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साखी कुबिजा मालिन की

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प्रेम भक्ति के संसार में कुबिजा का नाम बड़ा आदर-सत्कार से लिया जाता है| कुबिजा मालिन के प्यार के गीत बनाकर कविजन गुनगुनाते हैं| गुरुबाणी में भी यह आता है, ‘कुबजा ओधरी अंगसुट धार’ (बसंतु राग) आओ, श्रद्धालु और भक्तो जनो! आज आपको कुबिजा की कथा सुनाते हैं| श्रद्धा और प्यार से जो स्त्री-पुरुष यह कथा श्रवण करेगा, उसके हृदय और आत्मा में प्यार उमड़ आएगा|

कुबिजा एक दासी थी| वह राजा कंस के राजमहल के बगीचे में मालिन का कार्य करती थी| सारे लोग उसको कुबिजा मालिन कह कर बुलाते थे| उसकी आयु आयु अभी अल्प थी और वह अल्पायु से ही अत्यन्त सुन्दर थी| लेकिन ईश्वर की ऐसी लीला कि वह कमर से कुबड़ी थी| वह कुबड़ी होकर चलती थी, तभी उसका नाम कुबिजा पड़ गया| उसकी बुद्धिमानी और सुन्दरता की हर कोई प्रशंसा करता था लेकिन जब उसके कुबड़ेपन को देखता तो ईश्वर को कोसता कि ऐसी सुन्दरता देकर कुब क्यों प्रदान किया| लेकिन ईश्वर की लीला को कोई भी नहीं जानता| वह खेल था जो समय के साथ होना था|

युवा होकर जब भगवान कृष्ण जी मथुरा पधारे तो एक दिन कृष्ण जी और कुबिजा का मेल हो गया| वह फूल और घिसा हुआ चंदन लेकर राजा कंस की ओर जा रही थी, उसने जैसे ही कृष्ण जी के दर्शन किए तो मानो उसके पैरों में जंजीर पड़ गई हो| उसके हृदय में मीठी-सी कंपकंपी हुई| उसके मोटे नर्गिस नयन मोहित होकर चुंधिया गए| वह उनको देखती रही| उसने एक फूल माला श्री कृष्ण जी के गले में डाल दी और साथ ही चन्दन का तिलक लगा दिया| तिलक लगाते समय यह याद न रहा कि तिलक राजा कंस को लगाना था| यदि राजा कंस को इस बारे में पता चला तो वह मौत के घाट उतरवा देगा| कंस बड़ा दुष्ट था अत्याचारी राजा था| परन्तु कुबिजा ने प्रभु को चन्दन और तिलक लगा ही दिया|

भगवान श्री कृष्ण ने जब उसका यह अनुराग देखा तो आप दयालु-कृपालु हो गए| उन्होंने कुबिजा मालिन की ओर निगाह भर कर देखा| प्रभु ने दया में आकर उसके कुबड़ापन को दूर करने के लिए विचार किया| आप विष्णु अवतार महांकाल शक्तियों के स्वामी थे| मालिन के एक पैर पर अंगूठा अपने चरण का रखकर कंधे से पकड़कर ऐसा खींचा कि वह एकदम सीधी हो गई| उसका कुबड़ापन उसी पल दूर हो गया| वह तो मानो मूर्छित-सी हो गई| भगवान कृष्ण की इस कृपा का यश करती हुई गीत गाने लगी और श्री कृष्ण जी के चरणों पर गिरकर उनको चूमने लगी| उसने श्रद्धा से हाथ जोड़कर श्री कृष्ण जी से विनती की-हे प्रभु! दासी को अपने चरणों में रखें| आप तो परमात्मा हैं, आप सृष्टि के पालक हैं|

श्री कृष्ण जी ने प्रसन्न होकर कहा – ‘हे मालिन! धैर्य रखो| समय आएगा तो तुम्हारा प्रेम प्रवान होगा| अभी शीघ्र जाओ और कंस को तिलक लगाने तुम जा रही थी, सामग्री लेकर उसे तिलक लगाओ|

यह कहकर भगवान आगे चले गए| मालिन कंस के दरबार में पहुंची लेकिन उसका मन प्रभु के चरणों में ही लिवलीन था| उसको सीधी सुन्दर खड़ी देखकर हर एक ने इस बारे पूछना चाहा लेकिन उसने कुबड़ेपन को ईश्वर द्वारा दूर करने के बारे में किसी को कुछ न बताया|

जब कंस के अत्याचारों तथा पापों का अंत करके भगवान श्री कृष्ण मथुरा, गोकुल और वृंदावन के राजा बन गए तो उन्होंने कुबिजा को तारा दर्शन देकर कृतार्थ किया| यह है मालिन और भगवान श्री कृष्ण जी की कथा, जो श्रद्धा प्रेम से सुनेगा वह भवसागर से पार हो जाएगा|

ईश्वर कल्याण तथा प्रेम प्रदान करें|

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राजा बली जी की जीवनी

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सद्पुरुष कहते हैं, पुरुष को तपस्या करने से राज मिलता है, पर राज प्राप्ति के बाद उसको नरक भोगना पड़ता है, ‘तपो राज तथा राजो नरक’ इसका मूल भावार्थ यह है कि राज प्राप्ति के पश्चात मनुष्य अहंकारी हो जाता है| अहंकार के साथ कुछ लालच भी आता है| इसलिए फिर कुछ बात नहीं सूझती| उसके कर्म ऐसे हो जाते हैं कि प्रभु उसको फिर सत्य मार्ग पर लगाने के लिए कोई कौतुक रचता है| ऐसा युगों से होता आया है जैसे कि राजा बली की कथा है|

बली नाम का एक प्रतापी राजा था| उसके दादा प्रहलाद ने तपस्या की और अमर राज प्राप्त किया| बली का पिता विरोचन भी नेक पुरुष था| बली बड़ा दानी था, कोई भी उसके पास आता तो वह उसे खाली न जाने देता| स्वयं को राजा जनक या हरीशचन्द्र कहलाता| उसने अपने राज में यज्ञ किये तथा अत्यंत दान दिया, उसे अहंकार हो गया कि मेरे जैसा कौन दानी होगा? ब्राह्मणों को दान देकर संतुष्ट कर दिया है|

परमात्मा ने देखा कि एक अच्छे भले आदमी को अहंकार हो गया है, इसका अहंकार अवश्य चकनाचूर करना चाहिए| यह विचार करके भगवान विष्णु ने एक ब्राह्मण का रूप धारण किया और राजा बली के दरबार में पहुंच गया| राजा ने आदर से कहा-हे स्वामी! आज्ञा दीजिए, मैं आपकी इस समय क्या सेवा करूं|

बावन (छोटा ब्राहमण रूप) भगवान बोले-हे राजन! मैं तो एक निर्धन ब्राह्मण हूं| मेरा कोई घर नहीं है| केवल एक इच्छा है कि आप कृपा करके मुझे सिर्फ ढ़ाई कदम धरती दे दें ताकि मैं वहां बैठ कर प्रभु का जाप कर लिया करूं आप से और क्या मांगना है| मुझे बस यही चाहिए, आपके द्वार पर बैठा रहूंगा|

यह सुन कर राजा बली हंसा तथा सम्बोधन करके कहने लगा-हे ब्राह्मण! तुम्हारा कद तो छोटा है, पर बली राजा को मजाक बहुत बड़ा करने आ गए हो| राज्य में खुले वन पड़े हैं, अनगिनत धरती पर लोगों ने आश्रम बनाए हैं, क्या तुम्हें किसी ने बैठने नहीं दिया| मेरे राज में मेरी धरती पर तो हर एक को छूट है, वह आश्रम बनाए धरती को जोते, मैं तो कुछ नहीं कहता| यदि मांगना था तो गाय, अनाज, वस्त्र, हीरे-मोती मांगते| यह क्या मांगा है? तुम ब्राह्मण हो यदि कोई और होता तो मरवा देता|

बावन चुप रहा, वह खड़ा मुस्कराता ही रहा| राजा बली बातें करता रहा|

राजा बली का मंत्री बहुत सूझवान था| वह समझ गया कि यह कोई खेल है| प्रभु स्वयं ही कोई परीक्षा लेने आए हैं| उसने राजा से कहा-राजन! यह बावन ब्राह्मण जिसने थोड़ी-सी ढाई कदम भूमि की मांग की है, वास्तव में कोई विष्णु अवतार लगता है|

‘आपको छलने के लिए आया है| कोई अद्भुत खेल न करें| जरा सावधानी से रहना चाहिए| इसकी यह बात नहीं माननी चाहिए| क्षमा मांग लेना ठीक है|’

पर राजा बली को अहंकार ने घेरा हुआ था, उसने एक न सुनी तथा कहा “जाओ ढाई कदम भूमि जहां से लेनी है, अधिकार कर लो| फिर कभी मजाक करने न आना|”

राजा बली की यह बात सुन कर बावन अवतार दरबार से बाहर आया तथा अपना शरीर इतना बढ़ा लिया कि दो कदमों में उसने बली राजा की सारी धरती सहित ब्रह्मांड माप लिया तथा आधी पूरी करने के लिए उसके सिर पर पैर आ रखा| बली राजा को होश आया, पर समय निकल गया था| बली को बावन ने पैर से धकेल कर पाताल में भेज दिया तथा कहा, ‘यहां राज करो| यह कह कर जब भगवान रूप बावन चला तो बली ने कहा, ‘मैं तो यहां राज करूंगा पर आप ने भी तो वचन दिया है कि द्वार के आगे रहोगे| अब वचन से न फिरो और बैठो|’ इस बात में भगवान भी छले गए| बापन रूप धारण कर बली के द्वार के आगे बैठ गया| बली पातालपुरी में भक्ति करने लगा|

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भक्त सुदामा जी की जीवनी

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प्रभु के भक्तों की अनेक कथाएं हैं, सुनते-सुनते आयु बीत जाती है पर कथाएं समाप्त नहीं होतीं| सुदामा श्री कृष्ण जी के बालसखा हुए हैं|

भाई गुरदास जी के कथन अनुसार सुदामा गोकुल नगरी का एक ब्राह्मण था| वह बड़ा निर्धन था| वह श्री कृष्ण जी के साथ एक ही पाठशाला में पढ़ा करता था| उस समय वह बच्चे थे| बचपन में कई बच्चों का आपस में बहुत प्यार हो जाता है, वे बच्चे चाहे गरीब हो या अमीर, अमीरी और गरीबी का फासला बचपन में कम होता है| सभी बच्चे या विद्यार्थी शुद्ध हृदय के साथ मित्र और भाई बने रहते हैं|

सुदामा और कृष्ण जी का आपस में अत्यन्त प्रेम था, वह सदा ही इकट्ठे रहते| जिस समय उनका गुरु उनको किसी कार्य के लिए भेजता तो वे इकट्ठे चले जाते, बेशक नगर में जाना हो या किसी जंगल में लकड़ी लेने| दोनों के प्रेम की बहुत चर्चा थी|

सुदामा जब पढ़ने के लिए जाता था तो उनकी माता उनके वस्त्र के पलड़े में थोड़े-से भुने हुए चने बांध दिया करती थी| सुदामा उनको खा लेता था, ऐसा ही होता रहा|

एक दिन गुरु जी ने श्री कृष्ण और सुदामा दोनों को जंगल की तरफ लकड़ियां लेने भेजा| जंगल में गए तो वर्ष शुरू हो गई| वे एक वृक्ष के नीचे बैठ गए| बैठे-बैठे सुदामा को याद आया कि उसके पास तो भुने हुए चने हैं, वह ही खा लिए जाए| वह श्री कृष्ण से छिपा कर चने खाने लगा| उसे इस तरह देख कर श्री कृष्ण जी ने पूछा-मित्र! क्या खा रहे हो?

सुदामा से उस समय झूठ बोला गया| उसने कहा-सर्दी के कारण दांत बज रहे हैं, खा तो कुछ नहीं रहा, मित्र!

उस समय सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण जी के मुख से यह शब्द निकल गया -‘सुदामा! तुम तो बड़े कंगाल हो, चनों के लिए अपने मित्र से झूठ बोल दिया|’

यह कहने की देर थी कि सुदामा के गले दरिद्र और कंगाली पड़ गई, कंगाल तो वह पहले ही था| मगर अब तो श्री कृष्ण ने वचन कर दिया था| यह वचन जानबूझ कर नहीं सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण के मुख से निकल गया, पर सत्य हुआ| सुदामा और अधिक कंगाल हो गया|

पाठशाला का समय खत्म हो गया और सुदामा अपने घर चला गया| विवाह हुआ, बच्चे हुए तथा उसके पश्चात माता-पिता का देहांत हो गया| कंगाली दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी, कोई फर्क न पड़ा| दिन बीतने लगे| श्री कृष्ण जी राजा बन गए, उनकी महिमा बढ़ गई| वह भगवान रूप में पूजा जाने लगे तो सुदामा बड़ा खुश हो का अपनी पत्नी को बताया करता कि हम दोनों का परस्पर अटूट प्रेम होता था|

उसकी पत्नी कहने लगी -‘यदि आपके ऐसे मित्र हैं और आप में इतना प्रेम था तो आप उनके पास जाओ और अपना हाल बताओ| हो सकता है कि कृपा तथा दया करके हमारी कंगाली दूर कर दें|’

अपनी पत्नी की यह बात सुन कर सुदामा ने कहा -‘जाने के लिए तो सोचता हूं, पर जाऊं कैसे, श्री कृष्ण के पास जाने के लिए भी तो कुछ न कुछ चाहिए, आखिर हम बचपन के मित्र हैं|’

आखिर उसकी पत्नी ने बहुत ज़ोर दिया तो एक दिन सुदामा अपने मित्र श्री कृष्ण कि ओर चल पड़ा| उसकी पत्नी ने कुछ चावल, तरचौली उसको एक पोटली में बांध दिए| सुदामा मन में विचार करता कि मित्र को कैसे मिलेगा? क्या कहेगा? द्वारिका नगरी में पहुंच कर वह श्री कृष्ण जी का दरबार लगता था| प्रभु वहां इंसाफ और न्याय करते थे| सुदामा ने डरते और कांपते हुए द्वारपाल को कहा – ‘मैंने राजा जी को मिलना है|’

द्वारपाल-‘क्या नाम बताऊं जा कर?’

सुदामा-उनको कहना सुदामा ब्राह्मण आया है, आपके बचपन का मित्र| द्वारपाल यह संदेश ले कर अंदर चला गया| जब उसने श्री कृष्ण जी को संदेश दिया तो वह उसी पल सिंघासन से उठ कर नंगे पांव बाहर को भागे तथा बाहर आ कर सुदामा को गले लगा लिया| कुशलता पूछी तथा बड़े आदर और प्रेम से उसे अपने सिंघासन पर बिठाया और उसके पैर धोए| पास बिठा कर व्यंग्य के लहजे में कहा – लाओ मेरी भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है?

यह कह कर श्री कृष्ण ने सुदामा के वस्त्रों से बंधी हुई पोटली खोल ली और फक्के मार कर चबाने लगे| चबाते हुए वर देते गए तथा कहते रहे, “वाह! कितनी स्वादिष्ट है तरचौली! कितनी अच्छी है भाभी!”

सुदामा प्रसन्न हो गया| श्री कृष्ण ने मित्र को अपने पास रखा तथा खूब सेवा की गई| बड़े आदर से उसको भेजा| विदा होते समय न तो सुदामा ने श्री कृष्ण से अपनी निर्धनता बताते हुए कुछ मांगा तथा न ही मुरली मनोहर ने उसे कुछ दिया| सुदामा जिस तरह खाली हाथ दरबार की तरफ गया था, वैसे ही खाली हाथ वापिस घर को चल पड़ा| मार्ग में सोचता रहा कि घर जाकर अपनी पत्नी को क्या बताऊंगा? मित्र से क्या मांग कर लाया हूं|

सुदामा गोकुल पहुंचा| जब वह अपने मुहल्ले में पहुंचा तो उसे अपना घर ही न मिला| वह बड़ा हैरान हुआ| उसका कच्चा घर जो झौंपड़ी के बराबर घास फूस से बना गाय बांधने योग्य था, कहीं दिखाई न दिया| वह वहां खड़ा हो कर पूछना ही चाहता था कि इतने में उसका लड़का आ गया| उसने नए वस्त्र पहने हुए थे| ‘पिता जी! आप बहुत समय लगा कर आए हो|…..द्वारिका से आए जिन आदमियों को आप ने भेजा था, वह यह महल बना गए हैं, सामान भी छोड़ गए हैं तथा बहुत सारे रुपये दे गए हैं| माता जी आपका ही इंतजार कर रहे हैं| आप आकर देखें कितना सुंदर महल बना है|’

अपने पुत्र से यह बात सुन कर तथा कच्चे घर की जगह सुन्दर महल देख कर वह समझ गया कि यह सब भगवान श्री कृष्ण की लीला है| श्री कृष्ण ने मुझे वहां अपने पास द्वारिका में रखा और मेरे पीछे से यहां पर यह लीला रचते रहे तथा मुझे बिल्कुल भी मालूम नहीं पड़ने दिया| महल इतना सुन्दर था कि, उस जैसा किसी दूसरे का शायद ही हो| शायद महल बनाने के लिए विश्वकर्मा जी स्वयं आए थे, तभी तो इतना सुन्दर महल बना| भगवान श्री कृष्ण की लीला देख कर सुदामा बहुत ही प्रसन्न था| उसके बिना कुछ बताए ही श्री कृष्ण जी सब कुछ समझ गए थे|

उस दिन के बाद सुदामा श्री कृष्ण की भक्ति में लग गया और भक्तों में गिने जाने लगा|

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राजा हरिचन्द जी की जीवनी

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एक हरिचन्द नाम का राजा था| उसकी रानी का नाम तारा रानी था| रानी को बचपन से ही सद् पुरुषों के वचन सुनने की लगन थी| छोटे-से राज्य की धार्मिक विचारों वाली रानी विवाह के पश्चात भी पूजा पाठ में लगी रहती थी| एक दिन राज भवन के निकट एक भजन मण्डली आ गई, वह हरि कीर्तन करने लगी| सारी रात ही कीर्तन होता रहता| रानी को जब पता चला तो वह भी उस कीर्तन में जाने लगी| अब यह उसका नित्य नियम था| परमात्मा का नाम ही उसके जीवन का आसरा था| वह बिना किसी भय के इस नेक रास्ते पर जाया करती थी|

भाई गुरदास जी के कथन अनुसार एक दिन तारा रानी जब कीर्तन सुनने गई तो बाद में राजा जाग गया| राजा धर्मी नहीं था इसलिए रानी का भी उसे कीर्तन में जाना अच्छा नहीं लगता था| वह सदा अपने राज कार्य में जुटा रहता तथा धर्म-कर्म की ओर ध्यान देने के स्थान पर रंगरलियां मनाने में लगा रहता| ऐसे पुरुष प्राय: शकी स्वभाव के होते हैं| राजा हमेशा अपनी रानी पर शक करता रहता था| रानी जितनी नेक थी उतनी ही रूपवंती भी थी| परमात्मा ने उसे सभी सुख दिए थे, वह शांति से दिन काट रही थी|

जब राजा जागा तो उसने देखा कि रानी की सेज खाली है| वह कहां गई? राजा के मन में हैरानी हुई| उसने उठ कर देखा पर रानी उसे कहीं भी न मिली| राज भवन के पहरेदारों से पूछा तो उन्होंने भी कुछ न बताया, क्योंकि जब रानी जाती थी तो उस समय पहरेदारों को नींद आ जाया करती थी| वह रानी को जाते हुए नहीं देख पाते थे| यह सब भगवान की ही लीला थी|

जब रानी वापिस आ गई तो राजा चुप ही रहा| उसने रानी को कुछ न पूछा| पर अगली रात को उसे नींद न आई| वह जागता रहा और उसने नजर रखी कि कब रानी उठ कर जाती है लेकिन रानी अपने नित्य नियम अनुसार सो गई| जब अमृत के समय कीर्तन का समय आया, आधी रात बीत गई तो रानी उठी| स्नान किया, साधारण भक्ति भाव वाले वस्त्र पहने और कीर्तन में चल पड़ी|

राजा वास्तव में सोया नहीं था| वह तो ऐसे ही आंखें बंद करके लेटा था| जब तारा रानी चली तो राजा ने उसका पीछा किया| रानी कीर्तन में जा बैठी, वहां पर हरि कीर्तन हो रहा था| वहां पर सब भक्त कीर्तन में अन्तर्ध्यान हुए विराजमान थे| परम शांति और प्यार का वातावरण था

राजा रानी का पीछा करते-करते कीर्तन में पहुंच गया| वह वहां पर खड़ा पहले तो कुछ देर सोचता रहा, फिर रानी की एक खड़ाऊं उठा कर अपने राज भवन में आ गया| राज भवन आकर आराम से अपनी सेज पर सो गया| उसको दीन दुनिया का कोई ख्याल नहीं था, वह तो राज-काज, रंग-राग और माया का पुतला था| उस दिन वह सोते हुए कई स्वपन देखता रहा|

कीर्तन समाप्त हुआ तथा भोग पड़ गया| जब रानी बाहर आ कर अपनी खड़ाऊं पहनने लगी तो एक खड़ाऊं गायब थी| एक खड़ाऊं को देखकर रानी कुछ हैरान हुई कि यह कैसे हो गया? एक खड़ाऊं किसने चुरा ली है| उस समय सत्संगियों को भी पता चल गया| संगत ने अरदास की कि है पारब्रह्म! तुम्हारा यश गान करते हुए रानी की खड़ाऊं का चले जाना भय का कारण है| तुम्हारा यश किस तरह प्रगट होगा? कोई चमत्कार दिखाओ, रानी ने राज भवन जाना है|

संगत ने ऐसी अरदास की कि उसी समय खड़ाऊं के साथ वही जो पुरानी खड़ाऊं थी, आ कर जुड़ गई| रानी तारा ने खड़ाऊं के साथ वही जोड़ी पहनी और राज भवन में आ गई| जब वह अपने कक्ष में गई तो राजा ने पूछा, ‘रानी! आप की खड़ाऊं कहां है?’

हे नाथ! मेरी खड़ाऊं मेरे पैरों में है| क्या बात है जो आज आप ने यह पूछने को कष्ट किया|’ तारा रानी ने उत्तर दिया|

‘कहां है? राजा ने फिर पूछा|’

‘दासी के पैरों में|’

राजा हरिचन्द ने देखा दोनों खड़ाऊं रानी के पैरों में थी एक जैसी थी, एक जैसी ही घिसी हुई| राजा को हैरानी हुई और उसने जल्दी से उठा कर लाई हुई खड़ाऊं देखनी चाही, पर वह खड़ाऊं वहां नहीं थी| इस तरह के चमत्कार से राजा बड़ा हैरान हुआ| रानी सारी बात समझ गई कि राजा बाद में जाग गया होगा और शक पड़ने पर मेरे पीछे लग गया होगा| पर सत्संग के कारण मेरी लाज रह गई| पारब्रह्म परमेश्वर बड़ा दयालु और लीला करने वाला है| कोई भी उसका पारावार नहीं ले सकता| तब रानी ने स्पष्ट तौर पर राजा से पूछा, हे नाथ! अब तो आपको विश्वास हो गया कि मैं आधी रात को उठ कर कहां जाती हूं| मैं परमात्मा की भक्ति करती हूं| भक्ति ही मेरे जीवन का उद्देश्य है| इस मायावादी जगत में और है भी क्या? कितना अच्छा हो अगर आप भी वहां सत्संग में जाया करें| सत्संग में बैठ कर थोड़ा-सा तन मन को शांत कर लिया करो, राज-काज तो होते ही रहते हैं|

राजा हरिचन्द ने तारा रानी से क्षमा मांगी तथा उसे कीर्तन में जाने की आज्ञा दे दी| वह स्वयं भी भक्ति मार्ग पर चल पड़ा|

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संत तुकाराम जी

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हमारे यहाँ तीर्थ यात्रा का बहुत ही महत्त्व है। पहले के समय यात्रा में जाना बहुत कठिन था। पैदल या तो बैल गाड़ी में यात्रा की जाती थी। थोड़े थोड़े अंतर पे रुकना होता था। विविध प्रकार के लोगो से मिलना होता था, समाज का दर्शन होता था। विविध बोली और विविध रीति-रीवाज से परिचय होता था। कंई कठिनाईओ से गुजरना पड़ता, कंई अनुभव भी प्राप्त होते थे। एकबार तीर्थ यात्रा पे जानेवाले लोगो का संघ संत तुकाराम जी के पास जाकर उनके साथ चलनेकी प्रार्थना की। तुकारामजी ने अपनी असमर्थता बताई। उन्होंने तीर्थयात्रियो को एक कड़वा कद्दू देते हुए कहा : “मै तो आप लोगो के साथ आ नहीं सकता लेकिन आप इस कद्दू को साथ ले जाईए और जहाँ – जहाँ भी स्नान करे, इसे भी पवित्र जल में स्नान करा लाये।” लोगो ने उनके गूढार्थ पे गौर किये बिना ही वह कद्दू ले लिया और जहाँ – जहाँ गए, स्नान किया वहाँ – वहाँ स्नान करवाया; मंदिर में जाकर दर्शन किया तो उसे भी दर्शन करवाया। ऐसे यात्रा पूरी होते सब वापस आए और उन लोगो ने वह कद्दू संतजी को दिया। तुकारामजी ने सभी यात्रिओ को प्रीतिभोज पर आमंत्रित किया। तीर्थयात्रियो को विविध पकवान परोसे गए। तीर्थ में घूमकर आये हुए कद्दूकी सब्जी विशेष रूपसे बनवायी गयी थी। सभी यात्रिओ ने खाना शुरू किया और सबने कहा कि “यह सब्जी कड़वी है।” तुकारामजी ने आश्चर्य बताते कहा कि “यह तो उसी कद्दू से बनी है, जो तीर्थ स्नान कर आया है। बेशक यह तीर्थाटन के पूर्व कड़वा था, मगर तीर्थ दर्शन तथा स्नान के बाद भी इसी में कड़वाहट है !” यह सुन सभी यात्रिओ को बोध हो गया कि ‘हमने तीर्थाटन किया है लेकिन अपने मन को एवं स्वभाव को सुधारा नहीं तो तीर्थयात्रा का अधिक मूल्य  नहीं है। हम भी एक कड़वे कद्दू जैसे कड़वे रहकर वापस आये है।’ हमारे यहाँ तीर्थ यात्रा का बहुत ही महत्त्व है। पहले के समय यात्रा में जाना बहुत कठिन था। पैदल या तो बैल गाड़ी में यात्रा की जाती थी। थोड़े थोड़े अंतर पे रुकना होता था। विविध प्रकार के लोगो से मिलना होता था, समाज का दर्शन होता था। विविध बोली और विविध रीति-रीवाज से परिचय होता था। कंई कठिनाईओ से गुजरना पड़ता, कंई अनुभव भी प्राप्त होते थे।

एकबार तीर्थ यात्रा पे जानेवाले लोगो का संघ संत तुकाराम जी के पास जाकर उनके साथ चलनेकी प्रार्थना की। तुकारामजी ने अपनी असमर्थता बताई। उन्होंने तीर्थयात्रियो को एक कड़वा कद्दू देते हुए कहा : “मै तो आप लोगो के साथ आ नहीं सकता लेकिन आप इस कद्दू को साथ ले जाईए और जहाँ – जहाँ भी स्नान करे, इसे भी पवित्र जल में स्नान करा लाये।”

लोगो ने उनके गूढार्थ पे गौर किये बिना ही वह कद्दू ले लिया और जहाँ – जहाँ गए, स्नान किया वहाँ – वहाँ स्नान करवाया; मंदिर में जाकर दर्शन किया तो उसे भी दर्शन करवाया। ऐसे यात्रा पूरी होते सब वापस आए और उन लोगो ने वह कद्दू संतजी को दिया। तुकारामजी ने सभी यात्रिओ को प्रीतिभोज पर आमंत्रित किया। तीर्थयात्रियो को विविध पकवान परोसे गए। तीर्थ में घूमकर आये हुए कद्दूकी सब्जी विशेष रूपसे बनवायी गयी थी। सभी यात्रिओ ने खाना शुरू किया और सबने कहा कि “यह सब्जी कड़वी है।” तुकारामजी ने आश्चर्य बताते कहा कि “यह तो उसी कद्दू से बनी है, जो तीर्थ स्नान कर आया है। बेशक यह तीर्थाटन के पूर्व कड़वा था, मगर तीर्थ दर्शन तथा स्नान के बाद भी इसी में कड़वाहट है !”

यह सुन सभी यात्रिओ को बोध हो गया कि ‘हमने तीर्थाटन किया है लेकिन अपने मन को एवं स्वभाव को सुधारा नहीं तो तीर्थयात्रा का अधिक मूल्य  नहीं है। हम भी एक कड़वे कद्दू जैसे कड़वे रहकर वापस आये है।’

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माई सरखाना जी

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आज की दुनिया में प्यार तथा श्रद्धा की बेअंत साखियां हैं| गुरु घर में तो अनगिनत सिक्ख हुए हैं, जिन्होंने गुरु चरणों से ऐसी प्रीति की है, जिस की मिसाल अन्य धर्मों में कम ही मिलती है| ऐसी प्रीति की व्याख्या करते हुए भाई गुरदास जि फरमाते हैं कि सिक्ख गुरु से ऐसी प्रीति करते हैं जैसे मान सरोवर के हंस मोतियों के साथ करते हैं, भाव मोती खाते है| कोयल का प्यार आमों के साथ है तथा उनके वैराग में मीठे गीत गाती रहती है| चंदन की सुगन्धि से सारी वनस्पति झूम उठती है| लोहा पारस के साथ मिल कर सोना हो जाता है| नदियां तथा नाले गंगा से मिल कर पवित्र हो जाते हैं| अंत में भाई साहिब कहते हैं, सिक्खों का प्यार ही उनकी पवित्र रास पूंजी है|

जब इतिहास को देखे तो माई सरखाना का नाम आदर से लिया जाता है| आप गुरु घर में बड़ा आदर प्राप्त कर चुकी थीं| उसके प्यार की कथा बड़ी श्रद्धा दर्शाने वाली है| वह प्यारी दीवानी श्रद्धालु तथा अमर आत्मा हुई| जिसका यश आज भी गाया जाता है|

किसी गुरु-सिक्ख से माई ने गुरु घर की शोभा सुनी| उस समय बुढ़ापा निकट था तथा जवानी ढल चुकी थी| बच्चों का विवाह हो गया था| जिम्मेवारियां सिर से उतर गई थीं| उसे अब जन्म-मरण के चक्र का ज्ञान हो गया था| पर यह पता नहीं था कि चौरासी का चक्र कैसे खत्म होता था|

गुरसिक्ख ने माई सरखाना को गुरसिक्खी का ज्ञान करवाते हुए यह शब्द पढ़ा-

मन मंदरु तनु वेस कलंदरु घट ही तीरथि नावा||

एकु सबदु मेरै प्रानि थसतु है बाहुड़ि जनमि न आवा||१||

यह शब्द जो हृदय में बसता है, वह शब्द सतिगुरु जी से प्राप्त होता है| सतिगुरु त्रिकालदर्शी थे| सतिगुरु नानक देव जी की गुरुगद्दी पर छठे पातशाह हैं मीरी-पीरी के मालिक! उनको याद कर उनके चरणों में सुरत लगा कर मन में श्रद्धा धारण करो|

अच्छा! मैं श्रद्धा करूंगी| मुझे बताओ सेवा के लिए भेंट क्या रखूंगी, जब दर्शन करूं| माई सरखाना ने पूछा था|

गुरसिक्ख-सतिगुरु जी प्रीत पर श्रद्धा चाहते हैं| कार भेंट जो भी हो| पहुंच से ऊपर कुछ नहीं मांगते| एक टके से भी प्रसन्न होते हैं| उनके दरबार में सेवक हाथी, घोड़े, दुशाले, रेशमी वस्त्र, सोना, चांदी बेअंत भेंट चढ़ाते हैं| नौ निधियां तथा बारह सिद्धियां हैं| सतिगुरु जी अवश्य आपका जन्म-मरन काटेंगे, वह कृपा के सागर हैं :-

हरिगोविंद गुरु अरजनहुं गुरु गोबिंद नाउं सदवाया|

गुर मूरति गुर शबद है साध संगति विच प्रगटी आया|

पैरीं पाइ सभ जगत तराया|२५|

इस तरह गुरु घर की शोभा सुन कर माई सरखाना गुरु घर की श्रद्धालु बन गई| उसने ध्यान कर लिया तथा गुरसिक्ख द्वारा सुने मूल मंत्र का जाप करने लगी| उसके मन में प्रेम जाग पड़ा| मन के साथ हाथ भी सेवा के लिए उत्साहित हुए| अपनी फसलों में से मोटे-मोटे गुल्लों वाली कपास चुनी| कपास चुन कर पेली तथा फिर रुई पिंजाई, रुई पिंजाई गई तो सतिगुरु जी का ध्यान धर कर कातती रही| रुई कात कर जुलाहे से श्रद्धा के साथ कपड़ा तैयार करवाया| बुढ़ापे में लम्बी आयु के तजुर्बे के साथ बारीक तथा सूत का कपड़ा रेशमी कपड़े जैसा था| उसने अपने हाथ से चादरा तैयार किया तथा मन में श्रद्धा धारण की, ‘सतिगुरु जी के दर्शन हो|’

पर गुरसिक्खों से सुनती रही कि गुरु जी के दरबार में राजा, महाराजा तथा वजीर आते हैं| फिर वैराग के साथ मन में सोचती मैं तो एक गुरसिक्ख हूं, जिसके पास एक चादरा है वह भी खादी का| कैसे सतिगुरु जी स्वीकार करेंगे? इस तरह मन में वैराग आया तथा मन में उतार चढ़ाव रहा|

मीरी-पीरी के मालिक सतिगुरु हरिगोबिंद साहिब जी मालवे की धरती को पूजनीय बनाने तथा सिक्ख सेवकों का उद्धार करने गए थे| डरोली भाई दीवान लगा था, सिक्ख संगतें आतीं तथा दर्शन करके वापिस जातीं| घरों तथा नगरों में जा कर गुरु यश को सुगन्धि की तरह फैलातीं|

माई सरखाना को भी खबर मिल गई कि सतिगुरु जी निकट आ गए हैं| वह भी सतिगुरु जी के दर्शन के लिए तैयार हो गई| देशी चीनी में घी मिलाया| मक्खन के परांठे बनाए तथा चादरे को जोड़ कर सिर पर रखकर चल पड़ी| चार-पांच कोस का रास्ता तय करके गुरु दरबार के निकट पहुंची तो माई के पैर रुक गए| वह मन ही मन विचार करने लगी, मैं निर्धन हूं, मेरा खादी का चादरा, चीनी, घी तथा परांठे क्या कीमत रखते हैं? जहां राजाओं, महाराजाओं के कीमती दुशाले आए होंगे|…..छत्तीस प्रकार का भोजन खाने वाले दाता यह भारी परांठे क्या पता खाए कि न खाएं यह तो…..

वह दीवार के साथ जुड़ कर खड़ी हो गई| आंखें बंद कर लीं तथा अंतर-आत्मा में सतिगुरु जी को याद करने लगी| वह दुनिया को भूल गई, अटल ध्यान लग गया, सुरति जुड़ गई|

उधर सच्चे पातशाह सतिगुरु हरिगोबिंद साहिब जी महाराज, मीरी पीरी के मालिक, भवसागर से पार करने की समर्था रखने वाले दाता, दयावान, अन्तर्यामी जान गए| माता सरखाना ध्यान लगा कर खड़ी है| उसके आगे भ्रम की दीवार है| वह दीवार पीछे नहीं हट सकती, जितनी देर कृपा न हो|

अन्तर्यामी दाता ने हुक्म दिया – ‘घोड़ा लाओ!’ यह हुक्म दे कर पलंग से उठ गए| जूता पहना तथा शीघ्र ही दीवान में से बाहर हुए| सिक्ख संगत चोजी प्रीतम के चोज को देख कर हैरान हुई, जो उनका भेद जानते थे, वह समझ गए कि किसी जीव को पार उतारने के लिए महाराज चले हैं तथा जो नए थे वे हैरान ही थे| उनकी हैरानी को दूर करने वाला कोई नहीं था|

उधर माई सरखाना की आंखें बंद थीं तथा वह प्रार्थनाएं किए जा रही थीं| उसकी आत्मा कहती जा रही थी – ‘हे सच्चे पातशाह! मैं निर्धन हूं| कैसे दरबार में आऊं, डर लगता है| अपनी कृपा करो, मैं दर्शन के लिए दूर खड़ी हूं| कोई रास्ता नहीं, डर आगे चलने नहीं देता, दाता जी कृपा करो! दया करो!’

इस तरह आंखें बंद करके सतिगुरु जी को याद किए जा रही थी| उधर सतिगुरु जी घोड़े पर सवार हुए, घोड़े को दौड़ाया तथा उसी जगह पहुंचे जहां माई सरखाना दीवार से सहारा लगा कर खड़ी थी| सतिगुरु जी ने आवाज दी –

‘माता जी देखो! आंखें खोल कर देखो! सतिगुरु जी के यह शब्द सुन कर माई ने आंखें खोलीं, देखा दाता घोड़े पर सवार खड़े थे| माई शीघ्र ही आगे हुई, चरणों पर शीश झुका कर प्रणाम किया| खुशी में इतनी मग्न हो गई कि उसकी जुबान न खुली, वह कुछ बोल न सकी| बहती आंखों से सतिगुरु की तरफ देखती दर्शन करती गई|’

सच्चे पातशाह ने कहा-‘अच्छा माता जी! रोटी दें हम खाएं, हमें बहुत भूख लगी है|…. परांठे…..| आपका हम इन्तजार करते रहे आप तो रास्ते में ही खड़े रहे|’

माई ने झोली में से घी, चीनी वाला डिब्बा तथा परांठे निकाल कर सतिगुरु को पकड़ा दिए| सतिगुरु ने प्रसन्न होकर भोजन किया| भोजन करने के बाद सतिगुरु जी ने चादरे की मांग की| माई ने चादरा गुरु जी को भेंट कर दिया| माई ने जी भर कर दर्शन कर लिये एवं मन की श्रद्धा पूरी हो गई| माई कृतार्थ हो गई| उसका जन्म मरन का चक्र खत्म हो गया| दाता ने अपनी कृपा से माई सरखाना को अमर कर दिया|

सतिगुरु जी माई सरखाना का उद्धार कर ही रहे थे कि पीछे सिक्ख आ गए| हजूरी सिक्ख को सतिगुरु जी ने हुक्म दिया – ‘माता जी को दरबार में ले आओ| यह हुक्म करके आप दरबार की तरफ चले गए| माई सरखाना दो दिन दरबार में रह कर दर्शन करती रही| उसका कल्याण हो गया| उस माई के नाम पर आज उसका गांव सरखाना मालवे में प्रसिद्ध है|

मान सरोवर हंसला खाई मानक मोती|

कोइल अंब परीत है मिठ बोल सरोती|

चंदन वास वणासपति हुइ पास खलोती|

लोहा पारस भेटिए हुइ कंचन जोती|

नदीआं नाले गंग मिल होन छोत अछोती|

पीर मुरीदां पिरहड़ी इह खेप सिओती|६|

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भक्त विदुर जी

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युगों-युगों से यह रीत चली आ रही है कि अहंकार और लालच की सदा दया, धर्म और प्यार से टक्कर रही है| अहंकारी और लालची पुरुष की सेवा, उसकी अयोग्य आज्ञा का पालन वह करता है, जिसे आवश्यकता हो ‘गौं भुनावे जौं|’ लेकिन जिसे कोई दुःख, लालच, अहंकार, लोभ नहीं, वह कदापि भी अहंकारी मनुष्य की परवाह नहीं करता| ऐसी ही कथा भक्त विदुर और श्री कृष्ण जी की है| श्री कृष्ण जी सदा प्रेम और श्रद्धा के प्यासे रहे हैं| उनको राज पाठ, शान-शौकत आदि की कभी आवश्यकता नहीं थी| प्रभु के पास सब कुछ अपरंपार है|

जहां वह धरती मथुरा-वृंदावन के राजा थे, वहां प्रेम, श्रद्धा, भक्ति तथा दिलों के भी राजा थे|

भाई गुरदास जी ने इस बारे सुन्दर कथा बयान की है|

एक दिन मुरली मनोहर श्री कृष्ण जी दुर्योधन के राज्य में पधारे वह दुर्योधन के शीश महलों तथा दरबारियों-सेनापतियों के शाही ठाठ-बाठ वाले महलों को छोड़कर एक दासी पुत्र विदुर की झौंपड़ी में रात को जाकर ठहरे| उस निर्धन के पास एक चटाई ही बैठने के लिए थी और खाने के लिए केवल अलूना सरसों का साग उसने रखा हुआ था| वह भी हांडी में पक रहा था| भगवान श्री कृष्ण विदुर की कुटिया में पहुंच गए| श्री कृष्ण के चरण स्पर्श से उसकी कुटिया में उजाला हो गया| उसके भाग्य जाग गए| उसने प्रभु के चरण धोकर चरणामृत लिया और सारी रात प्रभु की खुले मन से सेवा करता रहा| प्रभु के प्रवचन सुनकर वह मुग्ध हो गया, जिसकी भक्ति करता आ रहा था, दर्शन के लिए तड़पता था, वह प्रत्यक्ष दर्शन देकर उसे आनंदित करते रहे| विदुर का साग उन्होंने बड़े चाव से खाया| ऐसे चखा जैसे छत्तीस प्रकार के भोजन खाते हैं| विदुर को भी नया ही स्वाद आया| उसका मन तृप्त हो गया| वह एक तरह से मुक्त हो गया| उसका जीवन इस भवसागर से पार हो गया| वह एक दासी पुत्र था| अहंकारी दुर्योधन तथा उसके भाई और दरबारी विदुर को अच्छा नहीं समझते थे| उनको अपने राज का अहंकार था|

भक्त विदुर के जन्म की कथा इस प्रकार है| विदुर दुर्योधन का चाचा लगता था| धृतराष्ट्र, पांडव और विदुर तीनों भाई ऋषि व्यास के पुत्र थे| उनके जन्म की कथा इस प्रकार महाभारत में वर्णन है|

रानी सत्यवती के तीन पुत्र थे| व्यास, चित्रांगाद और विचित्रवीर्य| व्यास के अलावा दोनों पुत्र शादीशुदा थे और उनकी रानियां काफी सुन्दर रूपवती थीं| लेकिन संयोग से दोनों ही शीघ्र मर गए| उनकी दोनों रानियां अम्बा और अम्बिका विधवा हो गईं| वह सुन्दर तथा रूपवती सन्तानहीन थीं| राजसिंघासन तथा वंश चलाने के लिए संतान की आवश्यकता थी|

एक दिन रानी सत्यवती ने अपनी दोनों वधुओं को बैठा कर समझाया कि हस्तिनापुर के राजसिंघासन हेतु वह उसके बड़े पुत्र व्यास से सन्तान प्राप्त कर ले| लेकिन व्यास शक्ल सूरत से कुरुप था इसलिए दोनों रानियां उससे सन्तान प्राप्त नहीं करना चाहती थीं| लेकिन रानी सत्यवती के अधिक विवश करने पर दोनों रानियों अम्बा और अम्बिका ने एक-एक पुत्र प्राप्त किया| अम्बा का पुत्र धृतराष्ट्र था जो जन्म से ही अन्धा था और अम्बिका के गर्भ से पांडव का जन्म हुआ|

रानी अम्बिका व्यास की सूरत से घृणा करती थी| जब रानी सत्यवती ने उसे और पुत्र प्राप्त करने के लिए कहा तो अम्बिका ने बड़ी चालाकी से स्वयं जाने की जगह व्यास के पास अपनी दासी को भेज दिया|

उस दासी के पेट से जिस बच्चे ने जन्म लिया, उसका नाम विदुर रखा गया| दासी पुत्र होने के कारण विदुर का राजमहल में सत्कार कम था|

पांडव बड़ा राजपुत्र होने के कारण राजसिंघासन पर विराजमान हुआ| लेकिन तीर्थ यात्रा करने गया पांडव एक ऋषि के श्राप से शीघ्र ही स्वर्ग सिधार गया| उसकी मृत्यु के बाद जो राज विदुर को मिलना चाहिए था, दासी पुत्र होने के कारण उसे न मिल सका| राजसिंघासन पर धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का राजा घोषित करके विराजमान किया|

इस प्रकार विदुर नगर से बाहर अपनी पत्नी के साथ एक छोटी-सी कुटिया में रहने लग गया| राज की ओर से इतनी घृणा हो गई कि वह राज राजकोष से कोई धन नहीं लेता था| अपने परिश्रम द्वारा ही निर्वाह करता और धरती पर ही सोता| उसका मन प्रभु भक्ति में सदा लिवलीन रहता, जिससे उसकी भक्ति पर प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण उसके घर रात रहे|

भाई गुरदास जी फरमाते हैं कि दुर्योधन को जब इस बारे पता लगा कि यादव वंश मथुरा के राजा श्री कृष्ण उसके महल में रात रहने की बजाय उनके चाचा दासी पुत्र विदुर के घर में रहे हैं और स्वादिष्ट पकवानों की जगह अलूना साग खाया है तो वह भगवान कृष्ण के पास गया और उसने कहा – ‘हे कृष्ण! आप हमारे राजभवन में रहने की जगह दासी पुत्र की झौंपड़ी में क्यों ठहरे हैं| यदि मेरे पास नहीं रहना था तो मेरी सभा के श्रृंगार भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा कर्ण आदि के पास रुक जाते| उनके राजभवनो में जाकर निवास कर लेते| हमें यह बहुत बुरा लगा है कि आपने एक दासी पुत्र के घर कुटिया में जाकर रात बिताई| हमारे साथ क्या वैर-विरोध हुआ है?

दुर्योधन की यह बात सुनकर भगवान कृष्ण जी हंस पड़े और उसकी तरफ देखते हुए कहने लगे-हे दुर्योधन! विदुर की झौंपड़ी तो अति पवित्र है| विदुर राजाओं का राजा है, क्योंकि उसकी आत्मा प्रेम भक्ति के रस में डूबी हुई है| ईश्वर प्रेम देखता है लेकिन दूसरी ओर आपके महलों में प्रेम भक्ति का वास नहीं, आपके यहां अहंकार, लोभ, राज की भूख है, इसलिए मुझे विदुर का प्रेम खींच कर ले गया| यह भी बात है कि मुझे न कोई विपदा पड़ी है तथा न कोई दुःख है जो मैं आप का सहारा लूंगा| एक बे-गरज आदमी को क्या जरूरत है कि राजाओं के महलों में जाकर उनकी खुशामद करे? जी विदुर के घर चाव, श्रद्धा तथा प्यार की भावना है वह आपके पास नहीं और मेरा हृदय प्यार का चाहवान है, क्योंकि पारब्रह्म परमेश्वर और जीव के बीच केवल एक प्यार का संबंध है|

कबीर जी के मुखारबिंद श्री कृष्ण जी ने कहा-हे राजन! बताओ कौन आपके घर में आएगा, क्योंकि आपके घर प्रेम एवं श्रद्धा का निवास नहीं| जैसा विदुर के घर प्रेम है वह मुझे अच्छा लगता है|आप तो अपनी उच्च पदवी राजसिंघासन को देखकर भ्रम का शिकार हुए हैं और परमात्मा की महाकाल शक्ति को भुला बैठे हैं क्योंकि आपको परमेश्वर का ज्ञान नहीं| सिर्फ राज अभिमान है| इसलिए विदुर आप से बहुत बड़ा है| आपके राजमहल का दूध एवं विदुर के घर का जल मैं एक समान समझता हूं, जो मैंने उसके घर सरसों का साग खाया है वह आपकी खीर से अच्छा है और परमेश्वर के गुण गाते हुए सारी रात अच्छी बीती| मुझे बड़ा आनंद आया| यदि आपके पास निवास करता तो राजा की निंदा और ईर्ष्या आदि सुनने थे| अब तो ठाकुर का गुण गाते हुए रात अच्छी व्यतीत हुई तथा ठाकुर के लिए छोटे-बड़े सब जीव एक समान हैं| ऐसा उपदेश वाला उत्तर भगवान कृष्ण जी ने दिया| इस संबंध में मारू राग में कबीर जी फरमाते हैं:

राजन कऊनु तुमारै आवै||

ऐसो भाउ बिदर को देखिओ ओहुगरीबु मोहि भावै||१|| रहाउ||

हसती देखि भरम ते भूला स्रीभगवान न जानिआ||

तुमरो दूध बिदर को पान्हो अंम्रितु करि मैमानिआ||१||

खीर समानि सागु मै पाइआ गुन गावत रैनिबिहानी||

कबीर को ठाकुरु अनद बिनोदी जाति न काहू की मानी||

इस कथा का भावार्थ यह है कि प्रभु से प्रेम करने वाले भक्तों से प्रभु भी उतना ही अटूट प्रेम करता है और राज अभिमान की जगह प्रेम-भक्ति का दर्जा श्रेष्ठ है|

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राजा जनक जी

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जनक जी एक धर्मी राजा थे| उनका राज मिथिलापुरी में था| वह एक सद्पुरुष थे| न्यायप्रिय और जीवों पर दया करते थे| उनके पास एक शिव धनुष था| वह उस धनुष की पूजा किया करते थे| आए हुए साधू-संतों को भोजन खिलाकर स्वयं भोजन करते थे|

लेकिन एक दिन एक महात्मा ने राजा जनक को उलझन में डाल दिया| उस महात्मा ने राजा जनक से पूछा-हे राजन! आप ने अपना गुरु किसे धारण किया है?

यह सुन कर राजा सोच में पड़ गया| उसने सोच-विचार करके उत्तर दिया-हे महांपुरुष! मुझे याद है कि अभी तक मैंने किसी को गुरु धारण नहीं किया| मैं तो शिव धनुष की पूजा करता हूं|

यह सुनकर उस महात्मा ने राजा जनक से कहा-राजन! आप गुरु धारण करो| क्योंकि इसके बिना जीवन में कल्याण नहीं हो सकता और न ही इसके बिना भक्ति सफल हो सकती है| आप धर्मी एवं दयावान हैं|

‘सत्य वचन महाराज|’ राजा जनक ने उत्तर दिया और अपना गुरु धारण करने के लिए मन्त्रियों से सलाह-मशविरा किया| तब यह फैसला हुआ कि एक विशाल सभा बुलाई जाए| उस सभा में सारे ऋषि, मुनि, पंडित, वेदाचार्य बुलाए जाएं| उन सब में से ही गुरु को ढूंढा जाए|

सभा बुलाई गई| सभी देशो में सूझवान पंडित, विद्वान और वेदाचार्य आए| राजा जनक का गुरु होना एक महान उच्च पदवी थी, इसलिए सभी सोच रहे थे कि यह पदवी किसे प्राप्त हो, किसको राजा जनक का गुरु बनाया जाए| हर कोई पूर्ण तैयारी के साथ आया था| सभी विद्वान आ गए तो राजा जनक ने उठकर प्रार्थना कि ‘हे विद्वान और ब्राह्मण जनो! यह तो आप सबको ज्ञात ही होगा कि यह सभा मैंने अपना गुरु धारण करने के लिए बुलाई है| परन्तु मेरी एक शर्त यह है कि मैं उसी को अपना गुरु धारण करना चाहता हूं जो मुझे घोड़े पर चढ़ते समय रकाब के ऊपर पैर रखने पर काठी पर बैठने से पूर्व ही ज्ञान कराए| इसलिए आप सब विद्वानों, वेदाचार्यों और ब्राह्मणों में से अगर किसी को भी स्वयं पर पूर्णत: विश्वास है तो वह आगे आए| आगे आ कर चन्दन की चौकी पर विराजमान हो पर यदि चन्दन की चौकी पर बैठ कर मुझे ज्ञान न करा सका तो उसे दण्डमिलेगा| क्योंकि सभा में उस की सबने हंसी उड़ानी है और इससे मेरी भी हंसी उड़ेगी| इसलिए मैं सबसे प्रार्थना करता हूं कि योग्य बल बुद्धि वाला सज्जन ही आगे आए|

यह प्रार्थना करके धर्मी राजा जनक अपने आसान पर बैठ गया| सभी विद्वान और ब्राह्मण राजा जनक की अनोखी शर्त सुनकर एक दूसरे की तरफ देखने लगे| अपने-अपने मन में विचार करने लगे कि ऐसा कौन-सा तरीका है जो राजा जनक को इतने कम समय में ज्ञान करा सके| सब के दिलों-दिमाग में एक संग्राम शुरू हो गया| सारी सभा में सन्नाटा छा गया| राजा जनक का गुरु बनना मान्यता और आदर हासिल करना, सब सोचते और देखते रहे| चन्दन की चौकी की ओर कोई न बढ़ा| यह देखकर राजा जनक को चिंता हुई| वह सोचने लगा कि उसके राज्य में ऐसा कोई विद्वान नहीं? राजा ने खड़े हो कर सभा में उपस्थित हर एक विद्वान के चेहरे की ओर देखा| लेकिन किसी ने आंख न मिलाई| राजा जनक बड़ा निराश हुआ|

कुछ पल बाद एक ब्राह्मण उठा, उसका नाम अष्टावकर था| जब वह उस चन्दन की चौकी की ओर बढ़ने लगा तो उसकी शारीरिक संरचना देखकर सभी विद्वान और ब्राह्मण हंस पड़े| राजा भी कुछ लज्जित हुआ| उस ब्राह्मण की कमान पर दो बल थे| छाती आगे को और पेट पीछे को गया हुआ था| टांगें टेढ़ी थीं और हाथों का तो क्या कहना, एक पंजा है ही नहीं था तथा दूसरे पंजे की उंगलियां जुड़ी हुई थीं| जुबान चलती थी और आंखें तथा चेहरा भी ठीक नहीं था| वह आगे होने लगा तो मंत्री ने उसको रोका और कहा-पुन: सोच लीजिए! राजा जनक की संतुष्टि न हुई तो मृत्यु दण्ड मिलेगा| यह कोई मजाक नहीं है, यह राजा जनक की सभा है|

अष्टावकर बोला-हे मन्त्री! यह बात आपको कहने का इसलिए साहस पड़ा है क्योंकि मैं शरीर से कुरुप दिखता हूं| हो सकता है गरीब और बेसहारा हूं| आपके मन में भी यह भ्रम आया होगा कि मैं शायद लालच के कारण आगे आने लगा हूं| इससे यह प्रतीत होता है कि जैसे इस भरी सभा में कोई ज्ञानी नहीं, कोई राजा का गुरु बनने की योग्यता नहीं रखता, वैसे आप भी अज्ञानी हो| आप ने अपने जैसे अज्ञानियों को ही बुलाया है| पर मैं सभी से पूछता हूं क्या ज्ञान का सम्बन्ध आत्मा और दिमाग के साथ है या किसी के शरीर के साथ? जो सुन्दर शरीर वाले, तिलक धारी, ऊंची कुल और अच्छे वस्त्रों वाले बैठे हैं, वह आगे क्यों नहीं आते? सभी सोच में क्यों पड़ गए हो?  मेरे शरीर की तरफ देख कर हंसते हुए शर्म नहीं आती, क्योंकि शरीर ईश्वर की रचित माया है| उसने अच्छा रचा है या बुरा| जिसको तन का अभिमान है, उसको ज्ञान अभिमान नहीं हो सकता, अष्टावकर गुस्से से बोला| उसकी बातें सुन कर सभी तिलकधारी राज ब्राह्मण शर्मिन्दा हो गए| उन सब को अपनी भूल पर पछतावा हुआ|

राजा जनक आगे बढ़ा| उसने हाथ जोड़ कर कहा, ‘आओ महाराज! अगर आप को स्वयं पर विश्वास है तो ठीक है| मेरी संतुष्टि कर देना|’

अष्टावकर चन्दन की चौकी पर विराजमान हो गया| उसी समय राजा ने घोड़ा मंगवाया| वह घोड़ा हवा से बातें करने वाला था| उसकी लगाम बहुत पक्की थी| अष्टावकर ने घोड़े की ओर देखा| तदुपरांत राजा जनक की तरफ देख कर कहने लगा, ‘हे राजन! यदि मैंने आपको ज्ञान करा दिया तो आप ने मेरा शिष्य बन जाना है|’

‘यह तो पक्की बात है!’ राजा जनक ने उत्तर दिया|

‘जब मैं आपका गुरु बन गया और आप मेरे शिष्य तो मुझे दक्षिणा भी अवश्य मिलेगी|’ अष्टावकर ने कहा|

‘यह भी ठीक है महाराज! आपको दक्षिणा मिलनी चाहिए|’ राजा जनक ने आगे से कहा|

‘क्योकि मैंने आप को ज्ञान का उपदेश उस समय देना है, जब आपने रकाब के ऊपर पैर रखना है और फिर आपने घोड़ा दौड़ा कर दूर निकल जाना है, इसलिए मेरी दक्षिणा पहले दे दीजिए| परन्तु दक्षिणा तन, मन और धन किसी एक वस्तु की हो|’ अष्टावकर बोला|

राजा जनक सोच में पड़ गया कि बात तो ठीक है| दक्षिणा तो पहले ही देनी पड़ेगी| पर दक्षिणा दूं किस वस्तु की तन की, मन की या धन की| इन तीनों का सम्बन्ध ही जीवन से है| अगर एक भी कम हो जाए तो हानि होगी, जीवन सुखी नहीं रहता| यह अनोखा ऋषि है, इसकी बातें भी अनोखी हैं| राजा सोचता रहा पर उसको कोई बात न सूझी| वह कोई भी फैसला न कर सका|

राजा जनक ने कहा, ‘महाराज! मुझे राजमहल में जाने की आज्ञा दीजिए| मैं वापिस आ कर आपको बताऊंगा कि मैं किस वस्तु की दक्षिणा दे सकता हूं|’

‘आप जा सकते हैं|’ अष्टावकर ने आज्ञा दी|

यह सुन कर सारी सभा में सन्नाटा छा गया| सभी विद्वान सोचने लगे कि यह कुरुप ब्राह्मण अवश्य गुणी है|

राजा जनक राजमहल में चला गया और अष्टावकर चंदन की चौकी पर विराजमान हो गया| उसकी पूजा होने लगी| जैसे कि गुरु धारण करने से पहले गुरु पूजा करनी पड़ती है|

राजा जनक महल में पहुंचा और रानी से कहा-जिसको मैं गुरु धारण करने लगा हूं, वह तन, मन और धन में से एक को दक्षिणा में मांगता है| बताओ मैं क्या दूं, क्योंकि आप मेरी दुःख सुख की साथी हो|

यह सुन कर रानी सोच में पड़ गई| कुछ समय सोच कर उसने कहा-‘हे राजन! यदि धन दान किया तो दुःख प्राप्त होगा, गरीबी आएगी, यदि तन दान किया तो कष्ट उठाना पड़ेगा, अच्छा यही है कि आप मन को दक्षिणा में दे दीजिए| मन को देने से कोई कष्ट नहीं होगा|

‘राजा जनक विचार करने लगा कि रानी ने जो सलाह दी है वह ठीक है या नहीं| पर विचार करके वह भी इसी परिणाम पर पहुंचा और सभा में आकर उसने हाथ जोड़ कर अष्टावकर को कहा-‘मैं गुरु दक्षिणा में मन अर्पण करता हूं| अब मेरे मन पर आपका अधिकार हुआ|’

‘चलो ठीक है| अब आप घोड़े पर चढ़ने की तैयारी करें| आपका मन मेरा है तो मेरा कहना अवश्य मानेगा|’ अष्टावकर ने आज्ञा की| सभा में बैठे सब हैरान हो गए कि यह राजा जनक का गुरु बनने लगा है, कैसे कुरुप व्यक्ति के भाग्य जाग पड़े|

राजा घोड़े के ऊपर चढ़ने लगा, सभी रकाब में पैर रखा ही था कि अष्टावकर बोला, राजन! मेरे मन की इच्छा नहीं कि आप घोड़े के ऊपर चढ़ो| यह सुनकर राजा ने उसी समय रकाब से पैर उठा कर धरती पर रख लिए तथा अष्टावकर की ओर देखने लगा| घोड़े के ऊपर चढ़ने की उसकी मन की इच्छा दूर हो गई| उसी समय अष्टावकर ने दूसरी बार कहा-राजन! मेरा मन चाहता है कि आस-पास का लिबास उतार दिया जाए| राजा जनक उसी समय वस्त्र उतारने लगा तो उसको ज्ञान हुआ, मन पर काबू पाना, मन के पीछे स्वयं न लगना ही सुखों का ज्ञान है| मन भटकता रहता है| राजा जनक ने उसी समां अष्टावकर के चरणों में माथा झुका दिया और कहा, ‘आप मेरे गुरु हुए|’

उसी समय खुशी के मंगलाचार होने लग पड़े| यज्ञ शुरू हो गया| बड़े-बड़े ब्राह्मणों को अष्टावकर के चरणों में लगना पड़ा|

राजा जनक के बारे में भाई गुरदास जी फरमाते हैं :-

  •     भगत वडा राजा जनक है गुरमुख माइआ विच उदासी|
  •     देव लोक नो चलिआ गण गंधरब सभा सुख वासी|
  •     जमपुर गईया पुकार सुणि विललावन जीअ नरक निवासी|
  •     धरमराइ नों आखिओनु सभनां दी कर बंद खलासी|
  •     करे बेनती धरमराइ हऊ सेवक ठाकुर अबिनासी|
  •     गहिने धरिअनु एक नाऊ पापां नाल करै निरजासी|
  •     पासंग पाप न पुजनी गुरमुख नाऊ अतुल न तुलासी|
  •     नरकहु छुटे जीअ जंत कटी गलहु सिलक जम फासी|
  •     मुकति जुगति नावै की दासी|


राजा जनक बहुत बड़ा प्रतापी हुआ, जो माया में उदास था| गुरु धारण करने के बाद उसने बहुत भक्ति की| मन को ऐसा बना लिया कि माया का कोई भी रंग उस पर प्रभाव नहीं डालता था| मोह माया, लोभ, अहंकार तथा वासना, काम का जोश भी उसके मन की इच्छा अनुसार हो गया| वह राजा भक्त बन गया|

एक दिन उसके मन में आया कि आखिर मैं भक्ति करता हूं…..क्या पता भक्ति का असर हुआ है कि नहीं? क्यों न परीक्षा लेकर देखा जाए| बात तो अहंकार वाली थी पर उसके मन में आ गई| जो मन में आए वह हो जाता है|

एक दिन राजा ने अद्भुत ही कौतुक रचा| उसने एक तेल का कड़ाहा गर्म करवाया| उस छोटे कड़ाहे के पास बिछौना बिछा कर उस पर अपनी सबसे सुन्दर स्त्री को कहा कि वह लेट जाए| जब स्त्री लेट गई तो राजा जनक ने एक पैर कड़ाहे में रखा और एक उस स्त्री के बदन पर| वह अडोल खड़ा रहा| अग्नि ने उसको जरा भी आंच न आने दी|….और रानी की सुन्दरता, पैर द्वारा शरीर के स्पर्श ने उसके खून को न गरमाया, गर्म तेल उबलता था, रानी की जवानी दोपहर में थी| यह देखकर लोग राजा जनक की जै जै बोलने लगे| वह धर्मात्मा-बड़ा भक्त बन गया| उसके पश्चात राजा को कभी माया ने न भरमाया|

प्रतापी राजा जनक की कथा बड़ी विस्तृत है| यदि पूरी कथा बयान करने लगे तो ग्रन्थों के ग्रन्थ बन जाएंगे| भक्त की कथाएं ही खत्म न हों| आपका अन्तिम समय आ गया| पंचतत्व शरीर को छोड़ कर अगली दुनिया की तरफ जाना था| शरीर को जैसे ही आत्मा ने छोड़ा तो कुदरत की तरफ से अपने आप ही बेअंत शंख बजने लग गए, नरसिंघे बोले, मंगलाचार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं| कहते हैं देवता और गन्धर्व आए, अप्सराएं आईं| भक्त जन और नेक आत्माओं के दल स्वागत करने के लिए आए|

कहते हैं, जनक ने जो भक्ति का दिखावा किया था, वह परमात्मा के दरबार में उसका अहंकार लिखा गया| जब देवता लेने के लिए आए तो परमात्मा ने हुक्म दिया-हे देवताओं! राजा जनक को नरक वाले रास्ते से देवपुरी ले आना, क्योंकि उसके अहंकार का फल उसको अवश्य मिले| यहां बे-इंसाफी नहीं होती, इंसाफ होता है| बस इतना ही काफी है| उसका फूलों वाला बिबान उधर से ही आए|

जिस तरह परमात्मा का हुक्म था, सब ने उसी तरह ही मानना था| देवताओं ने राजा जनक का बिबान नरकों की तरफ मोड़ लिया| नरक आया| नरकों में हाहाकार मची हुई थी| जीव पापों और कुकर्मों का फल भुगत रहे थे| कोई आग में जल रहा था तो कोई उल्टा लटकाया हुआ था और नीचे आग जल रही थी| कई आत्माओं को गर्म तेल के कड़ाहों में डाला हुआ था| तिलों की तरह कोहलू में पीसे जा रहे थे| हैरानी की बात यह थी कि वह न मरते थे और न जीते थे| आत्माएं दुःख उठाती हुई तड़प रही थीं| नरक की तरफ देख कर राजा जनक ने पूछा-यह कौन-सा स्थान है? नरक के राजा यमदूत ने कहा-महाराज! यह नरक है, उन लोगों के लिए जो संसार में अच्छे काम नहीं करते रहें, अब दुःख उठा रहे हैं|

राजा जनक ने कहा-इन सब को अब छोड़ देना चाहिए| बहुत दुःख उठा लिया है| देखो कैसे मिन्नतें कर रहे हैं|

यम-परमात्मा की आज्ञा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता| हां, यदि कोई पुण्य का फल दे तो इनको भी छुटकारा मिल सकता है|

राजा जनक को रहम आ गया| उसने कहा-मेरे एक पल के सिमरन का फल लेकर इन को छोड़ दो|

यमों ने तराजू मंगवाया| एक तरफ राजा जनक के सिमरन का फल रखा गया और दूसरी तरफ नरकगामी आत्माएं बिठाईं| धीरे-धीरे सभी नरकगामी आत्माएं तराजू पर चढ़ गईं| नरक खाली हो गया| आत्माएं राजा जनक के साथ ही स्वर्ग की ओर चल पड़ीं| बड़े प्रताप और शान से राजा जनक परमात्मा के दरबार में उसके देव लोक में पहुंचा|

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भगत सूरदास जी

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भक्त सूरदास जी विक्रमी सम्वत सोलहवीं सदी के अंत में एक महान कवि हुए हैं, जिन्होंने श्री कृष्ण जी की भक्ति में दीवाने हो कर महाकाव्य ‘सूर-सागर’ की रचना की| आप एक निर्धन पंडित के पुत्र थे तथा 1540 विक्रमी में आपका जन्म हुआ था| ऐसा अनुमान है कि आप आगरा के निकट हुए हैं| हिन्दी साहित्य में आपका श्रेष्ठ स्थान है|

आपका जन्म से असली नाम मदन मोहन था| जन्म से सूरदास अन्धे नहीं थे| जवानी तक आपकी आंखें ठीक रहीं तथा विद्या ग्रहण की| विद्या के साथ-साथ राग सीखा| प्रकृति की तरफ से आप का गला लचकदार बनाया गया था तथा तन से बहुत सुन्दर स्वरूप था| बचपन में ही विद्या आरम्भ कर दी तथा चेतन बुद्धि के कारण आप को सफलता मिली| चाहे घर की आर्थिक हालत कोई पेश नहीं जाने देती थी|

भारत में मुस्लिम राज आने के कारण फारसी पढ़ाई जाने लगी थी| संस्कृत तथा फारसी पढ़ना ही उच्च विद्या समझा जाता था|

मदन मोहन ने भी दोनों भाषाएं पढ़ीं तथा राग के सहारे नई कविताएं तथा गीत बना-बना कर पढ़ने लगा| उसके गले की लचक, रसीली आवाज़, जवानी, आंखों की चमक हर राह जाते तो मोहित करने लगी, उनका आदर होने लगा तथा उन्हें प्यार किया जाने लगा| हे भक्त जनो! जब किसी पुरुष के पास गुण तथा ज्ञान आ जाए, फिर उसको किसी बात की कमी नहीं रहती| गुण भी तो प्रभु की एक देन है, जिस पर प्रभु दयाल हुए उसी को ही ऐसी मेहर वरदान होती है| मदन मोहन कविताएं गाकर सुनाता तो लोग प्रेम से सुनते तथा उसको धन, वस्त्र तथा उत्तम वस्तुएं भी दे देते| इस तरह मदन मोहन की चर्चा तथा यश होने लगा, दिन बीतते गए| मदन मोहन कवि के नाम से पहचाना जाने लगा|

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भगत रविदास जी

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भारतवर्ष में भक्ति की जो लहर चली थी, उसमें भक्त रविदास जी का भी बहुत ऊंचा स्थान है| महान महापुरुष और यूं कहें कि भक्तों में श्रेष्ठ भक्त हुए हैं| ऐसे भक्त जिनकी बाणी पढ़कर आज भी अनेकों जीव मुक्ति के मार्ग पर चलते हैं| आइए आपको उनकी कथा श्रवण करवाएं| ऐसे भक्तों और अवतारों की जीवन कथाएं सुनते रहें तो जीवन में बहुत परिवर्तन आ जाते हैं|

श्रेष्ठ भक्त रविदास जी का जन्म भी गंगा किनारे के महान पूजनीक शहर काशी (बनारस) में हुआ था| आपका पिता रघु चमड़े का व्यवसाय करता था और जाति चमार में से था| भक्त जी की माता का नाम धुरबिनिया था| वह एक परिश्रमी नेक माता थी| जो प्रभु-परमात्मा पर अटूट विश्वास रखती थी| दोनों जीवों का जीवन मेल भरा समृद्ध होने के कारण उनके पास अच्छे पैसे थे| बच्चे के जन्म की उन्होंने धूमधाम से खुशियां मनाईं| शिशु के जन्म की खुशी में उन्होंने बाजे-गाजे बजाए और अपनी जाति के लोगों को भोजनपान करवाया|
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गनिका जी

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गनिका एक वेश्या थी जो शहर के एक बाजार में रहती थी| वह सदा पाप कर्म में कार्यरत रहती थी| उसके रूप और यौवन सब बाजार में बिकते रहते थे| वह मंदे कर्म करके पापों की गठरी बांधती जा रही थी|

जब से हो जाती तो उसके घर में रौनकें बढ़ जाती तथा महफिलें सजी रहतीं| रात को दीया जलते ही वह हार-श्रृंगार करके अपने सुन्दर यौवन को आकर्षित करती हुई बैठ जाती|

पर – सुआ पड़ावत गनिका तरी ||

सो हरि नैनहु की पूतरी ||

भक्तों ने वचन किया है कि तोते को पढ़ाती हुई गनिका भवजल से तर गई| वह परमात्मा के नयनों की पुतली बनी| वह भक्तों में गिनी जाने लगी| उसका ऐसा जीवन बदल गया|

उसके पाप एवं नरकी जीवन में से निकलने की कथा इस प्रकार है – वह बुरे कर्मों में व्यस्त हुई जीवन को ही भूल गई थी| मनुष्य जीवन के मनोरथ का उसे बिल्कुल भी ज्ञान नहीं था| एक दिन एक साधू जिसके पास एक तोता था, वहां आ गया|

कहते हैं कि वह साधू नगर से बाहर रहता था| वह भीड़-भाड़ में कम ही आता| उस रात इतनी वर्षा हुई कि वहां ऊंची-नीची धरती जल-थल दिखाई देने लगी| साधू ने देखा कि सर्दी से उसका तोता भी मरने लगा है| यह तोता उसको प्राणों से भी प्यारा था, क्योंकि वह ‘राम-राम’ जपता था| उसने तोते के पिंजरे को उठाया तथा नगर की ओर चल पड़ा| उसने अपनी गोदड़ी तथा अन्य वस्त्र ऊपर लिए हुए थे| कुदरत की शक्ति का मुकाबला करना उसके वश से बाहर था| वह पैदल चलता हुआ नगर आ गया, पर कोई ठिकाना न मिला| रात का समय था| सब लोग अपने-अपने घरों में द्वार बंद करके बैठे हुए थे| बहुत घूमने-फिरने पर भी साधू को कोई ठिकाना न मिला, वह चलता रहा|

गनिका का घर आया| दिया जल रहा था, द्वार भी खुला हुआ था| वह राम का नाम लेकर भीतर चला गया| गनिका उसे देखकर मन ही मन बहुत प्रसन्न हुई| उसने सोचा कि वर्षा और तूफान में भी उसके पास ग्राहक आया है, जो उसके तन का सौदा करेगा और उसको पैसे खटाएगा| उसने बड़ी खुशी से कहा…. आओ, मेरी आंखों में बैठो, मैं आपका रास्ता देख रही थी|

गनिका की यह बात सुन कर और उसके रूप तथा श्रृंगार को देख कर साधू बड़ा हैरान हुआ| साधू ने गनिका से कहा-‘पुत्री! बाहर वर्षा बहुत हो रही है जिस कारण मेरी झोंपड़ी बह गई| मैं अपने तोते सहित सहारा लेने आया हूं|’

‘पुत्री’ शब्द से गनिका का पापी मन कांप उठा| वह एक बार कांपी तथा फिर मायूस होकर बोली-‘आप ने रात ठहरना है?

हां, ‘पुत्री! हमने रात ठहरना है| हरेक आत्मा परमात्मा का अंश है और शरीर आत्मा का घर| शरीर को आश्रय देना नेक मार्ग पर चलना होता है| पुत्री! परमात्मा ने तुम्हें सुख के सभी साधन दिए हैं, तुम उसे याद करती होगी|

साधू सहज स्वभाव बोलता गया| उसकी आत्मा सचमुच ही बड़ी निर्मल थी, परन्तु गनिका जिसका वास्तविक नाम ‘चन्द्रमणी’ था, वह साधू की बातें सुनकर घबराने लगी| वह तो पापिन थी, उसने घबरा कर कहा – ‘आप साधू हैं?’

हां, ‘ मैं साधू हूं| मेरे मालिक ने मुझे साधू बना कर अपने नाम के सिमरन में लगाया है| वही मालिक सबका जीवन दाता और अन्न दाता है|’

गनिका के मन में भी कुछ नेक भाव आए, क्योंकि उस दिन से पहले उस जैसा साधू महात्मा पुरुष पहले कभी भी उसके पास नहीं आया था जो उसको पाप कर्म की ओर न लगाता| उसके पास वहीं पुरुष आते जो उसके तन का सौदा करके उसके मैले मन पर और अधिक मैल फैंक देते| उस दिन गनिका सुबह स्नान करके घूमती रही| वर्षा अभी भी हो रही थी|

‘आप साधू हैं, भगवान के भक्त! ठीक है| आओ…. बैठो और भीगे वस्त्र उतार कर दूसरे वस्त्र पहन लो| गनिका को शायद जीवन में पहली बार साधू की सेवा करने का अवसर मिला है| आओ…. क्या पता मेरे जीवन में ऐसी घटना होनी होगी|’

यह कह कर उसने साधू के भीगे वस्त्र उतरवाए और उसे गर्म वस्त्र दिए| उसने साधू और तोते के लिए आग जलाई| जब वह गर्म होकर अपने आपको ठीक अनुभव करने लगे तो तोते ने अपनी आदत अनुसार राम का नाम लेना शुरू कर दिया| चन्द्रमुखी गनिका को उनकी बातें अनोखी लगी| उसने साधू से पूछा – ‘महाराज! भोजन करोगे?’

हां, ‘पुत्री! मैं भी भूखा हूं और यह पक्षी भी भूखा है, जो भगवान ने हमारी किस्मत में लिखा है, वह देगा| आज नहीं तो कल| उसकी जैसी इच्छा है वैसा ही होना है|’ साधू ने उत्तर दिया|

‘मेरे पास जो कुछ है उसको स्वीकार करें-पर मैं गनिका (वेश्या) हूं, जिसे इस घर में आए बारह साल हो गए हैं| पुरुषों के मन की खुशियां पूरी करती रही हूं| मैं तो पापिन हूं, पापिन के घर का भोजन! गनिका चन्द्रमुखी ने कहा| उसके चेहरे पर गम्भीरता आ गई, शायद उसके जीवन में यह पहली घटना थी|

साधू ने देखा, गनिका ने अपने पाप कर्मों को अनुभव कर लिया है| अब इसको उपदेश देना ठीक है| साधू ने कहा -‘तुम्हारा दिया भोजन स्वीकार होगा| इस जगत में माया का प्रवेश है| माया का प्रभाव जब जीव पर पड़ता है तो वह भगवान को भूल कर काम, क्रोध और मोह में फंस जाता है| जीवन मार्ग से दूर हो जाता है, राम नाम का सिमरन नहीं करता| कुछ ऐसे पुरुष होते हैं जो अपने ही स्वार्थ के लिए किसी दूसरे को कुमार्ग पर भेज देते हैं, ऐसा ही जगत का दस्तूर है|’

ठीक है महाराज! आप सत्य कहते हैं| पुरुषों ने ही मुझे कुमार्ग पर डाला है| मैं पापिन हूं, पर पापिन होने का ज्ञान मुझे आपके ही दर्शन करने पर हुआ है| जब आपने मुझे ‘पुत्री’ कहा| मेरे घर में चाहे जवान आए चाहे बूढ़ा, कभी मुझे बहन या पुत्री किसी ने नहीं कहा| न ही मुझे पता है कि मेरी मां कौन थी और पिता कौन? बस ऐसे ही जीवन व्यतीत होने लगा| वर्षा होते दो दिन हो गए लेकिन वह नहीं आए जो अपने स्वार्थ के लिए आते थे|

इस प्रकार गनिका चन्द्रमुखी को ज्ञान होता गया| उसका शरीर और मन कांपने लगा| उसको ऐसा अनुभव होने लगा जैसे उसमें एक महान परिवर्तन आ रहा हो| एक दर्द और पीड़ा हो रही थी|

मतलब ही तो सब कुछ है, इस समाज की जान है| मुझे और मेरे तोते को मतलब था आसरा लेने का, हम चल कर आ गए| इस मतलब के दो रूप हैं – एक तो है मायावादी तथा दूसरा ईश्वरवादी| अगर जीवन को यह मतलब हो कि उसका जीवन अच्छा बने, तो वह राम नाम का सिमरन करने के लिए साधू-सन्तों और नेक पुरुषों की संगत करे| सेवा का भाव अपने मन में रखे| धर्म और समाज की मर्यादा कायम रखे तो ठीक है| देख पुत्री! अगर तुमने एक पति धारण किया होता, उसकी सेवा करती, उससे ही तन और मन की जरूरत पूरी किया करती तो बच्चे होते| बच्चों और पति की सुख-शांति के लिए पूजा-पाठ करती, सभी तुझे देवी कहते| जीव कर्म से जाना जाता है शरीर से नहीं| इसलिए भला है, जो बीत गया सो बीत गया, आगे से नेक मार्ग पर चलना| भगवान, जिसने जीवन दिया है, वह रोजी-रोटी भी देता है|

गनिका चन्द्रमुखी ने साधू को भोजन कराया| उसने तोते को चूरी खिलाई और उनके चरणों में लग गई| साधू की संगत ने उसके मन को बदल दिया तथा उसको पापों का एहसास करा दिया| इसीलिए तो सद्पुरुष हमेशा कहते हैं कि सदा साधू-सन्त, गुरु पीर, नेक पुरुषों की संगत करनी चाहिए| भाई गुरदास जी ने संगत का बहुत ही बड़ा महत्व बताया है| भाई गुरदास जी फरमाते हैं :-

सण वण वाड़ी खेत इक परउपकार विकार जणावै| खल कढाइ वढाइ सण रसा बंधन होई बनावै| खासा मलमल सिरिसाफ सूत कताइ कपाह वणावै| लजण कजण होइकै साध असाध बिरद बिरदावै| संग दोख निरदोख मोख संग सुभाउ न मान मिटावै| त्रपड़ होवै धरमसाल साध संगति पग धूड़ धुमावै| कुटकुट सण किरतास कर हरिजस लिख पुराण सुणावै| पतित पुनीत करे जन भावै| पथर चित कठोर है चूना होवै अगीं दधा| अग बुझै जल छिड़कीअै चूने अग उठै अति वधा| पाणी पाए विहु न जाइ अगन न फुटे अवगुण बधा| जीभै उते रखिआ छाले पवन संग दुख लधा| पान सुपारी कथ मिल रंग सुरंग संपूरण सधा| साध संगति मिल साध होइ गुरमुख महां असाध समधा| पाप गवाइ मिले पल अधा|

साधू-संगत का ऐसा फल है कि जो गनिका के मन पर प्रभाव डाल गया| वह सारी-सारी रात सत्संग करती रहती|

अगले दिन वर्षा बंद हो गई| आकाश बिल्कुल साफ हो गया| धूप निकली तो साधू ने चलने की तैयारी की| तब गनिका चन्द्रमणी ने प्रार्थना की ‘महाराज! मुझ पर एक उपकार करो, यह तोता दे जाओ| मैं इससे ‘राम नाम’ सुना करुंगी, इसको पढ़ाया करुंगी| अच्छा हो अगर आप भी यहां पर ही रहें|

अच्छा पुत्री! अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो यह लो पिंजरा| इसको संभाल कर रखना, हम अपनी कुटिया में जाते हैं| तुम्हारे घर रहने से लोग तुम्हारी और मेरी दोनों की निंदा करेंगे| लोक निंदा करानी अच्छी नहीं होती| हम चलते हैं|’

यह कह कर साधू चला गया| वह अपना तोता छोड़ गया| वह तोता राम का नाम बोलता| गनिका कहती, बोल गंगा राम ‘राम-राम’|

गनिका चन्द्रमणी को ऐसी लगन लगी कि वह दिन-रात गंगा राम को ‘राम’ नाम का पाठ पढ़ाने लगी| उसका मन पाप कर्मों से हट गया| उसने राम नाम की धुनी गानी शुरू कर दी| धीरे-धीरे उसकी बैठक खाली रहने लगी और ‘राम नाम’ की गूंज आने लगी| उसे तन और मन की होश न रही| वह भूखी ही ‘राम’ नाम जपती रहती|

गनिका चन्द्रमणी की भक्ति देख कर भगवान प्रसन्न हो गया| उसने चन्द्रमणी को अपने पास बुलाने के लिए एक बहाना बना लिया| वह बहाना यह था कि उसने पिंजरे में सांप का रूप धारण करके अपने काल दूत को भेजा| उसने पहले तोते को डंक मारा, उसकी आत्मा को पहले भेज दिया तथा फिर बैठा रहा| गनिका उठी, उसने तोते को बुलाया, बोल गंगा राम ‘राम-राम|’ पर उसको कोई आवाज़ न आई| उसने अपना हाथ पिंजरे में डाल कर तोते को हिलाया तो सांप ने उसको डंस लिया| उसी समय उसकी आत्मा शरीर त्याग गई| आत्मा के लिए बिबान आया, नरसिंघे बजे| शंखों की धुन में वह मृत्यु-लोक से स्वर्ग-लोक में पहुंच गई| इस कथा पर भाई गुरदास जी ने कहा है –

गई बैकुण्ड बिमान चढ़ नाम नाराइण छोत अछोता |
थाऊं निथावें माण मणोता | 

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अजामल जी

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हे भक्त जनो! अजामल की कथा श्रवण करो| इस कथा के श्रवण करने वाले को यम भी तंग नहीं करता| वह ऊंचे चाल-चलन वाला बनता है| सुनने वाले के पाप मिटते हैं| उसका कल्याण होता है, उसे मोक्ष मिलता है|

अजामल उस समय का बहुत बड़ा पापी माना गया है| वह पापी किसलिए था? उसने क्या कसूर किया था? इसकी कथा इस प्रकार है :-

अजामल एक राज-ब्राह्मण का पुत्र था| उसका पिता राजा के पास पुरोहित भी था और वजीर भी| वह बहुत अक्लमंद था| उसके सूझवान होने की चर्चा चारों ओर थी|

अजामल की आयु जब पांच साल की हुई तो उसके माता-पिता ने उसको विद्यालय में दाखिल करवा दिया| वह जिस गुरु से पढ़ता था वह बहुत ही सूझवान था| सूझवान गुरु को जब सूझवान शिष्य मिल जाता है तो वह बहुत खुश हो जाता है ऐसी ही हालत अजामल के गुरु की भी थी| उसने देखा कि अजामल की जुबान पर सरस्वती बैठी है वह जो भी शब्द पढ़ता या सुनता वही कंठस्थ कर लेता| उसका कंठ भी रसीला था| जब वह वेद मंत्र पढ़ता तो एक अनोखा ही रंग दिखाई देता था| वह बहुत ही बुद्धिमान निकला| उसने केवल दस साल में ही बीस साल की विद्या प्राप्त कर ली| उसकी विद्वता की चहुं ओर प्रसिद्धि हो गई| ऐसी प्रसिद्धि कि बड़े-बड़े विद्वान भी उसके दर्शन करने आते थे|

एक दिन अजामल के गुरु ने कहा – ‘अजामल! अभी तुम शिष्य हो!’

‘हां, गुरुदेव मैं शिष्य हूं – पर कितनी देर शिष्य रहूंगा?’ ‘कोई चार साल और लगेंगे| चारों वेद और उपनिषद पूरे हो जाएंगे|’

‘जो आज्ञा गुरुदेव|’

उसके गुरु ने उसकी ओर ध्यान से देख कर कहा – अजामल जब मेरे पास आओ या अपने घर को जाओ तो नगर से बाहर-बाहर आया-जाया करो| नगर में कभी नहीं जाना, क्योंकि अभी तुम्हारे वस्त्र विद्यार्थी के हैं| गुरु कि आज्ञा का पालन करना होगा| आज्ञा का पालन न किया तो दुःख उठाओगे| सुखी वही रहता है जो गुरु की आज्ञा का पालन करता है, क्योंकि गुरु को हर प्रकार के ज्ञान और कर्म का बोध होता है|’

हे गुरुदेव! क्या मैं पूछ सकता हूं कि आप मुझे नगर में आने से क्यों रोकते हो? अजामल ने उत्तर दिया| उसका उत्तर सुनकर गुरु चुप कर गया| केवल इतना ही कहा-नगर से बाहर-बाहर आया-जाया करो, ऐसा ही कर्म है|

अजामल ने गुरु की आज्ञा का पालन किया| वह नगर के बाहर बाहर ही आया-जाया करता था| न ही वह इस बारे किसी से बात किया करता था कि उसके गुरु ने उसको नगर में जाने से मना किया है| इस तरह कई साल बीत गए| वह विद्या पढ़ता रहा| उसकी आयु अब बीस साल की हो गई| वह बहुत सुन्दर दर्शनी जवान निकला| नेत्रों में डोरे आए उसकी विद्या पूरी होने वाली थी| उसके पश्चात उसने गुरु दक्षिणा दे कर आज़ाद हो जाना था|

एक दिन उसका अपने मन से झगड़ा हो गया| उसने कहा, गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करके नगर में से जाना ही ठीक है| आखिर यह तो देखा जाए, गुरु जी रोकते क्यों हैं?

उसके एक मन का यह भी कहना था कि अजामल! गुरु की आज्ञा का पालन नहीं करेगा तो नरक का भागी होगा, बहुत दुःख भोगेगा|

देखा जाएगा, अजामल ने मन सुदृढ़ किया और वह अपने गुरु के पास से उठ कर उस मार्ग को छोड़ कर जिससे वह रोज़ आया-जाया करता था, अनदेखे रास्ते से नगर में से चल पड़ा|

अजामल के गुरु ने उसको इसलिए नगर में जाने से रोका था क्योंकि नगर में माया का विस्तार था| धन के रूप के चमत्कार ऐसे थे कि नौजवान का मन उस ओर शीघ्र आकर्षित हो जाता था| नवयुवक को पूर्ण ज्ञान नहीं होता था| गुरु के आश्रम के वेश्याओं का बाजार था, सारी ही वेश्या नगरी थी| उस मुहल्ले में वेश्याएं बैठती थीं| वह युवा-पुरुषों को अपने वश में करती थी| ऐसी हवा से बचाने के लिए ही गुरु ने अजामल को रोका था| गुरु चाहता था कि अजामल राजपुरोहित बन जाए| जब विवाह हो जाएगा तो फिर इस ओर ध्यान नहीं जाएगा| ऐसा ही विचार गुरु का था, क्योंकि गुरु के लिए शिष्य ही उसका पुत्र होता है, उसका ध्यान रखना गुरु का कर्त्तव्य और धर्म होता है| शिष्य का भी धर्म है कि वह गुरु की सेवा करे, उसकी आज्ञा का पालन करे| अजामल जब जाने लगा तो गुरु ने स्मरण करवाया कि अजामल! शहर के अन्दर मत जाना|

‘बहुत अच्छा गुरुदेव’ कह कर अजामल चल पड़ा| पर वह आश्रम में से निकल कर नगर के अंदर ही अंदर द्वार की ओर चल पड़ा| वह जैसे ही द्वार के भीतर गया, वैसे ही उसे नगर की महिमा बड़ी अनोखी-सी लगी| बहुत चहल-पहल थी| सबसे बड़ी बात यह थी कि सुन्दर नारियां हाव-भाव करती इधर-उधर घूमती दिखाई दीं| वह पुरुषों से मधुर बातें करती थीं| उनके रूप बहुत सुन्दर थे| नरगिस के फूल जैसे नयन थे| उनके अर्द्ध-नग्न तन तुलाब की पत्तियों की तरह चमकते थे| वह शोभा वाली थी|

उन सुन्दर नारियों को देखता हुआ अजामल अपने घर को चला गया| घर जाकर उसका मन पढ़ने और पाठ याद करने में न लगा| उसका मन बेचैन हो गया तथा जो कुछ देखा था वहीं सामने घूमने लगा| जब रात को नींद आई तो वही सपने आते रहे जो उसने नगर में देखा था| सुबह उठ कर स्नान किया| जब गुरु के पास गया तो गुरु ने उसकी आंखों में लाली देखी और पूछा-अजामल! रात सोए नहीं, क्या बात है?

‘सोया था गुरुदेव!”

आंखें लाल और मन उखड़ा-सा क्यों है?”

पता नहीं गुरुदेव?”

नगर से बाहर-बाहर गया था, बाहर-बाहर आया था|’

अजामल ने पहले तो गुरु की आज्ञा का उल्लंघन किया और बाद में दूसरी महान भूल यह की कि गुरु से झूठ बोल दिया| उसने झूठ बोलते हुए कहा – गुरुदेव बाहर-बाहर गया था| वह झूठ बोला| इसलिए उसकी आत्मा कांपी, पर वह झूठ बोल चुका था|

उस दिन पढ़ने में मन न लगा| दो दोष हो गए| अजामल के मन पर बहुत भार रहा| दूसरा उसकी आंखों के सामने नगर के नजारे थे वह पाठ को पढ़ने नहीं देते थे| जैसे तैसे उसने समय व्यतीत किया| जब छुट्टी मिली तो फिर उस नगर के रास्ते ही चल पड़ा| उस नगर की वासना भरी महिमा को देखता रहा| देखता-देखता वह घर चला गया|

इस प्रकार दस-बारह दिन व्यतीत हो गए| वह नगर आता-जाता रहा| नारी रूप लीला ने उसके युवा मन को प्रभावित कर दिया| जादू जैसा असर और उसका मन डगमगाने लगा| जब मन डगमगा जाए तो मनुष्य शीघ्र शिकार हो जाता है| एक दिन एक रूपवती नवयौवना अभी खिलती जवानी 16-17 वर्ष की आयु वाली वेश्या ने उसका बाजू पकड़ लिया| उसे जाल में फंसा कर पाप कर्म की तरफ लगा लिया| वह अधिकतर समय उसके पास बैठा रहा| वह भोग-विलास में डूब गया और फिर घर चला गया| घर उसे पराया-सा लगा| उसकी आंखों में नींद न आई| सुबह पढ़ने के लिए गुरु आश्रम में समय पर न पहुंच सका|

पहले ही अजामल ने मंदे कर्म-दोष किए थे| एक गुरु की आज्ञा की अवज्ञा तथा दूसरा झूठ बोलना| उसने अब दो पाप और कर दिए| एक जूठन खाई और पराई नारी का गमन करना| वह वासना की ओर बढ़ गया| वेश्या का जूठा भोजन भी खा लिया| इन चारों ही महां-दोषों ने उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी| वह गुरु के पास जाता लेकिन मन भटकने से पाठ न कर पाता|

उसका सूझवान गुरु यह सब कुछ जान गया था लेकिन अपने मन की तसल्ली करने के लिए एक दिन अपने शिष्य अजामल के पीछे-पीछे चल पड़ा| उसने अपनी आंखों से देख लिया कि उसका बुद्धिमान शिष्य अजामल एक वेश्या के दर पर चला गया है| वह वापिस लौट आया और बहुत बैचेन रहा| अगले दिन जब अजामल आया तो गुरु ने उसे कहा-अजामल इस आश्रम से चले जाओ, तुमने जो कुछ पढ़ना था वह पढ़ लिया है| यह कह कर गुरु ने अजामल को भेज दिया| तदुपरांत गुरु ने अजामल के पिता को बुलाकर कर कहा –

‘आप अजामल का विवाह कर दें| इसका अब कुंवारा रहना योग्य नहीं|’

अजामल का पिता राजपुरोहित था| राजपुरोहित होने के कारण उसके लिए अजामल का विवाह करना कोई मुश्किल कार्य न था| उसने शीघ्र ही अजामल के लिए योग्य कन्या देखकर उसे परिणय सूत्र में बांध दिया|

अजामल का विवाह हो गया| उसके घर एक सुन्दर, सुशील, गुणवंती तथा तेजवान दुल्हन आ गई| लेकिन अजामल का मन अब भी चंचल ही रहा| वह अपनी पत्नी से तृप्त न हुआ| वह वेश्या के द्वार पर फिर जाने लग गया| परन्तु उसका वेश्या के पास जाना छिपा न रह सका| इसका सब को पता चल गया| उसकी धर्मपत्नी ने काफी यत्न किए कि वह उसके पास ही रहे| सोलह श्रृंगार भी किए, नृत्य तथा संगीत से उसे प्रसन्न करने का प्रयास किया लेकिन अजामल का मन पापी ही रहा| वेश्या की जूठन और शराब ने उसकी बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया था| उसकी सत्यवंती पत्नी अनेक प्रयास करके हार गई|

एक दिन अजामल का पिता परलोक गमन कर गया| उसके पश्चात राजा ने अजामल को राजपुरोहित बना दिया| राजपुरोहित बनने पर उसकी जिम्मेदारी और बढ़ गई| वह धर्म, समाज और राज्य का अध्यक्ष बन गया| धन-दौलत काफी बढ़ गई| किसी बात की कमी न रही, तब भी उसने न सोचा| वह सोचता भी कैसे? पांच दोष उसके ऊपर लग गए थे| गुरु की आज्ञा की अवज्ञा| झूठ बोलना| जूठन खानी और मदिरापान| पांचवा महान दोष-वेश्या का गमन करना था|

उसने उच्च पदवी मिलने पर भी वेश्या के पास जाना न छोड़ा| शहर में आम चर्चा होने लगी| जो बात छिपी थी, वह दुनिया में जाहिर हो गई, जाहिर भी सूर्य की तरह हुई| उसका नया प्यार एक कलावंती वेश्या से हो गया| वह पापों की पुतली माया रूप धारण कर बैठी थी|

एक दिन अजामल को राजा ने अपने पास बुलाया और पूछा-अजामल! ‘आप राजपुरोहित हैं|’

हां, महाराज! अजामल ने कहा|

आपके विरुद्ध एक आरोप लगा है|

‘क्या आरोप है?’

‘आप कलावंती वेश्या के पास जाते हैं| मदिरा पान करके रंगरलियां मनाते हैं|’

‘सत्य है महाराज, इसमें झूठ नहीं| मैं कलावंती के पास जाता हूं, क्योंकि मैं उससे प्रेम करता हूं|’

‘क्या यह नहीं मालूम कि कोई भी पंडित कभी ऐसा कर्म नहीं कर सकता, जिससे राज्य में बदनामी का कारण बने और जिसका देश की प्रजा पर बुरा असर पड़े?’

‘यह भी पता है महाराज|’

‘फिर कलावंती के पास क्यों जाते हो? क्या तुम ने अपनी ही बदनामी स्वयं नहीं सुनी?’

‘सुनी है! लेकिन मैं विवश हूं| मैं कलावंती को छोड़ नहीं सकता| उसके रूप ने मुझे मोह लिया है|’

अजामल और आगे बढ़ गया| वह ‘निर्लज्ज’ भी हो गया, क्योंकि जिसके पास निर्लज्जता आ गए उसके पास कुछ भी नहीं रहता| निर्लज्जता सबसे महान दोष या पाप है|

राजा बुद्धिमान था| उसकी आयु अजामल के पिता जितनी थी| वह जान गया कि उसका राजपुरोहित पापों का भागीदार बन गया है| पाप इसको अच्छे लग रहे हैं| उसने अजामल से कहा – ‘यदि आप की बात सही है कि वह आपको अपना पति स्वीकार कर चुकी है तो उसे अपने घर ले आओ, घर रहेगी तो लोगों को पता नहीं चलेगा| जितनी देर वहां रहेगी उतनी देर वेश्या है| कर्म करना भी स्थान की जांच करता है| जगह पर ही हर चीज़ की शोभा होती है| आप भी राज पुरोहित है| राज पुरोहित को शोभा नहीं देता कि वह वेश्या के बाजार में जाए|’

‘मैं उसको घर नहीं ला सकता, न ही मैं उसको छोड़ सकता हूं| अजामल ने अपना फैसला दे दिया|’

‘यह पक्का फैसला है?’ राजा ने पूछा|

‘जी हां पक्का फैसला!’

‘सोच लो!’

‘जी सोच लिया है!’

‘देखो अजामल! आज तो नहीं, अभी से तुम राज पुरोहित नहीं! खामियां यह हैं! गुरु की आज्ञा को भंग करना, झूठ बोलना| जूठ खानी, वेश्या गमन, शराब पीनी और निर्लज्जता से मंद कर्मों से रुकने से मना करना| ऐसे दोषों के रहते हुए आप राज पुरोहित रहने के अधिकारी नही| आपको अब शहर से बाहर रहना पड़ेगा| सारी जायदाद और राज महल जो है वह अब आपकी पत्नी और उसके बच्चे को दे दिया जाएगा| आज के बाद इस शहर में मत आना| कलावंती को भी इस शहर से बाहर निकाल दिया जाता है| यह हुक्म है, कोई अपील नहीं न कोई साधन जाओ!’

राजा के हुक्म को सुन कर राज दरबारी और अहलकार सब घबरा गए, लेकिन अजामल पर कोई असर न हुआ| उस समय राजदूतों ने अजामल को धक्के मार कर बाहर निकाल दिया| उसको शहर से बाहर निकालने का हुक्म हो गया|

अजामल की पत्नी ने जब यह हुक्म सुना तो वह बहुत दुखी हुई| पर राजा ने हुक्म को टालना भी कठिन था| नगर वासी भी हैरान हुए| पर अजामल को कोई रोक नस सका|

अजामल ने कलावंती को साथ लेकर शहर से बाहर झोंपड़ी बना ली| कलावंती का सारा सामान वहां गया! गरीबों और अछूतों में रहने लगे| रात दिन भोग-विलास में लगे रहे तो चार बच्चे हो गए| उन बच्चों के लिए अन्न वस्त्र की जरूरत थी| राजा का हुक्म था कि कोई मदद न करें| सभी उसको ‘अजामल-पापी’ कहने लग पड़े थे और वे चिड़िया-पक्षी मार कर खाने लगे! नंगे रहने लगे| दुर्दशा इतनी बुरी हो गई कि वह पागलों की तरह खीझ कर बात करने लग गया| शरीर रोगी हो गया| ऐसा रोगी की जीवन की उम्मीद कम हो गई| जब शरीर ऐसा हुआ उससे पहले सात पुत्र हो गए| सातवें पुत्र का नाम नारायण रखा| जैसे भाई गुरदास जी फरमाते हैं : –

पतित अजामल पाप करि जाइ कलावतनी दे रहिआ |
गुर ते बेमुख होइ कै पाप कमावै दुरमति दहिआ |
बिरथा जनमु गवाइअनु भवजल अंदर फिरदा वहिआ |
छिअ पुत जाऐ वेसना पापां दे फल इछे लहिआ |
पुत उपंना सतवां नाऊं धरन नो चिति उमहिआ |
गुरु दुआरै जाइ कै गुरमुखि नाउं नराइण कहिआ |

उसने सातवें पुत्र का नाम नारायण रख लिया| दुखी होने लगा| वह पापों और दुखों का एक पुतला बन गया| वह सुबह जंगल को चला जाता और शाम को शिकार करके वापस आ जाता| कलावंती अब एक भारी गृहिणी थी| सात बच्चों की मां थी, और रूप भी अब ढल गया था| वह दुखी होने लगी|

स्त्री-पुरुष का यह स्वभाव है, जब दुःख-कष्ट तन को आए तो भगवान या नेकी याद आती है| कलावंती को अब पछतावा होने लगा कि उसने एक उच्च ब्राह्मण का जीवन नष्ट किया और अपना भी| पापिन बनी| अगर राजा से क्षमा मांग लेती तो इतना कष्ट न पाती| झौंपड़ी के पास से कोई साधू-संतों की तरफ देखती रहती|

एक दिन देवनेत के साथ समय बन गया कि दो साधू उसकी झौंपड़ी के पास ठहर गए| वह महापुरुष बहुत सूझवान थे| भगवान रूप! मगर कलावंती के पास कुछ नहीं था, जो उनको खाने को देती| वह वैष्णव साधू थे| अजामल शाम को घर आया| वह चिड़िया, बटेर और कबूतर आदि मार कर लाया तो कलावंती ने उस दिन उसको बनाने न दिए| उसने कहा-हे पति देव! पहले ही पता नहीं किस कुकर्म के बदले यह दशा हुई है| हमें आज मांस नहीं बनाना चाहिए| साधू वैष्णव हैं| हो सकता है कि कोई अच्छा वचन कर जाएं तो हमारे जीवन में कोई सुख का समय आ जाए| सुना है साधू भगवान के भक्त होते हैं|

अजामल-‘हे प्रियतमा! बात तो आपकी ठीक है, पर हम क्या खाएं और इनको क्या दें| मेहमान हैं| घर आए अतिथि को भोजन न देना भी तो घोर पाप है|

कलावंती-यह बात तो ठीक है| इनको खाने के लिए क्या दें| हां, कुछ दाने हैं भूने हुए और गुड़ भी है| वह ही दें दे| आप भी मुठ्ठी-मुठ्ठी चबाकर संतोष से रात बिता लें! सुबह जो होगा देखा जाएगा|

अजामल-बात ठीक है| ऐसा ही करो|

दम्पति ने भूने हुए दाने और गुड़ साधुओं को खाने के लिए दिए| अनुरोध किया, ‘महाराज! हमारे पास तो यही कुछ है| हम गरीब और पापी हैं| कृपा करो! दया करो! हे महाराज! हमारे लिए भगवान से प्रार्थना करो!

भगवान रूप साधू ने वचन किया-‘हे अजामल! त्रिकाल दृष्टि द्वारा हम सब जान गए हैं| आप ब्राह्मण के पुत्र थे, वासना की अग्नि ने आप की बुद्धि सब भस्म कर दी, ठीक है पर जल्दी ही आपका कल्याण होगा| जो आपने अपने पुत्र का नाम ‘नारायण’ रखा है यह भगवान की प्रेरणा है| इसके साथ प्यार किया करो| नारायण! नारायण! पुकारो| एक दिन अवश्य नारायण आप की पुकार सुन लेंगे|’

ये वचन करके सुबह वह वहां से चले गए| अजामल ने अपने पुत्र को उठा लिया और उससे प्यार करता हुआ कहने लगा-‘पुत्र नारायण! आओ बेटा नारायण| रोटी खाओ नारायण! दूध पीओ नारायण!’ ऐसी बातें करने लगा| उसकी बातें उसके मन को शांति देने लगी|

कुछ ऐसी प्रभु की लीला हुई, वह जो शिकार मार कर लाता वही बिक जाता| जिससे उसको पैसे मिल जाते इस तरह उसे अन्न खाने को मिलने लगा| उसके दिन अब अच्छे व्यतीत होने लगे| वह झौंपड़ी में रह कर भी सुख महसूस करने लगा|

काल महाबली है| काल की मार से कोई नहीं बचता जो दिखाई देता है, सब नाशवान है सब के काम अधूरे रह जाते हैं जब काल आता है| काल का भारी हाथ सब के सिर के ऊपर रखा जाता है| अजामल का भी काल आ गया| वह बीमार पड़ गया और बिमारी भी उसको कष्ट देने वाली| वह कष्टदायक बीमारी से दुखी होने लगा| एक दिन ऐसा आया जब आंखें बन्द करते ही यमदूत भी नजर आने लगे| नरक की आग जलती हुई दिखाई देने लगी, वह बहुत भयानक रूप में थी, उसकी दशा बहुत डरावनी थी! नरक की झांकी व अंतकाल नजदीक नज़र आया देखकर उसने बहुत ऊंची-ऊंची पुकारा-‘नारायण आओ! नारायण आओ!

अजामल पापी ने आवाज़ तो अपने पुत्र को दी परन्तु पुत्र शब्द का इस्तेमाल न किया! सत्य ही उसका कल्याण हो गया जैसे ही उसने ‘नारायण’ कहा वैसे ही धर्मराज के यमदूत भी पीछे हट गए| अचानक रोशनी हुई| नाद शंख बजे| इधर आत्मा ने शरीर छोड़ा, उधर से फूलों की वर्षा हुई| अजामल की आत्मा स्वर्ग में चली गई| नारायण कहने से पापी का कल्याण हो गया| इस संबंध में चौथे पातशाह का वचन है :-

अजामल प्रीति पुत्र प्रति कीनी करि नाराइण बोलारे ||
मेरे ठाकुर कै मनि भाइ भावणी जम कंकर मारि बिदारे || 

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