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खेचरी मुद्रा क्या है और कैसे करे ?


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खेचरी मुद्रा क्या है और ध्यान व साधना के लिए क्यों आवश्यक है?

खेचरी मुद्रा सदा ही एक गोपनीय विषय रहा है जिसकी चर्चा सिर्फ निष्ठावान एवम् गंभीर रूप से समर्पित साधकों में ही की जाती रही है। पर रूचि जागृत करने हेतु इसकी सार्वजनिक चर्चा भी आवश्यक है । ध्यानस्थ होकर योगी महात्मागण अति दीर्घ काल तक बिना कुछ खाए-पीये कैसे जीवित रहते हैं? इसका रहस्य है ….’खेचरी मुद्रा’।

ध्यान साधना में तीव्र गति लाने के लिए भी खेचरी मुद्रा बहुत महत्वपूर्ण है । ‘खेचरी’ का अर्थ है ….. ख = आकाश, चर = विचरण  ।  अर्थात आकाश तत्व यानि ज्योतिर्मय ब्रह्म में विचरण ।  जो बह्म में विचरण करता है वही साधक खेचरी सिद्ध है। परमात्मा के प्रति परम प्रेम और शरणागति हो तो साधक परमात्मा को स्वतः उपलब्ध हो जाता है। पर प्रगाढ़ ध्यानावस्था में देखा गया है कि साधक की जीभ स्वतः उलट जाती है और खेचरी व शाम्भवी मुद्रा अनायास ही लग जाती है

वेदों में ‘खेचरी’ शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है। वैदिक ऋषियों ने इस प्रक्रिया का नाम दिया — ‘विश्वमित्’। “दत्तात्रेय संहिता” और “शिव संहिता” में खेचरी मुद्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है

शिव संहिता में खेचरी की महिमा इस प्रकार है …..
“करोति रसनां योगी प्रविष्टाम् विपरीतगाम् । लम्बिकोरर्ध्वेषु गर्तेषु धृत्वा ध्यानं भयापहम् ।।”
एक योगी अपनी जिव्हा को विपरीतगामी करता है, अर्थात जीभ को तालुका में बैठाकर ध्यान करने बैठता है, उसके हर प्रकार के कर्म बंधनों का भय दूर हो जाता है

जब योगी को खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है तब उसकी गहन ध्यानावस्था में सहस्त्रार से एक रस का क्षरण होने लगता है। सहस्त्रार से टपकते उस रस को जिव्हा के अग्र भाग से पान करने से योगी दीर्घ काल तक समाधी में रह सकता है, उस काल में उसे किसी आहार की आवश्यकता नहीं पड़ती, स्वास्थ्य अच्छा रहता है और अतीन्द्रीय ज्ञान प्राप्त होने लगता है

आध्यात्मिक रूप से खेचरी सिद्ध वही है जो आकाश अर्थात ज्योतिर्मय ब्रह्म में विचरण करता है। साधना की आरंभिक अवस्था में साधक प्रणव ध्वनी का श्रवण और ब्रह्मज्योति का आभास तो पा लेता है पर वह अस्थायी होता है।  उसमें स्थिति के लिए दीर्घ अभ्यास, भक्ति और समर्पण की आवश्यकता होती है

योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ध्यान करते समय खेचरी मुद्रा पर बल देते थे। जो इसे नहीं कर सकते थे उन्हें भी वे ध्यान करते समय जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर तालू से सटा कर बिना तनाव के जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जा कर रखने पर बल देते थे

वे खेचरी मुद्रा के लिए कुछ योगियों के सम्प्रदायों में प्रचलित छेदन, दोहन आदि पद्धतियों के सम्पूर्ण विरुद्ध थे। वे एक दूसरी ही पद्धति पर जोर देते थे जिसे ‘तालब्य क्रिया’ कहते हैं। इसमें मुंह बंद कर जीभ को ऊपर के दांतों व तालू से सटाते हुए जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जाते हैं। फिर मुंह खोलकर झटके के साथ जीभ को जितना बाहर फेंक सकते हैं उतना फेंक कर बाहर ही उसको जितना लंबा कर सकते हैं उतना करते हैं।

इस क्रिया को नियमित रूप से दिन में कई बार करने से कुछ महीनों में जिव्हा स्वतः लम्बी होने लगती है और गुरुकृपा से खेचरी मुद्रा स्वतः सिद्ध हो जाती है। योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी जी मजाक में इसे ठोकर क्रिया भी कहते थे । तालब्य क्रिया एक साधना है और खेचरी सिद्ध होना गुरु का प्रसाद है।

हमारे महान पूर्वज स्थूल भौतिक सूर्य की नहीं बल्कि स्थूल सूर्य की ओट में जो सूक्ष्म भर्गःज्योति: है उसकी उपासना करते थे। उसी ज्योति के दर्शन ध्यान में कूटस्थ (आज्ञाचक्र और सहस्रार के मध्य) में ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में, और साथ साथ श्रवण यानि अनाहत नाद (प्रणव) के रूप में सर्वदा होते हैं।

ध्यान साधना में सफलता के लिए हमें इन का होना आवश्यक है:—–

(1) भक्ति यानि परम प्रेम
(2) परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा
(3) दुष्वृत्तियों का त्याग
(4) शरणागति और समर्पण
(5) आसन, मुद्रा और यौगिक क्रियाओं का ज्ञान
(6) दृढ़ मनोबल और बलशाली स्वस्थ शरीर रुपी साधन

खेचरी मुद्रा की साधना की एक और वैदिक विधि के बारे में पढ़ा है पर मुझे उसका अभी तक ज्ञान नहीं है । सिद्ध गुरु से दीक्षा लेकर, पद्मासन में बैठ कर ऋग्वेद के एक विशिष्ट मन्त्र का उच्चारण सटीक छंद के अनुसार करना पड़ता है। उस मन्त्र में वर्ण-विन्यास कुछ ऐसा होता है कि उसके सही उच्चारण से जो कम्पन होता है उस उच्चारण और कम्पन के नियमित अभ्यास से खेचरी मुद्रा स्वतः सिद्ध हो जाती है


भगवान दत्तात्रेय के अनुसार साधक यदि शिवनेत्र होकर यानि दोनों आँखों की पुतलियों को नासिका मूल (भ्रूमध्य ) के समीप लाकर, भ्रूमध्य में प्रणव यानि ॐ से लिपटी दिव्य ज्योतिर्मय सर्वव्यापी आत्मा का चिंतन करता है, तो उसके ध्यान में विद्युत् की आभा के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति प्रकट होती है। अगर ब्रह्मज्योति को ही प्रत्यक्ष कर लिया तो फिर साधना के लिए और क्या बाकी बचा रह जाता है

जो योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय की गुरु परम्परा में क्रियायोग साधना में दीक्षित हैं उनके लिए खेचरी मुद्रा का अभ्यास अनिवार्य है। क्रिया योग की साधना खेचरी मुद्रा में होती है। जो खेचरी मुद्रा नहीं कर सकते उनको जीभ ऊपर को ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखनी पडती है। खेचरी मुद्रा में क्रिया योग साधना अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है 

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खेचरी मुद्रा को सिद्ध करने से मिलता है समाधि और सिद्धि

 

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मनुष्य की जीभ (जिह्वा) दो तरह की होती हैं- लंबी और छोटी। लंबी जीभ को सर्पजिह्वा कहते हैं। कुछ लोगों की जीभ लंबी होने से वे उसे आसानी से नासिकाग्र पर लगा सकते हैं और खेचरी-मुद्रा कर सकते हैं। मगर जिसकी जीभ छोटी होती है उसे तकलीफों का सामना करना पड़ता है। सबसे पहले उन्हें अपनी जीभ लंबी करनी पड़ती है और उसके लिए घर्षण व दोहन का सहारा लेना पड़ता है। जीभ नीचे की ओर से जिस नाड़ी से जुड़ी होती है उसे काटना पड़ता है।


खेचरी मुद्रा को सिद्ध करने एवं अमृत के स्राव हेतु आवश्यक उद्दीपन में कुछ वर्ष भी लग सकते हें। यह व्यक्ति की योग्यता पर भी निर्भर करता है। योग में कुछ मुद्राएं ऐसी हैं जिन्हें सिर्फ योगी ही करते हैं। सामान्यजनों को इन्हें नहीं करना चाहिए। खेचरी मुद्रा साधकों के लिए मानी गई है।

विधि- इसके लिए जीभ और तालु को जोड़ने वाले मांस-तंतु को धीरे-धीरे काटा जाता है अर्थात एक दिन जौ भर काटकर छोड़ दिया जाता है। फिर तीन-चार दिन बाद थोड़ा-सा और काट दिया जाता है।

इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा काटने से उस स्थान की रक्त शिराएं अपना स्थान भीतर की तरफ बनाती जाती हैं। जीभ को काटने के साथ ही प्रतिदिन धीरे-धीरे बाहर की तरफ खींचने का अभ्यास किया जाता है।

इसका अभ्यास करने से कुछ महीनों में जीभ इतनी लंबी हो जाती है कि यदि उसे ऊपर की तरफ लौटा (उल्टा करने) दिया जाए तो वह श्वास जाने वाले छेदों को भीतर से बंद कर देती है। इससे समाधि के समय श्वास का आना-जाना पूर्णतः रोक दिया जाता है।

लाभ- इस मुद्रा से प्राणायाम को सिद्ध करने और सामधि लगाने में विशेष सहायता मिलती है। साधनारत साधुओं के लिए यह मुद्रा बहुत ही लाभदायी मानी जाती है।

विशेषता- निरंतर अभ्यास करते रहने से जिब जब लंबी हो जाती है, तब उसे नासिका रन्ध्रों में प्रवेश कराया जा सकता है। इस प्रकार ध्यान लगाने से कपाल मार्ग एवं बिंदु विसर्ग से संबंधित कुछ ग्रंथियों में उद्दीपन होता है। जिसके परिणामस्वरूप अमृत का स्राव आरंभ होता है। उसी अमृत का स्राव होते वक्त एक विशेष प्रकार का आध्यात्मिक अनुभव होता है। इस अनुभव से सिद्धि और समाधि में तेजी से प्रगति होती है।

चेतावनी- यह आलेख सिर्फ जानकारी हेतु है। कोई भी व्यक्ति इसे पढ़कर करने का प्रयास न करे, क्योंकि यह सिर्फ साधकों के लिए है आम लोगों के लिए नहीं।
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योग आसनों से दूर की जा सकती है बांझपन की समस्या

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आजकल महिलाओं में बांझपन के मामले ज्यादा देखने को मिल रहे हैं। कई महिलाएं मां बनने वंचित रह जाती हैं। इस समस्या के कई समाधान हैं। योग के जरिए बांझपन की समस्या को दूर किया जा सकता है। योगानंता, स्टूडियो ऑफ योगा की संस्थापक और योग विशेषज्ञ रेखा बता रही हैं कुछ ऐसे योगासनों को जिनसे इस समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है।

बालासन

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सबसे पहले वज्रासन की स्थिति में बैठ जाएं। दोनों हाथ अपने घुटनों के ऊपर रखें। अब धीरे-धीरे आगे की तरफ झुकते चालें जाएं। अपने पेट को जंघे से अच्छे से सटा कर रखें और दोनों हाथों को परस्पर आगे की तरफ बढ़ाते जाएं। ध्यान रहे आपके कूल्हे आपकी एड़ियों के ऊपर बनी रहें। इस अवस्था में आप 1 से 2 मिनट तक बने रह सकते हैं।

पश्चिमोत्तानासन

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सबसे पहले अपने आसन पर पैरों को सामने की ओर फैलाकर बैठ जाएं। मेरुदंड एकदम सीधा रखें। स्वास भरते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाएं। याद रखें, दोनों हाथ कनपटी से लगी होनी चाहिए। स्वास छोड़ते हुए कूल्हों के जोड़ से झुकें। ठुड्डी पंजों की तरफ मेरुदंड सीधा रखने का प्रयास करें। अपने हाथों को पैरों पर रखें और क्षमतानुसार इसी आसन में बने रहें। स्वास भरते हुए धीरे से सिर को ऊपर उठाएं तथा धीरे धीरे दोनों हाथ नीचे ले आएं। इस तरह से यह एक चक्र पूरा होता है। इसे 3 से 4 बार दोहरा सकते हैं।

सर्वांगासन

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सबसे पहले अपने आसन पर पीठ के बल लेट जाएं। अपने दोनों हाथों को जंघाओं के पास रखें एवं धीरे धीरे दोनों पैरों को एक साथ पहले 30 डिग्री फिर 60 डिग्री और अंत में 90 डिग्री तक लेकर जाएं। हाथों का दबाव हिप्स पर बनाते हुए अपने पैरों को सिर की ओर लेकर आएं। अपनी हथेलियों से अपनी पीठ को सहारा देके रहें। कोहनियों को आसन से लगा के रखें।

शरीर धीरे-धीरे सीधा करते जाएं और अपनी ठोड़ी को छाती से लगाने का प्रयास करें। क्षमतानुसार आसन में बने रहें। वापस आने के लिए धीरे से पहले 60 डिग्री पर उसके बाद 30 डिग्री और पैर धीरे से आसन पर रखें। ये आसन आप 3 से 4 चक्र कर सकते हैं।

सेतुबंधासन
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सबसे पहले आसन पर अपनी पीठ के बल लेट जाएं। अपने घुटनों को मोड़ लें, घुटनों और पैरों को एक सीध में रखें तथा दोनों पैरों को एक दूसरे से 10-12 इंच दूर रखते हुए फैला ले। दोनों हाथों से अपने दोनों टखने पकड़ लें। सांस लेते हुए, धीरे से अपनी पीठ के निचले मध्य और फिर सबसे ऊपरी हिस्से को ज़मीन से उठाएं।

धीरे से अपने कन्धों को अंदर की ओर लें। बिना ठोड़ी को हिलाये अपनी छाती को अपनी ठोड़ी के साथ लगाएं। इसी आसन में 30 से 40 सेकंड तक बने रहें और सांस छोड़ते हुए आसन से बहार आ जाएं। इस तरह से यह एक चक्र पूरा होता है। सेतुबंधासन को आप 3 से 4 चक्र कर सकते हैं।





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योग हस्त मुद्रा की प्राचीन पद्धति और लाभ

 
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शरीर मे हथेली सबसे ज्यादा सक्रिय भाग -  शरीर में सक्रिय अंगों में हाथ भी प्रमुख है। हथेली में एक विशेष प्रकार की प्राण ऊर्जा अथवा शक्ति का प्रवाह निरंतर होता रहता है। इसी कारण शरीर के किसी भाग में दुःख, दर्द, पीड़ा होने पर सहज ही हाथ वहाँ चला जाता है। अंगुलियों में अपेक्षाकृत संवेदनशीलता अधिक होती है। इसी कारण अंगुलियों से ही नाड़ी की गति को देखा जाता है।  जिससे मस्तिष्क में नब्ज़ की कार्यविधि का संदेश शीघ्र ही पहुँचता है। रेकी चिकित्सा में हथेली का ही उपयोग होता है। रत्न चिकित्सा में विभिन्न प्रकार के नगीने अंगूठी के माध्यम से हाथ की अंगुलियों में ही पहने जाते हैं। जिनकी तरंगों के प्रभाव से शरीर को स्वस्थ रखा जा सकता है। एक्यूप्रेशर चिकित्सा में हथेली में सारे शरीर के संवेदन बिंदु होते हैं।  सुजोक बायल मेरेडियन के सिद्धान्तानुसार अंगुलियों से ही शरीर के विभिन्न अंगों में प्राण ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है। अनुभवी हस्त रेखा विशेषज्ञ हथेली देख कर व्यक्ति के वर्तमान, भूत और भविष्य की महत्वपूर्ण घटनाओं को बतला सकते हैं।   कहने का आशय यही है कि हाथ, हथेली और अंगुलियों का मनुष्य की जीवन शैली से सीधा सम्बन्ध होता है। इसी प्रकार हस्त योग मुद्राओं द्वारा पंच तत्त्वों को सरलता से संतुलित किया जा सकता है। ये मुद्राएँ शरीर में चेतना के शक्ति केंद्रों  में रिमोट कंट्रोल के समान स्वास्थ्य रक्षा और रोग निवारण करने में प्रभावशाली कार्य करती है। जिससे मानव भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति की तरफ अग्रसर होता है।

मुद्रा विज्ञान-हाथ की पाँचों अंगुलियों का सम्बन्ध पंच महाभूत तत्वों से होता है। प्रत्येक अंगुली प्रचलित मान्यता के अनुसार तर्क संगत मान्यता के अनुसार अलग-अलग तत्व का प्रतिनिधित्व करती है।  

कनिष्ठिका :- जल तत्व से, अनामिका पृथ्वी तत्व से, मध्यमा अग्नि तत्व से, तर्जनी वायु तत्त्व से और अंगूठा आकाश तत्व से । परन्तु बहुत से योगी अंगूठे को अग्नि और मध्यमा को आकाश तत्व का प्रतीक मानते हैं।  परन्तु ऐसा इसलिए उचित नहीं लगता क्योंकि आकाश तत्व ही सभी तत्वों को आश्रय देता है, उसके सहयोग के बिना किसी भी तत्व का अस्तित्त्व नहीं रहता। ठीक उसी प्रकार अँगूठे से ही अन्य सभी अंगुलियों का स्पर्श हो सकता है, मध्यमा से नहीं। दूसरी बात मस्तिष्क में आकाश तत्व की प्रधानता होती है। अंगूठा मस्तिष्क का प्रतिनिधित्व करता है। एक्यूप्रेशर में मस्तिष्क के रोगों का उपचार अंगठे से ही किया जाता है। मुद्रा विज्ञान के अनुसार हमारी अंगुलियाँ ऊर्जा का नियमित स्रोत होने के साथ साथ एन्टीना का कार्य करती है। शरीर में पंच तत्वों की घटत-बढ़त से व्याधियाँ होती हैं। अंगुलियों को मिलाने, दबाने, स्पर्श करने, मरोड़ने तथा विशेष आकृति कुछ समय तक बनाए रखने से तत्त्वों में परिवर्तन किया जा सकता है। उसका स्नायु मण्डल और यौगिक चक्रों पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। अंगुलियों को अनावश्यक मरोड़ने एवं चटखने से शक्ति का अपव्यय होता है। अंगूठे को तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठिका के मूल में लगाने से उस अंगुलि से सम्बन्धित तत्त्व की वृद्धि होती है। अंगुलियों के प्रथम पौर में स्पर्श करने से तत्त्व सन्तुलित होता है तथा इन अंगुलियों को अंगूठे के मूल पर स्पर्श कर अंगूठे से दबाने से उस तत्त्व की कमी होती है। इस प्रकार विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से पंच तत्त्वों को इच्छानुसार घटाया अथवा बढ़ाकर सन्तुलित किया जा सकता है।

हस्त मुद्राओं के सामान्य नियम - 

मुद्राओं का अभ्यास बालक, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी कर सकते हैं। मुद्राओं को चलते-फिरते, सोते-जागते, उठते-बैठते जब चाहें कर सकते हैं। परन्तु शांत एकान्त स्थान पर एकाग्रचित से मुद्राएँ करने पर विशेष लाभ होता है। अपनी-अपनी आवश्यकताओं के अनुसार सही मुद्राओं का अभ्यास करने से चमत्कारिक लाभ होता है। नियमित और निश्चित समय पर प्राणायाम के पश्चात् ध्यान के आसन में बैठ एकाग्र चित्त से दोनों हाथों में करने से तुरंत लाभ होता है। कुछ विशेष मुद्राओं को छोड़ मुद्राएँ किसी भी अवस्था में की जा सकती है। रोग के समय लेटे-बैठे, चलते-फिरते अथवा बातचीत करते हुए मुद्राएँ की जा सकती हैं। अधिकांश मुद्राएँ कम-से-कम एक रोग से सम्बन्धित मुद्राएँ रोग दूर होने के समय तक ही करनी चाहिए। परन्तु अन्य मुद्राएँ स्वेच्छानुसार जितनी अधिक की जाती हैं, उतना अधिक लाभ मिलता है। रोग जितना पुराना होता है, उसके उपचार में उतना ही अधिक समय लग सकता है। फिर भी अंशकालीन मुद्रा प्रयोग स्नायुमण्डल के केंद्रों और मुख्य ऊर्जा चक्रों 'में प्रभावशाली कंपन उत्पन्न करने में सहायक होती है। बांयें हाथ से जो मुद्रा की जाती है, उसका प्रभाव दाहिने अंगों पर विशेष पड़ता है और दायें हाथ से जो मुद्राएँ की जाती हैं, उसका प्रभाव बायें भाग के अंगों पर विशेष पड़ता है। शरीर के आवश्यकतानुसार एक के बाद एक मुद्रा की जा सकती है।  मुद्राएँ यथासम्भव दोनों हाथों से करनी चाहिए। मुद्रा करते समय अंगुलियों का स्पर्श हल्का और सहज होना चाहिए तथा जो अंगुलियाँ मुद्रा बनाने में काम नहीं आती, उन्हें सीधा ही रखना चाहिए। अन्य उपचारों के साथ भी मुद्राओं का उपयोग बिना किसी दुष्प्रभाव किया जा सकता है।

मुख्य हस्त मुद्रा- 

हथेली की अंगुलियों और अँगूठे की विविध स्थितियों से अलग-अलग मुद्राएँ बनती हैं। प्रत्येक मुद्रा का प्रभाव अलग-अलग होता है और इन मुद्राओं से शरीर में उपस्थित पंच महाभूत तत्व प्रभावित होते हैं। इस लिए  अलग-अलग मुद्राओं द्वारा उन्हें संतुलित रख के स्वस्थ रहा जा सकता है। वैसे मुद्राएँ कभी भी किसी भी आसन में की जा सकती है, परन्तु स्वस्थ व्यक्ति को वज्रासन अथवा पद्मासन में ही करना चाहिये । परन्तु रोगी सोते सोते भी कर सकता है। मुद्रा एक हाथ में अथवा दोनों हाथों में की जा सकती हैं। मुद्राओं के नियमित अभ्यास से शरीर की ऊर्जा बढ़ती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। कुछ मुद्राएँ रोग की अवस्था में ही की जाती है, तो पंच तत्वों को सम करने वाली ऊर्जाएं कभी भी की जा सकती है। यहाँ पर चंद विशेष मुद्राओं की सामान्य उपयोगी जानकारी ही दी जा रही है।  जिज्ञासु व्यक्ति मुद्रा विशेषज्ञों से सम्पर्क कर मुद्रा विज्ञान को सरलता से अनुभूति कर अपने आपको स्वस्थ रख सकते हैं। कुछ मुद्राएँ तत्काल अपना प्रभाव डालती है। जैसे अपान वायु और शून्य मुद्रा । कुछ मुद्राएं दीर्घकालिक होती है, जो लम्बे समय के अभ्यास के पश्चात अपना स्थायी प्रभाव प्रकट करती है।

ज्ञान मुद्रा : ज्ञान मुद्रा केसे करे ? 
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गुष्ठ व तर्जनी के ऊपरी पौर को स्पर्श करने से जहाँ हल्का सा नाड़ी स्पन्दन अनुभव हो, ज्ञान मुद्रा बनती है। हाथ की अलग अलग स्थिति रखने से ज्ञान मुद्राओं का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है, जिन्हे अलग-अलग प्रवृत्तियाँ करते समय आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। 

ज्ञान मुद्रा के लाभ :  
  • ज्ञान मुद्रा से मस्तिष्क संबंधी रोग, आलस्य, घबराहट, चिड़चिड़ापन, क्रोध, निराशा, तनाव, अनिद्रा, बैचेनी, ज्ञान तन्तु के विकार दूर होते हैं तथा स्मरण शक्ति बढ़ती है। इस मुद्रा से आभा मण्डल आकर्षक बनता है और आत्म विकार दूर होते हैं।
  • ज्ञान मुद्रा अधिक से अधिक समय तक की जा सकती है। हस्त रेखा विज्ञान की दृष्टि से ज्ञान मुद्रा करने से जीवन रेखा तथा बुद्ध ग्रह संबंधी दोष दूर होते हैं तथा अविकसित शुक्र पर्वत का भी विकास संभव होता है।
  • जब ज्ञान मुद्रा में दोनों हथेलियाँ कंधे के बराबर सामने की तरफ होती हैं तो, व्यक्ति में निर्भयता आने से उस मुद्रा को अभय मुद्रा कहते हैं।
  • जब दायाँ हाथ हृदय के पास और बायाँ घुटने के ऊपर रख जब ज्ञान मुद्रा की जाती है तो उसे योग मुद्रा" अथवा “वैराग्य मुद्रा" कहते हैं। भगवान गौतम की अधिकांश मूर्तियां इस आसन में ही देखने को मिलती है।
वायु मुद्रा : वायु मुद्रा कैसे करें 
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फोटो मे बताया हे अंगुष्ठ से तर्जनी को दबाने से वायु मुद्रा बनती है । 
वायु मुद्रा के लाभ - 
  • वायु मुद्रा जो शरीर में वायु के बढ़ने से होने वाले रोगों का शमन करती है, जैसे शरीर का कम्पन्न, जोड़ों का दर्द, गंठिया, रीढ़ की हड्डी संबंधी दर्द, वात रोग, लकवा आदि के समय करने से रोगों में राहत मिलती है।
  • मुंह टेढ़ा पड़ जाने, गर्दन की जकड़न होने तथा गर्दन संबंधी अन्य रोगों में वायु मुद्रा का प्रयोग लाभ दायक होता है। वायु मुद्रा करने से हाथ के मध्य में वात नाड़ी में बन्ध लग जाता है। वात जन्य गर्दन के दर्द में वायु मुद्रा लगाने के बाद हाथ की कलाई को दायां- बांया घुमाने से वात नाड़ी में खट-खट की ध्वनि होती है। 
  • जो उस कलाई को दूसरे हाथ से पकड़ कर वात नाड़ी पर अंगूठे से हल्का दबाव देते हुए, गोलाकार दाहिने बांये थोड़ी देर घुमाने के पश्चात बंद हो जाती है। उसके साथ ही गर्दन के दर्द में आराम होने लगता है। यदि जकड़न और दर्द गर्दन के बांयी तरफ हो तो बांयी कलाई को घुमाना चाहिये और यदि गर्दन के दाहिनी तरफ दर्द हो तो दाहिनी कलाई को घुमाना चाहिये।
  • परन्तु पूरी गर्दन में दर्द हो तो दोनों कलाईयों को एक के बाद एक घुमाना चाहिये । इसी प्रक्रिया से मुंह का टेढ़ापन भी ठीक हो जाता हैं।
आकाश मुद्रा : आकाश मुद्रा केसे करे ?
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फोटो मे दिया हे वेसे अंगुष्ठ के ऊपरी पौर को मध्यमा के ऊपरी पौर से स्पर्श करने से आकाश मुद्रा बनती है। 
आकाश मुद्रा के लाभ - 
इससे अग्नि तत्त्व सन्तुलित होता है। हड्डियां मजबूत होती है । मुख का तेज और कान्ति सुधरती है। विचार क्षमता बढ़ती है. मानसिक संकीर्णता कम होती है। हृदय रोग में भी यह मुद्रा प्रभावकारी होती है। हस्त रेखा विज्ञान की दृष्टि से शनि ग्रह से संबंध रखने वाले रोगों में यह मुद्रा लाभकारी होती हैं।

शून्य मुद्रा : शून्य मुद्रा केसे करे ?
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अंगुष्ठ से मध्यमा को दबा कर बाकी अंगुलियाँ सीधी रखने से शून्य मुद्रा  बनती है।
शून्य मुद्रा के लाभ : 
इस मुद्रा से शरीर में मणिपुर चक्र से विशुद्ध चक्र तक के सभी चक्र प्रभावित होते हैं। बहरापन, कान कि रोग, हिचकी, गूंगापन, सिर दर्द, विचार शून्यता दूर होती है। काम वासना नियन्त्रित होती है। मूत्रावरोध दूर होता है।

पृथ्वी मुद्रा : पृथ्वी मुद्रा केसे करे : 
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अंगुष्ठ को अनामिका के ऊपरी पौर से स्पर्श से यह  पृथ्वी मुद्रा  मुद्रा बनती है। रोजाना 10-15 मिनट से शुरू कर अवधि बढ़ाते जाएं। कफ दोष में अधिक देर तक न करें। खाली पेट ही करें। 

पृथ्वी मुद्रा के लाभ : 
यह पृथ्वी मुद्रा करने से पृथ्वी तत्व सन्तुलित होने से शरीर की ताकत और पैरों की शक्ति बढ़ती है। यह  मुद्रा कमजोर लोगों का वजन बढ़ाती है और शरीर में विटामिनों की कमी को दूर करती है। बढ़ते बच्चों, स्त्रियों, कमजोर पाचन शक्ति वाले लोगों के लिए यह मुद्रा लाभकारी है। इससे शरीर की ऊर्जा बढ़ती है, जीवन शक्ति का विस्तार होता है और चेहरे पर चमक आती है।

सुर्य मुद्रा : सूर्य मुद्रा कैसे करें
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अनामिका के ऊपरी पौर को अँगूठे के मूल पर रख कर अंगूठे से दबाने पर यह मुद्रा बनती है । अपना ध्यान श्वास पर लगाकर अभ्यास करना चाहिए। अभ्यास के दौरान श्वास को सामान्य रखना है। 5- इस मुद्रा को आप 10-15 मिनट तक करें। आप इसे सांयकाल सूर्यास्त से पूर्व भी कर सकते हैं सूर्य मुद्रा को प्रारंभ में 8 मिनट से प्रारंभ करके 24 मिनट तक कर सकते है।

सूर्य मुद्रा के लाभ : 
इस मुद्रा से मोटापा व भारीपन घटता है। मानसिक तनाव में कमी आती है। इससे कोलेस्ट्रोल कम होता है। जब मोटापा कम होता है , वजन कम होता है , शरीर की चयापचय क्रिया ठीक होती है तो कोलेस्ट्रोल नियंत्रण में आ जाता है। इस मुद्रा को नियमित करने से वजन कम और शरीर संतुलित हो जाता है।

जल मुद्रा : (वरुण मुद्रा) jal mudra in hindi वरुण मुद्रा कैसे करें?
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जल मुद्रा (वरूण मुद्रा)
अंगुष्ठ का कनिष्ठिका के ऊपरी पौर पर स्पर्श करने से यह मुद्रा बनती है। इस अवस्था में कम से कम 24 मिनट तक रहना चाहिये।  वरुण मुद्रा का अभ्यास प्रातः एवं सायं अधिकतम 24-24 मिनट तक करना उत्तम है।

जल मुद्रा के लाभ - 
कनिष्ठिका जो शरीर में जल तत्त्व का सन्तुलन करती है। जल तत्त्व की कमी से होने वाले रोगों में जैसे मांसपेशियों में खिचाव, चर्म रोग, शरीर में रुक्षता आदि ठीक होते हैं। रक्त शुद्धि और त्वचा में स्निग्धता लाने के लिये वरुण मुद्रा लाभदायक होती हैं।  यह मुद्रा जल की कमी से होने वाले समस्त रोगों का नाश करती है।

प्राण मुद्रा ; प्राण मुद्रा कैसे करें ?
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कनिष्ठिका और अनामिका के ऊपरी पौर को अंगुठे के ऊपरी पौर से स्पर्श करने से यह प्राण मुद्रा मुद्रा बनती है। 

प्राण मुद्रा के फायदे : 
  • जो जल और पृथ्वी तत्त्व को शरीर में सन्तुलन करने में सहयोग करती है। इस मुद्रा से चेतना शक्ति जागृत होती है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।भूख प्यास सहन हो जाती है। रक्त संचार सुधरता है. आंखों के रोगों में राहत मिलती है। हस्त रेखा विज्ञान के अनुसार सूर्य की अंगुलि अनामिका समस्त प्राणशक्ति का केन्द्र मानी जाती है । 
  • बुद्ध की अंगुलि कनिष्ठिका युवा शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। अत: इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में प्राण शक्ति का संचार तेज होता है। रक्त संचार ठीक होने से रक्त नलिकाओं का अवरोध दूर होता है। साधक को भूख प्यास की तीव्रता नहीं सताती।
अपान मुद्रा : अपान मुद्रा केसे करे ?
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मध्यमा और अनामिका अंगुली के सिरे को अंगूठे के सिरे से स्पर्श करने से बनती है।
अपान मुद्रा के लाभ : 
  • इस मुद्रा से शरीर से विभिन्न प्रकार के विजातीय तत्त्वों की विसर्जन क्रिया नियमित होती है, ताकि अनावश्यक, | अनुपयोगी पदार्थ सरलता पूर्वक शरीर से बाहर निकल जाते है।
  • इससे पेट में वायु का नियन्त्रण होने से पेट संबंधी वात रोगों में विशेष लाभ होता है।  इस मुद्रा से मूत्राशय की कार्य प्रणाली सुधरती है। कब्ज और बवासीर में यह मुद्रा विशेष लाभ दायक होती है। यह मुद्रा दांतों को भी स्वस्थ रखती है । इस मुद्रा से पसीना नियमित ढंग से आने लगता है। शरीर में प्राण और अपान वायु संतुलित होती है।
जलोदर नाशक मुद्रा : जलोदर नाशक मुद्रा  केसे करे 
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कनिष्ठिका को पहले अंगूठे की जड़ में लगा कर फिर अंगूठे से कनिष्ठिका को दबाने से जलोदर नाशक मुद्रा बनती है । 

जलोदर नाशक मुद्रा के लाभ : 
इस मुद्रा से शरीर में जल की वृद्धि से होने वाले रोग ठीक होते हैं। शरीर के विजातीय द्रव्य बाहर निकलने लगते है, जिससे शरीर निर्मल बनता है, पसीना आने लगता है , मूत्रावरोध ठीक होता है।

शंख मुद्रा : शंख मुद्रा केसे करे ?
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बांयें हाथ के अंगूठे को दांयें हाथ की मुट्ठी में बन्द कर बायें हाथ की तर्जनी को दाहिने हाथ के अंगूठे से मिला, बाकी तीनों अंगुलियों को मुट्ठी के ऊपर रखने से शंख मुद्रा बनती है।

शंख मुद्रा के लाभ :
इस मुद्रा से वाणी संबंधी रोग जैसे तुतलाना, आवाज में भारीपन गले के रोग और थायरायड संबंधी रोगों में विशेष लाभ होता है। भूख अच्छी लगती है । वज्रासन में बैठकर यह मुद्रा करने से अधिक प्रभावकारी हो जाती है। हृदय के पास इस मुद्रा को हथेलियाँ रख कर करने से हृदय रोग में शीघ्र लाभ होता है। रक्त चाप कम होने लगता है।

लिंग मुद्रा : लिंग मुद्रा केसे करे ?
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दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फंसा कर दायें अंगूठे को ऊपर खड़ा रखने से यह मुद्रा बनती है।

लिंग मुद्रा  के लाभ : 
इस मुद्रा से शरीर में गर्मी बढ़ती है। मोटापा कम होता है। कफ, नजला, जुकाम, खांसी, सर्दी संबंधी रोगों, फेफड़ों के रोग, निम्न रक्त चाप आदि में कमी होती है। इस मुद्रा से शरीर मे मौसम परिवर्तन से होने वाले सर्दी जन्य रोगों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। 


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गर्भावस्था के दौरान मेडिटेशन,फायदे और तकनीक

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प्रेगनेंसी प्रकृति के एक चमत्कार के तौर पर जाना जाता है। हालांकि, इसमें इनसोम्निया, एंग्जाईटी, डिप्रेशन और असंयमित खाना जैसे खतरनाक चीजें भी शामिल होती हैं, जो कि महिला के स्वास्थ्य पर असर डाल सकती हैं।  मेडिटेशन इन चुनौतियों से निपटने का एक असरदार तरीका है। यह गोली खाने वाली परंपरा से कहीं ज्यादा असरदार है, जो कि आज के समय में एक आम बात हो गई है। क्योंकि, मेडिटेशन समस्या की जड़ पर काम करता है, जो कि दिमाग का एक इलाज है। इनसोम्निया, डिप्रेशन और एंग्जाईटी इन सब को एक अस्वस्थ मस्तिष्क के लक्षणों के रूप में देखा जाना चाहिए और गोलियां केवल लक्षणों को कंट्रोल करने में मदद करती हैं। 

मेडिटेशन क्या है? 
‘मेडिटेशन’ शब्द संस्कृत के एक शब्द मेधा से लिया गया है। जिसका अर्थ होता है – ‘बुद्धि’। हममें से कई लोगों को एक गलतफहमी है, कि मेडिटेशन प्रार्थना का एक स्वरूप है, क्योंकि हमने अक्सर ही साधुओं को ध्यान करते हुए सुना है। पर यह सच्चाई नहीं है, मेडिटेशन जागरूकता की एक स्थिति है, जहाँ हम बिना किसी व्याकुलता के अपनी सोच में डूबे होते हैं। उदाहरण के लिए, पार्क की एक बेंच पर बैठकर बिना किसी भटकाव के एक फूल को देखने जैसा एक सामान्य काम एक तरह का मेडिटेशन है। गर्भवती महिलाओं के मेडिटेशन करने से दिमाग की सभी नकारात्मकता को बाहर निकाल कर डिप्रेशन, तनाव, एंग्जाइटी जैसी समस्याओं से निपटा जा सकता है। 

गर्भावस्था के दौरान मेडिटेशन के सबसे बेहतरीन फायदे क्या होते हैं? 
मेडिटेशन करने से ऐसी कई समस्याओं पर नियंत्रण पाया जा सकता है, जिनका अनुभव महिलाएं गर्भावस्था के दौरान करती हैं, जैसे कि: 

बेहतर नींद: ऐसा अनुमान है, कि 75% से ज्यादा गर्भवती महिलाएं, अपनी गर्भावस्था के दौरान किसी न किसी पड़ाव पर इनसोम्निया (नींद ना आने की स्थिति) से गुजरती हैं। यह कई कारणों से हो सकता है, जैसे कि एंग्जाईटी, हार्टबर्न, बार-बार पेशाब आना या हार्मोन्स, जो कि रात को अच्छी नींद आने में रुकावट बनते हैं। गर्भावस्था के दौरान, अच्छी नींद के लिए मेडिटेशन करने से आपको नींद न आने की समस्या से छुटकारा मिल सकता है। हार्वर्ड द्वारा की गई एक स्टडी से यह पता चलता है, कि जो लोग मेडिटेशन करते हैं, वे स्लीप एजुकेशन क्लास को अटेंड करने वाले लोगों से भी बेहतर नींद पाते हैं।

एंग्जाइटी में कमी: अधिकतर महिलाएं गर्भावस्था के दौरान एंग्जाईट का अनुभव करती हैं, क्योंकि इसमें प्रीएक्लेमप्सिया, एक्लेमप्सिया और जेस्टेशनल डायबिटीज का खतरा शामिल होता है। अध्ययनों से यह पता चलता है, कि जो महिलाएं प्रेगनेंसी के दौरान अत्यधिक एंग्जाइटी की शिकार होती हैं, उनसे पैदा होने वाले बच्चों में अटेंशन डिफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) का खतरा होता है। चूंकि, कॉर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन प्लेसेंटा तक पहुंच जाता है और विकास संबंधित समस्याएं पैदा करता है। अगर किसी को यह समझ आ जाए, कि नकारात्मक विचार आप की सच्चाई को नहीं दिखाते हैं, तो एंग्जाईटी को मेडिटेशन की मदद से कम किया जा सकता है। जब आपका दिमाग सकारात्मक विचारों पर केंद्रित होने लगता है, तो एंग्जाईटी धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। 

डिप्रेशन में कमी: कुछ महिलाएं गर्भावस्था के बाद, शरीर के हॉर्मोनल स्तर में अचानक आने वाले बदलाव के कारण गर्भावस्था के बाद डिप्रेशन से गुजरती हैं। इसे पोस्टपार्टम डिप्रेशन के नाम से जाना जाता है और इसे ठीक होने में 2 साल तक का समय भी लग सकता है। अनगिनत अध्ययनों से यह पता चला है, कि जो लोग नियमित रूप से मेडिटेड करते हैं, वे सेरोटोनिन उत्पन्न करते हैं, जो कि शरीर के द्वारा पैदा किया जाने वाला एक प्राकृतिक एंटीडिप्रेसेंट है। 

खानपान की स्वस्थ आदतों का विकास: गर्भावस्था एक ऐसा समय है, जब महिलाएं सामान्य से ज्यादा खाती हैं और तरल पदार्थों की बढ़ी हुई मात्रा, एमनियोटिक फ्लूइड, प्लेसेंटा का वजन आदि के कारण उनका वजन बढ़ता है। हालांकि, कुछ महिलाएं ओवरईटिंग के कारण मोटापे के खतरे को भी बढ़ा देती हैं। जिससे नींद ना आना, प्रीएक्लेमप्सिया और जेस्टेशनल डायबिटीज जैसी समस्याएं हो सकती हैं। मेडिटेशन का इस्तेमाल करके, अपने खान-पान के प्रति जागरूक रहा जा सकता है और अधिक खाने और कंफर्ट फूड का सहारा लेने की खतरनाक आदतों से बचा जा सकता है। 

गर्भावस्था के दौरान मेडिटेशन के सबसे बेहतरीन फायदे क्या होते हैं? 
शारीरिक तनाव में कमी:  जैसे-जैसे महिला का शरीर बदलता है, वह पीठ के दर्द, कमर के दर्द, मॉर्निंग सिकनेस और मरोड़ आदि जैसी समस्याओं के कारण अत्यधिक तनाव से गुजरती हैं। स्टडीज दर्शाती हैं, कि मेडिटेशन से इस तरह के दर्द में 57% तक की कमी लाई जा सकती है। मानव दिमाग दो तरह के दर्द का अनुभव करता है – प्राइमरी और सेकेंड्री। जहाँ, प्राइमरी दर्द, दर्द के प्रति शरीर का एक रिएक्शन होता है, वहीं सेकेंडरी दर्द, दर्द के प्रति दिमाग का रिएक्शन होता है। मेडिटेशन सेकेंड्री दर्द पर काम करता है और यह सुनिश्चित करता है, कि हम केवल शारीरिक दर्द पर ध्यान दें। शारीरिक दर्द की यह जागरूकता, दर्द को बढ़ाने वाले उसी अनुभव की ओर हमारे दिमाग को भटकने से रोकती है। 

लेबर की प्रक्रिया को मैनेज करने में आपकी मदद करना: लेबर की शुरुआत के दौरान, सभी महिलाएं निश्चित रूप से दर्द का अनुभव करती हैं। मेडिटेशन को पेन मैनेजमेंट के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, क्योंकि यह डिलीवरी के दौरान शांति और सुकून की एक भावना को स्थापित करता है। 

गर्भावस्था के दौरान मेडिटेशन कैसे करना चाहिए? 
मेडिटेशन की प्रक्रिया में प्रवेश करने से पहले, जो सबसे पहली चीज आपको ढूंढने की जरूरत है, वह है एक शांत जगह, जहाँ कोई व्यक्ति शांति से मेडिटेड कर सके। आदर्श रूप से, घर की एक शांत जगह का चुनाव किया जा सकता है, जो कि हर तरह के भटकाव से दूर हो। अगर आस-पास ऐसी कोई शांत जगह नहीं है, तो आप, पास के किसी पार्क में भी जा सकती हैं, जहाँ पर अधिक लोग नहीं आते हों। दूसरा काम है, एक पोस्चर को ढूंढना, जिसमें आप आराम महसूस करें। जहाँ कुछ लोग आलथी-पालथी मार के बैठना पसंद करते हैं, वहीं, एक कुर्सी पर सीधे बैठ कर मेडिटेड करने के भी सामान फायदे हैं। कुर्सी पर बैठने के दौरान यह ध्यान देने की जरूरत है, कि आप की रीढ़ की हड्डी मुड़ी हुई नहीं होनी चाहिए और टेल बोन कुर्सी के बैक के करीब होनी चाहिए। अंत में, मेडिटेशन के एक प्रकार का चुनाव किया जा सकता है, जिसका इस्तेमाल वे दिमाग को मजबूत बनाने के लिए करना चाहते हैं।  इनमें निम्नलिखित प्रकार शामिल हैं: 

अवेयरनेस मेडिटेशन:  मेडिटेशन के इस स्वरूप को मानसिक एक्सरसाइज के रूप में किया जा सकता है, जिससे आप अपने बच्चे के साथ एक मजबूत बॉन्ड महसूस कर सकें। यह लंबी सांस लेने से शुरू होता है और इसमें केवल सांसो पर ध्यान को केंद्रित करना होता है। इसमें सांस लेना, सांस छोड़ना, सांस की गति और ध्वनि शामिल हैं। एक बार आप 2 मिनट तक इसे कर लें, फिर आप धीरे से अपने एक हाथ का इस्तेमाल करके अपने बेबी बंप पर अपने बच्चे को बढ़ता हुआ महसूस कर सकती हैं। ऐसे समय में आप धीरे से अपने ध्यान को अपनी सांसों से हटाकर अपने बच्चे की ओर लगा सकती हैं। ऐसे में अपने ध्यान को सोच से हटाकर भावनाओं पर लगाना होता है, ताकि आप अपने पेट में पल रहे बच्चे के साथ पूरा जुड़ाव महसूस कर सकें। 

कांसेप्ट मेडिटेशन: प्रेगनेंसी मेडिटेशन के इस प्रकार में, एक प्रक्रिया होती है, जो कि बिल्कुल अवेयरनेस मेडिटेशन जैसी ही होती है। केवल इसमें मानसिक दर्शन की ताकत का इस्तेमाल किया जाता है। सांस लेने के दौरान, आपको चीजों या लोगों का मानसिक दर्शन करना शुरू करने की जरूरत होती है, जैसे – पानी का एक झरना, हवा में उड़ता हुआ एक पत्ता या फिर एक देवता। ये तस्वीरें भावनाओं का एक प्रतीक होनी चाहिए, जिसकी आप इच्छा रखते हैं। उदाहरण के लिए, एक शक्तिशाली पानी के झरने को मजबूती की भावना को पाने के लिए विजुअलाइज किया जा सकता है, वहीं हवा में आजादी से उड़ता हुआ एक पत्ता, तनाव और एंग्जाईटी से छुटकारे को दर्शाता है। 

वॉकिंग मेडिटेशन: वॉकिंग को लेबर उत्पन्न करने के लिए जाना जाता है, क्योंकि यह गर्भाशय में कॉन्ट्रेक्शन को एक्टिवेट करता है।चलने की शारीरिक गतिविधि, मेडिटेशन और प्रेगनेंसी के बीच का एक पुल बन जाती है, क्योंकि वॉकिंग मेडिटेशन दिमाग को तैयार करने के साथ-साथ शरीर को तैयार करने का काम भी करता है। वॉकिंग मेडिटेशन का मतलब होता है, कि आपको चलने की प्रक्रिया के बारे में सचेत रूप से जागरूक होना चाहिए। इसमें कदम रखने या हाथों को झुलाने जैसी गतिविधियों के प्रति जागरूक रहना शामिल है, जिन्हें हम आमतौर पर फॉर ग्रांटेड लेते हैं। 

गर्भवती महिलाओं के लिए सबसे बेहतरीन मेडिटेशन तकनीक
गर्भावस्था के दौरान, आप ऊपर दी गई तकनीकों में से किसी का भी चुनाव कर सकती हैं। सबसे बेहतरीन मेडिटेशन तकनीक वही है, जो आपके लिए सबसे बेहतर तरीके से काम करें और आप चाहें, तो मेडिटेशन क्लास या ग्रुप में भी शामिल हो सकती हैं। 

निष्कर्ष
मेडिटेशन, गर्भावस्था के तनाव को कम करने में मदद करता है, क्योंकि यह दिमाग को निराशा की भावना में भटकने से रोकता है। यह ध्यान को केवल सच्चाई पर केंद्रित करने में मदद करता है और काल्पनिक डर को दिमाग पर हावी होने से बचाता है। गर्भावस्था के दौरान, एक सुंदर और खुशनुमा अनुभव पाने के लिए मेडिटेशन की प्रैक्टिस जरूर करें। 

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योग क्या है, योग के लाभ, नियम, प्रकार और आसन

 
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योग विस्मरण में दफन एक प्राचीन मिथक नहीं है। यह वर्तमान की सबसे बहुमूल्य विरासत है। यह आज की आवश्यकता है और कल की संस्कृति है - स्वामी सत्यानंद सरस्वती

योग क्या है? - 
योग सही तरह से जीने का विज्ञान है और इस लिए इसे दैनिक जीवन में शामिल किया जाना चाहिए। यह हमारे जीवन से जुड़े भौतिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक और आध्यात्मिक, आदि सभी पहलुओं पर काम करता है। योग का अर्थ एकता या बांधना है। इस शब्द की जड़ है संस्कृत शब्द युज, जिसका मतलब है जुड़ना। आध्यात्मिक स्तर पर इस जुड़ने का अर्थ है सार्वभौमिक चेतना के साथ व्यक्तिगत चेतना का एक होना। व्यावहारिक स्तर पर, योग शरीर, मन और भावनाओं को संतुलित करने और तालमेल बनाने का एक साधन है। यह योग या एकता आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बँध, षट्कर्म और ध्यान के अभ्यास के माध्यम से प्राप्त होती है। तो योग जीने का एक तरीका भी है और अपने आप में परम उद्देश्य भी।

योग सबसे पहले लाभ पहुँचाता है बाहरी शरीर (फिज़िकल बॉडी) को, जो ज्यादातर लोगों के लिए एक व्यावहारिक और परिचित शुरुआती जगह है। जब इस स्तर पर असंतुलन का अनुभव होता है, तो अंग, मांसपेशियां और नसें सद्भाव में काम नहीं करते हैं, बल्कि वे एक-दूसरे के विरोध में कार्य करते हैं।

बाहरी शरीर (फिज़िकल बॉडी) के बाद योग मानसिक और भावनात्मक स्तरों पर काम करता है। रोज़मर्रा की जिंदगी के तनाव और बातचीत के परिणामस्वरूप बहुत से लोग अनेक मानसिक परेशानियों से पीड़ित रहते हैं। योग इनका इलाज शायद तुरंत नहीं प्रदान करता लेकिन इनसे मुकाबला करने के लिए यह सिद्ध विधि है।

पिछली सदी में, हठ योग (जो की योग का सिर्फ़ एक प्रकार है) बहुत प्रसिद्ध और प्रचलित हो गया था। लेकिन योग के सही मतलब और संपूर्ण ज्ञान के बारे में जागरूकता अब लगातार बढ़ रही है।

योग के लाभ - 
शारीरिक और मानसिक उपचार योग के सबसे अधिक ज्ञात लाभों में से एक है। यह इतना शक्तिशाली और प्रभावी इसलिए है क्योंकि यह सद्भाव और एकीकरण के सिद्धांतों पर काम करता है।

योग अस्थमा, मधुमेह, रक्तचाप, गठिया, पाचन विकार और अन्य बीमारियों में चिकित्सा के एक सफल विकल्प है, ख़ास तौर से वहाँ जहाँ आधुनिक विज्ञान आजतक उपचार देने में सफल नहीं हुआ है। एचआईवी (HIV) पर योग के प्रभावों पर अनुसंधान वर्तमान में आशाजनक परिणामों के साथ चल रहा है। चिकित्सा वैज्ञानिकों के अनुसार, योग चिकित्सा तंत्रिका और अंतःस्रावी तंत्र में बनाए गए संतुलन के कारण सफल होती है जो शरीर के अन्य सभी प्रणालियों और अंगों को सीधे प्रभावित करती है। 

अधिकांश लोगों के लिए, हालांकि, योग केवल तनावपूर्ण समाज में स्वास्थ्य बनाए रखने का मुख्य साधन हैं। योग बुरी आदतों के प्रभावों को उलट देता है, जैसे कि सारे दिन कुर्सी पर बैठे रहना, मोबाइल फोन को ज़्यादा इस्तेमाल करना, व्यायाम ना करना, ग़लत ख़ान-पान रखना इत्यादि।

इनके अलावा योग के कई आध्यात्मिक लाभ भी हैं। इनका विवरण करना आसान नहीं है, क्योंकि यह आपको स्वयं योग अभ्यास करके हासिल और फिर महसूस करने पड़ेंगे। हर व्यक्ति को योग अलग रूप से लाभ पहुँचाता है। तो योग को अवश्य अपनायें और अपनी मानसिक, भौतिक, आत्मिक और अध्यात्मिक सेहत में सुधार लायें।

योग के नियम - 
अगर आप यह कुछ सरल नियमों का पालन करेंगे, तो अवश्य योग अभ्यास का पूरा लाभ पाएँगे:

  • किसी गुरु के निर्देशन में योग अभ्यास शुरू करें।
  • सूर्योदय या सूर्यास्त के वक़्त योग का सही समय है।
  • योग करने से पहले स्नान ज़रूर करें।
  • योग खाली पेट करें। योग करने से 2 घंटे पहले कुछ ना खायें।
  • आरामदायक सूती कपड़े पहनें।
  • तन की तरह मन भी स्वच्छ होना चाहिए - योग करने से पहले सब बुरे ख़याल दिमाग़ से निकाल दें।
  • किसी शांत वातावरण और सॉफ जगह में योग अभ्यास करें।
  • अपना पूरा ध्यान अपने योग अभ्यास पर ही केंद्रित रखें।
  • योग अभ्यास धैर्य और दृढ़ता से करें।
  • अपने शरीर के साथ ज़बरदस्ती बिल्कुल ना करें।
  • धीरज रखें। योग के लाभ महसूस होने मे वक़्त लगता है।
  • निरंतर योग अभ्यास जारी रखें।
  • योग करने के 30 मिनिट बाद तक कुछ ना खायें। 1 घंटे तक न नहायें।
  • प्राणायाम हमेशा आसन अभ्यास करने के बाद करें।
  • अगर कोई मेडिकल तकलीफ़ हो तो पहले डॉक्टर से ज़रूर सलाह करें।
  • अगर तकलीफ़ बढ़ने लगे या कोई नई तकलीफ़ हो जाए तो तुरंत योग अभ्यास रोक दें।
  • योगाभ्यास के अंत में हमेशा शवासन करें।
योग के प्रकार - 
योग के 4 प्रमुख प्रकार या योग के चार रास्ते हैं:

राज योग:
राज का अर्थ शाही है और योग की इस शाखा का सबसे अधिक महत्वपूर्ण अंग है ध्यान। इस योग के आठ अंग है, जिस कारण से पतंजलि ने इसका नाम रखा था अष्टांग योग। इसे योग सूत्र में पतंजलि ने उल्लिखित किया है। यह 8 अंग इस प्रकार है: यम (शपथ लेना), नियम (आचरण का नियम या आत्म-अनुशासन), आसन, प्राणायाम (श्वास नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रियों का नियंत्रण), धारण (एकाग्रता), ध्यान (मेडिटेशन), और समाधि (परमानंद या अंतिम मुक्ति)। राज योग आत्मविवेक और ध्यान करने के लिए तैयार व्यक्तियों को आकर्षित करता है। आसन राज योग का सबसे प्रसिद्ध अंग है, यहाँ तक कि अधिकतर लोगों के लिए योग का अर्थ ही है आसन। किंतु आसन एक प्रकार के योग का सिर्फ़ एक हिस्सा है। योग आसन अभ्यास से कहीं ज़्यादा है। 
 
कर्म योग:
अगली शाखा कर्म योग या सेवा का मार्ग है और हम में से कोई भी इस मार्ग से नहीं बच सकता है। कर्म योग का सिद्धांत यह है कि जो आज हम अनुभव करते हैं वह हमारे कार्यों द्वारा अतीत में बनाया गया है। इस बारे में जागरूक होने से हम वर्तमान को अच्छा भविष्य बनाने का एक रास्ता बना सकते हैं, जो हमें नकारात्मकता और स्वार्थ से बाध्य होने से मुक्त करता है। कर्म आत्म-आरोही कार्रवाई का मार्ग है। जब भी हम अपना काम करते हैं और अपना जीवन निस्वार्थ रूप में जीते हैं और दूसरों की सेवा करते हैं, हम कर्म योग करते हैं। 
 
भक्ति योग:
भक्ति योग भक्ति के मार्ग का वर्णन करता है। सभी के लिए सृष्टि में परमात्मा को देखकर, भक्ति योग भावनाओं को नियंत्रित करने का एक सकारात्मक तरीका है। भक्ति का मार्ग हमें सभी के लिए स्वीकार्यता और सहिष्णुता पैदा करने का अवसर प्रदान करता है। 
 
ज्ञान योग:
अगर हम भक्ति को मन का योग मानते हैं, तो ज्ञान योग बुद्धि का योग है, ऋषि या विद्वान का मार्ग है। इस पथ पर चलने के लिए योग के ग्रंथों और ग्रंथों के अध्ययन के माध्यम से बुद्धि के विकास की आवश्यकता होती है। ज्ञान योग को सबसे कठिन माना जाता है और साथ ही साथ सबसे प्रत्यक्ष। इसमें गंभीर अध्ययन करना होता है और उन लोगों को आकर्षित करता है जो बौद्धिक रूप से इच्छुक हैं।

योग कब करें या योग करने का सही समय क्या है? - 
सुबह सूर्योदय से पहले एक से दो घंटे योग के लिए सबसे अच्छा समय है। अगर सुबह आपके लिए मुमकिन ना हो तो सूर्यास्त के समय भी कर सकते हैं। इसके अलावा इन बातों का भी ख़ास ध्यान रखें:
  • अगर दिन का कोई समय योग के लिए निर्धारित कर लें, तो यह उत्तम होगा।
  • सब आसन किसी योगा मैट या दरी बिछा कर ही करें।
  • आप योग किसी खुली जगह जैसे पार्क में कर सकते हैं, या घर पर भी। बस इतना ध्यान रहे की जगह ऐसी हो जहाँ आप खुल कल साँस ले सकें।
योगाभ्यास शुरू करने से पहले सही मानसिक स्थिति क्या है? - 
योग आसन हमेशा मन को शांतिपूर्ण अवस्था में रख कर किए जाने चाहिए। शांति और स्थिरता के विचार के साथ अपने मन को भरें और अपने विचारों को बाहारी दुनिया से दूर कर स्वयं पर केंद्रित करें। सुनिश्चित कर लें कि आप इतने थके ना हों कि आसन पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ हों अगर थकान ज़्यादा हो तो केवल रिलैक्स करने वाले आसन ही करें।

योगाभ्यास के दौरान सही मानसिक स्थिति क्या है? -
आप जो आसन कर रहे हैं, उस पर गहरा ध्यान लगायें। शरीर के जिस अंग पर उस आसन का सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ता है, उस पर अपनी एकाग्रता केंद्रित करें। ऐसा करने से आपको आसान का आशिकतम लाभ मिलेगा। आसन करते समय, श्वास बहुत महत्वपूर्ण होता है। आसन के लिए जो सही श्वास करने का तरीका है वैसा ही करें (कब श्वास अंदर लेना है और बाहर छोड़ना है)। अगर आपको इसका ग्यात ना हो तो जो सामान्य लयबद्ध श्वास रखें।

योग की शुरुआत करने के लिए टिप्स और सुझाव - 
अगर आप योगाभ्यास जीवन में पहली बार शुरू कर रहे हैं या योग से ज़्यादा परिचित नहीं हैं, तो इन बातों का ख़ास ध्यान रखें:
  • अपने योगाभ्यास को धैर्य और दृढ़ता के साथ करें। अगर आपके शरीर में लचीलापन कम है तो आपको शुरुआत में अधिकतर आसन करने में कठिनाई हो सकती है। अगर आप पहले-पहले आसन ठीक से नहीं कर पा रहे हों तो चिंता ना करें। सभी आसान दोहराव के साथ आसान हो जाएँगे। जिन मांसपेशियों और जोड़ों में खिंचाव कम है, वह सब धीरे-धीरे लचीले हो जाएँगे।
  • अपने शरीर के साथ जल्दबाज़ी या ज़बरदस्ती बिल्कुल ना करें।
  • शुरुआत में आप सिर्फ़ वही आसन कर सकते हैं जो आप आसानी से कर पायें। बस इतना ध्यान रखिए की आपकी श्वास लयबद्ध हो।
  • शुरुआत में हमेशा दो आसन के बीच कुछ सेकंड के लिए आराम करें। दो आसन के बीच में विश्राम की अवधि अपनी शारीरिक ज़रूरत के हिसाब से तय कर लें। समय के साथ यह अवधि कम कर लें।

अच्छे योगाभ्यास के लिए क्या सावधानियों बरतनी चाहियें? - 
ज़्यादातर ऐसा कहा जाता है कि महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान योग का अभ्यास नहीं करना चाहिए। किंतु आप अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार यह अनुमान लगा सकती हैं कि आपको मासिक धर्म के दौरान योगाभ्यास सूट करता है कि नहीं।
  • गर्भावस्था के दौरान योग किसी गुरु की देखरेख में करें तो बेहतर होगा।
  • 10 वर्ष की आयू से कम के बच्चों को ज़्यादा मुश्किल आसन ना करायें। किसी गुरु के निर्देशन में ही योग करें।
  • ख़ान-पान में संयम बरते। समय से खाएं-पीए।
  • धूम्रपान सख्ती से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। अगर आपको तंबाकू या धूम्रपान की आदत है, तो योग अपनायें और यह बुरी आदत छोड़ने की कोशिश करें। (और पढ़ें - धूम्रपान छोड़ने के उपाय)
  • नींद ज़रूर पूरी लें। शरीर को व्यायाम और पौष्टिक आहार के साथ विश्राम की भी जरूरत होती है। इसलिए समय से सोए।
विश्वास का महत्व एक अच्छे योग अभ्यास के लिए -
अपने आप में और योग में विश्वास रखें। सकारात्मक सोच एक आदर्श योगाभ्यास की सच्ची साथी है। आपकी मानसिक दशा ओर दृष्टिकोण ही अंत में आपको योग से मिलने वाले तमाम फायदे दिलाती है।

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बाबा से सीखें साइनस से छुटकारे के लिए योग

 
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साइनसाइटिस की समस्या नाक में बहुत अधिक बलगम बढ़ जाने के कारण उत्पन्न होती है। इस समस्या के कारण नाक में पोलिप्स (polyps) बढ़ जाते हैं जिससे छुटकारा पाने के लिए सर्जरी तक करवानी पड़ सकती है। कभी कभी तो सर्जरी के बाद भी दुबारा पोलिप्स हो जाते हैं। साइनसाइटिस देखने में तो बहुत छोटी समस्या है पर यह बहुत ही खतरनाक होती है। नाक बंद होने के कारण हम शब्दों का उच्चारण भी सही ढंग से नहीं कर पाते हैं और हमें श्वास लेने में भी बहुत दिक्कत होने लगती है। इस समस्या का उपचार योग द्वारा किया जा सकता है। साइनस से छुटकारा पाने के लिए आपको नियमित रूप से भस्त्रिका, कपालभाती और अनुलोम-विलोम जैसे प्राणायाम करने चाहिए।

साइनसाइटिस के लिए करें भस्त्रिका प्राणायाम
  • सबसे पहले सुखासन में बैठें। अब मेरुदंड, पीठ, गला तथा सिर को सीधा रखें और अपने शरीर को बिलकुल स्थिर रखें। 
  • अब मुंह बंद कर लें।
  • इसके बाद दोनों नासिका छिद्रों (Nostrils) से आवाज करते हुए श्वास लें और आवाज करते हुए श्वास बाहर छोड़ें। 
  • श्वास लेने और छोड़ने की गति तीव्र होनी चाहिए। 
  • श्वास लेते समय पेट बाहर की तरफ निकलना चाहिए और श्वास छोड़ते समय पेट अन्दर खींचना है। 
  • यह प्रक्रिया करते समय केवल पेट हिलना चाहिए और छाती स्थिर रहनी चाहिए। 
  • इस तरह कम से कम 20 बार करें।
साइनसाइटिस के लिए करें कपालभाती प्राणायाम  
  • सब से पहले आप जमीन पर बैठ जाएँ और बैठने के बाद अपने पेट को ढीला छोड़ दें। 
  • अब अपने नाक से सांस को बाहर छोड़ें। सांस को बाहर छोड़ते समय पेट को अंदर की ओर धक्का दें।
  • इस प्राणायाम में श्वास अंदर लेने की क्रिया करने की जरुरत नहीं है। इस प्राणायाम में श्वास अपने आप अंदर की तरफ आने लगती है। 
  • इस प्राणायाम को प्रतिदिन लगातार 15 से 20 मिनट तक करने से नाक खुलने लगती है और साइनसाइटिस की समस्या से छुटकरा मिल जाता है। 
साइनसाइटिस के लिए करें अनुलोम-विलोम प्राणायाम 
  • साइनसाइटिस की समस्या में शुरू में अनुलोम-विलोम प्राणायाम करने पर थोड़ी परशानी होगी लेकिन इस प्राणायाम को लगातार करने से बहुत लाभ मिलेगा। 
  • अनुलोम-विलोम करने से पहले पद्मासन में बैठ जाएँ। 
  • अब अपनी आँखों को बंद कर लें। 
  • अब बाए हथेली को बाए घुटने पर रखें।
  • प्रथम सांस बाहर निकालकर नासाग्र मुद्रा बनाएं। 
  • दाएं हाथ के अंगूठे से एक तरफ की नाक को दबा कर छिद्र को बंद करें। 
  • अंगूठे के पास वाली दोनों अंगुलियां तर्जनी और मध्यमा को भ्रूमध्य में रखें।
  • अब बाए छिद्र से सांस खीचें, इसके पश्चात बाए छिद्र को अनामिका अंगुली से बंद करें और दाए छिद्र से अंगूठा हटाकर साँस छोड़ें।
  • अब इसी प्रक्रिया को प्रतिदिन 15 से 20 मिनिट तक करें। इससे आपको साइनस की समस्या से छुटकरा मिल जायगा। 
साइनसाइटिस के लिए करें ये घरेलु उपचार 
यदि आपका कफ जायदा बढ़ गया है तो इसके लिए 100 ग्राम बादाम, 20 ग्राम काली मिर्च और 50 ग्राम खांड़ को मिलाकर पाउडर बना लें। इस पाउडर का एक चम्मच रात को गर्म दूध के साथ लें। इससे साइनस की समस्या में तुरंत लाभ मिलता है। 

साइनस की समस्या से छुटकारा पाने के लिए सोंठ, पिप्पली और काली मिर्च के बराबर मात्रा में मिला कर पाउडर बना लें। इस पाउडर का 1 ग्राम प्रतिदिन शहद के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है (और पढ़ें - शहद खाने के फायदे)

साइनसाइटिस हो तो करें ये परहेज
सावधानियां: साइनस की समस्या में भुनी, तली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए और ठंडा पानी पीने से भी बचें।  


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पेट की गैस के लिए योग

 
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आजकल गैस लोगों की रोजमर्रा की परेशानियों में से एक है, लेकिन अत्यधिक गैस असहज और शर्मनाक हो सकती है। सौभाग्य से, योग ने इन परेशानियों से आपको बचाया हुआ है। कई विशिष्ट योग से गैस और सूजन को आपके पाचन तंत्र से दूर करने में मदद मिलती है। 

पेट की गैस को दूर करने के लिए पवनमुक्तासन - 
यह मुद्रा विशेष रूप से पाचन तंत्र में फंसी गैस को निकालने के लिए ही बनायीं गयी है। इस आसन को करने से आपके पेट पर दबाव बनता है और गैस को निकलने में आसानी होती है।

कैसे करें - अपनी पीठ के बल लेट जाइये और पैरों को साथ में जोड़ लें। दाएँ घुटने को आप अपनी दाईं छाती के पास लाएं और घुटने को हाथों से पकड़ते हुए पेट पर दबाएँ। ध्यान रहे आपके कंधे ज़मीन से छूने चाहिए। दोबारा से एक लंबी गहरी साँस लें और छोड़ते हुए अपने बाएं ओर भी यही प्रक्रिया करें। दोनों तरफ की प्रक्रियाओं को उसी स्तिथि में करने के बाद आखिर में दोनों पैरों के घुटनों को एक साथ छाती के पास लायें और छाती पर दबाव बनाएँ। शरीर को छोड़ते हुए पेट से लम्बी गहरी सांस लें और विश्राम करें। 

गैस को दूर करने का उपाय है सुप्त मत्स्येन्द्रासन - 
इस मुद्रा में आप धड़ को मोड़ते वक़्त एक गहरी सांस लेते हैं जिस वजह से आपकी आँतों पर दबाव बनता है और एक प्रकार की मालिश होती है। ये योगासन करने से आपके पेट में गैस नहीं बनती।

कैसे करें - पीठ के बल आप ज़मीन पर सीधा लेट जाइये। अब अपने दोनो हाथों को कंधों की सिधाई में दोनो ओर फैला लीजिये। दाएं पैर को घुटने से मोड़ें और ऊपर की तरफ उठायें। दाईं टांग को अब बायें घुटने पर टिकायें। अब साँस को छोड़ते हुए अपने दायें कूल्हे को उठायें, पीठ को बाईं तरफ मोड़ें और दायें घुटने को नीचे की ओर जाने दीजिये। इस प्रक्रिया को करते समय दोनो हाथ ज़मीन पर टिके रहने चाहिए। कोशिश करें कि दायां घुटना पूरी तरह शरीर के बाईं तरफ ज़मीन पर टिका रहे। सिर को दाईं तरफ घुमाइये। अब आप सुप्त मत्स्येन्द्रासन की मुद्रा में हैं। अब गहरी सांस लें और छोड़ दें, फिर इस प्रक्रिया को दुबारा बाएं ओर भी करें। 

अनंदा बालासन से दूर करें पेट की गैस - 
इस आसन के नाम से ही आपको संकेत मिल गया होगा कि ये आसन आपको कितनी ख़ुशी दे सकता है जब आप पेट की गैस से निजात पा लेंगे।

कैसे करें - सबसे पहले पीठ के बल लेट जाएँ। अब सांस को छोड़ें और घुटनों को पेट के करीब लाएं। अब गहरी सांस लें और पैरों के तलवों को हाथों से पकड़ें। इसे धीरे-धीरे उपर की तरफ ले जाएँ और घुटनों के बीच दूरी बनाएं। अब हाथों से पैरों को नीचे की तरफ थोड़ा खीचें जिस वजह से आपकी मांसपेशियों में दबाव बनेगा और गैस को निकलने में आसानी होगी। अब धीरे-धीरे वापस सीधे हो जाएँ और विश्राम करें। 

मार्जारी आसान करे पेट गैस को कम -
अगर जड़ से आपको अपनी पेट की गैस का इलाज करना है तो ये आसन आपके लिए बहुत लाभकारी है।

कैसे करें : सबसे पहले घुटनों के बल बैठें। अपने शरीर को आगे की तरफ ले जाकर हथेलियों को ज़मीन से टिका दें। गहरी सांस लेते हुए पेट को अपने ज़मीन की तरफ झुकाएं और कूल्हों को उपर की तरह उठायें। शरीर को इसी अवस्था में कुछ देर के लिए रोके रखें। अब सांस छोड़ते हुए ये प्रक्रिया उलटी करें। गर्दन को नीचे की तरफ ले जाएँ और कूल्हों को झुका दें। इस प्रक्रिया को आप बार-बार दोहराएं। 

पेट की गैस को कम करने का तरीका है वज्रासन - 
वज्रासन करने से आपकी पाचन शक्ति अच्छी होती है और किसी भी प्रकार की गैस या जलन का बनना नामुमकिन है। 

कैसे करें - सबसे पहले बैठ जाइये और टांगो को सीधा कर लीजिये। अब अपने दोनों पैरों को एक-एक कर कूल्हों के नीचे रख लें। दोनों पैरो के अंगूठों को आपस में मिलाएं और एडियों के बीच थोड़ी दूरी बनाएं रखें। शरीर का पूरा भार अपने पैरों पर रख दें। अब आराम से अपने दोनों हाथो को जांघो पर रखें। कमर को एकदम सीधी रखें। इसी अवस्था में दस मिनट तक रहना है और लम्बी-लम्बी सांसे लेनी हैं। 

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गठिया (आर्थराइटिस) के लिए योग

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गठिया के सबसे आम प्रकार को ऑस्टियोआर्थराइटिस कहा जाता है। यह एक जोड़ों का रोग है जिसमें स्वस्थ उपास्थि जो जोड़ों में हड्डियों को कुशन करता है, धीरे धीरे ख़तम होने लगता है। इससे जोड़ों में कठोरता, दर्द, सूजन, रेंज ऑफ मोशन भी कम हो जाती है। योग दर्द प्रबंधन को बढ़ा सकता है, जिससे अंगों की कार्यकौशलता में सुधार होता है।

कैसे गठिया में लाभदायक है योग - 
सौभाग्य से, जीवन शैली में परिवर्तन — ख़ास तौर से योग को अपनाना — ऑस्टियोआर्थराइटिस और अन्य तरह के गठिया या आर्थराइटिस के लक्षणों को सुधारने में मदद कर सकता है। यहाँ दिए गये योगासन आपके जोसों पे सौम्य हैं, लेकिन किसी भी नए व्यायाम आहार शुरू करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर से ज़रूर सलाह करें। किसी योग गुरु के निर्देशन में यह या अन्य आसन करना बेहतर होगा क्योंकि वह आपकी शारीरिक क्षमता के अनुसार इन आसनों में परिवर्तन कर सकते हैं।

सुक्ष्म व्यायाम करेगा गठिया की ट्रीटमेंट में फायदा - 
सुक्ष्म व्यायाम कुछ आसान स्ट्रेचिंग एक्सर्साइज़ होती हैं जो हमें हर योग अभ्यास सेपहले करनी चाहियें। यह जोड़ों और मासपेशियों पर सौम्या होती हैं और इन्हे कोई भी बिना ज़्यादा परेशानी के कर सकता है। सुक्ष्म व्यायाम गठिया के रोगियों के लिए ख़ास तौर से लाभदायक होता है क्योंकि यह संपूर्ण शरीर का व्यायाम करवा देता है। सुक्ष्म व्यायाम 4-5 मिनिट के लिए करें और जैसे अभ्यास बढ़ने लगे, इसे ज़्यादा देर कर सकते हैं। (और पढ़ें: सुक्ष्म व्यायाम करने का तरीका और फायदे)

पर्श्वोत्तनासन है गठिया का इलाज - 
पर्श्वोत्तनासन आपके कूल्हों, कंधों, कलाईयों और बाज़ुओं के लिए अच्छा होता है। अगर आपको इनमें से किसी भी अंग में परेशानी हो तो इस आसन को ज़रूर करें। ध्यान रहे की शुरुआत में थोड़ी कम देर करें और अगर परेशानी ना बढ़े तो अवधि बढ़ा सकते हैं। पर्श्वोत्तनासन को 1-2 मिनिट के लिए करें, और जैसे अभ्यास बढ़ने लगे, इसे ज़्यादा देर कर सकते हैं। (और पढ़ें: पर्श्वोत्तनासन करने का तरीका और फायदे)

उत्तानासन है गठिया में लाभदायक - 
हैमस्ट्रिंग, पिंडली, और कूल्हों के लिए अच्छा होता है। अगर आपको टाँगों या हिप्स में परेशानी हो तो इस आसन को ज़रूर करें। ध्यान रहे की शुरुआत में थोड़ी कम देर करें, ज़्यादा नीचे ना झुकें और अगर परेशानी ना बढ़े तो अवधि बढ़ा सकते हैं या ज़्यादा नीचे झुक सकते हैं। उत्तानासन को 1-2 मिनिट के लिए करें, और जैसे अभ्यास बढ़ने लगे, इसे ज़्यादा देर कर सकते हैं। (और पढ़ें: उत्तानासन करने का तरीका और फायदे)

वीरभद्रासन है गठिया में लाभदायक - 
जाँघ, पिंडली, टख़नों और कंधों के लिए लाभदायक होता है। अगर आपको टाँगों या कंधों में परेशानी हो तो इसका अभ्यास करें। ध्यान रहे की शुरुआत में ज़्यादा देर के लिए ना करें, टाँगों को ज़्यादा ना मोड़ें (ख़ास तौर से अगर घुटनों में दर्द हो) और अगर परेशानी ना बढ़े तो अवधि बढ़ा सकते हैं या ज़्यादा टाँगों को मोड़ सकते हैं। वीरभद्रासन को शुरुआत में सिर्फ़ 1-2 मिनिट के लिए ही करें। (और पढ़ें: वीरभद्रासन करने का तरीका और फायदे)

अर्ध मत्स्येन्द्रासन है गठिया के लिए फायदेमंद - 
रीढ़ की हड्डी, कूल्हों और घुटनों के जोड़ों के लिए अच्छा होता है। अगर आपको इनमें से किसी भी अंग में परेशानी हो तो इसका अभ्यास करें। ध्यान रहे की शुरुआत में थोड़ी देर के लिए ही करें, पीठ को ज़्यादा ना मोड़ें (ख़ास तौर से अगर पीठ में दर्द हो) और अगर परेशानी ना बढ़े तो अवधि बढ़ा सकते हैं या ज़्यादा टाँगों को मोड़ सकते हैं। अर्ध मत्स्येन्द्रासन को शुरुआत में सिर्फ़ 1 मिनिट के लिए ही करें। (और पढ़ें: अर्ध मत्स्येन्द्रासन करने का तरीका और फायदे)

शवासन करेगा गठिया की ट्रीटमेंट में फायदा - 
शवासन में आपका शरीर सबसे अधिक आराम की स्तिथि में होता है। इस आसन को योगाभ्यास के अंत में ज़रूर। इस आसन को भी 5-10 मिनिट के लिए करें।

इन बातों का खास तौर से ध्यान रखें:
  • याद रहे की योगाभ्यास से आराम निरंतर अभ्यास करने के बाद ही मिलता है और धीरे धीरे मिलता है।
  • आसन से जोड़ों का दर्द बढे नहीं, इसके लिए अभ्यास के दौरान शरीर को सहारा देने वाली वस्तुओं, तकियों व अन्य उपकरणों की सहायता जैसे ज़रूरी समझें वैसे लें।
  • अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक जोर न दें। अगर दर्द बढ़ जाता है तो तुरंत योगाभ्यास बंद कर दें और चिकित्सक से परामर्श करें।
  

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माइग्रेन के लिए योग

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माइग्रेन सामान्य सिरदर्द की तुलना में अधिक तीव्र होता है। आम तौर से माइग्रेन सिर के एक तरफ एक धड़कते दर्द के रूप में होता है। और माइग्रेन अक्सर मतली, चक्कर आना, और प्रकाश व ध्वनि के प्रति संवेदनशीलता के साथ होते हैं। यह कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक रह सकते हैं।

कैसे माइग्रेन में लाभदायक है योग - 
न केवल माइग्रेन से लड़ने के लिए योग का एक समग्र तरीका है, बल्कि योग दर्द कम करने में भी सक्रिय है। शोध से पता चला है कि माइग्रेन की आवृत्ति और तीव्रता अपने नियमित उपचार के साथ योग का अभ्यास करने से कम हो जाती है। चुनिंदा योगासन तनाव को कम करते हैं, जो कि माइग्रेन का एक मूल कारण है। योग व्यक्ति को मान को आराम देना का एक मौका देता है, और शरीर में वास्तव में रक्त परिसंचरण में सुधार करता है। अगर रक्त परिसंचरण में सुधार आता हैं, तो अवश्य ही माइग्रेन और तनाव से राहत मिलती है।

तो आइए जानें की कौन से योगासन माइग्रेन से पीड़ित अवस्था में करने चाहिए।

बालासन है माइग्रेन का इलाज - 
बालासन में आपके संपूर्ण शरीर को आराम मिलता है। यह ना ही माइग्रेन कम करता है बल्कि थकान ममिटाने में भी मदद करता है। बालासन को 1-2 मिनिट के लिए करें। (और पढ़ें: बालासन करने का तरीका और फायदे)

मार्जरी आसन है माइग्रेन के लिए फायदेमंद - 
मार्जरी आसन रक्त परिसंचरण में सुधार लाता है और मन को भी आराम देता है। यह दोनो ही माइग्रेन को कम करने में काम आते हैं। इस आसन को 1-2 मिनिट के लिए करें।

उत्तानासन है माइग्रेन में लाभदायक - 
उत्तानासन रक्त की आपूर्ति को बढ़ाकर तंत्रिका तंत्र को मज़बूत बनाता है और मन को शांत करता है। इस आसन को 1 मिनिट के लिए करें। (और पढ़ें: उत्तानासन करने का तरीका और फायदे) उत्तानासन के बाद आप पादहस्तासन भी कर सकते हैं। यह भी माइग्रेन से राहत दिलाने में सक्रिय है। पादहस्तासन को 1 मिनिट के लिए करें।

पश्चिमोत्तानासन करेगा माइग्रेन के उपचार में सहायता - 
पश्चिमोत्तानासन मस्तिष्क को शांत करता है और तनाव से राहत देता है। यह आसन भी सिरदर्द से राहत देता है। पश्चिमोत्तानासन को 1 मिनिट के लिए करें। (और पढ़ें: पश्चिमोत्तानासन करने का तरीका और फायदे) पश्चिमोत्तानासन के बाद आप जानुशीर्षासन भी कर सकते हैं। यह भी माइग्रेन से राहत दिलाने में मदद करता है। जानुशीर्षासन को 1 मिनिट के लिए करें। (और पढ़ें: जानुशीर्षासन करने का तरीका और फायदे)

अधो मुख श्वानासन करेगा माइग्रेन की ट्रीटमेंट में फायदा - 
अधो मुख श्वानासन मस्तिष्क में रक्त परिसंचरण बढ़ता है और इस से सिरदर्द से राहत मिलती है। इस आसन को भी 1 मिनिट के लिए करें। (और पढ़ें: अधो मुख श्वानासन करने का तरीका और फायदे)

शवासन करेगा माइग्रेन की ट्रीटमेंट में फायदा -
शवासन में आपका शरीर सबसे अधिक आराम की स्तिथि में होता है। माइग्रेन से राहत पाने में यह आसन बहुत मदद करता है। शवासन 5-10 मिनिट के लिए करें। 

इन बातों का खास तौर से ध्यान रखें:

  • याद रहे की योगाभ्यास से आराम निरंतर अभ्यास करने के बाद ही मिलता है और धीरे धीरे मिलता है।
  • योगासन से जोड़ों का दर्द बढे नहीं, इसके लिए अभ्यास के दौरान शरीर को सहारा देने वाली वस्तुओं, तकियों व अन्य उपकरणों की सहायता जैसे ज़रूरी समझें वैसे लें।
  • अपनी शारीरिक क्षमता से अधिक जोर न दें। अगर दर्द बढ़ जाता है तो तुरंत योगाभ्यास बंद कर दें व चिकित्सक से परामर्श करें।
  

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