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आरती कात्यायनी माता जी की

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कात्यायनी माता की आरती नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है व दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में छठे दिन इसका जाप करना चाहिए।

जय जय अंबे जय कात्यायनी। जय जगमाता जग की महारानी॥
बैजनाथ स्थान तुम्हारी। वहां वरदानी नाम पुकारा॥

कई नाम है कई धाम हैं। यह स्थान भी तो सुखधाम है॥
हर मंदिर में जोत तुम्हारी। कही योगेश्वरी महिमा न्यारी॥

हर जगह उत्सव होते रहते। हर मंदिर में भक्त हैं कहते॥
कात्यायनी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की॥

झूठे मोह से छुड़ानेवाली। अपना नाम जपनेवाली॥
बृहस्पतिवार को पूजा करियो। ध्यान कात्यायनी का धरियो॥


हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी॥
जो भी माँ को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे॥

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आरती कालरात्रि माता जी की

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कालरात्रि माता की आरती माँ दुर्गाजी की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। दुर्गापूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन 'सहस्रार' चक्र में स्थित रहता है। इसके लिए ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। देवी कालात्रि को व्यापक रूप से माता देवी - काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, मृित्यू, रुद्रानी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है। रौद्री और धुमोरना देवी कालात्री के अन्य कम प्रसिद्ध नामों में हैं।

कालरात्रि जय-जय-महाकाली। काल के मुह से बचाने वाली॥
दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा। महाचंडी तेरा अवतार॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा। महाकाली है तेरा पसारा॥
खडग खप्पर रखने वाली। दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा। सब जगह देखूं तेरा नजारा॥
सभी देवता सब नर-नारी। गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदंता और अन्नपूर्णा। कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥
ना कोई चिंता रहे बीमारी। ना कोई गम ना संकट भारी॥

उस पर कभी कष्ट ना आवें। महाकाली माँ जिसे बचाबे॥
तू भी भक्त प्रेम से कह। कालरात्रि माँ तेरी जय॥

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आरती श्री सिद्धिदात्री माता जी की

 
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श्री सिद्धिदात्री माता जी की आरती माँ दुर्गाजी की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री हैं। ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए अगम्य नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

जय सिद्धिदात्री माँ तू सिद्धि की दाता।
तु भक्तों की रक्षक तू दासों की माता॥

तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि।
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि॥

कठिन काम सिद्ध करती हो तुम।
जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम॥

तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है।
तू जगदंबे दाती तू सर्व सिद्धि है॥

रविवार को तेरा सुमिरन करे जो।
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो॥

तू सब काज उसके करती है पूरे।
कभी काम उसके रहे ना अधूरे॥

तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया।
रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया॥

सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली।
जो है तेरे दर का ही अंबे सवाली॥

हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा।
महा नंदा मंदिर में है वास तेरा॥

मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता।
भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता॥
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आरती महागौरी माता जी की

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महागौरी माता जी की आरती माँ दुर्गाजी की आठवीं शक्ति का नाम महागौरी है। दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। इनकी उपासना से भक्तों को सभी कल्मष धुल जाते हैं, पूर्वसंचित पाप भी विनष्ट हो जाते हैं। भविष्य में पाप-संताप, दैन्य-दुःख उसके पास कभी नहीं जाते। वह सभी प्रकार से पवित्र और अक्षय पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।

जय महागौरी जगत की माया।
जया उमा भवानी जय महामाया॥

हरिद्वार कनखल के पासा।
महागौरी तेरी वहां निवासा॥

चंद्रकली ओर ममता अंबे।
जय शक्ति जय जय माँ जगंदबे॥

भीमा देवी विमला माता।
कौशिकी देवी जग विख्यता॥

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा।
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥

सती {सत} हवन कुंड में था जलाया।
उसी धुएं ने रूप काली बनाया॥

बना धर्म सिंह जो सवारी में आया।
तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया॥

तभी माँ ने महागौरी नाम पाया।
शरण आनेवाले का संकट मिटाया॥

शनिवार को तेरी पूजा जो करता।
माँ बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता॥

भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो।
महागौरी माँ तेरी हरदम ही जय हो॥

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आरती श्री जगदम्बा जी की

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जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।।
तुमको निशि दिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी।।

मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को।।
उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको।।

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।।
रक्तपुष्प गल माला, कंठन पार साजै।।

केहरि वाहन राजत, खडूग खप्पर धारी ।।
सुर – नर मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी।।

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती ।।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति ।।

शुम्भ निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती ।।
धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मतमाती।।

चण्ड – मुण्ड संहारे, शौणित बीज हरे।।
मधु – कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ।।

ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी ।।
आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी।।

चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरु।।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू।।

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता ।।
भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता ।।

भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी।।
मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ।।

कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति।।

अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे।।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख – सम्पत्ति पावे।।

देवी वन्दना
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता  ।।
नमस्तस्यै  नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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आरती श्री दुर्गा जी की

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सुन मेरी देवी पर्वत वासिनी,कोई तेरा पार न पाया ।।  टेक ।।
पान सुपारी ध्वजा नारियल ले,तेरी भेंट चढ़ाया ।।  सुन ।।

सारी चोली तेरे अंग बिराजे,केसर तिलक लगाया ।।  सुन ।।
ब्रह्मा वेद पढ़े तेरे द्वारे,शंकर ध्यान लगाया ।। सुन ।।

नंगे नंगे पग से तेरे,सम्मुख अकबर आया,सोने का छत्र चढ़ाया ।। सुन ।।
ऊँचे ऊँचे पर्वत बन्यौ शिवालो,नीचे महल बनाया ।।  सुन।।

सतपुरा द्वापर त्रेता मध्ये,कलयुग राज सवाया ।।  सुन ।।
धुप, दीप नैवेद्य आरती,मोहन भोग लगाया ।। सुन ।।

ध्यानू भगत मैया तेरा गुण गावे,मनवांछित फल पाया।।
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आरती श्री सीता माता की आरती


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सीता बिराजथि मिथिलाधाम सब मिलिकय करियनु आरती।
संगहि सुशोभित लछुमन-राम सब मिलिकय करियनु आरती।।

विपदा विनाशिनि सुखदा चराचर, सीता धिया बनि अयली सुनयना घर।
मिथिला के महिमा महान, सब मिलिकय करियनु आरती।।
 सीता बिराजथि...

सीता सर्वेश्वरि ममता सरोवर, बायाँ कमल कर दायाँ अभय वर।
सौम्या सकल गुणधाम, सब मिलिकय करियनु आरती।।
सीता बिराजथि...

रामप्रिया सर्वमंगल दायिनि, सीता सकल जगती दुःखहारिणि।
करथिन सभक कल्याण, सब मिलिकय करियनु आरती।।
सीता बिराजथि...

सीतारामक जोड़ी अतिभावन, नैहर सासुर कयलनि पावन।
सेवक छथि हनुमान, सब मिलिकय करियनु आरती।।
सीता बिराजथि...

ममतामयी माता सीता पुनीता, संतन हेतु सीता सदिखन सुनीता।
धरणी-सुता सबठाम, सब मिलिकय करियनु आरती।।
सीता बिराजथि...

शुक्ल नवमी तिथि वैशाख मासे, चंद्रमणि सीता उत्सव हुलासे।
पायब सकल सुखधाम, सब मिलिकय करियनु आरती।
सीता बिराजथि मिथिलाधाम सब मिलिकय करियनु आरती।।
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आरती श्री शाकुम्भरी माता की आरती

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हरी ॐ श्री शाकुम्भरी अम्बा जी की आरती की जो।
ऐसी अदभुत रूप ह्रदय धर लीजो॥

शताक्षी दयालु की आरती की जो।
तुम परिपूर्ण आदि भवानी माँ, सब घट तुम आप बखानी माँ॥

शाकुम्भरी अम्बा जी की आरती कीजो।
तुम्ही हो शाकुम्भर, तुम ही हो सताक्षी माँ॥

शिवमूर्ति माया प्रकाशी माँ।
शाकुम्भरी अम्बा जी की आरती की जो॥

नित जो नर-नारी अम्बे आरती गावे माँ।
इच्छा पूर्ण कीजो, शाकुम्भर दर्शन पावे माँ॥

शाकुम्भरी अम्बा जी की आरती की जो।
जो नर आरती पढ़े पढावे माँ, जो नर आरती सुनावे माँ॥

बस बैकुंठ शाकुम्भर दर्शन पावे।
शाकुम्भरी अंबा जी की आरती की जो॥
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आरती श्री नैना देवी जी की

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तेरा अदभुत रूप निराला,आजा! मेरी नैना माई ए ।।
तुझपै तन मन धन सब वारूं,आजा मेरी नैना माई ए ।।

सुन्दर भवन बनाया तेरा,तेरी शोभा न्यारी ।।
नीके नीके खम्भे लागे,अद्-भुत चित्तर करी।।
तेरा रंग बिरंगा द्वारा ।।  आजा

झाँझा और मिरदंगा बाजे,और बाजे शहनाई ।।
तुरई नगाड़ा ढोलक बाजे,तबला शब्त सुनाई ।।
तेरे द्वारे नौबत बाजे।। आजा

पीला चोला जरद किनारी,लाल ध्वजा फहराये ।।
सिर लालों दा मुकुट विराजे,निगाह नहिं ठहराये ।।
तेरा रूप न वरना जाए ।।  आजा

पान सुपारी ध्वजा,नारियल भेंट तिहारी लागे ।।
बालक बूढ़े नर नारी की,भीड़ खड़ी तेरे आगे ।।
तेरी जय जयकार मनावे ।।  आजा

कोई गाए कोई बजाए,कोई ध्यान लगाये।।
कोई बैठा तेरे आंगन में,नाम की टेर सुनाये।।
कोई नृत्य करे तेरे आगे ।।  आजा

कोई मांगे बेटा बेटी,किसी को कंचन माया ।।
कोई माँगे जीवन साथी,कोई सुन्दर काया।।
भक्तों किरपा तेरी मांगे ।। आजा

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आरती श्री सरस्वती जी की

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कज्जल पुरित लोचन भारे, स्तन युग शोभित मुक्त हारे।
वीणा पुस्तक रंजित हस्ते, भगवती भारती देवी नमस्ते॥

जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता।
दगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता ॥

जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता।
चंद्रवदनि पदमासिनी, घुति मंगलकारी।
सोहें शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी॥

जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता।
बायेँ कर में वीणा, दायें कर में माला।
शीश मुकुट मणी सोहें, गल मोतियन माला॥

जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता।
देवी शरण जो आयें, उनका उद्धार किया।
पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया॥

जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता।
विद्या ज्ञान प्रदायिनी,  ज्ञान प्रकाश भरो।
मोह और अज्ञान तिमिर का जग से नाश करो॥

जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता।
धुप, दिप फल मेवा माँ स्वीकार करो।
ज्ञानचक्षु दे माता, भव से उद्धार करो॥

जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता।
माँ सरस्वती जी की आरती जो कोई नर गावें।
हितकारी, सुखकारी ग्यान भक्ती पावें॥

सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता।
सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता॥
जय सरस्वती माता, जय जय हे सरस्वती माता॥

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आरती श्री चिन्तपूर्णी देवी जी की

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चिन्तपूर्णी चिन्ता दूर करनी,जन को तारो भोली माँ।।

काली दा पुत्र पवन दा घोडा,सिंह पर भई असवार, भोली माँ ।।
एक हाथ खड़ग दूजे में खांडा,तीजे त्रिशूलसम्भालो, भोली माँ ।।

चौथे हथ चक्कर गदा पांचवे,छठे मुण्डों दी माल भोली माँ ।।
सातवें से रुण्ड-मुण्ड बिदारे,आठवें से असुर संहारे, भोली माँ ।। 

चम्पे का बाग लगा अति सुन्दर,बैठी दीवान लगाय, भोली माँ ।।
हरि हर ब्रह्मा तेरे भवन विराजे,लाल चंदोया बैठी तान, भोली माँ ।।

औखी घाटी विकटा पैंडा,तले बहे दरिया, भोली माँ ।।
सुमर चरन ध्यानू जस गावे,भक्तां दी पज निभाओ, भोली माँ ।।
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श्री मैहर की शारदा माता जी की आरती

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हे शारदे! कहाँ तू बीणा बजा रही है ।।
किस मंजुज्ञान से तू जग को लुभा रही है ।।

किस भाव में भवानी तू मग्न हो रही है,
विनती नहीं हमारी क्यों मात सुन रही है ।।

हम दीन बाल कब से विनती सुना रहे हैं,
चरणों में तेरे माता हम सिर नवा रहे हैं।।

अज्ञान तुम हमारा माँ शीघ्र दूर कर दे,
द्रुत ज्ञान शुभ्र हम में माँ शारदे तू भर दे ।।

बालक सभी जगत के सुत मात है तिहारे,
प्राणों से प्रिय तुझे है हम पुत्र सब दुलारे ।।

हमको दया मयी ले गोद में पढ़ाओ,
अमृत जगत का हमको मां शारदे पिलाओ।।

ह्रदय रुपी पलक में करते है आहो जारी,
हर क्षण ढूंढते है माता तेरी सवारी ।।

मातेश्वरी तू सुन ले सुन्दर विनय हमारी,
करके दया तू हरले बाधा जगत की सारी ।।
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आरती श्री राधा जी की

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आरती श्री वृषभानुसुता की । मंजु मूर्ति मोहन ममताकी।। टेक ।।

त्रिविध तापयुत संसृति नाशिनि, विमल विवेकविराग विकासिनि।।
पावन प्रभु पद प्रीति प्रकाशिनि, सुन्दरतम छवि सुन्दरता की।।

मुनि मन मोहन मोहन मोहनि, मधुर मनोहर मूरती सोहनि ।।
अविरलप्रेम अमिय रस दोहनि, प्रिय अति सदा सखी ललिताकी ।।

संतत सेव्य सत मुनि जनकी, आकर अमित दिव्यगुन गनकी।।
आकर्षिणी कृष्ण तन मनकी, अति अमूल्य सम्पति समता की ।।

कृष्णात्मिका, कृषण सहचारिणि, चिन्मयवृन्दा विपिन विहारिणि ।।
जगज्जननि जग दुःखनिवारिणि, आदि अनादिशक्ति विभुताकी ।।
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आरती श्री गायत्री माता जी की

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ज्ञान दीप और श्रद्धा की बाती,सो भक्ति ही पूर्ती करै जहं घी की ।।
आरती श्री गायत्री जी की ।।

मानस की शुचि थाल के ऊपर,देवी की जोति जगै, जहं नीकी ।।
आरती श्री गायत्री जी की ।।

शुद्ध मनोरथ के जहां घण्टा,बाजैं करैं पूरी आसहु ही की ।।
आरती श्री गायत्री जी की ।।

जाके समक्ष हमें तिहूँ लोक कै,गद्दी मिलै तबहूं लगै फीकी ।।
आरती श्री गायत्री जी की ।।

संकट आवैं न पास कबौ तिन्हें, सम्पदा औ सुख की बनै लीकी ।।
आरती श्री गायत्री जी की ।।

आरती प्रेम सो नेम सों करि, ध्यावहिं मूरति ब्रह्म लली की ।।
आरती श्री गायत्री जी की ।।
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आरती गायत्री माता की

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जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता।

आदि शक्ति तुम अलख निरंजन जग पालन कर्त्री।
दुःख शोक भय क्लेश कलह दारिद्र्य दैन्य हर्त्री॥

ब्रह्मरूपिणी, प्रणत पालिनी, जगत धातृ अम्बे।
भव-भय हारी, जन हितकारी, सुखदा जगदम्बे॥

भयहारिणि, भवतारिणि, अनघे अज आनन्द राशी।
अविकारी, अघहरी, अविचलित, अमले, अविनाशी॥

कामधेनु सत-चित-आनन्दा जय गंगा गीता।
सविता की शाश्वती, शक्ति तुम सावित्री सीता॥

ऋग्, यजु, साम, अथर्व, प्रणयिनी, प्रणव महामहिमे।
कुण्डलिनी सहस्रार सुषुम्रा शोभा गुण गरिमे॥

स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, राधा, रुद्राणी।
जय सतरूपा वाणी, विद्या, कमला, कल्याणी॥

जननी हम हैं दीन, हीन, दुःख दारिद के घेरे।
यदपि कुटिल, कपटी कपूत तऊ बालक हैं तेरे॥

स्नेह सनी करुणामयि माता चरण शरण दीजै।
बिलख रहे हम शिशु सुत तेरे दया दृष्टि कीजै॥

काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ, दुर्भाव द्वेष हरिये।
शुद्ध, बुद्धि, निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये॥

तुम समर्थ सब भाँति तारिणी, तुष्टि, पुष्टि त्राता।
सत मारग पर हमें चलाओ जो है सुखदाता॥

जयति जय गायत्री माता, जयति जय गायत्री माता॥
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आरती श्री लक्ष्मी माता की

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ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

उमा, रमा, ब्रम्हाणी, तुम जग की माता।
सूर्य चद्रंमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

दुर्गारुप निरंजन, सुख संपत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्याता, ऋद्धि सिद्धी धन पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

तुम ही पाताल निवासनी, तुम ही शुभदाता।
कर्मप्रभाव प्रकाशनी, भवनिधि की त्राता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद् गुण आता।
सब सभंव हो जाता, मन नहीं घबराता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

तुम बिन यज्ञ ना होता, वस्त्र न कोई पाता।
खान पान का वैभव, सब तुमसे आता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

शुभ गुण मंदिर सुंदर क्षीरनिधि जाता।
रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता।
उँर आंनद समाा, पाप उतर जाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

स्थिर चर जगत बचावै, कर्म प्रेर ल्याता।
रामप्रताप मैया जी की शुभ दृष्टि पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता....

ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता।
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता...
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आरती श्री तुलसी जी की

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जय जय तुलसी  माता, सबकी सुखदाता वर माता ।
सब योगों के ऊपर, सब रोगों के ऊपर, रज से रक्षा करके भव त्राता ।।

बहु पुत्री है श्यामा, सूर वल्ली है ग्राम्या ।
विष्णु प्रिय जो तुमको सेवे सो नर तर जाता ।।

हरि के शीश विराजत त्रिभुवन से हो वंदित ।
पतित जनों की तारिणि तुम हो विख्याता ।।

लेकर जन्म बिजन में, आई दिव्य भवन में ।
मानव लोक तुम्हीं से सुख संपति पाता ।।

हरि को तुम अति प्यारी श्याम वर्ण सुकुमारी ।
प्रेम अजब है श्री हरि का तुम से नाता ।।

जय जय तुलसी माता ।।
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आरती श्री काली जी की -01

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अम्बे तू है जगम्बे काली जय दुर्गे खप्पर वाली  ।।
तेरे ही गुण गायें भारती ।
ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती  ।।

तेरे भक्त जनों पे माता भीड़ पड़ी है भारी  ।
दानव दल पार टूट पड़ो मां करके सिंह सावरी  ।।

सौ सौ सिंहों से है बलशाली दस भुजाओं वाली  ।
दुखियो के दुखडें निवारती  ।।  ओ मैया  ।।
मां बेटे का हैं पर ना माता सुनी कुमाता  ।।

सब पे करूणा दरसाने वाली अमृत बरसाने वाली  ।
दुखियो के दुखडें निवारती  ।।  ओ मैया  ।।
नहीं माँगते धन और दौलत न चांदी न सोना  ।।

हम तो मांगे मां तेरे मन में एक छोटा – सा कोना  ।
सबकी बिगड़ी बनाने वाली लाज बचाने वाली
सतियों के सत को सँवारती  ।।  ओ मैया  ।।

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आरती श्री काली माता जी की

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मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड तेरे द्वार खडे।
पान सुपारी ध्वजा नारियल ले ज्वाला तेरी भेट धरेसुन।।

जगदम्बे न कर विलम्बे, संतन के भडांर भरे।
सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, जै काली कल्याण करे।।

बुद्धि विधाता तू जग माता, मेरा कारज सिद्व रे।
चरण कमल का लिया आसरा शरण तुम्हारी आन पडे।।

जब जब भीड पडी भक्तन पर, तब तब आप सहाय करे।
गुरु के वार सकल जग मोहयो, तरूणी रूप अनूप धरेमाता।।

होकर पुत्र खिलावे, कही भार्या भोग करेशुक्र सुखदाई सदा।
सहाई संत खडे जयकार करे।।

ब्रह्मा विष्णु महेश फल लिये भेट तेरे द्वार खडेअटल सिहांसन।
बैठी मेरी माता, सिर सोने का छत्र फिरेवार शनिचर।।

कुकम बरणो, जब लकड पर हुकुम करे।
खड्ग खप्पर त्रिशुल हाथ लिये, रक्त बीज को भस्म करे।।

शुम्भ निशुम्भ को क्षण मे मारे, महिषासुर को पकड दले।
आदित वारी आदि भवानी, जन अपने को कष्ट हरे।।

कुपित होकर दनव मारे, चण्डमुण्ड सब चूर करे।
जब तुम देखी दया रूप हो, पल मे सकंट दूर करे।।

सौम्य स्वभाव धरयो मेरी माता, जन की अर्ज कबूल करे।
सात बार की महिमा बरनी, सब गुण कौन बखान करे।।

सिंह पीठ पर चढी भवानी, अटल भवन मे राज्य करे।
दर्शन पावे मंगल गावे, सिद्ध साधक तेरी भेट धरे।।

ब्रह्मा वेद पढे तेरे द्वारे, शिव शंकर हरी ध्यान धरे।
इन्द्र कृष्ण तेरी करे आरती, चॅवर कुबेर डुलाय रहे।।

जय जननी जय मातु भवानी, अटल भवन मे राज्य करे।
सन्तन प्रतिपाली सदा खुशहाली, मैया जै काली कल्याण करे।।
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आरती श्री गौ माता जी की

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आरती श्री गैया मैया की ।
आरती-हरनि विश्‍वधैया की ।।  टेक ।।

अर्थ काम सद्धर्म प्रदायिनि।
अविचलअमलमुक्तिपददायिनि ।।

सुर मानक सौभाग्य विधायिनि।
प्यारी पूज्य नन्द छैया की ।।  आरती।।

अखिल विश्‍व प्रति पालिनि माता ।
मधुर अमिय दुग्धान्न प्रदाता ।।

रोग-शोक-संकट परित्राता ।
भवसागर हित दृढ़ नैया की ।। आरती ।।

आयु-ओज आरोग्य विकाशिनि ।
दुःख दैन्य दारिद्रय विनाशिनि ।।

सुष्मा सौख्य समृद्धि प्रकाशिनि ।
विमल विवेक बुद्धि दैया की ।।  आरती ।।

सेवक हो चाहे दुःखदाई ।
सम पय सुधा पियावति माई ।।

शत्रु मित्र सबको सुखदाई ।
स्नेह स्वभाव विश्‍व जैया की॥ आरती ॥
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