल और फिर हिंदू स्कूल में भरती कराया गया। स्कूली शिक्षा पूरी करके सत्येन्द्रनाथ बोस ने कोलकाता के प्रसिद्ध प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया। वह अपनी सभी परीक्षाओं में सर्वाधिक अंक पाते रहे और उन्हें प्रथम स्थान मिलता रहा। उनकी प्रतिभा देखकर कहा जाता था कि वह एक दिन पियरे साइमन, लेप्लास और आगस्टीन लुई काउथी जैसे गणितज्ञ बनेंगे। सत्येन्द्रनाथ बोस ने सन्‌ १९१५ में गणित में एम.एस.सी. परीक्षा प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम आकर उत्तीर्ण की। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर सर आशुतोष मुखर्जी ने उन्हें प्राध्यापक के पद पर नियुक्त कर दिया। उन दिनों भौतिक विज्ञान में नई-नई खोजें हो रही थीं। जर्मन भौतिकशास्त्री मैक्स प्लांक ने क्वांटम सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। उसका अर्थ यह था कि ऊर्जा को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटा जा सकता है। जर्मनी में ही अल्बर्ट आइंस्टीन ने "सापेक्षता का सिद्धांत" प्रतिपादित किया था। सत्येन्द्रनाथ बोस इन सभी खोजों का अध्ययन कर रहे थे। बोस तथा आइंस्टीन ने मिलकर बोस-आइंस्टीन स्टैटिस्टिक्स की खोज की।

विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सि तंबर 1860 को एक तेलुगु परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्मस्थान से ही पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। विश्वेश्वरैया ने 1881 में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।

भारतीय प्राणि विज्ञानी सुंदरलाल होरा (1896-1955) का जन्म पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) के हाफिज़ाबाद नामक कस्बे में हुआ था। पंजाब विश्वविद्यालय की एम. एस-सी. परीक्षा में आपने प्रथम स्थान प्राप्त किया तथा आपको मैकलैगेन पदक और अन्य सम्मान प्राप्त हुए। सन् 1919 में आप भारत के जूलॉजिकल सर्वे विभाग में नियुक्त हुए। सन् 1922 में पंजाब विश्वविद्यालय और सन् 1928 में एडिनबरा विश्वविद्यालय से आपने डी. एस-सी. की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

वेंकटरामन "वेंकी" रामकृष्णन (तमिल: வெங்கட்ராமன் ராமகிருஷ்ணன்) (जन्म: १९५२, तमिलनाडु) एक जीव वैज्ञानिक हैं। इनको २००९ के रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इन्हें यह पुरस्कार कोशिका के अंदर प्रोटीन का निर्माण करने वाले राइबोसोम की कार्यप्रणाली व संरचना के उत्कृष्ट अध्ययन के लिए दिया गया है। इनकी इस उपलब्धि से कारगर प्रतिजैविकों को विकसित करने में मदद मिलेगी। इसराइली महिला वैज्ञानिक अदा योनोथ और अमरीका के थॉमस स्टीज़ को भी संयुक्त रूप से इस सम्मान के लिए चुना गया। तीनों वैज्ञानिकों ने त्रि-आयामी चित्रों के ज़रिए दुनिया को समझाया कि किस तरह राइबोसोम अलग-अलग रसायनों के साथ प्रतिक्रिया करते हैं, इसके लिए उन्होंने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफ़ी का सहारा लिया जो राइबोसोम्ज़ की हज़ारों गुना बड़ी छवि सामने लाता है। वर्तमान में श्री वेंकटरामन् रामकृष्णन् ब्रिटेन के प्रतिष्ठित कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से जुड़े हैं एवं विश्वविद्यालय की एमआरसी लेबोरेट्रीज़ ऑफ़ म्यलूकुलर बायोलोजी (पेशीय जीवविज्ञान की एमआरसी प्रयोगशाला) के स्ट्रकचरल स्टडीज़ (संरचनात्मक अध्ययन) विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक हैं।

विक्रम अंबालाल साराभाई (१२ अगस्त, १९१९- ३० दिसंबर, १९७१) भारत के प्रमुख वैज्ञानिक थे। इन्होंने ८६ वैज्ञानिक शोध पत्र लिखे एवं ४० संस्थान खोले। इनको विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में सन १९६६ में भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। डॉ॰ विक्रम साराभाई के नाम को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम से अलग नहीं किया जा सकता। यह जगप्रसिद्ध है कि वह विक्रम साराभाई ही थे जिन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत को अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर स्थान दिलाया। लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने अन्य क्षेत्रों जैसे वस्त्र, भेषज, आणविक ऊर्जा, इलेक्ट्रानिक्स और अन्य अनेक क्षेत्रों में भी बराबर का योगदान किया।

अतुल गुर्टु एक भारतीय उच्च ऊर्जा भौतिक विज्ञानी हैं। उन्होंने १९७१ में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान, मुम्बई से जुड़ गये और २०११ में एक लम्बे कण भौतिकी शोध के पश्चात् एक वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में सेवानिवृत हुये।



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पारा की खोज किसने और कब किया ?

 
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पारा या पारद (संकेत: Hg) आवर्त सारिणी के डी-ब्लॉक का अंतिम तत्व है। इसका परमाणु क्रमांक ८० है। इसके सात स्थिर समस्थानिक ज्ञात हैं, जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ १९६, १९८, १९९, २००, २०१, २०२ और २०४ हैं। इनके अतिरिक्त तीन अस्थिर समस्थानिक, जिनकी द्रव्यमान संख्याएँ १९५, १९७ तथा २०५ हैं, कृत्रिम साधनों से निर्मित किए गए हैं। रासायनिक जगत् में केवल यही धातु साधारण ताप और दाब पर द्रव रूप होती है।

परिचय-

द्रव रूप और चाँदी के समान चमकदार होने के कारण पुरातन युग से पारद कौतूहल का विषय रहा है। लगभग १,५०० ईसवी पूर्व में बने मिस्र के मकबरों में पारद प्राप्त हुआ है। भारत में इस तत्व का प्राचीन काल से वर्णन हुआ है। चरक संहिता में दो स्थानों पर इसे 'रस' और 'रसोत्तम' नाम से संबोधित किया गया है। वाग्भट ने औषध बनाने में पारद का वर्णन किया है। वृन्द ने सिद्धयोग में कीटमारक औषधियों में पारद का उपयोग बताया है। तांत्रिक काल (७०० ई. से लेकर १३०० ई.) में पारद का बहुत उल्लेख मिलता है। इस काल में पारद को बहुत महत्ता दी गई। पारद की ओषधियाँ शरीर की व्याधियाँ दूर करने के लिये संस्तुत की गई हैं। तांत्रिक काल के ग्रंथों में पारद के लिये 'रस' शब्द का उपयोग हुआ है। इस काल की पुस्तकों के अनुसार पारद से न केवल अन्य धातुओं के गुण सुधर सकते हैं वरन् उसमें मनुष्य के शरीर को अजर बनाने की शक्ति है। नागार्जुन द्वारा लिखित रसरत्नसमुच्चय नामक ग्रंथ में पारद की अन्य धातुओं से शुद्ध करने तथा उससे बनी अनेक ओषधियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। तत्पश्चात् अन्य ग्रंथों में पारद की भस्मों तथा अन्य यौगिकों का प्रचुर वर्णन रहा है।

पारे का वर्णन चीन के प्राचीन ग्रंथों में भी हुआ है। यूनान के दार्शनिक थिओफ्रेस्टस ने ईसा से ३०० वर्ष पूर्व 'द्रव चाँदी' (quicksilver) का उल्लेख किया था, जिसे सिनेबार (HgS) को सिरके से मिलाने से प्राप्त किया गया था। बुध (Mercury) ग्रह के आधार पर इस तत्व का नाम 'मरकरी' रखा गया। इसका रासायनिक संकेत (Hg) लैटिन शब्द हाइड्रारजिरम (hydrargyrum) पर आधारित है।

पारद मुक्त अवस्था में यदाकदा मिलता है, परंतु इसका मुख्य अयस्क सिनेबार (HgS) है, जो विशेषकर स्पेन, अमरीका, मेक्सिको, जापान, चीन और मध्य यूरोप में मिलता है। सिनेबार को वायु में ऑक्सीकृत करने पर पारद मुक्त हो जाता है। पारा का प्रयोग थर्मामीटर में किया जाता है

गुणधर्म-

पारद श्वेत रंग की चमकदार द्रव धातु है, जिसके मुख्य भौतिक गुणधर्म निम्नांकित हैं :
  • संकेत : Hg
  • परमाणुसंख्या : ८०
  • परमाणुभार : २००.५९
  • गलनांक : - ३८.८९ डिग्री सेंल्सियस
  • क्वथनांक : ३५६.५८ डिग्री सेल्सियस
  • घनत्व : १३.५४६ ग्राम प्रति घन सेंमी. (२० डिग्री सेल्सियस पर)
  • क्रांतिक ताप : १,४६० डेग्री सेल्सियस
  • संगलन की गुप्त उष्मा : २.७ कैलरी
  • परमाणुव्यास : ३.१ एंग्सट्राम
  • आयनीकरण विभव : १०.४३४ eV
  • विद्युत् प्रतिरोधकता : ९४.१ माइक्रोओम-सेंमी. (० डिग्री सें. पर)
पारद अनेक धातुओं से मिलकर मिश्रधातु बनाता है, जिन्हें अमलगम (amalgam) कहते हैं। सोडियम तथा अन्य क्षारीय धातुओं के अमलगम अपचायक (reducing agent) होने के कारण अनेक रासायनिक क्रियाओं में उपयोगी सिद्ध हुए हैं।

पारद वायु में अप्रभावित रहता है, परंतु गरम करने पर यह ऑक्साइड या (HgO) बनता है, जो अधिक उच्च ताप पर फिर विघटित हो जाता है। यह तनु नाइट्रिक अम्ल और गरम सांद्र सल्फ्यूरिक अम्ल में घुल जाता है। पारद के दो संयोजकता (१ और २) के यौगिक प्राप्त हैं। इसके लवणों का आयनीकरण न्यून मात्रा में होता है। इसके दो क्लोराइड यौगिक प्राप्त हैं। इनमें से एक मरक्यूरस क्लोराइड अथवा कैलोमेल, (Hg2Cl2) है, जिसका भारतीय ग्रंथों में 'कर्पूररस' और 'श्वेतभस्म' के नाम से वर्णन है। दूसरा मरक्यूरिक क्लोराइड, अथवा केरोसिव सब्लिमेट, (HgCl2), हैं, जो विषैला पदार्थ है। पारद के यौगिक अधिकतर विषैले होते हैं, परंतु न्यून मात्रा में औषध रूप में दिए जाते हैं।

पारद के मरक्यूरस (१ संयोजकतावाले) और मरक्यूरिक (२ संयोजकता वाले), दोनों लवण, जटिल यौगिक (complex compunds) बनाते हैं। नेसलर का अभिकर्मक (Nessler's reagent) भी एक जटिल यौगिक है, जो मरक्यूरिक क्लोराइड, (HgCl2) पर पोटैशियम आयोडाइड, (KI), की प्रक्रिया से बनता है। यह अमोनिया की सूक्ष्म मात्रा के विश्लेषण में काम आता है।

उपयोग-

द्रव अवस्था, उच्च घनत्व और न्यून वाष्पदबाव के कारण पारद का उपयोग थर्मामीटर, बैरोमीटर, मैनोमीटर तथा अन्य मापक उपकरणों में होता है। पारद का उपयोग अनेक लपों तथा विसर्जन नलिकाओं में भी होता है। ऐसी आशा है कि परमाणु ऊर्जा द्वारा चालित यंत्रों में पारद का उपयोग बढ़ेगा, क्योंकि इसके वाष्प द्वारा ऊष्मा स्थानांतरण सुगमता से हो सकता है। पारद के स्पेक्ट्रम की हरी रेखा को तरंगदैर्घ्य मापन में मानक माना गया है।

पारद के अनेक यौगिक औषध रूप में उपयोगी हैं। मरक्यूरिक क्लोराइड, बेंजोएट, सायनाइड, सैलिसिलेट, आयोडाइड आदि कीटाणुनाशक गुणवाले यौगिक हैं। मरक्यूरोक्रोम चोट आदि में बहुधा लगाया जाता है। इसके कुछ यौगिक चर्मरोगों में लाभकारी सिद्ध हुए हैं। पारदवाष्प श्वास द्वारा शरीर में प्रवेश कर हानि करता है। इस कारण पारद के साथ कार्य करने में सावधानी बरतनी चाहिए। पारद के यौगिक बहुधा विषैले होते हैं, जिनके द्वारा मृत्यु हो सकती है। यदि अकस्मात् कोई इन्हें खा ले, तो तुरंत डाक्टर को बुलाना चाहिए। दूध या कच्चा अंडा खिलाकर, गैस्ट्रिक नलिका (gastric tube) द्वारा पेट की शीघ्र सफाई करने से विष का प्रभाव कम हो जाता है।

आयुर्वेद एवं रसशास्त्र में पारा-
औषध में भी पारे का बहुत प्रयोग होता है । पुराणों और वैद्यक की पोथियों में पारे की उत्पत्ति शिव के वीर्य से कही गई है और उसका बड़ा माहात्म्य गाया गया है, यहाँ तक कि यह ब्रह्म या शिवस्वरूप कहा गया है । पारे को लेकर एक रसेश्वर दर्शन ही खड़ा किया गया है जिसमें पारे ही से सृष्टि की उत्पत्ति कही गई है और पिंडस्थैर्य (शरीर को स्थिर रखना) तथा उसके द्वारा मुक्ति की प्राप्ति के लिये रससाधन ही उपाय बताया गया है ।

भावप्रकाश में पारा चार प्रकार का लिखा गया है— श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण । इसमें श्वेत श्रेष्ठ है । वैद्यक में पारा कृमिनाशक और कुष्ठनाशक, नेत्रहितकारी, रसायन, मधुर आदि छह रसों से युक्त, स्निग्ध, त्रिदोषनाशक, योग-वाही, शुक्रवर्धक और एक प्रकार से संपूर्ण रोगनाशक कहा गया है । पारे में मल, वह्नि, विष, नाम इत्यादि कई दोष मिले रहते हैं, इससे उसे शुद्ध करके खाना चाहिए । पारा शोधने की अनेक विधियाँ वैद्यक के ग्रंथों में मिलती हैं । शोधन कर्म आठ प्रकार के कहे गए हैं— स्वेदन, मर्दन, उत्थापन, पातन, बोधन, नियामन और दीपन । भावप्रकाश में मूर्छन भी कहा गया है जो कुछ ओषधियों के साथ मर्दन का ही परिणाम है ।

पर्यायवाची—रसराज, रसनाथ, महारस, रस, महातेजभ् , रसेलह, रसोत्तम, सुतराट् , चपल , चैत्र , शिवबीज , शिव , अमृत , रसेंद्र , लोकेश , दुर्धर , पुरभु , रुद्रज , हरतेजः , रसधातु , स्कंद , देव , दिव्यरस , यशोद , सूतक , सिद्धधातु , पारत , हरवीज 


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