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इंडोनेशिया की श्राप वाली देवी के मंदिर का रहस्य

 
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यह एक अनूठी गाथा है। जिसमें एक युवक ने एक युवती को श्राप दे दिया। जिसके कारण वह मूर्ति बन गयी। आश्चर्य की बात यह है कि बाद में उस मूर्ति में एक दैवीय शक्ति उत्पन्न हो गयी और लोग उस मूर्ति की पूजा देवी माँ के रूप में करने लगे। श्राप के कारण उत्पन्न होने वाली देवी माँ की यह मूर्ति भारत में नहीं बल्कि इंडोनेशिया में हैं। इंडोनेशिया का प्रम्बानन नामक भगवान शिव का यह मंदिर पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।

इस मंदिर में भगवान शंकर के साथ देवी माँ विराजमान हैं। इस मंदिर में देवी मां की वही अद्भुत मूर्ति स्थापित है जो जिंदा लड़की से पत्थर की बन गयीं थी। जिंदा इंसान से मूर्ति बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प और अद्भुत है। इस कहानी को जानने वाला हर व्यक्ति आश्चर्यचकित रह जाता है।

श्राप वाली देवी का पूरा किस्सा क्या है! जावा के उस युवक ने युवती को श्राप क्यों दिया और किस तरह उसने मूर्ति का रूप धारण कर लिया? इस अद्भुत देवी की पूरी कहानी बड़ी चमत्कारिक है। आइये जानते हैं इस श्राप वाली देवी की अद्भुत कहानी।

कहानी

यह कथा 10 वीं शताब्दी से पूर्व की है। तब जावा में प्रबुबका नाम का एक दैत्य राज्य करता था। उसकी एक पुत्री थी, जिसका नाम था रो रो  जोंग्गारंग। जो अत्यंत सुंदर थी। लेकिन अधिकतर महल में ही रहने कारण उस राजा की बेटी की सुंदरता से आम जनता अनजान थी। एक दिन उस दैत्य की पुत्री राजकुमारी रो रो जोंग्गारंग अपने राज्य में घूमने निकली। घूमते-घूमते उसकी नजर एक मूर्तिकार पर पड़ी।

उस मूर्तिकार का नाम था बोंदोवोसो। वह उस समय मूर्ति बना रहा था। उसकी बनायी मूर्तियाँ इतनी सजीव लगती थी कि मानो अभी बोल देंगी। उसकी हाथ की कलाकारी को देखकर ऐसा लगता था कि जैसे उसे दैवीय शक्ति प्राप्त हो। उस दैत्य राजा की पुत्री, उस कलाकार की मूर्तियों से इतनी प्रभावित हुई कि उसकी कला को देखने के लिए अपने रथ से नीचे उतर पड़ी और उस कलाकार की सुंदर मूर्तियां देखने लगी।

मूर्तिकार बोंदोवोसो की नज़र जब अति सुंदर राजकुमारी पर पड़ी तो वह उसकी सुंदरता का दीवाना हो गया। वह मूर्तिकार, दैत्य राज की पुत्री को मन ही मन चाहने लगा। वह उससे विवाह करना चाहता था। लेकिन उसने अपने मन की बात अपने मन में ही रखी क्योंकि उसे पता था कि कहाँ वह राजा की पुत्री और कहाँ वह एक मामूली मूर्तिकार! ऐसे में दोनों का मेल असम्भव था ।

लेकिन एक दिन हिम्मत करके वह मूर्तिकार उस दैत्य राजा के महल पहुँच गया। उसने पहरेदारों से कहा कि वह राजकुमारी से मिलना चाहता है। पहरेदार उस कलाकार का संदेश लेकर अंदर महल में गये। लेकिन राजकुमारी ने उससे मिलने से इंकार कर दिया। फिर मूर्तिकार बोंदोवोसो ने रातोंरात अपने हाथ से बनायी वह मूर्ति जो राजकुमारी के चेहरे से हूबहू मिलती थी; महल के अंदर भेज दी।

दैत्य की पुत्री राजकुमारी रो रो जोग्गारंग ने जब अपनी इतनी सुंदर मूर्ति देखी तो प्रसन्न हो गई और उसने उस मूर्तिकार को महल में बुला लिया। वह मूर्तिकार जब महल में पहुँचा तो दरबार में राजा, उसकी पुत्री और दरबारी सभी बैठे थे। मूर्तिकार बोंदोवोसो ने सोचा कि यह अच्छा अवसर है अपने दिल की बात कहने का। उसने राजा से कहा कि वह उसकी पुत्री से विवाह करना चाहता है।

एक आम आदमी का राजकुमारी से विवाह करने का प्रस्ताव देना, अचंभे से भरा था। उसकी यह बात सुनकर राजा आग बबूला हो गया। उसने अपनी तलवार निकाल ली। लेकिन चालाक राजकुमारी ने अपने पिता को उस मूर्तिकार का कत्ल करने से रोक दिया। उसने उस कलाकार को सबक सिखाने के लिए एक प्रस्ताव रख दिया। राजकुमारी ने कहा कि वह मूर्तिकार से तभी विवाह कर सकती है जब वह एक रात में 1000 मूर्तियां बना दे।

दैत्य की पुत्री को पता था कि एक रात में एक हजार मूर्तियाँ बनाना संभव नहीं है। उसका सोचना था कि न मूर्तियां बन पायेंगी और न शादी हो पायेगी। मूर्तिकार बोंदोवोसो लगन से राजकुमारी की एक रात में 1000 मूर्ति बनाने की शर्त पूरा करने के लिये अपने काम में जुट गया। उसने रातों रात 999 मूर्तियां बना दी और जैसे ही वह अपनी 1000 वीं मूर्ति का निर्माण करने जा रहा था कि उसे लगा कि सुबह हो गई।

उसने अपना काम रोक दिया क्योंकि 1000 मूर्तियाँ रातों- रात पूरी करनी थी। लेकिन सुबह का उजाला होने के कारण मूर्तिकार ने काम रोक दिया और बहुत निराश हो गया, क्यों कि वह शर्त हार गया था। उसे नहीं पता था की राजा की पुत्री ने उसके साथ धोखा किया है। दरअसल राजकुमारी ने पूरे शहर के चावल की खेतों में आग लगवा दी थी। इसके कारण पूरे शहर में उजाला हो गया।

उस उजाले को सुबह जानकर मूर्तिकार ने अपना काम रोक दिया। वह 999 ही मूर्ति बना पाया था। जिसके कारण वह अपनी शर्त हार गया था अतः मूर्तिकार निराश होकर बैठ गया। वह घंटों रोता रहा लेकिन जब वास्तव में सुबह हुई तो उसे राजकुमारी के षडयंत्र के बारे में पता चल गया। वह बहुत क्रोधित हो गया और दौड़ा-दौड़ा राजमहल पहुँच गया।

पहरेदारों के रोकने पर भी मूर्तिकार बोंदोंवोसो अंदर महल में घुस गया और उसने राजकुमारी को श्राप दे दिया कि तूने मेरे साथ छल किया। जिसके कारण मैं 999 मूर्तियां ही बना सका, अब तू मेरी 1000 वीं मूर्ति बन जा। देखते ही देखते राजकुमारी पत्थर की मूर्ति में बदल गयी।

मूर्तिकार ने फिर कहा कि हे राजकुमारी, तूने जीते जी किसी का भला नहीं चाहा लेकिन मूर्ति बनने के बाद तुझे दूसरों का भला करना होगा। उस मूर्तिकार की बात सच हो गयी। राजकुमारी की मूर्ति से माँगी गयी लोगों की मनोकामना पूरी होने लगी। जिसके कारण सभी उसे देवी के रूप में पूजने लगे।


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कौन सा युग श्रेष्ठ है ?

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 एक बार ऋषियो की सभा में चर्चा हो रही थी कि कौन सा युग श्रेष्ठ है। कोई सतयुग तो कोई त्रेता तो कोई द्वापर को श्रेष्ठ बता रहा था। सभा किसी युग की श्रेष्ठता को लेकर एक मत नही थी। अंत में तय हुआ कि इस समस्या के समाधान के लिए महर्षि वेदव्यास के पास चला जाए। 

जब सभी ऋषि वहा पहुंचे तो उस समय महर्षि व्यास गंगा में स्नान कर रहे थे। सब उनकी प्रतीक्षा करने लगे। उन्होने जल में डूबकी मारी और ऊपर आने पर जपने लगे , ‘‘ कलयुग ही सर्व श्रेष्ठ है। ‘‘ ऋषि गण कुछ समझ पाते कि व्यास जी ने फिर डूबकी मारी और ऊपर आने पर कहने लगे, ‘‘ शूद्र ही साधु है,शुद्र ही साधु है ‘‘ सभी ऋषिगण एक दूसरे की तरफ आश्चर्य से देखने लगे। इससे पहले कोई कुछ समझ पाता व्यास जी ने गंगा मे तीसरी डूबकी  लगाई और ऊपर आने पर जपने लगे, ‘‘ स्त्री ही धन्य है। ‘‘ मुनिगण महर्षि व्यास के इस व्यवहार पर आश्चर्य चकित थे । उन्हे समझ नही आ रहा था कि वह कौन सा मंत्र जप रहे है ? स्नान कर व्यास जी अपने कुटिया पर आए और प्रतिक्षा में बैठे सभी ऋषियो का स्वागत करते हुए पूछा, कहिए, आज आप सबका मेंरे यहां कैसे आना हुआ ? ऋषियो नें कहा, आपके पास एक समस्या के समाधान के लिए आए थे । लेकिन आप नहाते समय जो मंत्र  रहे थे। उसने तो हमें असमंजस डाल दिया है। कृपया पहले इसका समाधान करे। व्यास जी ने कहा ,इसमें कुछ भी गोपनीय नही है। सतयुग में दस वर्ष के कठोर जप-तप जो फल मिलता है,वही फल त्रेता में मात्र एक वर्ष ,द्वापर में एक महीना जबकि कलयुग में केवल एक भगवान के नाम जपने से प्राप्त हो जाता है,इसलिए कलयुग ही श्रेष्ठ है। ब्राह्मण को जो फल लंम्बे कठोर अनुशासन  और पूजा-पाठ से मिलता है,वही पूण्य फल कलयुग में शूद्र अपनी सेवा भाव के बल पर अर्जित कर लेते है,इस लिए शूद्र ही साधु है। मन-बचन-कर्म से अपनी सेवा के जरिये अपने परिवार को समर्पित स्त्री का योगदान महान है। वे इससे ही पूण्य लाभ कमा लेती है,इस लिए वे धन्य है। 

अब आप बताये कि आप सबका यहां कैसे आना हुआ ? सभी ने कहा,‘‘ हम जिस शंका को लेकर आपके पास आये थे,आपकी कृपा से वह दूर हो गई है। यह सुन कर व्यास जी मुस्करा दिए। 

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मृत्यु क्या है ?

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मृत्यु क्या है ? इसका उत्तर कई दृष्टिकोण से दिया जा सकता है लेकिन क्या कभी किसी ने मृत्यु को देखा है या मृत्यु को साक्षात अनुभव किया है इस का सकारात्मक उत्तर दुनिया में विरले लोगों के पास ही होगा । इस सम्बन्ध में भारतीय तत्वदर्शी योगियों ने सारस्वरूप, ज्ञान के जिन तथ्यों को रखा है, संसार उसके लिए उनका हमेशा ऋणी रहेगा । 

उनके अनुसार मृत्यु से कुछ समय पहले मनुष्य को बड़ी बेचैनी, पीड़ा और छटपटाहट होती है, क्योंकि शरीर की सारी नाड़ियों में से प्राण खिंच कर एक जगह एकत्रित होता है, लेकिन पुराने अभ्यास के कारण वो फिर से नाड़ियों में खिसक जाता है जिससे एक प्रकार का आघात लगता है, यही कष्ट का कारण होता है । ऐसा एक से अधिक बार हो सकता है । और ये कितनी बार होगा, यह निर्भर करता है कि जीवात्मा किस कदर सांसारिक मोह, वासना से घिरा हुआ था । 

अगर मौत किसी रोग, आघात या किसी अन्य कारण से हो रही हो तो उससे भी पीड़ा होती है । मरने से पहले मनुष्य कष्ट पाता ही है भले ही वो इसको अपनी जिह्वा से प्रकट कर सके या न कर सके । लेकिन जब प्राण निकलने का समय बिलकुल पास आ जाता है तो उसे एक प्रकार की मूर्छा आ जाती है और उसी मूर्छा या अचेतन अवस्था में उसके प्राण निकल जाते हैं । 

जब मनुष्य मरने वाला होता है तो उसकी समस्त बाह्य शक्तियां एकत्रित होकर अंतर्मुखी हो जाती हैं और फिर स्थूल शरीर से बाहर निकल पड़ती हैं ।  विदेशी विद्वानों का मत है कि किसी जीव का सूक्ष्म शरीर, बैंगनी रंग की छाया लिए स्थूल शरीर से बाहर निकलता है जबकि प्राचीन भारतीय योगियों ने इसका रंग शुभ्र श्वेत ज्योति जैसा माना है  । दोनों के अपने-अपने अनुसन्धान हैं । 

अंतिम समय, जीवन में जो पुरानी बातें, घटनाएं, धूमिल पड़ कर मस्तिष्क के अति सूक्ष्म कोष्ठकों में निष्क्रिय अवस्था में पड़ी रहती हैं, वे सब एकत्रित होकर एक साथ निकलने की कोशिश करती हैं जिसकी वजह से वो जागृत एवं सजीव हो जाती हैं ।  इसलिए कुछ ही क्षणों के भीतर अपने समस्त जीवन की घटनाओं को एक फिल्म की तरह मनुष्य देख लेता है । 

इन सब का जो सम्मिलित निष्कर्ष निकलता है वह सार रूप में संस्कार बनकर मृतात्मा के साथ हो लेता है ।  ज्ञानी बताते हैं कि यह घड़ी अत्यंत ही पीड़ा की होती है ।  भौतिक कष्ट से तुलना की जाय तो कहा गया है कि एक साथ हज़ार बिच्छुओं के दंश जैसा कष्ट होता है । 

बस यूं समझ लीजिये कि जैसे कोई मनुष्य भूल से अपने छोटे से पुत्र पर गोली चला दे और उसका पुत्र मृत्यु-शैया पर पड़ा तड़प रहा हो तो उस दृश्य को देखकर एक सहृदय पिता के ह्रदय में अपनी भूल के कारण अपने प्राण-प्रिय पुत्र के लिए ऐसी भयंकर दुर्घटना हो जाने पर जो दारुण कष्ट और व्यथा पैदा होती है ठीक वैसी ही पीड़ा उस समय उस जीव का प्राण अनुभव करता है क्योंकि तब उसे ये जीवन अत्यंत बहुमूल्य लगने लगता है और वो जानता है कि इस बहुमूल्य जीवन का उसने वैसा सदुपयोग नहीं किया जैसा उसे करना चाहिए था । 

मृत्यु का समय उपस्थित होने पर प्राणी की शारीरिक चेतनाएं तो शून्य हो ही जाती हैं पर मानसिक वेदना मर्मान्तक होती है  । मृत्यु से ठीक पहले तक शरीर अपना कष्ट सह चुका होता है ।  रोग आदि की शारीरिक पीड़ा तो कुछ क्षण पूर्व ही, जबकि इन्द्रियाँ अपनी शक्तियों के साथ अंतर्मुखी होने लगती है, बंद हो जाती है । 

उस समय बीमारी या किसी आघात से शरीर और जीव के बंधन टूटने प्रारम्भ हो जाते हैं ।  शरीर के ऊर्ध्व भाग में बने मार्गों, जैसे मुख, कान, आँख, नाक, से अकसर प्राण निकलता है ।  दुष्ट प्रकृति के लोगों का प्राण शरीर के अधोभाग में स्थित मार्गों (मल-मूत्र मार्ग) से निकलता देखा जाता है ।  योगी, ब्रह्मरंध्र से प्राण त्यागते हैं । 

शरीर से निकलने के बाद जीव एक विचित्र अवस्था में पड़ जाता है ।  घनघोर परिश्रम से थका हुआ व्यक्ति जिस प्रकार से एक कोमल और आरामदायक बिछौना पाते ही गहरी नींद में सो जाता है, उसी प्रकार से मृतात्मा को जीवन भर का सारा श्रम उतारने के लिए एक निद्रा की आवश्यकता होती है ।  इस नींद से जीव को बड़ी शान्ति मिलती है और आगे के जीवन के लिए वह शक्ति प्राप्त कर लेता है । 

लेकिन मरते ही नींद नहीं आती बल्कि उसमे कुछ देर लगती है । साधारण तौर पर एक महीना लग सकता है । उसका कारण यह है कि मरने के बाद कुछ समय तक पिछले जीवन (या जीवनों) की इच्छाएं और वासनाएँ प्रौढ़ रहती हैं और वो धीरे-धीरे ही निर्बल पड़ती हैं । 


भौतिक जीवन में देखा जाय तो वैसे भी कड़ी मेहनत कर के आने पर हमारे शरीर का रक्त-संचार बहुत तीव्र होता है और पलंग मिल जाने पर भी हम उतने समय तक जागते रहते हैं जब तक की फिर से रक्त की गति धीमी या सामान्य न हो जाए । 

मृतात्मा भौतिक शरीर से अलग होने पर सूक्ष्म शरीर में प्रस्फुटित होती है ।  यह सूक्ष्म शरीर, स्थूल शरीर के बनावट के जैसा ही होता है ।  मृतक को इस बात का आश्चर्य लगता है कि उसका शरीर कितना हल्का हो चुका है, वह हवा में पक्षियों की तरह उड़ सकता है और इच्छामात्र से जहाँ चाहे आ-जा सकता है । 

अपने स्थूल शरीर के आस-पास अपने परिवार और प्रियजनों को रोता-बिलखता देखकर वह उनसे कुछ कहना चाहता है या अपने पुराने शरीर में लौटना चाहता है लेकिन उससे ये सब हो नहीं पाता । पश्चिमी जगत में मृतात्माओं से संपर्क करने वाली कुछ ‘तथाकथित’ गुप्त संस्थाएं हैं । 

मृतात्माओं से संपर्क करने के इनके अपने तरीके और माध्यम हैं । ऐसी ही एक संस्था के एक अनुभव के अनुसार एक प्रेतात्मा ने बताया कि “मैंने मरने के बाद बड़ी विचित्र स्थिति में अपने को पाया।   अपने परिवार और मित्रों में मोह होने के कारण मैं अपने स्थूल शरीर में आना चाहता था लेकिन मैं लाचार था । मैं सबको देखता था लेकिन मुझे कोई नहीं देख पा रहा था ।  मैं सबको सुन भी रहा था पर मैं जो बड़े जोर-जोर से बोल रहा था उसे कोई नहीं सुन पा रहा था । 

इन सब बातों से मुझे बहुत कष्ट हो रहा था लेकिन अपने नए जीवन और शरीर को लेकर कुछ ख़ुशी भी रही थी कि मैं कितना हल्का हो चुका हूँ और कितनी तेज़ी से चारो तरफ उड़ सकता हूँ  । जब मैं ज़िन्दा था तो मौत से बहुत डरता था लेकिन अब मुझे डर जैसी कोई चीज समझ नहीं आ रही थी ।  सूक्ष्म शरीर में होने के कारण पुराने शरीर से कोई विशेष ममता भी नहीं रही क्योंकि नया शरीर पुराने शरीर की तुलना में हर लिहाज़ से अच्छा था  ।  मैं अपना अस्तित्व वैसा ही अनुभव करता रहा जैसा कि मैं जीवित दशा में था ।  कई बार मैंने अपने हाँथ पैर को हिलाया-डुलाया और अपने अंग-प्रत्यंग को देखकर मुझे ऐसा नहीं लगा कि मैं मर चुका हूँ ।  तब मुझे लगा कि मृत्यु में डरने जैसी कोई बात नहीं वह तो शरीर परिवर्तन की एक असाधारण लेकिन सुखद प्रक्रिया है ।  लेकिन सभी इतने किस्मत वाले नहीं होते  । जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में दूसरों (विशेष रूप से गरीबों और असहायों) के साथ बुरा किया है वो बुरा पायेंगे ।  मृत्यु उनके लिए एक अभिशाप की तरह होती है जो उसी समय तय करती है कि अगला प्रवेश उनका कहाँ होने वाला है । 

जब तक मृत शरीर की अंत्येष्टि क्रिया होती है तब तक जीव बार-बार उसके आस-पास मँडराता रहता है । जला देने पर वह उसी समय उससे निराश होकर मन को दूसरी और लौटा लेता है  ।  अधिक अज्ञान और माया-मोह के बंधन में अधिक दृढ़ता से बंधे हुए मृतक अकसर श्मशानों में बहुत दिनों तक चक्कर काटते रहते है । 

शरीर की ममता बार-बार उधर खींचती है और वे अपने को संभालने में असमर्थ होने के कारण उसी के आस-पास रुदन करते हैं।   कई ऐसे होते हैं जो शरीर की अपेक्षा प्रियजनों से अधिक मोह करते है । वे मरघटों की बजाय प्रिय व्यक्तियों के निकट रहने का प्रयत्न करते हैं।  वृद्ध व्यक्तियों की कामनाएँ स्वभावतः ढीली पड़ जाती हैं इसलिए वे मृत्यु के बाद बहुत जल्दी निद्रा-ग्रस्त हो जाते हैं । 

लेकिन वे युवा जिनकी कामनाएँ प्रबल होती हैं, बहुत समय तक विलाप करते फिरते हैं, उनमे भी खासतौर पर वे लोग जो अकाल मृत्यु, अपघात या आत्महत्या से मरे होते हैं ।  अचानक और उग्र वेदना के साथ मृत्यु, कुछ स्थूल, कुछ सूक्ष्म सी रहती है । 

ऐसी आत्माएँ प्रेत रूप में प्रत्यक्ष सी दिखाई देती है और अदृश्य भी हो जाती हैं ।  साधारण मृत्यु से मरे हुओं के लिए यह नहीं है कि वो तुरंत प्रकट हो जाएँ,उन्हें उसके लिए बड़ा प्रयत्न करना पड़ता है और विशेष प्रकार का तप करना पड़ता है । 


लेकिन अपघात से मरे हुए जीव सत्ताधारी प्रेत के रूप में विद्यमान हो सकते हैं और उनकी विषम मानसिक परिस्थिति उन्हें नींद भी नहीं लेने देती।  वे बदला लेने की इच्छा से या इन्द्रिय कामनाओं को तृप्त करने के लिए किसी पुराने वृक्ष, गुफा, खँडहर या जलाशय के आस-पास पड़े रहते हैं और जब अवसर देखते हैं अपने अस्तित्व को प्रकट करने या बदला लेने की इच्छा से प्रकट हो जाते हैं । 

इन्ही प्रेतों को कई तांत्रिक शव-साधना करके या श्मशान जगाकर अपने वश में कर लेते हैं और उनसे एक दास की तरह काम लेते हैं  । इस प्रकार से बांधे हुए प्रेत उन तांत्रिकों से प्रसन्न नहीं रहते बल्कि मन ही मन बड़ा क्रोध करते है और यदि मौका मिल जाए तो उन्हें मार भी डालते हैं । 

बंधन सभी को बुरा लगता है, प्रेत लोग छूटने में असमर्थ होने के कारण अपने मालिक का कहना मानते हैं लेकिन इससे उन्हें बहुत दुःख होता है ।  आबद्ध प्रेत प्रायः एक ही स्थान पर रहते हैं और बिना कारण जल्दी-जल्दी स्थान परिवर्तन नहीं करते । 

साधारण कामनाओं वाले प्रबुद्धचित्त और धार्मिक वृत्ति वाले लोग (जन-साधारण इसी श्रेणी में आता है), मृत्यु के बाद जब अंत्येष्टि क्रिया हो जाती है तो फिर पुराने सम्बन्धियों से रिश्ता तोड़ लेते हैं और मन को समझा कर उदासीनता धारण करते हैं  । उदासीनता आते ही उन्हें निद्रा आ जाती है और फिर आराम करके नई शक्ति प्राप्त करने के लिए वो निद्राग्रस्त हो जाते हैं । 

ये निद्रा अत्यंत रहस्यमय होती है ।  यह कितने समय तक होती है इसका कोई निश्चित नियम नहीं | लेकिन हाँ जीव की चेतना का विस्तार इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।  एक मान्यता के अनुसार तीन वर्ष की निद्रा सामान्यतया होती है जिसमे प्रारंभ के एक वर्ष तक बड़ी गहरी निद्रा होती है  । दूसरे वर्ष उसकी निद्रा तन्द्रा में बदलती है । 

इस तन्द्रा के भंग होने पर जीव, नवीन जन्म धारण करने की खोज में लग जाता है ।  यहाँ एक बात महत्वपूर्ण है कि जीव स्वयं अपने गर्भ का चुनाव कर सके इसके लिए उसकी चेतना में आपेक्षित विस्तार जरूरी है अन्यथा वह ब्रह्मांडीय नियमो में बंधा हुआ अपने ‘कर्मो’ के अनुसार जन्म ग्रहण करता है । 

इसीलिए बड़े-बुजुर्ग कह के गए हैं कि हमेशा अच्छे कर्म करो क्योंकि कल को जब कोई तुम्हारे साथ नहीं होगा, तुम्हारे कर्म तुम्हारा साथ देंगे  । वो कहते हैं न ‘बुरे काम का बुरा नतीजा’ ,….. सही कहते हैं । 


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खेचरी मुद्रा क्या है और कैसे करे ?


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खेचरी मुद्रा क्या है और ध्यान व साधना के लिए क्यों आवश्यक है?

खेचरी मुद्रा सदा ही एक गोपनीय विषय रहा है जिसकी चर्चा सिर्फ निष्ठावान एवम् गंभीर रूप से समर्पित साधकों में ही की जाती रही है। पर रूचि जागृत करने हेतु इसकी सार्वजनिक चर्चा भी आवश्यक है । ध्यानस्थ होकर योगी महात्मागण अति दीर्घ काल तक बिना कुछ खाए-पीये कैसे जीवित रहते हैं? इसका रहस्य है ….’खेचरी मुद्रा’।

ध्यान साधना में तीव्र गति लाने के लिए भी खेचरी मुद्रा बहुत महत्वपूर्ण है । ‘खेचरी’ का अर्थ है ….. ख = आकाश, चर = विचरण  ।  अर्थात आकाश तत्व यानि ज्योतिर्मय ब्रह्म में विचरण ।  जो बह्म में विचरण करता है वही साधक खेचरी सिद्ध है। परमात्मा के प्रति परम प्रेम और शरणागति हो तो साधक परमात्मा को स्वतः उपलब्ध हो जाता है। पर प्रगाढ़ ध्यानावस्था में देखा गया है कि साधक की जीभ स्वतः उलट जाती है और खेचरी व शाम्भवी मुद्रा अनायास ही लग जाती है।

वेदों में ‘खेचरी’ शब्द का कहीं उल्लेख नहीं है। वैदिक ऋषियों ने इस प्रक्रिया का नाम दिया — ‘विश्वमित्’। “दत्तात्रेय संहिता” और “शिव संहिता” में खेचरी मुद्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है।

शिव संहिता में खेचरी की महिमा इस प्रकार है …..
“करोति रसनां योगी प्रविष्टाम् विपरीतगाम् । लम्बिकोरर्ध्वेषु गर्तेषु धृत्वा ध्यानं भयापहम् ।।”
एक योगी अपनी जिव्हा को विपरीतगामी करता है, अर्थात जीभ को तालुका में बैठाकर ध्यान करने बैठता है, उसके हर प्रकार के कर्म बंधनों का भय दूर हो जाता है।

जब योगी को खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है तब उसकी गहन ध्यानावस्था में सहस्त्रार से एक रस का क्षरण होने लगता है। सहस्त्रार से टपकते उस रस को जिव्हा के अग्र भाग से पान करने से योगी दीर्घ काल तक समाधी में रह सकता है, उस काल में उसे किसी आहार की आवश्यकता नहीं पड़ती, स्वास्थ्य अच्छा रहता है और अतीन्द्रीय ज्ञान प्राप्त होने लगता है।

आध्यात्मिक रूप से खेचरी सिद्ध वही है जो आकाश अर्थात ज्योतिर्मय ब्रह्म में विचरण करता है। साधना की आरंभिक अवस्था में साधक प्रणव ध्वनी का श्रवण और ब्रह्मज्योति का आभास तो पा लेता है पर वह अस्थायी होता है।  उसमें स्थिति के लिए दीर्घ अभ्यास, भक्ति और समर्पण की आवश्यकता होती है।

योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय ध्यान करते समय खेचरी मुद्रा पर बल देते थे। जो इसे नहीं कर सकते थे उन्हें भी वे ध्यान करते समय जीभ को ऊपर की ओर मोड़कर तालू से सटा कर बिना तनाव के जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जा कर रखने पर बल देते थे।

वे खेचरी मुद्रा के लिए कुछ योगियों के सम्प्रदायों में प्रचलित छेदन, दोहन आदि पद्धतियों के सम्पूर्ण विरुद्ध थे। वे एक दूसरी ही पद्धति पर जोर देते थे जिसे ‘तालब्य क्रिया’ कहते हैं। इसमें मुंह बंद कर जीभ को ऊपर के दांतों व तालू से सटाते हुए जितना पीछे ले जा सकते हैं उतना पीछे ले जाते हैं। फिर मुंह खोलकर झटके के साथ जीभ को जितना बाहर फेंक सकते हैं उतना फेंक कर बाहर ही उसको जितना लंबा कर सकते हैं उतना करते हैं।

इस क्रिया को नियमित रूप से दिन में कई बार करने से कुछ महीनों में जिव्हा स्वतः लम्बी होने लगती है और गुरुकृपा से खेचरी मुद्रा स्वतः सिद्ध हो जाती है। योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी जी मजाक में इसे ठोकर क्रिया भी कहते थे । तालब्य क्रिया एक साधना है और खेचरी सिद्ध होना गुरु का प्रसाद है।

हमारे महान पूर्वज स्थूल भौतिक सूर्य की नहीं बल्कि स्थूल सूर्य की ओट में जो सूक्ष्म भर्गःज्योति: है उसकी उपासना करते थे। उसी ज्योति के दर्शन ध्यान में कूटस्थ (आज्ञाचक्र और सहस्रार के मध्य) में ज्योतिर्मय ब्रह्म के रूप में, और साथ साथ श्रवण यानि अनाहत नाद (प्रणव) के रूप में सर्वदा होते हैं।

ध्यान साधना में सफलता के लिए हमें इन का होना आवश्यक है:—–

(1) भक्ति यानि परम प्रेम।
(2) परमात्मा को उपलब्ध होने की अभीप्सा।
(3) दुष्वृत्तियों का त्याग।
(4) शरणागति और समर्पण।
(5) आसन, मुद्रा और यौगिक क्रियाओं का ज्ञान।
(6) दृढ़ मनोबल और बलशाली स्वस्थ शरीर रुपी साधन।

खेचरी मुद्रा की साधना की एक और वैदिक विधि के बारे में पढ़ा है पर मुझे उसका अभी तक ज्ञान नहीं है । सिद्ध गुरु से दीक्षा लेकर, पद्मासन में बैठ कर ऋग्वेद के एक विशिष्ट मन्त्र का उच्चारण सटीक छंद के अनुसार करना पड़ता है। उस मन्त्र में वर्ण-विन्यास कुछ ऐसा होता है कि उसके सही उच्चारण से जो कम्पन होता है उस उच्चारण और कम्पन के नियमित अभ्यास से खेचरी मुद्रा स्वतः सिद्ध हो जाती है।


भगवान दत्तात्रेय के अनुसार साधक यदि शिवनेत्र होकर यानि दोनों आँखों की पुतलियों को नासिका मूल (भ्रूमध्य ) के समीप लाकर, भ्रूमध्य में प्रणव यानि ॐ से लिपटी दिव्य ज्योतिर्मय सर्वव्यापी आत्मा का चिंतन करता है, तो उसके ध्यान में विद्युत् की आभा के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति प्रकट होती है। अगर ब्रह्मज्योति को ही प्रत्यक्ष कर लिया तो फिर साधना के लिए और क्या बाकी बचा रह जाता है।

जो योगिराज श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय की गुरु परम्परा में क्रियायोग साधना में दीक्षित हैं उनके लिए खेचरी मुद्रा का अभ्यास अनिवार्य है। क्रिया योग की साधना खेचरी मुद्रा में होती है। जो खेचरी मुद्रा नहीं कर सकते उनको जीभ ऊपर को ओर मोड़कर तालू से सटाकर रखनी पडती है। खेचरी मुद्रा में क्रिया योग साधना अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है ।

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क्यों अच्छे और भले लोगों को जीवन में अधिक दुख मिलता है ?

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प्रश्न : मन में कभी-कभी संदेह ऐसा होता है कि हमारा धर्म कहता है कि जैसे कर्म करोगे, वैसा फल देगा भगवान। लेकिन देखा जाता है कि जो लोग काफी पवित्र कर्म करते हैं, उन्हें बहुत तकलीफें उठानी पड़ती हैं। इसके विपरीत जो आचरण करते हैं, बहुत सुख में जीवन व्यतीत करते हैं। उनका मरण भी बहुत सुख में हो जाता है। और कभी-कभी अच्छे व्यक्ति का मरण भी दुःखी हो जाता है।

गुरुदेव — पहली बात यह है कि चोरी करके भी कोई रबड़ी खा लेगा, मिठास का अनुभव तो होगा। जो मर्यादा का परित्याग करके ईमानदारी से करोड़ों किलोमीटर दूर रहकर अर्थ का संचय करते हैं, अर्थ के सेवन से मौज-मस्ती पूर्ण जीवन यापन करते हैं, एक आपने बताया। दूसरा वो जो धर्म के मार्ग पर चलते हैं, धन भी उनको आजकल कम से कम सुलभ पाता है, रोटी-नमक तक सीमित रहते हैं। धन की कमी के कारण समाज भी उनको उपेक्षित दृष्टि से प्रायः देखता है। ये सब आपने कहा। कभी-कभी धर्मात्मा भी कोई विकृत रोग की चपेट में आकर देह-त्याग कर देते हैं। कभी-कभी जो जीवन भर अनाप-शनाप काम करते हैं, हँसी – खुशी में देह-त्याग कर देते हैं।

ये सब तो आपने पूछा। थोड़ा विचार कीजिये। दुर्योधन का जीवन मौज-मस्ती पूर्ण था या युधिष्ठिर जी का? बाहर से तो आपको यही लगेगा कि दुर्योधन का जीवन मौज-मस्ती पूर्ण था। युधिष्ठिर जी का जीवन यह ताप, यह वेदना, यह कष्ट। लेकिन इतिहास किसका उज्जवल हुआ – युधिष्ठिर जी का। भगवान तो भगवान ही हैं। लीलापूर्वक रावण का जीवन मौज-मस्ती पूर्ण था या रामजी का जीवन? वनवास भी झेलना पड़ा, पत्नी से वियोग भी हुआ। हमने यह बताया कि आखिर धर्म के मार्ग पर चलने पर धर्म का असली फल क्या है, इस पर विचार कीजिये। तुलसीदास जी ने ब्रह्मसूत्र शंकर भाष्य के भावों को गिने-चुने शब्दों में एक जगह व्यक्त किया ‘धर्मते वीरति।’ धर्म का पालन करने पर देह, इन्द्रिय, प्राण, अन्तःकरण जो हैं संयत होते हैं, सुव्यवस्थि होते हैं। जो कुछ अनात्म प्रपंच है, जो वरण करने योग्य नहीं है, उससे अनासक्ति होती है, वैराग्य होता है। धर्म का वास्तविक फल वैराग्य है। तो वैराग्य योग्य परिस्थिति, अनासक्ति योग्य परिस्थिति प्राप्त हो, इसको हम दुर्भाग्य समझेंगे या सौभाग्य। दूसरे ढंग से भी मैं बोलूंगा।

जितना वैदिक वाङ्ग्मय में आपके प्रश्न का उत्तर हो सकता है, मेरी दृष्टि के सामने वो सब उत्तर नृत्य कर रहे हैं। पहले इसको समझिये। जिस कार्य का जो असली फल है, असली फल मिले, इसको सफलता कहेंगे या असफलता? धर्म का वास्तविक फल क्या है – वैराग्य। धर्म का वास्तविक फल क्या है – जीवन में लोकोत्तर त्याग का बल उत्पन्न होना। देह, इन्द्रिय, प्राण, अंतःकरण का शोधित होना, मन का शुद्ध होना, एकाग्र होना और एकमात्र भगवत तत्त्व की और समाकृष्ट होना। जंग आदि कालुष्य दोषों से विनिर्मुक्त लोहा को गुरुत्व युक्त चुंबक का सान्निध्य उपलब्ध होता है तो लोहा सर्वतोभावेन चुम्बक की और आकृष्ट होता है। सुनिए लखनऊ नाम सुना है, उत्तर प्रदेश में राजधानी, लखनपुर को लखनऊ कहते हैं। वहाँ खरबूजा होता है।

जितनी लू चलती है उतना उसमे मिठास का संचार होता है। सोना को तपाते हैं, कलमस आरोपित पदार्थ मलिनता का .. हो जाता है, सोना कुंदन के रूप में प्रकट होता है। मुज़्ज़रफ़रपुर सुना है? बिहार में है। वहाँ जो लीची होती है, वर्षा होने पर उसमे कीड़े पड़ जाते है। जितनी लू चलती है, उतना उसमे मिठास होता है। इसलिए कुंती जी ने, रंतिदेव और कुंती, श्रीमद्भागवत के दो पात्र का नाम ले रहा हूँ, कुंती देवी ने प्रार्थना की “विपदा सन्तु न शस्वत” भगवान श्रीकृष्ण सामने, हमारे सामने तो श्रीकृष्ण नहीं नृत्य कर रहे हैं। श्रीकृष्ण की तो बुआ लगती थी।

“हे प्रभु ! हे जगतगुरु ! मोर्चे पर, पग-पग पर मुझे विपत्ति विपत्ति विपत्ति का वरदान चाहिए।” अब प्रश्न उठता है, विपत्ति का वरदान कौन चाहेगा, कुंती ने चाहा। रंतिदेव का वर्णन है श्रीमद्भागवत में “हे प्रभु ! विश्व में जितने पापी तापी हैं, उनको जो यातना प्राप्त हो रही है, वो सारी यातना मैं झेल लूँ। किसी को दुःख प्राप्त न हो।” तो दुःख वरदान के रूप में कौन प्राप्त करना चाहता है, लेकिन कुंती ने कहा “मुझे पग-पग पर क्या चाहिए, विपत्ति चाहिए।” इससे क्या होगा ? मीरा के के प्रभु पीर …. वैद्य सामरो होए।” ऐसी पीड़ा, ऐसी वेदना, ऐसा कष्ट जो आपके आलावा कोई हर ही न सके, तो प्रतिक्षण आपका स्मरण होगा। देह, इन्द्रिय, प्राण, अंतःकरण में अनुपम लोकोत्तर त्याग का बल, जो भी कलुषित भाव हैं, उनका क्षालन धर्म का वास्तविक फल है। साथ ही साथ मैं एक संकेत करता हूँ, मैंने एक नियम बचपन में लिया स्वाभाविक रूप से, साथ वालों को मालूम है। जितने कष्ट हो सकते हैं, सब कष्ट मिलते हैं। अनुचित किसी को दबाना नहीं, अनुचित किसी से दबना नहीं। मेरा व्रत है। एक ही नियम ले लीजिये, जीवन भर कष्ट ही कष्ट मिलेगा। अनुचित किसी को दबाना नहीं, अनुचित किसी से दबना नहीं। मेरा बचपन का व्रत है। चारों और से संकट आता रहता है, मैं मुस्कुराता रहता हूँ। पहली बात मैंने ये कही कि धर्म का वास्तविक फल जो मिलता है, सत्संग की कमी के कारण व्यक्ति समझता है संपत्ति नहीं, संपत्ति मिलनी चाहिए, विपत्ति मिल गयी। नल को देखिये, जो भी धर्म के मार्ग पर चले जीवन भर तो उनको तपना पड़ा। लेकिन इतिहास उन्ही का बना क्योंकि धर्म का वास्तविक फल है ‘धर्मते वीरति’ । ‘योगते ज्ञाना’ वैराग्य का फल समाधी। ‘अत्यंत वैराग्य वतः समाधि, समाहितस्य .. प्रबोधः’ समाधि का फल है तत्त्व ज्ञान, तत्त्व ज्ञान का फल है मोक्ष। अब मैं थोड़ी व्याख्या करके बताता हूँ। ‘यज्ञ …. ‘ ये धर्म है या नहीं। थोड़ा विचार कीजिये। विधिवत शास्त्र-सम्मत विधा से यज्ञ करेंगे तो द्रव्य की पकड़ ढीली होगी .. एक वो व्यक्ति है कि द्रव्य को, मर जायेगा, छोड़ेगा नहीं, जिसका आपने वर्णन किया। एक वो व्यक्ति है जो यज्ञ के माध्यम से द्रव्य की पकड़ को छोड़ेगा। द्रव्य की पकड़ को नहीं छोड़ेंगे तो यज्ञ का संपादन नहीं होगा। विधिवत दान करना है नामा रूपए, सोने, चांदी। द्रव्य की पकड़ को ढीली नहीं करेंगे तो दान नहीं दे सकते। निर्जल व्रत किया, एक व्यक्ति गुलछर्रा उड़ा रहा है, एक माता है निर्जल एकादशी का व्रत किये हुए है। उसकी जीभ जलेगी और जो रसगुल्ला पा रहा है, बार-बार पानी पी रहा है उसकी जीभ कहाँ जलेगी। प्रत्यक्ष में तो दुःख वो पा रही है न जो निर्जल एकादशी का व्रत कर रही है। और गुलछर्रे उड़ा रहा है, मलाई चाट रहा है वो तो बड़ा मौज-मस्ती में है। व्रत करेंगे तो क्या होगा, भोग का त्याग करना ही पड़ेगा, तप करेंगे तो सुख का त्याग करना ही पड़ेगा। भगवत प्राप्ति के लिए सर्वस्व त्याग करना ही पड़ेगा। तो अनुपम त्याग का बल और वेग, धर्म के मार्ग पर चलने पर प्राप्त होता है। त्याग का जो बल और वेग प्राप्त होता है उसी के बल पर व्यक्ति भगवत तत्त्व की और जाता है। धर्म के द्वारा चित्त का इतना शोधन होता है जिससे आत्मा, परमात्मा, महात्मा की और ही व्यक्ति आकृष्ट होता है, अन्यत्र आकृष्ट नहीं होता। इतना मैंने स्पष्ट करके कहा। थोड़ा सुनिए। भगवान् की कृपा, जो आप प्रश्न कर रहें हैं जिधर आपका ध्यान नहीं था, उधर ध्यान केंद्रित किया। जिधर आपका ध्यान है उधर भी हम व्याख्या करके बता रहें हैं। श्रीमद्भागवत आदि में लिखा है, सावधान होकर सुनिए। भगवान् की कृपा दो ढंग की होती है। ‘यस्याहं अनुगृह्णामि’ जिस पर मैं विशेष कृपा करता हूँ, थोड़ा ध्यानपूर्वक सुनिए ह्रदय को मजबूत करके, भगवान की कृपा आर्तों पर अलग ढंग से, अर्थारतियों पर अलग ढंग से, जिसको भगवान अपने समीप बुलाना चाहते हैं। जिज्ञासुओं पर अलग ढंग से, ज्ञानी पे अलग ढंग से। कृपा की अभिव्यक्ति में भी तारतम्य होता है। भगवान ने कहा है ‘यस्याहं अनुगृह्णामि’ जिस पर अनुग्रह करता हूँ, जिसको अपने समीप लाना चाहता हूँ, क्या करता हूँ, धन पहले हरण कर लेता हूँ। कृपा है या कोप? शायद आप भुक्त-भोगी हैं। पहले धन हरण कर लेता हूँ, उसके बाद फिर वो हाथ – पांव चलाता है धन के लिए उसमे विघ्न डाल देता हूँ। ये भी भगवान् की कृपा है। जिसपर बहुत कृपा होती है उसको अपने पास बुलाने के लिए, भगवान का यह वचन है, मेरे वचन नहीं है – क्या करता हूँ, धन और मान के जितने स्रोत हैं, उसमे रोड़ा अटका देता हूँ। फिर भी नहीं मानता, बार-बार प्रयत्न करता है फिर रोड़ा अटकाता हूँ। फिर भी नहीं मानता तो शरीर में ऐसा रोग दे देता हूँ, भजन के समय शरीर ठीक रहता है, प्रपंच के समय शरीर में बहुत वेदना हो जाती है। एक अनुग्रह का प्रकार यह है। दूसरा अनुग्रह का प्रकार क्या है इस पर विचार करते हैं। शिव पुराण का वचन, कूर्म पुराण का वचन ‘धर्मा संजायते अर्थः’ धर्म से अर्थ प्राप्त होता है। ‘धर्मार्थ कामो अभिजायते’ धर्म से काम भी प्राप्त होता है और धर्म से अपवर्ग मोक्ष भी प्राप्त होता है। वेद व्यास जी ने दोनों बाहुओं को ऊपर उठा कर कहा ‘महाभारत भारत सावित्री ….. ‘ दोनों बाहुओं को ऊपर उठा कर कहता हूँ, पांच हजार वर्ष पहले की घटना है, मेरी बात प्रायः कोई सुनता नहीं है, मैं क्या कहता हूँ ‘धर्मा अर्थश्च कामश्च’ अरे बन्दे धर्म का पालन करोगे तो अर्थ भी मिलेगा और धर्म का पालन करोगे तो काम भी मिलेगा। मोक्ष न भी चाहिए, तो अर्थ चाहिए तो धर्म का पालन करो। काम चाहिए तो धर्म का पालन करो। कलयुग का लक्षण तुलसीदास जी ने क्या लिखा ‘सुखच मूढः न धर्मरतः’ धर्म का फल ही सुख है। अधर्म का फल सुख होता ही नहीं है। ‘सुखच मूढः’ धर्म का फल तो कलयुग के प्राणी मनुष्य चाहेंगे लेकिन धर्म में प्रीति-प्रवृत्ति नहीं होगी। अधर्म के माध्यम से सुख चाहेंगे। अब थोड़ा सुन लीजिये, तीन दिन, तरह दिन, तीन वर्ष, तीन-तीन का वर्णन है ‘अन्यायेन अर्थ संचयः’ गीता में लिखा है। अन्यायपूर्वक जो अर्थ संचय करते हैं, तीन की गणना है शास्त्रों में, तीन वर्ष, तीन महीने, तीन वर्ष अंत में क्या है चारों खाने चित्त हो जाते हैं। दूसरी बात है, आप बहुत ईमानदार अच्छे हैं, धन को लूट करके, चोरी करके जो उसके पास धन होता है, घी चुपड़ी रोटी भी खाता दिखता है, लेकिन उसके अंदर की बात पूछिए, हर समय जलता रहता है। सुखी नहीं रहता। सनातन धर्मियों का सिद्धांत बौद्धों ने अपने शब्दों में लिखा है। आतंकवादियों के हृदय की गति भी हम लोग जानते हैं। थोड़ा ध्यानपूर्वक सुनिए। ‘…… ‘ सत्य का पक्ष लेना जीव का और उसकी बुद्धि का धर्म है। ‘….. ‘ अव्वल दर्जे का आतंकवादी चोर लुटेरा भी क्या करता है, सत्य का पक्ष लेता है। उसकी बुद्धि हमेशा सत्य का पक्ष लेती है। बहुत बढ़िया उदाहरण है आप भोजन करने बैठे, सामने आपके कुत्ता आँख से रोटी मांगने का अभिनय करने लगा, किलकारी मारने लगा, पूंछ हिलाने लगा। आप ने इतना सा रोटी का टुकड़ा दे दिया। आपको मालूम है इससे पेट भरेगा नहीं, पेट की निवृत्ति नहीं होगी, उसे भी मालूम है। बड़े चाव से रोटी का टुकड़ा पाकर कृतज्ञता व्यक्त करेगा। अपने शब्दों में पूंछ हिलावेगा और बहुत ही विनम्रतापूर्वक आपकी और आँख से देखेगा। घी चुपड़ी पांच रोटी आपके चौके से लेकर चम्पत हो जायेगा, वही कुत्ता आपकी आँखों से नहीं सकता। उसका ह्रदय कहता है कि पांच रोटियां घी चुपड़ी हैं, पेट तो भर जायेगा लेकिन चोरी की हुई हैं। इसलिए जो धनाढ्य होते हैं दूसरों को लूट – लूट कर उनका मन स्वयं उनको कोसता है। अपनी दृष्टि में वो गिरे हुए होते हैं। और एक बहुत विचित्र बात है। वो मनोविज्ञान के भी बड़े कच्चे होते हैं। ‘आत्मनः प्रति कुलानि ….. ‘ जैसा व्यव्हार हम दूसरों से अपने प्रति चाहते हैं, हमारे बुद्धि की बलिहारी हैं कि हम दूसरों के प्रति व्यवहार करें। एक नंबर का हिंसक भी दुसरों से अपने प्रति अहिंसा की भावना रखता है। मेरी या मेरे बहु-बेटे को कोई हत्या न कर दे। एक नंबर का झूठ बोलने वाला भी दूसरों से सत्य भाषण की अपेक्षा रखता है। कोई झूठ बोलकर के मुझे चकमे में डाल न दे। एक नंबर का चोर जिसका नाम आपने लिया, वर्णन किया दूसरों से अचोरी की भावना रखता है। कोई चुराई हुई संपत्ति को या धरोहर को कोई चुरा के न ले जाये। एक नंबर का व्यभिचारी भी दूसरों से व्यभिचार की भावना नहीं रखता. हमारी बहु-बेटी हमारे शील का अपहरण न कर दे। एक नंबर का लुटेरा भी यही भावना रखता है कि हमारी लूटी हुई सामग्री को कोई लूट न ल जाये। इसलिए भगवन श्रीकृष्ण का गीता के छठे अध्याय में वचन है। ”……. ‘ आगे क्या लिखा है, जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने प्रति चाहते हैं वैसा व्यवहार हम काम, क्रोध, लोभ अनियंत्रित होने के कारण। गीता के सोलवें अध्याय का भागवत के एकादश स्कंध का अध्ययन कीजिये। नर्क के द्वार तीन हैं, अनियंत्रित काम, अनियंत्रित क्रोध, अनियंत्रित लोभ। आपको संभवतः मालूम न होगा रिटायर होने के बाद आईएएस अफसर ज्यादातर जेल में हैं। पद का दुरूपयोग करके खुब धनाढ्य तो हो गए, अब वो जेल में हैं। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों की सबकी दशा देखिये, गुलछर्रे उड़ा रहे हैं क्या जेल में ? क्या दुर्दशा है ! इसलिए हमने संकेत किया अपनी दृष्टि में वो गिरे होते हैं। अनियंत्रित काम, क्रोध, लोभ मानवता के लिए अभिशाप है। ऐसी स्थिति में थोड़े समय तक बाहर से वो सुखी दिखाई देते हैं, अंदर से बिलकुल खोखला होते हैं। क्योंकि अनियंत्रित काम व्यक्ति को स्वयं जलाता है। अनियंत्रित क्रोध भी जलाता है। अनियंत्रित लोभ भी जलाता है। वो सुख और शांति नहीं प्राप्त करते।

जिनको हम समझते हैं कि बड़े सुखी हैं, उनसे पूछिए वो सुख-शांति प्राप्त नहीं करते। लेकिन गरीबी का जीवन व्यतीत करके भी जिसके धन में किसी की हाय नहीं है वो रोटी नमक से पायेगा तो भी उसको संतोष रहेगा। और दूसरी बात है पापी पे परमात्मा रीझेंगे नहीं। और एक और बात है न्यायपूर्वक जो धन संचय करेगा, नर्क में आप क्यों जायेंगे, नर्क में जो कराने वाले प्राणी है कौन हैं, यहीं पर दूसरों को लूटने वाले और जघन्य अपराध करने वाला तो यहीं दंड प्राप्त कर लेता है। अब मुशर्रफ जी क्या सोचते होंगे, उनसे पूछिए। इसलिए हमको लगता है तात्कालिक, मैंने कहा न किसी के हाथ से रोटी छीन के खा लेंगे, पेट भी भरेगा, तात्कालिक लाभ होगा, भूखे रहेगा, लेकिन वो रोटी जो है सुखपूर्वक, चैनपूर्वक रहने दे संभव नहीं। इसलिए सन्मार्ग पर चलने पे पहला फल तो क्या होता है भगवत्प्राप्ति के अनुकूल वेग और बल प्राप्त होता है।

दूसरा ये है, ये भ्रम, बहुत बढ़िया, युधिष्ठिर जी ने बहुत विह्वल होकर कह दिया, महाभारत भीष्म पर्व, ‘पितामह ! क्या धर्म का फल दुःख होता है? हम को जीवन भर विपत्ति के पापड़ बेल रहे हैं, दुःख ही दुःख है।’ भीष्म जी ताव में नहीं आते थे, ताव में आ गए। उन्होंने कहा ‘सुनो, काल में भी वो क्षमता नहीं है कि धर्म का फल दुःख दे दे। धर्म का फल सुख ही होता है, अधर्म का फल परिणाम में दुःख ही होता है।

अधिक न बढाकर गीता के अठारवे अध्याय की और मैं आपका ध्यान केंद्रित करता हूँ। हिंदी अनुवाद सहित, मराठी अनुवाद सहित गीता प्रकाशित है, पढ़ लीजियेगा। ‘…. ‘ आरम्भ में अमृत के समान, परिणाम में विष के समान वो राजा सुख है। जिनकी आप चर्चा कर रहे हैं न। और जिसकी चर्चा आप कर रहे हैं अपनी ‘…… ‘ संयम के मार्ग पर, धर्म के मार्ग पर चलने पर आरम्भ में विष के समान कष्ट होता है, परिणाम में मंगल ही मंगल है। ‘अगर अमृतोपवं’ जिनकी चर्चा की आपने आरम्भ में मौज-मस्ती पूर्ण जीवन, ‘परिणामे विषमिव’ लौकिक उत्कर्ष भी उनका नहीं होता। सब धन जमा किया हुआ सब हड़प लिया जाता है। और न्यायपूर्वक जो धन होता है, आग में वो क्षमता नहीं कि उसको जला दे, चोर में क्षमता नहीं कि उसकी चोरी कर ले।

इसलिए आपने जो कहा उसका उत्तर गीता के अठारवे अध्याय में है ‘अगर अमृतोपवं’ खुजली जो है आरम्भ में सुख देती है, बाद में रुलाती है। विद्याध्ययन, संयम, ब्रह्मचर्य का बल, सत्यनिष्ठा आरम्भ में दुःख देती है, परिणाम में सुख देती है। इसलिए आरम्भ में जिनको अमृत के समान सुख मिल रहा है आप समझते हैं, आगे कल्पना कीजिये कि पूरा जीवन नहीं, एक एक हजार नहीं, दस हजार वर्षों तक नर्क की भट्ठी में उनको झुकना है। एक चुटकुला सुनाते हैं, बढ़िया है। एक सिद्ध महात्मा थे, बोलते बहुत कम थे, नाम बहुतों ने सुना था। पुरानी बात है, आकृति से परिचित नहीं थे। वो एक जगह ए। उनके साथ उनका एक शिष्य था। राजपुत्र जा रहा था, राजकुमार। ‘ये कौन बैठे हैं?’ ‘अमुक महात्मा’ ‘ अरे, हमने तो नाम सुना है।

हम भी प्रणाम कर लें।’ वो राजकुमार प्रणाम करने आया, महात्मा बहुत कम बोलते थे। ‘राजपुत्र चिरंजीव ‘ मुँह से निकला। ‘ए राजपुत्र, चिरंजीव हो जायो, दीर्घ समय तक जीवित रहो।’ उनका जो शिष्य था, महात्मा जी का, वो गुरूजी के भाव को जानता था, तो उसने संकेत किया। राजकुमार बहुत प्रसन्न हो गया। चिरंजीव का वरदान दे दिया। उसके बाद ऋषि कुमार, समझ गए, जिसका आपने वर्णन किया, भिक्षा मिली नहीं मिली। तपस्या के द्वारा शरीर भी, उसने सोचा वो सिद्ध महात्मा हैं, मैं भी प्रणाम कर लूँ। प्रणाम करने आये। महात्मा ने क्या कह दिया मालूम है, ‘माजीवऋषिपुत्रकः’ ‘अरे ओ ऋषि कुमार, मत जी।’ सोचा ‘देखो !

जीवन भर तप करने में लगाया अब तक, प्रणाम भी किया। बदले में क्या श्राप दे दिया, माजीव, मत जी।’ शिष्य ने कहा ‘बैठ जा। रहस्य मैं बताऊंगा महाराज जो हैं बहुत कम बोलते हैं।’ एक साधु-संत जा रहे थे, उन्होंने सोचा ‘महात्मा का नाम तो सुना था,यहीं हैं, मैं भी प्रणाम कर लूँ।’ महात्मा के मुँह से क्या निकला, ‘जीववामरवासाधो।’ ‘अरे साधु, जी या मर।’ शिष्य ने कहा ‘बैठ जायो।’ एक बहेलिया जा रहा था अपने बल्लम लिए। मृग, मयूर आदि को मारता है, कभी कोई मनुष्य को भी भेद देता था। उसने सोचा जीवन भर पाप करते तो हो गया, सिद्ध महात्मा का नाम सुना है, मैं भी प्रणाम कर लूँ।

‘राजपुत्रचिरंजीव माजीवऋषिपुत्रकः जीववामरवासाधो व्याधमाजीवमामारः।’ ‘अरे ओ व्याध, मत जी मत मर ‘ बड़ा उटपटांग कहा ‘माजीवमामारः’ न जी न मर। चेलवा ने कहा ‘बैठ जाओ।’ अब व्याख्या मैं करूँगा। राजपुत्र चिरंजीव का अर्थ क्या हुआ, आजकल राजपुत्र का अर्थ नेता का बेटा समझ लो। ‘ए लाडले लाल, राजकुमार के बेटे, खूब पिता के नाम पर तस्करी करके, लूट करके, जेल में सज्जनो को बंद करके मौज-मस्ती पूर्ण जीवन यापन कर रहे हो। पिता के नाम पर लाइसेंस बिना भी जाते हो। कोई पुलिस वाले रोकें तो पिटाई कर देते हो, गाली दे देते हो। तो कहा राजपुत्र चिरंजीव। शिष्य ने कहा जब तक जीवित है तभी तक खैरियत है। मरने के बाद तुम्हारे लिए नर्क की भट्ठी तैयार है।’ तो जो प्रसन्न हो रहा था राजपुत्र वो तो मुरझा गया।

गौरी संप्रदाय के विद्वान लेको ने एक श्लोक लिखा है श्रीमद्भागवत के ग्यारहवे स्कंध की व्याख्या, राजपुत्र चिरंजीव। ‘माजीवऋषिपुत्रकः’ वो समझा कि श्राप है, मत जी। बाहर से लगा कि श्राप दे रहे हैं। शिष्य ने कहा इसका अर्थ क्या है मालूम है, ‘तुमने तपस्या करके इनके समान बोटी-बोटी गला दी है, बड़े दुबले – पतले हो। तुमने तपस्या के द्वारा इतने पुण्यलोक को अर्जित कर लिया है, हजारों वर्षों के लिए, मरने की देर है, मरते ही दिव्य लोक मे हजारों वर्षों तक आनंद लो। शाप नहीं भैया तुम्हारे लिए वरदान है। संत तो क्या कहा था ‘जीववामरवासाधो’। तुलसीदास जी ने क्या कहा मालूम है, ‘प्रारब्ध ने न्योतो दियो, भेज ले श्री रघुबीर।’ कुल कुटुंब के सहित आपको किसी के यहाँ निमंत्रण हो, तो उस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाएंगे।

तुलसीदास जी ने कहा कि प्रारब्ध ने मुझे न्योता दे रखा है, रोज ही निमंत्रण ही निमंत्रण है। भिक्षा मांग के पाते हो, न संग्रह है न परिग्रह। खूब माला जपते हो। किसी का अहित नहीं। ‘जीववामरवासाधो’ माने यहाँ भी मौज है, वहां भी मौज है। यहाँ कोई संग्रह परिग्रह नहीं, किसी से राग नहीं, किसी से द्वेष नहीं, यहाँ भी तुम्हारे लिए मौज है, मरने के बाद भी मौज है। और व्याध से क्या कहा, उसको मार चूका हूँ, उसको मारूंगा, उसके घर बर्बाद कर दूंगा, लूटूँगा, यहाँ भी तुम्हारा ह्रदय जलता है क्रोधाग्नि के द्वारा, ईर्ष्या के द्वारा, मरोगे तो नर्क की भट्ठी है, यहाँ भी अमंगल है, वहां भी अमंगल। बहुत बढ़िया स्वामी अखंडानंद स्वामी जी ने एक बार बताया, आग जानते हैं, तीली के मुख को खाती हुई प्रकट होगी या नहीं ?

अगर खरपतवार से रहित, ईंधन से रहित या सरोवर में जलती हुई तीली को फेंक देंगे, वहां तो कारगर नहीं होगी। आश्रय पर कारगर हो गयी, आश्रय को अभिव्यंजक संस्थान को जलती हुई ही आग पैदा होती है। विषय पर कारगर होती है, कभी नहीं भी होती है। ऐसे जो क्रोध है, वो मीठा विष नहीं है, कड़वा विष है। काम और लोभ कौन से विष हैं मालूम है, मीठा विष। क्रोध जो है कड़वा विष।

जिस आश्रय में क्रोध रहता है, उसको जलाता है। क्रोधी व्यक्ति किसी को गाली दे दे, गाली सुनने वाला क्षमाशील हो उसपे कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। तो हमने स्पष्ट करके, बहुत व्याख्या करके बताया, आपके लिए यहाँ भी मंगलमय है। अभी जो कष्ट भोग रहे हैं, बहुत बढ़िया एक ब्राह्मण ने हमसे कहा ‘महाराज मैं तो संतोष कर लूँ, घर की आधुनिक बेटियां, बहुएँ, बेटे, उनको टेलीविज़न चाहिए, मोबाइल चाहिए, उनको कैसे मुँह बंद करूँ। मैं तो रोटी नमक से गुजर कर लूँ, लेकिन घर के व्यक्ति सब तो सत्संगी नहीं है। तो सन्मार्ग पर चलने वाले जो हैं, कष्ट तो पाते हैं, लेकिन आगे मङ्गल ही मङ्गल है। बहुत विस्तारपूर्वक हमने उत्तर दिया क्यूंकि आजकल प्रायः इसी ढंग के सज्जन कष्ट पाते हैं।

साभार जगतगुरु आदि शंकराचार्य श्री निश्चलानंद जी सरस्वती महाराज


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अधिक पूजा पाठ करने वाले अधिक दुखी क्यों?

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हमे मिलने वाले सुख या दुख का कारण भगवान नही अपितु हम ही हैं। हमारे कर्म ही हमें सुख दुख देते हैं।

कर्म सकाम व निष्काम होते हैं। सकाम कर्म यानि ऐसे कर्म जिनके बदले में हम कुछ भौतिक सुख सुविधाएं चाहते हैं। ऐसे कर्मो का फल सुख दुख के रूप में मिलता है।

निष्काम कर्म वह हैं जिनके बदले हम केवल भगवान को प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसे कर्मो का फल भगवद प्राप्ति के रूप में मिलता है।

अब बात आती है कि ज्यादा पूजा पाठ करने वाले ही दुखी क्यों रहते हैं..?

इसका सीधा सा उत्तर यह है कि ज्यादा पूजा पाठ करने वाला भक्ति के स्वरूप को नही समझने के कारण पूजा पाठ तो करता है, लेकिन वह अनजाने में सकाम पूजा ही करता है जिसका फल उसे सुख दुख के रूप में ही मिलता है।

ज्यादा पूजा पाठ करने वाला बेशक ज्यादा पूजा पाठ या भक्ति करता हुआ नजर आता है लेकिन वह कर्मकांड को ठीक से नही करना जानता है। ऐसे में गलती पर गलती करता जाता है।

बेशक वह कहता है कि वह कूआँ खोदने की बात करता है लेकिन असल मे वह खाई ही खोद रहा होता है। वह यह तो कहता है कि वह बहुत सारी दुनिया भर की पूजा पाठ या मेहनत कर रहा है। लेकिन असल मे तो वह अपनी मेहनत बेकार ही कर रहा होता है।

बेशक ऐसा करने में उसका सारा परिश्रम निष्फल चला जाता है।

तो एक बात तो यह हुई कि सकाम कर्मो का फल सुख या दुख के रूप में मिलता है। हो सकता है कि उसके पूर्वकर्मो की वजह से उसकी जिंदगी में दुख बहुत लिखे हों और पूजा पाठ से बेशक कम हुए हों।

लेकिन फिर भी आप यही सोच रहे हों कि भगवान हमे इतनी पूजा पाठ के बाद भी दुख ही दे रहे हों। और दूसरी बात यह है कि आप गलत तरीके से या बिना विधि विधान के जाने ही पूजा पाठ कर रहे हों। आप बेशक अत्यधिक पूजा पाठ कर रहे हों लेकिन उनका प्रभाव उल्टा या निष्फल हो रहा हो।

लगता है यहाँ तक आपको सब समझ आ गया होगा। अब एक पहलू और है पूजा पाठ करने वाले को ज्यादा दुख मिलने के पीछे।

और यह लागू होता है केवल उस पर जो सही मायने में “भक्त” है।

यह पहलू ही विशेष है! इसलिए इसके लिए आप एक बार फिर से यह जान लीजिए कि *भक्ति क्या है और भक्त कौन है?*

संध्यावंदन, योग, ध्यान, तंत्र, ज्ञान, कर्म के जैसे ही भक्ति भी मुक्ति का एक मार्ग है।

भक्ति भी कई प्रकार की होती है। इसमें श्रवण, भजन-कीर्तन, नाम जप-स्मरण, मंत्र जप, पाद सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, पूजा-आरती, प्रार्थना, सत्संग आदि शामिल हैं। इसे नवधा भक्ति कहते हैं।

अब आपको बताता हूँ *भगवद गीता* में उल्लेखित चार तरह के भक्तों के बारे में।

पहले नवधा भक्ति क्या है यह पढ़ते हैं और इसे शॉर्टकट में समझते हैं?

*श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।*

*अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥*

*1.श्रवण..*

*2. कीर्तन..*

*3. स्मरण..*

*4. पादसेवन..*

*5. अर्चन..*

*6. वंदन..*

*7. दास्य..*

*8. सख्य..*

और…

*9.आत्मनिवेदन..*

अब बात करते हैं चार प्रकार के भक्तों के बारे में…

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं…

*चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।*

*आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।*

(७।१६)

*अर्थात :-*

हे अर्जुन…!

*आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी…*

ये चार प्रकार के भक्त मेरा भजन किया करते हैं। इनमें से सबसे निम्न श्रेणी का भक्त अर्थार्थी है।

उससे श्रेष्ठ.. आर्त..

आर्त से श्रेष्ठ.. जिज्ञासु..

और जिज्ञासु से भी श्रेष्ठ.. ज्ञानी है।

1. आर्त :-

आर्त भक्त वह है जो शारीरिक कष्ट आ जाने पर या धन-वैभव नष्ट होने पर, अपना दु:ख दूर करने के लिए भगवान को पुकारता है। यही दुखी ज्यादा रहता है। और भगवान को दोष देता है कि मैं तो इतना सारा पूजा पाठ करता हूँ लेकिन फिर भी मुझे इतना दुख!!! इसकी एक वजह उसका प्रारब्ध भी होता है।

2. जिज्ञासु :-

जिज्ञासु भक्त अपने शरीर के पोषण के लिए नहीं.. वरन् संसार को अनित्य जानकर भगवान का तत्व जानने और उन्हें पाने के लिए भजन करता है। यह भक्त भी भगवान से कुछ चाहता है। क्योंकि जिज्ञासा भी तो किसी चीज को चाहना ही है।

3. अर्थार्थी :-

अर्थार्थी भक्त वह है जो भोग, ऐश्वर्य और सुख प्राप्त करने के लिए भगवान का भजन करता है। उसके लिए भोगपदार्थ व धन मुख्य होता है और भगवान का भजन गौण। यह भक्त भी सुख दुःख पाता है क्योंकि इसका उद्देश्य भी सकाम कर्म है।

और सकाम कर्म का फल सुख दुख के रूप में मिलता है, बेशक आपके द्वारा की गई भक्ति का फल अवश्य मिलता है।

4. ज्ञानी :-

आर्त, अर्थार्थी और जिज्ञासु तो सकाम भक्त हैं परंतु *ज्ञानी भक्त सदैव निष्काम होता है..

ज्ञानी भक्त भगवान को छोड़कर और कुछ नहीं चाहता है! इसलिए भगवान ने ज्ञानी को अपनी आत्मा कहा है!

और एक बात अच्छे से ध्यान रखिये..

यही भक्त ही केवल “शुद्ध भक्त” की श्रेणी में आता है। ज्ञानी भक्त के *योगक्षेम* का वहन भगवान स्वयं करते हैं।

इनमें से कौन-सा भक्त है संसार में सर्वश्रेष्ठ..?

*तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते*

*प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः।।*

17।।

*अर्थात : -*

इनमें से जो परमज्ञानी है और शुद्ध भक्ति में लगा रहता है वह सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि मैं उसे अत्यंत प्रिय हूं और वह मुझे प्रिय है।

इन चार वर्गों में से जो भक्त ज्ञानी है और साथ ही भक्ति में लगा रहता है, वह सर्वश्रेष्ठ है और ऐसे भक्त के लिए ही भगवान ने कहा है कि …

*अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |*

*तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ||*

*अर्थात : -*

भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं… (यहाँ अर्जुन का मतलब आप सब ही हैं जो जीवन के संग्राम के मध्य फँसे हुए हैं…)*

है अर्जुन.. अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हुए जो भक्तजन मेरी उपासना करते हैं, उन नित्ययुक्त पुरुषों का *योगक्षेम मैं वहन करता हूँ..*

आदिगुरु श्री शंकराचार्य जी का मत है कि.. *अप्राप्त वस्तु* को प्राप्त करना *योग* और..

*प्राप्त वस्तु का रक्षण* करना *क्षेम* कहलाता है।

हमारे जीवन का संघर्ष भी तो प्रायः दो भागों में विभाजित ही रहता है कि हमारी सारी भागदौड़ अप्राप्त की प्राप्ति के लिए ही होती रहती है और हम चिंतित रहते हैं उस सबके रक्षण के लिए जो हमारे पास है।

वस्तुतः हमारा कोई भी कार्य तभी यशस्वी हो सकता है जब हम ‘अनन्याश्चिन्तयन्तो’ अर्थात् संकल्प के विषय में निरंतर सोचते रहें।

हमारा चिन्तन पल भर को भी बाधित न हो, पर्युपासन (परि =अच्छी तरह एवं उपासन =सर्वस्व समर्पण ) अर्थात् एक निश्चित लक्ष्य के लिए हर संभव प्रयास और नित्ययुक्त्ता अर्थात् आत्मसंयम।

इस तरह जब संकल्प का..

सातत्य, सर्वस्व समर्पण और.. आत्मसंयम..

ये तीन कुंजियाँ हमारे हाथ लगती हैं तो भाग्य का ताला स्वयं ही खुल जाता है। अर्थात् “योगक्षेम” का भार स्वयं भगवान् वहन किया करते हैं, यही शाश्वत सत्य है।

अब इसको बिल्कुल सरल भाषा मे समझ लीजिये, एक लाइन में…

भगवान कहते हैं कि जो परमज्ञानी भक्त हैं.. और जो अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं

उनकी जो जरुरते हैं वह सब वो अपने आप पूरी करते हैं..

और जो आपके पास है.. उसकी रक्षा का भार भी स्वयं भगवान अपने कंधों पर लेते हैं।

यह ठीक उसी तरह है जैसे एक छोटे बच्चे के खानपान, रहन सहन आदि की सारी जिम्मेदारी माता अपने सिर पर लेती है। बच्चे को इस विषय मे चिंता करने की जरूरत नही होती है। माता इस विषय मे स्वयं चिंता करती है।

अगर हम ऐसे अनन्य भक्त बन जाते हैं..तब आप यह नही कह सकेंगे की हम तो इतनी सारी पूजा पाठ करते हैं फिर भी इतने दुखी क्यों हैं..

एक बात और भी है..

कई बार भक्त पर भगवान की विशेष कृपा होती है। जिसके फलस्वरूप भगवान प्रयास करते हैं कि आपके प्रारब्ध का फल इसी जन्म में या एक ही बार मे कट जाये।

ऐसे में वे आपसे ज्यादा पूजा पाठ भी करवा सकते हैं। क्योंकि फल तो कर्म करने से ही मिलेगा। ऐसे में आपको इसे दूसरे दृष्टिकोण से समझना होगा। इसे आप भगवान की कृपा ही समझिये।

कई बार जीवन के अंत मे या मृत्यु के समय आपको भगवान अत्यधिक कष्ट भी दे सकते हैं। असल मे वो कष्ट तो आपके कर्मों के ही होते हैं। लेकिन उन कष्टों को भगवान इस तरह से व्यवस्थित कर देते हैं कि अंत समय कष्टों की वजह से केवल भगवान का नाम ही याद रहे..ना कि किसी सगे संबंधी या भौतिक विषय वस्तु का..

और मृत्यु के समय हमारा जो भाव होता है

हम उसी को प्राप्त करते हैं। ऐसे में भगवान की याद बनी रहने से ईश्वर आपके लिए भगवद धाम का रास्ता खोल देते हैं। तो ऐसे में यह न कहे कि भगवान ने उन्हें इतने कष्ट दिए, वो तो इतना पूजा पाठ करते थे।

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मोक्ष क्या है और कैसे होता है ?

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 “मोक्ष कैसे होता है ?”

उत्तर —

सारी ईच्छाओं से पिण्ड छूट जाने पर ।

पहले तामसिक ईच्छाओं से,फिर राजसिक से,अन्त में सात्विक ईच्छाओं से भी ।

जबतक तामसिक और राजसिक ईच्छायें हैं तबतक सात्विक ईच्छाओं को त्यागना उचित नहीं । सात्विक ईच्छा का अर्थ है धार्मिक कर्म करने की ईच्छा । पुण्य का फल स्वर्ग होता है,मोक्ष नहीं । स्वर्ग का अर्थ है चार दिन की चाँदनी,फिर मर्त्यलोक का अँधियारा!नरक का अर्थ है चार दिन का कष्ट,फिर मर्त्यलोक का अँधियारा!अतः स्वर्ग और नरक का अन्तिम फल समान है —

मर्त्यलोक का “अरघट्ट−घटी−यन्त्र” ।

प्राचीन भारत में “अरघट्ट−घटी−यन्त्र” द्वारा खेतों की सिंचाई होती थी । कूँए से अनेक घड़ों की श्रृङ्खला जल भरकर ऊपर लाती और नाले में उड़ेलकर खाली घड़े पुनः नीचे जल लेने जाते,बैलों द्वारा घड़ों की श्रृङ्खला घूमती रहती थी । इसी तरह जीव कर्मों का फल भोगने के लिये नीचे मर्त्यलोक में गिरता,और उन फलों के समाप्त होने पर मर्त्यलोक से निकलता,किन्तु मर्त्यलोक में नये कर्म करने के कारण पुनः मर्त्यलोक में जाता । प्राचीन अद्वैतवादी ग्रन्थों में “अरघट्ट−घटी−यन्त्र” के उदाहरण द्वारा जन्म−मरण की अनवरत श्रृङ्खला को समझाया जाता था । इस अनवरत श्रृङ्खला को केवल ईच्छाओं के त्याग द्वारा ही तोड़ा जा सकता है । ईच्छायें नहीं रहेंगी तो नये सकाम कर्म भी नहीं किये जायेंगे,तब उनका फल भोगने के लिये जन्म−मरण के चक्र में बारम्बार फँसना नहीं पड़ेगा ।

ईच्छाओं का त्याग हो जाय तो निष्काम कर्म द्वारा शेष जीवन बिताना चाहिए ।

ईच्छाओं का त्याग केवल दो साधनों द्वारा ही सम्भव है — अभ्यास तथा वैराग्य । वैराग्य का अर्थ है ऐन्द्रिक तुष्टि वाले विषयों की ओर मन के आकर्षित होने का अभाव,और अभ्यास का अर्थ है ऐसा हर उपाय करना जिसके द्वारा वैराग्य मन की स्वाभाविक अवस्था बन जाय ।

सकाम कर्म के दो फल होते हैं । पहला फल तो वह है जिसे पाने के लिये वह कर्म किया गया,भले ही वह फल मिल सके या न मिले । दूसरा फल है उस प्रकार के नये सकाम कर्म करने की ईच्छा का बलवान होना । यह दूसरा फल ही पिछले समस्त कर्मफलों के उस भण्डार में जुड़ता है जिसे “संस्कार” कहते हैं ।

वैदिक संस्कारों अर्थात् अच्छे संस्कारों के अनुसार कर्म करने को “धर्म” कहते हैं । कर्म करने की सही विधि ही “कर्मकाण्ड” है जिसे कलियुग में धूर्तों ने धन्धा बना रखा है । कर्मकाण्ड द्वारा कर्तव्य कर्मों के उचित फल भी प्राप्त होते हैं और उनके फल बन्धन में बाँधते भी नहीं । कर्मकाण्ड को सकाम कर्म का साधन बनाना कलियुग की बीमारी है जिस कारण सनातन धर्म अशक्त हुआ है । संसारिक वासनाओं की पूर्ति के लिये कर्मकाण्ड नहीं हैं । कर्मकाण्ड का प्रयोग केवल कर्तव्यपालन और धर्मरक्षा हेतु ही करना चाहिये,वरना वैदिक यज्ञ भी सकाम बनकर बन्धन में डालेंगे ।

“संस्कार” के सम्पूर्ण समुच्चय के पूर्णतया भस्म होने पर ही मोक्ष मिलता है । किसी मनुष्य में यह सामर्थ्य नहीं कि चौरासी लाख योनियें में अनन्त जन्मों के दौरान किये गये समस्त कर्मों के फलों को अपने जप−तप आदि द्वारा भस्म कर सके ।

किन्तु आधे संस्कार भस्म हो जाने पर सात्विकता बढ़ जाती है । मन की स्वाभाविक प्रवृति सात्विक हो जाने पर ईश्वर जीव को खींचने लगते हैं । बिना ईशकृपा के संस्कारों के अनन्त प्रवाह वाली वैतरणी की विपरीत−तरणी को तैरना जीव के वश की बात नहीं । सही ज्ञान,सही कर्म और सच्ची भक्ति — तीनों अनिवार्य हैं,तब जीव अपने वास्तविक ज्ञान में स्थिर रहना सीख पाता है । ज्ञान ही मोक्ष है,कर्म और भक्ति साधन हैं,किन्तु साधन के बिना साध्य सम्भव नहीं ।

अपने सच्चे स्वरूप से जुड़ना ही “योग” है जिसके ‘अभ्यास’ का सर्वोत्तम साधन है महर्षि पतञ्जलि का “योगसूत्र”,जिसपर सर्वोत्तम भाष्य है महर्षि वेदव्यास का । हिन्दी में इसकी संक्षिप्त और सर्वोत्तम टीका है स्वामी ओमानन्द तीर्थ द्वारा लिखित और गीताप्रेस द्वारा प्रकाशित “पातञ्जल योग प्रदीप” जिसमें मूल योगसूत्र का अर्थ तथा व्यासभाष्य को समझने का पूरा प्रयास करें और स्वामी ओमानन्द तीर्थ द्वारा जोड़ी गयी सारी बातों का महत्व न दें — हालाँकि वे भी उपयोगी हैं परन्तु उक्त दोनों महर्षियों के सामने स्वामी ओमानन्द तीर्थ अथवा हमलोग कुछ नहीं ।

रामदेव,रावणदेव,रहीमदेव आदि से पूरी दूरी बनाकर रखें,वे लोग योगी नहीं हैं,स्वयं भी भटक गये हैं और आपको भी भटका देंगे । उनको मोक्ष नहीं,यश या धन चाहिए । आपको यश या धन चाहिए तो वैदिक कर्मकाण्ड का सही प्रयोग करें,योग या धर्म या कर्मकाण्ड की दूकान न खोलें । आलू−बैंगन बेचना पाप नहीं है,अध्यात्म बेचना पाप है ।

मोक्ष एक ही प्रकार का नहीं होता,किन्तु हर प्रकार के मोक्ष में एक समानता है — उसके पश्चात मर्त्यलोक में पुनरागमन नहीं होता ।

मोक्ष के तीन प्रकार हैं —

मैं “वह” हूँ (पृथक मैं हूँ ही नहीं)।

मैं ही ब्रह्म हूँ ।

ब्रह्म सिन्धु है तो उसमें एक बिन्दु मैं हूँ ।

वस्तुतः उपरोक्त तीनों प्रकार एक ही हैं । मुक्तपुरुष के आत्मा की कोई सीमा नहीं होती,अतः वह सर्वव्यापी ब्रह्म में ओतप्रोत होकर ब्रह्मस्वरूप ही रहता है । किन्तु आवश्यकता पड़ने पर वह चेतना का एक केन्द्रबिन्दु बनकर स्वतन्त्र पुरुष की भूमिका भी निभा सकता है,सप्तर्षियों की तरह ।

बद्ध जीव के आत्मा की भी कोई सीमा नहीं होती,वह भी वास्तव में सर्वव्यापी ब्रह्म में ओतप्रोत होकर सर्वव्यापी रहता है किन्तु अपनी सच्चाई से अनजान रहकर “अहङ्कार” को अपना स्व समझता है जिस कारण अपनी ब्रह्मस्वरूपता को न तो जान पाता है और न ही उस क्षमता का उपयोग कर पाता है । अपनी ब्रह्मस्वरूपता का ज्ञान ही मोक्ष है ।

मोक्ष पाने के पश्चात “जीव” नहीं रहता,केवल चैतन्य आत्म स्वरूप रहता है । आत्मा में तेरा−मेरा वाली भेदबुद्धि नहीं होती । किन्तु मुक्तपुरुष चाहे तो ब्रह्म में सदैव लीन रह सकता है जिस कारण पृथक सत्ता का व्यवहार नहीं रहता,और चाहे तो पृथक सत्ता भी रख सकता है । सारे सप्तर्षि पृथक सत्ता वाले हैं जो हर कल्प में सर्जना में योगदान देने आते हैं किन्तु संसारचक्र में फँसते नहीं । मुक्तपुरुष चाहे तो स्वयं किसी लोक में रह सकता है और निर्माणकाया बनाकर अन्यत्र भेज सकता है ।

मुक्तपुरुष शब्द में पुरुष का अर्थ शुद्ध चैतन्य आत्मतत्व है,न कि मानवलोक वाला स्त्री−पृरुष लिङ्ग । इसी पुरुष के अर्थ को प्राप्त करना पुरुषार्थ है ।

योगाभ्यास के दौरान जीव जब आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है तो अहङ्कार को केन्द्र बनाकर प्रकृति विरोध में हर प्रकार के हथकण्डे अपनाती है । अतः समाज से कटकर योगाभ्यास अनिवार्य हो जाता है,वरना प्रकृति दूसरों के माध्यम से बाधा डालती है । आरम्भ में प्रकृति भूतप्रेत आदि का झूठा स्वाङ्ग रचकर भी डराती है,कभी जीव को मारने का भी प्रयास करती है ताकि मोक्ष न मिले । प्रकृति जड़ है,अपनी आदत के अनुसार चलती है । उसकी आदत है ऐन्द्रिक भोग । अनन्त जन्मों के दौरान यह आदत घनीभूत हुई है । बिन गुरु इस बाधा को तोड़कर आत्मज्ञान के पथ पर आरम्भिक पग रखना सम्भव नहीं । जिसे गुरु नहीं मिला वह जप−तप आदि करता रहे तो समय आने पर ईश्वर गुरु से मिला देते हैं । उससे पहले आत्मज्ञान का आभास हो भी जाय तो कोई लाभ नहीं,भ्रम की तरह वह आभास लुप्त भी हो जाता है ।

शचीन्द्र नाथ उपाध्याय जी ने लिखा —
“शून्य (खं) अनंत आकाश है जो प्रत्ययः परश्च न्यास से पूर्ववर्ति को दस गुणित कर देता है।”

उत्तर —

दशमलव−पद्धति में शून्य ही नहीं बल्कि कोई भी संख्या अपने पूर्ववर्ती को दशगुणित करती है,अतः आपका वक्तव्य भ्रामक और एकपक्षीय है ।

अष्टक−पद्धति अथवा ऑक्टल पद्धति में कोई भी संख्या अपने पूर्ववर्ती को अष्टगुणित करती है । षोडश−पद्धति अथवा हेक्साडेसिमल पद्धति में कोई भी संख्या अपने पूर्ववर्ती को षोडशगुणित करती है । बायनरी पद्धति में कोई भी संख्या अपने पूर्ववर्ती को द्विगुणित करती है । अतः पूर्ववर्ती को गुणित करना शून्य का गुण नहीं वरन गणन पद्धति का गुण है ।

“गुण” उस लक्षण को कहते हैं जो घट या बढ़ सके,गुणित हो सके । ब्रह्म को निर्गुण कहते हैं जिसका यह अर्थ नहीं कि ब्रह्म में कोई लक्षण ही नहीं है,बल्कि यह अर्थ है कि ब्रह्म के लक्षणों में न्यूनता वा वृद्धि सम्भव नहीं,ब्रह्म के समस्त लक्षण सदैव पूर्ण ही रहते हैं ।

दशमलव−पद्धति में पूर्ववर्ती संख्या सदैव दशगुणित ही होती है,उससे न्यून वा अधिक नहीं । पूर्ववर्ती संख्या का यह लक्षण सदैव अपरिवर्तनीय ही रहता है,अतः इस लक्षण को “गुण” कहना अनुचित है ।

शून्य का लक्षण तो यह है कि किसी भी संख्या से गुणित करने पर शून्य उसे भी शून्य बना देता है । गुणित करने का ही दूसरा पक्ष विभाजन है,शून्य से विभाजन किसी भी संख्या को अनन्त बना देता है । अतः अनन्त भी शून्य का ही लक्षण है । अन्य कोई संख्या कभी अनन्त नहीं बन सकती ।

शून्य के और भी बहुत से लक्षण हैं । शून्य के लक्षणों की संख्या अनन्त है,जिनकी पूरी पड़ताल आधुनिक उच्च गणित भी नहीं कर सका है । किन्तु इनमें से कोई भी लक्षण शून्य का “गुण” नहीं है क्योंकि वे लक्षण घट या बढ़ नहीं सकते । अतः शून्य निर्गुण है,गुणातीत है,और सामान्य गुणों से पार्थक्य दिखाने के लिये कहा जा सकता है कि ब्रह्म की तरह शून्य में भी सामान्य नहीं वरन दिव्य “गुण” होते हैं ।

आप अपनी कामनाओं को शून्य बना सकें तो आपके प्राण का आयाम अनन्त हो जायगा । वहीं साम्य की अवस्था है,सम् आधि है,जिससे भिन्न कोई भी अवस्था व्याधि है । प्रकृति के तीनों गुणों में भी साम्य हो जाय तो प्रकृति अव्यक्त हो जाती है और जीवावस्था से मोक्ष मिल जाता है । अव्यक्त अर्थात् शून्य!अतः साम्य ही शून्यता है । वैषम्य सगुण अवस्था का कारक है । वासना के गुणों के अनुरूप वैषम्यता की लब्धि होती है । जैसे के रङ्ग−त्रिकोण में लाल हरित नील (RGB) में साम्य होने पर प्रकाश श्वेत हो जाता है तथा दृष्ट वस्तु काला,अर्थात् रङ्ग शून्य हो जाता है ।

पुरुष भी गुणों को शून्य कर दे तो अपने वास्तविक स्वरूप में अवस्थित होकर अनन्त और अव्यक्त हो जाता है । वह मुक्त पुरुष जब कुछ “चाहे” तो वह चाहत ही उसे व्यक्ति के रूप में व्यक्त बना देता है,जैसे कि इन्द्र,मनु,वसिष्ठ,अत्रि,कश्यप,आदि । कुछ न चाहे तो अव्यक्त ब्रह्मस्वरूप रहता है ।

सारी संख्यायें शून्य से ही निःसृत होती हैं । शून्य का गणित अनन्त है ।

जिसका दर्शन हो सके उसे सम् ख्या कहते हैं । शून्य संख्या नहीं है क्योंकि अव्यक्त है । यह अव्यक्त शून्य ही समस्त संख्याओं तथा समस्त गणित का स्रोत और आधार है ।

एक उदाहरण —

काल की विमा में शून्य के डिफ्रेन्सल समीकरण से ही हर युग में मानवजाति की कुल जनसंख्या का सूत्र बनता है जिसके द्वारा किसी भी काल में सही जनसंख्या की जानकारी मिल सकती है । यह प्राचीन “सांख्य” शास्त्र का एक उदाहरण है । वैदिक तन्त्र की यह परम्परा सदैव अलिखित रही है,वेद के सही प्रयोग द्वारा ही प्राप्त होती है ।

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विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र

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 विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान)
  • ■ काष्ठा = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग
  • ■ 1 त्रुटि  = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
  • ■ 2 त्रुटि  = 1 लव ,
  • ■ 1 लव = 1 क्षण
  • ■ 30 क्षण = 1 विपल ,
  • ■ 60 विपल = 1 पल
  • ■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
  • ■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
  • ■3 होरा=1प्रहर व 8 प्रहर 1 दिवस (वार)
  • ■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
  • ■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
  • ■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
  • ■ 2 माह = 1 ऋतू
  • ■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
  • ■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
  • ■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
  • ■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
  • ■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
  • ■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
  • ■ 4 युग = सतयुग
  • ■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
  • ■ 72 महायुग = मनवन्तर ,
  • ■ 1000 महायुग = 1 कल्प
  • ■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
  • ■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
  • ■ महालय  = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )
सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यहीं है जो हमारे देश भारत में बना हुआ है । ये हमारा भारत जिस पर हमे गर्व होना चाहिये l

दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच  उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच),  मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।

आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।

नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।

दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।


*** ***
1-अष्टाध्यायी               पाणिनी
2-रामायण                    वाल्मीकि
3-महाभारत                  वेदव्यास
4-अर्थशास्त्र                  चाणक्य
5-महाभाष्य                  पतंजलि
6-सत्सहसारिका सूत्र      नागार्जुन
7-बुद्धचरित                  अश्वघोष
8-सौंदरानन्द                 अश्वघोष
9-महाविभाषाशास्त्र        वसुमित्र
10- स्वप्नवासवदत्ता        भास
11-कामसूत्र                  वात्स्यायन
12-कुमारसंभवम्           कालिदास
13-अभिज्ञानशकुंतलम्    कालिदास 
14-विक्रमोउर्वशियां        कालिदास
15-मेघदूत                    कालिदास
16-रघुवंशम्                  कालिदास
17-मालविकाग्निमित्रम्   कालिदास
18-नाट्यशास्त्र              भरतमुनि
19-देवीचंद्रगुप्तम          विशाखदत्त
20-मृच्छकटिकम्          शूद्रक
21-सूर्य सिद्धान्त           आर्यभट्ट
22-वृहतसिंता               बरामिहिर
23-पंचतंत्र।                  विष्णु शर्मा
24-कथासरित्सागर        सोमदेव
25-अभिधम्मकोश         वसुबन्धु
26-मुद्राराक्षस               विशाखदत्त
27-रावणवध।              भटिट
28-किरातार्जुनीयम्       भारवि
29-दशकुमारचरितम्     दंडी
30-हर्षचरित                वाणभट्ट
31-कादंबरी                वाणभट्ट
32-वासवदत्ता             सुबंधु
33-नागानंद                हर्षवधन
34-रत्नावली               हर्षवर्धन
35-प्रियदर्शिका            हर्षवर्धन
36-मालतीमाधव         भवभूति
37-पृथ्वीराज विजय     जयानक
38-कर्पूरमंजरी            राजशेखर
39-काव्यमीमांसा         राजशेखर
40-नवसहसांक चरित   पदम् गुप्त
41-शब्दानुशासन         राजभोज
42-वृहतकथामंजरी      क्षेमेन्द्र
43-नैषधचरितम           श्रीहर्ष
44-विक्रमांकदेवचरित   बिल्हण
45-कुमारपालचरित      हेमचन्द्र
46-गीतगोविन्द            जयदेव
47-पृथ्वीराजरासो         चंदरवरदाई
48-राजतरंगिणी           कल्हण
49-रासमाला               सोमेश्वर
50-शिशुपाल वध          माघ
51-गौडवाहो                वाकपति
52-रामचरित                सन्धयाकरनंदी
53-द्वयाश्रय काव्य         हेमचन्द्र

वेद-ज्ञान:-

प्र.1-  वेद किसे कहते है ?
उत्तर-  ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है।

प्र.2-  वेद-ज्ञान किसने दिया ?
उत्तर-  ईश्वर ने दिया।

प्र.3-  ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ?
उत्तर-  ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया।

प्र.4-  ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ?
उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण  के लिए।

प्र.5-  वेद कितने है ?
उत्तर- चार ।                                                 
1-ऋग्वेद
2-यजुर्वेद 
3-सामवेद
4-अथर्ववेद

प्र.6-  वेदों के ब्राह्मण ।
        वेद              ब्राह्मण
1 – ऋग्वेद      –     ऐतरेय
2 – यजुर्वेद      –     शतपथ
3 – सामवेद     –    तांड्य
4 – अथर्ववेद   –   गोपथ

प्र.7-  वेदों के उपवेद कितने है।
उत्तर –  चार।
      वेद                     उपवेद
    1- ऋग्वेद       –     आयुर्वेद
    2- यजुर्वेद       –    धनुर्वेद
    3 -सामवेद      –     गंधर्ववेद
    4- अथर्ववेद    –     अर्थवेद

प्र 8-  वेदों के अंग हैं ।
उत्तर –  छः ।
1 – शिक्षा
2 – कल्प
3 – निरूक्त
4 – व्याकरण
5 – छंद
6 – ज्योतिष

प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन किन ऋषियो को दिया ?
उत्तर- चार ऋषियों को।
         वेद                ऋषि
1- ऋग्वेद         –      अग्नि
2 – यजुर्वेद       –       वायु
3 – सामवेद      –      आदित्य
4 – अथर्ववेद    –     अंगिरा

प्र.10-  वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ?
उत्तर- समाधि की अवस्था में।

प्र.11-  वेदों में कैसे ज्ञान है ?
उत्तर-  सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान।

प्र.12-  वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ?
उत्तर-   चार ।
        ऋषि        विषय
1-  ऋग्वेद    –    ज्ञान
2-  यजुर्वेद    –    कर्म
3-  सामवे     –    उपासना
4-  अथर्ववेद –    विज्ञान

प्र.13-  वेदों में।
ऋग्वेद में।
1-  मंडल      –  10
2 – अष्टक     –   08
3 – सूक्त        –  1028
4 – अनुवाक  –   85
5 – ऋचाएं     –  10589

यजुर्वेद में।
1- अध्याय    –  40
2- मंत्र           – 1975

सामवेद में।
1-  आरचिक   –  06
2 – अध्याय     –   06
3-  ऋचाएं       –  1875

अथर्ववेद में।
1- कांड      –    20
2- सूक्त      –   731
3 – मंत्र       –   5977

प्र.14-  वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ?    
उत्तर-  मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है।

प्र.15-  क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ?
उत्तर-  बिलकुल भी नहीं।

प्र.16-  क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ?
उत्तर-  नहीं।

प्र.17-  सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ?
उत्तर-  ऋग्वेद।

प्र.18-  वेदों की उत्पत्ति कब हुई ?
उत्तर-  वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व ।

प्र.19-  वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ?
उत्तर-
1-  न्याय दर्शन  – गौतम मुनि।
2- वैशेषिक दर्शन  – कणाद मुनि।
3- योगदर्शन  – पतंजलि मुनि।
4- मीमांसा दर्शन  – जैमिनी मुनि।
5- सांख्य दर्शन  – कपिल मुनि।
6- वेदांत दर्शन  – व्यास मुनि।

प्र.20-  शास्त्रों के विषय क्या है ?
उत्तर-  आत्मा,  परमात्मा, प्रकृति,  जगत की उत्पत्ति,  मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक  ज्ञान-विज्ञान आदि।

प्र.21-  प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ?
उत्तर-  केवल ग्यारह।

प्र.22-  उपनिषदों के नाम बतावे ?
उत्तर- 
01-ईश ( ईशावास्य ) 
02-केन 
03-कठ 
04-प्रश्न 
05-मुंडक 
06-मांडू 
07-ऐतरेय 
08-तैत्तिरीय
09-छांदोग्य
10-वृहदारण्यक
11-श्वेताश्वतर ।

प्र.23-  उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ?
उत्तर- वेदों से।

प्र.24- चार वर्ण।
उत्तर-
1- ब्राह्मण
2- क्षत्रिय
3- वैश्य
4- शूद्र

प्र.25- चार युग।
1- सतयुग – 17,28000  वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।
2- त्रेतायुग- 12,96000  वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।
3- द्वापरयुग- 8,64000  वर्षों का नाम है।
4- कलयुग- 4,32000  वर्षों का नाम है।

कलयुग के 5122  वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।
4,27024 वर्षों का भोग होना है।

पंच महायज्ञ
       1- ब्रह्मयज्ञ  
       2- देवयज्ञ
       3- पितृयज्ञ
       4- बलिवैश्वदेवयज्ञ
       5- अतिथियज्ञ

स्वर्ग  –  जहाँ सुख है।
नरक  –  जहाँ दुःख है।.

*#भगवान_शिव के  “35” रहस्य!!!!!!!!
भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है।
*1. आदिनाथ शिव : -* सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें ‘आदिदेव’ भी कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम ‘आदिश’ भी है।

*2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : -* शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था।

*3. भगवान शिव का नाग : -* शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है।

*4. शिव की अर्द्धांगिनी : -* शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि, काली कही गई हैं।

*5. शिव के पुत्र : -* शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं- गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है।

*6. शिव के शिष्य : -* शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे।

*7. शिव के गण : -* शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है।

*8. शिव पंचायत : -* भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।

*9. शिव के द्वारपाल : -* नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।

*10. शिव पार्षद : -*
जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।

*11. सभी धर्मों का केंद्र शिव : -* शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में वि‍भक्त हो गई।

*12. बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ अंतरराष्ट्रीय : -* 
ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रोफेसर उपासक का मानना है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अतिप्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर।

*13. देवता और असुर दोनों के प्रिय शिव : -* भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।

*14. शिव चिह्न : -* वनवासी से लेकर सभी साधारण व्‍यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्‍थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।

*15. शिव की गुफा : -* शिव ने भस्मासुर से बचने के लिए एक पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। दूसरी ओर भगवान शिव ने जहां पार्वती को अमृत ज्ञान दिया था वह गुफा ‘अमरनाथ गुफा’ के नाम से प्रसिद्ध है।

*16. शिव के पैरों के निशान : -* श्रीपद- श्रीलंका में रतन द्वीप पहाड़ की चोटी पर स्थित श्रीपद नामक मंदिर में शिव के पैरों के निशान हैं। ये पदचिह्न 5 फुट 7 इंच लंबे और 2 फुट 6 इंच चौड़े हैं। इस स्थान को सिवानोलीपदम कहते हैं। कुछ लोग इसे आदम पीक कहते हैं।

रुद्र पद- तमिलनाडु के नागपट्टीनम जिले के थिरुवेंगडू क्षेत्र में श्रीस्वेदारण्येश्‍वर का मंदिर में शिव के पदचिह्न हैं जिसे ‘रुद्र पदम’ कहा जाता है। इसके अलावा थिरुवन्नामलाई में भी एक स्थान पर शिव के पदचिह्न हैं।

तेजपुर- असम के तेजपुर में ब्रह्मपुत्र नदी के पास स्थित रुद्रपद मंदिर में शिव के दाएं पैर का निशान है।

जागेश्वर- उत्तराखंड के अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर की पहाड़ी से लगभग साढ़े 4 किलोमीटर दूर जंगल में भीम के पास शिव के पदचिह्न हैं। पांडवों को दर्शन देने से बचने के लिए उन्होंने अपना एक पैर यहां और दूसरा कैलाश में रखा था।

रांची- झारखंड के रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलोमीटर की दूरी पर ‘रांची हिल’ पर शिवजी के पैरों के निशान हैं। इस स्थान को ‘पहाड़ी बाबा मंदिर’ कहा जाता है।

*17. शिव के अवतार : -* वीरभद्र, पिप्पलाद, नंदी, भैरव, महेश, अश्वत्थामा, शरभावतार, गृहपति, दुर्वासा, हनुमान, वृषभ, यतिनाथ, कृष्णदर्शन, अवधूत, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, किरात, सुनटनर्तक, ब्रह्मचारी, यक्ष, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, द्विज, नतेश्वर आदि हुए हैं। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। रुद्र 11 बताए जाते हैं- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शंभू, चण्ड तथा भव।

*18. शिव का विरोधाभासिक परिवार : -* शिवपुत्र कार्तिकेय का वाहन मयूर है, जबकि शिव के गले में वासुकि नाग है। स्वभाव से मयूर और नाग आपस में दुश्मन हैं। इधर गणपति का वाहन चूहा है, जबकि सांप मूषकभक्षी जीव है। पार्वती का वाहन शेर है, लेकिन शिवजी का वाहन तो नंदी बैल है। इस विरोधाभास या वैचारिक भिन्नता के बावजूद परिवार में एकता है।

*19.*  ति‍ब्बत स्थित कैलाश पर्वत पर उनका निवास है।
जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है।

*20.शिव भक्त : -* ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवी-देवताओं सहित भगवान राम और कृष्ण भी शिव भक्त है। हरिवंश पुराण के अनुसार, कैलास पर्वत पर कृष्ण ने शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की थी। भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग स्थापित कर उनकी पूजा-अर्चना की थी।

*21.शिव ध्यान : -* शिव की भक्ति हेतु शिव का ध्यान-पूजन किया जाता है। शिवलिंग को बिल्वपत्र चढ़ाकर शिवलिंग के समीप मंत्र जाप या ध्यान करने से मोक्ष का मार्ग पुष्ट होता है।

*22.शिव मंत्र : -* दो ही शिव के मंत्र हैं पहला- ॐ नम: शिवाय। दूसरा महामृत्युंजय मंत्र- ॐ ह्रौं जू सः। ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जू ह्रौं ॐ ॥ है।

*23.शिव व्रत और त्योहार : -* सोमवार, प्रदोष और श्रावण मास में शिव व्रत रखे जाते हैं। शिवरात्रि और महाशिवरात्रि शिव का प्रमुख पर्व त्योहार है।

*24.शिव प्रचारक : -* भगवान शंकर की परंपरा को उनके शिष्यों बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज, अगस्त्य मुनि, गौरशिरस मुनि, नंदी, कार्तिकेय, भैरवनाथ आदि ने आगे बढ़ाया। इसके अलावा वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, बाण, रावण, जय और विजय ने भी शैवपंथ का प्रचार किया। इस परंपरा में सबसे बड़ा नाम आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय का आता है। दत्तात्रेय के बाद आदि शंकराचार्य, मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गुरुगोरखनाथ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

*25.शिव महिमा : -* शिव ने कालकूट नामक विष पिया था जो अमृत मंथन के दौरान निकला था। शिव ने भस्मासुर जैसे कई असुरों को वरदान दिया था। शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था। शिव ने गणेश और राजा दक्ष के सिर को जोड़ दिया था। ब्रह्मा द्वारा छल किए जाने पर शिव ने ब्रह्मा का पांचवां सिर काट दिया था।

*26.शैव परम्परा : -* दसनामी, शाक्त, सिद्ध, दिगंबर, नाथ, लिंगायत, तमिल शैव, कालमुख शैव, कश्मीरी शैव, वीरशैव, नाग, लकुलीश, पाशुपत, कापालिक, कालदमन और महेश्वर सभी शैव परंपरा से हैं। चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी और नागवंशी भी शिव की परंपरा से ही माने जाते हैं। भारत की असुर, रक्ष और आदिवासी जाति के आराध्य देव शिव ही हैं। शैव धर्म भारत के आदिवासियों का धर्म है।

*27.शिव के प्रमुख नाम : -*  शिव के वैसे तो अनेक नाम हैं जिनमें 108 नामों का उल्लेख पुराणों में मिलता है लेकिन यहां प्रचलित नाम जानें- महेश, नीलकंठ, महादेव, महाकाल, शंकर, पशुपतिनाथ, गंगाधर, नटराज, त्रिनेत्र, भोलेनाथ, आदिदेव, आदिनाथ, त्रियंबक, त्रिलोकेश, जटाशंकर, जगदीश, प्रलयंकर, विश्वनाथ, विश्वेश्वर, हर, शिवशंभु, भूतनाथ और रुद्र।

*28.अमरनाथ के अमृत वचन : -* शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

*29.शिव ग्रंथ : -* वेद और उपनिषद सहित विज्ञान भैरव तंत्र, शिव पुराण और शिव संहिता में शिव की संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है।

*30.शिवलिंग : -* वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।

*31.बारह ज्योतिर्लिंग : -
* सोमनाथ, मल्लिकार्जुन, महाकालेश्वर, ॐकारेश्वर, वैद्यनाथ, भीमशंकर, रामेश्वर, नागेश्वर, विश्वनाथजी, त्र्यम्बकेश्वर, केदारनाथ, घृष्णेश्वर। ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में अनेकों मान्यताएं प्रचलित है। ज्योतिर्लिंग यानी ‘व्यापक ब्रह्मात्मलिंग’ जिसका अर्थ है ‘व्यापक प्रकाश’। जो शिवलिंग के बारह खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

दूसरी मान्यता अनुसार शिव पुराण के अनुसार प्राचीनकाल में आकाश से ज्‍योति पिंड पृथ्‍वी पर गिरे और उनसे थोड़ी देर के लिए प्रकाश फैल गया। इस तरह के अनेकों उल्का पिंड आकाश से धरती पर गिरे थे। भारत में गिरे अनेकों पिंडों में से प्रमुख बारह पिंड को ही ज्‍योतिर्लिंग में शामिल किया गया।

*32.शिव का दर्शन : -* शिव के जीवन और दर्शन को जो लोग यथार्थ दृष्टि से देखते हैं वे सही बुद्धि वाले और यथार्थ को पकड़ने वाले शिवभक्त हैं, क्योंकि शिव का दर्शन कहता है कि यथार्थ में जियो, वर्तमान में जियो, अपनी चित्तवृत्तियों से लड़ो मत, उन्हें अजनबी बनकर देखो और कल्पना का भी यथार्थ के लिए उपयोग करो। आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि कल्पना ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

*33.शिव और शंकर : -*
शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं- शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। अत: शिव और शंकर दो अलग अलग सत्ताएं है। हालांकि शंकर को भी शिवरूप माना गया है। माना जाता है कि महेष (नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं।

*34. देवों के देव महादेव :* देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं। वे राम को भी वरदान देते हैं और रावण को भी।

*35. शिव हर काल में : -*
भगवान शिव हर काल में हैं और रहेंगें… अनंत, असीम, आदिनाथ


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