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गोण्डा- डंपर के आगे आयी कार भिडी,कार चालक की मौत

 
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कर्नलगंज-गोण्डा। जनपद के कर्नलगंज कोतवाली क्षेत्र के भंभुवा पुलिस चौकी क्षेत्र के मसवलिया प्रहलादगंज मोड़ के पास शुक्रवार दोपहर बाद डंपर के आगे आयी कार भिड़ गई। हादसे में लखनऊ के कार चालक की मौके पर ही मौत हो गई। सूचना के बाद भी देरी पहुंची पुलिस ने किसी तरह कार में फंसे चालक का शव बाहर निकाला। इसके बाद हाईवे पर वाहनों की आवाजाही फिर से शुरू हो सकी। घटनाक्रम के अनुसार शुक्रवार की दोपहर बाद करनैलगंज से जरवल की ओर जा रहा डंपर जा रहा था। मसवलिया प्रहलादगंज के पास स्थित पुल के डिवाडर के पास पहुंचा तो गोण्डा की ओर आ रही कार अचानक डिवाडर से टकराकर अचानक दूसरी तरफ के लेन में आ गई। जिससे दोनों वाहनों की आमने-सामने जबरदस्त भिड़ंत हो गई। हादसे के बाद डम्पर भी सड़क से नीचे चला गया। आसपास के लोग तुरंत मौके पर पहुंचे और घटना की सूचना भंभुवा पुलिस चौकी पर दी। गांववालों ने बताया कि सूचना देने के बाद भी पुलिस देर से पहुंची। गांववालों की मदद से कार में फंसे कार चालक का शव को बाहर निकाला गया। उसकी पहचान लखनऊ मे कानपुर रोड स्थित एलडीए कॉलोनी के हरिओम गुप्ता के रूप में हुई। चौकी प्रभारी उमेश सिंह ने बताया कि मृतक के भाई को सूचना दे दी गयी है। आगे की कार्रवई चल रही है। कोतवाल सुधीर कुमार सिंह ने बताया कि दुर्घटना के कारणों का पता लगाया जा रहा है। फिलहाल डंपर चालक की तलाश की जा रही है।

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पति प्राप्ति के लिए पार्वती स्तोत्र

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यदि कन्या विवाह में देरी हो रही है या कन्या के योग्य कोई अच्छा वर नहीं मिल रहा हो तब प्रतिदिन माता पार्वती का पूजन करते हुए इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए, ऎसा करने पर शीघ्र ही सुयोग्य वर मिलेगा. 

जानकीकृतं पार्वतीस्तोत्रम्


जानकी उवाच 

शक्तिस्वरूपे सर्वेषां सर्वाधारे गुणाश्रये ।
सदा शंकरयुक्ते च पतिं देहि नमोsस्तु ते ।।1।।

सबकी शक्ति स्वरूपे ! शिवे ! आप सम्पूर्ण जगत की आधारभूता हैं. समस्त सद्गुणों की निधि हैं तथा सदा भगवान शंकर के संयोग-सुख का अनुभव करने वाली हैं, आपको नमस्कार ह. आप मुझे सर्वश्रेष्ठ पति दीजिए।।1।।

सृष्टिस्थित्यन्त रूपेण सृष्टिस्थित्यन्त रूपिणी । 
सृष्टिस्थियन्त बीजानां बीजरूपे नमोsस्तु ते ।।2।।

सृष्टि पालन और संहार के जो बीज हैं, उनकी भी बीजस्वरुपिणी आपको नमस्कार है ।।2।।

हे गौरि पतिमर्मज्ञे पतिव्रतपरायणे ।
पतिव्रते पतिरते पतिं देहि नमोsस्तु ते ।।3।।

पति के मर्म को जानने वाली पतिव्रतपरायणे गौरि ! पतिव्रते ! पति अनुरागिणी ! मुझे पति दीजिए, आपको नमस्कार है ।।3।।

सर्वमंगल मंगल्ये सर्वमंगल संयुते ।
सर्वमंगल बीजे च नमस्ते सर्वमंगले ।।4।।

आप समस्त मंगलों के लिए भी मंगलकारिणी हैं. संपूर्ण मंगलों से संपन्न हैं, सभी प्रकार के मंगलों की बीजरूपा हैं, सर्वमंगले ! आपको नमस्कार है ।।4।।

सर्वप्रिये सर्वबीजे सर्व अशुभ विनाशिनी ।
सर्वेशे सर्वजनके नमस्ते शंकरप्रिये ।।5।।

आप सबको प्रिय हैं, सबकी बीजरूपिणी हैं, समस्त अशुभों का विनाश करने वाली हैं. सबकी ईश्वरी तथा सर्वजननी हैं, शंकरप्रिये आपको नमस्कार है ।।5।।

परमात्मस्वरूपे च नित्यरूपे सनातनि ।
साकारे च निराकारे सर्वरूपे नमोsस्तु ते ।।6।।

हे परमात्मस्वरूपे ! नित्यरूपिणी ! सनातनि ! आप साकार और निराकार भी हैं, सर्वरूपे ! आपको नमस्कार है।।6।।

क्षुत् तृष्णेच्छा दया श्रद्धा निद्रा तन्द्रा स्मृति: क्षमा ।
एतास्तव कला: सर्वा: नारायणि नमोsस्तु ते ।।7।।

क्षुधा, तृष्णा, इच्छा, दया, श्रद्धा, निद्रा, तन्द्रा, स्मृति और क्षमा – ये सब आपकी कलाएँ हैं, नारायणि आपको नमस्कार है।।7।।

लज्जा मेधा तुष्टि पुष्टि शान्ति संपत्ति वृद्धय: ।
एतास्त्व कला: सर्वा: सर्वरूपे नमोsस्तु ते ।।8।।

लज्जा, मेधा, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, सम्पत्ति और वृद्धि – ये सब भी आपकी ही कलाएँ हैं, सर्वरूपिणी ! आपको नमस्कार है।।8।।

दृष्टादृष्ट स्वरूपे च तयोर्बीज फलप्रदे ।
सर्वानिर्वचनीये च महामाये नमोsस्तु ते ।।9।।

दृष्ट और अदृष्ट दोनों आपके ही स्वरूप हैं, आप उन्हें बीज और फल दोनों प्रदान करती हैं. कोई भी आपको निर्वचन नहीं कर सकता है. हे महामाये ! आपको नमस्कार है ।।9।।

शिवे शंकर सौभाग्ययुक्ते सौभाग्यदायिनि ।
हरिं कान्तं च सौभाग्यं देहि देवी नमोsस्तु ते ।।10।।

शिवे आप शंकर संबंधी सौभाग्य से संपन्न हैं तथा सबको सौभाग्य देने वाली हैं. देवी ! श्री हरि ही मेरे प्राणवल्लभ और सौभाग्य हैं. उन्हें मुझे दीजिए. आपको नमस्कार है ।।10।।

स्तोत्रणानेन या: स्तुत्वा समाप्ति दिवसे शिवाम् ।
नमन्ति परया भक्त्या ता लभन्ति हरिं पतिम् ।।11।।

जो स्त्रियाँ व्रत की समाप्ति पर इस स्तोत्र से शिवादेवी की स्तुति कर भक्तिपूर्वक उन्हें मस्तक झुकाती हैं, वे साक्षात श्रीहरि को पतिरूप में पाती हैं ।।11।।

इह कान्तसुखं भुक्त्वा पतिं प्राप्य परात्परम् ।
दिव्यं स्यन्दनमारुह्य यान्त्यन्ते कृष्णसंनिधिम् ।।12।।

इस लोक में परात्पर परमेश्वर को पतिरूप में पाकर कान्त सुख का उपभोग करके अन्त में दिव्य विमान पर चढ़कर भगवान श्रीकृष्ण के समीप चली जाती हैं ।।12।।

श्री ब्रह्मवैवर्त पुराणे जानकीकृतं पार्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।


( श्री ब्रह्मवैवर्त पुराण में जानकी जी द्वारा किया गया पार्वती स्तोत्र पूर्ण हुआ)


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श्री भगवती स्तोत्रम्

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जय भगवति देवि नमो वरदे, जय पापविनाशिनि बहुफलदे ।
जय शुम्भ-निशुम्भ-कपालधरे, प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे ।।1।।

जय चन्द्रदिवाकर नेत्रधरे, जय पावक भूषितवक्त्रवरे ।
जय भैरवदेहनिलीनपरे, जय अन्धकदैत्य विशोषकरे ।।2।।

जय महिषविमर्दिनिशूलकरे, जय लोकसमस्तकपापहरे ।
जय देवि पितामहविष्णुनते, जय भास्करशक्रशिरोsवनते ।।3।।

जय षण्मुख सायुधईशनुते, जय सागर गामिनि शम्भुनुते ।
जय दु:खदरिद्रविनाशकरे, जय पुत्रकलत्रविवृद्धकरे ।।4।।

जय देवि समस्त शरीरधरे, जय नाक विदर्शिनि दु:खहरे ।
जय व्याधि विनाशिनि मोक्ष करे, जय वांछित दायिनि सिद्धिवरे ।।5।।

एतव्द्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि: ।
गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा ।।6।।

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महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र

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विनियोगः
ॐ अस्य श्री महाकाल शनि मृत्युञ्जय स्तोत्र मन्त्रस्य पिप्लाद ऋषिरनुष्टुप्छन्दो महाकाल शनिर्देवता शं बीजं मायसी शक्तिः काल पुरुषायेति कीलकं मम अकाल अपमृत्यु निवारणार्थे पाठे विनियोगः।

श्री गणेशाय नमः
ॐ महाकाल शनि मृत्युंजयाय नमः।
नीलाद्रीशोभाञ्चितदिव्यमूर्तिः खड्गो त्रिदण्डी शरचापहस्तः।
शम्भुर्महाकालशनिः पुरारिर्जयत्यशेषासुरनाशकारी ॥
मेरुपृष्ठे समासीनं सामरस्ये स्थितं शिवम्‌ ।
प्रणम्य शिरसा गौरी पृच्छतिस्म जगद्धितम्‌ ॥

पार्वत्युवाच
भगवन्‌ ! देवदेवेश ! भक्तानुग्रहकारक ! । अल्पमृत्युविनाशाय यत्त्वया पूर्व सूचितम्‌ ॥
तदेवत्वं महाबाहो ! लोकानां हितकारकम्‌ ।तव मूर्ति प्रभेदस्य महाकालस्य साम्प्रतम्‌ ॥

शनेर्मृत्युञ्जयस्तोत्रं ब्रूहि मे नेत्रजन्मनः ।अकाल मृत्युहरणमपमृत्यु निवारणम्‌ ॥
शनिमन्त्रप्रभेदा ये तैर्युक्तं यत्स्तवं शुभम्‌ । प्रतिनाम चथुर्यन्तं नमोन्तं मनुनायुतम्‌ ॥

नित्ये प्रियतमे गौरि सर्वलोक-हितेरते । गुह्याद्गुह्यतमं दिव्यं सर्वलोकोपकारकम्‌ ॥
शनिमृत्युञ्जयस्तोत्रं प्रवक्ष्यामि तवऽधुना । सर्वमंगलमांगल्यं सर्वशत्रु विमर्दनम्‌ ॥

सर्वरोगप्रशमनं सर्वापद्विनिवारणम्‌ । शरीरारोग्यकरणमायुवर्वृद्दिकरं नृणाम्‌ ॥
यदि भक्तासि मे गौरी गोपनीयं प्रयत्नतः । गोपितं सर्वतन्त्रेषु तच्छ्रणुष्व महेश्वरी ! ॥

ऋषिन्यासं करन्यासं देहन्यासं समाचरेत्‌ ।महोग्रं मूर्घ्नि विन्यस्य मुखे वैवस्वतं न्यसेत्‌ ॥
गले तु विन्यसेन्मन्दं बाह्वोर्महाग्रहं न्यसेत्‌ । हृदि न्यसेन्महाकालं गुह्ये कृशतनुं न्यसेत्‌ ॥

जान्वोम्तूडुचरं न्यस्य पादयोस्तु शनैश्चरम्। एवं न्यासविधि कृत्वा पश्चात्‌ कालात्मनः शनेः ॥
न्यासं ध्यानं प्रवक्ष्यामि तनौ श्यार्वा पठेन्नरः। कल्पादियुगभेदांश्च करांगन्यासरुपिणः ॥

कालात्मनो न्यसेद् गात्रे मृत्युञ्जय ! नमोऽस्तु ते । मन्वन्तराणि सर्वाणि महाकालस्वरुपिणः ॥
भावयेत्प्रति प्रत्यंगे महाकालाय ते नमः। भावयेत्प्रभवाद्यब्दान्‌ शीर्षे कालजिते नमः ॥

नमस्ते नित्यसेव्याय विन्यसेदयने भ्रुवोः। सौरये च नमस्तेऽतु गण्डयोर्विन्यसेदृतून्‌ ॥
श्रावणं भावयेदक्ष्णोर्नमः कृष्णनिभाय च। महोग्राय नमो भार्दं तथा श्रवणयोर्न्यसेत्‌ ॥

नमो वै दुर्निरीक्ष्याय चाश्विनं विन्यसेन्मुखे। नमो नीलमयूखाय ग्रीवायां कार्तिकं न्यसेत्‌ ॥
मार्गशीर्ष न्यसेद्-बाह्वोर्महारौद्राय ते नमः। ऊर्द्वलोक-निवासाय पौषं तु हृदये न्यसेत्‌ ॥

नमः कालप्रबोधाय माघं वै चोदरेन्यसेत्‌ । मन्दगाय नमो मेढ्रे न्यसेर्द्वफाल्गुनं तथा ॥
ऊर्वोर्न्यसेच्चैत्रमासं नमः शिवोस्भवाय च । वैशाखं विन्यसेज्जान्वोर्नमः संवर्त्तकाय च ॥

जंघयोर्भावयेज्ज्येष्ठं भैरवाय नमस्तथा। आषाढ़ं पाद्योश्चैव शनये च नमस्तथा ॥
कृष्णपक्षं च क्रूराय नमः आपादमस्तके। न्यसेदाशीर्षपादान्ते शुक्लपक्षं ग्रहाय च ॥

नयसेन्मूलं पादयोश्च ग्रहाय शनये नमः।नमः सर्वजिते चैव तोयं सर्वांगुलौ न्यसेत्‌ ॥
न्यसेद्-गुल्फ-द्वये विश्वं नमः शुष्कतराय च। विष्णुभं भावयेज्जंघोभये शिष्टतमाय ते ॥

जानुद्वये धनिष्ठां च न्यसेत्‌ कृष्णरुचे नमः। ऊरुद्वये वारुर्णांन्यसेत्कालभृते नमः ॥
पूर्वभाद्रं न्यसेन्मेढ्रे जटाजूटधराय च। पृष्ठउत्तरभाद्रं च करालाय नमस्तथा ॥

रेवतीं च न्यसेन्नाभो नमो मन्दचराय च । गर्भदेशे न्यसेद्दस्त्रं नमः श्यामतराय च ॥
नमो भोगिस्त्रजे नित्यं यमं स्तनयुगे न्यसेत्‌ । न्येसत्कृत्तिकां हृदये नमस्तैलप्रियाय च ॥

रोहिणीं भावयेद्धस्ते नमस्ते खड्गधारीणे। मृगं न्येसतद्वाम हस्ते त्रिदण्डोल्लसिताय च ॥
दक्षोर्द्ध्व भावयेद्रौद्रं नमो वै बाणधारिणे । पुनर्वसुमूर्द्ध्व नमो वै चापधारिणे ॥

तिष्यं न्यसेद्दक्षबाहौ नमस्ते हर मन्यवे । सार्पं न्यसेद्वामबाहौ चोग्रचापाय ते नमः ॥
मघां विभावयेत्कण्ठे नमस्ते भस्मधारिणे । मुखे न्यसेद्-भगर्क्ष च नमः क्रूरग्रहाय च ॥

भावयेद्दक्षनासायामर्यमाणश्व योगिने । भावयेद्वामनासायां हस्तर्क्षं धारिणे नमः ॥
त्वाष्ट्रं न्यसेद्दक्षकर्णे कृसरान्न प्रियाय ते । स्वातीं न्येसद्वामकर्णे नमो बृह्ममयाय ते ॥

विशाखां च दक्षनेत्रे नमस्ते ज्ञानदृष्टये । विष्कुम्भं भावयेच्छीर्षेसन्धौ कालाय ते नमः ॥
प्रीतियोगं भ्रुवोः सन्धौ महामन्दं ! नमोऽस्तु ते । नेत्रयोः सन्धावायुष्मद्योगं भीष्माय ते नमः ॥

सौभाग्यं भावयेन्नासासन्धौ फलाशनाय च । शोभनं भावयेत्कर्णे सन्धौ पिण्यात्मने नमः ॥
नमः कृष्णयातिगण्डं हनुसन्धौ विभावयेत्‌ । नमो निर्मांसदेहाय सुकर्माणं शिरोधरे ॥

धृतिं न्यसेद्दक्षवाहौ पृष्ठे छायासुताय च । तन्मूलसन्धौ शूलं च न्यसेदुग्राय ते नमः ॥
तत्कूर्परे न्यसेदगण्डे नित्यानन्दाय ते नमः । वृद्धिं तन्मणिबन्धे च कालज्ञाय नमो न्यसेत्‌ ॥

ध्रुवं तद्ङ्गुली-मूलसन्धौ कृष्णाय ते नमः । व्याघातं भावयेद्वामबाहुपृष्ठे कृशाय च ॥
हर्षणं तन्मूलसन्धौ भुतसन्तापिने नमः । तत्कूर्परे न्यसेद्वज्रं सानन्दाय नमोऽस्तु ते ॥

सिद्धिं तन्मणिबन्धे च न्यसेत्‌ कालाग्नये नमः । व्यतीपातं कराग्रेषु न्यसेत्कालकृते नमः ॥
वरीयांसं दक्षपार्श्वसन्धौ कालात्मने नमः । परिघं भावयेद्वामपार्श्वसन्धौ नमोऽस्तु ते ॥

न्यसेद्दक्षोरुसन्धौ च शिवं वै कालसाक्षिणे । तज्जानौ भावयेत्सिद्धिं महादेहाय ते नमः ॥
साध्यं न्यसेच्च तद्-गुल्फसन्धौ घोराय ते नमः । न्यसेत्तदंगुलीसन्धौ शुभं रौद्राय ते नमः ॥

न्यसेद्वामारुसन्धौ च शुक्लकालविदे नमः । ब्रह्मयोगं च तज्जानो न्यसेत्सद्योगिने नमः ॥
ऐन्द्रं तद्-गुल्फसन्धौ च योगाऽधीशाय ते नमः। न्यसेत्तदंगुलीसन्धौ नमो भव्याय वैधृतिम्‌ ॥

चर्मणि बवकरणं भावयेद्यज्वने नमः । बालवं भावयेद्रक्ते संहारक ! नमोऽस्तु ते ॥
कौलवं भावयेदस्थ्नि नमस्ते सर्वभक्षिणे । तैत्तिलं भावयेन्मसि आममांसप्रियाय ते ॥

गरं न्यसेद्वपायां च सर्वग्रासाय ते नमः। न्यसेद्वणिजं मज्जायां सर्वान्तक ! नमोऽस्तुते ॥
विर्येविभावयेद्विष्टिं नमो मन्यूग्रतेजसे । रुद्रमित्र ! पितृवसुवारीण्येतांश्च पञ्च च ॥

मुहूर्तांश्च दक्षपादनखेषु भावयेन्नमः । खगेशाय च खस्थाय खेचराय स्वरुपिणे ॥
पुरुहूतशतमखे विश्ववेधो-विधूंस्तथा । मुहूर्तांश्च वामपादनखेषु भावयेन्नमः ॥

सत्यव्रताय सत्याय नित्यसत्याय ते नमः। सिद्धेश्वर ! नमस्तुभ्यं योगेश्वर ! नमोऽस्तुते ॥
वह्निनक्तंचरांश्चैव वरुणार्यमयोनकान्‌ । मुहूर्तांश्च दक्षहस्तनखेषु भावयेन्नमः ॥

लग्नोदयाय दीर्घाय मार्गिणे दक्षदृष्टये। वक्राय चातिक्रूराय नमस्ते वामदृष्टये ॥
वामहस्तनखेष्वन्त्यवर्णेशाय नमोऽस्तुते ।गिरिशाहिर्बुध्न्यपूषाजपष्द्दस्त्रांश्च भावयेत्‌ ॥

राशिभोक्त्रे राशिगाय राशिभ्रमणकारिणे। राशिनाथाय राशीनां फलदात्रे नमोऽस्तु ते ॥
यमाग्नि-चन्द्रादितिजविधातृंश्च विभावयेत्‌। ऊर्द्ध्व-हस्त-दक्षनखेष्वत्यकालाय ते नमः ॥

तुलोच्चस्थाय सौम्याय नक्रकुम्भगृहाय च। समीरत्वष्टजीवांश्च विष्णु तिग्म द्युतीन्नयसेत्‌ ॥
ऊर्ध्व-वामहस्त-नखेष्वन्यग्रह निवारिणे । तुष्टाय च वरिष्ठाय नमो राहुसखाय च ॥

रविवारं ललाटे च न्यसेद्-भीमदृशे नमः। सोमवारं न्यसेदास्ये नमो मृतप्रियाय च ॥
भौमवारं न्यसेत्स्वान्ते नमो ब्रह्म-स्वरुपिणे। मेढ्रं न्यसेत्सौम्यवारं नमो जीव-स्वरुपिणे ॥

वृषणे गुरुवारं च नमो मन्त्र-स्वरुपिणे । भृगुवारं मलद्वारे नमः प्रलयकारिणे ॥
पादयोः शनिवारं च निर्मांसाय नमोऽस्तु ते। घटिका न्यसेत्केशेषु नमस्ते सूक्ष्मरुपिणे ॥

कालरुपिन्नमस्तेऽस्तु सर्वपापप्रणाशकः !। त्रिपुरस्य वधार्थांय शम्भुजाताय ते नमः ॥
नमः कालशरीराय कालनुन्नाय ते नमः । कालहेतो ! नमस्तुभ्यं कालनन्दाय वै नमः ॥

अखण्डदण्डमानाय त्वनाद्यन्ताय वै नमः । कालदेवाय कालाय कालकालाय ते नमः॥
निमेषादिमहाकल्पकालरुपं च भैरवम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥

दातारं सर्वभव्यानां भक्तानामभयंकरम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥
कर्त्तारं सर्वदुःखानां दुष्टानां भयवर्धनम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌॥

हर्त्तारं ग्रहजातानां फलानामघकारिणाम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥
सर्वेषामेव भूतानां सुखदं शान्तमव्ययम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥

कारणं सुखदुःखानां भावाऽभाव-स्वरुपिणम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥
अकाल-मृत्यु-हरणऽमपमृत्यु निवारणम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥

कालरुपेण संसार भक्षयन्तं महाग्रहम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥
दुर्निरीक्ष्यं स्थूलरोमं भीषणं दीर्घ-लोचनम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥

ग्रहाणां ग्रहभूतं च सर्वग्रह-निवारणम्‌ । मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम्‌ ॥
कालस्य वशगाः सर्वे न कालः कस्यचिद्वशः । तस्मात्त्वां कालपुरुषं प्रणतोऽस्मि शनैश्चरम्‌ ॥

कालदेव जगत्सर्वं काल एव विलीयते । कालरुपं स्वयं शम्भुः कालात्मा ग्रहदेवता ॥
चण्डीशो रुद्रडाकिन्याक्रान्तश्चण्डीश उच्यते । विद्युदाकलितो नद्यां समारुढो रसाधिपः ॥

चण्डीशः शुकसंयुक्तो जिह्वया ललितः पुनः । क्षतजस्तामसी शोभी स्थिरात्मा विद्युता युतः ॥
नमोऽन्तो मनुरित्येष शनितुष्टिकरः शिवे । आद्यन्तेऽष्टोत्तरशतं मनुमेनं जपेन्नरः ॥

यः पठेच्छ्रणुयाद्वापि ध्यात्त्वा सम्पूज्य भक्तितः । त्रस्य मृत्योर्भयं नैव शतवर्षावधिप्रिये !॥
ज्वराः सर्वे विनश्यन्ति दद्रु-विस्फोटकच्छुकाः। दिवा सौरिं स्मरेत्‌ रात्रौ महाकालं यजन्‌ पठेत ॥

जन्मर्क्षे च यदा सौरिर्जपेदेतत्सहस्त्रकम्‌ । वेधगे वामवेधे वा जपेदर्द्धसहस्त्रकम्‌ ॥
द्वितीये द्वादशे मन्दे तनौ वा चाष्टमेऽपि वा । तत्तद्राशौ भवेद्यावत्‌ पठेत्तावद्दिनावधि ॥

चतुर्थे दशमे वाऽपि सप्तमे नवपञ्चमे । गोचरे जन्मलग्नेशे दशास्वन्तर्दशासु च ॥
गुरुलाघवज्ञानेन पठेदावृत्तिसंख्यया । शतमेकं त्रयं वाथ शतयुग्मं कदाचन ॥

आपदस्तस्य नश्यन्ति पापानि च जयं भवेत्‌ । महाकालालये पीठे ह्यथवा जलसन्निधौ ॥
पुण्यक्षेत्रेऽश्वत्थमूले तैलकुम्भाग्रतो गृहे ।नियमेनैकभक्तेन ब्रह्मचर्येण मौनिना ॥

श्रोतव्यं पठितव्यं च साधकानां सुखावहम्‌ । परं स्वस्त्ययनं पुण्यं स्तोत्रं मृत्युञ्जयाभिधम्‌ ॥
कालक्रमेण कथितं न्यासक्रम समन्वितम्‌ । प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा पूजायां च निशामुखे ॥

पठतां नैव दुष्टेभ्यो व्याघ्रसर्पादितो भयम्‌ ।नाग्नितो न जलाद्वायोर्देशे देशान्तरेऽथवा ॥
नाऽकाले मरणं तेषां नाऽपमृत्युभयं भवेत्‌ । आयुर्वर्षशतं साग्रं भवन्ति चिरजीविनः ॥

नाऽतः परतरं स्तोत्रं शनितुष्टिकरं महत्‌ । शान्तिकं शीघ्रफलदं स्तोत्रमेतन्मयोदितम्‌ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन यदीच्छेदात्मनो हितम्‌ ।कथनीयं महादेवि ! नैवाभक्तस्य कस्यचित्‌ ॥

॥ इति मार्तण्ड-भैरव-तन्त्रे महाकाल-शनि-मृत्युञ्जय-स्तोत्रं सम्पूर्णम्‌ ॥

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श्री शिवप्रातः स्मरणस्तोत्रम्

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प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥१॥

प्रातर्नमामि गिरिशं गिरिजार्धदेहं
सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् ।
विश्वेश्वरं विजितविश्वमनोSभिरामं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥२॥

प्रातर्भजामि शिवमेकमनन्तमाद्यं
वेदान्तवेद्यमनघं पुरुषं महान्तम् ।
नामादिभेदरहितं षड्भावशून्यं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥३॥

प्रातः समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकत्रयं येSनुदिनं पठन्ति ।
ते दुःखजातं बहुजन्मसंचितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्भो: ॥

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संकटनाशन गणेश स्तोत्र

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प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्
भक्तावासं स्मरेनित्यम आयुष्कामार्थ सिध्दये ॥१॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्
तृतीयं कृष्णपिङगाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम ॥२॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धुम्रवर्णं तथाषष्टम ॥३॥
नवमं भालचंद्रं च दशमं तु विनायकम्
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम ॥४॥
द्वादशेतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर:
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिध्दीकर प्रभो ॥५॥
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम ॥६॥
जपेद्गणपतिस्तोत्रं षडभिर्मासे फलं लभेत्
संवत्सरेण सिध्दीं च लभते नात्र संशय: ॥७॥
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत: ॥८॥ 

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श्री सूर्याष्टकम्

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ऐसा कई बार देखने को मिलता है कि योग्यता होने के बावजूद भी मनचाही नौकरी नही मिलती। आज के समय में जब इतनी प्रतिस्पर्धा है, तब सरकारी नौकरी पाना बहुत मुशकिल लगता है। भगवान शिव द्वारा कहा गया सूर्याष्टकं का पाठ कर सकता है आपकी मुशकिल का समाधान।

जो भी व्यक्ति सरकारी नौकरी पाना चाहता हो, उसे नियमित रूप से प्रात: काल स्नान आदि नित्यकर्म से निवृत होकर श्रद्धा पूर्वक सूर्याष्टकं का पाठ करना चाहिये। सूर्यदेव की कृपा से जल्द ही आपका मनोरथ सिद्ध होगा। नौकरी मिलने में आने वाली कठिनाइयाँ स्वत: ही दूर हो जायेंगी। सूर्याष्टकं बहुत जल्दी फल देने वाला पाठ है।

प्रतिदिन ताम्बे के कलश से सूर्यदेव को जल अवश्य अर्पित करें। सूर्यदेव आपकी मनोकामना पूर्ण करें।

श्री साम्ब उवाच:

आदि देव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर:।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ॥

सप्ताश्वरथ मारुढ़ं प्रचण्डं कश्यपात्पजम्।
श्वेत पद्मधरं तं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥

लोहितं रथमारुढं सर्वलोक पितामहम्।
महापाप हरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मा विष्णु महेश्वरं।
महापापं हरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥

वृहितं तेज: पुञ्जच वायुराकाश मेव च।
प्रभुसर्वलोकानां तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥

बन्धूक पुष्प संकाशं हार कुंडल भूषितम्।
एक चक्र धरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥

तं सूर्य जगत् कर्तारं महातेज: प्रदीपनम्।
महापाप हरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥

तं सूर्य जगतां नाथं ज्ञान विज्ञान मोक्षदम्।
महापापं हरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥

सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं गृहपीड़ा प्रणाशनम।
अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान भवेत ॥

अभिषं मधु पानं च य: करोत्तिवे‍दिने।
सप्तजन्म भवेद्रोगी जन्म-जन्म दरिद्रता ॥

स्त्री तेल मधुमां-सा नित्य स्त्यजेन्तु रवेद्रिने।
न व्या‍धि: शोक दारिद्रयं सूर्यलोकं सगच्छति ॥

॥ इति श्री शिव प्रोक्तं सूर्याष्टकं ॥ 

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सूर्य स्तोत्र

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प्रात: स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यंरूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषी ।
प्रातर्नमामि तरणिं तनुवाऽमनोभि ब्रह्मेन्द्रपूर्वकसुरैनतमर्चितं च।
वृष्टि प्रमोचन विनिग्रह हेतुभूतं त्रैलोक्य पालनपरंत्रिगुणात्मकं च।।2।।

प्रातर्भजामि सवितारमनन्तशक्तिं पापौघशत्रुभयरोगहरं परं चं।
तं सर्वलोककनाकात्मककालमूर्ति गोकण्ठबंधन विमोचनमादिदेवम् ।।3।।

ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्ने:।
आप्रा धावाप्रथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्र्व ।।4।।

सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मत्योन योषामभ्येति पश्र्वात् ।
यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम् ।।5।।

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चंद्र स्तोत्र

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श्वेताम्बर: श्वेतवपु: किरीटी, श्वेतद्युतिर्दण्डधरो द्विबाहु: ।
चन्द्रो मृतात्मा वरद: शशांक:, श्रेयांसि मह्यं प्रददातु देव: ।।1।।

दधिशंखतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम ।
नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम ।।2।।

क्षीरसिन्धुसमुत्पन्नो रोहिणी सहित: प्रभु: ।
हरस्य मुकुटावास: बालचन्द्र नमोsस्तु ते ।।3।।

सुधायया यत्किरणा: पोषयन्त्योषधीवनम ।
सर्वान्नरसहेतुं तं नमामि सिन्धुनन्दनम ।।4।।

राकेशं तारकेशं च रोहिणीप्रियसुन्दरम ।
ध्यायतां सर्वदोषघ्नं नमामीन्दुं मुहुर्मुहु: ।।5।।

(इति मन्त्रमहार्णवे चन्द्रमस: स्तोत्रम )
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मंगल स्तोत्र

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रक्ताम्बरो रक्तवपु: किरीटी,
चतुर्मुखो मेघगदो गदाधृक ।

धरासुत: शक्तिधरश्च शूली,
सदा मम स्याद वरद: प्रशान्त: ।।1।।

धरणीगर्भसंभूतं विद्युतेजसमप्रभम ।
कुमारं शक्तिहस्तं च मंगलं प्रणमाम्यहम ।।2।।

ऋणहर्त्रे नमस्तुभ्यं दु:खदारिद्रनाशिने ।
नमामि द्योतमानाय सर्वकल्याणकारिणे ।।3।।

देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगा: ।
सुखं यान्ति यतस्तस्मै नमो धरणि सूनवे ।।4।।

यो वक्रगतिमापन्नो नृणां विघ्नं प्रयच्छति ।
पूजित: सुखसौभाग्यं तस्मै क्ष्मासूनवे नम: ।।5।।

प्रसादं कुरु मे नाथ मंगलप्रद मंगल ।
मेषवाहन रुद्रात्मन पुत्रान देहि धनं यश: ।।6।।

(इति मन्त्रमहार्णवे मंगल स्तोत्रम )
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बुध स्तोत्र

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पीताम्बर: पीतवपु किरीटी, चतुर्भुजो देवदु:खापहर्ता ।
धर्मस्य धृक सोमसुत: सदा मे, सिंहाधिरुढ़ो वरदो बुधश्च ।।1।।

प्रियंगुकनकश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम । सौम्यं सौम्यगुणोपेतं नमामि शशिनन्दनम ।।2।।
सोमसुनुर्बुधश्चैव सौम्य: सौम्यगुणान्वित: । सदा शान्त: सदा क्षेमो नमामि शशिनन्दनम ।।3।।

उत्पातरूपी जगतां चन्द्रपुत्रो महाद्युति: । सूर्यप्रियकरोविद्वान पीडां हरतु मे बुधं ।।4।।
शिरीषपुष्पसंकाशं कपिलीशो युवा पुन: । सोमपुत्रो बुधश्चैव सदा शान्तिं प्रयच्छतु ।।5।।

श्याम: शिरालश्चकलाविधिज्ञ:, कौतूहली कोमलवाग्विलासी ।
रजोधिको मध्यमरूपधृक स्या-दाताम्रनेत्रो द्विजराजपुत्र: ।।6।।

अहो चन्द्रासुत श्रीमन मागधर्मासमुदभव: । अत्रिगोत्रश्चतुर्बाहु: खड्गखेटकधारक: ।।7।।
गदाधरो नृसिंहस्थ: स्वर्णनाभसमन्वित: । केतकीद्रुमपत्राभ: इन्द्रविष्णुप्रपूजित: ।।8।।

ज्ञेयो बुध: पण्डितश्च रोहिणेयश्च सोमज: । कुमारो राजपुत्रश्च शैशवे शशिनन्दन: ।।9।।
गुरुपुत्रश्च तारेयो विबुधो बोधनस्तथा । सौम्य: सौम्यगुणोपेतो रत्नदानफलप्रद: ।।10।।

एतानि बुधनामानि प्रात: काले पठेन्नर: । बुद्धिर्विवृद्धितां याति बुधपीडा न जायते ।।11।।

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बृहस्पति स्तोत्र

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पीताम्बर: पीतवपु: किरीटी,
चतुर्भुजो देवगुरु: प्रशान्त: ।

दधाति दण्डं च कमण्डलुं च,
तथाक्षसूत्रं वरदोsस्तु मह्यम ।।1।।

नम: सुरेन्द्रवन्द्याय देवाचार्याय ते नम: ।
नमस्त्वनन्तसामर्थ्यं देवासिद्धान्तपारग ।।2।।

सदानन्द नमस्तेस्तु नम: पीडाहराय च ।
नमो वाचस्पते तुभ्यं नमस्ते पीतवाससे ।।3।।

नमोsद्वितीयरूपाय लम्बकूर्चाय ते नम: ।
नम: प्रह्रष्टनेत्राय विप्राणां पतये नम: ।।4।।

नमो भार्गवशिष्याय विपन्नहितकारक: ।
नमस्ते सुरसैन्याय विपन्नत्राणहेतवे ।।5।।

विषमस्थस्तथा नृणां सर्वकष्टप्रणाशनम ।
प्रत्यहं तु पठेद्यो वै तस्य कामफलप्रदम ।।6।।

(इति मन्त्रमहार्णवे बृहस्पतिस्तोत्रम)

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शुक्र स्तोत्र

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नमस्ते भार्गव श्रेष्ठ देव दानव पूजित ।
वृष्टिरोधप्रकर्त्रे च वृष्टिकर्त्रे नमो नम: ।।1।।

देवयानीपितस्तुभ्यं वेदवेदांगपारग: ।
परेण तपसा शुद्ध शंकरो लोकशंकर: ।।2।।

प्राप्तो विद्यां जीवनाख्यां तस्मै शुक्रात्मने नम: ।
नमस्तस्मै भगवते भृगुपुत्राय वेधसे ।।3।।

तारामण्डलमध्यस्थ स्वभासा भसिताम्बर: ।
यस्योदये जगत्सर्वं मंगलार्हं भवेदिह ।।4।।

अस्तं याते ह्यरिष्टं स्यात्तस्मै मंगलरूपिणे ।
त्रिपुरावासिनो दैत्यान शिवबाणप्रपीडितान ।।5।।

विद्यया जीवयच्छुक्रो नमस्ते भृगुनन्दन ।
ययातिगुरवे तुभ्यं नमस्ते कविनन्दन ।6।।

बलिराज्यप्रदो जीवस्तस्मै जीवात्मने नम: ।
भार्गवाय नमस्तुभ्यं पूर्वं गीर्वाणवन्दितम ।।7।।

जीवपुत्राय यो विद्यां प्रादात्तस्मै नमोनम: ।
नम: शुक्राय काव्याय भृगुपुत्राय धीमहि ।।8।।

नम: कारणरूपाय नमस्ते कारणात्मने ।
स्तवराजमिदं पुण्य़ं भार्गवस्य महात्मन: ।।9।।

य: पठेच्छुणुयाद वापि लभते वांछित फलम ।
पुत्रकामो लभेत्पुत्रान श्रीकामो लभते श्रियम ।।10।।

राज्यकामो लभेद्राज्यं स्त्रीकाम: स्त्रियमुत्तमाम ।
भृगुवारे प्रयत्नेन पठितव्यं सामहितै: ।।11।।

अन्यवारे तु होरायां पूजयेद भृगुनन्दनम ।
रोगार्तो मुच्यते रोगाद भयार्तो मुच्यते भयात ।।12।।

यद्यत्प्रार्थयते वस्तु तत्तत्प्राप्नोति सर्वदा ।
प्रात: काले प्रकर्तव्या भृगुपूजा प्रयत्नत: ।।13।।

सर्वपापविनिर्मुक्त: प्राप्नुयाच्छिवसन्निधि: ।।14।।

(इति स्कन्दपुराणे शुक्रस्तोत्रम)

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शनि स्तोत्र

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नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठनिभाय च ।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घायशुष्काय कालदष्ट्र नमोऽस्तुते ॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्निरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥

नमस्ते सर्वभक्षाय वलीमुखायनमोऽस्तुते ।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करे भयदाय च ॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तुते ।
नमो मन्दगते तुभ्यं निरिस्त्रणाय नमोऽस्तुते ॥

तपसा दग्धदेहाय नित्यं योगरताय च ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज सूनवे ।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥

देवासुरमनुष्याश्च सिद्घविद्याधरोरगा: ।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशंयान्ति समूलत: ॥

प्रसाद कुरु मे देव वाराहोऽहमुपागत ।
एवं स्तुतस्तद सौरिग्र्रहराजो महाबल: ॥ 
॥ इति शनि स्तोत्र संपूर्णं ॥
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श्रीगणपती नामाष्टक स्तोत्रम्

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विष्णु उवाच
गणेशमेकदन्तं च हेरम्बं विघ्ननायकम् ।
लम्बोदरं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं गुहाग्रजम् ॥

नामाष्टार्थ च पुत्रस्य श्रुणु मातर्हरप्रिये ।
स्तोत्राणां सारभूतं च सर्वविघ्नहरं परम् ॥ १ ॥

ज्ञानार्थवाचको गश्च णश्च निर्वाणवाचकः ।
तयोरीशं परं ब्रह्म गणेशं प्रणमाम्यहम् ॥

एकशब्दः प्रधानार्थो दन्तश्च बलवाचकः ।
बलं प्रधानं सर्वस्मादेकदन्तं नमाम्यहम् ॥ २ ॥

दिनार्थवाचको हेश्च रम्बः पालकवाचकः ।
परिपालकं दिनानां हेरम्बं प्रणमाम्यहम् ॥

विपत्तिवाचको विघ्नो नायकः खण्डनार्थकः ।
विपत्खण्डनकारकं नमामि विघ्ननायकम् ॥ ३ ॥

विष्णुदत्तैश्च नैवेद्यैर्यस्य लम्बोदरं पुरा ।
पित्रा दतैश्च विविधैर्वन्दे लम्बोदरं च तम् ॥

शूर्पाकारौ च यत्कर्णौ विघ्नवारणकारणौ ।
सम्पद्दौ ज्ञानरुपौ च शूर्पकर्णं नमाम्यहम् ॥ ४ ॥

विष्णुप्रसादपुष्पं च यन्मूर्ध्नि मुनिदत्तकम् ।
तद् गजेन्द्रवक्त्रयुतं गजवक्त्रं नमाम्यहम् ॥

गुहस्याग्रे च जातोSयमाविर्भूतो हरालये ।
वन्दे गुहाग्रजं देवं सर्वदेवाग्रपूजितम् ॥ ५ ॥

एतन्नामाष्टकं दुर्गे नामभिः संयुतं परम् ।
पुत्रस्य पश्य वेदे च तदा कोपं तथा कुरु ॥

एतन्नामाष्टकं स्तोत्रं नानार्थसंयुतं शुभम् ।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स सुखी सर्वतो जयी ॥ ६ ॥

ततो विघ्नाः पलायन्ते वैनतेयाद् यथोरगाः ।
गणेश्वरप्रसादेन महाज्ञानी भवेद् ध्रुवम् ॥

पुत्रार्थी लभते पुत्रं भार्यार्थी विपुलां स्त्रियम् ।
महाजडः कवीन्द्रश्च विद्दावांश्च भवेद् ध्रुवम् ॥ ७ ॥

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते गणपतीखण्डे श्रीविष्णुर्प्रोक्तं गणपति नामाष्टकं संपूर्णं ॥

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श्री राधानाम स्तोत्र

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रेफो हि कोटी जन्माघं कर्मभोगं शुभाशुभम्  ।। 
आकारो गर्भवासं च मृत्युं च रोगमुत्सृजेत्  ।। 

धकार आयुषो हानिमाकारो भवबन्धनम् ।। 
श्रवणस्मरणोक्तिभ्यः प्रणश्यति न संशयः ।। 

रेफ़ो हि निश्चलां भक्तिं दास्यं कृष्णपदाम्बुजे  ।। 
सर्वेप्सितं सदानन्दं सर्वसिद्धौघमीश्वरम् ।। 

धकारः सहवासं च तत्तुल्यकालमेव च  ।। 
ददाति सार्ष्टिसारूप्यं तत्त्वज्ञानं हरेः समम् ।। 

आकरस्तेजसां राशिं दानशक्तिं हरौ यथा  ।। 
योगशक्तिं योगमतिं सर्वकालं हरिस्मृतिम्  ।। 

श्रुत्युक्तिस्मरणाद्योगान्मोहजालं च किल्बिषम् ।। 
रोगशोक मृत्युयमा वेपन्ते नात्र संशयः  ।। 

 ।।  इति श्री राधा नाम महात्म्य स्तोत्र संपूर्णं  ।। 

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नमामि नारायन पादपकजम् स्तोत्रम्

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नमामि नारायणपादपङ्कजं करोमि नारायणपूजनं सदा ।। 
वदामि नारायणनाम निर्मलं स्मरामि नारायणतत्वमव्ययम् ।।  १ ।। 

श्रीनाथ नारायण वासुदेव श्रीकृष्ण भक्तप्रिय चक्रपाणे ।। 
श्रीपद्मनाभाच्युत कैटभारे श्रीराम पद्माक्ष हरे मुरारे ।।  २ ।। 

अनन्त वैकुण्ठ मुकुन्द कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति।। 
वक्तुं समर्थोSपि न वक्ति कश्र्चिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् ।।  ३ ।। 


ध्यायन्ति ये विष्णुमनन्तमव्ययं हृत्पद्ममध्ये सततं व्यवस्थितम् ।। 
समाहितानां सतताभयप्रदं ते यान्ति सिद्धिं परमां च वैष्णवीम्।।  ४ ।। 

क्षीरसागरतरन्गशीकरासारतार चितचारुमूर्तये ।। 
भोगिभोगशयनीयशायिने माधवाय मधुविद्विषे नमः।।  ५ ।। 

।।  इति श्री नमामिनारायणपादपङ्कजं स्तोत्रम् संपूर्णं ।। 

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देव्यपराधक्षमापन स्त्रोत

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न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथा:।

न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्।।1।।

अर्थ – हे मातः ! मैं तुम्हारा मन्त्र, यंत्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता, परन्तु सब प्रकार के क्लेशों को दूर करने वाला आपका अनुसरण करना ही जानता हूँ.

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव  चरणयोर्या च्युतिरभूत्।

तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।2।।

अर्थ – सबका उद्धार करने वाली हे करुणामयी माता ! तुम्हारी पूजा की विधि न जान्ने के कारण, धन के आभाव में, आलस्य से और उन विधियों को अच्छी तरह न कर सकने के कारण, तुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे क्षमा करो, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती.

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहव: सन्ति सरला:
परं  तेषां  मध्ये  विरलतरलोSहं  तव  सुत:।

मदीयोSयं त्याग: समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।3।।

अर्थ – माँ ! भूमण्डल में तुम्हारे सरल पुत्र अनेको है पर उनमे एक मैं विरला ही बड़ा चंचल हूँ, तो भी हे शिवे ! मुझे त्याग देना तुम्हे उचित नहीं, क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती.

जगन्मातर्मातस्तव  चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया।

तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।4।।

अर्थ – हे जगदम्ब ! हे मातः ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिए प्रचुर धन भी समर्पण नहीं किया तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है की क्योंकि पूत तो कपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती.

परित्यक्ता देवा विविधविधिसेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि।

इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता
निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्।।5।।

अर्थ – हे गणेश जननी ! मैंने अपनी पचासी वर्ष से अधिक आयु बीत जाने पर विविध विधियों द्वारा पूजा करने से घबड़ा कर सब देवों को छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर किस की शरण में जाऊं?

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकै:।

तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जन: को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ।।6।।

अर्थ – हे माता अपर्णे ! यदि तुम्हारे मंत्राक्षरों के कान में पड़ते ही चांडाल भी मिठाई के समान सुमधुरवाणी से युक्त बड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी करोड़पति बन कर चिरकाल तक निर्भय विचरता है तो उसके जप का अनुष्ठान करने पर जपने से जो फल होता है, उसे कौन जान सकता है?

चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपति:।

कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम्।।7।।

अर्थ – जो चिता का भस्म रमाए है, विष खाते है, नंगे रहते है, जटाजूट बांधे है, गले में सर्पमाला पहने है, हाथ में खप्पर लिए है, पशुपति और भूतों के स्वामी है, ऐसे शिवजी ने भी जो एकमात्र जगदीश्वर की पदवी प्राप्त की है, वह हे भवानि ! तुम्हारे साथ विवाह होने का ही फल है.

न मोक्षस्याकाड़्क्षा भवविभववाण्छापि च न मे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुन:।

अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपत:।।8।।

अर्थ – हे चंद्रमुखी माता ! मुझे मोक्ष की इच्छा नहीं है, सांसारिक वैभव की भी लालसा नहीं है, विज्ञान तथा सुख की भी अभिलाषा नहीं है, इसलिए मैं तुमसे यही मांगता हूँ कि मेरी साड़ी आयु मृडानी, रुद्राणी, शिव-शिव, भवानी आदि नामो के जपते-जपते ही बीते.

नाराधितासि विधिना विविधोपचारै:
किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभि:।

श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाथे
धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव।।9।।

अर्थ – हे श्याम ! मैंने अनेको उपचारों से तुम्हारी सेवा नहीं कि (यही नहीं, इसके विपरीत) अनिष्ट चिंतन में तत्पर अपने वचनों से मैंने क्या नहीं किया? (अर्थात अनेकों बुराइयाँ कि है) फिर भी मुझ अनाथ पर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह तुम्हे बहुत ही उचित है, क्योंकि तुम मेरी माता हो.

आपत्सु मग्न: स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि।

नैतच्छठत्वं मम भावयेथा:
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति।।10।।

अर्थ – हे दुर्गे ! हे दयासागर माहेश्वरी ! जब मैं किसी विपत्ति में पड़ता हूँ तो तुम्हारा ही स्मरण करता हूँ, इसे तुम मेरी दुष्टता मत समझना, क्योंकि भूखे-प्यासे बालक अपनी माँ को याद किया करते हैं.

जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि।
अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम्।।11।।

अर्थ – हे जगज्जननी ! मुझ पर तुम्हारी पूर्ण कृपा है, इसमें आश्चर्य ही क्या है? क्योंकि अनेक अपराधों से युक्त पुत्र को भी माता त्याग नहीं देती.

मत्सम: पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि।
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु।।12।।

अर्थ – हे महादेवी ! मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप नाश करने वाली नहीं है, यह जानकार जैसा उचित समझो, वैसा करो.

इति श्रीमच्छंकराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्।

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