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कड़वा सच

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प्राचीन भारत की एक लोककथा है। किसी राज्य में एक राजा था। वो बहुत ही धार्मिक और वीर था। राजा में कई गुण थे। एक दिन उसके दरबार में एक ज्योतिषी आया। किसी मंत्री ने बताया कि ये बहुत ही सिद्ध ज्योतिषी हैं, इनकी भविष्यवाणियां हमेशा सच होती है। राजा की उत्सुकता बढ़ गई। उसने ज्योतिषी को अपने महल में बुलवाया। महल में राजा ने अपनी कुंडली दिखाई। ज्योतिषी बहुत देर तक कुंडली का अध्ययन करता रहा फिर उसने राजा को कहा कि महाराज आपका तो जीवन ही बेकार है, आपके सारे रिश्तेदार आपके सामने ही मारे जाएंगे। आप अपने वंश में अकेले रह जाएंगे।

ज्योतिषी की बात सुन राजा को बहुत धक्का लगा। वो निराशा में चला गया। उसका काम में मन नहीं लगता। दरबार में भी अनमना सा रहने लगा। ये देख सारे मंत्री परेशान हो गए। लेकिन, किसी की हिम्मत नहीं हुई कि राजा से कुछ पूछ सके। एक दिन मणिराज नाम के एक समझदार मंत्री ने एकांत देखकर राजा से उसकी उदासी का कारण पूछ ही लिया। राजा ने कहा कि उस ज्योतिषी ने कहा है कि मेरा पूरा परिवार मेरे सामने ही खत्म हो जाएगा। इस बात से मुझे गहरा सदमा लगा है। मैं परिवार की सुरक्षा को लेकर परेशान हूं। मंत्री समझ गया कि राजा किसी कारण से परेशान है। उसने कहा महाराज में एक पंडित जगन्नाथ जी को जानता हूं, वे भी बहुत सिद्ध हैं। मेरे ख्याल से एक बार उनसे भी बात करना चाहिए।

राजा ने कहा ठीक है। उन्हें भी बुलवा लो। पंडित जगन्नाथ को बुलाया गया। मंत्री ने सारी परेशानी बताई। पुराने पंडित की भविष्यवाणी भी बताई। पंडित जगन्नाथ ने भी राजा की कुंडली देखी। उसने पाया कि पुराने पंडित ने सही भविष्यवाणी की। लेकिन, अब वो राजा को ये नहीं बता सकता था कि उसके सारे रिश्तेदार उसके सामने ही मर जाएंगे और वो कोई झूठ भी नहीं बोल सकता था। उसने दो घड़ी विचार किया। फिर चेहरे पर चमक लाकर बोला महाराज, आपकी कुंडली में तो दुःख का कोई योग है ही नहीं, आप लंबे समय तक राज करेंगे। आपका राज्य लगातार बढ़ेगा, सालों साल आप सिंहासन की शोभा बढ़ाएंगे। धन और आयु में भी आप अपने पूरे कुटुंब में सबसे आगे रहेंगे। आपकी जितनी आयु पूरे कुटुंब में किसी के भाग्य में नहीं होगी। आपकी कुंडली में मुझे कुछ गलत नहीं दिख रहा।

पंडित जगन्नाथ ने पुराने पंडित की बात दोहराई कि राजा के जीते-जी उसके सारे रिश्तेदार मर जाएंगे, ये कह कर की पूरे कुटुंब में उससे ज्यादा किसी की आयु नहीं। लेकिन राजा को पंडित की बात सुन काफी संतोष हुआ। उसे खूब सारा इनाम भी दिया।

कहानी का सार
जरूरी नहीं है कि कड़वा सच कड़वे तरीके से ही कहा जाए। कई बार बोलने का तरीका बात के असर को बदल देता है। अगर सच्चाई कड़वी है या कोई कठोर सत्य है तो उसे भी हल्के तरीके से बताया जा सकता है।

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परिचय- लोक -कथाएँ-कहानियाँ

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लोककथाएं इतनी पुरानी हैं कि कोई भी नहीं बता सकता कि उन्हें पहले-पहल किसने कहा होगा। लोक-कथाएं एक कान से दूसरे कान में, एक देश से दूसरे देश में जाती रहती हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने पर इन कथाओं का रूपरंग भी बदलता जाता है। एक ही कहानी अलग-अलग जगहों में अलग-अलग ढंग से कही-सुनी जाती है। इस तरह लोक कथाएं हमेशा नई बनी रहती हैं।-शंकर

लोककथाओं में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें पशु-पक्षी, सुर-असुर, देव-परियां, पेड़-पौधे, प्रकृति का मानवीकरण, चमत्कार आदि सभी कुछ होने के बावजूद मनुष्य के दुःख-सुख और उसकी अभिलाषाओं की तृप्ति निहित रहती है । यह लोककथाएं ही हैं जो हमें बोध करवाती हैं कि मूल रूप में समस्त विश्व में मनुष्य का स्वभाव एक जैसा ही है ।

लोककथाएँ वे कहानियाँ हैं जो मनुष्य की कथा प्रवृत्ति के साथ चलकर विभिन्न परिवर्तनों एवं परिवर्धनों के साथ वर्तमान रूप में प्राप्त होती हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ निश्चित कथानक रूढ़ियों और शैलियों में ढली लोककथाओं के अनेक संस्करण, उसके नित्य नई प्रवृत्तियों और चरितों से युक्त होकर विकसित होने के प्रमाण है। एक ही कथा विभिन्न संदर्भों और अंचलों में बदलकर अनेक रूप ग्रहण करती हैं। लोकगीतों की भाँति लोककथाएँ भी हमें मानव की परंपरागत वसीयत के रूप में प्राप्त हैं। दादी अथवा नानी के पास बैठकर बचपन में जो कहानियाँ सुनी जाती है, चौपालों में इनका निर्माण कब, कहाँ कैसे और किसके द्वारा हुआ, यह बताना असंभव है। "यद्यपि दादी नानी से ज्यादा कहानियाँ दादा नाना सुनाते हैं लेकिन फिर भी दादी-नानी को ही ज्यादा महता देना भी विरासत में चली आ रही परिपाटी का ही परिणाम है!"-डॉ.रवींद्र भारतीय

लोककथाएं इतनी पुरानी हैं कि कोई भी नहीं बता सकता कि उन्हें पहले-पहल किसने कहा होगा। लोक-कथाएं एक कान से दूसरे कान में, एक देश से दूसरे देश में जाती रहती हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने पर इन कथाओं का रूपरंग भी बदलता जाता है। एक ही कहानी अलग-अलग जगहों में अलग-अलग ढंग से कही-सुनी जाती है। इस तरह लोक कथाएं हमेशा नई बनी रहती हैं।-शंकर

लोककथाओं में सबसे बड़ी विशेषता यह है की इनमें पशु-पक्षी, सुर-असुर, देव-परियां, पेड़-पौधे, प्रकृति का मानवीकरण, चमत्कार आदि सभी कुछ होने के बावजूद मनुष्य के दुःख-सुख और उसकी अभिलाषाओं की तृप्ति निहित रहती है । यह लोककथाएं ही हैं जो हमें बोध करवाती हैं कि मूल रूप में समस्त विश्व में मनुष्य का स्वभाव एक जैसा ही है ।

लोककथाओं की प्राचीनता
कथाओं की प्राचीनता को ढूँढते हुए अंत में अन्वेषक ऋग्वेद के उन सूक्तों तक पहुँचकर रुक गए हैं जिनमें कथोपकथन के माध्यम से "संवाद-सूक्त" कहे गए हैं। पीछे ब्राह्मण ग्रंथों में भी उनकी परंपरा विद्यमान है। यही क्रम उपनिषदों में भी मिलता है किंतु इन सबसे पूर्व कोई कथा कहानी थी ही नहीं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। प्रश्न उठता है जो प्रथाएँ उन सब में आई हैं उनका उद्गम कहाँ है? जहाँ उनका उद्गम होगा लोककथाओं का भी वही आरंभिक स्थान माना जाना चाहिए। पंचतंत्र की बहुत सी कथाएँ लोक-कथाओं के रूप में जनजीवन में प्रचलित हैं। किंतु यह भी सही है कि जितनी कथाएँ (पंचतंत्र के प्रकार की) लोकजीवन में मिल जाती हैं उतनी पंचतंत्र में भी नहीं मिलतीं। यदि यह कहा जाए कि विष्णु शर्मा ने लोकजीवन में प्रचलित कथाओं से लाभ उठाया होगा तो कोई, अनुपयुक्त बात नहीं होगी। हितोपदेश, बृहदश्लोक संग्रह, बृहत्कथा मंजरी, कथा बेताल पंचविंशति आदि का मूल लोकजीवन है। जातक कथाओं को अत्यधिक प्राचीन माना जाता है। इनकी संख्या ५५० के लगभग है किंतु लोककथाओं की कोई निर्धारित संख्या नहीं है। प्राकृत भाषा में भी अनेक कथाग्रंथ हैं। मूल पैशाची में लिखित "बहुकहा" कथा सरित्सागर, बृहत्कथा आदि का उपजीव्य बनी। संस्कृत में उसकी कुछ कथाएँ रूपांतरित हुई। अपभ्रंश के "पउम चरिअ" और "भविशयत्त कहा" भी इस क्रम में आती हैं। इस तरह लिखित रूप में वैदिक संवाद सूक्तों से प्रवाहित कथाधारा निरंतर प्रवाहित है किंतु इन सबका योग भी लोकजीवन में प्रचलित कहानियों की बराबरी तक नहीं पहुँच सकता।

हिन्दी लोककथाएँ
हिंदी लोककथाओं के अध्ययन से इनकी कुछ अपनी विशेषताओं का पता चलता हैं। मनुष्य आदिकाल से सुखों की खोज में लगा हुआ है। सुख लौकिक एंव पारलौकिक दोनों प्रकार के हैं। भारतीय परंपरा में पारलौकिक को लौकिक से अधिक ऊँचा स्थान दिया जाता है "अंत भला तो सब भला" के अनुसार हमारी लोककथाएँ भी सुखांत हुआ करती है। शायद ही ऐसी कोई कथा हो जो दु:खांत हो। चिर प्राचीन काल से ही भारतीय लोककथाओं की यही मुख्य प्रवृत्ति रही। इसलिए लोककथाओं के पात्र अनेक साहसिक एवं रोमांचकारी घटनाओं से होकर अंत में सुख की प्राप्ति करते हैं। संस्कृत के नाटकों की भाँति इनका भी अंत संयोग में ही होता है। ये कथाएँ मूल रूप में मंगलकामना की भावनाएँ लेकर आई। इसीलिए लोककथा कहनेवाले प्राय: कथाओं के अंत में कुछ मंगल वचन भी कहा करते हैं। जैसे - "जिस प्रकार उनके (कथा के प्रमुख पात्र के), दिन फिरे, वैसे ही सात दुश्मन (बहुत बड़े शत्रु) के भी दिन फिरें।"

विभिन्न प्रकार के दैविक एवं प्राकृतिक प्रकोपों का भय दिखाकर श्रोताओं को धर्म तथा कर्तव्यपालन के पथ पर ले आना भी बहुत सी लोककथाओं का लक्ष्य होता है। सारी सृष्टि उस समय एक धरातल पर उतर आती है जब सभी जीव-जंतुओ की भाषा एक हो जाती है। कहीं मनुष्य पशु से बात करता है तो कहीं पशु पक्षी से। सब एक दूसरे के दु:ख-सुख में समीप दिखाई पड़ते हैं। लोकगीतों की भाँति लोककथाएँ भी किसी सीमा को स्वीकार नहीं करतीं। अंचलों की बात तो जाने दीजिए ये कथाएँ देशों और महाद्वीपों की सीमाएँ भी पार कर गई हैं। इन कथाओं की विशेषता यह भी है कि ये मानव जीवन के सभी पहलुओं से संपर्क रखती हैं। इधर लोककथाओं के जो संग्रह हुए हैं उनमें तो बहुत ही थोड़ी कथाएँ आ पाई हैं। भले ही हम उनके संरक्षण की बात करें परंतु अपनी विशेषताओं के कारण ही श्रुति एवं स्मृति के आधार पर जीवन प्राप्त करनेवाली ये कथाएँ युगों से चली आ रही हैं। ये कथाएँ मुख्य रूप से तीन शैलियों में कही जाती हैं। प्रथम गद्य शैली; इस प्रकार में पूरी कथा सरल एवं आंचलिक बोली में गद्य में कही जाती है। द्वितीय गद्य पद्य मय कथाएँ - इन्हें चंपू शैली की कथा कहा जा सकता है। ऐसी कथाओं में प्राय: मार्मिक स्थलों पर पद्य रचना मिलती हैं। तीसरे प्रकार की कथाओं में पद्य गद्य के स्थान पर एक प्रवाह सा होता है। यह प्रवाह श्रोताओं पर अच्छा असर डालता है किंतु इस में द्वितीय प्रकार की कथाओं के पद्यों की भाँति गेयता नहीं होती, जैसे :

  • जात रहे डाँड़े डाँड़े,
  • एक ठे पावा कौड़ी
  • ऊ कौड़ी गंगा के दिहा
  • गंगा वेचारी बालू दिहिनि
  • ऊ बालू मइँ भुँजवा के दिहा
  • भुँजवा बेचारा दाना दिहेसि - इत्यादि


कहानी कहनेवाला व्यक्ति कथा के प्रमुख पात्र (नायक) को पहले वाक्य में ही प्रस्तुत कर देता है; जैसे - "एक रहे राजा" या "एक रहा दानव" आदि। इस विशेषता के कारण लोककथाओं का श्रोता विशेष उलझन में नहीं पड़ता। लोकजीवन में कथा कहने के साथ ही उसे सुनने की शैली भी निर्धारित कर दी गई है। सुननेवालों में से कोई व्यक्ति, जब तक हुंकारी नहीं भरता तब तक कथा कहने वाले को आनंद ही नहीं आता। हुंकारी सुनने से कहनेवाला अँधेरे में भी समझता रहता है कि श्रोता कहानी को ध्यानपूर्वक सुन रहा है।

लोककथाओं के भेद
लेककथाओं को मुख्य रूप से निम्नलिखित विभागों में बाँटा जा सकता है-

उपदेशात्मक कथाएँ
हिंदी की अनेक छोटी बड़ी कथाओं में मानव कल्याण के लिए विभिन्न प्रकार के उपदेश भरे पड़े हैं। ऐसी कथाएँ प्राय: अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षा देती हैं। इसलिए ऐसा आभास नहीं होता कि उनका निर्माण उपदेश के लिए ही किया गया होगा। इनके माध्यम से गृहकलह एवं सामाजिक बुराइयों से बचने के लिए प्रेरणाएँ मिलती हैं। ऐसी बहुत सी कथाएँ हैं जिनमें कर्कशा नारियों के कारण परिवार को विभिन्न प्रकार के कष्टों का भाजन होना पड़ा है। इनमें विमाताओं तथा सौतों की कथाएँ प्रधान होती हैं। इनके अतिरिक्त ऐसी भी कथाएँ मिलती हैं जिनमें मायावी स्त्रियाँ पर पुरुषों पर डोरे डालती हैं या जादू टोना किया करती हैं जिससे कथा के नायक को तथा उससे संबंध रखनेवालों को विभिन्न संघर्षों का शिकार होना पड़ता है। पुत्र द्वारा पिता की आज्ञा न मानने पर कष्ट उठाने से संबद्ध भी अनेक कथाएँ हैं किंतु, जैसा कि ऊपर बताया गया है, ये सभी कथाएँ अंत में सुख एवं संयोग में समाप्त होती हैं। जब तक कथा समाप्त नहीं होती तब तक पात्रों और मुख्य रूप से नायकों को इतनी भयानक घटनाओं में फँसा देखा जाता है कि सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते है। कुछ श्रोता तो वहीं कथा कहनेवाले तथ अन्य श्रोताओं की परवाह किए बिना नायक को कष्ट देनेवाले के नाते अपशब्द भी कहने लगते हैं। उन्हें ये सारी घटनाएँ सही मालूम पड़ती हैं।

सामाजिक कहानियाँ
इनमें विभिन्न प्रकार की बुराइयों से उत्पन्न घटनाओं का समावेश होता है। इनमें विशेष कर गृहकलह (सास-बहू एवं ननद भावज के झगड़े) एवं दुश्चरित्र और लंपट साधु संतों की करनी तथा अयोग्य नरेश के कारण प्रजा का दुखी होना दिखाया जाता है। बाल विवाह, बेमेल विवाह, बहु विवाह, विजातीय विवाह तथा दहेज आदि की निंदा भी इन कथाओं में मिलती हैं। योग्य या निरपराध व्यक्ति अयोग्य दुष्ट व्यक्ति के चंगुल में फँसकर परेशान होते दिखाई पड़ते हैं। सामाजिक कहानियों में वे कथाएँ अपना विशेष स्थान रखती हैं जिनमें नायिका मुख्य रूप से और नायक गौण रूप से भयानक परीक्षाएँ देते हैं। ऐसी परीक्षाओं में प्राय: सामाजिक एवं व्यक्तिगत चरित्र को प्रधानता दी जाती है। जिन नायक नायिकाओं के चरित्र ठीक होते हैं वे ऐसी कठोर परीक्षाओं में उत्तीर्ण होते दिखाई पड़ते हैं। जैसे सच्चरित्र नारी जब तप्त तैल के कड़ाहे में हाथ डालकर अपने सतीत्व की परीक्षा देती है तो कड़ाहे का तप्त तेल शीतल होता है। पतिव्रता स्त्री सूर्य के रथ को भी रोक देती है। उसके भय से बड़े बड़े दैत्य दानव तथा डाइनें भूतप्रेत पास नहीं फटकते। इसी तरह चरित्रवान् नायक भी विकट परीक्षाओं में उत्तीर्ण होकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति करते हैं।

धार्मिक लोककथाएँ
इनमें जप तप, व्रत-उपवास एवं उनसे प्राप्त उपलब्धियाँ संजोई गई हैं। सुखों की कामना के लिए कही गई इन व्रत कथाओं से उपदेश ग्रहण कर संबद्ध पर्वों के अवसरों पर स्त्रियाँ व्रतों का पालन किया करती हैं। पति, पुत्र एव भाइयों की कुशलता तथा संपत्तिप्राप्ति इनका लक्ष्य होता है। ऐसी लोक कथाओं में "बहुरा" (बहुला), जिउतिया (जीवित्पुत्रिका), करवा चौथ, अहाई, गनगौर और पिड़िया की कथाएँ मुख्य स्थान रखती हैं। पिड़िया का व्रत कुमारी बालिकाओं द्वारा भाइयों की कुशलता के लिए किया जाता है। यह व्रत कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से अगहन शुक्ल प्रतिपदा तक चलता हैं। इसे गोधन व्रत कथा की संज्ञा भी दी जाती है। जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत पुत्र की प्राप्ति तथा उसे दीर्घ जीवन के लिए किया जाता है। इस अवसर पर भी कई लोककथाएँ कही जाती है। किंतु चील्ह तथा स्यारिन दोनों ने ही इस पर्व पर किसी समय व्रत किया था परंतु भूख की ज्वाला न सह सकने के कारण स्यारिन ने चुपके से खाद्य ग्रहण कर लिया। परिणाम यह हुआ कि उसके सभी बच्चे मर गए और व्रत निभानेवाली चील्ह के सभी बच्चे दीर्घ जीवन को प्राप्त हुए। इस पर्व के व्रतविश्वास से जब पुत्र की प्राप्ति होती है तो लोककथाओं में दिए गए संकेत के अनुसार उसका नाम "जीउत" रखा जाता है। ऐसा लगता है कि पुराणों में जीवत्पुत्रिका व्रत की कथा के साथ जो जीमूत वाहन की कथा संबद्ध है वह लोककथाओं के आधार पर ही है, क्योंकि पौराणिक जीमूत वाहन ने नार्गों की रक्षा के लिए अपनी देह का त्याग किया था। जिउतिया की कथा का भी उद्देश्य परोपकार के लिए आत्मोत्सर्ग कर देना ही है। करवा चौथ के व्रत में मुख्य रूप से उस राजा और रानी की कहानी कही जाती हैं जो दूसरों के बालकों से घृणा किया करते थे। इसीलिए उन्हें पुत्र नहीं हुआ। अंत में सूर्य की उपासना करने पर उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई।

प्रेमप्रधान लोककथाएँ
प्रेमप्रधान लोककथाएँ भी खूब मिलती हैं। इनमें मुख्य रूप में माता का पुत्र के प्रति, पुत्र का माता के प्रति, पत्नी का पति के और पति का पत्नी के प्रति तथा भाइयों बहनों का प्रेम दिखलाया जाता है। प्राय: सभी कथाओं में वर्णित प्रेम कर्तव्य एवं निष्ठा पर आधारित होता हैं। कुछ कथाएँ तो ऐसी भी हैं जिनमें जन्म जन्मात्तर का प्रेम पल्लवित होत है। सदावृज-सारंगा की कथा पूर्व जन्मों के प्रेम पर ही आधारित हैं। शीत वसंत की कहानी में जहाँ विमाता के दुर्व्यवहार की बात आती है वहीं भाई-भाई का प्रेम भी चरम सीमा पर पहुँचता दिखाई पड़ता है। भाई बहिन और पतिपत्नी के प्रेम पर आधारित तो अनेक कथाएँ हैं। कई कथाओं में कुलीन एवं पतिपरायण स्त्रियाँ कुपात्र तथा घृणित रोगों से ग्रस्त पतियों को अपनी सेवा, श्रद्धा और भक्ति के बल पर बचा लेती हैं।

मनोरंजन संबंधी कथाएँ
इनका मूल उद्देश्य श्रोताओं के दिल बहलाव की सामग्री प्रस्तुत करना होता है। बालक बालिकाएँ ऐसी कहानियों को अति शीघ्र याद कर लेते हैं। ये कथाएँ प्राय: छोटी हुआ करती हैं। भिन्न-भिन्न जानवरों जैसे कुत्ता, बिल्ली, गीदड़, नेवला, शेर, भालू, सुग्गा, कौवा, चील्ह आदि से संबंध रखनेवाली ये कहानियाँ बालकों का मनोरंजन करती हैं। इनमें वर्णित विषय गंभीर भी होते हैं किंतु प्राथमिकता हल्की फुल्की बातों को दी जाती हैं। उदाहरण के लिए ढेले पर पात की एक लघु कथा लें - ढेले पत्ते में मित्रता हुई। ढेले ने पत्ते से कहा, आँधी आने पर मैं तुम्हारे ऊपर बैठ जाऊँगा तो तुम उड़ोगे नहीं। पत्ते ने कहा पानी आने पर मैं तुम्हारे ऊपर हो जाऊँगा तो तुम गलोगे नहीं। संयोग की बात कि आँधी पानी का आगमन साथ ही हुआ। पत्ता भाई उड़ गए और ढेला भाई गल गए। विभिन्न प्रकार की हास्य कथाएँ भी इसी प्रकार के अंतर्गत आती हैं।

जातीय पात्रों पर आधारित लोककथाएँ
अंत में ऐसी लोककथाओं की चर्चा भी अपेक्षित है जो जातीय पात्रों पर आधारित होती हैं। ऐसी कथाएँ अहीरों, धोबियों, नाइयों, मल्लाहों, चमारों तथा कुछ अन्य जातियों में हुए विशिष्ट नायकों पर आधारित होती हैं। इन कथाओं को संबंधित जातियाँ ही आपस में कहती सुनती हैं। वन्य जातियों, जैसे कोलों, भीलों, धीमरों, खरबारों, किरातों तथा दुसाधों आदि में ऐसी कथाएँ अधिक मात्रा में पाई जाती हैं।


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फुर्र-फुर्र- लोक-कथा

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एक जुलाहा सूत कातने के लिए रुई लेकर आ रहा था। वह नदी किनारे सुस्ताने के लिए बैठा ही था कि जोर की आँधी आई। आँधी में उसकी सारी रुई उड़ गई। जुलाहा घबराया--अगर बिना रुई के घर पहुँचा तो मेरी पत्नी तो बहुत नाराज़ होगी। घबराहट में उसे कुछ न सूझा। उसने सोचा, यही बोल दूँगा-फुर्र-फुर्र। और वह फुर्र-फुर्र बोलता जा रहा था। आगे एक चिड़ीमार पक्षी पकड़ रहा था।

जुलाहे की फुर्र-फुर्र सुनकर सारे पक्षी उड़ गए। चिड़ीमार को बहुत गुस्सा आया। वह जुलाहे पर बहुत चिल्लाया तुमने मुझे बरबाद कर दिया। आगे से तुम ऐसा कहना, पकड़ो! पकड़ो!

जुलाहा जोर-जोर से “पकड़ो! पकड़ो!" रटता गया। रास्ते में कुछ चोर रुपए गिन रहे थे। जुलाहे की “पकड़ो! पकड़ो!" सुनकर वे घबरा गए। फिर उन्होंने देखा कि अकेला जुलाहा ही चला आ रहा था। चोरों ने उसे पकड़ा और घूरते हुए कहा-यह क्‍या बक रहे हो? हमें मरवाने का इरादा है क्या? तुम्हें कहना चाहिए, इसकों रखो, ढेरों लाओ, समझे ?

जुलाहा यही कहता हुआ आगे बढ़ गया-इसको रखो, ढेरों लाओ। जब वह श्मशान के पास से गुजर रहा था तो वहाँ गाँववाले शवों को जला रहे थे। उस गाँव में हैजा फैला हुआ था। लोगों ने जुलाहे को कहते सुना, 'इसको रखो, ढेरों लाओ', तब उन्हें बड़ा गुस्सा आया। वे चिल्लाए, तुम्हें शर्म नहीं आती है? हमारे गाँव में इतना भारी दुख फैला है और तुम ऐसा बकते हो। तुम्हें कहना चाहिए यह तो बड़े दुख की बात है।

जुलाहा शर्म से पानी-पानी हो गया। वह यही रटता हुआ आगे बढ़ने लगा-यह तो बड़े दुख की बात है। कुछ देर बाद वह एक बरात के पास से गुजरा। बरातियों ने उसे यह कहते हुए सुना, 'यह तो बड़े दुख की बात है, यह तो बड़े दुख की बात है।' इतना सुनकर वे जुलाहे को पीटने के लिए तैयार हो गए। बड़ी मुश्किल से उसने सफाई दी तो उन्होंने कहा-- सीधे से आगे बढ़ो, और हाँ, अब तुम यह रटते जाना-भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले।

अब जुलाहा यही रटता हुआ अपनी राह चल पड़ा। चलते-चलते अँधेरा हो गया। घर से निकलते समय उसकी पत्नी ने उससे यही कहा था कि “जहाँ रात हो जाए वहीं सो जाना।' जुलाहा थक भी गया था। वह वहां सो गया।"

अगले दिन जब सुबह उसके मुँह पर पानी पड़ा, तब जुलाहा हड़बड़ा कर उठा। आँखें खोलीं तो देखता ही रह गया-यह तो उसी का घर था। और अभी-अभी उसकी पत्नी ने ही उस पर पानी फेंका था। जुलाहे के मुँह से निकला-भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले।

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अजगर - लोक-कथा

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बहुत वर्ष पहले एक राजा की दो रानियाँ थीं। बड़ी रानी शोभा बहुत अच्छे स्वभाव की दयावान स्त्री थी। छोटी रानी रूपा बड़ी कठोर और दुष्ट थी। बड़ी रानी शोभा के एक पुत्री थी, नाम था देवी। रानी रूपा के भी एक बेटी थी, नाम था तारा।

रानी रूपा बड़ी चालाक और महत्वाकाँक्षी स्त्री थी। वह चाहती थी कि राज्य की सत्ता उसके हाथ में रहे। राजा भी उससे दबा हुआ था। रानी रूपा बड़ी रानी और उसकी बेटी से नफरत करती थी। एक दिन उस ने राजा से कह दिया कि रानी शोभा और देवी को राजमहल से बाहर निकाल दिया जाये। राजा रानी रूपा की नाराजी से डरता था। उसे लगा कि उसे वही करना पड़ेगा जो रूपा चाहती है। उस ने बड़ी रानी और उस की बेटी को राजमहल के बाहर एक छोटे से घर में रहने के लिए भेज दिया। लेकिन रानी रूपा की घृणा इससे भी नहीं हटी।

उस ने देवी को आज्ञा दी कि वह प्रतिदिन राजा की गायों को जंगल में चराने के लिए ले जाया करे। रानी शोभा यह अच्छी तरह जानती थी कि यदि देवी गायों को चराने के लिए गई तो रानी रूपा उन्हें किसी और परेशानी में डाल देगी। इसलिए उसने अपनी लड़की से कहा कि वह रोज सुबह गायों को जंगल में चरने के लिए ले जाया करे और शाम के समय उन्हें वापिस ले आया करे।

देवी को अपनी माँ का कहना तो मानना ही था, इस लिए वह रोज़ सुबह गायों को जंगल में ले जाती। एक शाम जब वह जंगल से घर लौट रही थी तो उसे अपने पीछे एक धीमी सी आवाज़ सुनाई दी-
‘‘देवी, देवी, क्या तुम मुझसे विवाह करोगी ?’’

देवी डर गई। जितनी जल्दी हो सका उसने गायों को घर की ओर हाँका। दूसरे दिन भी जब वह घर लौट रही थी तो उस ने वही आवाज़ पुन: सुनी। वही प्रश्न उससे फिर पूछा गया।

रात को देवी ने अपनी माँ को उस आवाज़ के बारे में कहा। माँ सारी रात इस बात पर विचार करती रही। सुबह तक उस ने निश्चय कर लिया कि क्या किया जाना चाहिए।
‘‘सुनो बेटी,’’ वह अपनी लड़की से बोली- ‘‘मैं बता रही हूँ कि यदि आज शाम के समय भी तुम्हें वही आवाज़ सुनाई दे तो तुम्हें क्या करना होगा।’’
‘‘बताइये माँ,’’ देवी ने उत्तर दिया।
‘‘तुम उस आवाज़ को उत्तर देना,’’ रानी शोभा ने कहा, ‘‘कल सुबह तुम मेरे घर आ जाओ, फिर मैं तुम से विवाह कर लूँगी।’’
‘‘लेकिन माँ,’’ देवी बोली- ‘‘हम उसे जानते तक नहीं।’’

‘‘मेरी प्यारी देवी,’’ माँ ने दु:खी होकर कहा- ‘‘जिस स्थिति में हम जीवित हैं उस से ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है। हमें इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना चाहिए। ईश्वर हमारी सहायता करेगा।’’
उस संध्या को जब देवी गायों को लेकर लौट रही थी उसे वही आवाज़ फिर सुनाई दी।
आवाज़ कोमल और दु:ख भरी थी।
‘‘देवी, देवी क्या तुम मुझ से विवाह करोगी ? क्या तुम मुझ से विवाह करोगी ?’’ आवाज़ बोली।
देवी रुक गई। उस ने पीछे मुड़कर देखा लेकिन उसे कोई नहीं दिखाई दिया। वह हिचकिचायी। वह वहाँ से भाग जाना चाहती थी लेकिन फिर उसे माँ के शब्द याद आ गये। वह जल्दी से बोली- ‘‘हाँ, यदि तुम कल सुबह मेरे घर आ जाओ तो मैं तुम से विवाह कर लूँगी।

तब वह बड़ी तेजी से गायों को हाँकती हुई घर चली गई।
अगले दिन सुबह रानी शोभा जरा जल्दी उठ गई। उस ने जाकर बाहर का दरवाजा खोला, देखने के लिए कि कोई प्रतीक्षा तो नहीं कर रहा।
वहाँ कोई भी न था। अचानक उसे एक धक्का सा लगा और वह स्तब्ध रह गई। एक बड़ा अजगर कुण्डली मारे सीढ़ियों पर बैठा था।

रानी शोभा सहायता के लिए चिल्लायी। देवी और नौकर भागे-भागे आये कि क्या बात है।
तभी एक आश्चर्यजनक बात हुई। अजगर बोला :-
‘‘नमस्कार,’’ उसका स्वर बहुत विनम्र था- ‘‘मुझे निमन्त्रित किया गया था इसलिये मैं आया हूँ। आपकी लड़की ने मुझसे वायदा किया था कि यदि मैं सुबह घर आ सकूँ तो वह मुझ से विवाह कर लेगी। मैं इस लिये आया हूँ।

रानी शोभा की समझ में नहीं आ रहा था कि वह करे तो क्या करे | उसे तो यही आशा थी कि किसी दिन कोई सुन्दर नौजवान उसकी लड़की से विवाह करने आयेगा । उसने यह कभी नहीं सोचा था कि वह अजगर होगा !

एक नौकर भाग कर रानी रूपा के पास गया और उसे उसने सारी घटना बतला दी । रानी यह सुन कर प्रसन्न हुई। वह उसी समय अपने नौकरों के साथ रानी शोभा के घर गई ।

“यदि राजकुमारी देवी ने किसी के साथ विवाह का वायदा किया है,” वह बोली--- तो उसे अपना वायदा अवश्य निभाना चाहिए । रानी होने के कारण यह देखना मेरा कर्त्तव्य है कि वह अपना वायदा पूरा करें।

उसी दिन विवाह हो गया । रानी शोभा और देवी के लिए यह कोई प्रसन्नता का समय नहीं था लेकिन इतने दुर्भाग्य सहने के बाद वे किसी भी प्रकार की विपत्ति का सामना करने को तैयार थीं ।
विवाह के पश्चात्‌ अजगर अपनी पत्नी के साथ उसके कमरे में गया ।

सारी रात रानी शोभा ने प्रार्थना करते हुए बिताई कि उसकी बच्ची ठीकठाक रहें। दूसरे दिन बड़े सवेरे उसने देवी के कमरे का दरवाज़ा खट- खटाया। एक सुन्दर नवयुवक ने दरवाज़ा खोला । देवी उसके पीछे खड़ी थी।

“मैं आपको कह नहीं सकता कि मेरी जान बचाने के लिए मैं आपका और देवी का कितना आभारी हूँ,” वह नवयुवक बोला--- मैं एक शाप के कारण अजगर बन गया था । एक वन-देवता मुझसे क्रुद्ध थे और उन्होंने मुझे अजगर बना दिया । बाद में उन्हें अपनी करनी पर दुख हुआ । तब उन्होंने कहा कि यदि कोई राजकुमारी मुझसे विवाह कर लेगी तो मैं फिर से मनुष्य बन जाऊँगा । और अब देवी ने मुझ से विवाह कर लिया है, मेरा शाप उतर गया है। अब मैं फिर कभी अजगर नहीं बनूंगा ।”

रानी शोभा बहुत प्रसन्न हुई। वह्‌ अपनी लड़की और दामाद को राजा से मिलाने के लिए ले गई। यह बड़ी विचित्र घटना थी। चारों ओर से लोग इस विचित्र नवयुवक को देखने राजमहल में आने लगे । सभी उत्सुक थे--सिवाय रानी रूपा के ।

रानी रूपा बहुत गुस्से में थी | उसने झल्लाते और खीझते हुए अपने आपको कमरे में बन्द कर लिया । देवी का भाग्य उससे देखा नहीं जा रहा था। वह चाहती थी कि उसकी बेटी तारा भी ऐसी भाग्यशाली बने । आखिरकार उसे एक युक्ति सूझी ।
उसने झपनी लड़की को बुलाया ।

“देवी का विवाह तो अब हो गया है,” वह बोली---“ इस लिए गायों को जंगल में चराने के लिए तुम ले जाया करो । ” “नहीं!” तारा चीख कर बोली--"इतने नौकर हैं तो फिर में क्यों गायें चराने जाऊं?”

“यह मेरी आज्ञा है!” रानी क्रुद्ध होकर बोली--“ एक बात और भी सुनो । यदि जंगल में कोई तुमसे विवाह का प्रस्ताव करे तो तत्काल कह देना कि तुम विवाह के लिए राज़ी हो, यदि वह अगले दिन सुबह हमारे घर आ जाये। ”

“तारा माँ की इस योजना से भयभीत हो गई । वह गायों को जंगल में नहीं ले जाना चाहती थी। वह खूब रोई। लेकित रानी फिर भी नहीं पिघली । तारा को उसकी आज्ञा माननी पड़ी ।

तारा रोज़ सुबह गायों को जंगल में चराने के लिए ले जाती और फिर शाम के समय वापिस ले आती ।

लेकिन उसने एक बार भी जंगल में किसी तरह की आवाज़ नहीं सुनी जो यह कह रही हो, “क्‍या तुम मुझसे विवाह करोगी ?”

फिर भी रानी निराश नहीं हुई । जंगल में कोई अजगर तो था नहीं जो तारा से विवाह का प्रस्ताव करता। इसलिए उसने खुद अजगर ढूंढने का निश्चय किया ।

उसने अपने नौकरों को एक अजगर लाने की आज्ञा दी । बहुत खोज करने पर काफी दिनों पश्चात्‌ उन्हें एक बहुत बड़ा अजगर मिला । उसे पकड़ कर वे राजमहल में ले आये ।

आखिरकार रानी का अभिप्रायः पूरा हो गया और उसने तारा का विवाह इस अजगर से कर दिया। अब रानी को संतोष हुआ ।
विवाह की रात तारा तथा अजगर को एक कमरे में बन्द कर दिया गया।

रानी अधीरता से सुबह की प्रतीक्षा कर रही थी । रानी रूपा ने सवेरे सवेरे ही लड़की के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन कोई उत्तर न मिला । उसने ज़रा और जोर से दरवाज़ा खटखटाया लेकिन दरवाज़ा तब भी न खुला । रानी से और प्रतीक्षा न की गई और उसने धक्का देकर दरवाज़ा खोल दिया । मोटा अजगर ज़मीन पर पड़ा हुआ था लेकिन तारा का कहीं पता नहीं था।

रानी चीख पड़ी। महल में सभी ने उसका चीखना सुना । राजा और नौकर भागे आये कि क्या बात है। राजकुमारी कहाँ है?” सब चिल्लाये ।

“वह तो अजगर के पेट में होंगी,” रसोइया बोला--- देखो वह कितना मोटा हो गया है?” रानी अब बड़ी ज़ोर-जोर से रोने लगी। राजा भी रोने लगा ।

रसोइया अपना सबसे बड़ा चाकू ले आया । वह बोला-- यदि वह अब तक जीवित हुई तो मैं राजकुमारी को बचाने की कोशिश करूँगा।

उसने अजगर का पेट चीर डाला । तारा अच्छी भली जीवित थी । रसोइये ने उसे बाहर खींचा । वह चीख मारकर अपनी माँ की तरफ भागी।

अजगर की मृत्यु हो गई और साथ में रानी रूपा की इस इच्छा की भी कि तारा का विवाह देवी की तरह ही किसी योग्य और सम्पन्न नवयुवक से हो ।

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तीन पुतले- लोक-कथा

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महाराजा चन्द्रगुप्त का दरबार लगा हुआ था। सभी सभासद अपनी अपनी जगह पर विराजमान थे। महामन्त्री चाणक्य दरबार की कार्यवाही कर रहे थे।

महाराजा चन्द्र्गुप्त को खिलौनों का बहुत शौक था। उन्हें हर रोज़ एक नया खिलौना चाहिए था। आज भी महाराजा के पूछने पर कि क्या नया है; पता चला कि एक सौदागर आया है और कुछ नये खिलौने लाया है। सौदागर का ये दावा है कि महाराज या किसी ने भी आज तक ऐसे खिलौने न कभी देखें हैं और न कभी देखेंगे। सुन कर महाराज ने सौदागर को बुलाने की आज्ञा दी। सौदागर आया और प्रणाम करने के बाद अपनी पिटारी में से तीन पुतले निकाल कर महाराज के सामने रख दिए और कहा कि अन्नदाता ये तीनों पुतले अपने आप में बहुत विशेष हैं। देखने में भले एक जैसे लगते हैं मगर वास्तव में बहुत निराले हैं। पहले पुतले का मूल्य एक लाख मोहरें हैं, दूसरे का मूल्य एक हज़ार मोहरे हैं और तीसरे पुतले का मूल्य केवल एक मोहर है।

सम्राट ने तीनों पुतलों को बड़े ध्यान से देखा। देखने में कोई अन्तर नहीं लगा, फिर मूल्य में इतना अन्तर क्यों? इस प्रश्न ने चन्द्रगुप्त को बहुत परेशान कर दिया। हार के उसने सभासदों को पुतले दिये और कहा कि इन में क्या अन्तर है मुझे बताओ। सभासदों ने तीनों पुतलों को घुमा फिराकर सब तरफ से देखा मगर किसी को भी इस गुत्थी को सुलझाने का जवाब नहीं मिला। चन्द्रगुप्त ने जब देखा कि सभी चुप हैं तो उस ने वही प्रश्न अपने गुरू और महामन्त्री चाणक्य से पूछा।

चाणक्य ने पुतलों को बहुत ध्यान से देखा और दरबान को तीन तिनके लाने की आज्ञा दी। तिनके आने पर चाणक्य ने पहले पुतले के कान में तिनका डाला। सब ने देखा कि तिनका सीधा पेट में चला गया, थोड़ी देर बाद पुतले के होंठ हिले और फिर बन्द हो गए। अब चाणक्य ने अगला तिनका दूसरे पुतले के कान में डाला। इस बार सब ने देखा कि तिनका दूसरे कान से बाहर आगया और पुतला ज्यों का त्यों रहा। ये देख कर सभी की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी कि आगे क्या होगा। अब चाणक्य ने तिनका तीसरे पुतले के कान में डाला। सब ने देखा कि तिनका पुतले के मुँह से बाहर आगया है और पुतले का मुँह एक दम खुल गया। पुतला बराबर हिल रहा है जैसे कुछ कहना चाहता हो।
चन्द्रगुप्त के पूछ्ने पर कि ये सब क्या है और इन पुतलों का मूल्य अलग अलग क्यों है, चाणक्य ने उत्तर दिया।

राजन, चरित्रवान सदा सुनी सुनाई बातों को अपने तक ही रखते हैं और उनकी पुष्टी करने के बाद ही अपना मुँह खोलते हैं। यही उनकी महानता है। पहले पुतले से हमें यही ज्ञान मिलता है और यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य एक लाख मोहरें है।

कुछ लोग सदा अपने में ही मग्न रहते हैं। हर बात को अनसुना कर देते हैं। उन्हें अपनी वाह-वाह की कोई इच्छा नहीं होती। ऐसे लोग कभी किसी को हानि नहीं पहुँचाते। दूसरे पुतले से हमें यही ज्ञान मिलता है और यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य एक हज़ार मोहरें है।

कुछ लोग कान के कच्चे और पेट के हलके होते हैं। कोई भी बात सुनी नहीं कि सारी दुनिया में शोर मचा दिया। इन्हें झूठ सच का कोई ज्ञान नहीं, बस मुँह खोलने से मतलब है। यही कारण है कि इस पुतले का मूल्य केवल एक मोहर है।

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चतुराई- लोक-कथा

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एक ग़रीब आदमी था। एक दिन वह राजा के पास गया और बोला- 'महाराज, मैं आपसे कर्ज़ मांगने आया हूं। कृपा कर आप मुझे पांच हजार रुपये दें। मैं पांच वर्ष के अंदर आपके रुपये वापस कर दूंगा।' राजा ने उसकी बात पर विश्‍वास कर उसे पांच हजार रुपये दे दिए। पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी जब उस व्‍यक्ति ने राजा के पांच हजार रुपये नहीं लौटाये तब राजा को मजबूरन उसके घर जाना पड़ा। लेकिन वहां वह व्‍यक्ति नहीं मिला। जब भी राजा वहां जाता बहाना बना कर उसे वापस भेज दिया जाता। एक दिन फिर राजा उस व्‍यक्ति के घर गया। वहां और कोई तो नहीं दिखा, एक छोटी लड़की बैठी थी। राजा ने उसी से पूछा- 'तुम्‍हारे पिता जी कहा हैं ?'

लड़की बोली- 'पि‍ताजी स्‍वर्ग का पानी रोकने गये हैं।'
राजा ने फिर पूछा- 'तुम्‍हारा भाई कहां है ?'
लड़की बोली- 'बिना झगड़ा के झगड़ा करने गये हैं।'
राजा के समझ में एक भी बात नहीं आ रही थी। इसलिए वह फिर पूछता है- 'तुम्‍हारी माँ कहां है ?'
लड़की बोली- 'मां एक से दो करने गई है।'
राजा उसके इन ऊल-जुलूल जवाब से खीझ गया। वह गुस्‍से में पूछता है- 'और तुम यहां बैठी क्‍या कर रही हो ?'
लड़की हंसकर बोली- 'मैं घर बैठी संसार देख रही हूं।'

राजा समझ गया कि लड़की उसकी किसी भी बात का सीधा जवाब नहीं देगी। इसलिए उसे अब इससे इन बातों का मतलब जानने के लिए प्‍यार से बतियाना पड़ेगा। राजा ने चेहरे पर प्‍यार से मुस्‍कान लाकर पूछा- 'बेटी, तुमने जो अभी-अभी मेरे सवालों के जवाब दिये, उनका मतलब क्‍या है ? मैं तुम्‍हारी एक भी बात का मतलब नहीं समझ सका। तुम मुझे सीधे-सीधे उनका मतलब समझाओ।'
लड़की ने भी मुस्‍करा कर पूछा - 'अगर मैं सभी बातों का मतलब समझा दूं तो आप मुझे क्‍या देंगे ?'
राजा के मन में सारी बातों को जानने की तीव्र उत्‍कंठा थी। वह बोला- 'जो मांगोगी, वही दूंगा।'
तब लड़की बोली- 'आप मेरे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर देंगे तो मैं आपको सारी बातों का अर्थ बता दूंगी।'
राजा ने कहा- 'ठीक है, मैं तुम्‍हारे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर दूंगा। अब तो सारी बातों का अर्थ समझा दो।'
लड़की बोली- 'महाराज, आज मैं आपको सारी बातों का अर्थ नहीं समझा सकती। कृपा कर आप कल आयें। कल मैं ज़रूर बता दूंगी।'

राजा अगले दिन फिर उस व्‍यक्ति के घर गया। आज वहां सभी लोग मौजूद थे। वह आदमी, उसकी पत्‍नी, बेटा और उसकी बेटी भी। राजा को देखते ही लड़की पूछी- 'महाराज, आपको अपना वचन याद है ना ? '

राजा बोला- 'हां मुझे याद है। तुम अगर सारी बातों का अर्थ बता दो तो मैं तुम्‍हारे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर दूंगा।'

लड़की बोली- 'सबसे पहले मैंने यह कहा था कि पिताजी स्‍वर्ग का पानी रोकने गये हैं, इसका मतलब था कि वर्षा हो रही थी और हमारे घर की छत से पानी टपक रहा था। पिताजी पानी रोकने के लिए छत को छा (बना) रहे थे। यानि वर्षा का पानी आसमान से ही गिरता है और हमलोग तो यही मानते हैं कि आसमान में ही स्‍वर्ग है। बस, पहली बात का अर्थ यही है। दूसरी बात मैंने कही थी कि भइया बिना झगडा़ के झगड़ा करने गये है। इसका मतलब था कि वे रेंगनी के कांटे को काटने गये थे। अगर कोई भी रेंगनी के कांटे को काटेगा तो उसके शरीर में जहां-तहां कांटा गड़ ही जायेगा, यानि झगड़ा नहीं करने पर भी झगड़ा होगा और शरीर पर खरोंचें आयेंगी। '

राजा उसकी बातों से सहमत हो गया। वह मन-ही-मन उसकी चतुराई की प्रशंसा करने लगा। उसने उत्‍सुकता के साथ पूछा- 'और तीसरी-चौथी बात का मतलब बेटी ? '

लड़की बोली- 'महाराज, तीसरी बात मैंने कही थी कि माँ एक से दो करने गई है। इसका मतलब था कि माँ अरहर दाल को पीसने यानि उसे एक का दो करने गई है। अगर साबुत दाल को पीसा जाय तो एक दाना का दो भाग हो जाता है। यानि यही था एक का दो करना। रही चौथी बात तो उस समय मैं भात बना रही थी और उसमे से एक चावल निकाल कर देख रही थी कि भात पूरी तरह पका है कि न‍ही। इसका मतलब है कि मैं एक चावल देखकर ही जान जाती कि पूरा चावल पका है कि नहीं । अर्थात् चावल के संसार को मैं घर बैठी देख रही थी।' यह कहकर लड़की चुप हो गई।

राजा सारी बातों का अर्थ जान चुका था। उसे लड़की की बुद्धिमानी भरी बातों ने आश्‍चर्य में डाल दिया था। फिर राजा ने कहा- 'बेटी, तुम तो बहुत चतुर हो। पर एक बात समझ में नही आई कि यह सारी बातें तो तुम मुझे कल भी बता सकती थी, फिर तुमने मुझे आज क्‍यों बुलाया ?'

लड़की हंसकर बोली- ' मैं तो बता ही चुकी हूं कि कल जब आप आये थे तो मैं भात बना रही थी। अगर मैं आपको अपनी बातों का मतलब समझाने लगती तो भात गीला हो जाता या जल जाता, तो माँ मुझे ज़रूर पीटती। फिर घर में कल कोई भी नही था। अगर मैं इनको बताती कि आपने कर्ज़ माफ कर दिया है तो ये मेरी बात का विश्‍वास नहीं करते। आज स्‍वयं आपके मुंह से सुनकर कि आपने कर्ज़ माफ कर दिया है, जहां इन्‍हें इसका विश्‍वास हो जायेगा, वहीं खुशी भी होगी। '

राजा लड़की की बात सुनकर बहुत ही प्रसन्‍न हुआ। उसने अपने गले से मोतियों की माला निकाल उसे देते हुए कहा- 'बेटी, यह लो अपनी चतुराई का पुरस्‍कार! तुम्‍हारे पिताजी का कर्ज़ तो मैं माफ कर ही चुका हूं। अब तुम्‍हें या तुम्‍हारे घरवालों को मुझसे बहाना नहीं बनाना पड़ेगा। अब तुम लोग निश्चिंत होकर रहो। अगर फिर कभी किसी चीज की ज़रूरत हो तो बेझिझक होकर मुझसे कहना।'

इतना कहकर राजा लड़की को आशीर्वाद देकर चला गया। लड़की के परिवारवालों ने उसे खुशी से गले लगा लिया।


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पंछी बोला चार पहर- लोक-कथा

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पुराने समय की बात है। एक राजा था। वह बड़ा समझदार था और हर नई बात को जानने को इच्छुक रहता था। उसके महल के आंगनमें एक बकौली का पेड़ था। रात को रोज नियम से एक पक्षी उस पेड़ पर आकर बैठता और रात के चारों पहरों के लिए अलग-अलग चार तरह की बातें कहा करता। पहले पहर में कहता :
“किस मुख दूध पिलाऊं,
किस मुख दूध पिलाऊं”

दूसरा पहर लगते बोलता :
“ऐसा कहूं न दीख,
ऐसा कहूं न दीख !”

जब तीसरा पहर आता तो कहने लगता :
“अब हम करबू का,
अब हम करबू का ?”

जब चौथा पहर शुरू होता तो वह कहता :
“सब बम्मन मर जायें,
सब बम्मन मर जायें !”

राजा रोज रात को जागकर पक्षी के मुख से चारों पहरों की चार अलग-अलग बातें सुनता। सोचता, पक्षी क्या कहता ?पर उसकी समझ में कुछ न आता। राजा की चिन्ता बढ़ती गई। जब वह उसका अर्थ निकालने में असफल रहा तो हारकर उसने अपने पुरोहित को बुलाया। उसे सब हाल सुनाया और उससे पक्षी के प्रशनों का उत्तर पूछा। पुरोहित भी एक साथ उत्तर नहीं दे सका। उसने कुछ समय की मुलत मांगी और चिंतित होकर घर चला आया। उसके सिर में राजा की पूछी गई चारों बातें बराबर चक्कर काटती रहीं। वह बहुतेरा सोचता, पर उसे कोई जवाब न सूझता। अपने पति को हैरान देखकर ब्राह्रणी ने पूछा, “तुम इतने परेशान क्यों दीखते हो ? मुझे बताओ, बात क्या है ?”

ब्राह्मणी ने कहा, “क्या बताऊं ! एक बड़ी ही कठिन समस्या मेरे सामने आ खड़ी हुई है। राजा के महल का जो आंगन है, वहां रोज रात को एक पक्षी आता है और चारों पहरों मे नितय नियम से चार आलग-अलग बातें कहता है। राजा पक्षी की उन बातों का मतलब नहीं समझा तो उसने मुझसे उनका मतलब पूछा। पर पक्षी की पहेलियां मेरी समझ में भी नहीं आतीं। राजा को जाकर क्या जवाब दूं, बस इसी उधेड़-बुन में हूं।”

ब्राह्मणी बोली, “पक्षी कहता क्या है? जरा मुझे भी सुनाओ।”

ब्राह्मणी ने चारों पहरों की चारों बातें कह सुनायीं। सुनकर ब्राह्मणी बोली। “वाह, यह कौन कठिन बात है! इसका उत्तर तो मैं दे सकती हूं। चिंता मत करो। जाओ, राजा से जाकर कह दो कि पक्षी की बातों का मतलब मैं बताऊंगी।”

ब्राह्मण राजा के महल में गया और बोला, “महाराज, आप जो पक्षी के प्रश्नों के उत्तर जानना चाहते हैं, उनको मेरी स्त्री बता सकती है।”

पुरोहित की बात सुनकर राजा ने उसकी स्त्री को बुलाने के लिए पालकी भेजी। ब्राह्मणी आ गई। राजा-रानी ने उसे आदर से बिठाया। रात हुई तो पहले पहर पक्षी बोला:
“किस मुख दूध पिलाऊं,
किस मुख दूध पिलाऊं ?”
राजा ने कहा, “पंडितानी, सुन रही हो, पक्षी क्या बोलता है?”
वह बोली, “हां, महाराज ! सुन रहीं हूं। वह अधकट बात कहता है।”
राजा ने पूछा, “अधकट बात कैसी ?”
पंडितानी ने उत्तर दिया, “राजन्, सुनो, पूरी बात इस प्रकार है-
लंका में रावण भयो बीस भुजा दश शीश,
माता ओ की जा कहे, किस मुख दूध पिलाऊं।
किस मुख दूध पिलाऊं ?”
लंका में रावण ने जन्म लिया है, उसकी बीस भुजाएं हैं और दश शीश हैं। उसकी माता कहती है कि उसे उसके कौन-से मुख से दूध पिलाऊं?”
राज बोला, “बहुत ठीक ! बहुत ठीक ! तुमने सही अर्थ लगा लिया।”
दूसरा पहर हुआ तो पक्षी कहने लगा :
ऐसो कहूं न दीख,
ऐसो कहूं न दीख।
राजा बोला, ‘पंडितानी, इसका क्या अर्थ है ?”
पडितानी ने समझाया, “महाराज ! सुनो, पक्षी बोलता है :
“घर जम्ब नव दीप
बिना चिंता को आदमी,
ऐसो कहूं न दीख,
ऐसो कहूं न दीख !”

चारों दिशा, सारी पृथ्वी, नवखण्ड, सभी छान डालो, पर बिना चिंता का आदमी नहीं मिलेगा। मनुष्य को कोई-न-कोई चिंता हर समय लगी ही रहती है। कहिये, महाराज! सच है या नहीं ?”

राजा बोला, “तुम ठीक कहती हो।”
तीसरा पहर लगा तो पक्षी ने रोज की तरह अपी बात को दोहराया :
“अब हम करबू का,
अब हम करबू का ?”
ब्राह्मणी राजा से बोली, “महाराज, इसका मर्म भी मैं आपको बतला देती हूं। सुनिये:
पांच वर्ष की कन्या साठे दई ब्याह,
बैठी करम बिसूरती, अब हम करबू का,
अब हम करबू का।

पांच वर्ष की कन्या को साठ वर्ष के बूढ़े के गले बांध दो तो बेचारी अपना करम पीट कर यही कहेगी-‘अब हम करबू का, अब हम करबू का ?” सही है न, महाराज !”

राजा बोला, “पंडितानी, तुम्हारी यह बात भी सही लगी।”
चौथा पहर हुआ तो पक्षी ने चोंच खोली :
“सब बम्मन मर जायें,
सब बम्मन मर जायें !”
तभी राज ने ब्राह्मणी से कहा, “सुनो, पंडितानी, पक्षी जो कुछ कह रहा है, क्या वह उचित है ?”
ब्रहाणी मुस्कायी और कहने लगी, “महाराज ! मैंने पहले ही कहा है कि पक्षी अधकट बात कहता है। वह तो ऐसे सब ब्राह्मणों के मरने की बात कहता है :
विश्वा संगत जो करें सुरा मांस जो खायें,
बिना सपरे भोजन करें, वै सब बम्मन मर जायें
वै सब बम्मन मर जायें।

जो ब्राह्मणी वेश्या की संगति करते हैं, सुरा ओर मांस का सेवन करते हैं और बिना स्नान किये भोजन करते हैं, ऐसे सब ब्राह्मणों का मर जाना ही उचित है। जब बोलिये, पक्षी का कहना ठीक है या नहीं ?”
राजा ने कहा, “तुम्हारी चारों बातें बावन तोला, पाव रत्ती ठीक लगीं। तुम्हारी बुद्धि धन्य है !”
राजा-रानी ने उसको बढ़िया कपड़े और गहने देकर मान-सम्मान से विदा किया। अब पुरोहित का आदर भी राजदरबार में पहले से अधिक बढ़ गया।

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आलसियों का आश्रम- लोक-कथा

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एक बार एक राज्य में बहुत सारे लोग आलसी हो गए। उन्होंने सारा कामधाम करना छोड़ दिया। यहाँ तक कि अपने लिए खाना बनाना भी छोड़ दिया और खाने के लिए दूसरों पर निर्भर रहने लगे। ज्यादातर समय वे लेटे रहते या सोते रहते।

खाने की समस्या का निराकरण जरूरी था क्योंकि इन आलसियों को खिलाने में लोग आनाकानी करने लगे। एक दिन सभी आलसियों ने राजा से मांग की की सभी आलसियों के लिए एक आश्रम बनवाना चाहिए और उनके खाने की व्यवस्था करनी चाहिए।

राजा नेक और दयालु होने के साथ साथ बुद्धिमान था। उसने कुछ सोचकर मंत्री को एक आश्रम बनाने का आदेश दिया। आश्रम के तैयार होने पर सभी आलसी वहाँ जाकर खाने और सोने लगे।

एक दिन राजा अपने मंत्री और कुछ सिपाहियों के साथ वहाँ आया और उसने एक सिपाही से कहकर आश्रम में आग लगवा दी। आश्रम को जलता देख आलसियों में भगदड़ मच गई और सभी जान बचाने के लिए आश्रम से दूर भाग गए।

जलते हुए आश्रम में दो आलसी अभी भी सोये हुए थे। एक को पीठ पर गर्मी महसूस हुई तो उसने पास ही में लेटे दूसरे आलसी से कहा, “मुझे पीठ पर गर्मी लग रही है, ज़रा देखो तो क्या माजरा है ?”

“तुम दूसरी करवट लेट जाओ”, दूसरे आलसी ने बिना आखें खोले ही उत्तर दिया।

यह देखकर राजा ने अपने मंत्री से कहा, “केवल ये दोनों ही सच्चे आलसी हैं। इन्हें भरपूर सोने और खाने को दिया जाए। शेष सारे कामचोर हैं। उन्हें डंडे मार मार कर काम पर लगाया जाए।”

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दरख़्त रानी- लोक-कथा

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पुराने ज़माने में किसी गाँव में एक बूढ़ा आदमी रहता था। उसकी शादी को 20 साल हो गए थे पर वह औलाद की दौलत से महरूम था। भगवान की कृपा से बूढ़े की औरत का पाँव भारी था। नई-नई चीज़ें खाने को उसका जी चाहता था। बूढ़ा भी अपनी बिसात के मुताबिक़ उसे खाने की चीज़ें ला कर देता था।

एक रोज़ बूढ़े की बीवी को खट्टे-मीठे बेर खाने की बहुत ख़्वाहिश हुई। गरमी के मौसम में बेर कहाँ मिलते हैं। फिर भी बूढ़ा बेरों की तलाश में जंगलों में भटकता रहा। एक दिन जंगलों में इधर-उधर बेर तलाश करते हुए वह एक तालाब के किनारे पहुँचा तो एक बेर की झाड़ी नज़र आई। बूढ़े को बहुत खुशी हुई। वह अपने दोनों हाथों से बेर इकट्ठे करने लगा।

अभी झोली भर बेर ही तोड़े थे कि एक आदमख़ोर मगरमच्छ ने अपना बड़ा सा मुँह पानी से ऊपर निकाला और ज़ोर से साँस खींची। उसके साँस लेने से एक ज़ोरदार आँधी चली और बूढ़ा कमज़ोरी की वजह से अपने को न संभाल पाया और तालाब में आ गिरा। बूढ़ा अपने को संभालते हुए किनारे तक पहुँचना ही चाहता था कि मगरमच्छ ने इसके पाँव ही पकड़ लिए। बूढ़ा उससे कहने लगा,‘‘भाई खट्टे-मीठे बेरों की तलाश में मेरे पाँव घिस गए और फिर जब बेर मिले तो मेरे रास्ते में तू रोड़ा बनता है।’’

‘‘तेरी यह मक्कारी मुझपर कोई असर नहीं करेगी। बहुत दिनों से इंसान का गोश्त खाने को नहीं मिला। तेरी करारी ह़ड्डियों को चबाने में मुझे बहुत मज़ा आएगा। आज मैं तुझे खाऊँगा।’’ मगरमच्छ ने लार टपकाते हुए कहा।
‘‘क्यों। मुझे तू क्यों खाएगा’’
‘‘इसलिए क्योंकि तूने मुझसे बगैर इजाज़त लिए मेरे बेर लिए हैं।’’

‘‘भाई मैं यह बेर बहुत मजबूरी में ले रहा हूँ। मेरी बीवी की हालत कुछ ऐसी है। मैं और मेरी बीवी अब और ज़्यादा इंतज़ार नहीं कर सकते।’’ बूढ़े की बात सुनकर मगरमच्छ समझ गया।

‘‘ओह’’ अगर यह बात है तो मैं तुझे नहीं खाऊँगा। तू अपनी राह ले लेकिन मेरी एक शर्त है। ‘‘क्या शर्त’’ है। बूढे़ ने पूछा।
‘‘अगर लड़का होगा तो तेरा और लड़की हुई तो मेरी।’’

‘‘मंजूर’’ कहकर वह बेरों की झोली संभालते हुए चल दिया। वह अपने दिल में सोचने लगा कि मगरमच्छ उसे फिर कहाँ मिलेगा और अगर उसके यहाँ लड़का पैदा हुआ तो फिर तो परेशानी की कोई बात ही नहीं।

बूढ़ा अपनी बीवी की आव भगत में कोई कमी नहीं करता था। दिन पर लगा कर उड़ते रहे और एक दिन बूढ़े के घर एक खूबसूरत और बहुत तंदरूस्त लड़की पैदा हुई। बच्ची को देखकर उसे मगरमच्छ की बात याद आई तो वह काँप उठा। लड़की का रंग गुलाब के फूल की तरह था। उसकी आँखे हीरों की तरह चमकदार थीं। वह परियों की तरह हसीन और मासूम थी। ऐसी मन्नतों और मुरादों की लड़की मगरमच्छ के पेट में जाए यह सोचकर बूढ़ा दुख से काँपने लगा। उसने सोचा कि अब वह कभी तालाब के किनारे नहीं जाएगा।

बारिश का मौसम आया और नदी में बाढ़ आ गई। मगरमच्छ पानी में बह कर तालाब से निकल कर खेत में आ गया। अब उसे आसानी से शिकार मिलने लगा। एक दिन बूढ़ा खेत से सब्ज़ी तोड़कर ला रहा था तो रास्ते में मगरमच्छ ने उसे रोककर सवाल किया।

‘‘क्यों बे बुडढ़े! मुझसे छुपता क्यों है? तू मुझसे छुप कर कहाँ भागेगा। सीधी तरह बता तेरे यहाँ लड़की हुई या लड़का।’’
‘‘लड़की हुई है।’’ बूढ़े ने सहमी हुई आवाज़ में कहा।
‘‘तो फिर वह मेरी है। मेरी अमानत को अब तक तूने अपने पास क्यों रखा है। क्या तू अमानत में ख़्यानत करना चाहता है।’’
‘‘इतनी छोटी बच्ची को तुझे कैसे दे दूँ?’’ बूढ़े ने कहा।

‘‘चौदह साल पहले तूने मुझसे वादा किया था। क्या वह अब भी बच्ची है। तू बाप की नज़र से देखता है वह अगर बूढ़ी भी हो जाएगी तब भी वह बच्ची ही रहेगी। तू मुझे अब और बेवकूफ़ नहीं बना सकता। मैं तुझे चैन से रहने नहीं दूंगा। देख! अगर तूने लड़की को कल ही लाकर मुझे नहीं दिया तो मैं तुम तीनों को एक-एक कर ख़्तम कर दूँगा।’’ मगरमच्छ ने कहा।

‘‘वह मेरी बेटी है। अपना खून तुझे मैं कैसे दे दूँ? लोग क्या कहेंगे?’’ बूढ़े ने सवाल किया।

‘‘लोग क्या कहेंगे वह मैं नहीं जानता। तू क्या कहता है? वादा ख़िलाफ़ी करना चाहता है?’’ मगरमच्छ ने गुस्से से चिल्लाकर कहा।

‘‘नहीं नहीं! यह बात नहीं है। मै चाहता हूँ कि मेरी बेटी को इस बात का पता न चले। और।।।’’ बूढ़ा कहते-कहते रुक गया। ‘‘तू क्या चाहता है बोल।’’ मगरमच्छ ने कहा।

‘‘मेरी लड़की को कमल का फूल बहुत पसंद है। तू अपनी पीठ पर एक कमल का फूल रखकर तालाब के अंदर पानी के नीचे बैठे रहना। जब लड़की खुशी से इसे लेने जाएगी तो इसे तू ले जाना।’’ मगरमच्छ को यह तरकीब पसंद आई।

दूसरे दिन जब बूढ़े ने अपनी बीवी को बताया तो लड़की की माँ परेशान हो गई। वह अपने आपको कोस रही थी कि क्यों उसने बेर खाने की ख़्वाहिश की। आज उसकी बेटी मौत के मुँह में जा रही थी। भगवान उसे मौत क्यों नहीं देता। उसका दिल रो रहा था लेकिन वह लड़की से कह रही थी, ‘‘बेटी! कितने दिन हुए नानी के घर तू नहीं गई। वह तुझे याद कर रही है। तू आज अपने बाप के साथ नानी के घर जाएगी। दो दिन रहकर वापस आ जाना।’’

बूढ़े की बेटी मगरमच्छ को सामने देखकर घबरा गई और चीख़ने लगी लेकिन उसकी चीख़ जंगल में गूंज कर रह गई पर उसका बाप वापस नहीं आया। मगरमच्छ उसको अपने बड़े-बड़े पंजों में पकड़ कर तालाब के दूसरे किनारे एक गुफा के अंदर ले गया और वहाँ लड़की को छोड़कर वापस आ गया

ननिहाल जाने की बात सुनकर बेटी को खुशी हुई। उसके लिए मामू का घर जन्नत से कुछ कम नहीं था। वहाँ की हर चीज़ उसे पसंद थी। वहाँ का चाँद खूबसूरत था। वहाँ के फूल खूबसूरत और फल रसीले थे। नानी के घर जाने की ख़बर सुनकर वह खुशी से नए कपड़े पहन कर तैयार हो गई थी। बूढ़ा उसे लेकर जंगल और नाले पार करता हुआ उस तालाब के किनारे पहुँचा और बेटी को तालाब के किनारे बैठा कर बोला, ‘‘बेटी तू यहाँ बैठी रह। मैं अभी आया।’’ बूढ़ा चला गया लेकिन वापस नहीं आया।

उधर बेटी को एक बेहद खूबसूरत कमल का फूल नज़र आया। वह सोचने लगी कि इतना खूबसूरत कमल तालाब के बिल्कुल किनारे खिला है लेकिन उसे अभी तक किसी ने हाथ नहीं लगाया! हो सकता है किसी की नज़र उस पर न पड़ी हो। बूढे की बेटी धीरे से पानी के अंदर गई। कमल के फूल की तरफ हाथ बढ़ाते ही कमल थोड़ा आगे खिसक गया। लड़की डर कर अपने बाप को पुकारने लगी।

घुटने पानी हुआ है बाबा
कमल खिसकता जाता है

वह फिर आगे बढ़ने लगी। कमल फिर से खिसक गया। लड़की चीख़ कर अपने बाप को पुकारने लगी।

छाती पानी हुआ है बाबा
कमल खिसकता जाता है

बाप वहाँ होता तो जवाब देता। उसे डर लग रहा था वह सोच रही थी कि वापस चली जाए। उसी वक़्त बड़ी-बड़ी लाल आँखों वाला मगरमच्छ मुँह खोले पानी की सतह पर दिखाई दिया। बूढ़े की बेटी मगरमच्छ को सामने देखकर घबरा गई और चीख़ने लगी लेकिन उसकी चीख़ जंगल में गूंज कर रह गई पर उसका बाप वापस नहीं आया। मगरमच्छ उसको अपने बड़े-बड़े पंजों में पकड़ कर तालाब के दूसरे किनारे एक गुफा के अंदर ले गया और वहाँ लड़की को छोड़कर वापस आ गया।

लड़की की मासूमियत और खूबसूरती को देखकर उसे खाने का इरादा इस वक़्त उसने छोड़ दिया। राहगीर जो तालाब में नहाने या पानी पीने आते थे, उन्हें वह पेट भरकर खाता और उस आदमी के पास खाने का जो सामान होता उसे लाकर इस लड़की को देता। लड़की इस गुफा में पड़ी रहती। पर मगरमच्छ के डर से वह कुछ बोलती नहीं थी।

इस तरह दिन गुज़रते गए। चारों तरफ इस तालाब का मगरमच्छ आदमखोर के नाम से मशहूर हो गया था। डर के मारे कोई राहगीर इस तालाब की तरफ़ नहीं आता था। मगरमच्छ भूख से बेक़रार होने लगा। उसने तालाब की बड़ी-बड़ी मच्छलियों को खाकर ख़त्म कर दिया। अब वह भूख के मारे मरने लगा। जंगल की गाय-बकरी भेड़ भी वह भूख की शिद्दत में खा गया। अब उसके डर से वहाँ कोई जानवर भी पानी पीने नहीं आता था। जब उसे ज़ोर की भूख सताने लगी तो वह बूढ़े की बेटी के क़रीब आकर उसे अपनी लाल और ललचाई आँखों से घूरने लगा। बूढ़े की बेटी समझ गई कि अब उसकी बारी थी। लेकिन मगरमच्छ ने उसे उस दिन नहीं खाया। सोचने लगा कि अब उसके दाँतों में धार नहीं थी। उन्हें लुहार से तेज़ कराने के बाद उस लड़की को खाएगा। यह सोचकर वह लुहार के पास चला गया।

इधर बूढ़े की बेटी अपनी जान बचाने की तरकीब सोचने लगी। गुफा में जितने सोने-चाँदी के ज़ेवरात मगरमच्छ ने लाकर रखे थे। उसने सबको इकट्ठा किया और एक टोकरी में रखकर सूखे पत्ते और छोटी-छोटी लकड़ियों से उसे ढँक लिया और अपने जिस्म पर कीचड़ लेप कर अपनी सूरत एक अंधी बुढ़िया जैसी बना ली और टोकरी कमर पर लादकर लाठी टेकते-टेकते जाने लगी। जैसे ही गुफा से बाहर निकली उसी वक़्त मगरमच्छ आ गया और दहाड़ कर पूछने लगा।।।‘‘तू कौन है?’’ बूढ़े की बेटी डर से काँपने लगी लेकिन बाद में ख़ुद को संभालते हुए कहने लगी।।।

मैं अँधी बूढ़ी हूँ
हड्डियो की लड़ी हूँ

‘‘मेरे बदन में क्या है जो तू खाएगा? तू अपनी गुफा को जा। वहाँ तेरे लिए एक तंदरूस्त लड़की मौजूद है। उसकी हड्डियाँ चबाने में तुझे मज़ा आएगा।’’

मगरमच्छ उसे पहचान न सका उसके मुँह में इंसानी गोश्त के मज़े को सोचकर पानी आ गया और वह तेज़ी से गुफा के अंदर चला गया। बूढ़े की बेटी उससे छुटका मिलते ही घबरा कर दौड़ने लगी और घने जंगल में गुम हो गई।

वह सोच रही थी कि जिस माँ-बाप ने उसे धोखा देकर मगरमच्छ के हवाले कर दिया। वह उनके पास नहीं जाएगी। वह यही कुछ सोचते हुए घने जंगल में चली जा रही थी कि उसे शेर की गरज सुनाई दी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह ख़ौफ़ के मारे इधर-उधर छुपने की जगह ढूंढने लगी। इतनी देर में एक हाथी के बराबर ऊँचा और बड़ा शेर उसके सामने आ गया। डर के मारे वह सामने एक बड़े बरगद के दरख़त के तने से चिपट गई और रो-रो कर मजबूरन दरख़्त से दरख्वास्त करने लगी।।।‘‘ऐ दरख़्त तू फट जा मैं तुझमें समा जाऊँ और तू बंद हो जा।’’ यह सुनते ही दरख़्त सचमुच फट गया और वह उसके अंदर चली गई और दरख़्त बंद हो गया।

एक दिन एक राजकुमार शिकार करने के लिए उसी जंगल में आया। वह दातुन के लिए एक शाख़ काटने लगा कि उसके कानों में ये आवाज़ आई।।।

राजकुमार धीरे काट कहीं
मेरी आँख फूट न जाए
मेरी नाक काट न जाए
मेरा हाथ टूट न जाए

यह सुरीली आवाज़ सनकर राजकुमार को हैरत हुई। और वह दातुन लिए बग़ैर राजमहल वापिस चला आया। वह रात भर उसी जादुई दरख़्त के बारे में सोचता रहा। राजमहल में राजकुमार की शादी की तैयारियाँ हो रही थीं। ज्योतिषी और पुरोहित राजकुमार को समझा रहे थे लेकिन राजकुमार की बस एक ही ज़िद थी कि वह उसी दरख़्त से शादी करेगा। अगर उसकी शादी उस दरख़्त से नहीं हुई तो वह अपनी जान दे देगा। राजकुमार राजा की इकलौती औलाद था। उसकी नज़र में शादी की अहमियत बेटे की ज़िंदगी से कम ही थी। इसलिए राजकुमार की ख़्वाहिश पूरी की गई। उसी दरख़्त के साथ उसकी शादी की रस्म अदा की गई।

राजकुमार ने उस दरख़्त को वहाँ से उखाड़कर अपने महल के पास बाग़ में लगवा लिया। बूढ़े की बेटी रात गए दरख़्त से निकलती और महल के अंदर जाकर सब काम पूरे करती और सुबह होते ही वापस दरख़्त के अंदर चली जाती। एक रोज़ राजकुमार ने छुपकर बूढ़े की बेटी के ये सब काम देखे। दूसरे दिन जब बूढ़े की बेटी दरख़्त से निकल कर महल के अंदर गई तो राजकुमार ने उस दरख़्त को आग लगाकर भस्म कर दिया।

बूढ़े की बेटी दौड़ती हुई आई और बोली,‘‘आह। तुमने यह क्या किया?’’

इस पर राजकुमार ने कहा, ‘‘इतना बड़ा महल है तुम इसमें रह सकती हो। इस खूबसूरत बाग़ में घूम सकती हो। बेवजह इस दरख़्त के अंधेरे में क्यों सड़ती रहती हो। और फिर मैं तुमसे बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ मैंने तुम्हें अपनी रानी बना लिया है। मैं तुम्हारे बिना जी न सकूंगा।!’’

लड़की तो सिर्फ़ मोहब्बत की भूखी थी। लड़की को लगा कि जैसे सारे जहाँ की खुशी उसे मिल गई हो। उस दिन के बाद दोनों राजमहल में हँसी खुशी रहने लगे।

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लोहा खा गया घुन- लोक-कथा

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एक बार की बात है दो व्यक्ति थे, जिनका नाम था मामा और फूफा। मामा और फूफा दोनों व्यापार करते थे और दोनों व्यापार में सहभागी थे। मामा ने फूफा से कहा,” फूफा क्यों ना हम कोई ऐसी वस्तु खरीद लें जो जल्दी खराब ना हो और उसकी कीमत भी बढती रहे; फिर हम उसे कुछ वर्षो बाद बेचें जिससे उसके मूलधन से ज्यादा दाम मिले।”

फूफा ने कहा,”ठीक है मामा, तुम्हारी बात तो सही है, पर हम खरीदें क्या?”

उन्होंने आपस में राय-मशवरा किया और लोहा खरीदने का निर्णय लिया। दोनों ने बराबर रूपये मिला कर लोहा खरीदा। फूफा ने मामा से कहा कि लोहा वह कहीं सूरक्षित स्थान पर रख दे।
मामा ने लोहा अपने पास एक पुरानी कोठरी में रख लिया।
कुछ दिन तो लोहा जस का तस रखा रहा पर धीरे-धीरे मामा के मन में लालच आ गया और मामा फूफा को बिना बताये लोहा बेचने लगा।
काफी दिनों बाद फूफा मामा के पास गया और बोला,”मामा आज लोहे का भाव काफी बढ़ गया है, जल्दी से वह लोहा निकालो, हम इसे बेच-कर आते हैं।”
इस पर मामा बोला, “फूफा लोहा तो अब कबाड़ घर में नहीं है, क्योंकि लोहे को तो घुन खा गये हैं।”
फूफा समझ गया की मामा ने उसके साथ धोखा किया है। और उसे बिना बताये सारा का सारा लोहा बेच दिया है। फूफा को क्रोध तो बहुत आया पर वह बिना कुछ कहे-सुने वहां से चला गया\

इस घटना के कुछ दिनों बाद फूफा मामा के पास आया और बोला,”मामा मैं एक बारात में जा रहा हूँ, बड़ा अच्छा इंतजाम है, अकेला हूँ चाहो तो अपने लड़के को साथ भेज दो, उसकी भी मौज हो जायेगी और कल सुबह तक हम वापस भी आ जायेंगे।”
मामा बोला,”क्यों नहीं, बेशक तुम मेरे लड़के को अपने साथ लेकर जाओ। और हां इसे बारात में अच्छी तरह खाना-वाना खिला देना।”
फूफा बोला, “यह भी भला कोई कहने की बात है मामा, तुम निश्चिंत रहो।” इस तरह दो दिन बीत गए। मामा का लड़का अभी तक घर वापस नहीं आया। मामा को बहुत चिंता हो गयी की अभी तक उसका लड़का घर वापस क्यों नहीं आया है?
वह अपने लड़के के बारे में जानने के लिए फूफा के पास गया और बोला, “फूफा मेरा लड़का कहाँ है? वह अभी तक घर वापस क्यों नहीं आया है?”
फूफा ने कहा, “क्या बताऊँ मामा, रास्ते में एक चील तुम्हारे लड़के को उठा कर ले गयी।”
मामा बोला, “ये कैसे हो सकता है, भला कोई चील 12 साल के लड़के को उठा कर ले जा सकती है? सीधी तरह मेरा लड़का मुझे वापस करों, नहीं तो मैं राजा भीम के पास जाऊंगा।”
फूफा बोला,”ठीक है मामा, चलो राजा जी के पास चले, अब वही न्याय करेंगे।”
मामला वहां के राजा भीम के सामने पेश हुआ।

राजा भीम ने सारी बात सुनी और आश्चर्यचकित होते हुए फूफा से कहा, “देखो फूफा तुम झूठ बोल रहे हो, भला कोई चील 12 वर्ष के लड़के को उठा कर अपने पंजो से आसमान में ले जा सकती है?”

इस पर फूफा ने उत्तर दिया,

“कथा कहूँ कथावली, सुनो राजा भीम।
लोहा को घुनन खाय, तो लड़का ले गया चील।”

इस पर राजा भीम सब समझ गये और उन्होंने मामा को आज्ञा दी की वह फूफा का लोहा वापस कर दे। और फूफा को कहा कि वह लड़के को मामा के पास वापस पहुंचा दे।

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कमल का फूल- (भारतीय लोक-कथा)

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(कमल भारत का राष्ट्रीय पुष्प एवं उड़ीसा, कर्नाटक,
जम्मू-कश्मीर और हरियाणा का राज्य पुष्प है)

कमल के सम्बन्ध में अनेक विश्वास, मिथक एवं किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। इनमें कहीं इसे एक प्रेमी युवक बताया गया है और कहीं इसे स्वर्ग का देवता कहा गया है। एक रोचक किंवदन्ती के अनुसार कमल एक अभिशप्त प्रेमी है।

बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में एक नवयुवक रहता था। वह बहुत हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर था। उसके माता-पिता दोनों मर चुके थे। बस एक बड़ा भाई था। युवक के पास माता-पिता की दी हुई थोड़ी-सी जमीन थी। उसी पर वह अपने भाई के साथ खेती करता था। युवक और उसका बड़ा भाई दोनों बहुत मेहनत करते थे। वे खेती किसानी के साथ ही मेहनत-मजदूरी भी करते थे । लेकिन इतना सब करने के बाद भी दोनों का गुजर-बसर बहुत कठिनाई से होता था।

एक बार युवक गाँव के जमींदार के खेतों में पानी दे रहा था। सुबह का समय था। जमींदार के खेत गाँव के बाहर थे और खेतों के पास एक बड़ा-सा मैदान था। मेलों और त्योहारों के समय गाँव के लोग इसी मैदान में एकत्रित होते थे। कभी-कभी इस मैदान में बंजारे भी आ जाते थे और अपने डेरे लगा लेते थे। बंजारे कुछ दिन गाँव में रुकते और फिर आगे बढ़ जाते थे।

जमींदार के खेतों में एक बड़ा कुआँ था। युवक कुएँ से पानी खींचता और पास की नाली में डाल देता। नाली खेतों के बीच से होकर गुजरती थी। अतः पानी खेतों में पहुँच जाता था। युवक पूरे तन-मन से काम कर रहा था। अचानक उसे लगा कि कोई उसके पास खड़ा है। युवक ने पीछे मुड़कर देखा। उसके सामने एक बंजारन हाथ में मटका लिए खड़ी थी। युवक ने बंजारन को देखा तो, देखता ही रह गया। बंजारन पन्द्रह-सोलह वर्ष की थी और बहुत सुन्दर थी। युवक ने आज तक कभी इतनी सुन्दर लड़की नहीं देखी थी।

बंजारन युवक को बड़ी देर से देख रही थी। उसने अपने जीवन में इतना हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर युवक कभी नहीं देखा था। बंजारन युवक के पास पानी लेने आई थी, लेकिन वह उस पर इतनी मुग्ध हो गई कि पानी माँगना भूल गई थी और उसे एकटक देखे जा रही थी।

युवक ने बंजारन को अपनी ओर प्यार भरी नजरों से एकटक घूरते हुए देखा तो घबरा गया। उसके हाथ से रस्सी छूट गई और बाल्टी सहित कुएँ में जा गिरी।

बंजारन ने युवक की यह स्थिति देखी तो खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसने युवक से कोई बात नहीं की और दौड़ती हुई अपने डेरे में आ गई। उसने डेरे से एक पतली रस्सी और काँटा उठाया और युवक के पास वापस आ गई।

युवक अब अपने पर पूरी तरह नियन्त्रण कर चुका था। वह मुस्करा रहा था और बंजारन को बड़े प्यार से देख रहा था।
बंजारन ने काँटा कुएँ के भीतर डाला और कुछ ही क्षणों में रस्सी और बाल्टी बाहर निकाल दी।
युवक बंजारन की आँखों की भाषा समझ चुका था। उसने बंजारन का घड़ा भरा और बिना कोई बात किए रस्सी-बाल्टी लेकर अपने घर आ गया।

युवक को रातभर नींद नहीं आई। वह सारी रात आँखें बन्द किए बंजारन के बारे में सोचता रहा। बंजारन बहुत सुन्दर थी।

अगले दिन प्रातःकाल युवक पुनः जमींदार के खेतों में पानी देने के लिए कुएँ पर आ पहुँचा। उसकी आँखें अलसाई हुई थीं और आज उनमें पहले जैसी ताजगी नहीं थी।

युवक ने कुएँ पर पहुँचकर अभी एक बाल्टी पानी भरा था कि बंजारन पुनः आ गई। ऐसा लगता था कि वह अपने डेरे के पास खड़ी उसी की राह देख रही थी।
दोनों ने एक-दूसरे को देखा और आँखों ही आँखों में बहुत-सी बातें हो गईं।
युवक के मन की बात जानने के बाद बंजारन उसे अपने डेरे में ले आई और उसे अपने बापू से मिलाया।

बंजारन का बापू बहुत लालची आदमी था। उसे जब यह मालूम हुआ कि युवक एक गरीब किसान है, तो उसने उसके साथ बंजारन का विवाह करने से साफ मना कर दिया। लेकिन बंजारन की माँ के बहुत समझाने पर वह इस शर्त पर अपनी बेटी का विवाह करने के लिए तैयार हुआ कि ग्रामीण युवक उसे पाँच सौ चाँदी के सिक्के लाकर देगा। बंजारन के बापू ने युवक से साफ-साफ कह दिया कि पाँच माह बाद नवदुर्गा की अष्टमी के दिन कामाख्या मन्दिर में वह बकरे की बलि चढ़ाएगा। इस दिन तक यदि उसे चाँदी के सिक्के मिल जाएँगे तो वह कामाख्या मन्दिर में ही अपनी बेटी का विवाह कर देगा और यदि युवक चाँदी के सिक्के नहीं ला सका तो वह अपनी बेटी किसी और को सौंप देगा।

युवक ने बंजारन के बापू की शर्त मान ली। वह शरीर से हृष्ट-पुष्ट और मजबूत होने के साथ ही बड़ा साहसी भी था। उसे विश्वास था कि वह किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके चाँदी के पाँच सौ सिक्के इकट्ठे कर लेगा।

बंजारे तीन दिन गाँव में रुककर चले गए। उनके साथ बंजारन भी चली गई। ग्रामीण युवक अपनी बंजारन को जाते हुए देखता रहा। बंजारन भी उसे बार-बार मुड़-मुड़कर देख रही थी।

बंजारन के जाने के बाद युवक अपने घर आ गया। उसे पाँच महीने में पाँच सौ चाँदी के सिक्के कमाने थे। युवक ने बहुत सोच-विचार किया। इतना धन उसे केवल जमींदार ही दे सकता था।

अगले दिन युवक जमींदार की हवेली पहुँचा और उसने जमींदार को अपनी समस्या बताई। जमींदार ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनी। वह युवक को सौ सिक्के प्रतिमाह इस शर्त पर देने के लिए तैयार हो गया कि वह दिन-रात जमींदार का काम करेगा और सभी तरह के काम करेगा।

युवक ने जमींदार की बात मान ली और जमींदार की सेवा में लग गया | युवक बहुत मेहनती था | वह दिनभर जमींदार के खेतों में काम करता और रात को जमींदार की हवेली में आ जाता। और जमींदार उसे जो भी काम देता, वह करता। दिन-रात मेहनत करने के बाद युवक बीमार भी पड़ा, किन्तु उसने बीमारी में भी जमींदार के सभी कार्य किए।
धीरे-धीरे एक महीना हो गया।

युवक अपने चाँदी के सौ सिक्के लेने जमींदार के पास पहुँचा, लेकिन जमींदार ने चौँदी के सिक्के देने से इनकार कर दिया। उसने युवक से साफ कह दिया कि उसकी इस तरह की कोई बात उसके साथ नहीं हुई थी।

युवक को क्रोध आ गया। उसने जमींदार को बहुत बुरा-भल्ना कहा और उसे उठाकर पत्थर की एक चट्टान पर पटक दिया । इससे जमींदार का सिर फट गया और वह मर गया।

इसी समय जमींदार के घरवाले और उसके नौकर-चाकर आ गए। लेकिन इसके पहले कि वह युवक को पकड़ पाते, वह भाग निकला।

जमींदार के नौकरों ने उसका पीछा किया, किन्तु वे युवक को पकड़ नहीं सके और खाली हाथ वापस आ गए।

युवक भागता रहा, भागता रहा और भागते-भागते बंगाल आ पहुँचा । यह एक नया स्थान था। युवक को लगा कि वह यहाँ सरलता से चाँदी के पाँच सौ सिक्के कमा लेगा और अपनी बंजारन को ले आएगा और यहीं बस जाएगा। उसके लिए अब गाँव वापस लौटना खतरे से खाली नहीं था।

युवक को काम की खोज करते-करते तीन दिन हो गए। लेकिन उसे कहीं कोई काम नहीं मिला। इस बीच उसने कुछ भी खाया-पिया नहीं था, अतः भूख से उसकी हालत खराब हो रही थी।

चौथे दिन प्रातः युवक एक बगीचे में बैठा हुआ कुछ सोच रहा था। इसी समय उसके पास एक सुन्दर युवती आकर खड़ी हो गई और उसे देखकर मुस्कराने लगी।

युवक को लगा कि वह स्त्री उसकी कुछ सहायता करना चाहती है। उसने उसे अपने पास बैठाया और सारी बातें बता दीं।

सुन्दर स्त्री ने युवक की बातें बड़े ध्यान से सुनीं। उसने उसे सभी प्रकार से सहायता करने का विश्वास दिलाया और अपने महल में ले आई। सुन्दर स्त्री का महल बड़ा आलीशान था।
सुन्दर स्त्री ने युवक को भोजन कराया और आराम करने के लिए एक शानदार बिस्तर दिया।
युवक बहुत थका था। अतः भोजन करने के बाद उसे नींद आ गई।

युवक कब तक सोता रहा, इसका उसे पता ही नहीं चला, लेकिन जब उसकी आँख खुली तो आधी रात हो चुकी थी। चन्द्रमा का हल्का प्रकाश एक खिड़की से कमरे के भीतर आ रहा था।
युवक उठकर खड़ा हो गया। उसने इधर-उधर देखा। सुन्दर स्त्री का कहीं पता नहीं था। युवक को बड़ा आश्चर्य हुआ।

अचानक युवक के कानों से सुन्दर स्त्री के गाने की आवाज टकराई । इस आवाज में गजब का आकर्षण था। युवक को ऐसा लगा कि मस्ती भरा गीत गाकर वह उसे बुला रही है।

युवक अपने पर नियन्त्रण नहीं रख सका और आवाज की ओर बढ़ा। कुछ कदम चलने के बाद युवक ने देखा कि भरपूर श्रृंगार किए सुन्दर स्त्री आईने के सामने खड़ी अपना रूप निहार रही है।

सुन्दर स्त्री ने आईने में युवक को देख लिया। वह उसकी ओर मुस्कराते हुए बढ़ी और उससे लिपट गई तथा उसे अपने पलंग पर ले आई।

युवक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। फिर भी वह यह तो समझ ही गया था कि सुन्दर युवती उससे क्‍या चाहती है।

इसी समय सुन्दर युवती ने उससे कहा कि यदि वह उसका साथ दे तो वह उसे अगले दिन ही चाँदी के पाँच सौ सिक्के देगी।
युवक के हृदय में बंजारन बसी थी। वह किसी स्त्री के साथ सोना नहीं चाहता था। लेकिन अपनी बंजारन को पाने के लिए उसने सुन्दर युवती की बात मान ली।

अगले दिन फिर यही हुआ। युवक दिन भर सोया और आधी रात के बाद उठा। उसे सुन्दर युवती सोलह श्रृंगार किए प्रतीक्षा करती मिली। उसने उससे कहा कि बस वह एक रात का सुख उसे और दे दे। इसके बाद वह उसे चाँदी के पाँच सौ सिक्‍के दे देगी।

धीरे-धीरे चार महीने हो गए। सुन्दर स्त्री युवक को रोज आधी रात के बाद छलती और उससे अगले दिन चाँदी के पाँच सौ सिक्के देने का झूठा वादा कर देती।

युवक के लिए अब और प्रतीक्षा करना कठिन हो रहा था। एक रात उसने सुन्दर स्त्री का साथ देने से मना कर दिया। सुन्दर युवती ने उसे बहुत समझाया। उसके समझाने का जब युवक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो उसने तरह-तरह की धमकियाँ दीं । जब धमकियों का भी युवक पर असर नहीं हुआ तो वह क्रोध में आ गई और उसने रौद्र रूप धारण कर लिया।

वास्तव में सुन्दर युवती एक जादूगरनी थी। उसे जब लगा कि युवक उसकी बात किसी कीमत पर नहीं मानेगा तो उसने अपनी जादुई शक्ति से उसे एक फूल बना दिया और अपने बगीचे के तालाब में लगा दिया।

इधर बंजारन ने युवक की पाँच माह तक प्रतीक्षा की, लेकिन जब युवक नहीं आया तो वह उसकी खोज में निकल पड़ी।

एक दिन अचानक बंजारन जादूगरनी के महल में आ पहुँची | प्रातःकाल का समय था। जादूगरनी अलसाई-सी महल के एक कमरे से बाहर देख रही थी। उसने एक बंजारन को अपने महल के सामने देखा तो उसे शक हुआ कि कहीं यह वही बंजारन तो नहीं है?

बंजारन को देखते-देखते जादूगरनी के मन में यह विचार आया कि बंजारन को बहला-फुसलाकर महल में रोक लिया जाए और उसकी सहायता से युवक के साथ मनमानी की जाए।

यह विचार आते ही जादूगरनी महल के द्वार पर आई और बंजारन को महल के भीतर ले गई। उसने बंजारन को युवक की पूरी कहानी बताई। उसने बंजारन को यह भी विश्वास दिलाया कि वह आज की रात ही उसे उसके प्रेमी से मिलवा देगी। लेकिन उसने उसे यह नहीं बताया कि उसने युवक को कमल का फूल बनाकर बगीचे के तालाब में लगा दिया है।

बंजारन खुश हो गई। उसे लगा कि सामने खड़ी स्त्री एक देवी है और वह उसकी इच्छा अवश्य पूरी कर देगी।

जादूगरनी ने बंजारन से दिनभर अच्छी-अच्छी बातें कीं और उसके प्रेमी युवक की बहुत प्रशंसा की। उसे जब लगा कि बंजारन उसके जाल में पूरी तरह फँस चुकी है तो उसने बंजारन से कहा कि वह भी उस युवक को बहुत प्यार करती है, अतः दोनों को उसका प्यार बराबर-बराबर मिलना चाहिए।

बंजारन को जादूगरनी से ऐसी आशा नहीं थी। वह सब कुछ बाँट सकती थी, लेकिन अपना प्यार नहीं बाँट सकती थी। वह अपना प्यार पाने के लिए ही अपना घर-बार छोड़कर आई थी।

जादूगरनी ने बंजारन को समझाने का बहुत प्रयास किया, किन्तु बंजारन नहीं मानी और भड़क उठी।
जादूगरनी को भी क्रोध आ गया। उसने अपने जादू से बंजारन को एक कीड़ा बना दिया।

बंजारन को सब समझते देर नहीं लगी। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। फिर भी वह खिड़की के रास्ते महल के बाहर आ गई।

इसी समय कीड़ा बनी बंजारन के कानों से उसके प्रेमी युवक की आवाज टकराई। यह आवाज उसे अपने पास बुला रही थी। बंजारन ने इधर-उधर देखा। यह आवाज महल के तालाब में खिल रहे एक कमल से आ रही थी।

बंजारन की समझ में सब आ गया। जादूगरनी ने उसके प्रेमी को कमल बना दिया था। वह तेजी से कमल के पास पहुँची और उसमें समा गई। इसी समय खिला हुआ कमल बन्द हो गया।

जादूगरनी बहुत क्रोध में थी। वह कीड़ा बनी बंजारन को ढूँढ़ते-दूँढ़ते बगीचे के तालाब तक आ गई, लेकिन उसे वह नहीं मिली।

इसी समय कमल मुरझाया और अपने भीतर कीड़ा बनी बंजारन को लिए हुए पानी में समा गया।

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आर्किड के फूल- अरुणाचल प्रदेश की लोक-कथा

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आर्किड और आर्किड जैसे सुन्दर फूलों के सम्बन्ध में लोगों में अनेक प्रकार के विश्वास और किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं।

कहते हैं कि किसी समय एक बड़ा नेक और ईमानदार राजा राज्य करता था। उसके राज्य में ऊँचे-ऊँचे पहाड़, घने जंगल, हरे-भरे बगीचे, कल-कल करती नदियाँ और सुन्दर-सुन्दर पशु-पक्षी थे। राजा अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखता था। अतः उसकी प्रजा बहुत सुखी थी। उसके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं थी।

राजा का परिवार बहुत छोटा था-एक रानी और एक राजकुमारी | राजा के कोई बेटा नहीं था। अतः रानी और राज्य के महामन्त्री, सेनापति, राजगुरु आदि ने राजा को सुझाव दिया कि वह दूसरा विवाह कर ले, किन्तु राजा ने उनकी बात नहीं मानी। राजा रानी को बहुत प्यार करता था और किसी भी कीमत पर दूसरा विवाह करना नहीं चाहता था।
धीरे-धीरे कई वर्ष बीत गए।

राजा का जीवन बहुत सुखी था। उसकी बेटी अब बड़ी हो गई थी। राजकुमारी भी अपनी माँ के समान सहृदय, कोमल और अद्वितीय सुन्दरी थी। उसके रूप और सौन्दर्य की चर्चा आसपास के राज्यों में होने लगी थी। राजा के पास आसपास के राजाओं ने अपने राजकुमारों के विवाह प्रस्ताव भेजने आरम्भ कर दिए थे। लेकिन राजकुमारी अभी विवाह की इच्छुक नहीं थी, अतः राजा ने किसी भी विवाह प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था।

राजकुमारी का महल बहुत शानदार था। उसके महल के पीछे एक हरा-भरा बगीचा था। इस बगीचे में बहुत सुन्दर-सुन्दर वृक्ष थे, जिन पर बड़े स्वादिष्ट फल लगते थे। राजकुमारी प्रतिदिन प्रातःकाल अपनी सखियों के साथ महल के पीछे बगीचे में आ जाती थी और तेज धूप निकलने के पहले तक यहीं रहती थी। तेज धूप होते ही वह महल में आ जाती थी। बगीचे में टहलना राजकुमारी का सबसे प्रिय शौक था।

राजकुमारी के महल के बगीचे में एक बावड़ी थी। इसका पानी बहुत साफ और स्वादिष्ट था। महल के लोग इसी बावड़ी का पानी पीते थे। बगीचे में टहलते-टहलते जब राजकुमारी थक जाती थी तो इसी बावड़ी की मुँडेर पर बैठकर आराम करती थी।

एक दिन प्रातःकाल का समय था। राजकुमारी हमेशा की तरह महल के पीछे के बगीचे में टहल रही थी। उसके साथ उसकी दो सखियाँ भी थीं। अचानक राजकुमारी को लगा कि कहीं आसपास बहुत दुर्गन्‍ध है। उसने अपनी सखियों से दुर्गन्‍ध आने की बात कही और बावड़ी की मुँडेर पर आकर बैठ गई। मुँडेर पर बैठते ही राजकुमारी की तबियत और खराब हो गई और वह अचेत हो गई।

राजकुमारी के अचेत होते ही दोनों सखियाँ घबरा गईं। उन्होंने किसी तरह राजकुमारी को सँभाला और उसे उठाकर महल के भीतर ले आईं।

राजकुमारी की एक सेविका ने राजकुमारी के अचेत होने की ख़बर राजा को दी। राजा उस समय दरबार में था। उसे जैसे ही राजकुमारी के अचेत होने का समाचार मिला तो वह राजवैद्य को लेकर राजकुमारी के महल में आ गया।

राजवैद्य ने राजकुमारी का परीक्षण किया। उसकी समझ में बस इतना आया कि राजकुमारी की बेहोशी का कारण कोई दुर्गन्‍ध है। राजकुमारी की सखियों ने भी राजा के सामने राजवैद्य को बताया कि राजकुमारी ने अचेत होने से पहले दुर्गन्‍ध की शिकायत की थी।

राजा ने यह बात मालूम होते ही अपने कई सैनिकों को बुलाया और उन्हें दुर्गन्‍ध का कारण मालूम करने के लिए राजकुमारी के बगीचे में भेजा।

सैनिकों ने बगीचे का चप्पा-चप्पा छान मारा, लेकिन उन्हें कुछ भी नहीं मिला। अचानक एक सैनिक की दृष्टि मरे हुए एक मोटे-तगड़े अधखाए चूहे पर पड़ी। इस चूहे से हल्की-हल्की दुर्गन्ध भी आ रही थी। सम्भवतः रात को बिल्ली अथवा कोई पक्षी चूहा ले आया होगा और आधा खाकर राजकुमारी के बगीचे में छोड़ गया होगा।
सेवकों ने तुरन्त जाकर राजा को खबर दी।

राजा ने शहर के बाहर चूहे को जलाकर जमीन में गाड़ने का हुक्म दिया और राजकुमारी के सिर पर स्नेह से हाथ फेरने लगे। दोपहर हो चुकी थी और राजकुमारी अभी तक अचेत थी।
धीरे-धीरे एक सप्ताह हो गया।

राजकुमारी को अभी तक होश नहीं आया था। राजवैद्य उसे तरह-तरह की औषधियाँ दे रहे थे, लेकिन उस पर किसी भी औषधि का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। राजा-रानी और राज्य के सभी लोग बहुत दुखी थे और राजकुमारी के शीघ्र होश में आने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे।

इसी तरह एक सप्ताह और बीत गया। लेकिन राजकुमारी को होश नहीं आया। इस मध्य राजवैद्य ने अपने राज्य के अन्य वैद्यों तथा पड़ोसी राज्यों के वैद्यों को भी बुलाकर उनसे परामर्श किया और राजकुमारी को बहुत प्रभावशाली औषधियाँ दीं, लेकिन सभी औषधियाँ बेअसर रहीं। राजा और रानी दो सप्ताह से राजकुमारी के पास ही बैठे हुए थे। उनसे राजकुमारी की हालत देखी नहीं जा रही थी। राजकुमारी बिना कुछ खाए पिए दो सप्ताह से अचेत पड़ी थी। राजवैद्य और उसके साथी वैद्यों की औषधियों को बेअसर होता देखकर राजा-रानी की चिन्ता बढ़ती जा रही थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें और क्या न करें।

इसी तरह एक महीना बीत गया। राजकुमारी अभी भी अचेत थी। उसका सुन्दर गुलाबी चेहरा पीला पड़ गया था एवं आँखों के चारों ओर कालिमा-सी छा गई थी। राजा-रानी, राजवैद्य और उसके साथी वैद्य सभी हिम्मत हार चुके थे। अब सभी को केवल ईश्वर का सहारा रह गया था।

एक विशाल कक्ष के मध्य पड़े पलंग पर राजकुमारी निर्जीव-सी पड़ी थी। उसके पास रानी और राजा बैठे थे। राजकुमारी से कुछ दूरी पर खड़े राजवैद्य, महामन्त्री, सेनापति, राजपुरोहित आदि आपस में राजकुमारी की बीमारी के सम्बन्ध में विचार-विमर्श कर रहे थे। अचानक महामन्त्री के मस्तिष्क में एक विचार आया।

महामन्त्री तुरन्त अपने स्थान से उठा और राजा के पास पहुँचकर हाथ बाँधकर खड़ा हो गया। महामन्त्री ने राजा को सुझाव दिया कि वह अपने राज्य में और आसपास के राज्यों में यह डुग्गी पिटवा दें कि जो व्यक्ति राजकुमारी को ठीक कर देगा उसे सोने की एक लाख मोहरें पुरस्कार में दी जाएँगी।

राजा को महामन्त्री का यह सुझाव अच्छा लगा। उसने इस सुझाव को और भी आकर्षक बनाते हुए महामन्त्री से कहा कि वह यह डुग्गी पिटवा दे कि जो व्यक्ति राजकुमारी को ठीक कर देगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में दिया जाएगा।

महामन्त्री ने राजा की आज्ञा पाकर अपने राज्य में और आसपास के राज्यों में यह डुग्गी पिटवा दी और पुरस्कार में आधे राज्य की घोषणा कर दी।

अगले दिन से ही एक से एक बढ़कर अनुभवी वैद्य आने लगे। वे आधे राज्य के लालच में अच्छी से अच्छी औषधि राजकुमारी को देते, किन्तु कोई लाभ नहीं होता। अन्त में वे वापस लौट जाते।

यह क्रम पन्द्रह दिन तक चलता रहा । एक लम्बा समय बीत चुका था। राजकुमारी अभी भी अचेत थी। उसकी स्थिति में अंशमात्र भी सुधार नहीं हुआ था। राजा-रानी, महामन्त्री, सेनापति, राजवैद्य, राजपुरोहित सभी निराश हो चुके थे। अब राजकुमारी के ठीक होने की कोई आशा नहीं रह गई थी।

प्रात:काल का समय था।
अचानक एक सेवक ने राजकुमारी के महल में प्रवेश किया और बताया कि एक परदेशी युवक आया है। उसका दावा है कि वह राजकुमारी को ठीक कर देगा।

राजा को आशा की एक किरण दिखाई दी। उसने सैनिक को आदेश दिया कि वह पूरे सम्मान के साथ नवयुवक को ले आए। सैनिक ने राजा की आज्ञा का पालन किया और नवयुवक को महल के भीतर ले आया।

राजा ने नवयवुक को देखा तो देखता ही रह गया। नवयुवक बीस-बाईस वर्ष की आयु का था। वह राजकुमारों के समान सौम्य और सुन्दर था। नवयुवक के चेहरे पर अजीब-सा आकर्षण और आत्मविश्वास था। राजा के साथ ही राजा के आसपास के लोग भी नवयुवक को बड़े ध्यान से देख रहे थे।

नवयुवक ने सर्वप्रथम राजा और रानी का अभिवादन किया और इसके बाद उनसे पूरी बात बताने को कहा। राजा के स्थान पर राजकुमारी की सहेली ने नवयुवक को राजकुमारी के महल के बगीचे में घूमने और दुर्गन्‍ध आने से लेकर अचेत होने तक की कहानी सुना दी।

नवयुवक पूरी बात ध्यान से सुनता रहा। इसके बाद उसने राजकुमारी को बगीचे में ले चलने के लिए कहा।

राजा ने नवयुवक से कुछ नहीं कहा। उसने राजकुमारी की सेविकाओं को आदेश दिया कि बगीचे में राजकुमारी के लिए आरामदायक बिस्तर लगाया जाए और फिर राजकुमारी को बगीचे में पहुँचाया जाए।

राजा की आज्ञा का तुरन्त पालन हुआ और बगीचे में शानदार बिस्तर लगा दिया गया। इसके बाद चार सेविकाओं ने राजकुमारी को उठाकर बगीचे में पहुँचा दिया।
नवयुवक ने राजकुमारी का बिस्तर एक वृक्ष के नीचे लगवाया था।

बसन्‍त के दिन थे। प्रातःकाल की हल्की-हल्की धूप बहुत अच्छी लग रही थी। राजकुमारी एक वृक्ष के नीचे लगे बिस्तर पर अचेत पड़ी थी। उसके चारों ओर राजा-रानी और राज्य के अन्य लोग खड़े थे। सभी की दृष्टि नवयुवक पर थी।

अचानक नवयुवक ने दोनों आँखें बन्द करके अपने हाथ आसमान की ओर उठाए और कुछ बुदबुदाने लगा। सम्भवतः वह ईश्वर की प्रार्थना कर रहा था। इसके बाद उसने अपने कपड़ों के भीतर से एक बाँसुरी निकाली और बजाने लगा।
बाँसुरी की आवाज में दैवीय आनन्द था । उसकी आवाज में ऐसा जादू था कि सभी खो गए।

अचानक एक चमत्कार हुआ । राजकुमारी जिस वृक्ष के नीचे लेटी थी वह सुगन्धित फूलों से भर उठा और उसके फूल राजकुमारी पर गिरने लगे।
अब नवयुवक बगीचे में घूम-घूमकर बाँसुरी बजाने लगा। वह बाँसुरी बजाते हुए जिस वृक्ष के नीचे से गुजरता वह वृक्ष फूलों से लद जाता।

इसी समय राजकुमारी को होश आ गया। वह उठकर बैठ गई और बगीचे में चारों ओर फैले हुए फूलों को आश्चर्य से देखने लगी। इसके पहले राजकुमारी अथवा किसी ने भी ऐसे फूल नहीं देखे थे।

राजा-रानी और राज्य के सभी लोग खुश हो गए। वे राजकुमारी के हालचाल पूछने लगे और नवयुवक को कुछ देर के लिए भूल से गए। जब उन्हें नवयुवक की याद आई तो वह जा चुका था। राजा और उसके सेवकों ने नवयुवक को ढूँढ़ने का बहुत प्रयास किया, किन्तु वह नहीं मिला।

अगले दिन सभी ने देखा। राज्य के सारे वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिले थे और उनकी सुगन्ध से पूरा वातावरण महक रहा था।

कहते हैं कि यह नवयुवक प्रतिवर्ष बसन्त में बाँसुरी बजाता हुआ निकलता है, उसकी बाँसुरी की आवाज से सभी वृक्ष फूलों से लद जाते हैं और चारों ओर मोहक सुगन्ध फैल जाती है।

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