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जाने ऐसा कौन सा पक्षी है, जो जमीन पर कभी पैर नहीं रखता ?

 
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क्या आप ऐसे पक्षी के बारे में जानते हैं, जो कभी भी जमीन पर पैर नहीं रखता इस लेख में हम आपको एक ऐसे ही पक्षी के बारे में जानकारी दे रहे हैं। जो पक्षी आकाश में उड़ता है, पेड़ पर घोंसला बनाकर रहता है। इसके बावजूद हम उसे जमीन पर विचरण करते भी कई बार देखते हैं। लेकिन दुनिया में एक ऐसा अनोखा पक्षी भी है, जो सदा पेड़ों पर ही रहता है और जमीन पर कभी उतरता ही नहीं। वह पक्षी भारत में भी पाया जाता है और यह पक्षी महाराष्ट्र का राजकीय भी पक्षी है।  आइये आज हम इस पक्षी के बारे में वितार से जानते हैं।

एक ऐसा पक्षी जो कभी जमीन पर पैर नहीं रखता 

कभी जमीन पर पैर नहीं रखने वाले पक्षी का नाम ‘हरियल पक्षी’ (भ्ंतपलंस च्ंोीप) है।  हरियल पक्षी कबूतर की तरह दिखने वाला एक पक्षी है। इसका रंग हल्का हरा-पीला कलर का होता है। रंग के कारणके वजह से ही इसे ‘हरियल पक्षी कहा जाता है। यह मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला पक्षी है। यह ऊँचे-ऊँचे पेड़ों पर निवास करता है और कभी भी जमीन पर नहीं उतरता।

क्या आप जानते है कि क्यो हरियल पक्षी जमीन पर पैर नहीं रखता ?

हरियल पक्षी ऊँचे पेड़ों पर निवास करने वाला एक पक्षी है। इसका मुख्य आहार पेड़ों के पत्ते, फल आदि हैं, इसके अतिरिक्त फूलों की कलियाँ, छोटे पौधे के अंकुर, बीज, अनाज के दाने भी इसके आहार में शामिल है। ये पीपल से लेकर बड़, गूलर, अंजीर के पेड़ों के पत्ते खाता है। बेर, चिरौंजी जामुन के फल इसे बहुत पसंद होते हैं। इसको पानी की आवश्यकता पेड़ों के फल और पत्तियों पर जमी ओंस से पूरी हो जाती हैं। इसका आहार संबंधी समस्त आवश्यकतायें पेड़ों पर ही पूरी हो जाती हैं। स्वभाव से ये एक शर्मीला पक्षी होता है और इंसान को देखते ही यह चुप्पी साध लेता है। यह अपना घोंसले भी ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की शाखाओं पर ही बनाते हैं। इस तरह समस्त यह पक्षी अपनी समत आवश्यकतायें पेड़ पर ही पूरी हो जाने के कारण यह जमीन पर कभी नहीं उतरता या ना के बराबर उतरता है। 

आइये जाने हरियल पक्षी के बारे में प्रमुख महत्वपूर्ण जानकारी

हरियल पक्षी देखने में कैसा होता है?

हरियल पक्षी कबूतर की तरह दिखने वाला पक्षी है। इसका रंग हल्का हरा-पीला होता है। रंग के वजह से ही इसे ‘हरियल पक्षी’ कहा जाता है। इसके सिर के ऊपर हल्के नीले भूरे रंग के बाल होते हैं। इसका आकार 29 से.मी से 33 सेमी और वजन 225 ग्राम से 260 ग्राम तक लगभीग होता है। इसके पंखों का फैलाव 17 सेमी से 19 सेमी होता है।  इसकी आँखों का रंग काला होता है। आँखों के आसपास लाल रंग की रिंग होती हैं।  इसका पैर चमकीले पीले रंग के होते हैं। नर मादा देखने में एक जैसे होते हैं। बस नर की तुलना में मादा थोड़ी सुस्त्त होती है।

हरियल पक्षी कहाँ पाया जाता है?
हरियल पक्षी मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला पक्षी है। यह पक्षी भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, बर्मा, नेपाल, बांग्लादेश के अतिरिक्त कंबोडिया, चीन में भी पाया जाता है। भारत में यह उत्तरी-पश्चिम रेगिस्तानी क्षेत्र को छोड़कर संपूर्ण भारत में पाए जाते है। भारत में हिमालय से लेकर कन्या कुमारी तक और राजस्थान से लेकर पूर्व में असम तक पाए जाते हैं। यह महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी है। परन्तु यह उत्तर प्रदेश में बहुतायत मात्रा में पाया जाता है। 

हरियल पक्षी खानपान क्या है ?
हरियल पक्षी पूर्णतः शाकाहारी होता है। यह कई प्रकार के फल खाता है। अनाज के दाने भी खाता है। कई प्रकार के फूलों की कलियाँ, छोटे पौधों के अंकुर और बीज खाना पसंद करता है। यह पके फल बड़े चाव से खता है। फल खाते समय कलाबाजियां भी करता है। पीपल से लेकर बड, गूलर, अंजीर के पेड़ों के पत्ते खता है। यह पक्षी बहुत खाऊ होता है और ठूस-ठूस कर खाता है। बेर, चिरौंजी जामुन के फल ज्यादा पसंद हैं। 

हरियल पक्षी कहाँ रहते हैं ?
हरियल पक्षी सदाबहार जंगलों में रहते हैं। इन्हें ऊँचे-ऊँचे पेड़ों वाले जंगलों में रहना पसंद है। येइस पक्षी को पीपल या बरगद के पेड़ पर घोंसला बनाता हैं। यह पक्षी तिनकों और पत्तियों से अपना घोंसला बनाता है। 

हरियल पक्षी के बारे में प्रमुख रोचक तथ्य 
  1. हरियल पक्षी कबूतर परिवार का पक्षी है। यह कबूतर जैसा दिखता है हल्के हरे-पीले रंग का होने के कारण इसका नाम “हरियल पक्षी” पड़ गया।
  2. हरियल पक्षी को अंग्रेजी में ग्रीन पिजन (ळतममद च्मपहवद) यानी हरा कबूतर (भ्ंतं ज्ञंइववजंत) कहते हैं।
  3. यह ट्रेरन फौनीकॉपटेरा (ज्तमतवद च्ीमवदपबवचजमतं) प्रजाति का पक्षी है। 
  4. हरियल पक्षी मुख्यतः भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाने वाला पक्षी है। यह भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, बर्मा, कंबोडिया, चीन में पाया जाता है। 
  5. हरियल पक्षी महाराष्ट्र का राजकीय पक्षी है। परन्तु यह उत्तर प्रदेश में बहुतायत में पाया जाता है।
  6. हरियल पक्षी का मांस नरम होता है इसके मांस के कारण ही इसका शिकार अधिक होता है।
  7. हरियल पक्षी विलुप्तप्राय जीवों की श्रेणी में शामिल है ।
  8. हरियल पक्षी की आवाज सीटी जैसी मधुर होती है। 
  9. हरियल पक्षी की सबसे विशेष बात यहे है कि यह पक्षी कभी जमीन पर पैर नहीं रखता।  यदि इसे कभी जमीन पर उतरना भी पड़े, तो ये अपने पैरों में लकड़ी का टुकड़ा लेकर उतरता है।
  10. हरियल पक्षी बहुत शर्मीला पक्षी है इंसान को देखते ही  यह पक्षी चुप्पी साध लेता है। 
  11. हरियल पक्षी का जीवनकाल 26 वर्ष होता है।
  12. हरियल पक्षी आजीवन एक ही साथी के साथ जीवन व्यतीत करे हैं।
  13. यह कबूतर की तरह सामाजिक पक्षी है और समूह में रहता है इनका छोटा समूह 5 से 10 पक्षियों का होता है यह समूह में उड़ान भरते हैं।
  14. नर हरियल पक्षी मादा को रिझाने के लिए अपने गर्दन की थैली फुला लेता है और नृत्य करता है।
  15. हरियल पक्षी का प्रजनन काल मार्च से जून तक होता है।
  16. मादा हरियल पक्षी एक बार में 1 या 2 अंडे देती है।
  17. हरियल पक्षी के अंडे चिकने और लीची के आकार के होते हैं. ये चमकीले सफेद रंग के होते हैं।
  18. हरियल पक्षी अंडों को 13 दिन तक सेते है।
  19. नर और मादा दोनों अंडों की देखभाल करते हैं।
  20. नर और मादा देखने में एक जैसे होते हैं, लेकिन नर की तुलना में मादा थोड़ी सुस्त होती है।
  21. इन्हें पतझड़ या सदाबहार जंगलों के पेड़ ज्यादा पसंद होते हैं यह पक्षी अपना सारा जीवन पेड़ पर बिता देते हैं।
  22. यह पक्षी जमीन पर नहीं या बहुत कम उतरते हैं ऊँचे पेड़ों या स्थानों पर बैठते हैं। 
  23. यह पक्षी पानी पीने के लिए भी जमीन पर नहीं उतरता है। यह पक्षी फलों और पत्तियों पर जमी ओंस से ही अपनी प्यास बुझा लेता है।

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क्या हिमांचल क्षेत्र में कोई रहस्यमय अग्नि स्वरुप शक्ति है जो राक्षसों का संहार करती है

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इस रहस्यमयी शक्ति का ज़िक्र पहली बार महाभारत में हुआ है । महाभारत में आई कथा के अनुसार एक बार गन्धर्वराज चित्ररथ अर्जुन से कहते हैं “अर्जुन ! राजा इक्ष्वाकु के वंश में कल्माषपाद नाम का एक राजा हुआ था ।

एक दिन की बात है, वह शिकार खेलने के लिये वन में गया । लौटने के समय वह एक ऐसे मार्ग से आने लगा, जिससे केवल एक ही मनुष्य चल सकता था । वह थका-माँदा और भूखा-प्यासा तो था ही, उसी मार्ग पर सामने से शक्तिमुनि आते दीख पड़े ।

शक्तिमुनि, वसिष्ठ जी के सौ पुत्रों में सबसे बड़े थे । राजा ने कहा, “तुम हट जाओ । मेरे लिये रास्ता छोड़ दो” । शक्ति ने कहा, “महाराज ! सनातन धर्म के अनुसार क्षत्रिय का यह कर्तव्य है कि वह ब्राह्मण के लिये मार्ग छोड़ दे” । इस प्रकार दोनों में कुछ कहा-सुनी हो गयी । न ऋषि हटे और न राजा । राजा के हाथ में चाबुक था, उन्होंने बिना सोचे-विचारे ऋषि पर चला दिया ।

शक्ति मुनि ने इसे राजा का अन्याय समझ कर उन्हें शाप दिया कि “अरे नृपाधम ! तू राक्षस की तरह तपस्वी पर चाबुक चलाता है; इसलिये जा, राक्षस हो जा” । राजा राक्षसभावाक्रान्त हो गया । उसने कहा, “तुमने मुझे अयोग्य शाप दिया है; इसलिये लो, मैं तुमसे ही अपना राक्षसपना प्रारम्भ करता हूँ” । इसके बाद कल्माषपाद शक्ति मुनि को मारकर तुरंत खा गया ।

केवल शक्तिमुनि को ही नहीं; वसिष्ठ के जितने पुत्र थे, सभी को उसने खा लिया । शक्ति और वसिष्ठ के दूसरे पुत्रों के भक्षण में कल्माष का राक्षसपना तो कारण था ही, इसके अलावा विश्वामित्र ने भी पहले द्वेष का स्मरण करके किंकर नाम के राक्षस को आज्ञा दी थी कि वह कल्माषपाद में प्रवेश कर जाय, जिसके कारण वह ऐसे नीच कर्म में प्रवृत्त हुआ ।

वसिष्ठ जी को यह बात मालूम हुई । उन्होंने जाना कि इसमें विश्वामित्र की प्रेरणा है फिर भी उन्होंने अपने शोक के वेग को वैसे ही धारण कर लिया, जैसे पर्वतराज सुमेरु पृथ्वी को । उन्होंने प्रतीकार की सामर्थ्य होने पर भी उनसे किसी प्रकार का बदला नहीं लिया । एक बार महर्षि वसिष्ठ अपने आश्रम पर लौट रहे थे ।

इसी समय ऐसा जान पड़ा, मानो उनके पीछे-पीछे कोई षडंग वेदों का अध्ययन करता हुआ चलता है । वसिष्ठ ने पूछा कि मेरे पीछे-पीछे कौन चल रहा है? आवाज आयी कि “मैं आपकी पुत्रवधू शक्ति पत्नी अदृश्यन्ती हूँ” । वसिष्ठ बोले, “बेटी ! मेरे पुत्र शक्ति के समान स्वर से सांग वेदों का अध्ययन कौन कर रहा है” ?

अदृश्यन्ती ने कहा, “आपका पौत्र मेरे गर्भ में है । वह बारह वर्ष से गर्भ में ही वेदाध्ययन कर रहा है” । यह सुनकर वसिष्ठ मुनि को बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने सोचा, “अच्छी बात है । मेरी वंश-परम्परा का उच्छेद नहीं हुआ” । यही सब सोचते हुए वे लौट ही रहे थे कि एक निर्जन वन में कल्माषपाद से उनकी भेंट हो गयी ।

कल्माषपाद विश्वामित्र के द्वारा प्रेरित उग्र राक्षस से आविष्ट होकर वसिष्ठ मुनि को खा जाने के लिये दौड़ा । उस क्रूरकर्मा राक्षस को देखकर अदृश्यन्ती डर गयी और कहने लगी, “भगवन् ! देखिये, देखिये; यह हाथ में सूखा काठ लिये भयंकर राक्षस दौड़ा आ रहा है । आप इससे मेरी रक्षा कीजिये” । वसिष्ठ ने कहा, “बेटी, डरो मत । यह राक्षस नहीं, कल्माषपाद है” ।

यह कहकर महर्षि वसिष्ठ ने हुंकार से ही उसे रोक दिया । इसके बाद उन्होंने जल को हाथ में लेकर मन्त्र से अभिमन्त्रित किया और कल्माषपाद के ऊपर डाला । वह तुरंत शाप से मुक्त हो गया । बारह वर्ष के बाद आज वह शाप से छूटा ।

उसका तेज बढ़ गया, वह होश में आया और हाथ जोड़कर श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ से कहने लगा, “महाराज ! मैं सुदास का पुत्र कल्माषपाद आपका यजमान हूँ । आज्ञा कीजिये, मैं आपको क्या सेवा करूँ” ? वसिष्ठ जी ने कहा, “यह सब बात तो भैया ! समय-समय की है । अब जाओ, तुम अपने राज्य की देखभाल करो । हाँ, इतना ध्यान रखना कि कभी किसी ब्राह्मण का अपमान न हो” ।

राजा ने प्रतिज्ञा की, “महाभाग्यवान् ऋषिश्रेष्ठ ! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा । कभी ब्राह्मणों का तिरस्कार नहीं करूँगा, उनका प्रेम से सत्कार करूँगा” । क्षमाशील महर्षि वसिष्ठ इसी पुत्रघाती राजा के साथ अयोध्या में आये और अपने कृपा प्रसाद से उसे पुत्रवान् बनाया ।

इधर वसिष्ठ के आश्रम पर अदृश्यन्ती के गर्भ से पराशर का जन्म हुआ । स्वयं भगवान् वसिष्ठ ने पराशर के जातकर्मादि संस्कार कराये । धर्मात्मा पराशर वसिष्ठमुनि को ही अपना पिता समझते थे और “पिताजी ! पिताजी !” कहकर पुकारते थे ।

एक दिन अदृश्यन्ती ने बतलाया कि ये तुम्हारे पिता नहीं, दादा हैं; इसी प्रसंग में पराशर जी को यह भी मालूम हुआ कि मेरे पिता को राक्षस ने खा डाला । यह सुनकर उनके चित्त में बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने सब राजाओं पर विजय प्राप्त करने का निश्चय किया । महर्षि वसिष्ठ ने प्राचीन कथाएँ कहकर उन्हें समझाया और आज्ञा की कि “तुम्हारा कल्याण इसी में है। तुम क्षमा करो, किसी को पराजित मत करो ।

तुम्हें मालूम ही है कि इन राजाओं की जगत में कितनी आवश्यकता है” । वसिष्ठ के समझाने-बुझाने से पराशर ने राजाओं को पराजित करने का निश्चय तो छोड़ दिया, परंतु राक्षसों के विनाश के लिये घोर यज्ञ प्रारम्भ किया । उस यज्ञ से जब राक्षसों का नाश होने लगा, तब महर्षि पुलस्त्य और वसिष्ठ ने उन्हें समझाया “पराशर ! क्षमा ही परम धर्म है । तुम्हारे सभी पूर्वज क्षमा की मूर्ति हैं ।

मनुष्य तो यों ही किसी की मृत्यु का निमित्त बन जाता है, तुम यह भयंकर क्रोध त्याग दो” । ऋषियों की आज्ञा से पराशर ने भी क्षमा स्वीकार की और अपने यज्ञाग्नि को हिमाचल में छोड़ दिया । उन्होंने उस भयङ्कर शक्ति को अभिमन्त्रित शक्तियों से आबद्ध कर के उस महान पर्वत की कंदराओं में ही कहीं स्थापित कर दिया है जिसका ज्ञान आज किसी को नहीं है ।

बहुत से लोग तो जानते भी नहीं कि ऐसी कोई शक्ति आज भी है । यद्यपि वो शक्ति जो कोई भी है और हिमांचल क्षेत्र में जहाँ कहीं भी है, इस बात की प्रबल सम्भावना है कि वो अभी निष्क्रिय है ।लेकिन भविष्य में जब कभी भी, किसी कारण वश अगर वह सक्रीय हुई, तो राक्षसी मानसिकता वाली प्राणियों पर कहर बन कर बरसेगी।



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मौत की घाटी जहाँ हजारों की संख्या में पंछी दम तोड़ देते हैं

 
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कुछ लोगों का कहना है कि उस खौफनाक घाटी में प्रकृति का कहर पंछियों पर मौत बनकर टूट पड़ता है। सचमुच में यह स्थान पक्षियों के लिए अभिशाप है या ऐसा लगता है़ कि इस स्थान पर किसी भूत या प्रेत का साया है जो पक्षियों की गर्दन मरोड़ देता है। बात कुछ भी हो लेकिन यह डरावना सच है। यदि इस घाटी को हम पक्षियों के लिए मौत की घाटी कहें है तो गलत न होगा।

इस घाटी में पक्षियों के आते ही उन पर मौत का साया मंडराने लगता है। यहाँ इस स्थान पर पक्षियों की मौत का कोई वैज्ञानिक कारण हो या और कुछ, लेकिन ये जो कुछ भी, अभी तक अनसुलझा है।

कुछ लोग तो कहते हैं इस घाटी में पक्षी खुद आत्महत्या करने आते हैं क्योंकि उन्हें पंछी योनि से मुक्ति पाना होता है। इसीलिए तो पक्षी यहां कर मौत को गले लगा लेते हैं ताकि इस जगह मौत के पश्चात उनको कोई ऊंची योनि प्राप्त हो।

शायद इसी चाहत में हजारों की संख्या में पंछी यहाँ आकर दम तोड़ देते हैं। यह सभी अटकलें हैं। यहाँ पंछियों की मौत के पीछे वास्तविकता क्या है़? यह अनहोनी क्यों होती है़? इस रहस्य का भेद आज कोई जान न सका है़।

पक्षियों को दर्दनाक मौत देने वाली यह मौत की घाटी कहाँ है और यहाँ बहुत सी संख्या में पक्षी क्यों जान दे देते हैं? आइए उस सच को ढूंढने का प्रयास करते हैं।

कहाँ है यह मौत की घाटी 

भारत के असम राज्य में  गुवाहाटी से लगभग 300 किलोमीटर दूर यह स्थान जतिंगा घाटी के नाम से जाना जाता है। देखने में तो यह घाटी अति सुंदर है जहाँ दूर-दूर तक नारंगी के बाग पर्यटकों को अपनी ओर लुभाते हैं।

लेकिन उत्तरी कछार की पहाड़ी में स्थित इस खूबसूरत घाटी का बदसूरत सच रूह को कंपा देने वाला है। यहाँ बारिश के दिनों में इस स्थान पर आने वाले लोगों को जतिंगा घाटी में दूर-दूर तक पक्षियों का, झुंड का झुंड मृत अवस्था में पड़ा हुआ नजर आता हैं।

देखने में ऐसा लगता है की किसी शिकारी ने इतने सारे पक्षियों को अपनी बंदूक का निशाना बना दिया हो। जिसके कारण एक साथ इतने सारे पक्षी घायल होकर मर गए हैं।

जो भी व्यक्ति इस दर्दनाक दृश्य को देखने आता है उसके आंसू निकल आते हैं। वह बस यही सोचता है यह किस की बुरी नजर है जो मासूम पक्षियों पर कहर बनकर टूट पड़ती है। जिसके कारण उनकी यह हालत हो जाती है।

वैज्ञानिक जतिंगा घाटी में भारी संख्या में मरने वाले पक्षियों का कारण यह बताते हैं कि इस स्थान पर मानसूनी मौसम में लगातार तेज वर्षा होती है। जिसके साथ ही चारों तरफ गहरा कोहरा छा जाता है।

ऐसा नम भरा मौसम महीनों चलता रहता है। लगातार चलने वाली भारी वर्षा के कारण यहाँ आने वाले पक्षियों के पंख पूरी तरह पानी से भीग जाते हैं। जब भी अपने वह भीगे पंखों से उड़ने का प्रयास करते हैं तो चारों तरफ गहरी धुंघ होने के कारण इस क्षेत्र में उगने वाले बांस के ऊंचे-ऊंचे कंटीले जंगलों में उलझकर घायल हो जाते हैं।

इस प्रकार वर्षा काल में जतिंगा घाटी की तेज बारिश में भीगे पक्षियों द्वारा बार-बार उड़ने के प्रयास करने पर वह बार-बार कंटीले बांसों टकराकर लहूलुहान हो जाते हैं और दम तोड़ देते हैं।

कुल मिलाकर वैज्ञानिक यही अनुमान लगाते हैं कि बारिश के दिनों में पक्षियों के लिए यहाँ का प्रतिकूल मौसम और कंटीले बांस के ऊँचे-ऊँचे पेड़ यहां पक्षियों की मौत के लिए जिम्मेदार है। कुछ लोगों का कहना है कि यहाँ पर देश-विदेश से आने वाली पक्षियों का एकमात्र उद्देश्य आत्महत्या करना ही होता है।

इस घाटी में पक्षियों द्वारा आत्महत्या करने के पीछे यह तर्क दिया जाता है़ कि यहाँ इस जतिंगा घाटी में पक्षियों द्वारा आत्महत्या करने से वह पक्षी योनि से मुक्ति पा जाते हैं और मनुष्य योनि में प्रवेश कर जाते हैं।

असम की जतिंगा घाटी में अमावस की काली रात यहाँ के पक्षियों पर मौत का कहर बनकर टूट पड़ती है। क्योंकि अमावस्या की भयानक काली रात में पक्षियों के मरने की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। जिसके कारण कुछ लोगों का कहना है कि जतिंगा घाटी वह स्थान है जहाँ भूत-प्रेत का साया है जो पक्षियों को मौत के घाट उतार देता है।

इस घाटी में मौत का मंजर दिन ढलने के बाद शुरू होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मानसून के मौसम में यहाँ आने वाले कोई भी पक्षी वापस जिंदा नहीं लौट पाते। फिर सभी के मन में यह सवाल उठता है कि यह जगह पक्षियों के लिए सुरक्षित जगह न होने के बाद भी ऐसा क्या आकर्षक है इस जतिंगा घाटी में, जहां बहुत संख्या में पक्षी हर वर्ष आते हैं।

ऐसी कौन सी रहस्यमय सम्मोहन शक्ति है़ जो पंछियों को अपनी ओर खींचती है़। यह बात रहस्य के परतों में छिपी हुई है। जिसका खुलासा आज तक नहीं हो पाया है़।

इस जतिंगा घाटी की अनोखी बात यह है़ कि यहाँ पक्षी झुंड के झुंड एक साथ मरते हैं। जैसे की उन्होंने साथ-साथ मरने की कसम खाई हो। लोग इस अदभुत घटना को सुनकर हैरान रह जाते हैं।

बहुत से लोगों ने पंछियों के मरने के इस खौफनाक मंजर के हकीकत को जानने के लिए इस डरावनी घटना के सच को देखने का प्रयास किया। लेकिन वे भी पक्षियों के मौत के स्पष्ट कारण को समझ न सके। उनके हाथ कोई सफलता नहीं लगी। उनके हाथ लगी केवल मायूसी क्योंकि कोई भी इस मौत की घाटी में पक्षियों की मौत की घटनाओं को नहीं रोक सका।

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जानें समुद्र के ऊपर बने रेल पुल के बारे में रोचक तथ्य

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अगर आप को समुद्र पर बने हुए रेलवे पुल के पास एक विशाल जहाज तेज़ी से आता दिखाई दे और लगे कि वो पुल से टकराने जा रहा है तो आप क्या करेंगे? शायद रूस, जापान, जर्मनी जैसे विकसित देशों में या ऑस्ट्रेलिया के सिडनी हार्बर पर बने प्रसिद्ध पुल के सामने होते तो आपको पता होता कि वह पुल दोनों तरफ से उठ जायेगा और जहाज को जाने कि जगह दे देगा पर भारत में अब तक ऐसा एक भी पुल नहीं है।

जी हाँ, आपको यह जानकर गर्व होगा कि अपने भारत में भी अब एक ऐसा ही पुल ऐसा बनने जा रहा है जिसे वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज कहते हैं, जो जहाज के आने पर अपनी जगह से हट जायेगा और जहाज के चले जाने पर वापस अपनी जगह आ कर फिट हो जायेगा। है ना आश्चर्य की बात, तो चलिए आपको बताते हैं कि ये कमाल का समुद्री रेलवे पुल भारत में कहाँ पर बनने जा रहा है!

कहाँ बन रहा है भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज?

हम बात कर रहे हैं भारत में बंगाल की खाड़ी के किनारे बसे रामेश्वरम धाम को मण्डपम शहर और पम्बन द्वीप से जोड़ने वाले पम्बन रेलवे पुल की जो लगभग 250 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा है। पम्बन द्वीप के समुद्री रास्ते पर पुराने पुल के बेहद आकर्षक नज़ारों का आनंद तो आपने शाहरूख़ ख़ान की हिंदी फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रैस‘ में लिया ही होगा, परंतु वह पुल अब 108 साल पुराना और बहुत जर्जर हो चुका है जिस पर ट्रेनें 10 किलोमीटर प्रति घंटा की धीमी रफ़्तार से रेंगते हुए चलती है।

कैसे काम करते हैं ये वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज?

इस 2 किलोमीटर लंबे पुल पर जैसे ही कोई जहाज पास आएगा, बिल्कुल ट्रैफिक कंट्रोलर की तरह ऑपरेटर उस पुल को लिफ्ट प्रणाली से दोनों तरफ से उठा कर के जहाज को जाने की जगह दे देगा। सोचिए कितना रोमांचक लगेगा ट्रेन में बैठ कर एक पुल को इस तरह दोनों तरफ से उठते हुए देखना और फिर जहाज का उसके अंदर से निकल जाना! जहाज के आते ही पटरियाँ अपने आप ही लिफ्ट की तरह ऊपर चली जायेंगी और जहाज के जाते ही वापस अपनी जगह पर इंटरलॉक हो जायेंगी, जिससे उसके ऊपर से ट्रेन निकल सके। इस पुल को उठाए जाने के बाद एक बार में 2 विशालकाय जहाज़ों को निकालने की जगह होगी और इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ 10 मिनट का ही समय लगेगा।

यह नया पंबन ब्रिज शेजर रोलिंग लिफ्ट तकनीक से बनेगा जो 100 किलोमीटर से भी अधिक तेज़ समुद्री हवाओं को झेलने की क्षमता रखने के साथ ही तेज़ समुद्री तूफानों का भी सामना करने में सक्षम होगा। इस पुल में नयी तकनीक से बने हुए स्टेनलेस स्टील, कम्पोज़िट स्लीपर और एक लंबे समय तक टिकने वाले पेंट की  प्रणाली जैसी इंजीनियरिंग की नई तकनीकें शामिल होंगी।

यह पुल जब बन कर तैयार होगा तो इस में 143 खम्भे लगे होंगे और इसमें दो-पतरों से बना हुआ और इंटरलॉकिंग से जुड़ा एक बैस्क्यूल खंड बना हुआ होगा। इन दोनों खंडों में शेजर रोलिंग लिफ्ट स्पैन होते हैं, जिन्हें जहाजों के आने-जाने के लिए उठाया जा सकता है।

इस तरह की नयी तकनीक वाली सुविधायें किसी भी देश की प्रगति की पहचान और देश का गौरव होतीं हैं। अब तक इस तरह के बेहतरीन नज़ारे सिर्फ विदेशों में ही देखने को मिलते थे, पर अब आप गर्व से मुस्कुरा सकते हैं क्योंकि अब नयी तकनीक का कमाल का ये पुल अब आपके अपने देश में भी है। अब इससे पर्यटकों के लिए और विशेष तौर पर श्रद्धालुओं के लिए रामेश्वरम जाना सुविधाजनक हो जाएगा।

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ताजमहल के बारे में कुछ रहस्यमयी किस्से या दिलचस्प तथ्य क्या हैं?

 

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ताजमहल के बंद कमरों में क्या है ये तब पता चलेगा जब वो 22 कमरे खोले जाएंगे।

पर उससे पहले ये जान लेना आवश्यक है कि ताजमहल इस्लामिक ढांचा है भी या नही ?

1 - ताजमहल ये शब्द अरबी नही है अपितु हिंदी और संस्कृत शब्द है।

2 - ताजमहल का जो आकर है वो ऑक्टागोनल यानी अष्टकोण है जो कि एक मंदिर का आकार होता है।

3 - ताजमहल एक वाटर बेस्ड मॉन्युमेंट है यानी यमुना के रिवर बेड पर स्थित है और वहां ऐसी लकड़ी(आबनूस और महोगनी) का उपयोग किया गया है जो पानी के साथ रहके और मजबूत होती है और ये भी किसी इस्लामिक ढांचे के लिहाज से गलत है क्योंकि किसी इस्लामिक ढांचे के लिए उसका सुपुर्दे खाख(मिट्टी में मिला होना) होना आवश्यक है जबकि ताजमहल यमुना की रिवर बेड पर है जो की अधिकतर हिन्दू मंदिर बनाए जाते है।

4 - मुमताज़ की कब्र जहां गढ़ी बताई जाती है वो ताजमहल में 4th फ्लोर पर है जो कि इस्लामिक संस्कृति के हिसाब से ही गलत है क्योंकि लाश को धरती के 2 गज़ नीचे गाढ़ा जाता है और उसके ऊपर पत्थर रखा जाता है किन्तु (1) सत्य ये है कि मुमताज़ की मृत्यु 14 वे बच्चे को जन्म देते हुई (2) जहां मृत्यु हुई वो जगह थी बुराहनपुर (2) आगरा से बुराहनपुर की दूरी है लगभग 800 KM तो लाश 800 KM दूर कैसे लाई गई? (4) ताजमहल को बनने में इनके हिसाब से 20 साल लगे तो 20 साल तक क्या किया? (5) मुमताज़ की लाश को बुराहनपुर में ही गाढ़ दिया गया था।

4 - ताजमहल के बैकसाइड की जो भूमि है वो आज भी रिव्यु रिकार्ड्स में गौ शाला के नाम से दर्ज है और आप देखेंगे कि किसी भी इस्लामिक ढांचे के पास आपको गौ शाला देखने को नही मिलेगी।

5 - ताजमहल की 4 मीनारें है जबकि वहीं मस्ज़िद पर कोई भी मीनार नही है जो गलत है तो क्या मकबरे से आज़ान दी जाती थी? जो कि गलत की वो मस्जिद भी है क्योंकि मस्ज़िद का 1 गुम्बद होता है और जिसे ये मस्जिद के रहे है उसके 3 गुम्बद है।

6 - ताजमहल को लोग नागनाथेश्वर क्यों कहते थे?

नीचे एक इमेज दे रहा हूँ कि ताजमहल को नागनाथेश्वर क्यों कहा जाता था और ये बात आप ताजमहल जाकर स्वयं देख सकते ना कि मेरी बात पर विश्वाश करके पर जब जाएं तो 'canon या nikon का कैमरा लेकर जाएं' ।

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आप इस इमेज को ध्यान से देखो जहां मैने लाल निशान से मार्क किया हुआ है, स्पष्ट रूप से आपको 2 नाग एक दूसरे की तरफ मुख किए दिख जाएंगे और ये 2 नाग ताजमहल में बस उसकी मुंडेर के आठो तरह है क्योंकि ताजमहल एक अष्टकोण ढांचा है तो आपको बस उसके ऊपरी मुंडेर पर ये 2 नाग एक दूसरे की तरफ मुख किए दिख जाएंगे।

कुछ कहेंगे नही ये कोई डिज़ाइन है तो 'ऐसा नही है' आप भारत के राजपरिवारों के अधिकार घरेलू चिन्हों पर ऐसे निशान देख सकते है 'उदाहरण के लिए सिंधिया घराने का चिन्ह' एक इमेज नीचे दे रहा हूँ उसे देखें।

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ये चिन्ह सिंधिया कन्या विद्यालय का है और यहां भी आप वहीं 2 नागों को एक दूसरे की तरफ मुख किए देख सकते है।

प्रमाण बहुत है पर यहां लिखने में समय लगेगा, बाकी आप सबसे आशा है आप स्वयं भी खोज किया करें।


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