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वज्रदंती के फायदे और नुकसान

 
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आयुर्वेदिक दवाओं और इस पद्धति से उपचार पर लोगों की विश्वसनीयता साल दर साल बढ़ती रही है। आयुर्वेद में कई ऐसी जड़ी बूटियां हैं जो कई प्रकार की गंभीर बीमारियों के इलाज में प्रभावी साबित हो चुकी हैं। ऐसी ही एक औषधि है वज्रदंती। यह एक बारहमासी पौधा है, जिसे दांतों और मसूड़ों को स्वस्थ बनाए रखने वाली क्षमता के लिए पीढ़ियों से जाना और उपयोग में लाया जाता रहा है। 

वज्रदंती को बारलेरिया प्रियोनाइटिस नाम से भी जाना जाता है। एशिया और पूर्वी अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह बहुतायत मात्रा में पाई जाने वाली औषधि है। हालांकि, अब दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भी वज्रदंती की खेती की जा रही है। भले ही वज्रदंती का स्वाद कड़वा और कसैला होता हो, लेकिन इसे अनेक फायदों की एक दवा माना जा सकता है।

आयुर्वेद के अलावा, वज्रदंती का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों जैसे सिद्ध और लोक चिकित्सा में भी किया जाता है। आइए इस गुणकारी औषधि के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।

वैज्ञानिक नाम : बारलेरिया प्रियोनाइटिस
संस्कृत नाम : सैरेयाका, सहकारा
परिवार : अचंतासी
मूल क्षेत्र और भौगोलिक वितरण : दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और अफ्रीका के कुछ हिस्से
किन हिस्सों को प्रयोग में लाते हैं : पत्ती, जड़, छाल, फूल

वज्रदंती के गुण -

कफ और वात दोषों के निवारण में वज्रदंती को काफी लाभकारी माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार मानव का शरीर जल और पृथ्वी (कफ) और वायु (वात) जैसे प्राकृतिक तत्वों से मिलकर बना होता है।

वज्रदंती दो शब्दों से मिलकर बना है, वजर जिसका अर्थ है हीरा और दंती यानी दांत। इसका शाब्दिक अर्थ है, एक ऐसी जड़ी-बूटी जो दांतों को हीरे की तरह मजबूत बनाती है। बाजार में मिलने वाले आयुर्वेदिक टूथपेस्ट में इसे एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में शामिल किया जाता है। इसके अतिरिक्त वज्रदंती को सूजन जैसी समस्याओं के समाधान में भी उपयोगी माना गया है। द आयुर्वेदिक फार्माकोपिया ऑफ इंडिया पार्ट-I, वॉल्यूम III (आयुष मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत) में एक लेख के अनुसार वज्रदंती में एल्कलॉइड, बीटा-साइटोस्टेरॉल और पोटेशियम जैसे कई फाइटोकेमिकल्स और खनिज पदार्थ पाए जाते हैं, जो हमारे शरीर के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण होते हैं।

वज्रदंती के स्वास्थ्य लाभ - 

मौखिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है वज्रदंती - 
वज्रदंती को मौखिक स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी औषधि माना जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट होती है वज्रदंती यानी हीरे जैसे दांत। इसके फूल से बने पेस्ट का इस्तेमाल दांतों को मजबूत बनाने के लिए किया जाता है।

जिन लोगों को मुंह के छालों की समस्या होती है उनको वज्रदंती के जड़ के काढ़े का उपयोग माउथवॉश के रूप में करने की सलाह दी जाती है। इससे छाले तेजी से ठीक हो जाते हैं। इसके अलावा जिन लोगों को दांतों के सड़न और मसूड़ों से खून आने की दिक्कत होती है उन्हें प्रभावित हिस्से में वज्रदंती के पत्ते के रस को लगाने से लाभ मिलता है।

संपूर्ण मौखिक स्वास्थ्य के लिए बहुत से लोग वज्रदंती की टहनियों को भी चबाते हैं। इन तमाम लाभों के आधार पर कहा जा सकता है कि वज्रदंती, मुंह और दांतों के लिए काफी लाभकारी औषधि हो सकती है।

सूजन को कम करने के लिए करें वज्रदंती का उपयोग - 
वॉटर रिटेंशन यानी अंगों में पानी भर जाने या सूजन के मामले में वज्रदंती के फूल के अर्क को फायदेमंद माना जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक यह पेशाब की मात्रा को बढ़ाकर शरीर से सोडियम को बाहर करने में काफी लाभकारी हो सकती है। इसका प्रयोग करते हुए एडिमा को चमत्कारी रूप से कम करने में मदद मिल सकती है।

गाउट, गठिया और जोड़ों में सूजन को दूर करने के लिए वज्रदंती का उपयोग - 
वज्रदंती को प्राकृतिक रूप से एंटी-रूमेटिक औषधि माना जाता है। सूजन और गठिया जैसी स्थितियां जैसे आर्थराइटिस आदि के इलाज के रूप में वज्रदंती के प्रयोग की सलाह दी जाती है। ऐसी ​समस्याओं के इलाज के रूप में आयुर्वेद विशेषज्ञ या सिद्ध चिकित्सक, रोगी को वज्रदंती के पौधे से तैयार किए गए काढ़े के सेवन की सलाह देते हैं।

कुछ शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि वज्रदंती का उपयोग रूमेटाइड आ​र्थराइटिस के रोगियों को भी लाभ दे सकता है। हालाकि, इस संबंध में ठोस परिणाम प्राप्त करने के लिए अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है। हमेशा ध्यान रखें कि किसी भी औषधि का उपयोग बिना विशेषज्ञ चिकित्सक की सलाह के न करें।

त्वचा के लिए काफी फायदेमंद है वज्रदंती - 
जिन लोगों को एक्जिमा, खुजली या त्वचा की एलर्जी जैसी समस्याएं हों, उन्हें प्रभावित हिस्से पर वज्रदंती की पत्तियों से बना पेस्ट लगाने पर लाभ मिलता है। इतना ही नहीं यह पेस्ट फोड़े-फुंसी और मुहांसों से भी छुटकरा दिला सकता है।

जिन लोगों को दाद या फंगल संक्रमण की दिक्कत हो उनके लिए भी यह औषधि फायदेमंद मानी जाती है। इसके लिए वज्रदंती की जड़ों को सुखाकर महीन पाउडर के रूप में पीस लें। अब इस पाउडर को नींबू के रस में मिलाकर प्रभावित हिस्से पर लगाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घरेलू उपचार दाद और इससे जुड़ी अन्य समस्याओं को ठीक करने में काफी प्रभावी हो सकता है। इसके अलावा जिन लोगों को एड़ी फटने की समस्या होती है वह वज्रदंती की पत्ती का रस या पेस्ट भी लगा सकते हैं।

वैसे तो सदियों से उपरोक्त स्थितियों में इन उपचार विधियों को प्रयोग में लाया जाता रहा है, लेकिन इन स्थितियों में वज्रदंती की प्रमाणिकता को स्पष्ट करने के लिए अभी और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है। इन प्राकृतिक उपचारों का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के बिना या निर्धारित दवाओं के विकल्प के रूप में नहीं किया जाना चाहिए।

वज्रदंती से किडनी की पथरी को निकाल सकते हैं -
वज्रदंती का उपयोग पीढ़ियों से मूत्रवर्धक के रूप में किया जाता रहा है। इसका मतलब है कि यह शरीर में मूत्र के उत्पादन को बढ़ाने के साथ विभिन्न अवशेषों को बाहर करने में मदद करती है। इसके सेवन से पेशाब की आवृत्ति बढ़ती है, जिससे प्राकृतिक रूप से किडनी की पथरी के बाहर निकलने की संभावना बढ़ जाती है।

यदि आपको पेट के बगल के हिस्से में अचानक दर्द या पीठ में दर्द होना, बुखार, मितली और उल्टी, बार-बार पेशाब आना, पेशाब से खून आने जैसे किडनी में पथरी के लक्षण नजर आते हैं तो इस बारे में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। आयुर्वेदिक उपचारों को प्रयोग में लाने से पहले इस बारे में किसी विशेषज्ञ से सलाह जरूर ले लें।

खांसी, बलगम और सांस की समस्याओं में वज्रदंती का उपयोग है फायदेमंद - 
वज्रदंती की एंटीकैट्रल एक्शन यानी अतिरिक्त बलगम को हटाने में काफी प्रभावी औषधि माना जाता है। यही कारण है कि इसका उपयोग खांसी और एलर्जिक राइनाइटिस के लिए किया जाता रहा है। कफ को बाहर करने के लिए वज्रदंती की पत्तियों के रस को शहद के साथ मिलाकर दिया जाता है। यह अतिरिक्त बलगम हटाने के साथ गले को साफ करने में मदद कर सकती है। वज्रदंती की सूखे छाल का चूर्ण खांसी के इलाज में कारगर बताया गया है। इसके अलावा यह अस्थमा से पीड़ित लोगों के लिए भी फायदेमंद औषधि हो सकती है।

ध्यान रहे इन औषधियों का उपयोग निर्धारित दवाओं के विकल्प के रूप में नहीं करना चाहिए। यदि आप अस्थमा या किसी अन्य समस्या की दवाइयों का सेवन कर रहे हैं तो किसी भी उपाय को आज़माने से पहले चिकित्सक से सलाह जरूर ले लें। ऐसा न करने पर यह औषधियां, पहले से चल रही दवा के प्रभाव को कम कर सकती हैं।

बालों की समस्या को दूर करने के लिए करें वज्रदंती का उपयोग - 

प्रजनन क्षमता को बढ़ाने में मददगार है वज्रदंती -
महिला और पुरुष दोनों की प्रजनन क्षमता में सुधार करने के लिए वज्रदंती के सेवन की सलाह दी जाती है। जिन लोगों में शुक्राणुओं की कमी होती है उन्हें वज्रदंती की पत्तियों के रस का सेवन करने की सलाह दी जाती है। वहीं वज्रदंती की जड़ों को उबालकर उसके पानी को गर्भवती महिलाओं के पेट पर रगड़ने से यह भ्रूण के समुचित विकास को बढ़ावा देने में फायदेमंद हो सकता है।

वज्रदंती के दुष्प्रभाव - 
औषधियों के लाभ के साथ उसके दुष्प्रभाव भी होते हैं। वैसे तो वज्रदंती का सही मात्रा में सेवन और तमाम प्रकार से इसके उपयोग के आधार पर इसके कोई दुष्प्रभाव सामने नहीं आए हैं। हालांकि, यदि आपको पहले से स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या है और उसकी दवाइयों का सेवन कर रहे हों तो वज्रदंती के सेवन से पहले डॉक्टर से परामर्श जरूर ले लें।

वज्रदंती के उपयोग का तरीका और खुराक - 
यदि आप वज्रदंती का उपयोग लगाने के रूप में कर रहे हैं तो सामान्य तौर पर डॉक्टर इसकी 50-100 मिलीलीटर की खुराक की सलाह देते हैं। वहीं यदि इसका मौखिक रूप से सेवन करते हैं तो यह खुराक आवश्यकतानुसार 5 से 20 मिलीलीटर का हो सकता है।

आपकी आवश्यकताओं के अनुसार वज्रदंती के पौधे का कौन सा भाग आपके लिए उपयुक्त है, इस बारे में जानने के लिए किसी चिकित्सक, आयुर्वेद विशेषज्ञ या सिद्ध चिकित्सक से सलाह लें।


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अगरकाष्ठ (अगरू) के फायदे और नुकसान

 
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पूजा-पाठ के दौरान अगरबत्ती का इस्तेमाल तो हममें से हर कोई करता है, पर क्या आपने सोचा कि यह बनती कैसे है? इस लेख में हम ऐसी ही एक जड़ी-बूटी के बारे में जानेंगे जो न सिर्फ अगरबत्ती बनाने में महत्वपूर्ण घटक के रूप में प्रयोग में लाई जाती है, बल्कि यह कई मामलों में स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद है। दक्षिण-पूर्व एशिया के क्षेत्रों में बहुतायत में पाई जाने वाली इस औषधि का नाम है-अगरू या अगरकाष्ठ। इसे कई स्थानों पर ईगल वुड के नाम से भी जाना जाता है। जिस प्रकार से आज के समय में लिखने के लिए कागज का इस्तेमाल किया जाता है उसी प्रकार पुराने समय में अगरू के पेड़ की छाल को प्रयोग में लाया जाता था। इसकी छाल से विशेष प्रकार की खुशबू भी आती है, इसीलिए अगरबत्ती बनाने में भी इसको प्रयोग में लाया जाता है।

आयुर्वेद और पारंपरिक चीनी चिकित्सा पद्धति में भी अगरकाष्ठ का जिक्र मिलता है। इसकी पत्तियां पतली और करीब तीन इंच तक लंबी होती हैं। कई संस्कृतियों में इस जड़ी-बूटी का प्रयोग बुरी ऊर्जाओं को दूर करने के लिए भी किया जाता रहा है। आइए अगरकाष्ठ के बारे में विस्तार से जानते हैं।

वानस्पतिक नाम : एक्यूलारिया अगालोचा
सामान्य नाम : अगरकाष्ठ, ईगलवुड
मूल : थिमिलिएसियायई
मूल क्षेत्र और भौगोलिक वितरण : उत्तर-पूर्व भारत, बांग्लादेश, भूटान और दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्से

अगरकाष्ठ के स्वास्थ्य संबंधी लाभ - 

जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया है कि अगरकाष्ठ का प्रयोग अगरबत्ती बनाने के अलावा कई स्वास्थ्य संबंधी लाभ प्राप्त करने के लिए भी किया जाता है। आइए जानते हैं कि यह औषधि किन मामलों में हमारे लिए लाभकारी हो सकती है।
  •     एनालाजेसिक
  •     सेडटिव
  •     पाचन में सहायक
  •     एंटी-माइक्रोबियल
  •     कारमिनाटिव
  •     कामोत्तेजना बढ़ाने में
  •     एस्ट्रिंजेंट
  •     एंटी-इंफ्लामेटरी
  •     सुगंध के लिए
अगरू की छाल के साथ इसकी पत्तियों का भी प्रयोग कई प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए किया जाता रहा है। इसकी पत्तियों से बनने वाली चाय को कई समस्याओं के उपचार के तौर पर उपयोग में लाया जाता है। इस प्रजाति के विभिन्न पेड़ों की पत्तियों में हेक्साडेकोनिक एसिड और स्क्वैलीन जैसे यौगिक पाए जाते हैं जो ऐंटिफंगल और एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए मशहूर हैं। हालांकि, एक शोध से यह भी पता चला है कि इस प्रजाति के एक अन्य पौधे ए. मैलाकेंसिस में बहुत ही मामूली, पर सायटोटॉक्सिक और जीनोटॉक्सिक प्रभावों की मौजूदगी होती है, इसे इंसानों के लिए खतरनाक माना जाता है।

अगरू की पत्तियों के लाभ पर कई शोध किए जा चुके हैं। 'जर्नल ऑफ हर्बल मेडिसिन' में प्रकाशित शोध के अनुसार, अगरवुड  की पत्तियों में 2-(2-फिनाइलेथल) क्रोमोसोमंस, फेनोलिक एसिड, स्टेरॉयड, फैटी एसिड, बेंजोफेनोन्स, जेन्थोनॉइड्स, फ्लेवोनॉइड्स, टेरपेनॉइड्स और एल्केन्स जैसे यौगिक पाए जाते हैं। यह यौगिक कई औषधीय गुणों जैसे दर्द और सूजन से राहत, एंटीकैंसर और एंटीट्यूमर, एंटीऑक्सिडेंट गुण, रोगाणुरोधी के तौर पर काफी प्रभावी हो सकते हैं।

आइए अब इस औषधि से होने वाले विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी लाभ के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।

कब्ज में फायदेमंद है अगरकाष्ठ - 

दैनिक जीवन में भागदौड़ के चलते खान-पान पर विशेष ध्यान न दे पाने के कारण कब्ज की समस्या होना आम बात है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति के लिए शौच कर पाना काफी मुश्किल हो जाता है। कब्ज की समस्या के कई कारण हो सकते हैं। अगरू की पत्तियां यहां आपकी मदद कर सकती हैं। कई शोध में पता चला है कि इसकी पत्तियां प्राकृतिक तौर पर लैक्सेटिव होती हैं, यानी यह मल त्याग करने की प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद कर सकती हैं। अगरू की पत्तियों से बनी चाय भी कब्ज से राहत दिलाने में मदद कर सकती है।

आर्थराइटिस के रोगियों के लिए फायदेमंद है अगरू - 

आर्थराइटिस, जोड़ों के दर्द से जुड़ी हुई समस्या है। इसमें लोगों के लिए चलना, उठना और सामान्य कार्यों को करना कठिन हो जाता है। विशषज्ञों का मानना है कि अगरू इस गंभीर समस्याकारक रोग में भी फायदेमंद होता है। ऑस्टियोआर्थराइटिस और रुमेटाइड आर्थराइटिस दोनों ही समस्याओं में अगरकाष्ठ के पेड़ की छाल से बने पेस्ट को लगाने से काफी राहत मिलती है। चूंकि इसमें एंटी-इंफ्लामेटरी यानी सूजन को कम करने वाले गुण मौजूद होते हैं ऐसे में यह जोड़ों के सूजन को कम करने के साथ दर्द से भी राहत दिलाने में मददगार औषधि है।

अगरकाष्ठ के उपयोग से पाएं साफ और निखरी त्वचा -

साफ और दमकती त्वचा पाने की चाहत हर किसी की होती है। इसके लिए हम सब कई सारे प्रयास भी करते रहते हैं। इस बारे में जानकारों का मानना है कि अगरू की छाल आपकी इस चाहत को पूरी करने में मदद कर सकती है। तमाम गुणों के साथ अगरू में रोगाणुओं से लड़ने और इंफ्लामेशन को कम करने की भी शक्ति होती है। इन्हीं गुणों के कारण माना जाता है कि यह औषधि मुंहासे, एक्जिमा और सोरायसिस जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में आपकी मदद कर सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक अगरकाष्ठ की छाल का पेस्ट बनाकर प्रभावित हिस्से में लगाने से लाभ मिलता है। इसके अलावा, छाल से बनी चाय रक्त को शुद्ध करने के लिए भी जानी जाती है, जिससे त्वचा स्वस्थ और चमकदार बनती है।

छाती में जलन और मितली में करें अगरकाष्ठ का सेवन - 

अगरकाष्ठ के तमाम हिस्सों को अलग-अलग प्रकार से प्रयोग में लाकर लाभ प्राप्त किया जाता है। यह औषधि छाती में जलन और मितली की समस्या में भी आपके लिए फायदेमंद हो सकती है। अगरकाष्ठ की थोड़ी सी मात्रा को जलाने से उठने वाले धुएं को अंदर खींचने से अम्लता और उल्टी महसूस होने से राहत मिल सकती है। इसके अलावा अगरकाष्ठ से बने काढ़े को भी पीने से राहत मिलती है। जिन लोगों को अक्सर छाती में जलन की समस्या रहती हो उन्हें इसका सेवन करना चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य में फायदेमंद है अगरकाष्ठ - 

अगरवुड के कई सबसे आश्चर्यजनक लाभों में से एक है इसका तेल। इसके गुणकारी तेल का उपयोग अरोमाथेरेपी मे किया जाता है। यह थेरपी शारीरिक और मानसिक रूप से व्यक्ति को मजबूती देती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह चिंता और अवसाद सहित विभिन्न मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों से राहत प्रदान करने में भी सहायक हो सकती है।

अस्थमा के रोगियों के लिए अगरकाष्ठ है काफी उपयोगी -
जिन लोगों को अस्थमा की समस्या होती है, उनके लिए विपरीत परिस्थितियों में सांस लेना काफी कठिन हो जाता है। रोगियों को इन्हेलर के उपयोग की सलाह दी जाती है। वहीं अगर हम आयुर्वेद की ओर देखें तो कई सारी ऐसी औषधियां हैं जो अस्थमा में काफी प्रभावी परिणाम दे सकती हैं, अगरकाष्ठ उन्हीं में से एक है। जानकारों की मानें तो अगरकाष्ठ का तेल अस्थमा की समस्या को नियंत्रित करने में काफी मददगार हो सकती है। इसका सेवन पान के पत्तों के साथ किया जा सकता है। कई बार अगरकाष्ठ का तेल आसानी से नहीं मिल पाता है, ऐसी स्थिति में इसके छाल को पानी में उबालकर काढ़ा बनाया जाता है, जिसे या तो नारियल के तेल में मिलाकर या फिर सीधे तौर पर अस्थमा के रोगी की खोपड़ी पर लगाया जाता है। माना जाता है कि यह अस्थमा के प्रभाव को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती है।

हालांकि, यहां ध्यान रखें कि अस्थमा एक गंभीर समस्या है, ऐसे में इस बीमारी में अगरकाष्ठ या किसी भी हर्बल उपाय को प्रयोग में लाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें। बिना सलाह के इन उपायों को प्रयोग में लाने से संभव है कि यह नियमित दवाओं के प्रभाव को कम कर दे। आपके स्वास्थ्य के हिसाब से ऐसा भी हो सकता है कि कुछ हर्बल उपचार आपके लिए उपयुक्त न हों। ऐसे में किसी भी औषधि या उपचार को प्रयोग में लाने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए।

शरीर और सांसों की दुर्गंध को दूर करता है अगरकाष्ठ - 
जिन लोगों के शरीर से बदबू आती है उन्हें कई बार सामाजिक रूप से झेप और शर्म का सामना करना पड़ता है। ऐसी ही मुंह से आने वाली दुर्गंध के साथ भी है। जैसा कि इस लेख की शुरुआत में बताया गया था कि अगरकाष्ठ में प्राकृतिक रूप से विशेष प्रकार की सुगंध मौजूद होती है, इस आधार पर विशेषज्ञों ने पाया कि यह शरीर की गंध को बढ़ाने वाले कारकों से मुकाबला करने में भी सहायक है। जानकारों का मानना है कि अगरवुड को दूध अथवा गुलाबजल से मिलाकर बनाए गए पेस्ट को लगाने से ताजगी और स्फूर्ति महसूस होती है। इसे लगाने से शरीर से सुगंध भी आती है। इसके अलावा इसकी छाल को चबाने से सांस की बदबू से भी छुटकारा पाया जा सकता है।

अगरू का डोज और इसके दुष्प्रभाव - 
उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया है कि अगरू कई मामलों में स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है। इसकी छाल और पत्तियों को कई प्रकार की समस्याओं से निजात पाने के लिए प्रयोग में लाया जाता रहा है। अब सवाल उठता है कि आखिर इसकी कितनी मात्रा को उपयोग में लाने से लाभ मिलता है? तो इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि अगरू का डोज आपके स्वास्थ्य और आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। आमतौर पर, अगरू के तेल को तमाम उपयोगों में एक से चार बूंदों की मात्रा में प्रयोग में लाया जाता है। वहीं इसके पाउडर के 3 से 6 ग्राम की मात्रा को प्रयोग में लाने की सलाह दी जाती है। यदि अगरू का उपयोग निर्धारित मात्रा में किया जाए तो इसे सुरक्षित माना जाता है।

आमतौर पर इसके कोई दुष्प्रभाव देखने को नहीं मिलते हैं। कई समस्याओं में प्रभावी माने जाने वाले इस औषधि का उपयोग वैसे तो सुरक्षित होता है लेकिन यदि आपको स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या हो और उसकी दवाइयों का सेवन कर रहे हों तो किसी भी प्रकार के उपचार माध्यमों को प्रयोग में लाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर ले लेनी चाहिए।


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शालपर्णी के फायदे और नुकसान

 
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आयुर्वेद की दुनिया तमाम गुणकारी औषधियों से भरी हुई है। ऐसी ही एक औ​षधि है- शालपर्णी। कई सारे स्वास्थ्य लाभ के लिए उपयोग में लाई लाने वाली इस औषधि की जड़ें काफी उपयोगी मानी जाती हैं। इतना ही नहीं यह उन 10 जड़ी-बूटियों में से एक है जिसकी जड़ें दशमूल में इस्तेमाल की जाती हैं। दशमूल, 10 सूखी जड़ी-बूटियों के मिश्रण से बने काढ़े को कहा जाता है, इस काढ़े को स्वास्थ्य के लिए कई मायनों में लाभदायक माना जाता है।

शालपर्णी को डेस्मोडियम गैंगिटिकम के नाम से भी जाना जाता है। दो से चार फीट तक बढ़ने वाला यह पौधा भारत के कई हिस्सों में बहुतायत में पाया जाता है। शालपर्णी के फूल मटर के आकार के सफेद-बैंगनी रंग के होते हैं, जिनका उपयोग कई प्रकार की समस्याओं के उपचार में किया जाता है। यह फूल अगस्त और नवंबर के महीनों के बीच खिलते हैं। भारत के पश्चिमी घाटों से लेकर सिक्किम तक के ज्यादातर हिस्सों में शालपर्णी के फूल देखने को मिल सकते हैं। आइए इस गुणकारी औषधि के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।

वैज्ञानिक नाम : डेस्मोडियम गैंगेटिकम
सामान्य नाम : शालपर्णी
संस्कृत नाम : अंशुमती, विदरिगंधा
मूल : फबासी
प्रयोग में लाए जाने वाले हिस्से : पौधे के ज्यादातर हिस्से, विशेष रूप से जड़
मूल क्षेत्र और भौगोलिक स्थिति : उष्णकटिबंधीय अफ्रीका, एशिया के अधिकांश (विशेष रूप से भारतीय उपमहाद्वीप) और ऑस्ट्रेलिया
विशेषता : कफ और वात दोषों को शांत करने के लिए जाना जाता है।

शालपर्णी, स्वाद में कड़वा-मीठा और पत्तियां सामान्य होती हैं। डेस्मोडियम पौधे में इस तरह के गुणों का होना असामान्य माना जाता है। जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया है कि यह औषधि कई प्रकार से स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है, आइए इससे होने वाले ऐसे ही स्वास्थ्य संबंधी कुछ फायदों और इसके दुष्प्रभावों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।

शालपर्णी के स्वास्थ्य लाभ - 

शालपर्णी का पौधा तमाम गुणों से युक्त होता है। इसी के आधार पर आइए जानते हैं कि यह हमारे स्वास्थ्य के लिए कैसे फायदेमंद हो सकता है?

आयुर्वेदशास्त्र में तीन दोषों का जिक्र है, जिनका संतुलित होना, स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए बेहद जरूरी होता है।
  •     कफ : यह शरीर में द्रव संतुलन को संदर्भित करता है।
  •     वात : यह तंत्रिका तंत्र की सक्रियता और शरीर की गति को संदर्भित करता है।
  •     पित्त : यह शरीर में मेटाबॉजिल्म को संदर्भित करता है।
अध्ययनों में पाया गया है कि शालपर्णी कफ और वात दोषों को संतुलित करने में काफी प्रभावी हो सकती है। चूंकि इसकी तासीर गर्म होती है ऐसे में शरीर को गर्म रखने के साथ पित्त को बढ़ाता है। शालपर्णी में विभिन्न प्रकार के फाइटोकेमिकल्स भी मौजूद होते हैं जो शरीर को कई तरह से लाभ पहुंचाते हैं। इसकी जड़ों में आवश्यक तेल, अल्कलॉइड और रेसिन जैसे उपयोगी तत्वों की मौजूदगी होती है। इसके अलावा माना जाता है कि इसमें एल्कालॉइड्स, टेरोकार्पान्स, फॉस्फोलिपिड्स, स्टेरोल्स, फ्लेवोन और फ्लेवोनोइड ग्लाइकोसिडीज जैसे तत्व भी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। इन तत्वों की मौजूदगी के कारण शालपर्णी को निम्न गुणों का भंडार माना जाता है।
  •     गैलेक्टागोग : स्तन में दूध के उत्पादन को बढ़ाने वाली
  •     दस्त रोकने वाले गुण
  •     मूत्रवर्धक : मूत्र के उत्पादन को बढ़ाता है
  •     कामशक्ति को बढ़ाने वाला
  •     कार्मिनिटिव : पेट फूलने से रोकता है
  •     एंटी इंफ्लामेटरी
  •     एक्सपेक्टोरेंट : शरीर से कफ को बाहर निकालने में मदद करता है।
  •     एस्ट्रीन्जेंट
  •     एंटीपायरेटिक : बुखार को कम करता है

पाचन को सुधारने में शालपर्णी का उपयोग है लाभकारी - 

अब तक हुए तमाम अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने पाया कि शालपर्णी के उपयोग से पाचन तंत्र को ठीक करने में फायदा मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गैस की समस्या, दस्त, मतली और पेट फूलने की परेशानियों से राहत दिलाने में भी मदद कर सकती है। इसके अलावा जिन लोगों को भूख न लगने की समस्या यानी एनोरेक्सिया होती है, उसे ठीक करने के लिए भी शालपर्णी को उपयोग में लाने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि इसके सेवन से भूख लगने लगती है।

पशुओं पर किए गए अध्ययनों में पाया गया कि शालपर्णी, एसिड स्राव को कम करने के साथ कोशिकाओं की रक्षा के लिए बलगम के उत्पादन को बढ़ा देती है, ऐसे में यह पेप्टिक अल्सर के इलाज में भी फायदेमंद हो सकती है। हालांकि यह मनुष्यों पर कैसे काम करती है इस संबंध में और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है।

बवासीर के रोगियों के लिए फायदेमंद है शालपर्णी - 

जिन लोगों को बवासीर की समस्या होती है उनका सामान्य जीवन बहुत मुश्किल हो जाता है। शरीर धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इन रोगियों को शालपर्णी से विशेष लाभ मिल सकता है। शालपर्णी में लैक्सेटिव पाया जाता है जो मल को आसानी से गुजराने में मदद कर सकता है। यह कब्ज से राहत देने के साथ बवासीर के उपचार में भी प्रभावी हो सकता है। इसके अलावा, शालपर्णी में एंटी इंफ्लामेटरी गुण भी पाए जाते हैं जो गुदा के आसपास के हिस्सों में खुजली और सूजन को कम करने में भी सहायक है। जिन लोगों को बवासीर की समस्या होती है उनमें यह परेशानियां आम हैं। ऐसे में शालपर्णी को बवासीर रोगियों के लिए प्रभावी औषधि माना जा सकता है।

हृदय को स्वस्थ बनाए रखती है शालपर्णी - 

दैनिक जीवन में अनियमितता और तमाम कारकों के चलते लोगों को हृदय रोग की समस्याएं अब ज्यादा होने लगी हैं। हृदय से संबंधित कई रोग जानलेवा भी होते हैं। ऐसे रोगियों के लिए शालपर्णी को काफी लाभदायक औषधि माना जाता है। शालपर्णी में कई ऐसे गुण होते हैं जो लो डेंसिटी लिपोप्रोटीन (एलडीएल) कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने के साथ स्वस्थ रक्त कोलेस्ट्रॉल और रक्तचाप को नियंत्रित रखने में मदद करती है। यह हृदय को स्वस्थ बनाए रखने के लिए आवश्यक होता है। इसके अलावा विशेषज्ञों का मानना है कि शालपर्णी रक्त वाहिकाओं को चौड़ा करने के साथ हृदय की मांसपेशियों को मजबूत बनाने में भी सहायक होती है। ऐसे में जिन लोगों को हृदय संबंधी समस्याएं हैं उनके लिए शालपर्णी का सेवन फायदेमंद हो सकता है।

ब्रोंकाइटिस से बचा सकती है शालपर्णी - 

ब्रोंकाइटिस, श्वांसनली में सूजन की बीमारी है। यह सांस लेने में कठिनाई का कारण बन सकती है। शालपर्णी का सेवन इस रोग के इलाज में फायदेमंद हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक चूंकि शालपर्णी की तासीर गर्म होती है ऐसे में इसकी जड़ के पाउडर से बने काढ़े का सेवन करने से फेफड़ों से बलगम को बाहर निकालने में मदद मिलती है। ऐसा करके ब्रोंकाइटिस के लक्षणों को नियंत्रित करने में आसानी होती है।

यौन शक्ति को बढ़ाती है शालपर्णी - 

अपने तमाम प्रकार के फायदों के लिए मशहूर शालपर्णी यौन स्वास्थ्य में सुधार करने में भी काफी प्रभावी औषधि है। यह कामशक्ति के प्रेरक के रूप में भी काम करती है। विशेषज्ञों के मुताबिक शालपर्णी की जड़ के पाउडर को काढ़े के रूप में नियमित रूप से सेवन करने से यह शीघ्रपतन और कामेच्छा में कमी जैसी समस्याओं को ठीक करने में आपकी मदद कर सकती है। ऐसे में जिन लोगों को यौन शक्ति में कमी की समस्याएं हो, उन्हें इसका सेवन करना चाहिए। इसका सेवन विशेष रूप से पुरुषों के लिए प्रभावी परिणाम दे सकता है।

प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए करें शालपर्णी का सेवन - 
दुनियाभर में फैली कोविड-19 महामारी के बाद अब लोगों का अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने पर विशेष जोर देखने को मिल रहा है। ऐसे लोगों के लिए शालपर्णी का सेवन काफी मददगार हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक शालपर्णी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूती देने में प्रभावी है। यह टी-कोशिकाओं, बी-कोशिकाओं, मैक्रोफेज को प्रेरित कर प्रतिरक्षा प्रणाली को शक्ति प्रदान करता है। इसके साथ ही इसे एंटी इंफ्लामेटरी गुणों के लिए भी जाना जाता है जो इसे समग्र प्रतिरक्षा को बढ़ावा देने के लिए उत्कृष्ट बनाती है।

मधुमेह रोगियों के लिए शालपर्णी - 
दिनचर्या में गड़बड़ी, खान-पान पर विशेष ध्यान न देने और कई अन्य कारकों के चलते मौजूदा समय में लोग मधुमेह के शिकार हो रहे हैं। ऐसे रोगियों के इलाज के दौरान रक्त शर्करा के स्तर को कम करने पर विशेष ध्यान दिया जाता है। शालपर्णी, ऐसे लोगों के लिए फायदेमंद हो सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक शालपर्णी रक्त शर्करा को कम करने के साथ इंसुलिन के स्राव को आसान बनाती है। इन्हीं गुणों के कारण इसे मधुमेह के प्रबंधन में उपयोगी औषधि माना जाता है।

डिमेंशिया के रोगियों के लिए प्रभावी औषधि है शालपर्णी - 
अब तक हुए अध्ययनों में पाया गया है कि शालपर्णी में फ्लेवोन और फ्लेवोनोइड जैसे एंटीऑक्सिडेंट गुण मौजूद होते हैं। माना जाता है कि पौधों में मौजूद यह रसायन, संकेतों को संचारित करने की मस्तिष्क की क्षमता में सुधार कर सकते हैं। इस गुण के कारण शालपर्णी को डिमेंशिया की रोकथाम और प्रबंधन के लिए उपयोगी माना जा सकता है।

शालपर्णी की खुराक और दुष्प्रभाव -
औषधियों का उपयोग अगर नियत मात्रा में किया जाए तो यह शरीर के लिए काफी फायदेमंद होती हैं। शालपर्णी के मामले में भी ऐसा ही है। विशेषज्ञों का मानना है कि कई समस्याओं को ठीक करने के लिए किए जाने वाले शालपर्णी की जड़ के काढ़े का सेवन दिन में 50-100 मिली से अधिक नहीं करना चाहिए। वैसे तो शालपर्णी के अब तक कोई भी दुष्प्रभाव देखने को नहीं मिले हैं। आयु समूहों, लिंग और गर्भावस्था आदि के आधार पर शालपर्णी के उपयोग और इसके प्रभाव को जानने के लिए अभी और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।

यदि आप किसी भी बीमारी से ग्रस्त हैं और उसकी दवाओं का सेवन कर रहे हैं, इन स्थितियों में किसी भी औषधि को प्रयोग में लाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें। ऐसा संभव है कि पौधों को उनके औषधीय गुण प्रदान करने वाले फाइटोकेमिकल्स, आपके दवाओं के प्रभाव को कम कर सकते हैं।


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बांस के फायदे और नुकसान

 
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बांस क्या है?-बांस जिसे बैम्बू भी कहते हैं घास के परिवार का सदस्य है और इसके पौधे बेहद कॉमन हैं, जिन्हें हम सभी ने कभी न कभी जरूर देखा होता है। ये देखने में किसी बड़ी लकड़ी या गन्ने जैसा होता है तो ज्यादातर जंगली इलाकों में पाया जाता है। बांस के पौधे का हर एक हिस्सा- बीज, जड़, पत्ती, कली या अंकुर- हमारी सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद है क्योंकि यह औषधीय गुणों से भरपूर होता है। लेकिन अगर आप सोच रहे हैं कि लकड़ी जैसा दिखने वाला इस सख्त बांस को खाएंगे कैसे और यह बीमारियां दूर करने में हमारी मदद कैसे कर सकता है, तो इस बारे में ही हम आपको इस लेख में बता रहे हैं। आखिर बांस होता क्या है, इसके इस्तेमाल का तरीका क्या है और इसे खाने के फायदे-नुकसान क्या हो सकते हैं।

बांस से जुड़े कुछ तथ्य

  •     वानस्पतिक नाम : बैम्बूसा वल्गरिस
  •     वैज्ञानिक नाम : बैम्बू सोडिया
  •     सामान्य नाम : बैम्बू या बांस
  •     अन्य नाम : बंसलोचन, वंसकपूर, बैम्बूसा अरुणडिनासिया, बनसमिथा
  •     वंश : पोएसी फैमिली (Poaceae)
भौगोलिक विवरण : बांस की 1450 से भी ज्यादा वरायटी है और यह मुख्य रूप से एशिया, अफ्रीका और अमेरिका में पाया जाता है। भारत की बात करें तो ऊत्तर पूर्वी राज्यों अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्कम आदि के अलावा बंगाल, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी बांस को उगाया जाता है। यह दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाले पौधों में से एक है और एक दिन में करीब 60 सेंटीमीटर तक बढ़ने की क्षमता रखता है।

बांस का उपयोग कैसे करें? - 

बांस का पौधा बाहर से देखने में भले ही बेहद सख्त लगे लेकिन इससे निकलने वाली कलियां, कोपलें और अंकुर बेहद कोमल होते हैं और खाने के लिए इन्हीं का इस्तेमाल किया जाता है। बांस की इन कोपलों को बैम्बू शूट्स कहते हैं। इन बैम्बू शूट्स में औषधीय गुण होने के साथ ही ये पौष्टिक तत्वों से भी भरपूर होते हैं। यही कारण है कि आयुर्वेद में भी कई तरह के दवाइयां बनाने और इलाज में बांस की कोपल या बैम्बू शूट्स का इस्तेमाल किया जाता है।

आयुर्वेद में बांस को वन्श्चलोचन कहते हैं जो बांस के पेड़ के नोड (ग्रंथि या गांठ) से स्रावित होता है। बांस में कफ और पित्त दोष को संतुलित करने का गुण होता है जो त्वचा की गुणवत्ता में सुधार करने में भी मदद करता है। बैम्बू शूट काफी हद तक शतावरी (ऐस्पारगस) से मिलता जुलता होता है और चीन, ताइवान, जापान समेत दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में इसे खाने में उपयोग किया जाता है। 

उपयोग का तरीका

बैम्बू शूट्स को खाने में इस्तेमाल करने से पहले ताजा बैम्बू शूट्स को छीलकर करीब 20 मिनट तक पानी में उबाल लें क्योंकि बांस की कच्ची कोपलें कड़वी होती हैं और उन्हें पचाना भी मुश्किल होता है।
आप चाहें तो ताजे बैम्बू शूट्स को घिसकर या बारीक-बारीक काटकर अन्य सब्जियों और लहसुन, अदरक, लेमनग्रास के साथ पकाकर खा सकते हैं।
इसके अलावा आप चाहें तो बैम्बू शूट्स को उबालकर कर स्लाइस में काट लें और फिर उस पर मक्खन और चीज डालकर उसे बेक कर लें और साइड डिश के तौर पर मीट या मछली के साथ खाएं।
बांस का मुरब्बा भी बनाया जाता है, बांस की कोपल या बैम्बू शूट्स का अचार भी बनता है और बांस की पत्तियों का काढ़ा बनाकर भी पीया जाता है। 

बांस की तासीर - 

बांस की तासीर ठंडी होती है और यह कफ और पित्त को कम करने में मदद करता है। इसके अलावा बांस की प्रकृति मीठी, तीखी, कड़वी और एसिडिक होती है जो खून को साफ करने के साथ ही शक्ति बढ़ाने में भी मदद करता है।

बांस के पोषक तत्व - 

बांस की हर एक सर्विंग में कितने पोषक तत्व पाए जाते हैं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि आप बांस की किस प्रजाति का सेवन कर रहे हैं। हालांकि सामान्य रूप से देखें तो आधा कप बांस के ताजा स्लाइस में लगभग:
  •     कैलोरीज- 20
  •     फैट- 0
  •     प्रोटीन- 2 ग्राम
  •     कार्बोहाइड्रेट- 4 ग्राम
  •     फाइबर- 2 ग्राम
  •     शुगर- 2 ग्राम
  •     सोडियम- 3 मिलिग्राम
इसके अलावा बांस में पोटैशियम, कैल्शियम, मैंग्नीज, जिंक, क्रोमियम, कॉपर, आयरन, थियामिन, नियासिन, विटामिन ए, विटामिन बी6 और विटामिन ई भी पाया जाता है। फर्मेंटेड या कैन्ड बैम्बू की तुलना में ताजे बांस में ये सारे गुण अधिक मात्रा में पाएं जाते हैं।

बांस के फायदे - 

बांस में कई तरह के मिनरल्स, अमिनो एसिड, एंटीऑक्सिडेंट्स, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं जो स्किन से जुड़ी बीमारियां दूर करने के साथ ही श्वसन से जुड़ी कई बीमारियां दूर करने में भी मदद करता है। तो आखिर बांस की कोपल या बैम्बू शूट्स खाने के क्या-क्या फायदे हैं, इस बारे में हम आपको यहां बता रहे हैं:

बांस के फायदे कोलेस्ट्रॉल कम करने के लिए - 
बांस या बैम्बू शूट्स में फाइबर की उच्च मात्रा पायी जाती है और इसमें कैलोरीज की संख्या बेहद कम होती है इसलिए यह शरीर में मौजूद एलडीएल यानी बैड कोलेस्ट्रॉल के लेवल को कम करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा बैम्बू शूट्स में फाइटोस्टेरॉल्स और फाइटोन्यूट्रिएंट्स भी होते हैं जिसे अगर उबालकर खाया जाए तो यह धमनियों में होने वाली रुकावट को और संकुचन को दूर कर देता है। एक बार जब बैड कोलेस्ट्रॉल कम हो जाता है और धमनियां क्लियर हो जाती हैं तो उसके बाद हृदय रोग होने का खतरा भी अपने आप कम हो जाता है।

बांस के फायदे भूख बढ़ाने के लिए -
कई बार पाचन से जुड़ी समस्याओं या जी मिचलाने और उल्टी की वजह से भी व्यक्ति की भूख कम हो जाती है। ऐसे में अगर ताजा बांस की कोपलों का सेवन किया जाए तो यह भूख बढ़ाने में मदद कर सकता है। बांस का स्वाद हल्का मीठा होता है और इसका टेक्सचर यानी बनावट कुरकुरा होता है। साथ ही बांस में सेलुलोज की सांद्रता अधिक होती है जो भूख को बढ़ाने, उत्तेजित करने, कब्ज को रोकने और पाचन में सुधार करने में मदद कर सकता है।

बांस के फायदे सांस संबंधी समस्याओं के लिए - 
जैसा कि हमने आपके पहले ही बताया है कि बांस की कोपल या अंकुर जिसे बैम्बू शूट कहा जाता है उसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो श्वसन तंत्र की सूजन और अन्य संक्रमणों को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है। एक रिसर्च के मुताबिक, सांस संबंधी कई परेशानियों जैसे -अस्थमा आदि को दूर करने के लिए भी बांस की कोपल का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा अस्थमा की वजह से सांस लेने में जो तकलीफ होती है उसे भी दूर करने में मदद करता है बांस। साथ ही यह फेफड़ों में इन्फ्लेमेशन को कम करता है और वायु मार्ग में बनने वाले म्यूकस के उत्पादन को भी कम करने में मदद करता है।

बांस के फायदे इम्यूनिटी मजबूत करने के लिए - 
बांस में पाए जाने वाले पोषक तत्वों के बारे में बताते हुए हमने आपको बताया था कि बांस में एंटीऑक्सिडेंट्स पाए जाते हैं तो शरीर की इम्यूनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद करते हैं। इसके अलावा ढेरों विटामिन्स और मिनरल्स का स्टोरहाउस होने की वजह से भी बैम्बू शूट्स या बांस की कोपलें इम्यूनिटी को बेहतर बनाने में मदद करती हैं। अक्सर मॉनसून के दौरान और सर्दियों के मौसम में इम्यूनिटी कमजोर होने की वजह से हम वायरल या बैक्टीरियल इंफेक्शन का शिकार हो जाते हैं। इससे बचने के लिए आप चाहें तो बांस का सेवन कर सकते हैं।

बांस के फायदे डायबिटीज के लिए - 
अपनी एंटीऑक्सिडेंट प्रॉपर्टी की वजह से बांस डायबिटीज को भी मैनेज करने में मदद कर सकता है। बांस में फेनोलिक एसिड और फ्लैवनॉयड्स जैसे एंटीऑक्सिडेंट्स पाए जाते हैं जो अग्नाशय में मौजूद कोशिकाओं की क्षति को रोकते हैं और इंसुलिन के स्त्राव (सिक्रिशन) को बढ़ावा देते हैं। ऐसा होने पर ब्लड ग्लूकोज लेवल को कम करने में मदद मिलती है जिससे डायबिटीज को मैनेज करना आसान हो जाता है। आयुर्वेद की मानें तो वात और कफ दोष के असंतुलन की वजह से डायबिटीज होता है और बांस इन दोनों दोषों को बैलेंस कर शरीर में इंसुलिन के लेवल को सामान्य बनाता है जिससे डायबिटीज के लक्षणों में कमी आती है।

बांस के फायदे मुंहासे और स्किन की समस्याओं के लिए - 
स्किन से जुड़ी बीमारियों को मैनेज करने में भी बांस को फायदेमंद माना जाता है। यह त्वचा के लचीलेपन को बनाए रखने में मदद करता है और कुछ विशिष्ट खनिजों और आवश्यक अमिनो एसिड की उपस्थिति के कारण स्किन को मजबूत भी बनाता है। बांस में एंटी-इन्फ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल प्रॉपर्टीज भी होती हैं जो मुंहासे, स्किन फटने और त्वचा पर घाव होने जाने जैसी समस्याओं को दूर करने में मदद करता है। एक रिसर्च में यह बात सामने आयी है कि बांस से बना सिरका (बैम्बू विनिगर) त्वचा की बाहरी परत को मजबूत बनाकर त्वचा संबंधी बीमारियों को दूर करने में मदद करता है।

बांस के नुकसान - 
अब तक आपने बांस क्या है, उसे कैसे उपयोग किया जाता है और इसे खाने के क्या-क्या फायदे हो सकते हैं इस बारे में पढ़ा। लेकिन कोई भी चीज चाहे कितनी ही हेल्दी क्यों न हो उसके कोई न कोई नुकसान जरूर होते हैं या फिर बहुत अधिक मात्रा में सेवन करने पर भी वह नुकसानदेह हो सकता है। ऐसे में बांस का सेवन करने से पहले जान लें कि किन लोगों को इसका सेवन नहीं करना चाहिए और बांस के क्या-क्या नुकसान हो सकते हैं:
  • प्रेगनेंसी के दौरान और बच्चों को अपना दूध पिलाने वाली महिलाओं पर बांस का क्या असर होता है इस बारे में बहुत ज्यादा रिसर्च मौजूद नहीं है। लिहाजा बेहतर यही होगा कि गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली महिलाएं बांस का सेवन न करें और इससे दूर ही रहें।
  • जिन लोगों की थायराइड की समस्या हो फिर चाहे वह हाइपोथायराइडिज्म (थायराइड का कम बनना) हो, हाइपरथायराइडिज्म (थायराइड का अधिक बनना) हो, गॉयटर हो या फिर थायराइड ट्यूमर- इन लोगों को भी बांस के सेवन से परहेज करना चाहिए क्योंकि लंबे समय तक बांस खाने से थायराइड संबंधी ये समस्याएं और ज्यादा बदतर हो सकती हैं।
  • बहुत अधिक मात्रा में बांस का सेवन करने से हाइपरयूरिसीमिया यानी शरीर में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ने की समस्या हो सकती है।
इसके अलावा यदि आप किसी तरह की दवा का सेवन कर रहे हों तब भी बांस को डाइट में शामिल करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें वरना यह दवाइयों के साथ हस्तक्षेप कर सकता है।



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भारंगी के फायदे और नुकसान

 
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आयुर्वेद की तमाम औषधियों का जिक्र पुराणों और कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। भृगु नाम के ऋषि ने ऐसी ही एक औषधि की खोज की थी, जिसे भारंगी नाम से जाना जाता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में इसे बाग फूल भी कहते हैं। आइए इस पौधे के बारे में कुछ सामान्य बातें जानते हैं। भारंगी का पौधा झाड़ीनुमा होता है, जिसकी उपज विशेष रूप से दोमट मिट्टी में होती है। भारंगी के फूल नीले-गुलाबी रंग के होते हैं और गर्मियों के मौसम में खिलते हैं। इन फूलों से हल्की खुशबू आती है और पौधे के अन्य हिस्सों की तरह यह भी काफी फायदेमंद होते हैं। बरसात के मौसम में इसके फल आते हैं।

वैसे तो भारंगी का उपयोग कई प्रकार की बीमारियों के इलाज में किया जाता है। लेकिन श्वसन संबंधी समस्याओं के लिए पारंपरिक उपचार के तौर पर इसे काफी प्रभावी माना जाता है। इसकी जड़ों और पत्तियों में सैपोनिन, फ्लेवोनोइड और फिनोलिक्स जैसे तत्व पाए जाते हैं जो इस पौधे को अन्य कई बीमारियों के उपचार के लिए प्रभावी बनाते हैं। आइए भारंगी के बारे में कुछ सामान्य जानकारियों के साथ इसके उपयोग, खुराक और दुष्प्रभावों के बारे में जानते हैं।

भारंगी से संबंधित कुछ सामान्य जानकारियां -

वानस्पतिक नाम : क्लेरोडेन्ड्रम सेराटम और रोथेका सेराटा
सामान्य नाम : ग्लोरी बोवर, बाग फूल, ब्लीडिंग हार्ट, चेरुटेकु
मूल : वर्बेनेसी
संस्कृत नाम : भारंगी
मूल क्षेत्र और भौगोलिक वितरण : दक्षिण-पूर्व एशिया (भारत और श्रीलंका), दक्षिण अफ्रीका, उष्णकटिबंधीय अमेरिका, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया
प्रयोग में लाए जाने वाले भाग : जड़ें, पत्ते, छाल
उपयोग : कफ और वात दोष को शांत करने के लिए जाना जाता है।

भारंगी के स्वास्थ्य लाभ - 

भारंगी के पौधे के कई हिस्सों का सेवन स्वास्थ्य संबंधी तमाम प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए किया जाता रहा है। भारंगी में निम्न औषधीय गुण मौजूद होते हैं जो हमारे लिए कई मायनों में लाभदायक हैं।
  •     एंटीपायरेटिक : बुखार को कम करने में सहायक
  •     एक्सपेक्टोरोंट : कफ को निकालने में सहायक
  •     एंटी इंफ्लामेटरी : सूजन कम करता है
  •     ऐपेटाइज़र : भूख बढ़ाता है
  •     एंटी टॉक्सिक
  •     एंटीसेप्टिक
  •     एस्ट्रीनजेंट
  •     स्टेप्टिक : घाव से होने वाले रक्तस्राव को रोकने में मदद करता है

  • पारंपरिक और देसी चिकित्सा में भारंगी को निम्न समस्याओं के उपचार के लिए प्रयोग में  लाया जाता रहा है।
  • सांप कटाने पर भारंगी को उपयोग में लाया जाता रहा है। सर्पदंश की स्थिति में भारंगी के पत्तों को तेल और मक्खन के साथ उबालकर प्रभावित हिस्से पर लगाया जाता है।
  • खांसी, सर्दी, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा के इलाज में भारंगी की जड़ों और छाल का उपयोग किया जाता है।
  • पौधे के विभिन्न हिस्सों का उपयोग सूजन को कम करने, भूख बढ़ाने, अपच और पेट फूलने की समस्या के उपचार के रूप में किया जाता रहा है।
  • बुखार को कम करने के लिए भी भारंगी को उपयोग में लाया जाता रहा है।
  • कर्नाटक में, भारंगी के पत्तों का उपयोग ब्रोन्कियल अस्थमा, खांसी, बवासीर और गोइटर के उपचार में किया जाता था। वहीं इसकी पारंपरिक चिकित्सा में इसकी जड़ों का उपयोग चोट के घावों को ठीक करने के​ लिए किया जाता रहा है।

देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम प्रकार की समस्याओं के उपचार में भारंगी को प्रयोग में लाया जाता रहा है। हालांकि, यह वैज्ञानिक दृष्टि से कितने कारगर हैं इस बारे में जानने के लिए अभी और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है। आइए जानते हैं भारंगी के पौधे के तमाम हिस्सों को और किन किन समस्याओं के उपचार में प्रयोग में लाकर लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए करें भारंगी का प्रयोग - 

स्वस्थ और चमकदार त्वचा पाने की चाहत रखने वाले लोगों के लिए भारंगी का प्रयोग काफी फायदेमंद माना जाता है। यह त्वचा को साफ करने के साथ रंगत में निखार लाती है। चेहरे पर भारंगी की पत्तियों के रस को लगाने से फोड़े-फुंसी सहित त्वचा के तमाम रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसे में बेदाग त्वचा की चाहत रखने वाले लोगों के लिए यह औषधि वरदान साबित हो सकती है।

सांस संबंधी रोगों में भारंगी का उपयोग है लाभकारी -

भारंगी, श्वसन से संबंधित रोगों के उपचार में भी प्रभावी परिणाम के लिए आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में काफी लोकप्रिय है। पुराने समय से अस्थमा जैसी क्रोनिक श्वसन स्थितियों को ठीक करने के लिए भारंगी को उपयोग में लाया जाता रहा है। भारंगी में म्यूकोलाईटिक गुण होते हैं, इसका मतलब है कि यह फेफड़े से बलगम को बाहर करने में भी मदद करती है। इसके अलावा जिन लोगों को सामान्य सर्दी जुकाम, राइनाइटिस और तपेदिक जैसी समस्याएं हों उनको भी भारंगी से लाभ प्राप्त हो सकता है।

हर्पीज संक्रमण में भारंगी का प्रयोग है फायदेमंद - 

हर्पीज सिंप्लेक्स वायरस (एचएसवी) उन वायरसों का एक समूह है जो मनुष्यों में संक्रमण का कारण बनते हैं। यह इंसानों को कई प्रकार से संक्रमित कर सकते हैं। एचएसवी वायरस, मुंह के चारों ओर कोल्ड सोर जबकि एचएसवी-2 वायरस मुख्यरूप से वायरल एसटीडी (यौन संचारित रोग) का कारण बनता है। इन सभी समस्याओं के उपचार में भारंगी को प्रभावी औषधि के रूप में वर्णित किया गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक भारंगी में एंटी इंफ्लामेटरी गुण मौजूद होते हैं जो हर्पीज संक्रमण के लक्षणों को कम करने के लिए जाने जाते हैं। हालांकि, वैज्ञानिक दृष्टि से इसकी पुष्टि करने और इसके कार्यों को सटीकता से समझने के लिए अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है।

सिरदर्द की समस्या को दूर करती है भारंगी - 

जिन लोगों को बार-बार सिरदर्द की समस्या होती है, ऐसे लोगों के लिए भारंगी एक प्रभावी औषधि मानी जाती है। सिरदर्द की स्थिति में भारंगी की जड़ के पाउडर को पेस्ट बनाकर माथे पर लगाया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से हल्के से तीव्र स्तर के सिरदर्द को ठीक करने में लाभ प्राप्त हो सकता है।

घाव को भरने में मदद करती है भारंगी -
भारंगी के तमाम प्रकार के फायदों के साथ घावों को असानी से भरने का गुण इसे काफी खास बनाता है। चूंकि भारंगी में एंटी-इंफ्लामेटरी के साथ-साथ एंटी-सेप्टिक गुण भी होते हैं, जो घावों को भरने के लिए आवश्यक होते हैं। जिन लोगों को घाव, अल्सर और फोड़े की समस्या होती है उन्हें प्रभावित हिस्से में भारंगी के पत्तों से बना पेस्ट लगाने की सलाह दी जाती है। वहीं यदि घाव संक्रमित हो गया है, तो भारंगी का पेस्ट लगाने से जलन व  संक्रमण को कम करने में मदद मिल सकती है।

जोड़ों के दर्द से छुटकारा पाने के लिए करें भारंगी का प्रयोग -
जोड़ों में होने वाला दर्द सामान्य जीवन की रफ्तार को प्रभावित कर सकता है। इस समस्या से ग्रसित लोगों के लिए चलना और उठना काफी कठिन हो जाता है। ऐसे रोगियों के उपचार के लिए लंबे समय से भारंगी को प्रयोग में लाया जाता रहा है। जोड़ों के दर्द से संबधित कई स्थितियां जैसे रूमेटाइड आर्थराइटिस, गाउट या सूजन, अपार दर्द और तकलीफ का कारण बन सकते हैं। कुछ मामलों में यह इतना दर्दकारक हो सकता है कि लोगों के लिए जोड़ों को हिलाना तक कठिन हो जाता है। इस स्थिति में प्रभावित हिस्से पर भारंगी लगाने से दर्द के साथ जोड़ों की सूजन को भी कम करने में लाभ मिलता है।

बुखार को दूर करने के लिए भारंगी - 
आयुर्वेद में कुछ ऐसी औषधियों का जिक्र मिलता है जो अपने एंटीपायरेटिक गुणों के लिए जानी जाती हैं। भारंगी ऐसी ही औषधि है। यही कारण है कि भारंगी का उपयोग सदियों से बुखार को कम करने के लिए किया जाता रहा है। जिन लोगों को मलेरिया बुखार या हाइपर-पाइरेक्सिया की समस्या हो उनके शरीर के तापमान को कम करने में भारंगी प्रभावी परिणाम दे सकती है। हालांकि, इस पारंपरिक पद्धति की वैज्ञानिक दृष्टि से पुष्टि के लिए अभी और अधिक शोध करने की आवश्यकता है। यहां ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इस चिकित्सा को डॉक्टरी इलाज के विकल्प के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरक मात्र के रूप में काम कर सकती है।

जिन लोगों को मलेरिया की समस्या है और इसके लिए वह दवाइयों का सेवन कर रहे हैं, उन्हें ऐसी स्थिति में किसी भी दवा को प्रयोग में लाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लेनी चाहिए। बिना सलाह के सेवन करने से संभव है कि भारंगी के औषधीय गुण, मलेरिया की दवाओं के प्रभाव को कम कर दें।

कृमि संक्रमण को दूर करने में प्रभावी है भारंगी - 
कृमि संक्रमण की समस्या लोगों में बहुत आम है। मुख्य रूप से आंत में कीड़ों की समस्या ज्यादातर लोगों को हो सकती है। जिन लोगों को इस प्रकार की समस्या हो उन्हें नियमित रूप से भारंगी के काढ़े का सेवन करना चाहिए। यह संक्रमण से छुटकारा दिलाने में आपकी मदद कर सकता है।

लिम्फ नोड की समस्याओं में फायदेमंद है भारंगी - 
लिम्फ नोड्स को प्रभावित करने वाली सबसे आम स्थितियों में से एक है लिम्फैडेनोपैथी। इस स्थिति में लिम्फ नोड्स बढ़ जाते हैं और लिम्फ नोड्स में सूजन की समस्या हो सकती है। इस तरह की सूजन को दूर करने के लिए भारंगी के पत्तों का पेस्ट प्रयोग में लाया जाता है। यह सूजन के साथ दर्द को कम करने में भी सहायक है।

भारंगी की खुराक और इसके दुष्प्रभाव - 
भारंगी औषधि किस तरह से हमारे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है यह आपने उपरोक्त पंक्तियों में जाना। अब सवाल यह उठता है कि इतने सारे लाभ को समाहित किए हुए इस औषधि के उपयोग से क्या किसी प्रकार के नुकसान भी हो सकते हैं? इस बारे में जानकारों का कहना है कि भारंगी को लेकर अब तक किए गए अध्ययनों में किसी भी दुष्प्रभाव की बात सामने नहीं आई है। हां यदि आप पहले से किसी बीमारी की दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो भारंगी को उपयोग में लाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें। वहीं विशेषज्ञ भारंगी की तीन-छह ग्राम की मात्रा को उपयोग में लाने की सलाह देते हैं।


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अंकोल के फायदे और नुकसान

 
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आयुर्वेद में कई सारे ऐसे पेड़ पौधे हैं जिनके सभी हिस्सों को प्रयोग में लाकर तमाम स्वास्थ्य संबंधी लाभ प्राप्त किए जाते रहे हैं। अंकोल ऐसा ही एक पौधा है। देश के ज्यादातर हिस्सों में यह बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। स्वास्थ्य संबधी कई सारी समस्याओं के उपचार के लिए अंकोल के जड़ से लेकर इसके तने तक को विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लाया जाता है। चाहे वह बीज हों या पत्ते, फल हों या तेल सभी को शरीर के लिए बेहद फायदेमंद बताया गया है। हालांकि, आयुर्वेद में विशेष रूप से अंकोल की छाल और तेल के उपयोग और लाभ के बारे में जिक्र मिलता है।

अंकोल, मुख्य रूप से दक्षिण अफ्रीका और पूर्वी एशिया में पाया जाने वाला पौधा है। फरवरी से अप्रैल के महीने में इस पौधे पर सफेद फूल आते हैं। इस पेड़ की लकड़ियों को काफी अच्छी गुणवत्ता वाला माना जाता है, जिनका कई प्रकार के कार्यों में प्रयोग किया जाता रहा है। फर्नीचर, संगीत वाद्ययंत्र और कुछ प्रकार के गहनों को बनाने में भी इसकी लकड़ियों को प्रयोग में लाया जाता रहा है। कई स्थानों पर अंकोल की लकड़ियों का प्रयोग ईंधन के रूप में भी किया जाता है। लकड़ियों के अलावा इसकी छाल, पत्ते और फल भी तमाम तरह की औष​धीय गुणों के लिए सदियों से प्रसिद्ध हैं। आइए आयुर्वेद के वरदान अंकोल के बारे में जानते हैं।
  •     वानस्पतिक नाम : एलैंगियम सैल्बीफोलियम
  •     सामान्य नाम : अंकोल
  •     मूल : एलैंगिएसियाई
  •     मूल क्षेत्र और भौगोलिक वितरण : पूर्वी एशिया और दक्षिण अफ्रीका
  •     प्रयोग में लाए जाने वाले भाग : छाल, तेल, पत्ते, जड़ और फल
  •     उपयोग : कफ और पित्त दोष को शांत करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है
जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया कि अंकोल का पौधा कई मामलों में स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। आइए इस लेख में अंकोल से होने वाले विभिन्न फायदों के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं।

अंकोल के स्वास्थ्य संबंधी लाभ - 

अंकोल अपने कई सारे चिकित्सकीय गुणों के कारण प्रसिद्ध है। इसमें समाहित ऐसे ही कुछ गुण निम्नलिखित हैं, जो इस पौधे को खास बनाते हैं।
  •     एंटीपायरेटिक : बुखार को शांत करने में सहायक
  •     एनाल्जेसिक : दर्द में राहत पहुंचाने वाला
  •     एंटी इंफ्लामेटरी : सूजन को कम करने वाला
  •     एक्सपेक्टोरॉन्ट
  •     मूत्रवर्धक
  •     लैक्सेटिव
  •     कारमिनैटिव
  •     एंटीमाइक्रोबाएल
  •     एंटीवेनम
अंकोल के फायदों के बारे में जानने के लिए अब तक कई शोध किए जा चुके हैं। ऐसे ही साल 2011 में 'जर्नल ऑफ फार्मेसी रिसर्च' में प्रकाशित एक लेख में अंकोल से होने वाले इन फायदों के बारे में बताया गया।
  • अंकोल के पत्तों के अर्क में अल्कलॉइड, टैनिन, ट्राइटरपीन और स्टेरॉयड पाए जाते हैं जो इसे एंटी-एपिलेप्टिक गुण प्रदान करते हैं। ऐसे में यह मिरगी के दौरों के शिकार लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है।
  • अंकोल की जड़ के अर्क में फेनोलिक यौगिक और फ्लेवोनॉइड जैसे यौगिक पाए जाते हैं जो इसे एंटीऑक्सिडेंट बनाते हैं।
  • अंकोल के तने और पत्तियों के अर्क में फ्लेवोनॉइड्स, टेरपेनॉइड्स, अल्कलॉइड्स और स्टेरॉयड की मौजूदगी होती है। जो इसे हाइपोग्लाइसेमिक और एंटीडायबिटिक गुण देते हैं। यह गुण मधुमेह रोग में काफी उपयोगी हो सकते हैं।
  • अंकोल की पत्तियों में फेनोलिक यौगिक, फ्लेवोनॉइड और अल्कलॉइड जैसे यौगिक होते हैं जो घाव को आसानी से भरने में मदद कर सकते हैं।
  • अंकोल के तनों की छाल में अल्कलॉइड, स्टेरॉयड और टैनिन की उपस्थिति होती है जो इसे एंटीआर्थराइटिक बनाती है। ऐसे में जिन लोगों को गठिया की समस्या होती है, उनके लिए अंकोल का प्रयोग करना फायदेमंद हो सकता है।
  • अंकोल के फूलों में मेथिल-1 एच-पाइरीमिडीन-2, 4-डायोन और 3-ओ-बी-डी-ग्लूकोपरानोजिल-(24ß)- एथाइलचोलस्टा-5,25,25-ट्राइनी जैसे रसायन पाए जाते हैं जो इसे जीवाणुरोधी गुण प्रदान करते हैं।
  • अंकोल के फूलों के रस के काढ़ा और इसकी जड़ों के अर्क में फेनोलिक ग्लाइकोसाइड्स और सालविफोसाइड्स यौगिक पाए जाते हैं। इनकी उपस्थिति के कारण अंकोल को एंटी-इंफ्लामेटरी और हृदय को सुरक्षा देने वाले गुणों से युक्त माना जाता है। 
  • अंकोल के पौधे की जड़ों को मूत्रवर्धक (मूत्र उत्पादन में वृद्धि), एनाल्जेसिक (दर्द निवारक) और एंटी-इंफ्लेमेटरी (सूजन को खत्म करने वाला) और एंथलेमिंटिक (डीवर्मिंग) के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता रहा है।

इसके अलावा अनुसंधानों से पता चलता है कि अंकोल मच्छरों को नियंत्रित करने में भी काफी प्रभावी होता है। यह औषधि विशेष रूप से डेंगू और जीका वायरस के मच्छरों को रोकने में सहायक हो सकती है। चूंकि अंकोल की पत्तियों के अर्क में मेथनॉलिक सहित आठ यौगिक पाए जाते हैं जो इसे मच्छरों से सुरक्षा देने वाले गुणों से युक्त करते हैं। आइए लेख में आगे जानते हैं कि यह औषधि और किन-किन स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों के लिए फायदेमंद हो सकती है।

गठिया रोगियों के लिए अंकोल का उपयोग है लाभदायक - 

गठिया की समस्या लोगों के सामान्य जीवन को प्रभावित कर देती है। इसके कारण सामान्य रूप से चलना और उठना-बैठना कठिन हो जाता है। जिन लोगों को गठिया की समस्या होती है उनके जोड़ों में सूजन और कठोरता आ जाती है। ऐसे लोगों के लिए अंकोल फायदेमंद हो सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अंकोल की जड़ों में एंटी-इंफ्लामेटरी और एनाल्जेसिक गुण होते हैं जो गठिया के कारण होने वाले जोड़ों के दर्द से राहत प्रदान कर सकता है। यदि किसी कारणवश इसकी जड़ें न मिल पाएं तो उसकी जगह पर इसकी छाल का उपयोग किया जा सकता है।

फ्लू के इलाज के लिए करें अंकोल का प्रयोग - 

अंकोल में कुछ ऐसे गुण होते हैं जो इन्फ्लुएंजा (फ्लू) नियंत्रित करने में सहायक हो सकते हैं। जिन लोगों को फ्लू की समस्या होती है, उन्हें ठंड लगने, बुखार, पसीना आने, नाक बहने और शरीर में दर्द जैसे लक्षणों का अनुभव होता है। ऐसी स्थिति में इसकी जड़ों को प्रयोग में लाया जाता है। माना जाता है कि अंकोल की जड़ों का तमाम प्रकार से सेवन करने से फ्लू के लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है।

सांप काटने या बिच्छू के डंक मारने में एंटीडोट का काम करता है अंकोल - 

सांप काटने से फैला जहर कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है जैसे
  •     सिस्टमेटिक माइलोसि​स या मांसपेशियों को नुकसान
  •     फ्लासिड पैरालिसिस
  •     कोआगुलोपैथी या खून जमने की समस्याएं
  •     हेमरेज या नकसीर
  •     कार्डियोटॉक्सिसिटी
  •     किडनी फेलियर या किडनी को क्षति
  •     मृत्यु का खतरा
सांप काटने जैसी गंभीर स्थितियों में रोगी को त्वरित उपचार की आवश्यकता होती है। इसको ध्यान में रखते हुए देशभर के स्वास्थ्य केंद्रों में एंटीवेनम उपलब्ध हैं, जो सांप के जहर के प्रभाव को कम कर सकती हैं। हालांकि, देश में अब भी कई हिस्से ऐसे हैं जहां लोगों के लिए सुगमता के साथ औपचारिक स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती है। ऐसे स्थानों पर लोगों के लिए अंकोल काफी प्रभावी औषधि हो सकती है।

'इंटीग्रेटिव मेडिसिन रिसर्च जर्नल' में प्रकाशित शोध के अनुसार जिन लोगों को सांप काट ले, उन्हें लगभग 15 ग्राम अंकोल की छाल, 10-12 काली मिर्च और 60 ग्राम एनिमल फैट के साथ मिश्रित करके हर दो घंटे में देनी चाहिए। यह सर्पदंश को ठीक करने में प्रभावी परिणाम दे सकता है। इसके अलावा जड़ और छाल के काढ़े के सेवन की भी सलाह दी जाती है। 

इस लेख में शोधकर्ताओं ने सर्पदंश की स्थिति में कुछ अन्य उपचारों की सलाह भी दी है।
  •     सप्तपर्णी के छाल का काढ़ा
  •     सेन्ना की पत्तियां
  •     नागरमोथा की जड़ का काढ़ा
  •     आंवले की जड़ के रस के साथ काली मिर्च का उपयोग
  •     सहजन की छाल
सांप और बिच्छू के जहर के लिए एंटीडोट के रूप में अंकोल के प्रभाव और कार्य तंत्र के बारे में अभी और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है।

कुत्ते या अन्य जानवरों के काटने में अंकोल का प्रयोग है प्रभावी - 

कुत्तों या किसी अन्य जानवर का काटना सामान्य है, ऐसे में तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है। यदि तुरंत चिकित्सालय पहुंचना संभव न हो तो ऐसी स्थिति में अंकोल का पौधा आपके लिए त्वरित उपचार के रूप में काम कर सकता है। कुत्ते के काटने के मामले में अंकोल की जड़ और छाल का पेस्ट बनाकर प्रभावित हिस्से में लगाने से लाभ मिलता है।

यहां ध्यान देने की आवश्यकता है कि यह उपाय डॉक्टरी इलाज और दवाओं का विकल्प नहीं है, इसे शुरुआती रूप से प्रयोग में लाने से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। डॉक्टर से यह भी पूछें कि क्या दवाओं के साथ अंकोल के पेस्ट को प्रभावित हिस्से पर लगाना या इसका सेवन करना चाहिए? ऐसा भी संभव है कि अंकोल के औषधीय गुण, डॉक्टर की सुझाई दवाइयों के प्रभाव को कम कर दें। ऐसे में बिना सलाह के किसी भी औषधि को प्रयोग में न लाएं।

लिवर की बीमारियों और पीलिया को कम करने के लिए अंकोल का सेवन - 

अंकोल को लिवर संबंधी तमाम बीमारियों को ठीक करने के लिए प्रभावी माना जाता है। इतना ही नहीं यह पीलिया को नियंत्रित और ठीक करने में भी उपयोगी औषधि हो सकती है। जिन लोगों को पीलिया की समस्या होती है उन्हें अंकोल की जड़ और छाल से बने पाउडर के सेवन की सलाह दी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह न केवल बिलीरुबिन के स्तर को कम करने में उपयोगी है साथ ही यह लिवर की सूजन को भी नियंत्रित करने में मदद करती है। लिवर से संबंधित तमाम बीमारियों के उपचार के लिए सदियों से आयुर्वेद में अंकोल का प्रयोग किया जाता रहा है।

सिरदर्द से छुटकारा पाने के लिए करें अंकोल का प्रयोग - 
अंकोल के तेल की उपयोगिता के बारे में आयुर्वेद में जिक्र मिलता है। विशेषरूप से सिरदर्द जैसी समस्याओं को ठीक करने में इसे बेहद असरकारक औषधि माना जाता है। जिन लोगों को सिर में दर्द हो, उन्हें अंकोल के तेल से मालिश करने की सलाह दी जाती है। आमतौर पर अश्वगंधा के साथ संयोजन में इसका उपयोग किया जाता है।

कामोत्तेजक प्रभावों के लिए अंकोल का प्रयोग - 
कई प्रकार की शरीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के चलते कामेच्छा में कमी आ जाती है। हालांकि, इसका लंबे समय तक बने रहना चिंता का​ विषय हो सकता है। जिन लोगों को इस तरह की समस्या होती है उनके लिए अंकोल का सेवन फायदेमंद माना जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अंकोल का फल एक शक्तिशाली कामोत्तेजक होता है। इसका सेवन करने से यौन उत्तेजना में कमी और स्तंभन दोष जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है। इन गुणों के आधार पर अंकोल को कामोत्तेजक भी माना जाता है।

अंकोल की खुराक और इसके साइड इफेक्ट्स - 
आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन यदि नियत मात्रा में किया जाए तो यह काफी प्रभावी होता है। हालांकि, इसकी खुराक बिगड़ने पर कई तरह के साइड इफेक्ट्स का भी खतरा रहता है। विशेषज्ञों के मुताबिक अंकोल की एक दिन में 2,000 मिलीग्राम से कम की खुराक सुरक्षित हो सकती है। हालांकि, यदि इसका ओवरडोज हो जाए तो इसके निम्नलिखित दुष्प्रभाव हो सकते हैं :
  •     सरदर्द
  •     जी मिचलाना
  •     अनिद्रा
  •     भूख में कमी
  •     पेट में तकलीफ या जलन होना
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए इसका नियत मात्रा में सेवन किया जाना चाहिए। यदि आप पहले से ही किसी बीमारी की दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो अंकोल को उपयोग में लाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें। संभव है कि इसके औषधीय गुण नियमित दवाओं के प्रभाव को बाधित कर दें।

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वरुण के फायदे और नुकसान

 
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भारत में आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा का इतिहास शास्त्रों और पुराणों में मिलता है। सदियों से तमाम प्रकार की आयुर्वेदिक औषधियों का उपयोग करते हुए लाभ प्राप्त किया जा रहा है। जो लोग अपने दैनिक जीवन में भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली के सिद्धांतों का पालन करते हैं, वे वरुण औषधि के नाम से परिचित होंगे। इस पौधे के तमाम हिस्सों को प्रयोग में लाया जाता है। वरुण के पौधे को 'क्राटाइवा नूरवाला' के नाम से जाना जाता है। इस पौधे की सबसे खास बात यह है कि न सिर्फ आयुर्वेद बल्कि यूनानी और सिद्ध चिकित्सा प्रणालियों में भी इसका जिक्र मिलता है। गुर्दे की पथरी के इलाज से लेकर मूत्र पथ में संक्रमण तक की कई बीमारियों के इलाज में वरुण को प्रभावी औषधि माना जाता है।

वरुण की उपयोगिता और इसके औषधीय लाभ के बारे में जानने के लिए कई शोध किए जा रहे हैं। भारत में बहुतायत मात्रा में पाए जाने वाले इस पौधे के बारे में आइए विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।

वरुण से संबंधित सामान्य जानकारी

वैज्ञानिक नाम : क्राटीवा नरवाला, सी.मैग्ना
संस्कृत नाम : सेतुवृक्ष, रोध वृक्ष, साधु वृक्ष, वरण, वसन, कुमारका, तमालका, बारहपुष्प, अजपा, सेतु, सेतुका
सामान्य नाम : बरना, बरुण, बिला, बिलासी, बिलियाना, लेंगम ट्री, थ्री-लीव्ड केपर, सेक्रड लिंगम ट्री, ट्रायून लीफ ट्री
मूल : कैपरिडैसी, कैपरैसी, केपर फैमिली
मूल क्षेत्र और भौगोलिक वितरण : म्यांमार, दक्षिण एशिया और इंडो-मलेशियन क्षेत्रों में पाया जाता है।
उपयोग किए गए भाग : जड़, तने की छाल, फूल, पत्तियां
गुण : सामान्य रूप से वरुण के पौधे का स्वाद कसैला और कड़वा होता है। इसे पचाना आसान होता है। इसकी तासीर गर्म होती है और यह वात दोष के निवारण के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है।

वरुण का पौधा सामान्य रूप से मध्यम आकार का होता है और यह देश के ज्यादातर हिस्सों जैसे गुजरात, बिहार, ओडिशा, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। वरुण का पौधा आमतौर पर नदियों के किनारे उपजता है और हल्के सफेद और हल्के पीले रंग के फूलों के गुच्छों से लदा हुआ दिखाई देता है। इसके फल जामुन के जैसे होते हैं और पकने के बाद इनका रंग लाल हो जाता है। इन फलों को कई प्रकार के स्वास्थ्य लाभ हेतु प्रयोग में लाया जाता है। आइए जानते हैं कि वरुण हमारे स्वास्थ्य के लिए किस प्रकार से फायदेमंद हो सकता है।

वरुण के फायदे - 

वरुण कई प्रकार से हमारे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद औषधि है। संस्कृत में इसके नाम का अर्थ भी होता है 'कुछ ऐसा जो लोगों के लिए फायदेमंद हो'। वहीं सेतुवृक्ष और मरुतपहा का अर्थ है 'रोगों का निवारण करने वाला'। रामनाथपुरम, कोयम्बटूर स्थित 'इंटरनैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद' के फिजियोलॉजी और एथनोबायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर वाई.एस. प्रभाकर और डी सुरेश कुमार के अुनसार मूत्राशय की पथरी के इलाज के लिए वरुण काफी प्रभावी औषधि है। वरुण मूत्रवर्धक गुणों से युक्त होता है जो रक्त को साफ करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें लैक्सेटिव गुण भी मौजूद होते हैं जो कब्ज के रोगियों के लिए काफी लाभकारी माना जाता है। इसके अलावा इस पौधे में एंटी-इंफ्लामेटरी गुण भी पाए जाते हैं जो जोड़ों के दर्द और सूजन को कम करने में सहायक हो सकते हैं।

आइए निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से जानते हैं कि वरुण का पौधा और किन-किन मामलों में हमारे स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है।

वरुण के फायदे किडनी की पथरी में - 

वरुण को किडनी और मूत्राशय की पथरी को दूर करने वाली प्रभावी औषधि के रूप में जाना जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक वरुण वृक्ष की छाल को प्रयोग में लाकर मूत्र मार्ग की पथरी को निकालने में मदद मिल सकती है। इसकी प्रमाणिकता को जानने के लिए 46 लोगों पर एक अध्ययन किया गया। इसमें गुर्दे की पथरी, मूत्रमार्ग की पथरी और पित्ताशय की पथरी वाले रोगियों को शामिल किया गया। चिकित्सकों ने पाया कि 26 लोगों ने वरुण की छाल के काढ़े का सेवन किया, उनकी पथरी चार महीने के भीतर ही बाहर निकल गई। इसके पीछे विशेषज्ञों ने पाया कि चूंकि वरुण में मूत्रवर्धक गुण होते हैं जो शरीर में मूत्र के उत्पादन को बढ़ा देता है। इस स्थिति में पेशाब के साथ शरीर से छोटी पथरियां बाहर आ जाती हैं।

साल 2008 में 'जर्नल ऑफ हर्ब्स, स्पाइसेस एंड मेडिसिनल प्लांट्स' में प्रकाशित एक शोध में बताया गया कि वरुण की जड़ की छाल में लूप्योल पाया जाता है। यह एक पेंटासाइक्लिक ट्राइटरपेन भी होता है, जो उन खनिजों के जमाव को कम कर सकता है, जो पथरी का कारण बनते हैं। इस आधार पर विशेषज्ञों ने पाया कि वरुण किडनी और पेशाब की पथरी को निकालने की प्रभावी औषधि हो सकती है।

यूरोलिथियासिस शब्द का प्रयोग मूत्र मार्ग में बनने वाली पथरी के लिए किया जाता है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में किए गए नैदानिक अध्ययनों से पता चलता है कि वरुण यूरोलिथियासिस के साथ-साथ, क्रोनिक मूत्र संक्रमण, प्रोस्टेटिक हाइपरट्रॉफी (प्रोस्टेट में वृद्धि जो मूत्रमार्ग में रुकावट पैदा कर सकता है) और न्यूरोजेनिक ब्लेडर (तंत्रिका तंत्र या रीढ़ की समस्याओं के कारण मूत्र को नियंत्रित करने में होने वाली समस्या) जैसी स्थितियों के उपचार में प्रभावी साबित हो सकता है। अध्ययन के लिए जब यूरोलिथियासिस रोगियों को वरुण की छाल का काढ़ा दिया गया तो विशेषज्ञों ने पाया कि यह मूत्र में कैल्शियम के उत्सर्जन को कम करने में भी मदद करता है। यह मूत्र में मैग्नीशियम और सोडियम के अनुपात में भी परिवर्तन करता है, जो मूत्र मार्ग की पथरी का कारण बन सकता है।

वरुण के फायदे मूत्रमार्ग के संक्रमण में - 

अब तक हुए कई शोध में पाया गया है कि वरुण का सेवन मूत्रमार्ग के संक्रमण (यूटीआई) को ठीक करने में काफी प्रभावी परिणाम दे सकता है। चूंकि इस पौधे में एंटी-इंफ्लामेटरी और एंटी माइक्रोबायल गुण पाए जाते हैं, जो इसे इस प्रकार के रोगों के निवारण में असरदार बनाता है। जिन लोगों को यूटीआई की समस्या होती है, उन्हें जलन (योनि में जलन और लिंग में जलन) का अनुभव हो सकता है। इस प्रकार की जलन को नियंत्रित करने में भी वरुण का सेवन मदद कर सकता है। इतना ही नहीं यह मूत्र प्रवाह को बढ़ाने में भी मदद करता है। जिन लोगों को यूटीआई की समस्या होती है, उन्हें भोजन के बाद शहद के साथ 1-1/5 चम्मच वरुण पाउडर के सेवन की सलाह दी जाती है। यहां ध्यान देने की आवश्यकता है कि यह उपाय डॉक्टरी चिकित्सा का विकल्प नहीं है। यदि आपको पेशाब करते समय जननांग में खुजली या जलन, बार-बार पेशाब आना, बुखार या यूटीआई के अन्य लक्षण दिखाई देते हैं, तो तत्काल डॉक्टर से इलाज के लिए संपर्क करें। डॉक्टर की सलाह के आधार पर ही हर्बल उपचार को प्रयोग में लाना चाहिए।

वरुण के फायदे एंटी-एजिंग में - 

वरुण के पौधे की प्रकृति तैलीय होती है। यह वात दोष को कम करने में मदद करता है, जिसके परिणामस्वरूप शुष्क त्वचा, त्वचा में नमी की कमी, झुर्रियां और समय से पहले बूढ़ापे के लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। चेहरे की झुर्रियों को नियंत्रित करने के लिए वरुण की छाल के पाउडर को नारियल के तेल में मिलाकर इसके पेस्ट को प्रभावित हिस्से पर लगाने से लाभ मिल सकता है। अपने कसैले स्वाद के कारण वरुण रक्त को शुद्ध करने, मुहांसे या फोड़े जैसी त्वचा की समस्याओं को रोकने में भी मददगार हो सकता है।

वरुण के फायदे करें मेटाबॉलिज्म को बेहतर - 

वरुण में मौजूद औषधीय गुण पित्त दोष (मेटाबॉलिज्म से संबंधी विकार) के इलाज में फायदेमंद हो सकता है। यह लिवर को ठीक से काम करने में सक्षम बनाता है और अतिरिक्त बिलीरुबिन की मात्रा को शरीर से बाहर करने में मदद करता है। मेटाबॉलिज्म ठीक रहने से भोजन का ठीक तरीके से पाचन होता है और यह वजन घटाने में भी सहायता करता है।

वरुण के लाभ - 
वरुण के लाभ गाउट की समस्याओं में - 
जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया है कि वरुण के पौधे में एंटी-इंफ्लामेटरी गुण पाए जाते हैं जो गाउट की समस्या को ठीक करने में सहायक हो सकते हैं। आयुर्वेद के अनुसार वात दोष के असंतुलन के कारण गाउट की समस्या होती है, जिसके परिणामस्वरूप प्रभावित हिस्से में सूजन और जलन हो सकती है। वरुण, वात दोष को संतुलित करने के साथ और सूजन को कम करने में भी मदद करता है।

वरुण के लाभ भूख न लगने की समस्या में - 
वरुण को दैनिक आहार में शामिल करने से भूख की समस्या को ठीक करने में मदद मिल सकती है। आयुर्वेद के अनुसार, अग्निमांद्य या पाचन तंत्र में गड़बड़ी के कारण भूख न लगने की समस्या हो सकती है। पित्त, कफ और वात दोषों के बढ़ने के कारण भोजन के पाचन संबंधी समस्या होती है, जो भूख की कमी का कारण बनती है। ऐसे लोगों के लिए वरुण काफी प्रभावी औषधि होती है। वरुण, भोजन के पाचन को ठीक करने और भूख में सुधार करने में मदद करता है। पौधे में दीपन या क्षुधावर्धक गुण पाए जाते हैं, यही कारण है कि यह भूख की समस्याओं को ठीक करने में प्रभावी परिणाम दे सकता है। वरुण से लाभ प्राप्त करने के लिए आप अपने दैनिक आहार में वरुण के पाउडर को शहद के साथ मिलाकर सेवन कर सकते हैं। हालांकि, जिन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर की समस्या होती है उन्हें केवल डॉक्टर से सलाह के आधार पर ही इसे उपयोग में लाना चाहिए।

वरुण के लाभ फोड़ों को ठीक करने में - 
शरीर के ऊतकों में मवाद बनने के साथ फोड़े होने की समस्या होती है। इसके कारण लालिमा, दर्द और सूजन जैसी परेशानियां हो सकती हैं। आयुर्वेद शास्त्र के मुताबिक वात और पित्त दोषों के असंतुलन के कारण फोड़ा होता है, जो बाद में सूजन और मवाद बना देता है। वरुण के पौधे में वात दोष के संतुलन के गुणों के अलावा सोथार (एंटी इंफ्लामेटरी) और कषाय (कसैलापन) गुण होते हैं जो फोड़े को ठीक करने में प्रभावी हो सकते हैं। यह सूजन को कम करने में मदद करने के साथ और भविष्य में फोड़े-फुंसियों को भी रोकता है। फोड़े-फुंसियों को दूर करने के लिए प्रभावित हिस्से में वरुण की छाल के पाउडर को नारियल के तेल के साथ पेस्ट बनाकर लगाने से लाभ मिलता है।

वरुण के लाभ मधुमेह रोगियों के लिए - 
वरुण की छाल में एंटी डायबिटिक गुण होते हैं। यह इंसुलिन और ब्लड शुगर के स्तर के अतिरिक्त स्राव को कम करने में मदद कर सकता है। इस गुण के आधार पर विशेषज्ञों का मानना है कि वरुण डायबिटीज के रोगियों के लिए फायदेमंद हो सकता है।

वरुण के औषधीय गुण - 
वरुण के औषधीय गुण करें कब्ज की परेशानी को दूर - 
वरुण के पौधे में मौजूद लैक्सेटिव गुण, इसे कब्ज से राहत देने में मददगार औषधि बनाता है। यह मल के निष्कासन को आसान बनाने के साथ बाउल मूमेंट को ठीक करने में काफी असरकारक हो सकता है। वरुण के पौधे में मौजूद दीपन (क्षुधावर्धक) और पाचन गुण, भोजन को पचाने में मदद करने के साथ शरीर में विषाक्त पदार्थों के निर्माण को रोकते हैं। इन औषधीय गुणों के आधार पर कहा जा सकता है कि वरुण का सेवन कब्ज और पेट की बीमारियों के निवारण में फायदेमंद हो सकता है।

वरुण के औषधीय गुण करें घावों को भरने में मदद - 
वरुण, घावों को जल्दी भरने में मदद कर सकता है। इसके लिए वरुण की छाल के पाउडर को त्वचा के प्रभावित हिस्से पर लगाने की सलाह दी जाती है। यह सूजन को कम करने और त्वचा की सामान्य बनावट को पुर्नस्थापित करने में मदद करती है। वरुण के पौधे में मौजूद रोपन गुण इसे ऐसा करने में मदद करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक घावों को ठीक करने के लिए नारियल के तेल में 1-1/5 टी स्पून वरुण की छाल का पाउडर मिलाकर पेस्ट बनाएं और इस पेस्ट को प्रभावित हिस्से पर लगाने से लाभ मिलता है।

वरुण के औषधीय गुण करें रक्तस्राव विकारों को ठीक - 
वरुण के पौधे के तमाम हिस्सों को अनेक प्रकार की समस्याओं को ठीक करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है। ऐसे ही वरुण का फूल रक्तस्रावी विकारों जैसे कि मलाशय से खून आना, नाक से खून आना और मेनोरेजिया (मासिक धर्म से बहुत अधिक खून बहना) की समस्याओं के उपचार में प्रभावी परिणाम दे सकता है। आयुर्वेद शास्त्र के मुताबिक शरीर की सभी समस्याओं को वात, पित्त और कफ के बीच संतुलन बनाकर नियंत्रित किया जा सकता है। वरुण का सेवन वात (रक्त प्रवाह, अपशिष्टों को बाहर करने, सांस), पित्त (बुखार और मेटाबॉलिज्म संबंधी विकार) और कफ (जोड़ों के ल्यूब्रिकेशन, त्वचा की नमी, घाव भरने) को संतुलित करने में मददगार पाया गया है। ऐसे में माना जाता है कि यह रक्तस्राव विकारों को ठीक करने में भी प्रभावी परिणाम दे सकता है।

वरुण के औषधीय गुण करें दस्त की समस्या को ठीक - 
एक अध्ययन में पाया गया है कि वरुण के तने की छाल का अर्क बार-बार होने वाले दस्त और आंत के संक्रमण को ठीक करने में सहायक हो सकता है। जिन लोगों को बार-बार दस्त हो रहे हों उन्हें इसका सेवन करने से लाभ मिल सकता है। हालांकि, इसके सेवन के संबंध में डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें।

वरुण के औषधीय गुण करें गठिया और जोड़ों के दर्द को कम - 
वरुण के पौधे में एंटी इंफ्लामेटरी गुण होते हैं, जो गठिया और रूमेटाइड आर्थराइटिस के रोगियों के लिए फायदेमंद हो सकता है। इसका उपयोग जोड़ों के दर्द और जोड़ों की कठोरता की समस्या को कम करने में मदद कर सकता है।

वरुण के नुकसान - 
वरुण के पौधे में मूत्रवर्धक गुण होते हैं ऐसे में जो लोग उच्च रक्तचाप के इलाज के लिए पहले से ही मूत्रवर्धक दवाओं का सेवन कर रहे हैं, उन्हें इसके उपयोग से पहले डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए। इसके अलावा यदि आप गर्भवती हैं या गर्भ धारण की तैयारी कर रही हैं तो भी हर्बल उपचार के उपयोग से पहले चिकित्सीय सलाह जरूर लें। पौधे के औषधीय गुण, पहले से चल रही दवाइयों के प्रभाव को कम कर सकते हैं इसके लिए सेवन से पहले चिकित्सक की सलाह महत्वपूर्ण हो जाता है।
  • अब तक वरुण पौधे के अर्क का होम्योपैथिक दवाओं के साथ हस्तक्षेप के मामले नहीं देखे गए हैं। फिर भी यदि आप होम्योपैथिक दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो वरुण के उपयोग से पहले डॉक्टर से बात जरूर करें।
  • हम में से ज्यादातर लोग पर्याप्त पोषण के लिए मल्टीविटमिन की गोलियां और ओमेगा-3 फैटी एसिड की खुराक लेते हैं। वरुण इन सप्लीमेंट के असर को प्रभावित नहीं करता है, लेकिन यदि आप एक दिन में एक से अधिक सप्लीमेंट ले रहे हैं, तो किसी भी संभावित दुष्प्रभावों से बचने के लिए डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
  • जो लोग नियमित तौर पर एलोपैथिक दवाओं का सेवन करते हैं, उन्हें अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए कि उनके लिए आयुर्वेदिक उपचार लेना सुरक्षित है या नहीं? कुछ आयुर्वेदिक जड़ी- बूटियां दवाइयों के साथ रिएक्शन कर सकती हैं। किसी भी प्रतिकूल प्रतिक्रिया से बचने के लिए आयुर्वेदिक उपचार लेने के बारे में डॉक्टर से सलाह लें।
वरुण की खुराक और उपयोग का तरीका - 
औषधियों का सही मात्रा में सेवन करना बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक वरुण की छाल से बने काढ़े को प्रतिदिन 12-50 मिलीलीटर की मात्रा में लिया जा सकता है। हालांकि, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आयुर्वेदिक या सिद्ध चिकित्सक आपके लिए स्वास्थ्य स्थितियों को देखते हुए कितनी मात्रा निर्धारित करते हैं। इसके अलावा करीब आधा चम्मच वरुण की छाल के पाउडर के सेवन की सलाह दी जाती है। ध्यान रहे, स्वास्थ्य के आधार पर वरुण की मात्रा को जानने के लिए डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें। 

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नागरमोथा के फायदे और नुकसान

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आधुनिक समय में एक बार फिर से आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हो रहा है। इसकी मुख्य वजह आधुनिक शोधकर्ताओं द्वारा प्राकृतिक उपचारों के फायदों को लेकर लगातार किए जा रहे शोध हैं। हाल के समय में वैज्ञानिकों का जिन औषधीय पौधों ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया है उन्ही में से एक है - नागरमोथा का पौधा या 'साइप्रस रोटंडस' के नाम से भी जाना जाता है। यह एक प्रकार का खरपतवारनुमा पौधा होता है जो दुनिया के कई हिस्सों में पाया जाता है। अलग-अलग हिस्सों में इसे विभिन्न नामों (पर्पल नटसेज, नटग्रास और जावाग्रास) से जाना जाता है। आयुर्वेद में इस पौधे का जिक्र कई सारी बीमारियों जैसे पेट और आंत संबंधी समस्याओं, दर्द से राहत दिलाने और सूजन को कम करने के लिए किया जाता रहा है। कुछ जानकारों का मानना है कि नागरमोथा का तेल लगाने से बालों के विकास को भी बढ़ावा मिलता है।

आयुर्वेद शास्त्र में इस औषधि के तमाम प्रकार के लाभ का जिक्र मिलता है। हालांकि, इनके आधुनिक विज्ञान के परीक्षण की आवश्यकता है। आइए नागरमोथा औषधि के बारे में विस्तार से जानते हैं।

नागरमोथा के बारे में सामान्य जानकारी

वैज्ञानिक नाम : साइप्रस रोटंडस
फैमिली : साइपरेसी
संस्कृत नाम : भद्रमुस्त, ग्रंथी, कच्छडा, मुस्ता, मुस्तको, सुगंधी-ग्रन्थिला
सामान्य नाम : नागरमोथा, गिंबल (मराठी), कोरई (तमिल), तुंगगड़ी (तेलुगु)
प्रयोग में लाए जाने वाले हिस्से : राइजोम (तने), कंद, फूल
मूल : भारत
भौगोलिक वितरण : उष्णकटिबंधीय, उपोष्णकटिबंधीय या शीतोष्ण जलवायु वाले देशों में यह बहुतायत में पाया जाता है

जैसा कि उपरोक्त पंक्तियों में बताया गया है कि यह पौधा खरपतवार नुमा दिखाई देता है, जिसकी ऊंचाई 7-40 सेमी के करीब की होती है। इसकी जड़ें रेशेदार होती हैं और यह मुख्य रूप से राइजोम (मोडिफाइड स्टेम) द्वारा प्रजनन करती है। नागरमोथा के फूल फाइटोकेमिकल्स का उत्पादन करते हैं जो प्राकृतिक रूप से कीटनाशकों के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। आइए नागरमोथा के स्वास्थ्य संबंधी लाभ और इससे होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में जानते हैं।

आयुर्वेद की दृष्टि से नागरमोथा के फायदे - 

आयुर्वेदिक चिकित्सा में पौधों और जड़ी-बूटियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। एक अनुमान के अनुसार, आयुर्वेद में 2559 पौधों का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली ही एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है, जिसमें पौधों की 6403 प्रजातियों को प्रयोग में लाया जाता रहा है। नागरमोथा के बारे में कहा जाता है कि यह भारतीय उपमहाद्वीप की उपज है, जिसे पारंपरिक चिकित्सा में निम्न समस्याओं के उपचार के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है।
  •     पाचन संबंधी समस्याएं
  •     मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द के इलाज में (और पढ़ें - मासिक धर्म में दर्द क्यों होता है)
  •     बुखार
अन्य पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में, यह दांतों की सड़न (कैविटी) को रोकने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। शोध से यह भी पता चलता है कि इस पौधे की कुछ किस्में स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटेन बैक्टीरिया के खिलाफ भी प्रभावी हो सकती हैं।

अनुसंधानों में पाया गया है कि नागरमोथा निम्न प्रकार की समस्याओं में भी फायदेमंद हो सकता है।
  •     मूत्रवर्धक (शरीर में मूत्र उत्पादन बढ़ाता है)
  •     कार्मिनेटिव (पेट फूलने की समस्या को कम करता है)
  •     एमेनोगॉग ( मासिक धर्म में सुधार करता है)
  •     कृमिनाशक (पेट के कीड़े को मारने में सहायक)
  •     एनाल्जेसिक (दर्द से राहत देता है)
  •     एंटी इंफ्लामेटरी (सूजन को कम करता है)
  •     एंटीडिसेंट्रिक (पेचिश से राहत देता है)
  •     एंटीरूमेटिक (रूमेटिक स्थितियों जैसे गठिया और जोड़ों के सूजन से राहत प्रदान करता है)
  •     रास ऑन्कोजीन से जुड़े सेल परिवर्तन को रोककर कैंसर से बचाता है।
आयुर्वेद में इन फायदों का जिक्र मिलता है, लेकिन इसके लाभ के बारे में जानने के लिए अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है।

नागरमोथा के औषधीय गुण - 

नागरमोथा के औषधीय गुण करें त्वचा रोगों का खात्मा -
जानवरों पर किए गए प्री-क्लिनिकल रिसर्च में शोधकर्ताओं ने पाया कि नागरमोथा कई तरह से त्वचा के लिए भी फायदेमंद हो सकता है। नागरमोथा में क्लोरोजेनिक एसिड पाया जाता है जो इसे एंटी इंफ्लामेटरी गुण प्रदान करता है। ऐसे में यह डर्मटाइटिस यानी जिल्द की सूजन की गंभीर और लंबे समय से चली आ रही समस्याओं को ठीक कर सकता है। हालांकि, इंसानोंं में इस लाभ की पुष्टि करने के लिए अभी और अधिक अध्ययन और मानव परीक्षण की आवश्यकता है।

कुछ शोधकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया है कि नागरमोथा राइजोम के अर्क में पाया जाने वाला वैलेनसीन रसायन त्वचा पर झुर्रियां पड़ने जैसी परेशानियों को ठीक करने में प्रभावी हो सकता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि नागरमोथा के एंटी-एजिंग की समस्या में प्रभाव को जानने के लिए अभी और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है।

नागरमोथा के औषधीय गुण दें संक्रमण से सुरक्षा - 
कई अनुसंधानों से पता चला है कि नागरमोथा में जीवाणुरोधी और एंटिफंगल गुण होते हैं। एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह एस.ऑरियस बैक्टीरिया के खिलाफ काफी प्रभावी हो सकता है। यह बैक्टीरिया त्वचा में संक्रमण, फोड़े-फुंसियों, साइनसाइटिस और फूड पॉइजनिंग जैसे संक्रमणों का कारण बन सकते हैं। इंसानोंं में इस बात को स्थापित करने के लिए और अधिक शोध व परीक्षण किए जाने की आवश्यकता है।

इसके अलावा नागरमोथा, अमृतादि क्वाथ नामक एक हर्बल फार्मूलेशन का घटक भी है जिसका उपयोग हर्पीस सिंप्लेक्स वायरल इंफेक्शन, पुराने ऑस्टियोआर्थराइटिस और रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसी समस्याओं के उपचार के लिए किया जाता है। नागरमोथा महामर्चयादि तेल का भी घटक है जो दाद संक्रमण के लिए एक आयुर्वेदिक उपचार के तौर पर प्रयोग में लाया जाता है।

नागरमोथा के औषधीय गुण करें मलेरिया को दूर - 
मलेरिया, मच्छरों के कारण फैलने वाला रोग है। भारत में इससे हर साल बहुत सारे लोग प्रभावित होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2019 में डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में मलेरिया से हुई कुल मौतों में से 86 फीसदी भारत में हुई थीं। कई सारे अनुसंधानों से पता चलता है कि नागरमोथा में एंटी मलेरिया गुण मौजूद होते हैं जो ऐसे रोगियों के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। शोध से पता चलता है कि नागरमोथा के कंद में कई सारे ऐसे रसायन पाए जाते हैं जिनमें एंटीमलेरियल गुण पाए जाते हैं।
  •     पैचोलेनन
  •     कायरोफायलीन ऑर ऑक्साइड
  •     10,12-पेरॉक्सीकैलामिनेने
  •     4,7-डाइमिथिल-एल-टेट्रालोन
इसके अलावा शोध में पाया गया है कि नागरमोथा राइजोम, गुडूची के तने और सूखे अदरक को मिलाकर बने काढ़े का सेवन करने से मलेरिया के बुखार को कम करने में मदद मिल सकती है।

नागरमोथा के फायदे - 

आयुर्वेद में नागरमोथा से होने वाले स्वास्थ्य संबंधी तमाम लाभ के बारे में जिक्र मिलता है।

नागरमोथा का राइजोम
  •     एंटीऑक्सीडेंट
  •     घावों को भरने में सहायक है (और पढ़ें - घाव ठीक करने के घरेलू उपाय)
  •     बुखार को कम करने में प्रभावी
  •     दस्त की समस्या को रोकने में मदद करता है
  •     एलर्जी रोधी या एंटी-हिस्टामाइन
  •     एंटी-हाइपरग्लाइसेमिक (ब्लड शुगर की बढ़ी हुई मात्रा को कम करता है)
  •     एंटी माइक्रोबियल
  •     एंटी कॉन्वलसेंट
  •     अल्सर से बचाता है
  •     गैस्ट्रोप्रोटेक्टिव (पेट की सुरक्षा) और हेपेटोप्रोटेक्टिव (लिवर की सुरक्षा)।
  •   कार्डियोप्रोटेक्टिव (हृदय की सुरक्षा) और एंटी-हाइपरलिपिडेमिक (हाई कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करता है)
  •     न्यूरोप्रोटेक्टिव प्रभाव (नसों की सुरक्षा करता है)
  •     एंटी-माइक्रोबियल गुण मौजूद होते हैं जो कैंडिडा और कुछ अन्य वायरस से शरीर की सुरक्षा करते हैं

नागरमोथा का ट्यूबर या कंद
  •     सूजन को कम करने में प्रभावी
  •     एंटी-ओबैसिटी या शरीर से वसा को कम करने में मदद करता है
  •     एंटी-डायरिया, जो दस्त की समस्या को कम करने में सहायक है
  •     मलेरिया रोधी
  •     हाइपोटेंसिव (रक्तचाप को कम करता है)
  •     एंटी-इमेटिक, उल्टी को रोकता है
  •     एंटी-कारियोजेनिक (दांतों को सड़न से बचाता है)।
नागरमोथा के पौधे के अलग-अलग हिस्सों में ऐसे रसायन पाए गए हैं जो इस पौधे को कई मामलों में खास बनाते हैं।

नागरमोथा के जड़ के हिस्से से निकले तेल में कोपाइन (11.4-12.1%), साइपरीन (8.4-11.7%), वेलेरिनल (8.7-9.8%), कार्योफायलीन ऑक्साइड (7.8-9.7%) और ट्रांस-पिनोकारवेओल (5.2-7.4%) जैसे रसायन पाए जाते हैं। इसकी रासायनिक संरचना इसके उपज वाले क्षेत्रों के हिसाब से भिन्न हो सकती है। जर्नल ऑफ एसेंशियल ऑयल बियरिंग प्लांट में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक नागरमोथा के जड़ के हिस्से से निकले तेल में साइपरीन, लोंगिफोलिन, कार्योफायलीन ऑक्साइड और लॉन्ग्वेरेबोन जैसे महत्वपूर्ण यौगिक पाए जाते हैं। इसकी उपज के आधार पर इसमें मौजूद यौगिकों और रसायनों की मात्रा भिन्न हो सकती है।
एंटीऑक्सिडेंट फ्लेवोनॉइड्स
टेरपेनॉइड्स : इसमें एंटी माइक्रोबियल, परजीवी रोधी गुण, एंटी-हाइपरग्लाइसेमिक, एंटी इंफ्लामेटरी और इम्यूनोमॉड्यूलेटरी गुण पाए जाते हैं।
सेस्क्यूटरपेंस : पौधे की विभिन्न प्रजातियों में प्राकृतिक रूप से कई प्रकार के सेस्क्यूटरपेंस पाए जाते हैं। मोटे तौर पर, उन्हें एंटीबायोटिक, एंटी-ट्यूमर, एंटीवायरल, साइटोटॉक्सिक, इम्यूनोसप्रेसिव, एंटीफंगल और हार्मोनल एक्टिविटी के लिए जाना जाता है।
नागरमोथा के अन्य हिस्सों में कई अन्य रसायन जैसे एसेलिन, रोटंडीन, वैलेंसीन, साइपेरल, गुर्जुनीन, ट्रांस-कैलामेनेन, कैडलीन, साइपरोअंडन, मुस्टेकोन, आइसोसाइपरोल और एसाइपरोन भी पाए जाते हैं।

उपरोक्त गुणों के अलावा आइए जानते हैं कि नागरमोथा को किन-किन स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में प्रभावी माना जा सकता है।

नागरमोथा के फायदे गठिया के रोगियों में - 

जिन लोगों को आर्थराइटिस की समस्या होती है उनके लिए नागरमोथा के उपयोग को आयुर्वेद में प्रभावी माना जाता है। नागरमोथा में ट्राइटरपेनॉइड नामक रसायनिक यौगिक पाया जाता है जो इसे एंटी- इंफ्लामेटरी गुण प्रदान करता है। यही कारण है कि नागरमोथा को गठिया के रोगियों के उपचार में प्रभावी माना जाता है। गठिया से ग्रसित जानवरों पर किए गए अध्ययन में इसके प्रभावी परिणाम देखने को मिले हैं।

एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि नागरमोथा का मेथनॉल अर्क गठिया में सुपरऑक्साइड के कारण होने वाली सूजन को कम कर सकता है। हालांकि, मनुष्यों पर यह कितना प्रभावी है, इसकी खुराक और गठिया के अन्य प्रकारों जैसे रूमेटाइड आर्थराइटिस आदि में यह कितना प्रभावी है, इस बारे में जानने के लिए अभी और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।

नागरमोथा के फायदे मधुमेह रोगियों में - 

एक लैब अध्ययन में पाया गया कि नागरमोथा का अर्क एल्फा-ग्लूकोसाइडस और एल्फा-एमाइलस के खिलाफ काफी प्रभावी परिणाम दे सकता है। ये दोनो एंजाइम कार्बोहाइड्रेट के पाचन के लिए आवश्यक होते हैं। इस आधार पर विशेषज्ञों का मानना है कि नागरमोथा राइजोम अर्क, ब्लड शुगर के स्तर को कम करने के साथ डायबिटीज को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है। हालांकि, इस लाभ की पुष्टि के लिए अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है।

चूहों पर किए गए एक अन्य लैब टेस्ट में पाया गया कि सात दिनों तक प्रतिदिन नागरमोथा अर्क की 500 मिलीग्राम/ किग्रा की मात्रा देने पर चूहों के ब्लड ग्लूकोज के स्तर में कमी देखी गई। हालांकि मनुष्यों पर इसके प्रभाव के बारे में और शोध की आवश्यकता है।

वजन बढ़ने से रोकता है नागरमोथा - 
वजन बढ़ने से रोकने में नागरमोथा का सेवन फायदेमंद हो सकता है। वैसे तो अभी तक इस औषधि को लेकर जानवरों पर ज्यादा अध्ययन हुए हैं, इसलिए इंसानों पर इसके प्रभावों के बारे में जानने के लिए अभी और अधिक शोध की आवश्यकता है। 

एक लैब टेस्ट के दौरान मोटे चूहों पर अध्ययन किया गया। इस दौरान चूहों को 60 दिनों तक नागरमोथा की जड़ का अर्क दिया गया। परिणामस्वरूप पाया गया कि औषधि ने भोजन की मात्रा को प्रभावित किए बिना वजन कम करने में मदद की।

नागरमोथा के लाभ - 
नागरमोथा के लाभ बचाएं कैंसर से - 
शोधकर्ताओं का मानना है कि नागरमोथा की प्रजाति के कई पौधों में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो कैंसर से हमारी सुरक्षा कर सकते हैं। शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन के दौरान पाया कि एक ही मूल के दो अलग अलग पौधे- साइप्रस रोटंडस और साइप्रस स्कारियोसिस में ऐसे गुण पाए जाते हैं जो ऑक्सीडेटिव क्षति को रोक सकते हैं। इसके अलावा यह कॉनेक्सिन सेल एडेसन प्रोटीन को रेगुलेट करता है जो लिवर कैंसर सहित कई अन्य प्रकार के कैंसरों से शरीर की सुरक्षा करता है। हालांकि, यह शोध चूहों पर किया गया था और इसमें नागरमोथा को हर्बल दवा के एक घटक के रूप में शामिल किया गया था। इंसानों में यह कैंसर को रोकने में कितना प्रभावी है इसे जानने के लिए और अधिक शोध किए जाने की आवश्यकता है।

नागरमोथा के लाभ भगाएं कीड़ों को - 
एक अध्ययन में पाया गया कि नागरमोथा कंद तेल में ऐसे गुण मौजूद होते हैं जो एडीज अल्बोपिक्टस मच्छरों के अंडे और लार्वा को मार सकता है। इस आधार पर शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि नागरमोथा के पौधे को प्राकृतिक रूप से मच्छरों को भगाने में प्रभावी माना जा सकता है।

एक अन्य अध्ययन में विशेषज्ञों ने पाया कि डीईईटी (एन, एन-डायथाइल-3-मिथाइलबेंजामाइड) की तुलना में नागरमोथा कंद का अर्क अधिक प्रभावी परिणाम दे सकता है। यह डीईईटी की तुलना में मलेरिया और लिंफैटिक फिलारियासिस जैसे रोगों के वाहक मच्छरों को भगाने में असरकारक साबित हो सकता है। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि नागरमोथा, ऑर्गेनोफॉस्फेट की तरह प्रभावी है और यह चींटियों को बेहतर तरीके से मार सकती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि नागरमोथा ट्यूबर से प्राप्त तेल को भी कीटों को मारने के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है।

नागरमोथा के लाभ बालों के झड़ने की समस्या करें दूर - 
नागरमोथा औषधि को बालों के लिए प्रभावी पाया गया है। चूहों पर किए गए एक अध्ययन में विशेषज्ञों ने पाया कि नागरमोथा का अर्क हेयर फॉलिकल्स को बढ़ाने के साथ बालों के सक्रिय विकास में मदद करता है। ऐसे में जिन लोगों को बालों के झड़ने की समस्या हो उनमें यह औषधि उपयोगी साबित हो सकती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह एलोपेसिया को ठीक करने में भी सहायक हो सकता है।

नागरमोथा के अन्य उपयोग - 
उपरोक्त लाभ के अलावा नागरमोथा को कई अन्य कार्यों के लिए प्रयोग में लाया जा सकता है। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं।

  • इत्र और साबुन में भी इसको प्रयोग में लाया जाता है
  • मलेरिया और टाइफाइड की बीमारी में बुखार को कम करने के लिए भी नागरमोथा को प्रभावी औषधि माना जाता है। टाइफाइड बुखार को कम करने के लिए के लिए नागरमोथा राइजोम, फुमारिया इंडिका (पितपापड़ा), र्स्वेतिया चिरायता, काली मिर्च और अदरक से बने काढ़े को प्रयोग में लाने की सलाह दी जाती है।
  • नागरमोथा को कब्ज के इलाज में भी असरकारक माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार जिन लोगों को कब्ज की समस्या होती है उन्हें दिन में तीन बार 25 मिलीलीटर की मात्रा में नागरमोथा राइजोम के जूस का सेवन करने से लाभ मिलता है। इसके अलावा पेचिश और पेट की समस्याओं के इलाज के लिए पारंपरिक रूप से नागरमोथा राइजोम, हरी अदरक और शहद का मिश्रण दिया जाता था।
  • ब्रेस्ट मिल्क बढ़ाने के लिए नागरमोथा के ताजे कंद को लगाने की सलाह दी जाती है।
नागरमोथा उपरोक्त स्थितियों में फायदेमंद हो सकता है। हालांकि, इससे होने वाले लाभ को जानने के लिए अभी और अधिक शोध करने की आवश्यकता है। बिना डॉक्टरी सलाह के इन उपायों को प्रयोग में नहीं लाना चाहिए। इसके अलावा यदि आपको स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या है और पहले से ही इसका इलाज चल रहा है तो किसी भी हर्बल उपचार को प्रयोग में लाने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर ले लें।

नागरमोथा की खुराक और नुकसान - 
आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन सही मात्रा में किया जाना बेहद आवश्यक होता है। नागरमोथा के संदर्भ में बात करें तो इसकी खुराक रोगी की स्थिति और उसके वजन पर निर्भर करता है। इस वजह से किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए नागरमोथा के सेवन से पहले आयुर्वेद या यूनानी चिकित्सक से परामर्श जरूर करें। इसके अलावा यदि आप पहले से किसी दवा का सेवन कर रहे हैं तो डॉक्टर से यह भी जानने की कोशिश करें कि नागरमोथा उन दवाओं को प्रभावित तो नहीं करेगा?

अब तक हुए अध्ययनों में नागरमोथा के कोई महत्वपूर्ण दुष्प्रभाव नहीं देखे गए हैं। हालांकि, ध्यान रखें कि बाजार में बिकने वाली हर्बल दवाओं में, प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पौधे की तुलना में फाइटोकेमिकल्स की अधिक मात्रा हो सकती है। ऐसे में डॉक्टरी सलाह के आधार पर ही बाजार में मिलने वाले नागरमोथा को प्रयोग में लाना चाहिए।


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