गोण्डा लाइव न्यूज एक प्रोफेशनल वेब मीडिया है। जो समाज में घटित किसी भी घटना-दुघर्टना "✿" समसामायिक घटना"✿" राजनैतिक घटनाक्रम "✿" भ्रष्ट्राचार "✿" सामाजिक समस्या "✿" खोजी खबरे "✿" संपादकीय "✿" ब्लाग "✿" सामाजिक "✿" हास्य "✿" व्यंग "✿" लेख "✿" खेल "✿" मनोरंजन "✿" स्वास्थ्य "✿" शिक्षा एंव किसान जागरूकता सम्बन्धित लेख आदि से सम्बन्धित खबरे ही निःशुल्क प्रकाशित करती है। एवं राजनैतिक , समाजसेवी , निजी खबरे आदि जैसी खबरो का एक निश्चित शुल्क भुगतान के उपरान्त ही खबरो का प्रकाशन किया जाता है। पोर्टल हिंदी क्षेत्र के साथ-साथ विदेशों में हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय है और भारत में उत्तर प्रदेश गोण्डा जनपद में स्थित है। पोर्टल का फोकस राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को उठाना है और आम लोगों की आवाज बनना है जो अपने अधिकारों से वंचित हैं। यदि आप अपना नाम पत्रकारिता के क्षेत्र में देश-दुनिया में विश्व स्तर पर ख्याति स्थापित करना चाहते है। अपने अन्दर की छुपी हुई प्रतिभा को उजागर कर एक नई पहचान देना चाहते है। तो ऐसे में आप आज से ही नही बल्कि अभी से ही बनिये गोण्डा लाइव न्यूज के एक सशक्त सहयोगी। अपने आस-पास घटित होने वाले किसी भी प्रकार की घटनाक्रम पर रखे पैनी नजर। और उसे झट लिख भेजिए गोण्डा लाइव न्यूज के Email-gondalivenews@gmail.com पर या दूरभाष-8303799009 -पर सम्पर्क करें।
Showing posts with label आलेख. Show all posts
Showing posts with label आलेख. Show all posts

हिंदुओं की संपत्ति छीनने का औजार बना वक्फ एक्ट 1995? इस राज्य में 6 गांवों की जमीन पर वक्फ बोर्ड ने किया कब्जा

jameen-par-vakph-bord-ne-kiya-kabja

इस्लाम (Islam) को आए 1400 साल ही हुए हैं. लेकिन, वक्फ बोर्ड (Waqf Board) 1500 साल पुराने मंदिर की जमीन पर भी दावा ठोक सकता है. तमिलनाडु (Tamil Nadu) के एक हिंदू बाहुल्य गांव तिरुचेंथुरई को वक्फ एक्ट (Waqf Act) के तहत अपनी मिल्कियत घोषित कर दिया है. जिसमें उस गांव में बना 1500 साल पुराना मंदिर भी आता है.

Tamil Nadu Waqf Board: अगर आप अपनी कोई जमीन या मकान बेचने के लिए रजिस्ट्रॉर दफ्तर जाएं और वहां पता चले कि आपकी जमीन तो आपकी है ही नहीं. उस जमीन पर तो किसी और का कब्जा हो चुका है तो हमारा दावा है कि आपके पैरों तले की जमीन खिसक जाएगी.  

यही हुआ है तमिलनाडु में त्रिची जिले के तिरुचेंथुरई गांव के रहने वाले राजगोपाल नाम के व्यक्ति के साथ. जो अपनी एक एकड़ जमीन बेचने के लिए रजिस्ट्रॉर दफ्तर पहुंचे तो उन्हें पता चला कि जिस जमीन को बेचने के के बारे में वो सोच रहे हैं वो उनकी नहीं रही, वक्फ की हो चुकी है और अब उसका मालिक तमिलनाडु वक्फ बोर्ड है. बात बढ़ी तो रजिस्ट्रॉर दफ्तर से पता चला कि तमिलनाडु वक्फ बोर्ड (Tamil Nadu Waqf Board) ने राजगोपाल की जमीन समेत पूरे गांव की जमीन पर अपना दावा किया हुआ है. जिसमें उस गांव में बना करीब 1500 साल पुराना मंदिर भी आता है.

वक्फ बोर्ड ने कर लिया हिंदू गांव की जमीन पर कब्जा

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है, ऐसा तो हो ही नहीं सकता? जब हमने ये खबर सुनी तो हमें भी यकीन नहीं आया. लेकिन फिर हमने इस दावे की सच्चाई जानने के लिए त्रिची के तिरुचेंथुरई गांव जाने का फैसला किया. फिर जो सच्चाई सामने आई, वो तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की अवैध कब्जा नीति का जीता-जागता सबूत है. 

65 वसंत देख चुके राजगोपाल को जब त्रिची के लैंड रजिस्ट्रॉर ने अपनी जमीन बेचने के लिए चेन्नई जाकर तमिलनाडु वक्फ बोर्ड (Tamil Nadu Waqf Board) से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लाने के लिए कहा तो उन्हें अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ. जब राजगोपाल के हाथ में नोटिस आया तो उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

असल में राजगोपाल अपनी बेटी की शादी के लिए जमीन बेचना चाहते हैं. लेकिन शादी रुक गई है क्योंकि वह इसका खर्च उठाने में असमर्थ हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं आत्महत्या करना चाहता था. मैं अस्वस्थ हूं. 

राजगोपाल की जमीन ही नहीं तिरुचेंथुरई गांव के सारे खेत-खलिहान गांव की जमीनें-मकान. सब पर तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने कब्जा कर लिया है. गांव के लोग ठगा महसूस कर रहे हैं. पुरखों की जमीन को अपना समझते आए थे वो पता चला कि उनकी नहीं है. 

1500 साल पुराने मंदिर को भी बताया अपना

इस गांव में 95 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की है. वर्ष 1985 में 22 मुस्लिम परिवार जरूर यहां आकर बसे हैं. लेकिन पूरा गांव हिंदू बाहुल्य है. करीब पंद्रह हजार की आबादी वाले इस गांव के आसपास करीब 369 एकड़ की संपत्ति है. गांव में एक प्राचीन मंदिर भी है. जो 1500 साल पुराना बताया जाता है. यानी इस्लाम धर्म से भी पहले का.

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड (Tamil Nadu Waqf Board) की इस कारस्तानी पर सवाल उठाने के बजाय रजिस्ट्रॉर कार्यालय गांव वालों को ही नोटिस दे रहा है और घोषणा कर रहा है कि गांव की सारी संपत्ति तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के अधीन है. वक्फ बोर्ड की अनुमति के बगैर कोई संपत्ति ना खरीदी जा सकती है और ना बेची.

सवाल ये है कि एक हिंदू बाहुल्य गांव को वक्फ बोर्ड अपनी प्रापर्टी कैसे घोषित कर सकता है. आखिर कौन से कानून में वक्फ बोर्ड को इस मनमानी की इजाजत मिली है. जो वक्फ बोर्ड को इतनी असीमित ताकतें देता है. अब पूरा तिरुचेंथुरई गांव ये सोच-सोचकर परेशान है कि वक्फ के कब्जे से अपनी जमीनों और संपत्तियों को कैसे छुड़ाएं. 

ये सिर्फ एक गांव का मामला नहीं है, जिस पर तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने अपना मालिकाना हक घोषित कर दिया है. बल्कि अकेले त्रिची जिले में कम से कम 6 ऐसे गांव हैं, जिन्हें वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति घोषित किया हुआ है.
तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने हिंदुओं को भेजा नोटिस

इसका सबूत है तमिलनाडु वक्फ बोर्ड (Tamil Nadu Waqf Board) का वो दस्तावेज है जिसमें त्रिची जिले में वक्फ बोर्ड की सारी संपत्तियों की डिटेल्स हैं. जिसका ब्यौरा त्रिची के रजिस्ट्रार दफ्तर को भेजा गया था. इस दस्तावेज पर 18 अगस्त 2022 की तारीख पड़ी है. ये बीस पन्नों का दस्तावेज है. जिसमें बोल्ड अक्षरों में लिखा है कि वक्फ की संपत्ति को बेचना, अदला-बदली करना, किराये पर देना या ट्रांसफर करना वक्फ एक्ट 1995 के तहत गैरकानूनी है. इस दस्तावेज में त्रिची में वक्फ बोर्ड की संपत्तियों का ब्यौरा दिया गया है.

लेकिन त्रिची के एक हिंदू बाहुल्य गांव पर वक्फ बोर्ड ने अपना मालिकाना हक जताकर कई सवाल पैदा कर दिए हैं. जिन्हें समझने के लिए आपको पहले ये समझना होगा कि आखिर वक्फ होता क्या है और वक्फ बोर्ड कैसे काम करता है. 

वक्फ, अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब होता है - वो संपत्ति, जो अल्लाह के नाम पर दान दी गई हो. वक्फ, पैसे या संपत्ति का हो सकता है, जिसका इस्तेमाल गरीबों की भलाई के लिए हो सके. इसके अलावा अगर किसी संपत्ति को लंबे समय तक इस्लाम धर्म के काम में इस्तेमाल किया जा रहा हो, तो उसे भी वक्फ माना जा सकता है. अगर कोई एक बार किसी संपत्ति को वक्फ कर देता है तो उसे फिर वापस नहीं लिया जा सकता.

क्या होती हैं वक्फ संपत्ति

वक्फ में मिली संपत्तियों और पैसों के मैनेजमेंट के लिए वक्फ बोर्ड होते हैं. जिन्हें आप धरती पर अल्लाह के खजांची यानी अकाउंटेंट भी कह सकते हैं. दरअसल जब कोई मुस्लिम अपनी संपत्ति दान कर देता है तो उसकी देखरेख का जिम्मा वक्फ बोर्ड के पास ही होता है. वक्फ बोर्ड के पास दान दी गई किसी भी संपत्ति पर कब्जा रखने या उसे किसी और को देने का अधिकार होता है. 

भारत में वक्फ संस्थाओं का वजूद 800 साल से है. जिसकी शुरुआत मुस्लिम बादशाहों द्वारा दान की गई जमीनों की देखभाल करने से हुई. इस समय भारत में एक केंद्रीय वक्फ बोर्ड और 32 राज्य वक्फ बोर्ड हैं. जिन्हें रेगुलेट करने के लिए वक्फ बोर्ड एक्ट 1995 है. अब इसी कानून के आईने में तमिलनाडु वक्फ बोर्ड की कारस्तानी का DNA टेस्ट करते हैं.

पॉइंट नंबर वन 

वक्फ एक्ट (Waqf Act 1995) के नियमों के मुताबिक, वक्फ बोर्ड सिर्फ उस संपत्ति पर दावा कर सकता है जो इस्लाम धर्म को मानने वाले किसी शख्स ने धार्मिक काम के लिए दान में दी हो. तो फिर तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने पूरे गांव को अपनी संपत्ति कैसे घोषित कर दिया?

पॉइंट नंबर टू 
वक्फ कानून के मुताबिक वक्फ बोर्ड के पास गैर मुस्लिमों की संपत्ति पर दावा करने का अधिकार नहीं है. तो फिर एक हिंदू बाहुल्य गांव पर वक्फ बोर्ड ने दावा कैसे कर दिया?

पॉइंट नंबर थ्री 
वक्फ बोर्ड एक्ट 1995 में कहीं नहीं लिखा कि वक्फ बोर्ड, किसी निजी प्रॉपर्टी पर अपना दावा ठोक सकता है. तो फिर तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने राजगोपाल नाम के हिंदू शख्स की जमीन पर दावा कैसे ठोक दिया?

चौथा और सबसे बड़ा पॉइंट 
वक्फ एक्ट 1995 (Waqf Act 1995) के ही सेक्शन 3 में वक्फ की परिभाषा है जिसके मुताबिक कोई भी ऐसी चल या अचल संपत्ति, जो मुस्लिम लॉ द्वारा मान्यता प्राप्त किसी धार्मिक या चैरिटेबल काम के लिए पूरी तरह से दान में दी गई हो, वो वक्फ बोर्ड की प्रॉपर्टी होगी. सवाल ये है कि त्रिची के जिस गांव को तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति बताया है, उसे किसने दान में दिया ?

इन सवालों के जवाब तमिलनाडु वक्फ बोर्ड को देने हैं लेकिन वो सवाल पूछे जाने पर सीधा जवाब देने के बजाय बातों को गोल-गोल घुमा रहा है और वक्फ बोर्ड की संपत्तियों पर अवैध कब्जों को लेकर ज्यादा चिंतित नजर आ रहा है.

वक्फ बोर्ड को दे दिए गए असीमित अधिकार
आसान भाषा में कहें तो वक्फ बोर्ड के पास असीमित अधिकार हैं कि वो मुस्लिम चैरिटी के नाम पर संपत्तियों पर हक जता सके. लेकिन उसे ये हक कैसे मिला, इसे समझने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को पलटना होगा.

दरअसल बंटवारे के बाद पाकिस्तान से जो हिंदू भागकर हिंदुस्तान आए, पाकिस्तान में उनकी संपत्तियों पर मुसलमानों और पाकिस्तान सरकार ने कब्जा कर लिया . लेकिन भारत से पाकिस्तान जा चुके मुसलमानो की जमीन को भारत सरकार ने वक्फ बोर्ड को दे दिया. जिसके बाद वर्ष 1954 में वक्फ बोर्ड एक्ट बना. लेकिन वर्ष 1995 में वक्फ बोर्ड एक्ट में बदलाव कर वक्फ बोर्ड्स को जमीनों के अधिग्रहण के असीमित अधिकार दे दिए गए. जिसके बाद वक्फ बोर्ड की संपत्ति में दिन दोगुनी, रात चौगुनी रफ्तार से इजाफा होने लगा.

देश में तीसरे नंबर पर सबसे ज्यादा संपत्तियां
वक्फ मैनेजमेंट सिस्टम ऑफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक इस वक्त वक्फ बोर्ड्स के पास कुल 8 लाख 54 हजार 509 संपत्तियां हैं जो आठ लाख एकड से ज्यादा जमीन पर फैली हैं. आपको जानकर हैरानी होगी कि सेना और रेलवे के बाद सबसे ज्यादा जमीन वक्फ बोर्ड्स के पास है. सेना के पास करीब 18 लाख एकड़ जमीन पर संपत्तियां हैं. जबकि देश में रेलवे की चल-अचल संपत्तियां करीब 12 लाख एकड़ में फैली हैं.

वर्ष 2009 में वक्फ बोर्ड की संपत्तियां चार लाख एकड़ जमीन पर फैली थी. जो अब बढ़कर दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी हैं. जबकि देश में जमीन उतनी ही है जितनी पहले थी. फिर भी वक्फ बोर्ड की जमीन कैसे बढ़ रही है? आरोप लगते हैं कि वक्फ बोर्ड, देश में जहां भी कब्रिस्तान की चारदीवारी करवाता है, उसके आसपास की जमीन को भी वक्फ अपनी संपत्ति मान लेता है. इसी तरह अवैध मजारों और मस्जिदों को धीरे-धीरे वक्फ बोर्ड, अपनी संपत्ति घोषित कर देता है. आसान भाषा में इसे लोग अतिक्रमण कहते हैं और वक्फ बोर्ड को इस अतिक्रमण का अधिकार 1995 का वक्फ बोर्ड कानून देता है.

किसी की भी संपत्ति छीन सकते हैं वक्फ बोर्ड
वक्फ एक्ट (Waqf Act 1995) का सेक्शन 3 बताता है कि अगर वक्फ सोचता है कि जमीन किसी मुस्लिम से संबंधित है, तो वह वक्फ की संपत्ति है. यहां ध्यान दीजियेगा कि वक्फ का सिर्फ सोचना ही काफी है, उसे इसके लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं है. अगर वक्फ ने ये मान लिया कि आपकी संपत्ति, आपकी नहीं, बल्कि वक्फ बोर्ड की है तो फिर आप अदालत भी नहीं जा सकते. आप वक्फ की ट्रिब्यूनल कोर्ट में जा सकते हैं.

वक्फ एक्ट का सेक्शन 85 कहता है कि अगर वक्फ बोर्ड ट्रिब्यूनल को आप संतुष्ट नहीं कर पाते कि ये आपकी ही जमीन है तो आपको जमीन खाली करने का आदेश दे दिया जाएगा. ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम होगा. कोई सिविल कोर्ट, वक्फ ट्रिब्यूनल कोर्ट के फैसले को बदल नहीं सकती है.

वक्फ एक्ट का सेक्शन 40 कहता है कि जब वक्फ बोर्ड किसी शख्स की जमीन पर दावा करता है तो जमीन पर दावा सिद्ध करने की जिम्मेदारी वक्फ बोर्ड की नहीं होती है बल्कि जमीन के असली मालिक को अपनी जमीन पर मालिकाना हक साबित करना होता है.

यानी अगर वक्फ बोर्ड किसी जमीन पर दावा कर दे तो समझो वो जमीन उसकी हो गई. तमिलनाडु में भी यही हुआ है. दिल्ली हाई कोर्ट में इसी साल अप्रैल में एक याचिका दायर की गई है जिसमें वक्फ एक्ट के प्रावधानों को चुनौती दी गई है.

वर्ष 1995 में बनाया गया था यह कानून
एक सेकुलर देश में एक धार्मिक एक्ट (Waqf Act 1995) लागू है. ये अपने आप में हैरानी की बात है क्यों हिंदुओं, ईसाईयों और सिखों के लिए ऐसा कोई एक्ट नहीं है? केवल मुस्लिमों को लिए ही क्यों है? विडंबना देखिये कि वर्ष 1991 में Places of Worship Act बना जो कहता है कि देश की स्वतंत्रता के समय जो धार्मिक स्थल जिस स्वरूप में था, उसे वैसे ही बरकरार रखा जाएगा. वहीं 1995 में वक्फ एक्ट लागू होता है जो देशभर में वक्फ बोर्ड को ये अधिकार देता है कि वो किसी भी संपत्ति पर अपना हक जता सकता है और इसके खिलाफ पीड़ित पक्ष देश की किसी अदालत में गुहार तक नहीं लगा सकता.

किसी भी मुस्लिम देश में नहीं है ऐसा विधान
ये सुनने में ही अजीब लगता है कि एक धर्मनिरपेक्ष देश में ऐसा एक्ट है. जबकि किसी मुस्लिम देश में ऐसा कोई एक्ट नहीं है. तुर्की, लीबिया, इजिप्ट, सुडान, लेबनान, सीरिया, जोर्डन और इराक जैसे मुस्लिम देशों में ना तो कोई वक्फ बोर्ड है और ना ही कोई वक्फ कानून. हमारा मानना है कि भारत में भी वक्फ एक्ट की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. सरकार को वक्फ एक्ट को रद्द कर देना चाहिए और सभी धर्मों के लिए एक जैसा एक्ट बनाया जाना चाहिए.

[ Read More ]»

दालों को जब कुकर में बनाया जाता है तो क्या गलती की जाती है जिससे घर के बच्चों तक का यूरिक एसिड बढ़ जाता है ?

 
tak-ka-yoorik-esid-badh -jaata-hai

परिवार में बार बार सब का यूरिक एसिड बढ़ा हुआ आ रहा था। जब नूट्रिशनिस्ट से बात की ताकि पता चल सके भोजन में किस किस्म के बदलाव किए जाएं, तब उसने दाल बनाने के सही तरीके के बारे में बताया। दाल कभी भी यूरिक एसिड नहीं बढ़ाती अगर सही तरीके से बनाई जाए। अगर दाल के गुणों का सही फायदा उठाना है तो एक छोटी सी चीज का ध्यान रखना चाहिए।

दाल को कम से कम एक घंटा जरूर भिगोना चाहिए। इससे दाल का स्वाद अधिक बढ़ कर आता है और पकाने का समय भी कम हो जाता है।
tak-ka-yoorik-esid-badh -jaata-hai-01


दाल, पानी, हल्दी और नमक को कुकर में डाल कर सीधे बंद कर नहीं पकाना चाहिए। यही वह गलती है जो यूरिक एसिड को बढ़ाती है।

पहले दाल, पानी, हल्दी, लहसुन, अदरक और नमक को कुकर में डाल कर बिना ढककन के उबाल आने देना चाहिए। जब दाल में उबाल आता है तो साथ में झाग भी आती है। उस झाग को किसी बड़े चम्मच की मदद से निकाल देना चाहिए और फिर कुकर को बंद कर दाल पकानी चाहिए। यही झाग ही यूरिक एसिड को बढ़ाती है।

पहले समय में जब कूकर नहीं थे और दाल को चूल्हे पर सगली (गोल आकार का बर्तन ) में बनाया जाता था तब झाग निकाल दी जाती थी और हो सकता है अब भी कुछ घरों में इस बात का ध्यान रखा जाता हो।
ka-yoorik-esid-badh -jaata-hai-02


दाल के छोंक में हींग और करी पत्ता का इस्तेमाल करना चाहिए। करी पत्ते का नियमित सेवन यूरिक एसिड को न केवल कम करता है बल्कि यूरिक एसिड को होने भी नहीं देता है।

आप कमेंट बॉक्स में लिख कर जरूर बताएं कि आप के यहाँ इस झाग को निकाला जाता है या नहीं।


[ Read More ]»

औरते अक्सर आदमियों के लिए ऐसा क्यों बोलती हैं कि आदमी कुत्ता कमीना होता है?

kutta-kameena-hota-hai

हां हां , मैने भी ऐसा सुना है , हम एक महिला जी से इसका कारण भी पुछे थे और तुरंत इसका जवाब भी मिल गया था । बंगाली भाषा में उन्होंने मुझे समझा दिए थे , आदमी का मन और कुत्ते का धन , दोनो एक जैसा ही होता है । अब इसका मतलब समझाते हैं । बंगाली में  धन मतलब पुरुष लिंग यानी पुरुष यौनांग भी होता है । तो बात ये होता है कि कुत्ते लोगों का जब मेटिंग का सीजन आता है , यानी कुतरिया के साथ शारीरिक मिलन का , तब कुत्ता ये नही सोचता है कि किस कुतरिया के शरीर में वो प्रवेश कर रहा है , यानी अपना  धन जहां मौका मिला वहीं प्रवेश करा दिया , तो आदमी भी कुत्ता जैसा ही होता है , जहां , जब मौका मिला अपना धन प्रवेश करा दिया , यानी कि किसी भी महिला से शारीरिक संबंध बना लिया । हमने उस महिला से पुछे कि , आपका पति ? महिला जी तुरंत जवाब दिए , वो तो दुनिया का सबसे बड़ा कुत्ता है । मैं चुप हो गया ।


आदमी को कुत्ता कमीना कहना यानि कुत्ते को गाली देना --क्या सही है ?

अपने पसंदीदा फ़िल्मी हीरो धर्मेन्द्र की फिल्मों में अक्सर एक डायलोग सुनने को मिलता है --कुत्ते कमीने मैं तेरा खून पी जाऊँगा ।

टोरंटो कनाडा के एक बड़े मॉल में घूमते हुए अचानक एक स्टाल पर नज़र पड़ी । लिखा था --डॉग्स मीट । हम हैरान हो गए यह सोचकर कि यहाँ भी लोग कुत्तों का मीट खाते हैं । यह आदत तो पूर्वी एसिया के लोगों में पाई जाती है । फिर पता चला कि वह कुत्ते का मीट नहीं बल्कि कुत्तों के खाने के लिए मीट था जो बेचने के लिए रखा था ।

कहते हैं कुत्ता मनुष्य का सबसे सच्चा दोस्त होता है । वह वफ़ादार भी होता है । कुत्ता शायद सबसे पहला जानवर है जो मनुष्य के साथ घरेलु बना । आज कुत्तों के बिना बहुत से घरों में सूनापन सा हो जायेगा । बहुत से लोग कुत्तों से प्यार भी बहुत करते हैं ।

दरअसल कुत्तों में गुण ही ऐसे हैं कि मनुष्य भी उनके सामने काफ़िर सा नज़र आने लगता है । लेकिन हम मनुष्य हैं कि कुत्तों से कुछ भी नहीं सीखते ।

आइये देखते हैं कुत्ते और मनुष्य में समानता और विभिन्नताएं :

जनसँख्या में आदमी और कुत्तों में बस एक समानता है
दोनों में मादाएं कम , और नरों की संख्या ज्यादा है ।

लेकिन आदमी और कुत्ते में एक अंतर है बहुत भारी
और वो है कुत्ते की मालिक के प्रति वफ़ादारी ।

कुत्ता अपने मालिक के लिए जान भी दे देता है
आदमी जिस थाली में खाता है , उसी में छेद कर देता है ।

कुत्ता गली में कभी दुसरे कुत्ते को नहीं काटता
आदमी है कि रोड रेज़ में सीधा गोली मारता ।

कुत्ता नींद में भी जागता है , भरोसेमंद है
आदमी नशे में ही भागता है , भरोसा बंद है ।

रोटी के इक टुकड़े से कुत्ते को मिलता संतोष
पैसे के पीछे आदमी अक्सर खो देता है होश ।

एक बार एक आदमी और कुत्ते में बहस हो गई कहीं
कुत्ता बोला कभी मैं भी इंसान था , मगर तेरी तरह कुत्ता नहीं ।

मैं भी सोचता हूँ कि काश कितना अच्छा होता
यदि आदमी आदमी न होकर एक कुत्ता होता ।

तब न होती काम , क्रोध , मद , लोभ की बीमारी
और आदमी भी होता कुत्ते की तरह सदाचारी ।

नोट : अब ज़रा आप ही बताएं कि आदमी को कुत्ता कमीना कहकर गाली देना क्या सही है। साथ ही कोशिश करें और चित्र में दिखाए कुत्ते की नस्ल बताने का प्रयास करें ।



[ Read More ]»

गुरुकुल का नाश करके मिशनरीज शिक्षा लागू होने से तीन बहुत बड़ी बीमारी समाज को मिल गईं

samaaj-ko-mil-gaeen

 1. चरित्रहीनता - सखी प्रथा(गर्लफ्रेंड कल्चर) और व्यभिचार (विवाहोत्तर सम्बन्ध)

2. अवसाद (डिप्रेशन)
3. वैचारिक गुलामी - स्वरोजगार का अन्त
चरित्रहीनता -
जब गुरुकुल से बच्चे निकलते थे तो 25वर्ष की आयु तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते थे। मानसिक दुर्बलता बस अधोगामी हो कर नैतिक पतन का पथ कभी विकल्प नहीं बन पाता था। बाकायदा ब्रह्मचर्य का पठन पाठन होता था और गृहस्त होने की भी दीक्षा दी जाती थी। शीलवान, गुणवान, नीतिवान, धर्मसम्मत, और कर्तव्यनिष्ठ होने की शिक्षा हर पुरुष और नारी को दी जाती थी। अर्जुन ने यदि गुरुकुल में धनुर्विद्या में करतब किये थे तो धर्मराज युधिष्ठिर भी गुरुकुल में ही सत्य बोलने में पारंगत हुए थे। भीष्म ने नीतिशास्त्र की शिक्षा वृहस्पति देव से ली थी तो युद्धनीति की शिक्षा भगवान भार्गव से ली थी। महाभारत शान्ति पर्व में भीष्म ने सम्पूर्ण नीतियों का बखान किया है जो भौतिक गीता से कम महत्व नहीं रखती। प्रेम एक शास्वत विषय है। कृष्णा और कृष्ण कोई भाई बहन नहीं थे और कृष्णा के स्वयम्बर में कृष्ण उपस्थित भी थे परन्तु उन्होंने मछली की आँख बेधन में जरा भी अपनी रुचि नहीं दिखाई जबकि कृष्णा ने उन्हीं के इशारे पर कर्ण को सूतपुत्र कहकर उसका वरन करने से मना कर दिया था। मतलब विवाह से पहले ही दोनों सखा थे और विवाह के उपरान्त तीनों सखा हो गए। तीसरे सखा थे अर्जुन। एक सखा ने अपने सखा का विवाह अपनी सखी से करवाने के लिए हर सम्भव प्रयास किये। सखा भाव में वासना, विवाहोत्तर सम्बन्ध यानी व्यभिचार आदि का नाम तक किसी के दिमाग में नहीं आया बल्कि राजसूर्य यज्ञ सम्पन्न होने के बाद जब पांचों भाई अपने संबंधियों के साथ गंगा स्नान को जा रहे थे तो सबसे पहले तीनों सखा ही एक दूसरे पे पानी रँग आदि फेंकने सुरु हो गए और गीले वस्त्रों में भी किसी स्त्री को कोई जरा सी भी परेशानी महसूस नहीं हुई बल्कि भीम आदि सब कूद पड़े और खूब जम के होली से पहले ही होली खेल डाले। वहाँ अर्जुन बताते भी हैं कि कुलीन पुरुष की दृष्टि "आनन्द विभोर" होती है जिसमें कलुषित व निम्न विचारों का स्थान नहीं होता। इसलिए सब स्त्रियाँ गीले वस्त्रों में भी सहज हैं क्योंकि वहाँ वस्त्र या शारीरिक बनावट देख ही कौन रहा है? वहाँ सब नयनाभिराम हैं, आंखों में आनन्द और मन में उल्लास है न कि आंखों में सुअर का बाल और मन में वासना है। अब मिशनरीज ने नारा दिया है कि एक लड़का और एक लड़की सखा नहीं हो सकते। अब तो गर्लफ्रैंड कल्चर बन गया है सखा भाव। जिस उम्र में ब्रह्मचर्य का पालन द्रढ़ता से करना है ताकि मजबूत बेस का पुरुष बने उस उम्र में वर्जिनिटी गँवाने को उतावले घूम रहे। जवानी बर्दास्त कर पाने लायक मार्गदर्शन नहीं हो रहा बल्कि मियाँ खलीफा और सन्नी लियोनी जैसे लोग जमीन से निकल रहे बच्चों के टीचर बने हुए हैं। व्यभिचार तो बचपन से ही आरम्भ हो गया। सारी मिशनरी शिक्षा का एक ही मूल है - नौकरी और छोकरी ...
अवसाद -
जीवन किस पद्दति से जीना है ताकि शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ्य रहें? संघर्ष के दिनों में हीन भावना का जरा भी प्रादुर्भाव न होने पाय
👈
ये सब शिक्षा के अंग थे जोकि अब परीक्षा पास करने के प्रेशर में बदल गए। कुरुकुल में पात्र के अनुरूप शिक्षा दी जाती थी और हस्तकला विज्ञान में तो मंदबुद्धि भी निपुण हो जाते थे। कुम्हार, बढ़ई, लोहार, सुनार, नाई, किसानी, नाविक, पत्थर कटिंग आदि की ट्रेनिंग तो पिता से ही मिल जाती थी और गुरुकुलों में भवन निर्माण से लेकर आयुर्वेद तक की शिक्षा से कोई भी व्यक्ति कम से कम भूंखों नहीं मरता था। सबके पास चारित्रिक बल, नैतिक बल व रोजगार होने से समाज मे अवसाद नामक बीमारी का कोई स्थान ही नहीं था। श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता गुरुकुल में हुई थी क्योंकि वहां किसी के लिए कोई VIP ट्रीटमेंट नहीं था। सभी ब्रह्मचारियों को भिक्षा माँगनी है। सभी को वही पहनना है जो गुरु ने दे दिया। किसी राजा के बेटे और किसी गरीब ब्राह्मण के बेटे में कोई भेदभाव नहीं है। गुरुमाता को अपने गायब बेटे की झलक कृष्ण में दिखती है परन्तु सुदामा उम्र में बड़े हैं तो चने उन्हीं सुदामा को सौपें गए कि मेरे कृष्ण को भूखा मत रखना। ऐसा नहीं हुआ कि सुदामा को चना और कृष्ण को मोहनभोग दिया हो। सुदामा को जब सुशीला भेज रहीं हैं श्रीकृष्ण के पास तो भेंट में चावल की पोटली दे रहीं हैं और सखा को भेंट करने के लिए बिना कोई संकोच सुदामा ने वो पोटली रख ली। संकोच तो श्रीकृष्ण का वैभव देखने के बाद हुआ कि यहाँ मेरी पोटली का होगा क्या? लेकिन भेंट परम्परा तो दोनों ने एक ही गुरुकुल में सीखी थी तो कन्हैया जी मांग लेते हैं - मित्र मेरी भेंट किधर है? भाभी ने कुछ दिया नहीं मेरे लिए? राजा को भी संकोच नहीं कि एक गरीब सखा से भेंट माँग रहा। एडिकेट्स, आचार, सदाचार, परस्पर व्योहार आदि सब भी गुरुकुल सिखाते थे। न सुदामा को गरीबी का अवसाद है न श्रीकृष्ण को अमीरी का घमण्ड। गुरुकुल में सिखाई गई परम्परा में राजगद्दी का घमण्ड घुसेड़ा था द्रुपद ने, जिंदगी भर जलील होते रहे अस्वस्थामा से जिसने उसका आधा राज्य जीवन भर दबा के रखा। अवसाद तो उनको होता था जो नीति विरुद्ध कार्य करते थे, नीति पे चलने वाले को कोई दूसरा ताप ही नहीं था। आज नीतिशास्त्र का सब्जेक्ट तक नहीं सिलेबस में लेकिन जो गुरुकुल बचे हुये हैं उनमें आज भी पढ़ाया जाता है। अब आचार्यों का ही प्रकल्प विद्रूप हो गया तो रिस्टोर करने के लिए भगवान आदिशंकर को एक बार फिर औतार लेना पड़ेगा ताकि समाज में शिक्षक पैदा हों। आज जो कुछ नहीं बन पाया वो शिक्षक बन जाता है।
वैचारिक गुलामी -
आज की उच्च शिक्षा से डॉक्टर और इंजीनियर ही बन सकते हैं। ज्यादा से ज्यादा वैज्ञानिक बन जायेंगे परन्तु 130 करोड़ की जनसंख्या में जब सब नौकरी के लिए ही घूमेंगे तो कितनों को नौकरी मिल पाएगी? हर बाप की चाहत है कि उसका बेटा इंजीनियर बने भले भैंसिया बिक जाय। अपना प्लाट बेंच के MBA किया फिर बिल्डर के प्लाट बेंचने की नौकरी कर रहे हैं। ऊपर से टारगेट की वजह से जालसाली करना और फिर टारगेट और जालसाजी दो तरह से प्रेशर में पिस के बीमारी ओढ़ लेना। जितना कमाया उससे इलाज करा लो और बस हो गई जिंदगी पूरी ... अभिवावक अपने बच्चों के मन में बचपन में ही विचार डाल देते हैं कि उनको नौकरी करनी है। बड़े होने तक बच्चे को भी समझ आ जाता है कि नौकरी नहीं तो छोकरी नहीं। बस लग जाता है गुलाम बनने के लिए मेहनत करने में। कहाँ गुलामी से बचने के लिए मेहनत करना चाहिए और कहाँ हम गुलाम बनने के लिए मेहनत करते हैं। जीवन का मूल उद्देश्य बस कैसे भी पैसा कमाना और बीबी बच्चे पालना
👈
बस यही जीवन भर की शिक्षा का मूल रहता है। ऐसी मानसिक गुलामी में जिंदगी जीने के बाद 70 वर्ष की उम्र में भी आदमी के दिमाग में शराब, शबाब और कबाब ही घुसा रहता है। वासनाओं से तृप्ति नहीं मिलती। गाँधी, 70 वर्ष की उम्र में औरतबाजी करता है और उसका नाम देता है - ब्रह्मचर्य के प्रयोग
👈
ये मैकाले की थोपी मानसिक गुलामी नहीं है तो और क्या है??
धर्माचार्यों को राजनीति और संपत्ति पर कब्जे के केस लड़ने से ही फुर्सत नहीं, समाज पूरी तरह से गर्त में गिरे तो उनको क्या? उनकी गद्दियों की पूजा करो और चढ़ावा चढ़ाओ तो ही 2-4 मिनट का समय मिल सकता है वो भी साथ में नेता या अधिकारी की डिग्री होनी चाहिए ...!!
[ Read More ]»

विनेगर क्या है? इसके कितने प्रकार है और इसके उपयोग क्या है?

vinegar-kya-


विनेगर को अल्कोहलिक लिक्विड का फर्मेंटेशन करके बनाया जाता है। कई फर्मेंटेड सामग्री जैसे- नारियल, चावल, खजूर, शहद आदि की सहायता से विनेगर को बनाया जाता है। स्वास्थ्य और खूबसूरती से लेकर वजन घटाने तक विनेगर के कई इस्तेमाल और बेशुमार फायदे हैं।

विभिन्न प्रकार के विनेगर - 


एप्पल साइडर विनेगर -
भारत के साथ अमेरिका में भी एप्पल साइड विनेगर का प्रयोग ही सबसे ज्यादा किया जाता है। हल्के पीले रंग के इस विनेगर को सेब को दबाकर बनाया जाता है, जो इसे खास किस्म का फ्लेवर देता है। सलाद ड्रेसिंग, मैरिनेड आदि में एप्पल साइडर विनेगर का प्रयोग बखूबी किया जाता है।

व्हाइट विनेगर - 
पकाने में सबसे ज्यादा व्हाइट विनेगर का ही प्रयोग किया जाता है। इसे व्हाइट वाइन से तैयार किया जाता है। इसका स्वाद तीखा होता है, जो चिकन या फिश डिशेज में खूब इस्तेमाल में लाया जाता है। खासतौर पर चाइनीज़ व्यंजनों में इस तरह के विनेगर का इस्तेमाल किया जाता है।

राइस विनेगर - 
यह विनेगर के पुराने प्रकार में से एक है। इसे राइस वाइन को फर्मेंट करके बनाया जाता है। राइस विनेगर सफेद, लाल और काले रंग में मिलता है। व्हाइट राइस विनेगर का प्रयोग अचार बनाने में किया जाता है, जबकि रेड राइस विनेगर का प्रयोग सॉस और डिप्स को बनाने में किया जाता है।

बैलसेमिक विनेगर - 
इसे डार्क ब्राउन कलर विनेगर के तौर पर जाना जाता है, जिसे बिना फिल्टर और बिना फर्मेंट किए अंगूर से बनाया जाता है। अन्य विनेगर की बजाय बैलसेमिक विनेगर को फर्मेंटेड अल्कोहल से नहीं बनाया जाता है और यही वजह है कि यह विनेगर इटली में काफी प्रसिद्ध है। इसे अंगूरों को दबाकर तैयार किया जाता है और वाइन की तरह लंबे समय तक छोड़ दिया जाता है।

माल्ट विनेगर - 
लाइट गोल्डन रंग का यह विनेगर ऑस्ट्रिया, जर्मनी और नीदरलैण्ड में काफी पॉपुलर है। यह बीयर से बनता है और इसका स्वाद तीखा होता है। माल्ट विनेगर में एसिटिक एसिड होता है, जिसकी वजह से वजन प्रबंधन के लिए यह बेहतरीन है।

शुगरकेन विनेगर - 
इसे केन विनेगर कहा जाता है, जो गन्ने से बनता है। इसका स्वास राइस विनेगर की तरह ही होता है। नाम के ठीक उलट, शुगरकेन विनेगर स्वाद में बिल्कुल मीठा नहीं होता है। इसका स्वाद अन्य विनेगर की तरह ही होता है।

खाने में विनेगर का प्रयोग

देश- विदेश के किचन में विनेगर का प्रयोग खूब किया जाता है। हमारे यहां तो इसका प्रयोग खान- पान में पहले कम किया जाता था लेकिन समय के साथ नए डिशेज और रेसिपी के चलन के साथ हमारे यहां भी विनेगर का प्रयोग अब काफी किया जाने लगा है।

अचार - Pickle-सलाद - Salad

अपने भारतीय घरों में खाना अचार के बिना अधूरा है। दाल - चावल खाना हो या पूरी, अचार के साथ जायका बढ़ जाता है। हमारे यहां के अचार में खास तरह के मसालों का प्रयोग किया जाता है। लेकिन इन दिनों अचार में विनेगर का प्रयोग खूब किया जा रहा है। विनेगर को अचार में मिलाने से अचार का स्वाद भी बढ़ जाता है और यह लंबे समय तक टिक भी जाता है।


[ Read More ]»

अजीनोमोटो क्या है, इसके फायदे और नुकसान

 
ajeenomoto

यह नमक जैसा होता है जिसका अपने आप में एक खास स्वाद होता है . इसका ज्यादातर इंडो चाइनीज खाने में उपयोग किया जाता है . इसका उपयोग स्वाद बढ़ाने के लिए सीजनिंग के रूप में किया जाता है . यह बड़े ग्रोसरी स्टोर्स पर मिल जाता है

अजीनोमोटो का दूसरा नाम मोनो सोडियम ग्लूटामेट भी है , इसके अलावा इसे एमएसजी के नाम से भी जानते है . चोओ , टोक्यो में अजीनोमोटो ( Ajinomoto ) की कम्पनी का मुख्य कार्यालय स्थित है . 26 देशो में ये काम करता है . इसका वार्षिक राजस्व 2013 में करीब 12 अरब अमरीकी डॉलर है . चीन की खाध्य पदार्थो में खाने के स्वाद को दौगुना करने के लिए अजीनोमोटो का ज्यादातर उपयोग किया जाता है . पहले की अपेक्षा अब हम घर की बजाय बाहर का खाना पसंद करते है , इसके अलावा चिप्स , पिज्जा और मेगी जैसे खाने को पसंद करते है जिनमे अजीनो मोटो का उपयोग होता है . टोमेटो साँस , फ़ास्ट फ़ूड सोया साँस जैसे सभी संरक्षित खाध्य उत्पादों में इसका उपयोग होता है .

अजीनोमोटो क्या है -

जापानी जैव रसायनज्ञ किकुनाए एकेडा ने 1909 में अजीनोमोटो की खोज की . इसके टेस्ट यानि स्वाद को उन्होंने मामी के रूप में पहचाना मतलब सुखद स्वाद के रूप में . इसका इस्तेमाल कई जापानी सूप में होता है . थोडा नमक के जैसा इसका स्वाद होता है ( Ajinomoto Salt ) . यह चमकीले छोटे क्रिस्टल की भांति दिखाई देते है . एमिनो एसिड अजीनोमोटो ( Ajinomoto ) में पाया जाता है . यह एक Veg Material है . यह एक TradeMark Product है जिसे Originally मानी Japanese Company द्वारा बनाया गया है . इसका सीमित मात्रा में सेवन करना सुरक्षित है परन्तु अत्यधिक मात्रा में उपयोग करने से इसका सेवन हानिकारक है . इसे जिस फ़ूड में डाला जाता है ये उसका स्वाद बढ़ा देता है .

अजीनोमोटो का उपयोग -

चायनीज खाने में विशेष रूप से अजीनोमोटो ( Ajinomoto ) का उपयोग किया जाता है . इसका उपयोग करके लोग खाने को स्वादिष्ट बनाते है .

इसका इस्तेमाल सुरक्षित माना गया है , अपितु इसके आस पास कुछ गलतफहमी भी पनप रही है जो की वैज्ञानिक रूप से अभी प्रमाणित नहीं हो पाई है . सब्जियों के मसाले में इसका उपयोग किया जाता है .

1908 में यह एक ब्रांड के रूप में व्यवसायिक तौर पर आया . किन्तु आज दुनिया में हर खाने को स्वादिष्ट बनाने में प्रयोग में लिया जाता है .

इसका इस्तेमाल चायनीज खाने जैसे नुडल्स , सूप आदि कई प्रकार के खाने में किया जाता है .

अजीनोमोटो के नुकसान -

पहले इसका उपयोग केवल चीन में रसोई में होता था , पर धीरे धीरे हम सभी के घरो में इसका उपयोग होना शुरू हो गया है और एक अच्छी पैठ बना चूका है . हम 2 मिनट में नुडल्स बनाकर अपने समय बचाने के चक्कर में खाते है उनमे ये पाया गया है की ये धीरे धीरे हमारे शरीर को हानि पहुचाता है . और इससे हमारे शरीर में साइड इफ़ेक्ट) होने लगता है .

इसका सेवन करने से शरीर में इन्सुलिन की मात्रा बढ़ जाती है . और इसके सेवन से रक्त में ग्लूटामेट का स्तर बढ़ जाता है . जसी वजह से शरीर पर काफी गम्भीर प्रभाव पड़ता है .

ये एक नशे की तरह कार्य करता है . एक बार इसे खा लेते हो तो बार बार खाने का जी चाहता है और इसे खाने से नुकसान होता है .

एमएसजी को एक धीमा हत्यारा कहना गलत नहीं है क्योंकि ये आँखों की रेटिना को नुकसान पहुचाता है साथ ही ये थायराईट और केंसर जैसे रोगों के लक्षण पैदा कर सकता है .

अजीनोमोटो से होने वाली हानि -
अजीनोमोटो का उपयोग करना हमारे लिए नुकसानदेय है उसके बारे में हम ऊपर बात कर चुके है . अब हम बात करेंगे की उससे बड़ा नुकसान क्या हो सकता है इसके उपयोग से . वैसे इसका उपयोग करना लाभदायक भी है इसके बारे में हम निचे डिटेल से बात करेंगे फ़िलहाल हम जानते है – MSG Harmful Effects

माइग्रेन : 
अजीनोमोटो का रोजाना सेवन करने से हमारे आधे सिर में हल्का हल्का दर्द होने लगता है . जिसको हम माइग्रेन अथवा अधकपाली भी कहते है .

तंत्रिका पर प्रभाव : 
ये तंत्रिका को प्रेरित कर उसमे असंतुलन पैदा कर सकती है . इस वजह से शरीर में झनझुनी और गर्दन में खिचाव या अकडन होने लगती है . अजीनोमोटो ( Ajinomoto ) के सेवन से अल्झाइमर, हन्तिन्ग्तिओन और पार्किन्सन , मल्टीपल स्क्लेरोसिस जैसी लक्षण पैदा होने लगते है . ये एक न्युरोत्रन्स्मित्टर है जो अनिद्रा जैसे विकारो के भी लक्षण पैदा कर सकते है .

बच्चो के हानिकारक : 
बच्चो को अजीनोमोटो युक्त खाध्य पदार्थो से दूर रखना चाहिए . इसका प्रभाव अलग अलग व्यक्ति पर अलग अलग तरीके से होता है . अगर किसी व्यक्ति में इसका प्रभाव नहीं पड़ता है तो वो इसका उपयोग कर सकता है .

बांझपन : 
गर्भवती महिलाओ का इसका उपयोग बिलकुल भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ये बच्चे और महिला के बीच भोजन आपूर्ति में बाधक बन सकता है . इसके साथ साथ मस्तिष्क के न्यूरोस पर भी बुरा प्रभाव डालता है . यह शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ा देता है जिस वजह से रक्तचाप बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है . साथ ही पैरो में सुजन की समस्या होने लगती है .

सीने में दर्द : 
अजीनोमोटो का उपयोग करने से अचानक सीने में दर्द , धडकन का बढ़ जाना और ह्रदय की मांसपेशियों में खिंचाव होने लगता है .

मोटापा बढ़ना : 
एमएसजी के अधिक सेवन से मोटापे के बढ़ने का खतरा हमेशा बना रहता है . हमारे शरीर में मौजूद लेप्टिन हार्मोन , हमें भोजन के अधिक सेवन को रोकने के लिए हमारे मस्तिष्क को संकेत देते है . अजीनोमोटोके सेवन से ये प्रभावित हो सकता है जिस वजह से हम ज्यादा भोजन कर जल्द ही मोटापे से ग्रस्त हो सकते है .

अजीनोमोटो के लाभ -
टमाटर , समुद्री मछलियों , पनीर और मशरूम जैसे खाध्य पदार्थो में प्राकृतिक रूप से ग्लूटामेट पाया जाता है . जिससे इसमें अलग इस्तेमाल नहीं किया जाता और यह हानिकारक भी नहीं होता है . अगर किसी व्यक्ति को अजीनोमोटो खाने में कोई परेशानी नहीं होती है मतलब उसे कोई समस्या नहीं होती है और स्वस्थ है तो वो इसे खा सकता है .


[ Read More ]»

जाने डॉक्टर्स क्यों लिखते हैं इतनी गन्दी हैंडराइटिंग?

 
doktars-kyon

डॉक्टर्स की हैंड राइटिंग आम आदमी से कुछ अलग होती है। दवाईयों के नाम कुछ इस प्रकार लिखे होते हैं कि आपको समझ ही नही आते हैं और कई बार भरसक कोशिशों के बाद भी इसे समझ पाने में आप असफल रहते हैं। किसी को भी डॉक्टर की हैंड राइटिंग में लिखे प्रिस्क्रिप्शन की दवाईयां पढ़नी नहीं आती हैं। आखिर क्यों इतने पढे लिखे मैट्रिक पास डॉक्टरों की हैंडराइटिंग इतनी बेकार होती है। 

डॉक्टर की हैंड राइटिंग:

एक महिला डॉक्टर से पूछा था कि हर डॉक्टर अपने प्रिस्क्रिप्शन में इतनी अजीब हैंडराइटिंग क्यों लिखते हैं, तो उनका कुछ ये जवाब था –‘डॉक्टरों ने डॉक्टर बनने से पहले बहुत मेहनत की है, उन्होंने कम समय में बडे-बडे एग्जाम कम्पलीट किए हैं और इसी कारण समय बचाने के चक्कर में वो हमेशा बहुत ही तेजी में लिखते हैं जिस कारण उनकी हैंडराइटिंग इतनी बुरी हो गई है कि अब लोगों के समझ में ही नहीं आती है। 

यह  है इसका कारण:

डॉक्टर के कहने के अनुसार यदि आप भी बहुत तेजी से लिखना आरंभ कर देते हैं तो आपकी भी राइटिंग भी डॉक्टरों जैसी हो जायेगी और आपको भी डॉक्टरों द्वारा लिखी गई दवाइयों को भी आसानी से आप पढ़ सकते हैं। यदि डॉक्टरों की इस बात को मान भी लिया जाए लेकीन दवा के मामले में ऐसी बात सही नहीं बैठती है। 

इतनी गंदी राइटिंग लिखी होने के बावजूद भी मेडिकल स्टोर वालें कैसे पहचान जाते हैं कि डॉक्टर में कौन सी दवा का नाम लिखा है, दरअसल दुकानदारों को पहले से मालूम होता है कि कौन सा डॉक्टर किस बीमारी के लिए कौन सी दवा लिखेगा। ज्यादातर केमिस्ट दवा के लिखे हुए पहले अक्षर से पता कर लेते हैं कि पर्चे में कौन सी दवा लिखी हुई है और उसी दवा को दे देते हैं लेकीन कुछ केमिस्ट डॉक्टरों द्वारा लिखी हुई दवा को नहीं पढ़ पाते हैं और लोगों को गलत दवा दे देते हैं। 

अब साफ लिखेंगे डॉक्टर:

मेडिकल काउन्सिल ऑफ़ इंडिया यानि एमसीआई के तहत सभी डॉक्टर्स को ये गाईडलाइन दी जाती है कि अपने प्रिस्क्रिप्शन में उन्हें सभी अक्षरो को कैपिटल लैटर्स में लिखना पड़ेगा और उन्हें पूरी तरह से अपने मरीज़ को एक्स्पलेन करना होगा कि कौन-सी दवाई किस बीमारी की है और उसका नाम क्या है।

लाखो लोग डॉक्टर की लिखी हुई गंदी राइटिंग की वजह से अपनी जान गवां देते हैं-
आपको यह सुनकर हैरानी होगी हर साल करीब लाखो लोग डॉक्टर की लिखी हुई गंदी राइटिंग की वजह से अपनी जन गवां देते हैं। डॉक्टर जब खराब राइटिंग लिखते हैं तो कुछ मेडिकल स्टोर वालों को लिखा हुआ समझ में आ जाता है लेकीन कुछ मेडिकल स्टोर वालों की समझ में नहीं आता है और वो सही दवा के स्थान पर लोगों को दूसरी दवा दे देते हैं जिससे गलत दवा का सेवन करने से लोगों की जान भी चली जाती है। 


[ Read More ]»

संविधान के खिलाफ है विधानसभा में नमाज कक्ष, जानें क्‍या है इस मसले परकानून विशेषज्ञों की राय

 
visheshagyon-kee-raay

नई दिल्ली। झारखंड विधानसभा परिसर में नमाज अदा करने के लिए अलग कमरा आवंटित किए जाने पर घमासान मचा है। नमाज कक्ष आवंटित करने पर विपक्ष में बैठी भाजपा भी अब विधानसभा परिसर में मंदिर के लिए जगह देने की मांग कर रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि संसद या विधानसभा परिसर में किसी धार्मिक गतिविधि को इजाजत देना क्या संविधान सम्मत है। विशेषज्ञों की मानें तो विधानसभा में धार्मिक गतिविधि या धार्मिक निर्माण की इजाजत नहीं दी जा सकती। जानें इस मसले पर क्‍या है कानून विशेषज्ञों की राय...

यह संविधान के खिलाफ

विशेषज्ञों का कहना है कि संसद और विधानसभा संविधान के तहत राज्य की परिभाषा में आते हैं। संविधान के मुताबिक, राज्य पंथनिरपेक्ष है। ऐसे में विधानसभा परिसर में नमाज कक्ष संविधान के खिलाफ है। झारखंड विधानसभा स्पीकर की ओर से जारी दो सितंबर, 2021 के आदेश के मुताबिक, नए विधानसभा भवन में कमरा नंबर 348 को नमाज अदा करने के लिए नमाज कक्ष के रूप में आवंटित किया गया है।

लोकसभा के पूर्व सेक्रेट्री जनरल की राय

विधानसभा पब्लिक बिल्डिंग है जो विधानसभा अध्यक्ष के तहत आती है। वहां कोई भी काम विधानसभा अध्यक्ष के आदेश से ही होता है। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नमाज अदा करने के लिए नमाज कक्ष आवंटित करने को लोकसभा के पूर्व सेक्रेट्री जनरल पीडीटी आचारी असंवैधानिक मानते हैं।

विधानसभा एक सेक्युलर बाडी

पीडीटी आचारी कहते हैं कि उन्होंने ऐसा पहले कभी देखा, सुना नहीं। विधानसभा एक सेक्युलर बाडी (पंथनिरपेक्ष संस्था) है। उसका धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। उसमें धार्मिक गतिविधि की बाडी नहीं होनी चाहिए। भारत पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है। राष्ट्र का कोई धर्म नहीं होता। पाकिस्तान इस्लामिक स्टेट है। वहां ऐसा हो सकता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं हो सकता। यहां किसी धार्मिक गतिविधि की इजाजत नहीं दी जा सकती।

यह असंवैधानिक
राज्यसभा के पूर्व सेक्रेट्री जनरल योगेन्द्र नारायण भी कहते हैं कि यह असंवैधानिक है। विधानसभा पंथनिरपेक्ष है और वह पब्लिक बिल्डिंग है। पब्लिक बिल्डिंग के अंदर कोई रिलीजियस स्ट्रक्चर की इजाजत नहीं है।

नमाज कक्ष आवंटित करना अनुचित
संविधान विशेषज्ञ और लंबे समय तक लोकसभा में सेक्रेट्री जनरल रहे सुभाष कश्यप का भी मानना है कि झारखंड विधानसभा में नमाज के लिए नमाज कक्ष आवंटित करना अनुचित और औचित्य के विरुद्ध है। यह संविधान की भावना के खिलाफ है। उन्हें पूर्व की ऐसी कोई घटना याद नहीं है। हालांकि वह मानते हैं कि ऐसा करना स्पीकर और सदन के क्षेत्राधिकार में आता है, लेकिन साथ ही कहते हैं कि सदन स्पीकर से ऊपर होता है और सदन चाहे तो स्पीकर का आदेश खारिज कर सकता है।

अदालतों को सुनवाई का अधिकार
स्पीकर के क्षेत्राधिकार पर वरिष्ठ वकील और पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी कहते हैं कि स्पीकर भी संविधान के हिसाब से ही काम करेगा। वह मनमानी नहीं कर सकता। वह संविधान से बंधा होता है और संविधान के दायरे में रह कर ही काम करेगा। नमाज कक्ष आवंटित करने पर रोहतगी का कहना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से दूसरे वर्ग भी इसी तरह की मांग रखेंगे। इस मामले में दखल देने के कोर्ट के क्षेत्राधिकार पर वह कहते हैं कि वैसे तो इस तरह के मामले कोर्ट-कचहरी में नही जाने चाहिए, लेकिन अगर मामला कोर्ट में जाता है तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को उस पर सुनवाई करने का अधिकार है।


[ Read More ]»

बचपन की याद दिलाते 21 देसी खेल, जिनसे अनजान है आज के बच्चे

 
jinas- anajaan

( श्रीवास्तव सरिता )
भारत हमेशा से संस्कृति और परंपरा से समृद्ध रहा है! और खेल, हमेशा से ही भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहें हैं। चाहे भगवान शिव और उनकी पत्नी पार्वती के बीच पचीसी का खेल हो, पांडवों द्वारा पासे के खेल में द्रौपदी को हार जाना या दोपहर के बाद शतरंज के खेल का आनंद लेने वाले मुगल; खेल और खेलने वाले हमेशा से भारत के इतिहास और पौराणिक कथाओं में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आये हैं।

धीरे-धीरे समय बदल गया और इसके साथ ही बदलाव आये हमारे खेलों में भी। प्ले स्टेशन, वीडियो गेम और गैजेट के समय में, हम सभी भारत के पारंपरिक खेलों को शायद भूल ही गए हैं। याद है कैसे हम स्कूल खत्म होने तक का इंतजार नहीं कर पाते थे ताकि हम अपने दोस्तों के साथ जाकर किठ-किठ खेल सकें? तो चलिए आज इन्हीं सब खेलों को याद किया जाये। आज हम आपको बता रहें हैं भारत के 21 पारम्परिक खेलों के बारे में आप लोगो को जानकारी उपलब्ध करवा रहे है ।

01-पिट्टू का खेल: छोटे छोटे पत्थरों से टावर बनाने वाला ये खेल आपने भी खेला होगा 

anajaan-01

इस खेल को खेलने के लिए सात चपटे पत्थर और एक गेंद की जरुरत होती है। इसमें पत्थरों को एक के ऊपर एक जमाया जाता है। इस खेल में दो टीमें भाग लेती हैं, एक टीम का खिलाड़ी पहले गेंद से पत्थरों को गिराता है और फिर उसकी टीम के सदस्यों को पिट्ठू गरम बोलते हुए उसे फिर से जमाना पड़ता है। इस बीच दूसरी टीम के ख़िलाड़ी गेंद को पीछे से मारते हैं। यदि वह गेंद पिट्ठू गरम बोलने से पहले लग गयी तो टीम बाहर। इसके लिए हमें टेनिस या रबर बॉल की जरूरत होती है। बस ध्यान रहे कि यह बहुत भारी न हो, वरना चोट भी लग सकती है। पिट्ठू खेलने के लिए खुली जगह होनी चाहिए, जिससे खिलाड़ी आसानी से दूरी बनाते हुए अपनी पारी खेल सकें। मैदान की आउटर बाउंड्री तय कर लें और बीचोबीच एक सर्कल बनाकर पिट्ठू का टावर बनाएं। इस सर्कल के दोनों तरफ करीब 3 मीटर की दूरी पर छोटी लाइन खीचें। दो टीमें बनानी होंगी, जिनमें कम-से-कम तीन खिलाड़ी हों। लेकिन जितने ज्यादा खिलाड़ी होंगे, खेलने में उतना ही मजा आएगा।

खेल के नियम-
  • दो टीमें होंगी। टीम 1 बैटिंग करेगी यानी बॉल से पिट्ठू टावर तोड़ेगी और सबसे बचते हुए इसे दोबारा बनाएगी। टीम-2 फील्डिंग करेगी यानी टीम 1 के खिलाड़ियों को पिट्ठू टावर बनाने से रोकेगी।
  • खेलते हुए मैदान की आउटर बाउंड्री से बाहर जाने पर फाउल होगा और वह खिलाड़ी टीम से बाहर होगा।
  • मैदान के बीच बने सर्कल के एक तरफ की पैरलल लाइन से परे होकर टीम-1 का एक खिलाड़ी खड़े होकर पिट्ठू तोड़ेगा और दूसरी तरफ टीम-2 का खिलाड़ी बॉल कैच करने के लिए खड़ा होगा।
  • पिट्ठू टावर तोड़ने के लिए टीम के हर खिलाड़ी को तीन चांस दिए जाते हैं, जब तक वह टीम आउट नहीं हो जाती। अगर वह टीम एक बार भी पिट्ठू तोड़ने में कामयाब नहीं होती तो दूसरी टीम की बारी आ जाती है। टावर तोड़ते वक्त अगर फील्डर टीम-2 के खिलाड़ी बॉल सीधी कैच कर लेते हैं तो वह टीम आउट हो जाती है।
  • दूसरे खिलाड़ी मैदान में दूरी पर खड़े रहते हैं और टावर दोबारा बनाने के लिए बचते हुए भागते हैं। टीम-2 के खिलाड़ी उनके आसपास रहते हैं और एक खिलाड़ी तो बीच के सर्कल के पास ही खड़ा रहता है ताकि वे उन्हें पिट्ठू टॉवर दोबारा बनाने से रोक सकें और उन्हें बॉल से हिट करके आउट करने की कोशिश करते हैं।
  • इसके लिए वे अपनी टीम के खिलाड़ियों को भी बॉल पास कर सकते हैं। एक फील्डर ज्यादा-से-ज्यादा 50 सेकंड के लिए बॉल पकड़ सकता है। बैटिंग टीम के खिलाड़ियों को आउट करने के लिए उसे बॉल अपनी टीम के दूसरे खिलाड़ी को पास करनी पड़ेगी।
  • फील्डर टीम के खिलाड़ी को केवल घुटनों के नीचे ही बॉल से हिट कर सकते हैं।
  • पिट्ठू टॉवर टूटने पर टीम-1 के खिलाड़ी अपना बचाव करते हुए उसे दोबारा बना लेते हैं तो उन्हें जोर से बोलकर पिट्ठू बनाने की सूचना देनी चाहिए। इससे उन्हें पॉइंट ही नहीं मिलता, एक बार और खेलने का मौका भी मिलता है।
  • लेकिन अगर टीम-2 के खिलाड़ी अपने साथियों को बॉल पास करके टीम-1 के किसी भी खिलाड़ी को हिट कर देते हैं तो टीम-1 की बारी खत्म हो जाती है और दूसरी टीम को पॉइंट मिलेगा। टॉवर तोड़ने के लिए टीम-1 के तीन चांस हो जाने के बाद दूसरी टीम की बारी आ जाती है।
  • इसके बाद टीम-2 बैटिंग करती है और पिट्ठू टॉवर बनाती है। टीम-1 फील्डिंग करती है, जिसके पॉइंट ज्यादा बनते हैं, वह जीतता है।

02-गुट्टे या किट्ठु-

anajaan-02

यह पारंपरिक खेल बच्चों और बड़े दोनों द्वारा खेला जाता है। इस साधारण खेल के लिए 5 छोटे पत्थरों की आवश्यकता होती है। आप हवा में एक पत्थर उछालते हैं और उस पत्थर के जमीन पर गिरने से पहले अन्य पत्थरों को चुनते हैं। यह गेम कितने भी लोगों के साथ खेला जा सकता है।

03-कंचा-

anajaan-03
बच्चों के बीच कंचा खेलना सबसे प्रसिद्द खेल होता था। इस खेल को मार्बल से खलते हैं, जिसे ‘कंचा’ कहते हैं। इस खेल में सभी कंचे इधर-उधर कुछ दुरी पर बिखेर दिए जाते हैं। खिलाडी एक निश्चित दुरी से एक कंचे से दूसरे कंचों को हिट करता है। जो खिलाडी सभी कंचों को हिट कर लेता है वह विजेता होता है। आखिर में सभी कंचे विजेता को दे दिए जाते हैं।

04-खो-खो-

anajaan-04
यह भारत में सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है। इसमें दो टीम होती हैं। एक टीम मैदान में घुटनों के बल बैठती है। सभी खिलाडी एक-दूसरे के विपरीत दिशा में मुंह करके बैठते हैं। जो भी टीम सभी सदस्यों को टैप करके सबसे कम समय में खेल खत्म करती है वही विजयी होती है।

05-गिल्ली-डंडा-

anajaan-05

भारतीय गांवों की गलियों में खेले जाने वाला यह खेल बच्चों का सबसे पसंदीदा खेल है। इसमें दो छड़ें होती हैं, एक थोड़ी बड़ी, जिसे


डंडे के रूप में प्रयोग किया जाता है और छोटी छड़ को गिल्ली के लिए। गिल्ली के दोनों तरफ के छोर को चाक़ू से नुकीला किया जाता है।

डंडे से गिल्ली के एक छोर पर चोट की जाती है, जिससे कि वह हवा में उछले और हवा में फिर से एक बार गिल्ली पर चोट करते हैं जिससे वह दूर जाकर गिरती है। इसके बाद खिलाडी पहले बिंदु को छूने के लिए दौड़ता है ताकि दूसरे खिलाडी के गिल्ली लाने से पहले वह पहुंच सके।

06-पोशम्पा-

anajaan-06

इस खेल में दो लोग अपने सिर से ऊपर कर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर खड़े होते हैं। साथ में वे एक गाना भी गाते हैं। बाकी सभी बच्चे उनके हाथों के नीचे से निकलते हैं। गाना खत्म होने पर दोनों अपने हाथ नीचे करते है और जो भी बच्चा उसमे फंसता है वह खेल से आउट हो जाता है।

07-चौपड़/पचीसी-

anajaan-07

इसमें सभी खिलाडियों को अपने विरोधी से पहले अपनी चारों गोटियों को बोर्ड के चारों और घुमाकर वापिस अपने स्थान पर लाना होता है। चारों गोटियां चौकरनी से शुरू होकर चौकरनी पर खत्म होती हैं।

08-किठ-किठ-
anajaan-08

इस खेल घर के अंदर, बाहर और गली में खेला जा सकता है। आपको बस एक चौक से जमीन पर रेक्टैंगल डिब्बे बनाने हैं और उनमें नंबर लिखने होते हैं। हर एक खिलाडी बाहर से एक पत्थर एक डिब्बे में फेंकता है और फिर किसी भी डिब्बे की लाइन को छुए बिना एक पैर पर (लंगड़ी टांग) उस पत्थर को बाहर लाता है।

इस खेल को कई और नामों से भी जाना जाता है, जैसे की कुंटे, खाने आदि।

09-धोपकेल-
anajaan-09

असम का यह लोकप्रिय खेल धोपकेल कबड्डी के जैसे खेला जाता है। धोप एक रबड़ की बॉल को कहते हैं। मैदान में एक लाइन बनाकर, उस लाइन के दोनों तरफ टीमें खड़ी होती हैं। हर एक टीम का खिलाडी विरोधी टीम के पाले में जाता है और धोप को कैच करके वापिस अपने पाले में लाने की कोशिश करता है। जिसे उसकी टीम दूसरे पाले में फेंकती है।

10-पलांगुली-
anajaan-10
इस बोर्ड गेम में 14 कप होते हैं। हर एक कप में छह बीज रखे जाते हैं। खिलाड़ी इन बीजों को अन्य कपों में तब तक वितरित करते हैं जब तक कि सारे बीज खत्म न हो जाएँ। वह व्यक्ति जो बीज के बिना लगातार दो कप तक पहुंचता है उसे खेल से बाहर निकलना पड़ता है।

11-आंख-मिचौली -
anajaan-11

खेल आंख-मिचौली एक मजेदार खेल है। इस खेल को लड़के-लड़कियां एक साथ या अलग-अलग टोलियां बनाकर खेल सकते हैं। इस खेल में किसी एक खिलाड़ी के आंख में एक कपड़े की पट्टी बांध दी जाती है। यह खिलाड़ी पट्टी बांधे-बांधे अपने आसपास के खिलाड़ियों को पकड़ने की कोशिश करता है जिसे वह पकड़ लेता है तो फिर पट्टी उसके आंखों में बांधी जाती है। कुछ याद आया आपको, बचपन में ये खेल हम अपने दोस्तों के साथ ऐसे ही मजेदार तरीके तरीके से खेलते थे। इसी को कहीं-कहीं दूसरे तरीके से खेला जाता है। जिसके आंख में पट्टी बंधी होती है उसके सिर पर कई लोग एक-एक करके थप्पी देते हैं। सबसे पहले थप्पी किसनें दी उसका नाम पट्टी बांधने वाले खिलाड़ी को बताना होता है। इस खेल में खिलाड़ियों की संख्या कितनी भी हो सकती है।

12-लंगड़ी टांग खेल -
anajaan-12

ज्यादातर यह खेल लड़कियां खेलती हैं, कई बार लड़के भी इस खेल का मजा लेने से पीछे नहीं हटते। इस खेल को हर जगह अलग-अलग तरीके से खेला जाता है जिसमें एक तरीका ये भी है। इस खेल को खेलने के लिए चौपाल या कहीं भी खुली जगह में नौ खाने बनाने होते हैं। तीन-तीन खानों की तीन लाइनें होती हैं। जो बीज का गोला होता है इसमें क्रास का निशाँ लगा देते हैं। पहले खाने से लेकर आठ खाने तक बारी-बारी खेलना पड़ता है।

खेल की शुरुआत पहले खाने से करते हैं, घर में फूटे मिट्टी के घड़े की एक गोल गुप्पल बनाते हैं। पहले खाने से लेकर उसे क्रास वाले खाने तक एक टांग से खड़े होकर सरकाना पड़ता है। जब क्रास वाले खाने में गुप्पल और खिलाड़ी दोनों पहुंच जाएं तो वहां दोनों पैर रख सकते हैं। इसके बाद उस गुप्पल हो एक पैर से इतनी तेज मारना पड़ता है जिससे वो उन नौ खानों के बाहर निकल जाए। इसके बाद खिलाड़ी को उस क्रास वाले खाने से फांदकर गुप्पल को पैरों से छूना होता है। तबी कहीं जाकर पहला राउंड पूरा होता है अगर इस दौरान ये गुप्पल किसी भी लाइन में छू गयी तो दूसरे खिलाड़ी को मौका मिलता है। इसमें दो या उससे अधिक खिलाड़ी खेल सकते हैं।

13-लब्बो-डाल खेल-
anajaan-13

ये खेल पेड़ों पर चढ़कर खेला जाता है। जिसमें एक खिलाड़ी को छोड़कर सभी पेड़ों की अलग-अलग डाल पर बैठ जाते हैं। एक खिलाड़ी नीचे रहता है, एक गोल गोला करके इसमें एक दो हाथ के एक डंडे को रखा जाता है। जो खिलाड़ी नीचे होता है उसे ऊपर चढ़े किसी खिलाड़ी को छूना होता है इसके बाद उस लकड़ी को पकड़ कर चूमना होता था। अगर खिलाड़ी छूने के बाद लकड़ी पकड़कर न चूम पाए और इस दौरान दूसरा खिलाड़ी उस लकड़ी को दूर फेक दें तो उसे ये प्रक्रिया दोबारा करनी पड़ती है। जो खिलाड़ी पकड़ जाता है तो फिर उसे दूसरे खिलाड़ियों को ऐसे ही पकड़ना होता है।


14-छुपन-छुपाई -

anajaan-14

खेल ये खेल पहले सर्दियों में खूब खेला जाता था। पुआल के और लकड़ियों के ढेर में कहीं भी छुप जाओ दूसरा साथी खोजता रहता था। एक साथी 100 तक गिनती गिनता तबतक आस-पास सभी साथी छिप जाते। एक-एक करके सभी साथियों को खोजना होता है, अगर इस दौरान जो खिलाड़ी खोज रहा है उसे छुपा हुआ कोई भी साथी पीछे से उसके सिर को छू ले तो उसे दोबारा पूरे साथियों को खोजना होता है।

15-विष-अमृत-
anajaan-15

ये खेल विदेशी खेल लॉक एंड की का भारतीय रूप है। खेल में एक खिलाड़ी के पास विष देने का अधिकार होता है। ये खिलाड़ी जिस भी खिलाड़ी को छू दे, वो अपनी जगह पर फ्रीज़ हो जाता है, जबतक कि उसके साथ खिलाड़ी आकर उसे छू ना दे, यानि अमृत ना दे दे। खेल तब ख़त्म होता है, जब सारे खिलाड़ी पकड़े जाते हैं, और उन्हें अमृत देने के लिए कोई खिलाड़ी नहीं बचता।


16-लूडो, सांप सीढ़ी -
anajaan-16

खेल लूडो, सांप सीढ़ी एक ऐसा खेल है जिसे शहर और गांव हर जगह खेला जाता है। बाकी खेलों की अपेक्षा ये खेल अभी प्रचलन में है। लूडो इसलिए अभी भी प्रचलित है क्योंकि ये अब मोबाइल में भी डाउनलोड करके खूब खेला जाता है। सांप-सीढ़ी में एक से 100 तक की गिनती होती है। इसमें जगह-जगह छोटे बड़े कई सांप होते हैं और कई सीढ़ियां भी। सीढ़ियों से ऊपर जाने का मौका मिलता है सांप से नीचे आ जाते हैं।

17-रस्सी कूदना खेल -
anajaan-19


इस खेल को भी ज्यादातर लड़कियां खेलती हैं। इसे पेट कम करने या बजन घटाने का एक अच्छा व्यायाम भी माना जाता है। एक रस्सी को टुकड़े से लगातार कूदना होता है अगर बीच में रुक गये या रस्सी पैरों में फंस गयी तो दूसरे खिलाड़ी को मौका मिलता। दूसरा तरीका ये भी है कि दो लड़कियां रस्सी के एक-एक छोर को पकड़ लें और तीसरी लकड़ी बीच में कूदती है। जो सबसे ज्यादा बिना रुके कूदती है जीत उसी की मानी जाती है।


anajaan-17
लट्टू लकड़ी से बना हुआ एक गोलाकार संरचना वाला खिलौना होता है, जिसमें सिरे की ओर एक नुकीली कील लगी होती है। जिसका नुकीला सिरा ज़मीन की तरफ होता है। जब सूत अथवा किसी अन्य तरह की डोर को गोल लट्टू में लपेटा जाता है, तथा एक झटके के साथ डोर को पीछे खींचा जाता है, तब कील का नुकीला सिरा जमीन में टकराता है, और लट्टू पूरी तेज़ी के साथ घूमने लगता है। कई बार लट्टू को पहले हाथ में घुमाया जाता है। और झटके के साथ ज़मीन पे छोड़ा जाता है।

लट्टू प्रायः लकड़ी का बना होता है। आजकल अन्य प्रकार की धातुओं से बने लट्टू भी बाजार में उपलब्ध हैं। इसमें अलग-अलग प्रकार की रंगीन धारियां होती है, जो की लट्टू को घुमाने बेहद आकर्षक लगती हैं। और खेल में एक नया रोमांच भर देती हैं। यह खेल बच्चों में बेहद लोकप्रिय है। जिसका भी लट्टू ज़मीन में अधिक समय तक घूमता है, उसे इस खेल में विजेता घोषित किया जाता है। यह कितनी देर घुमेगा ये उसकी गुणवत्ता और खेलने वाले के अनुभव पर निर्भर करता है।

anajaan-18

सुरबग्घी खेल में 32 गिट्टियों की ज़रूरत पड़ती हैं, जिसमें 16 गोटियां एक खिलाड़ी के पास होती हैं और बाकी 16 गोटियां दूसरे खिलाड़ी के पास। दोनों पक्षों की गिट्टियों का रंग अलग होता है। खेल भले ही घर के अंदर खेला जाता है, लेकिन इसमें दिमाग की कसरत बहुत अच्छी होती है। आपकी एक गलत चाल आपको हरा सकती है, इसलिए खेल खेलने वाले दोनों खिलाड़ियों को बड़े ध्यान से खेल खेलना पड़ता है। इस खेल में बनाई गई चौकौर बिसात में प्वाइंटों (Points) के सहारे एक पंक्ति पर गोटियां चली जाती हैं। मान लीजिए कि आपकी और आपके विपक्षी खिलाड़ी की गिट्टी अगल-बगल है और तीसरा प्वाइंट खाली है तथा आपकी गिट्टी बीच में है और अब चाल अगले खिलाड़ी की है।

अगर विपक्षी खिलाड़ी आपकी गिट्टी को काट कर आगे के प्वाइंट पर अपनी गिट्टी रख देता है, तो आपकी गिट्टी कट जाएगी और दूसरा खिलाड़ी बाज़ी जीत जाएगा। गाँव के बड़े-बुज़ुर्ग मानते थे कि सुरबग्घी का खेल न सिर्फ हमारी मानसिक शक्ति को बढ़ाने का काम करता है, बल्कि खाली समय में यह खेल मनोरंजन के अच्छे साधन की तरह भी काम करता है। पुराने समय में ग्रामीण सजावट के तौर पर सुरबग्घी को अपने घर की ज़मीन या फिर दीवारों पर बनवाते थे। इसके नियम चाईनीज़ चेकर के समान हैं, लेकिन सुरबग्घी में प्यादे (Pawns) बाहर हो जाते हैं।

20-कबड्डी का खेल -
anajaan-20

कबड्डी एक ऐसा खेल है जिसे लड़का और लड़की दोनों ही खेल सकते हैं. इसे गाँव और शहर दोनों जगह खेल जाता है परन्तु इस खेल को गाँव में ज्यादा खेलते हैं. गाँव में रहने वाले बच्चों के बचपन की शुरूआत कबड्डी के खेल से होती है. यह खेल शारीरिक और मानसिक रूप से बच्चो को स्वस्थ बनाता है. कबड्डी के खेल में युवा अब करियर बना सकते हैं. राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर यह खेल खेला जाता है। 


21-घोडा जमाल खा पीछे देखे मार खा -
anajaan-21

घोडा जमाल खा पीछे देखे मार खा एक ऐसा खेल है जिसे लड़का और लड़की दोनों ही खेल सकते हैं. इसे गाँव और शहर दोनों जगह खेल जाता है परन्तु इस खेल को गाँव में ज्यादा खेलते हैं. गाँव में रहने वाले बच्चों के बचपन की शुरूआतघोडा जमाल खा पीछे देखे मार खा  के खेल से होती है।  यह खेल शारीरिक और मानसिक रूप से बच्चो को स्वस्थ बनाता है। 

इस खेल एक साथ कई लोग खेल सकते है।  इस खेल में एक बच्चा एक कपडा को लेकर एक तरफ उसमे गांठ मार देता है। इसके बाद सभी एक गोलाई में बैठ जाते है। एक बच्चा उस कपडे को लेकर किसी के पीछे छुपा देता है। इसके बाद गोलाई में बैठे हुए सभी बच्चो के पीछे चक्कर लगाता है। इस बीच यदि जिसके पीछे रखा कपडा यदि बच्चा जान जाता है तो वह उस कपडे से पीछे रखने वाले बच्चे के पीठ पर मारता हुआ दौड़ता है। जब बच्चा उसके जगह पर आकर बैठ जाता है। .इसके बाद पुनः दूसरा बच्चा इसी प्रक्रिया को दोहराता है। यह खेल गांव में अधिक लोकप्रिय एवं प्रचलित था। 

आवश्यक सुझाव-
यदि आप बचपन की याद दिलाते 21 देसी खेल, जिनसे अनजान है आज के बच्चे की जानकारी प्राप्त करते है। , या किसी अन्य खेल के बारे में आपको कोई नई जानकारी हो तो आप उसे हमें झट लिख भेजे हमारे ईमेल पर - gondalivenews@gmail.com या कृपया नीचे टिप्पणी करें, या दूसरों की मदद करने के लिए इस लेख को साझा करें।



[ Read More ]»

प्राचीन खेल उपकरण है पासा

upakaran-hai-paasa


पासों का खेल एक ऐसा खेल है जिसका उपयोग आज से नहीं बल्कि सदियों पहले से किया जा रहा है। इसका प्रयोग किसी खेल में यादृच्छिक संख्या उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भीतर खेले जाने वाले खेलों में उपयोग किया जाने वाला यह खेल उपकरण सबसे प्राचीन उपकरण हैं। आधुनिक युग में खेले जाने वाले लूडो (Ludo) में इसके उपयोग से हम सभी भली-भांति परिचित होंगे। यह प्रायः घन के आकार के होते हैं जिसकी प्रत्येक सतह पर एक से लेकर छह बिंदु चिह्नित किये गये होते हैं। इसका उपयोग हज़ारों वर्षों से खेल और अटकलों को हल करने के उद्देश्य से किया जाता रहा है।

मिस्र की कब्रों में मिले साक्ष्यों से यह पता चलता है कि यहां की सभ्यता द्वारा 2000 ई. पू. में पासों का उपयोग किया गया था। अन्य आंकड़ों के अनुसार अमेरिका की आदिम सभ्यताएं भी पासे का उपयोग विभिन्न खेलों के लिए करती थी। इसके अतिरिक्त इनका उपयोग प्राचीन समय से ही जुए के लिए भी किया जाता रहा है। विभिन्न प्रकार से उपयोग किये जाने वाले इन पासों का प्रत्यक्ष प्रमाण महाभारत और अन्य वेद ग्रंथों में देखने को मिलते है। महाभारत में इसका प्रयोग विशेष रूप से जुए के खेल के लिए किया गया था। इनके अतिरिक्त प्राचीन भारतीय ऋग्वेद, अथर्ववेद और बौद्ध खेल सूची में भी पासे से संबंधित खेलों का उल्लेख किया गया है।

पहले के समय में पासों को बनाने के लिए विभिन्न जानवरों की हड्डियों का उपयोग किया जाता था तथा इनकी चार सतहों पर चिह्नित बिंदुओं का उपयोग संभवतः जादुई उपकरणों के रूप में किया गया था। माना जाता था कि ये जादुई उपकरण भविष्य वाणी भी कर सकते थे। प्राचीन यूनानियों और रोम निवासियों नेहड्डी और हाथी दांत से बने पासों का इस्तेमाल किया। शुरुआती संस्कृतियों में अधिकांश पासों के आकार केवल घन न होकर अन्य आकार के भी थे।

वर्तमान में प्रायः घनाकार पासे का उपयोग किया जाता है जिसकी उत्पत्ति चीन में हुई थी। 14वीं शताब्दी के दौरान इनका उपयोग यूरोप में भी किया जाने लगा था। इन पासों को 20वीं सदी तक छोटे पैमाने पर उत्पादित किया जाने लगा। पासे विभिन्न आकार के हो सकते हैं जिनमें चतुष्फलकीय, अष्ट्फलकीय, पंचभुजीय, गोलाकार, बेलनाकार, प्रिज़्माकार (प्रिज़्म के आकार की), त्रिकोण प्रिज़्म, पंचभुजाकार प्रिज़्म आदि पासे शामिल हैं।

पूरे इतिहास में पासे को कई सामग्रियों, जैसे हड्डियों, कांच, लकड़ी, धातु आदि से बनाया गया किंतु आज पासे के निर्माण के लिए प्लास्टिक (Plastic) को व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। जैसे-जैसे प्लास्टिक तकनीक उभरती गई वैसे-वैसे पासा निर्माण में विभिन्न तरीकों को विकसित किया गया। ये पासे अब विभिन्न आकारों और रंगों में उपलब्ध हो जाते हैं और विभिन्न खेलों के लिए इनका उपयोग किया जा सकता है। प्लास्टिक से पासा बनाने के लिए यह आवश्यक है कि प्लास्टिक साफ़, बेरंग और पारदर्शी होनी चाहिए। पासा निर्माण के लिए उपयुक्त प्लास्टिक सेलूलोज़ (Cellulose) आधारित प्लास्टिक तथा पॉलीमिथाइल मेथाक्रिलेट (Polymethyl methacrylate - PMMA) है जिससे मज़बूत पासों का निर्माण किया जा सकता है।


[ Read More ]»

सुरबग्घी बौद्धिक विकास के लिए अत्यधिक लाभकारी है

 

bauddhik-vikaas

वर्तमान समय में मोबाइल फोन के बढ़ते चलन की वजह से ग्रामीण क्षेत्रों के युवा मिट्टी से जुड़े खेलों से दूर होते जा रहे हैं। मिट्टी से जुड़ा ​एक खेल 'सुरबग्घी' भी है, जो पहले बहुत प्रचलित था, किंतु अब समय के साथ-साथ गाँवों में अपनी पहचान खोता जा रहा है। गर्मी की छुट्टियों का वह दृश्य शायद सब ही याद करते होंगे, जब अपने गाँव के घर के बरामदे में सुरबग्घी की चौकोर बिसात को देखते होंगे। यह बिसात कुछ हद तक चाईनीज़ चेकर (Chinese Checkers) और शतरंज खेलों से मिलती जुलती है। चाईनीज़ चेकर एक स्ट्रेटेजी बोर्ड गेम (Strategy Board Game) है, जिसे दो, तीन, चार या छह लोग व्यक्तिगत रूप से या भागीदारी में खेल सकते हैं। यह खेल मुख्य रूप से जर्मन मूल का है। इसके नियम सरल हैं, जिस कारण इसे छोटे बच्चे भी खेल सकते हैं।

सुरबग्घी खेल में 32 गिट्टियों की ज़रूरत पड़ती हैं, जिसमें 16 गोटियां एक खिलाड़ी के पास होती हैं और बाकी 16 गोटियां दूसरे खिलाड़ी के पास। दोनों पक्षों की गिट्टियों का रंग अलग होता है। खेल भले ही घर के अंदर खेला जाता है, लेकिन इसमें दिमाग की कसरत बहुत अच्छी होती है। आपकी एक गलत चाल आपको हरा सकती है, इसलिए खेल खेलने वाले दोनों खिलाड़ियों को बड़े ध्यान से खेल खेलना पड़ता है। इस खेल में बनाई गई चौकौर बिसात में प्वाइंटों (Points) के सहारे एक पंक्ति पर गोटियां चली जाती हैं। मान लीजिए कि आपकी और आपके विपक्षी खिलाड़ी की गिट्टी अगल-बगल है और तीसरा प्वाइंट खाली है तथा आपकी गिट्टी बीच में है और अब चाल अगले खिलाड़ी की है।

अगर विपक्षी खिलाड़ी आपकी गिट्टी को काट कर आगे के प्वाइंट पर अपनी गिट्टी रख देता है, तो आपकी गिट्टी कट जाएगी और दूसरा खिलाड़ी बाज़ी जीत जाएगा। गाँव के बड़े-बुज़ुर्ग मानते थे कि सुरबग्घी का खेल न सिर्फ हमारी मानसिक शक्ति को बढ़ाने का काम करता है, बल्कि खाली समय में यह खेल मनोरंजन के अच्छे साधन की तरह भी काम करता है। पुराने समय में ग्रामीण सजावट के तौर पर सुरबग्घी को अपने घर की ज़मीन या फिर दीवारों पर बनवाते थे। इसके नियम चाईनीज़ चेकर के समान हैं, लेकिन सुरबग्घी में प्यादे (Pawns) बाहर हो जाते हैं।

लखनऊ के निकट 2009 से ग्रामीण ओलंपिक (Village Olympic) खेलों का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें कई खेल जैसे भैंस दुहना, साइकिल दौड़, नहर में तैरना, कबड्डी, वॉलीबाल (Volleyball), पतंगबाजी, रस्साकशी, शतरंज, सुरबग्घी आदि शामिल हैं। इस प्रतियोगिता में उत्तर भारत के कई राज्य भाग लेते हैं, जिनमें राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश मुख्य हैं। 2009 में पहली बार किसी गाँव में इस तरह के पैमाने पर राष्ट्रीय ग्रामीण खेलों का आयोजन किया गया था।

खेल की पुरातनता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि खेल के साक्ष्य अकबर के शासन काल से भी प्राप्त हुए। अकबर और उसके अधिकारी, भीतर खेले जाने वाले खेलों के बहुत शौकीन थे। व्यक्तिगत रूप से अकबर ‘चंदल-मंदल’ और ‘पच्चीसी’ के खेल के बहुत शौकीन थे। उस समय ग्रामीण क्षेत्रों के लोग कबड्डी और सुरबग्घी खेलना बहुत पसंद करते थे। मोबाईल फोन के चलन और कई अन्य कारणों से सुरबग्घी आज अपनी लोकप्रियता खोता जा रहा है किंतु बौद्धिक विकास के लिए यह आज भी उतना ही फलदायी है, जितना पहले माना जाता था।


[ Read More ]»

लट्टू का इतिहास, क्यों है खास?

 

kyon-hai-khaas

ऐ दिल जरा बचपन की गलियों से गुजर आऊं! लट्टू को रस्सी पे लपेटूं और दुनिया को घुमाऊं!। डॉ. निशा माथुर द्वारा लिखी गयी इन पंक्तियों में "लट्टू" (Bambaram) नामक एक ऐसे खिलौने की चर्चा है, जो हिंदुस्तान के हर वर्ग के बच्चों में खासा लोकप्रिय है। आज भी यदि हम लट्टू का चित्र देखें या नाम ही सुन ले तो हमारे मन बचपन की सुनहरी यादों और नए रोमांच से भर जाता है। लट्टू का खेल आज भी पूरे रोमांच के साथ बच्चों में खेला जाता है। और उतना ही लोकप्रिय है, जितना आज से कई दशक पहले था।

kyon-hai-khaas-01

लट्टू लकड़ी से बना हुआ एक गोलाकार संरचना वाला खिलौना होता है, जिसमें सिरे की ओर एक नुकीली कील लगी होती है। जिसका नुकीला सिरा ज़मीन की तरफ होता है। जब सूत अथवा किसी अन्य तरह की डोर को गोल लट्टू में लपेटा जाता है, तथा एक झटके के साथ डोर को पीछे खींचा जाता है, तब कील का नुकीला सिरा जमीन में टकराता है, और लट्टू पूरी तेज़ी के साथ घूमने लगता है। कई बार लट्टू को पहले हाथ में घुमाया जाता है। और झटके के साथ ज़मीन पे छोड़ा जाता है।

लट्टू प्रायः लकड़ी का बना होता है। आजकल अन्य प्रकार की धातुओं से बने लट्टू भी बाजार में उपलब्ध हैं। इसमें अलग-अलग प्रकार की रंगीन धारियां होती है, जो की लट्टू को घुमाने बेहद आकर्षक लगती हैं। और खेल में एक नया रोमांच भर देती हैं। यह खेल बच्चों में बेहद लोकप्रिय है। जिसका भी लट्टू ज़मीन में अधिक समय तक घूमता है, उसे इस खेल में विजेता घोषित किया जाता है। यह कितनी देर घुमेगा ये उसकी गुणवत्ता और खेलने वाले के अनुभव पर निर्भर करता है।

लट्टू पुरातत्वविदों द्वारा पूरे विश्व के खोजे गए सबसे प्राचीनतम खेलों में से एक है। लट्टू का वर्णन 3500 ईसा पूर्व. इराक के शहरों में हुयी। इराक आज से लगभग 6000 साल पहले प्राचीन कवि (Homer) की कविताओं में मिलता है। समय के साथ-साथ इसके बनावट में रचनात्मकता बढ़ती गयी लट्टू को और ज़्यादा आकर्षक तथा अधिक देर तक घूमते रहने के लिए संशोधित किया गया। आजकल इसे बेहद आधुनिक रूप दे दिया गया है यह हवा में बिना किसी आधार के भी लम्बे समय तक घूमता रहता है।

बदलते स्थानो के आधार पर इन्हें अलग-अलग नामों के साथ जाना जाने लगा। कर्नाटक और तमिल में इसे बम्बाराम ( Bambaram), हिंदी तथा उर्दू भाषा में इसे लट्टू (Lattu), तथा आंध्र प्रदेश में इसे बोंगराला आता (Bongaralu Aata in Andhra Pradesh),बंगाली में लतीम, से सम्बोधित किया जाता है।

लट्टू का खेल भारत के हर आयु वर्ग में बेहद प्रचलित है। बच्चे इसको बड़े ही उत्साह के साथ खेलते हैं। बड़े-बूढ़े शर्त लगाते है। आज भी यह खेल भारत में काफी जाना-माना है। परन्तु आज से लगभग दो दशक (20 साल पहले) यह बेहद ऊंचे स्तर पर लोकप्रिय था। देश के हर गली नुक्कड़ पर आसानी से लट्टु के खिलाडियों का झुंड देखने को मिल जाता था। देश में कई जगह पर स्वदेशी लट्टू बनाये जाते थे। यहाँ तक की लोग घरों में इनको स्वनिर्मित भी करते थे। आज भी लोग बनाते है, परंतु दुर्भाग्यवश नवीनतम तकनीक और आधुनिक खिलौनों की भीड़ में लट्टू का खेल कही विलुप्त सा होने लगा है। आज की नयी पीढ़ी इस बेहद अनोखे और असामान्य खेल से अनभिज्ञ है। ऑनलाइन गेम और आधुनिक खिलौने आज पूरी तरह से हमारे प्राचीनतम खेल "लट्टू" पर हावी हो चुके हैं। युवा पीढ़ी इस खेल में अनुभव होने वाले असामान्य रोमांच से वंचित है। परन्तु आज भी भारत के कई पारंपरिक गावों में यह खेल उत्साह के साथ खेला जाता है। शहरों में भी यह थोड़ा बचा हुआ है। समय के साथ हर वस्तु और संस्कृति का विकास होता है, लट्टु की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। समय के साथ यह और तेज़ गति से तथा लम्बे समय तक घूमने वाला बन गया। वर्तमान में इसका नवीनतम स्वरूप स्पिनर(Spinner) पूरी दुनिया में सुप्रसिद्ध है। स्पिनर लट्टू का सबसे आधुनिक स्वरूप है। स्पिनर को अंगूठे और हाथ की किसी अन्य उंगली के बीच में रखा जाता है, तथा जोर से घुमाया जाता है। यह भी लट्टू के समान भौतिक नियमों पर आधारित है। देखने में यह बेहद रोमांचक लगता है और युवाओं में खासा लोकप्रिय है। आज समय तेज़ गति से बदल रहा है, हमारे खेल बदल रहे हैं। नयी तकनीके हमारे दैनिक जीवन पर हावी हो रही है। हमें अपने संस्कृति से जुड़े खेलों से भी जुड़ा रहना चाहिए। और समय के साथ संतुलित विकास करना चाहिए।


[ Read More ]»
”go"