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हिंदू धर्म के सोलह संस्कार

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हिंदू धर्म एक प्राचीन धर्म है, इस धर्म के लिए विस्तार के लिए हमारे ऋषि मुनि महात्माओं नें बड़े तप और शौध किए। हिंदू  धर्म को सनातन धर्म भी बोला जाता है। जीवन को धर्म के साथ जोड़ने के लिए इंसान के पैदा होने से पहले से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कार बताए गए हैं।  
ये हैं सोलह संस्कार

1. गर्भाधान  - विवाह के बाद गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने पहले कर्तव्य के रुप में इस संस्कार को स्थान दिया गया है। उत्तम संतान कि प्राप्ति और गर्भाधान से पहले तन मन को पवित्र और शुद्ध करने के लिए यह संस्कार करना आवश्यक होता है।
2. पुंसवन - पुंसवन गर्भाधान के तीसरे माह के दौरान किया जाता है। इस दौरान गर्भस्थ शिशू का मष्तिष्क विकसित होने लगता है। इस समय में ये संस्कार करके गर्भस्थ शिशु के संस्कारों की नीव रखी जाती है। 
3. सीमन्तोन्नयन - इस संस्कार को सीमंत संस्कार भी कहा जाता है। इसका अर्थ होता है सौभाग्य समपन्न होना। इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य गर्भपात रोकने के साथ साथ शिशु की माता पिता के जीवन की मंगल कामना भी होता है।
4. जातकर्म - इस संसार में आने वाले शिशु को बुद्धी स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करते हुए सोने के किसी आभूषण या टुकड़े से गुरुमन्त्र के उच्चारण के साथ शहद चटाया जाता है। इसके बाद मां बच्चे को स्तन पान कराती है।
5. नामकरण - जन्म के 11वें दिन शिशु का नामकरण संस्कार रखा जाता है। इसमें ब्राह्मण द्वारा हवन प्रक्रिया करके जन्म समय और नक्षत्रो के हिसाब से कुछ अक्षर सुझाए जाते हैं जिनके आधार पर शिशु का नाम रखा जाता है। 
6. निषक्रमण - जन्म के चौथे माह में यह संस्कार निभाया जाता है। निष्क्रमण का मतलब होता है बाहर निकालना इस संस्कार से शिशु के शरीर को सुर्य की गर्मी और चंद्रमा की शीतलता से मुलाकात कराई जाती है। ताकि वह आगे जाकर जलवायु के साथ तालमेल बैठा सके।
7. अन्नप्राशन - जन्म के 6 महिने बाद इस संस्कार को निभाया जाता है। जन्म के बाद शिशु मां के दूध पर ही निर्भर रहता है, 6 महिने बाद उसके शरीर के विकास के लिए अन्य प्रकार के भोज्य पदार्थ दिए जाते हैं। 
8. चूड़ाकर्म - चूड़ा कर्म को मुंडन भी कहा जाता है संस्कार को करने के बच्चे के पहले, तीसरे और पांचवे वर्ष का समय उचित माना गया है। इस संस्कार में जन्म से सिर पर उगे अपवित्र केशों को काट कर बच्चे को प्रखर बनाया जाता है।
9. विद्यारंभ - जब शिशु की आयु हो जाती है तो इसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है। इस संस्कार से बच्चा अपनी विद्या आरंभ करता है, इसके साथ साथ माता पिता औऱ गुरुओं को भी अपना दायित्व निभाने का अवसर मिलता है।
10. कर्णवेध - कर्णवेध संस्कार का आधार वैज्ञानिक है। बालक के शरीर की व्याधि से रक्षा करना इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य होता है। कान हमारे शरीर का मुख्य अंग होते हैं, कर्णभेद से इसकि व्याधियां कम हो जाती है और श्रवण शक्ति मजबूत होती है।
11. यज्ञोपवीत - यज्ञोपवीत यानी उपनयन संस्कार में जनेऊ पहना जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। यज्ञोपवीत सूत से बना वह पवित्र धागा है जिसे व्यक्ति बाएं कंधे के ऊपर और दाईं भुजा के नीचे पहनता है।
12. वेदारंभ - इस संस्कार से इंसान को वेदो का ज्ञान लेने की शुरुआत की जाती है। इसके अलावा ज्ञान और शिक्षा को अपने अंदर समाहित करना भी इस संस्कार का उद्देश्य है।
13. समावर्तन - केशांत संस्कार के बाद समावर्तन संस्कार किया जाता है, इस संस्कार से विद्या पूर्ण करके समाज में लौटने का संदेश दिया जाता है।
14. विवाह - प्राचीन समय से ही स्त्री और पुरुष के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। सही उम्र होने पर दोनो का विवाह करना उचित माना जाता है।
15-वानप्रस्थ - वानप्रस्थ संस्कार का हिंदू धर्म में बहुत अधिक महत्व है। यह संस्कार धार्मिक दृष्टि से तो महत्व है ही लेकिन इसकी सामाजिक महत्ता भी बहुत अधिक होती है। शास्त्रों के अनुसार अपने से तीसरी पीढी यानि दादा बनने के पश्चात व्यक्ति पितृ ऋण से मुक्त हो जाता है। ऐसे में वह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को ज्येष्ठ पुत्र या कहें परिवार के समझदार और योग्य व्यक्तियों के हाथ में थमाकर अपने आप को सामाज कल्याण के कार्यों में समर्पित कर सकता है। व्यक्ति द्वारा लिये जाने वाले इसी संकल्प को वानप्रस्थ कहा जाता है। यहां से तीसरे आश्रम की शुरुआत हो जाती है और सन्यास लेने की अवस्था तक का जीवन समाज को समर्पित रहता है। मनु के अनुसार वानप्रस्थी से सन्यास और सन्यास से मोक्ष का मार्ग मिलता है। इसकी सामाजिक महत्ता को देखते हुए ही वानप्रस्थ व्यक्ति को राष्ट्र का प्राण, मनुष्य जाति का शुभचिंतक एवं देवस्वरूप समझा जाता है। 100 वर्ष के प्राकृतिक आयु को 25-25 वर्षों के चार कालों में बांटा गया है जिसमें 50 साल तक व्यक्ति ब्रह्मचर्य औ गृहस्थ जीवन का पालन करता है। वानप्रस्थ संस्कार का मुख्य उद्देश्य सेवाधर्म है। इस अवस्था में व्यक्ति स्वाध्याय, मनन, सत्संग, ध्यान, ज्ञान, भक्ति, योग आदि साधना द्वारा अपने जीवन का आध्यात्मिक विकास भी करता है। प्राचीन समय में समाज कल्याण के लिये समाज सेवियों की फौज वानप्रस्थी ही होते थे। यह अलग बात है कि वर्तमान में यह संस्कार चलन में नहीं है जिससे अंतिम समय तक मनुष्य मोह, माया, लोभ आदि से घिरा रहता है। 
16. अन्त्येष्टि - इंसान की मृत्यु होने पर उसका अंतिम संस्कार कराया जाना ही अंत्येष्टि कहा जाता है। हिंदु धर्म के अनुसार मृत शरीर का अग्नि से मिलन कराया जाता है।

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गर्भाधान संस्कार-01


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क्या है सनातन धर्म शास्त्र के अनुसार गर्भाधान संस्कार
गर्भधान शब्द दो शब्दो के योग से बना है- गर्भ + आधान - आधान का अर्थ होता है स्थापित करना या रखना। इस तरह गर्भधान का शाब्दिक अर्थ है पुरूषो द्वारा स्त्री के गर्भशाय में बीज रूप शुक्र को  स्थापित करना। धर्म-शास्त्र में स्त्री को क्षेत्र कहा गया है और पुरूष को  बींज जैसे बीजवन के लिए भूमि (  क्षेत्र,खेत )  की आवश्यकता होता है। ठीक वैसे ही पुस्ष रूपी बीज के स्त्री स्पी क्षेत्र में स्थापित होने की यथोचित क्रिया गर्भाधान है। किंतु इस सृष्टि प्रक्रिया को धार्मिक तथा यज्ञ रूप में बनाना अर्थात उसे सुस्कृत करना ही संस्कार का कार्य है।

वैसे तो समस्त जीवधारियो में स्त्री वर्ग तथा पुरूष वर्ग में सहज रूप में सहवास होता है जिसका परिणाम संन्तानोप्ति है। किंतु यह मैथुनिक क्रिया सृष्टि का पाशविक धरातल है। यद्यपि मानव अन्य जीवधारियो से भिन्न श्रेष्ठ एंव विवेक  पूर्ण प्राणा माना गया है उसे इस पाशविक धरातल से ऊपर उठने के लिए निरंकुश पाशविक प्रवृत्तियो पर अंकुश लगाने के लिए दीर्घ दर्शी ऋषि -मर्हिषियो के द्वारा बताये गये गर्भाधानादि धार्मिक संस्कारो का विधान बनाया है। जिससे स्वेच्छाचार एंव कामाचार नियन्त्रित हो सके। जैसे अन्तः करण की शुद्धि के लिए भगवत् भक्ति,शाम-दमादि अनेक साधन है। ठीक वैसे ही बाह्य करणो की शुद्धि संस्कारों से होता है। यद्यपि गर्भाधान-संस्कार कृत्य बाह्य है। यानि बाहरी कृत्य है। किंतु इसका पूर्ण प्रभाव संन्तान के मन,बुद्धि,चित्त तथा ह्रदय   पर विलक्षण रूप से पडता है।

गर्भाधान से पूर्व संकल्प व प्रार्थना करें-
विवाह के अनन्तर रजोदर्शन के बाद चतुर्थ दिन ऋतु स्नान करके स्त्री को प्रातःकाल आभूषण आदि से सुसज्जित होकर तथा नवीन वस्त्र आदि धारण कर मौनव्रत पूर्वक पति के साथ सूर्य के सम्मुख हाथ जोडकर सूर्य मन्त्र से सूर्यावलोकन तथा नमस्कार करे। इसके बाद प्रथम पूज्यनीय गणेश की पूजा विधान से करने के बाद  अपने कुलदेवता व पूर्वजों का आशीर्वाद लेना चाहिए। ( गर्भाधान ) के समय गर्भाधान से पूर्व संकल्प व प्रार्थना करनी चाहिए एवं श्रेष्ठ आत्मा का आवाहन कर निमंत्रित करना चाहिए। ( गर्भाधान)  के समय दंपति की भावदशा एवं वातावरण जितना परिशुद्ध होगा, श्रेष्ठ आत्मा के गर्भप्रवेश की संभावना उतनी ही बलवती होगी। संकल्प विधि से ईश्वर को साक्षी मानकर पूजा-पाठ करने के उपरान्त ही स्त्री और पुरूष साथ-साथ हो। हां यदि संम्भव हो सके तो किसी योग्य ब्राम्हण से गर्भाधान संस्कार का कर्मकाण्ड अवश्य  सम्पन्न करावें। यदि कीन्ही कारण वश संम्भव न हो सके तो उपरोक्त बताये गये नियमो का अवश्य पालन करे।

गर्भाधान संस्कार अनुष्ठान कब करे-
गर्भाधान-संस्कार अनुष्ठान उस समय होता है,जब पति पत्नी दोनो संन्तानोत्पत्ति के योग्य और स्वस्थ्य हो। जब वे एक-दूसरे के ह्रदय  को जानते व समझते हो और उनमें संन्तान उत्पन्न करने की आपस में प्रबल इच्छा उत्पन्न हो रहा हो। गर्भाधान संस्कार विष्यान्नद नही,वैषियिक सुख नही,अपितु उत्तम संन्तान प्राप्ति का यज्ञ कर्म है। गर्भाधान संस्कार के लिए अच्छे विचार,पावन एंव निश्च्छल मानसिक,तपःपूत चिन्तन एंव संयम-शक्ति अपरिहार्य तत्व है। गर्भाधान संस्कार विवाह संस्कार की पूर्णता को व्यक्त करता है। गर्भाधान संस्कार होने पर मातृ में आत्म  रूप में जीव की प्रतिष्ठा हो जाने पर ही आगे के संस्कार संम्भव है। क्योकि गर्भ में जीव के आने पर ही आगे के पुंसवन,सीमान्तोन्नयन तथा प्रसव के अन्नतर के जातकर्म आदि संस्कार होते है। इस सृष्टि से गर्भाधान-संस्कार का सर्वोपरि महत्व है। यथा विधि संस्कार के सम्पन्न होने पर पंच तत्वो की पंच कोशों की तथा माता से उत्पन्न होने वाले त्वक् , मांस , शाणित एंव पिता से उत्पन्न होने वाले अस्थि,स्नायु एंव मज्जा आदि इन धातुओ की शुद्धि हो जाता है।

सहवास के अनन्तर कृत्य-
आचारादर्श में महर्षि पराशर के वचन से बताया गया है कि ऋतुकाल में गर्भ रहने की आशंका है,अतः गमन के अनन्तर पुरूष को अशिरक स्नान करके आचमन-प्रणायाम करके भगवान का स्मरण करना चाहिए। किंतु ऋतुकाल रहित समय में सहवास करता है,उसकी शुद्धि मूत्रपुरीषवत् होता है ।

ऋतौ तु गर्भशक्त्वित्स्नानं मैथुनिनः स्मृतम्।
अनृतौ तु यदा गच्छेच्छौचं मूत्रपुरीषवत्।।


यहां पर विशेष यह बताया गया है कि ऋतुकाल में मैथुन करने वाले को अशिरकस्नान तथा बिना ऋतुकाल में गमन करने वाले पर पादप्रक्षालन,अंप्रोक्षण आदि करना चाहिए। स्नान की आवश्यकता नही है,किन्तु दोनो अवस्थाओ में इन्द्रियों की मूत्रपुरीषवत् शुद्धि करनी चाहिए। रात्रि में स्नान निषिद्ध होने से मार्जन आदि करना चाहिए,ऐसा आर्दश में बताया गया है।

परन्तु स्त्रीयो के लिए स्नाना आदि की आवश्यकता नही है क्योकि उनमें अशुचित्व नही रहता। वृद्धशातातपका कहना है कि स्त्री-पुरूष शयनकाल में दोनो अशुचि रहते है। किंतु सहवास के अनन्तर शयन से उठ जाने पर स्त्री शुचि ही रहती है। किंतु पुरूष अशुचि हो जाता है। इस लिए उसे मार्जन-स्नानादि से पवित्र होना चाहिए।

गर्भाधान के लिए शुभाशुभ समय-
गर्भाधान के उपयुक्त काल के विषय में धर्म ग्रन्थो में बहुत विचार हुआ है। उन सभी बातो को मुहूर्तचिन्तामणि के निम्न श्लोको में बताया गया है।

गण्डान्तं त्रिविधं त्यजेन्निधनजन्मर्क्षे च मूलान्तकं,
दास्त्रं पौष्णमथोपरागदिवसं पातं तथा वैधृतिम्।
पित्रोः श्राद्धदिनं दिवा च परिघाद्यर्ध स्वपत्नीगमें,
भान्युत्पातहतानि मृत्युभवनं जन्मर्क्षतः पापभाम्।।
भद्राषष्ठीपर्वरिक्तश्च सन्ध्याभौमार्कार्कीनाद्यरात्रीश्चतस्तः।
गर्भाधनं त्र्युत्तरेन्द्वर्कमैत्रब्राम्हस्वातीविष्णुवस्वम्बुभे सत्।।


गर्भाधान के लिए निषेध काल
नक्षत्र, तिथि तथा लग्न गण्डान्त , निधन-तारा , जन्म-तारा , मूल नक्षत्र , भरणी नक्षत्र , अश्विनि नक्षत्र , रेवती नक्षत्र , ग्रहण के दिन  व्यतीपात , वैधृति,माता-पिता के श्राद्ध के दिन , दिन के समय , परिधयोग के आदि का आधा भाग , उत्पात से दूषित नक्षत्र , जन्मराशि या जन्म नक्षत्र से आठवां लग्न ,पाप युक्त नक्षत्र या लग्न , भद्रा , षष्ठी , चतुदर्शी , अष्टमी , अमावस्या , पूर्णिमा , संक्रान्ति , संन्धया के दोनो समय , मंगलवार , रविवार और शनिवार रजोदर्शन से आरम्भ करके चार दिन-यह सब पत्नी से सहवास करना वर्जित है।

गर्भाधान के लिए शुभ समय
शेष तिथियां सोमवार , बृहस्पतिवार , शुक्रवार , बुधवार , तीनो उत्तरा नक्षत्र , मृगशिरा नक्षत्र , हस्त नक्षत्र , अनुराधा नक्षत्र , रोहिणी नक्षत्र , स्वाती नक्षत्र , श्रवण नक्षत्र , धनिष्ठा नक्षत्र और शततारका आदि यह सब गर्भाधान के लिए शुभा-शुभ समय है।

गर्भाधान काल-
एक प्रहर रात्रि बीतने तथा एक प्रहर रात्रि शेष रहने के मध्य के काल में आरोग्यमय द्वि-तन, अत्यन्त प्रसन्न मन, अतिप्रेममय सम्बन्ध, आह्लाद आभर पति-पत्नी स्थिर संयत शरीर, प्रसन्न वदन, आनन्द पूर्वक गर्भाधान करें। प्रक्षेपण एवं धारण क्रिया सहज सौम्य हो।

गर्भाधान काल के बाद-
यह ज्ञात होते ही गर्भाधान हो गया है तो पति-पत्नी दश मास गर्भ के स्वस्थन, परिस्वस्थन, परिपुष्टन, देव-व्यवस्था के उत्तमीकरण की भावना से सने वेद-मन्त्रों से अर्थ सहित ही यज्ञ करें। इसके पश्चात भोजन व्यवस्था में सम-क्षार, अम्ल, लवणनिग्ध, कमतीता (मिर्च), पुष्टिकारक भोजन आयोजन करे। भोजन ऋतुओं के अनुकूल ही हो।

गर्भधान के समय की भावना
देवताब्राम्हणपराः शौचाचारहिते रताः।
महागुणान! प्रसूयन्ते विपरीतास्तु निगुर्णान्।।


इस समय जिस भी भाव से स्त्री व पुरूष सहवास करते है। उसी भाव से युक्त सन्तान की उत्पत्ति होती है। इस लिए गर्भधान के समय मन में सुयोग्य उत्तम चरित्र सम्पन्न गुणवान तथा धर्मात्मा पुत्रोत्पति  का भाव रखा चाहिए।

गर्भिणी स्त्री के आवश्यक पालनीय नियम
जब गर्भ में संन्तान होता है,तब माता जैसी सात्विक,राजस तामस भावना से भावित रहती है। जैसा अच्छा-बुरा देखती व सुनती,पडती,खाती-पीती है, उन सबका गर्भ में स्थित संन्तान के ऊपर प्रभाव पडता है। इस लिए गर्भवती स्त्री  राजस-तामस भावो से बचकर सात्विक भावनांए करनी चाहिए। गन्दे एंव अश्लील दृश्यो को न देखकर सात्विक देवदर्शन , सन्त दर्शन आदि करना चाहिए। गन्दे गीत सुनना-गाना छोडकर सात्विक भजन-र्कीतन ही सुनना एंव गाना चाहिए। एक स्त्री के गर्भकालीन भावना का सन्तान पर प्रत्यक्ष प्रभाव पडता है। इस लिए एक स्त्री को चाहिए की जग वह गर्भवती हो वह सद्विचार,सदग्रन्थो का अध्ययन तथा शुभ दृश्यो को देखे।

दोहद ‘‘ गर्भकालीन इच्छा ’’ 
गर्भिणी की अभिलाषा को ही दोहद कहते है। ऐसी गर्भिणी स्त्री जो अन्नपानादि विशेष अभिलाषा करती है। दोहदवती कहलाती है।  गर्भ के चार मास हो जाने पर गर्भ इन्द्रिय के विषयो में चाह इच्छा करने लगती है। अतः स्त्री को दो हृदय वाली होने से संन्तान में विकृति होती है,इसलिए गर्थिणी जिस-जिस वस्तुओ की इच्छा करे,वह उसको देनी चाहिए। गर्भवती इच्छा पूर्ण होने से संनमन वीर्यशाली और चिरायु होती है। गर्भ का हृदय माता के हृदय से उत्पन्न होता है। और गर्भ पोषण के लिए रसवाही धमनियो द्वारा माता के हृदय से बालक का हृदय सम्बद्ध रहता है। इस लिए उन रसवाहीनी धमनियो द्वारा बालक अपनी इच्छा को माता के हृदय द्वारा प्रकट करता है। इस लिए दो हृदय वाली स्त्री का अपमान नही करना चाहिए। अपमान करने से गर्भ का नाश गर्भ में विकृति उत्पन्न हो जाती है।

स्त्रियों का ऋतुकाल-
जीव की उत्पति के गर्भोत्पति कहा जाता हे। गर्भरूप जीव ऋतुस्नाता स्त्री के आश्रय में रहता है। ऋतु स्नान से पर्व स्त्री ( रजस्वला )  कहलाती है। प्रायः बारह वर्ष ही अवस्था  से प्रारम्भ होकर पचास वर्ष पर्यन्त  प्रतिमास -चन्द्रमास के अनुसार 27-28 दिन पर- स्त्री के गर्भाशय से स्वभाव ही आर्तव या रजका स्राव हुआ करता है। और आर्तवस्राव के प्रथम दिन से सोलह रात्रियों को ऋतुकाल माना जाता है। और इनमें निषिद्धेतर काल ही गर्भाधान योग्य माना जाता है। रजस्वला स्त्री  के लिए शास्त्रो में विशिष्ट नियम प्रतिपादित है। उनकी अवहेलना से गर्भ में दोष-विकार आ जाते है। स्त्रियों के गर्भधारण की योग्यता काल ऋतुकाल कहलाता है।
रजोदर्शन के दिन से सोलह रात्रियां दिन-रात स्त्रियो का स्वभाविक ऋतुकाल है। उनमें रजोधर्म ( मासिक धर्म )  के चार दिन निन्दित दिन-रात काल भी सम्मिलत होता है। उन सोलह रात्रियों में प्रथम चार ,ग्यारहवी और तेरहवी रात्रियां अर्थात छ : रात्रियां स्त्री के साथ सहवास के लिए निन्दित है तथा शेष 10 रात्रियां श्रेष्ठ मानी गयी है।

पुत्रोत्पति काल-
जैसा कि ऊपर बताया गया है। उन दस श्रेष्ठ रात्रियों में से युग्म ( सम ) अर्थात ऋतुकाल के प्रारंम्भ होने के दिन से -छठी ,आठवी ,दसवी , बारहवी ,चौदहवी तथा सोलहवी रात्रियों में स्त्रीयों के साथ सहवास करने से पुत्रोत्पति होता है।

पुत्री ( लक्ष्मी ) उत्पति काल-
जैसा कि ऊपर बताया गया है। उन दस श्रेष्ठ रात्रियों में से विषम रात्रियों में अर्थात ऋतुकाल के प्रारम्भ होने के दिन से - पाचवीं ,सातवीं ,नवी पन्द्रहवी रात्रियां स्त्रीयो के साथ सहवास करने से कन्या की उत्पति होती है।

ऋतुस्नाता स्त्री के कर्तव्य-
शास्त्रो के अनुसार लिखा है जो कि वैज्ञानिक रीति से भी प्रमाणित है। ऋतु स्नान के अनन्तर स्त्री प्रथम जिसे देखती है। उसी का संस्कार उसके चित्त पर पड जाता है। ऋतुमती स्त्री का चित्त उन दिनो में ठीक फोटो लेने वाले कैमरे के सदृश हो जाता है। यही  वह प्रमुख कारण है कि स्नान के अनन्तर सर्वप्रथम ऋतुस्नाता स्त्री के लिए पतिदर्शन ही आवश्यक है। गर्भ उत्पति के समय स्त्री का मन जिस किसी प्राणी के तरफ आकृष्ट होता है , ठीक उसी प्राणी के सदृश संनतान को स्त्री उत्पन्न करती है।

रजस्वला स्त्री के साथ सहवास निषेध-
काम वेग से अत्यन्त उद्विग्न होने पर भी रजस्वला स्त्री के साथ कदापि सहवास नही करना चाहिए। इतना ही नही उसके साथ एक आसन पर न तो बेठना चाहिए और न ही एक साथ शयन करना चाहिए। रजोधर्म वाली स्त्री के साथ सहवास करने से पुरूष की बुद्धि , तेज , बल , नेत्र और आयु क्षीण हो जाता है। तथा रजस्वला स्त्री के साथ सहवास करने से ब्रम्ह हत्या लगती है। और ऐसा व्यक्ति नरक का भागी होता है।

रजस्वला स्त्री के पालनीय नियम और उनके वैज्ञानिक रहस्य
रजस्वला नारी के लिए कतिपय धार्मिक पालन आवश्यक माना जाता है। क्योकि इनका सम्बन्ध प्रकृति नियमो के साथ जुडा हुआ होता है। रजस्वला के लिए विहित नियमो का परिपालन ऋतुमती स्त्री और उसकी सन्तति के शरीर,इन्द्रिय,मन और बुद्धि तथा स्वास्थ्य का प्रबल एंव प्रथम कारण होता है।  रजस्वला अवस्था में ऋतुमति स्त्री के लिए विहित एकान्तवास ब्रम्हचर्य-पालन , अंजननिषेध , उसके साथ भाषण , सह-शयन , सह-आसन तथा उसके स्पर्श आदि के निषेध का रहस्य बताया गया है।

रजस्वला स्त्री के नियम
रजस्वला नारी को जिन-जिन नियमो का पालन अपनी संन्तति तथा अन्यों की स्वास्थ्य-रक्षा के लिए परम आवश्यक होता है। 

01-एकान्तवास , ब्रम्चर्यपालन , स्नान का त्याग , शरीर पर तैलाभ्यंगवर्जन , भूमि रेखा न खीचना , अंजन का त्याग , दन्तधावन-त्याग,नख न काटना , वस्तुओ के छेदन-भेदन का त्याग , रस्सी न गुथना , पर्णपात्र से जल न पीना , अन्य से भाषण न करना , छोटे से पात्र से जल न पीना , भूमि पर शयन , पुण्य श्लोको मानवो का स्मरण करना , अमंगल एंव बीभत्स पदार्थे का चिन्तन न करना , पुण्य ग्रन्थो में उल्लेखित दयावीर  , दानवीर , क्षमावीर , धर्मवीर एंव सीता , सावित्री , अनुसूइया आदि महासति के चरित्रो का स्मरण करना चाहिए। अर्थ-जो रजस्वला नारी स्नान करती है उसकी सन्तान जलमग्न होकर मर जाती है। जो रजस्वला नारी तेल मर्दन करती है उसकी संन्तान चर्मविकार रोगो से ग्रस्त हो जाता है। जो रजस्वला नारी भूमि पर लेखन करती है उसकी सन्तान खलवाट गंजी होता है। जो रजस्वला नारी नेत्रो में अंजन लगाती है उसका पुत्र अथवा पुत्री काना या कानी होती है। जो रजस्वला नारी दन्तधावन करती है उसकी सन्तान काले दांतो वाले होते है। जो रजस्वला नारी जीवहिंसा करती है उसका पुत्र नपुसंक होता है। जो रजस्वला नारी रस्सी बाधती है उसका पुत्र दूसरो को फंसाने वाला उत्पन्न होता है। जो रजस्वला नारी पर्णमय पात्र से जल पीती है उसका पुत्र-पुत्री उन्मक्त पागल होता है। जो रजस्वला नारी छोटे पात्रो से जल पीती है उसका पुत्र-पुत्री छोटे कद काठी के होते हे। अतः तीन रात्रियां तक उक्त व्रतो का पालन सुलक्षण सन्तान उत्पन्न करने और उसकी रक्षा तथा सुसंस्कारो के लिए आवश्यक है।

गर्भावस्था में जीव की प्रतिज्ञा
गर्भावस्था में मातृ कुक्षि में पडा हुआ जीव अनेक कष्टो के भोगता है। किंतु उसे अपने पूर्व जन्मो की स्मृति याद रहती है तथा उसे अपने शुभा-शुभ कर्मो का संम्पूर्ण ज्ञान रहता है। गर्भवास के कष्टो को भोगता हुआ वह ईश्वर से बारम्बार प्रार्थना करता है कि हे प्रभो ! यदि मुझे यहां सं मुक्ति मिली तो मै आपके चरणो में शरण-ग्रहण करूगां। तदन्तर वह योनिद्वार को प्राप्त होकर यन्त्र में दबाया जाकर बडे कष्ट से जन्म को ग्रहण करता है। बाहर निकलते ही वह वैष्णवी वायु यानि की माया के स्पर्श से वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओं को भूल जाता है और शुभा-शुभ कर्म भी उसके सामने से हट जाता है।  प्रत्तेक जीव जैसा इस संसार में कर्म करता है अपितु उसे फल भी उसी किये गये कर्मो के अनुसार प्राप्त होते हे। प्रत्तेक जीव इस संसार में जन्म और मरण के चक्कर में फंसा होता है। इस जन्म-मरण के बन्धनो से मुक्ति को ही मोक्ष कहते है। यदि जीव चाहे तो वह ईश्वर से अगाध प्रेम कर इस जन्म मरण के बन्धनो से हमेशा के लिए मुक्त हो मोक्ष को प्राप्ति कर सकता है।
                                                                    ।।    श्रीवास्तव सरिता   ।। 
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पुंसवन संस्कार

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हिन्दू धर्म में, संस्कार परम्परा के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह तथ्य समझाए जाते हैं कि शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान पैदा करने की पहल करें। गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाय। उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित किया जाय। गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाय, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है। वेद मंत्रों, यज्ञीय वातावरण एवं संस्कार सूत्रों की प्रेरणाओं से शिशु के मानस पर तो श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों और परिजनों को भी यह प्रेरणा मिलती है कि भावी माँ के लिए श्रेष्ठ मनःस्थिति और परिस्थितियाँ कैसे विकसित की जाए।

पुंसवन संस्कार उद्देशय -
यह संस्कार गर्भस्थ शिशु के समुचित विकास के लिए गर्भिणी का किया जाता है। कहना न होगा कि बालक को संस्कारवान् बनाने के लिए सर्वप्रथम जन्मदाता माता-पिता को सुसंस्कारी होना चाहिए। उन्हें बालकों के प्रजनन तक ही दक्ष नहीं रहना चाहिए, वरन् सन्तान को सुयोग्य बनाने योग्य ज्ञान तथा अनुभव भी एकत्रित कर लेना चाहिए। जिस प्रकार रथ चलाने से पूर्व उसके कल-पुर्जों की आवश्यक जानकारी प्राप्त कर ली जाती है, उसी प्रकार गृहस्थ जीवन आरम्भ करने से पूर्व इस सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी इकट्ठी कर लेनी चाहिए। यह अच्छा होता, अन्य विषयों की तरह आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में दाम्पत्य जीवन एवं शिशु निर्माण के सम्बन्ध में शास्त्रीय प्रशिक्षण दिये जाने की व्यवस्था रही होती। इस महत्त्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति संस्कारों के शिक्षणात्मक पक्ष से भली प्रकार पूरी हो जाती है। यों तो षोडश संस्कारों में सर्वप्रथम गर्भाधान संस्कार का विधान है, जिसका अर्थ यह है कि दम्पती अपनी प्रजनन प्रवृत्ति से समाज को सूचित करते हैं। विचारशील लोग यदि उन्हें इसके लिए अनुपयुक्त समझें, तो मना भी कर सकते हैं। प्रजनन वैयक्तिक मनोरंजन नहीं, वरन् सामाजिक उत्तरदायित्व है। इसलिए समाज के विचारशील लोगों को निमंत्रित कर उनकी सहमति लेनी पड़ती है। यही गर्भाधान संस्कार है। पूर्वकाल में यही सब होता था।

आधुनिक भारतीय समाज के अन्धाधुन्ध पाश्चात्य सन्स्कृती के अनुसरण के वजह और विवेक की कमी के कारण;वह सन्तानोत्पत्ति को भी वैयक्तिक मनोरंजन का रूप मान लिया गया हैं। इस कारण गर्भाधान संस्कार का महत्त्व कम हो गया। इतने पर भी उसकी मूल भावना को भुलाया न जाए, उस परम्परा को किसी न किसी रूप में जीवित रखना चाहिए। ग्रहस्थ एकान्त मिलन के साथ वासनात्मक मनोभाव न रखें, मन ही मन आदर्शवादी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहें, तो उसकी मानसिक छाप बच्चे की मनोभूमि पर अंकित होगी। लुक-छिपकर पाप कर्म करते हुए भयभीत और आशंकाग्रसित अनैतिक समागम-व्यभिचार के फलस्वरूप जन्मे बालक अपना दोष-दुर्गुण साथ लाते हैं। इसी प्रकार उस समय दोनों की मनोभूमि यदि आदर्शवादी मान्यताओं से भरी हुई हो, तो मदालसा, अर्जुन आदि की तरह मनचाहे स्तर के बालक उत्पन्न किये जा सकते हैं।

गर्भाधान संस्कार का प्रयोजन यही है। वस्तुतः वह प्रजनन-विज्ञान का आध्यात्मिक एवं सामाजिक स्थिति का मार्गदर्शन कराने वाला सन्कार ही था। आज संस्कारों का जबकि एक प्रकार से लोप ही हो गया है, गर्भाधान का प्रचलन कठिन पड़ता है, इसलिए उसे आज व्यावहारिक न देखकर उस पर विशेष जोर नहीं दिया गया है, फिर भी उसकी मूल भावना यथावत् है। सन्तान उत्पादन से पूर्व उर्पयुक्त तथ्यों पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए।

कब करते हैं पुंसवन संस्कार ?
हिन्दू धर्म संस्कारों में पुंसवन संस्कार द्वितीय संस्कार है। पुंसवन संस्कार गर्भ सुनिश्चित हो जाने पर तीन माह पूरे हो जाने तक पुंसवन संस्कार कर देना चाहिए। विलम्ब से भी किया तो दोष नहीं, किन्तु समय पर कर देने का लाभ विशेष होता है। तीसरे माह से गर्भ में आकार और संस्कार दोनों अपना स्वरूप पकड़ने लगते हैं। अस्तु, उनके लिए आध्यात्मिक उपचार समय पर ही कर दिया जाना चाहिए। इस संस्कार के नीचे लिखे प्रयोजनों को ध्यान में रखा जाए। गर्भ का महत्त्व समझें, वह विकासशील शिशु, माता-पिता, कुल परिवार तथा समाज के लिए विडम्बना न बने, सौभाग्य और गौरव का कारण बने। गर्भस्थ शिशु के शारीरिक, बौद्धिक तथा भावनात्मक विकास के लिए क्या किया जाना चाहिए, इन बातों को समझा-समझाया जाए। गर्भिणी के लिए अनुकूल वातावरण खान-पान, आचार-विचार आदि का निर्धारण किया जाए। गर्भ के माध्यम से अवतरित होने वाले जीव के पहले वाले कुसंस्कारों के निवारण तथा सुसंस्कारों के विकास के लिए, नये सुसंस्कारों की स्थापना के लिए अपने संकल्प, पुरुषार्थ एवं देव अनुग्रह के संयोग का प्रयास किया जाए।

क्यों कहते हैं पुंसवन संस्कार ?
पुंसवन संस्कार एक हष्ट पुष्ट संतान के लिये किया जाने वाला संस्कार है। कहते हैं कि जिस कर्म से वह गर्भस्थ जीव पुरुष बनता है, वही पुंसवन-संस्कार है। शास्त्रों अनुसार चार महीने तक गर्भ का लिंग-भेद नहीं होता है। इसलिए लड़का या लड़की के चिह्न की उत्पत्ति से पूर्व ही इस संस्कार को किया जाता है।

धर्मग्रथों में पुंसवन-संस्कार करने के दो प्रमुख उद्देश्य मिलते हैं। पहला उद्देश्य पुत्र प्राप्ति और दूसरा स्वस्थ, सुंदर तथा गुणवान संतान पाने का है। दूसरा पुंसवन-संस्कार का उद्देश्य बलवान, शक्तिशाली एवं स्वस्थ संतान को जन्म देना है। इस संस्कार से मुख्यतः गर्भस्थ शिशु की पुष्टि होती है, गर्भरक्षा होती है तथा उसे उत्तम संस्कारों से पूर्ण बनाया जाता है।

अगर पूत्र की इच्छा हो तो निम्न लिखित मंत्र का जाप करवाए –

पुमानग्निः पुमानिन्द्रः पुमान् देवो बृहस्पतिः।
पुमांसं पुत्रं विन्दस्व तं पुमान्नु जायताम्।।

अर्थात् : अग्निदेवता पुरुष है, इन्द्र भी पुरुष है, गुरु ब्रहस्पति भी पुरुष है तुजे भी पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी|

कैसे करते हैं पुंसवन संस्कार?
औषिधि अवघ्राण के लिए वट वृक्ष की जटाओं के मुलायम सिरों का छोटा टुकड़ा, गिलोय, पीपल की कोपल-मुलायम पत्ते लाकर रखे जाएँ। सबका थोड़ा-थोड़ा अंश पानी के साथ सिल पर पीसकर एक कटोरी में उसका घोल तैयार रखा जाए।

साबूदाने या चावल की खीर तैयार रखी जाए। जहाँ तक सम्भव हो सके, इसके लिए गाय का दूध प्रयोग करें। खीर गाढ़ी हो। तैयार हो जाने पर निर्धारित क्रम में मंगलाचरण, षट्कर्म, संकल्प, यज्ञोपवीत परिवर्तन, कलावा-तिलक एवं रक्षाविधान तक का यज्ञीय क्रम पूरा करके नीचे लिखे क्रम से पुंसवन संस्कार के विशेष कर्मकाण्ड कराएँ।

औषधि अवघ्राण -
इस संस्कार में एक विशेष औषधि (वटवृक्ष की कोमल कुंपल का रस) को गर्भवती स्त्री की दांई नासिका के छिद्र से भीतर पहुंचाया जाता है। हालांकि औषधि विशेष ग्रहण करना यह वैधकीय परामर्श का विषय है। विशेष पूजा और मंत्र के माध्यम से भी यह संस्कार किया जाता है। कहते हैं कि तीन माह तक शिशु का लिंग निर्धारण नहीं होता है। इस संस्कार से लिंग को परिवर्तित भी किया जा सकता है।

वट वृक्ष, विशालता और दृढ़ता का प्रतीक है। धीरे-धीरे बढ़ना धैर्य का सूचक है। इसकी जटाएँ भी जड़ और तने बन जाती हैं, यह विकास-विस्तार के साथ पुष्टि की व्यवस्था है, वृद्धावस्था को युवावस्था में बदलने का प्रयास है। गिलोय में वृक्ष के ऊपर चढ़ने की प्रवृत्ति है। यह हानिकारक कीटाणुओं की नाशक है, शरीर में रोगाणुओं, अन्तःकरण के कुविचार-दुर्भावों, परिवार और समाज में व्याप्त दुष्टता-मूढ़ता आदि के निवारण की प्रेरणा देती है। शरीर को पुष्ट कर, प्राण ऊर्जा की अभिवृद्धि कर सत्प्रवृत्तियों के पोषण की सार्मथ्य पैदा करती है। पीपल देवयोनि का वृक्ष माना जाता है। देवत्व के परमार्थ के संस्कार इसमें सन्निहित हैं। उनका वरण, धारण और विकास किया जाए। सूँघने और पान करने का तात्पर्य श्रेष्ठ संस्कारों का वरण करने, उन्हें आत्मसात् करने की व्यवस्था बनाना है। आहार तथा दिनचर्या का निर्धारण ऐसा किया जाए जिससे महापुरुषों के अध्ययन, श्रवण, चिन्तन द्वारा गर्भिणी अपने में, अपने गर्भ में श्रेष्ठ संस्कार पहुँचाए। इस कार्य में परिजन उसका सहयोग करें।

क्रिया भावना -
औषधि की कटोरी गर्भिणी के हाथ में दी जाए। वह दोनों हाथों में उसे पकड़े। मन्त्र बोला जाए, गर्भिणी नासिका के पास औषधि को ले जाकर धीरे-धीरे श्वास के साथ उसकी गन्ध धारण करे। भावना की जाए कि औषधियों के श्रेष्ठ गुण और संस्कार खींजे जा रहे हैं। वेद मन्त्रों तथा दिव्य वातावरण द्वारा इस उद्देश्य की पूर्ति में सहयोग मिल रहा है।

शिक्षण एवं प्रेरणा-
गर्भ के माध्यम से प्रकट होने वाले जीव को अपेक्षा होती है कि उसे विकास के लिए सही वातावरण मिलेगा। जिस सत्ता ने गर्भ प्रदान किया है, वह भी उस उत्तरदायित्व को पूरा होते देखना चाहती है। दोनों को आश्वस्त किया जाना चाहिए कि उन्हें निराश नहीं होना पड़ेगा। पहला आश्वासन गर्भिणी दे। वह अपने र्कत्तव्य का ध्यान रखे। आहार-विहार, चिन्तन सही रखे। दूसरों के व्यवहार और वातावरण की शिकायत करने में समय और शक्ति न गँवाकर, धैर्यपूर्वक गर्भ को श्रेष्ठ संस्कार देने का प्रयास करे। प्रसन्न रहे, ईष्र्या, द्वेष, क्रोध आदि मनोविकारों से बचती रहे। धैर्यपूर्वक उज्ज्वल भविष्य की कामना करे। दूसरा आश्वासन उसके पति और परिजनों की ओर से होता है। गर्भिणी माता अपने शरीर तथा रक्त-मांस से बालक का शरीर बनाती है, अपना रक्त सफेद दूध के रूप में निकाल-निकाल कर बच्चे का पोषण करती है, उसके मल-मूत्र, स्नान, वस्त्र तथा दिनचर्या की हर घड़ी साज-सॅभाल रखती है। इतना भार तथा त्याग कुछ कम नहीं। माता इतना करके भी अपने हिस्से की जिम्मेदारी का बहुत बड़ा भाग पूरा कर लेती है। अब शिशु को सुसंस्कारी बनाने की उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करना, पिता का काम रह जाता है। उसे पूरा करने के लिए उतना ही त्याग करना, उतना ही कष्ट सहना और उतना ही ध्यान रखना, पिता का और परिजनों का भी र्कत्तव्य है। सब मिलकर प्रयास करें कि गर्भ पर अभाव और कुसंस्कारों की छाया न पड़ने पाए। गर्भिणी गलत आकांक्षाएँ पास न आने दे। परिजन उसकी उचित आकांक्षाएँ जानें और पूरी करें। क्या खाना चाहती है? यही पूछना पर्याप्त नहीं, कैसा व्यवहार चाहती है? यह भी पूछा जाय, समझा जाए और पूरा किया जाए।

गर्भ पूजनशिक्षण एवं प्रेरणा-
गर्भ कौतुक नहीं, एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। उसे समझा जाए और उस जिम्मेदारी को उठाने की तैयारी मानसिक तथा व्यावहारिक क्षेत्र में की जाए। गर्भ के माध्यम से जो जीव प्रकट होना चाहता है, उसे ईश्वर का प्रतिनिधि मानकर उसके लिए समुचित व्यवस्था बनाकर, उसके स्वागत की तैयारी करनी चाहिए। गर्भ पूज्य है। कोई पूज्य व्यक्ति सामने हो, तो अपने स्वभाव तथा परस्पर के द्वेष-वैर को भुलाकर भी शालीनता का वातावरण बनाया जाता है। गर्भ के लिए भी ऐसा ही किया जाए। गर्भ का पूजन केवल एक सामयिकता औपचारिकता न रह जाए। संस्कारित करने के लिए पूजा उपासना का सतत प्रयोग चले। घर में आस्तिकता का वातावरण रहे। गर्भिणी स्वयं भी नियमित उपासना करे। उसे आहार और विश्राम जितना ही महत्त्वपूर्ण मानकर चलाया जाए। अधिक न बने, तो गायत्री चालीसा पाठ एवं पंचाक्षरी मन्त्र 'ॐ र्भूभुवः स्वः' का जप ही कर लिया करे।

क्रिया और भावना-
गर्भ पूजन के लिए गर्भिणी के घर परिवार के सभी वयस्क परिजनों के हाथ में अक्षत, पुष्प आदि दिये जाएँ। मन्त्र बोला जाए। मंत्र समाप्ति पर एक तश्तरी में एकत्रित करके गर्भिणी को दिया जाए। वह उसे पेट से स्पर्श करके रख दे। भावना की जाए, गर्भस्थ शिशु को सद्भाव और देव अनुग्रह का लाभ देने के लिए पूजन किया जा रहा है। गर्भिणी उसे स्वीकार करके गर्भ को वह लाभ पहुँचाने में सहयोग कर रही है।

ॐ सुपर्णोऽसि गरुत्माँस्त्रिवृत्ते शिरो, गायत्रं चक्षुबरृहद्रथन्तरे पक्षौ।
स्तोमऽआत्मा छन्दा स्यंगानि यजूषि नाम।
साम ते तनूर्वामदेव्यं, यज्ञायज्ञियं पुच्छं धिष्ण्याः शफाः।
सुपर्णोऽसि गरुत्मान् दिवं गच्छ स्वःपत॥ -१२.४

क्रिया और भावना
गर्भिणी अपना दाहिना हाथ पेट पर रखे। पति सहित परिवार के सभी परिजन अपना हाथ गर्भिणी की तरफ आश्वासन की मुद्रा में उठाएँ। मन्त्र पाठ तक वही स्थिति रहे। भावना की जाए कि गर्भिणी गर्भस्थ शिशु तथा दैवी सत्ता को आश्वस्त कर रही है। सभी परिजन उसके इस प्रयास में भरपूर सहयोग देने की शपथ ले रहे हैं। इस शुभ संकल्प में दैवी शक्तियाँ सहयोग दे रही है। इस श्रेष्ठ संकल्प-पूर्ति की क्षमता दे रही हैं।

ॐ यत्ते ससीमे हृदये हितमन्तः प्रजापतौ।
मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं, माहं पौत्रमघन्नियाम्॥ - आश्व०गृ०सू० १.१३

आश्वास्तना के बाद अग्नि स्थापन से लेकर गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ पूरी करने का क्रम चलाएँ। उसके बाद विशेष आहुतियाँ प्रदान करें।

विशेष आहुति शिक्षण एवं प्रेरणा-
यज्ञीय जीवन भारतीय संस्कृति की विशेष उपलब्धि है। जीवन का हर चरण एक आहुति है। कृत्य विशेष को यज्ञमय बनाने के लिए विशेष क्रम बनाने होते हैं। विशेष आहुति उसी बोध को जीवन्त बनाती है। यज्ञ में पोषक, सात्त्विक पदार्थ खीर की आहुति डाली जाती है। इसी प्रकार अंतःकरण में दूध की तरह श्वेत, कलुषरहित भावों का संचार करें। दूध में घी समाया रहता है, अपने चिन्तन एवं आचरण में स्नेह समाया रहे। गर्भिणी स्वयं भी तथा परिवार के परिजन मिलकर गर्भस्थ शिशु के लिए ऐसा ही परमार्थपरक वातावरण बनाएँ।

क्रिया और भावना-
गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ हो जाने के बाद खीर की पाँच आहुतियाँ विशेष मन्त्र से की जाएँ। भावना की जाय कि दिव्य मन्त्र शक्ति के संयोग से गर्भस्थ शिशु और सभी परिजनों के लिए अभीष्ट मंगलमय वातावरण बन रहा है।

ॐ धातादधातु दाशुषे, प्राचीं जीवातुमक्षिताम्।
वयं देवस्य धीमहि, सुमतिं वाजिनीवतः स्वाहा।
इदं धात्रे इदं न मम॥ -आश्व०गृ०सू० १.१४

चरु प्रदान शिक्षण एवं प्रेरणा-
यज्ञ से बची खीर गर्भिणी को सेवन के लिए दी जाती है। यज्ञ से संस्कारित अन्न ही मन में देवत्व की वृत्तियाँ पैदा करता है। स्वार्थ वृत्ति से स्वाद को लक्ष्य करके तैयार किया गया भोजन अकल्याणकारी होता है। आहार प्रभु का प्रसाद बनाकर लिया जाए। बिना भोग लगाये न खाना, संयम की वृत्ति को पैदा करता है, पुष्ट करता है। नित्य का आहार भी यज्ञीय संस्कार युक्त हो, इसके लिए घर में बलिवैश्व परम्परा डाली जानी चाहिए। गर्भिणी विशेष रूप से नित्य बलिवैश्व करके, यज्ञ का प्रसाद बनाकर ही भोजन ले। भोजन में सात्विक पदार्थ हों। उत्तेजक, पेट और वृत्तियों को खराब करने वाले पदार्थ न हों। उन्हीं में रस लिया जाए।

क्रिया और भावना-
विशेष आहुतियों के बाद शेष बची खीर प्रसाद रूप में एक कटोरी में गर्भिणी को दी जाए। वह उसे लेकर मस्तक से लगाकर रख ले। सारा कृत्य पूरा होने पर पहले उसी का सेवन करे। भावना करे कि यह यज्ञ का प्रसाद दिव्य शक्ति सम्पन्न है। इसके प्रभाव से राम-भरत जैसे नर पैदा होते हैं। ऐसे संयोग की कामना की जा रही है।

ॐ पयः पृथिव्यां पयऽओषधिषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः।
पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्। -यजु० १८.३६

आशीर्वचन
सारा कृत्य पूरा हो जाने पर विसर्जन के पूर्व आशीर्वाद दिया जाए। आचार्य गर्भिणी को शुभ मन्त्र बोलते हुए फल-फूल आदि दें। गर्भिणी साड़ी के आँचल में ले। अन्य बुजुर्ग भी आशीर्वाद दे सकते हैं। सभी लोग पुष्प वृष्टि करें। गर्भिणी एवं उसका पति बड़ों के चरण स्पर्श करें, सबको नमस्कार करें।
विसर्जन और जयघोष करके आयोजन समाप्त किया जाए।

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सीमन्तोन्नयन संस्कार

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सीमन्तोन्नयन संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में तृतीय संस्कार है। सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। यह संस्कार पुंसवन का ही विस्तार है। इसका शाब्दिक अर्थ है- "सीमन्त" अर्थात् 'केश और उन्नयन' अर्थात् 'ऊपर उठाना'। संस्कार विधि के समय पति अपनी पत्नी के केशों को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इसलिए इस संस्कार का नाम 'सीमंतोन्नयन' पड़ गया। यह संस्कार गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है। इस संस्कार का फल भी गर्भ की शुद्धि ही है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म आएं, इसके लिए माँ उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है। महाभक्त प्रह्लाद को देवर्षि नारद का उपदेश तथा अभिमन्यु को चक्रव्यूह प्रवेश का उपदेश इसी समय में मिला था। अतः माता-पिता को चाहिए कि वे इन दिनों विशेष सावधानी के साथ योग्य आचरण करें।

सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं।

सनातन धर्म में स्त्रियों को शिक्षित होना अनिवार्य है इसी समय गर्भिणी को वेद एवं शास्त्रों का अध्ययन कराया जाता है। जब गर्भिणी शिक्षित, मानसिक बल एवं सकारात्मक विचारों  से युक्त होगी तभी शिशु भी शक्तिशाली व विद्वान होगा क्योंकि शिशु का लगभग 90 % बौद्धिक विकास गर्भ में हो जाता है।

सीमन्तोन्नयन संस्कार का महत्व 
जैसा कि नाम से ही जाहिर होता है कि यह सीमन्तोन्नयन सीमन्त और उन्नयन से मिलकर बना है। सीमन्त बालों को कहा जाता है और उन्नयन का अर्थ होता है ऊपर उठाना। मान्यता है कि जब स्त्री गर्भधारण करती है तो समय के साथ-साथ उसके अंदर बहुत सारे परिवर्तन आते हैं। सीमन्तोन्नयन संस्कार आठवें महीने में किया जाता है। इस समय स्त्री की पीड़ा और उसके स्वभाव में परिवर्तन बहुत बढ़ जाते हैं ऐसे में उसे मानसिक रूप से तैयार करने की जरूरत होती है। इस संस्कार के बहाने पति पत्नी के केश संवारता है ताकि उसे मानसिक शक्ति प्राप्त हो। इस संस्कार की यह मान्यता भी काफी प्रबल है कि इससे गर्भ सुरक्षित रहता है। माना जाता है कि चौथे, छठे या आठवें माह में गर्भपात हो जाये तो गर्भ के जीवित रहने की संभावनाएं नहीं होती बल्कि माता के जीवन को भी कई बार संकट हो जाता है। इसलिये यह संस्कार छठे या आठवें माह में अवश्य करने की सलाह दी जाती है। इस संस्कार का एक महत्व यह भी माना जाता है कि इससे शिशु का भी मानसिक विकास होता है। क्योंकि आठवें माह में वह माता को सुनने व समझने लगता है। इसलिये मां का मानसिक स्वास्थ्य यदि बेहतर होगा तो शिशु का भी बेहतर बना रहता है।

विधि -
इस संस्कार को करते समय शास्त्रवर्णित गूलर वनस्पति द्वारा गार्भिणी पत्नी के सीमंत (मांग) का  पृथक् करणादि क्रियाएं करते हुए पति को निम्नलिखित मंत्रोच्चारण करना चाहिए -

ॐ भूर्विनयामि, ॐ भूर्विनयामि, ॐ भूर्विनयामि,
येनादितेः सीमानं नयाति प्रजापतिर्महते सौभगाय।
तेनाहमस्यौ सीमानं नयामि प्रजामस्यै जरदष्टिं कृणोमि॥

अर्थात् : जिस प्रकार देवमाता अदिति का सीमंतोन्नयन प्रजापति ने किया था, उसी प्रकार मैं इस गार्भिणी का सीमंतोन्नयन करके इसके पुत्र को जरावस्थापर्यंत दीर्घजीवी करता हूं।

संस्कार के अंत में वृद्धा ब्राह्मणियों, अथवा परिवार या आस-पड़ोस की बुजूर्ग महिला का आशीर्वाद लेना चाहिये। आशीर्वाद के पश्चात गर्भवती महिला को खिचड़ी में अच्छे से घी मिलाकर खिलाये जाने का विधान भी है। इस बारे में एक उल्लेख भी शास्त्रों में मिलता है - परिवार की महिलाओं द्वारा पत्नी को आशीर्वाद दिलवाएं। सीमंतोन्नयन-संस्कार में पर्याप्त घी मिली खिचड़ी खिलाने का विधान है। इसका उल्लेख गोभिल गृहयसूत्र में इस प्रकार किया गया है।

किं पश्यास्सीत्युक्तवा प्रजामिति वाचयेत् तं सा स्वयं।
भुज्जीत वीरसूर्जीवपत्नीति ब्राह्मण्यों मंगलाभिर्वाग्भि पासीरन्॥

अर्थात् : खिचड़ी खिलाते समय स्त्री से सवाल किया गया कि क्या देखती हो तो वह जवाब देते हुए कहती है कि संतान को देखती हूं इसके पश्चात वह खिचड़ी का सेवन करती है। संस्कार में उपस्थित स्त्रियां भी फिर आशीर्वाद देती हैं कि तुम्हारा कल्याण हो, तुम्हें सुंदर स्वस्थ संतान की प्राप्ति हो व तुम सौभाग्यवती बनी रहो।
इसमें कोई संदेह नहीं की गर्भस्थशिशु बहुत ही संवेदनशील होता है। सती मदालसा के बारे में कहा जाता है की वह अपने बच्चे के गुण, कर्म और स्वभाव की पूर्व घोषणा कर देती थी, फिर उसी प्रकार निरंतर चिंतन, क्रिया-कलाप, रहन-सहन, आहार-विहार और बर्ताव अपनाती थी, जिससे बच्चा उसी मनोभूमि ढल जाता है, जैसा कि वह चाहती थी।

उदाहरण : -
भक्त प्रह्लाद की माता कयाधू को देवर्षि नारद भगवदभक्ति के उपदेश दिया करते थे, जो प्रहलाद ने गर्भ में ही सुने थे।
व्यासपुत्र शुकदेव ने अपनी माँ के गर्भ में सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया था।
अर्जुन ने अपनी गर्भवती पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूहभेदन की जो शिक्षा दी थी, वह सब गर्भस्थशिशु अभिमन्यु सीख ली थी | उसी शिक्षा के आधार पर सोलह वर्ष की आयु में ही अभिमन्यु ने अकेले सात महारथियों से युद्ध कर चक्रव्यूह-भेदन किया
अलग अलग जगह इस संस्कार को अलग अलग नाम से जाना जाता है। 

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जातकर्म संस्कार

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हिन्दू धर्म संस्कारों में जातकर्म संस्कार चतुर्थ संस्कार है। गर्भस्थ बालक के जन्म होने पर यह संस्कार किया जाता है। इस बारे में कहा भी गया है कि “जाते जातक्रिया भवेत्”। गर्भस्थ बालक के जन्म के समय जो भी कर्म किये जाते हैं उन्हें जातकर्म कहा जाता है। इनमें बच्चे को स्नान कराना, मुख आदि साफ करना, मधु व घी चटाना, स्तनपान, आयुप्यकरण आदि कर्म किये जाते हैं। क्योंकि जातक के जन्म लेते ही घर में सूतक माना जाता है इस कारण इन कर्मों को संस्कार का रूप दिया जाता है। मान्यता है कि इस संस्कार से माता के गर्भ में रस पान संबंधी दोष, सुवर्ण वातदोष, मूत्र दोष, रक्त दोष आदि दूर हो जाते हैं व जातक मेधावी व बलशाली बनता है।

दशमासाञ्छशयान: कुमारो अधि मातरि!
निरैतु जीवो अक्षतों जीवन्त्या अधि!!  (ऋग्वेद ५/७५/९)

हे परमात्मन, दस माह तक माता के गर्भ में रहने वाला सुकुमार जीव प्राण धारण करता हुआ अपनी प्राण शक्ति सम्पन्न माता के शरीर से सुखपूर्वक बाहर निकले।

जातकर्म -
जन्म के बाद नवजात शिशु के नालच्छेदन (यानि नाल काटने) से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है। इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।(यह स्तनपान विज्ञान  के अनुसार जन्म होने के आधे घंटे  अन्तर्गत कराये जाने वाला स्तनपान है, जिसको हिन्दू धर्म में हजारो वर्ष पहले से बताया जा चूका है।)

जातकर्म संस्कार का महत्व -
गर्भस्थ बालक के जन्म होने पर यह संस्कार किया जाता है - 'जाते जातक्रिया भवेत्।' इसमें सोने की शलाका से विषम मात्रा में घृत और मधु घिस करके बालक को चटाया जाता है। इससे माता के गर्भ में जो रस पीने का दोष है, वह दूर हो जाता है और बालक की आयु तथा मेधाशक्ति को बढ़ाने वाली औषधि बन जाती है। सुवर्ण वातदोष को दूर करता है। मूत्र को भी स्वच्छ बना देता है और रक्त के ऊर्ध्वगामी दोष को भी दूर कर देता है। मधु लाला (लार)-का संचार करता है और रक्त का शोधक होने के साथ-साथ बलपुष्टिकारक भी है।

जातकर्म संस्कार की विधि -
इस संस्कार में जातक के जन्म लेते ही कई प्रकार की क्रियाएं की जाती हैं। सर्वप्रथम सोने की श्लाका से विषम मात्रा में घी और शहद को विषम मात्रा में मिलाकर उसे शिशु को चटाया जाता है। मान्यता है कि यह नवजात शिशु के लिये एक प्रकार कि औषधि का काम भी करता है। शिशु के जन्म लेने पर पिता को अपने कुल देवता व घर के बड़े बुजूर्गों को नमस्कार करने के पश्चात ही पुत्र का मुख देखना चाहिये। इसके तुंरत बाद किसी नदी या तालाब या किसी पवित्र धार्मिक स्थल पर उत्तर दिशा में मुख कर स्नान करना चाहिये। मान्यता यह भी है कि यदि शिशु का जन्म मूल-ज्येष्ठा या फिर किसी अन्य अशुभ मुहूर्त में हुआ हो तो पिता को शिशु का मुख देखे बिना ही स्नान करना चाहिये।

जातकर्म संस्कार के दौरान की जाने वाली क्रियाएं -
इस संस्कार में बच्चे को स्नान कराना, मुख आदि साफ करना, मधु व घी चटाना, स्तनपान, आयुप्यकरण आदि कर्म किये जाते हैं। क्योंकि जातक के जन्म लेते ही घर में सूतक माना जाता है इस कारण इन कर्मों को संस्कार का रूप दिया जाता है। मान्यता है कि इस संस्कार से माता के गर्भ में रस पान संबंधी दोष, सुवर्ण वातदोष, मूत्र दोष, रक्त दोष आदि दूर हो जाते हैं व जातक मेधावी व बलशाली बनता है।

वृहदारण्यकोपनिषद् ( 6.4.24-28 ) के अनुसार-
“पुत्रोत्पत्ति के उपरांत पिता प्रसूतिकाग्नि को प्रज्वलित करके एक कांस्य पात्र में दधि- घृत को मिश्रण करके वैदिक मंत्रों का पाठ करता था तथा शिशु के कान के पास अपने मुंह को ले जाकर तीन बार “वाक्’ शब्द का उच्चारण करता था। तदनंतर उसकी जीभ में सोने की शलाका ( चम्मच से ) दधि- घृत- मधु का मिश्रण लगाता था। इस समय उपर्युक्त मंत्र का पाठ करता था, जिसमें कहा गया है “मैं तुझमें “भू’ रखता हूँ, “भूवः’ रखता हूँ, “स्वः’ रखता हूँ, “भूर्भुवः स्वः’ सभी को एक साथ रखता हूँ। इसके बाद शिशु को सम्बोधित करते हुए कहता था “तू वेद है।”” और उसका एक गुप्त नाम भी रखता था।

मान्यता यह भी है कि यदि शिशु का जन्म मूल-ज्येष्ठा या फिर किसी अन्य अशुभ मुहूर्त में हुआ हो तो पिता को शिशु का मुख देखे बिना ही स्नान करना चाहिये।

शिशु के जन्म के पश्चात बच्चे के शरीर पर उबटन लगाया जाता है। उबटन में चने का बारीक आटा यानि बेसन की बजाय मसूर या मूंग का बारीक आटा सही रहता है। इसके पश्चात शिशु का स्नान किया जाता है। मान्यता है कि गर्भ में शिसु श्वास नहीं लेता और न ही मुख खुला होता है।

मुख साफ करना
मान्यता है कि गर्भ में शिसु श्वास नहीं लेता और न ही मुख खुला होता है। प्राकृतिक रूप से ये बंद रहते हैं और इनमें कफ भरी होती है। लेकिन जैसे ही शिशु का जन्म होता है तो कफ को निकाल कर मुख साफ करना बहुत आवश्यक होता है। इसके लिये मुख को ऊंगली से साफ कर शिशु को वमन कराया जाता है ताकि कफ बाहर निकले इसके लिये सैंधव नमक बढ़िया माना जाता है। इसे घी में मिलाकर दिया जाता है।

तालु में तेल या घी लगाना-
तालु की मज़बूती के लिये नवजात क तालु पर घी या तेल लगाया जाता है। मान्यता है कि जिस तरह कमल के पत्ते पर पानी नहीं ठहरता उसी प्रकार स्वर्ण खाने वाले को विष प्रभावित नहीं करता। अर्थात संस्कार से शिशु की बुद्धि, स्मृति, आयु, वीर्य, नेत्रों की रोशनी या कहें कुल मिलाकर शिशु को संपूर्ण पोषण मिलता है व शिशु सुकुमार होता है।

उपरोक्त उपचार व प्रयोग प्रचलित मान्यताओं पर आधारित हैं। शिशु जन्म पर कोई भी क्रिया करने से पहले चिकित्सकीय परामर्श अवश्य लें।

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नामकरण संस्कार

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नामकरण संस्कार हिन्दू धर्म संस्कारों में पंचम संस्कार है। यह संस्कार बच्चे के जन्म होने के ग्यारहवें दिन में कर लेना चाहिये। बच्चे का नाम उसकी पहचान के लिए नहीं रखा जाता। गोभिल गह्यसूत्रकार के अनुसार 100 दिन या 1 वर्ष बीत जाते के बाद भी नामकरण संस्कार कराने का प्रचलन है।

गोभिल गृह्यसुत्र के अनुसार-

“जननादृशरात्रे व्युष्टे शतरात्रे संवत्सरे वा नामधेयकरणम्”

अर्थात- जन्म के 10 वें दिन में 100 वें दिन में या 1 वर्ष के अंदर जातक का नामकरण संस्कार कर देना चाहिए।
नामकरण-संस्कार के संबंध में स्मृति-संग्रह में निम्नलिखित श्लोक उक्त है-

आयुर्वेडभिवृद्धिश्च सिद्धिर्व्यवहतेस्तथा ।
नामकर्मफलं त्वेतत् समुद्दिष्टं मनीषिभिः ।।

अर्थात- नामकरण-संस्कार से तेज़ तथा आयु की वृद्धि होती है। लौकिक व्यवहार में नाम की प्रसिद्धि से व्यक्ति का अस्तित्व बनता है। इसके पश्चात् प्रजापति, तिथि, नक्षत्र तथा उनके देवताओं, अग्नि तथा सोम की आहुतियां दी जाती हैं। तत्पश्चात् पिता, बुआ या दादी शिशु के दाहिने कान की ओर उसके नाम का उच्चारण करते हैं। इस संस्कार में बच्चे को शहद चटाकर और प्यार-दुलार के साथ सूर्यदेव के दर्शन कराए जाते हैं।

मनोविज्ञान एवं अक्षर-विज्ञान के जानकारों का मत है कि नाम का प्रभाव व्यक्ति के स्थूल-सूक्ष्म व्यक्तित्व पर गहराई से पड़ता रहता है। नाम सोच-समझकर तो रखा ही जाय, उसके साथ नाम रोशन करने वाले गुणों के विकास के प्रति जागरूक रहा जाय, यह जरूरी है। हिन्दू धर्म में नामकरण संस्कार में इस उद्देश्य का बोध कराने वाले श्रेष्ठ सूत्र समाहित रहते हैं।

नाम प्रायः दो होते हैं- एक गुप्त नाम दूसरा प्रचलित नाम- जैसे कहा है कि- दो नाम निश्चित करें, एक नाम नक्षत्र-सम्बन्धी हो और दूसरा नाम रुचि के अनुसार रखा गया हो।

गुप्त नाम- जिसे सिर्फ जातक के माता पिता जानते हों तथा दूसरा प्रचलित नाम जो लोक व्यवहार में उपयोग में लाया जाये। नाम गुप्त रखने का कारण जातक को मारक , उच्चाटन आदि तांत्रिक क्रियाओं से बचाना है। प्रचलित नाम पर इन सभी क्रियाओं का असर नहीं होता विफल हो जाती हैं। गुप्त नाम बालक के जन्म के समय ग्रहों की खगोलीय स्थिति के अनुसार नक्षत्र राशि का विवेचन कर के रख जाता है। इसे राशि नाम भी कहा जाता है। बालक की ग्रह दशा भविष्य फल आदि इसी नाम से देखे जाते हैं। विवाह के समय जातक जातिकवों के कुंडली का मिलाप भी राशि नाम के अनुसार होता है। सही और सार्थक नामकरण के लिए बालक के जन्म का समय, जनक स्थान, और जन्म तिथि का सही होना अति आवश्यक है।

दूसरा नाम लोक प्रचलित नाम- योग्य ब्राह्मण या ऋषि बालक के गुणों के अनुरुप बालक का नामकरण करते हैं। जैसे राम, लक्षमण, भरत और शत्रुघ्न का गुण और स्वभाव देख कर ही महर्षि वशिष्ठ ने उनका नामकरण किया था। लेकिन आजकल यह लोक प्रचलित नाम सामान्यतः माता पिता नाना नानी के रूचि के अनुसार रख जाता है। इस नाम से बालक के व्यवसाय, व्यवसाय में किसी पुरुष से शत्रुता और मित्रता के ज्ञान के लिए किया जाता है।

कब किया जाता है नामकरण संस्कार
नामकरण संस्कार आम तौर पर जन्म के दस दिन बाद किया जाता है। दरअसल जातक के जन्म से सूतक प्रारंभ माना जाता है जिसकी अवधि वर्ण व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग होती है। पाराशर स्मृति के अनुसार ब्राह्मण वर्ण में सूतक दस दिन, क्षत्रियों में 12 दिन, वैश्य में 15 दिन तो शूद्र के लिये एक मास का माना गया है। वर्तमान में वर्ण व्यवस्था के अप्रासंगिक होने के कारण इसे सामान्यत: ग्यारहवें दिन किया जाता है। पारस्कर गृहयसूत्र कहता है – “दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति” यानि दसवें दिन भी पिता द्वारा नामकरण किया जाता है। लेकिन इसके लिये यज्ञ का आयोजन कर सूतिका का शुद्धिकरण करवाया जाता है। नामकरण संस्कार 100वें दिन या एक वर्ष बीत जाने के पश्चात भी किया जाता है। गोभिल गृहयसूत्रकार लिखते भी हैं – “जननादृशरात्रे व्युष्टे शतरात्रे संवत्सरे वा नामधेयकरणम्”

कैसे किया जाता है नामकरण
नामकरण संस्कार के दौरान बच्चे को शहद चटाया जाता है, इसके पश्चात आशीर्वचन करते हुए जातक को सूर्यदेव के दर्शन करवाये जाते हैं। सूर्य के दर्शन करवाने के पिछे मान्यता है कि बच्चा भी सूर्य की तरह तेजस्वी हो। धरती माता को भी नमन किया जाता है। सभी देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है। इसके पश्चात शिशु का नाम लेकर उपस्थित जनों द्वारा उसकी लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य व उसके जीवन में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। नामकरण किसी विद्वान ज्योतिषाचार्य द्वारा ही करवाया जाता है क्योंकि जातक का जन्म जिस नक्षत्र में होता है उसी नक्षत्र के अक्षर से जातक का  नाम रखा जाता है। नामकरण के दौरान जातक  के जातिनाम, वंश, गौत्र आदि का भी ध्यान रखा जाता है। वहीं नाम की सार्थकता भी विशेष ध्यान रखा जाता है। नामकरण के दौरान जातक के दो नाम रखे जाते हैं। एक प्रचलित नाम होता है जो सबको बताया जाता है वहीं एक गुप्त नाम भी जातक का रखा जाता है जिसकी जानकारी केवल माता-पिता को होती है। मान्यता है कि इससे जातक मारण, उच्चाटन, मोहन आदि तंत्र-मंत्र, टोने-टोटकों से बचा रहता है, जातक का अहित चाहने वालों द्वारा किये गये इस तरह के अभिचार कर्म असफल रहते हैं।

तो नामकरण संस्कार बहुत ही अच्छा संस्कार है आप भी अपने बच्चे का कोई सुंदर व सार्थक सा नाम रखें। ऐसा नाम कदापि न रखें जिसके कारण बालक को आगे चलकर अपने नाम के कारण किसी हीन भावना का शिकार होना पड़े।

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निष्क्रमण संस्कार

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हिन्दू धर्म संस्कारों में निष्क्रमण संस्कार षष्ठम संस्कार है। निष्क्रमण का अर्थ हैं- बाहर निकलना । इस संस्कार के द्वारा बच्चे को पहली वार सूर्यदेव का दर्शन कराया जाता हैं। बच्चे के पैदा होते ही उसे सूर्य के प्रकाश में नहीं लाना चाहिये। इससे बच्चे की आंखों पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिये जब बालक की आँखें तथा शरीर कुछ पुष्ट बन जाये, तब इस संस्कार को करना चाहिये। इस संस्कार का फल विद्धानों ने शिशु के स्वास्थ्य और आयु की वृद्धि करना बताया है –

निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युद्दिष्टा मनीषिभिः

जन्मे के चौथे मास में निष्क्रमण-संस्कार होता है। जब बच्चे का ज्ञान और कर्मेंन्द्रियों सशक्त होकर धूप, वायु आदि को सहने योग्य बन जाती है। सूर्य तथा चंद्रादि देवताओ का पूजन करके बच्चे को सूर्य, चंद्र आदि के दर्शन कराना इस संस्कार की मुख्य प्रक्रिया है। चूंकि बच्चे का शरीर पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकश से बनता है, इसलिए बच्चे के कल्याण की कामना करते हुए रहता है –

शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ। शं ते सूर्य
आ तपतुशं वातो ते हदे। शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्यः पयस्वतीः ।।

अर्थात् हे बालक! तेरे निष्क्रमण के समय द्युलोक तथा पृथिवीलोक कल्याणकारी सुखद एवं शोभास्पद हों। सूर्य तेरे लिए कल्याणकारी प्रकाश करे। तेरे हदय में स्वच्छ कल्याणकारी वायु का संचरण हो। दिव्य जल वाली गंगा-यमुना नदियाँ तेरे लिए निर्मल स्वादिष्ट जल का वहन करें।

मनुस्मृति में लिखा हैं , यह संस्कार जन्म के चौथे महीने में करना चाहिए। यह संस्कार को शुभ महुरत में करना चाहिए। इस संस्कार किये बिना बच्चे को बाहर निकालना नहीं चाहिए। घर के बाहर के दुनिया में कई तरह के शक्ति भरपूर होते हैं। यहां दैवी और दैत्य शक्ति का समागम होता हैं । निष्पाप शिशु को इन सारी दुष्प्रभाव से रक्षा करने के लिए , बच्चे का पिता प्रार्थना करते हैं। मनुष्य का शरीर पंच महाभूत से बना होता हैं , इस दिन इन देवताऔं का प्रार्थना और पूजा किया जाता हैं। इस संस्कार से संबंधित निम्न मंत्र भी अथर्ववेद में मिलता है –

शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ।
शं ते सूर्य आ तपतुशं वातो वातु ते हृदे।
शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्या: पयस्वती:।।

अर्थात् बालक के निष्क्रमण के समय देवलोक से लेकर भू लोक तक कल्याणकारी, सुखद व शोभा देने वाला रहे। सूर्य का प्रकाश शिशु के लिये कल्याणकारी हो व शिशु के हृद्य में स्वच्छ वायु का संचार हो। पवित्र गंगा यमुना आदि नदियों का जल भी तुम्हारा कल्याण करें।

कब किया जाता है- 
निष्क्रमण संस्कार जातक के जन्म के चौथे मास में किया जाता है। मान्यता है कि जातक के जन्म लेते ही घर में सूतक लग जाता है। जन्म के ग्याहरवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है हालांकि यह कुछ लोग 100  वें दिन या जातक के जन्म के एक वर्ष के उपरांत भी करते हैं। लेकिन जन्म के कुछ दिनों तक बालक को घर के बाहर नहीं निकाला जाता। माना जाता है कि इस समय जातक को सूर्य के प्रकाश में नहीं लाना चाहिये क्योंकि इससे जातक के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ सकता है, विशेषकर आंखों को नुक्सान पंहुचने की संभावनाएं अधिक होती हैं। इसलिये जब जातक शारीरिक रूप से स्वस्थ हो जाये तो ही उसे घर से बाहर निकालना चाहिये यानि निष्क्रमण संस्कार करना चाहिये।

निष्क्रण संस्कार के दिन प्रात:काल उठकर तांबे के एक पात्र में जल लेकर उसमें रोली, गुड़, लालपुष्प की पंखुड़ियां आदि का मिश्रण करें व इस जल से सूर्यदेवता को अर्घ्य देते हुए बालक को आशीर्वाद देने के लिये उनका आह्वान करें। सूर्यास्त के समय ढ़लते सूरज को भी प्रणाम कर शिशु को आशीर्वाद देने के लिये सूर्य देवता का धन्यवाद करना चाहिये। इस पश्चात चंद्रमा के दर्शन भी विधिपूर्वक करवाने चाहिये।


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अन्नप्राशन संस्कार

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हिन्दू धर्म संस्कारों में अन्नप्राशन संस्कार सप्तम संस्कार है। इस संस्कार में बालक को अन्न ग्रहण कराया जाता है। एक कहावत बहुत ही प्रचलित है कि “जैसा खाये अन्न वैसा होगा मन” यानि हम जिस प्रकार का अन्न (भोजन) ग्रहण करते हैं हमारे विचार हमारा व्यवहार भी उसी प्रकार का हो जाता है। सात्विक भोजन से सात्विक गुण और तामसिक भोजन से तामसी प्रवृति हमारे अंदर आ जाती हैं। खान-पान संबंधी दोषों को दूर करने के लिये ही जातक के जन्म के छह-सात मास बाद ही सप्तम संस्कार किया जाता है जिसका नाम है अन्नप्राशन।

छठे माह में बालक का अन्नप्राशन संस्कार किया जाता है। शास्त्रों में अन्न को प्राणियों का प्राण कहा गया है। गीता में कहा गया है कि अन्न से ही प्राणी जीवित रहते हैं। अन्न से ही मन बनता है। इसलिए अन्न का जीवन में सर्वाधिक महत्व है।

अन्नाशनान्मातृगर्भे मलाशाद्यपि शुद्धयति

अर्थात- माता के गर्भ में मलिन भोजन के जो दोष शिशु में आ जाते हैं, उनके निवारण और शिशु को शुद्ध भोजन कराने की प्रक्रिया को अन्नप्राशन-संस्कार कहा जाता है।

शिशु को जब 6-7 माह की अवस्था में पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त प्रथम बार यज्ञ आदि करके अन्न खिलाना प्रारंभ किया जाता है, तो यह कार्य अन्नप्रशन-संस्कार के नाम से जाना जाता है। इस संस्कार का उद्देश्य यह होता है शिशु सुसंस्कारी अन्न ग्रहण करे।

शुद्ध एवं सात्त्विक, पौष्टिक अन्न से ही शरीर व मन स्वस्थ रहते हैं तथा स्वस्थ मन ही ईश्वरानुभुति का एक मात्र साधन है। आहार शुद्ध होने पर ही अंतःकरण शुद्ध होता है।

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः

अर्थात्- शुद्ध आहार से शरीर में सत्त्वगुण की वृद्धि होती है।

हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में अन्नप्राशन संस्कार का भी खास महत्व है। मान्यता है कि छह मास तक शिशु माता के दुध पर ही निर्भर रहता है लेकिन इसके पश्चात उसे अन्न ग्रहण करवाया जाता है ताकि उसका पोषण और भी अच्छे से हो सके। शिशु को पहली बार माता के दुध के अलावा अन्य अन्न दुध आदि पिलाये जाने की क्रिया को अन्नप्राशन कहा जाता है।

अब तक तो शिशु माता का दुग्धपान करके ही वृद्धि को प्राप्त होता था, अब आगे स्वयं अन्न ग्रहण करके ही शरीर को पुष्ट करना होगा, क्योंकि प्राकृतिक नियम सबके लिये यही है। अब बालक को परावलम्बी न रहकर धीरे-धीरे स्वावलम्बी बनना पड़ेगा। केवल यही नहीं, आगे चलकर अपना तथा अपने परिवार के सदस्यों के भी भरण-पोषण का दायित्व संम्भालना होगा। यही इस संस्कार का तात्पर्य है।

कब किया जाता है- 
अन्नप्राशन संस्कार से पहले निष्क्रमण संस्कार किया जाता है जो कि जन्म के पश्चात चतुर्थ मास में किया जाता है। अन्नप्राशन संस्कार छठे या सातवें मास में किया जाता है। चूंकि छह मास तक जातक को माता का दुध ही दिया जाना चाहिये इस कारण यह संस्कार सातवें माह में किया जाना चाहिये। इसका कारण यह भी है कि इस अवस्था तक शिशु हल्का भोजन पचाने में सक्षम हो जाता है। इस समय शिशु को ऐसा अन्न दिया जाना चाहिये जो पचाने में आसान व पौष्टिक हो। इसी समय शिशु के दांत भी निकल रहे होते हैं जिससे उसका पाचनतंत्र मजबूत होने लगता है। ऐसे में पौष्टिक भोजन के सेवन से शिशु तंदुरुस्त होने लगता है।

शास्त्रों में देवों को खाद्य पदार्थ निवेदित करके अन्न खिलाने का विधान बताया गया है। इस संस्कार में शुभमुहूर्त में देवताओं का पूजन करने के पश्चात् माता-पिता चांदी के चम्मच से खीर आदि पवित्र और पुष्टिकारक अन्न शिशु को चटाते हैं और निम्नलिखित मंत्र बोलते हैं-

शिवौ ते स्तां व्रीहियवावबलासावदोमधौ।
एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुंचतो अंहसः।।

अर्थात्- हे बालक! जौ और चावल तुम्हारे लिए बलदायक तथा पुष्टिकारक हों, क्योंकि ये दोनों वस्तुएं यक्ष्मानाशक हैं तथा देवान्न होने से पापनाशक हैं।

कैसे किया जाता है- 
अन्न न सिर्फ शारीरिक पोषण बल्कि मन, बुद्धि, तेज़ व आत्मिक पोषण के लिये भी आवश्यक होता है। इससे जातक तेजस्वी व बलशाली होता है। इस संस्कार के दौरान शिशु को भात, दही, शहद और घी आदि को मिश्रित कर खिलाया जाता है। अन्न से जातक का शारीरिक व आत्मिक विकास होता है। संस्कार के लिये शुभमुहूर्त देखकर उसमें देवताओं का पूजन करना चाहिये। देवपूजा के पश्चात चांदी के चम्मच से खीर आदि का पवित्र प्रसाद शिशु को मंत्रोच्चारण के साथ माता-पिता द्वारा चटाया जाता है। इस दौरान माता-पिता को निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिये-

ॐ याऽ ओषधीः पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनै नु बभ्रूणामह* शतं धामानि सप्त च॥

गंगाजल की कुछ बूंदें पात्र में डालकर मिलाएँ। पतितपावनी गङ्गा खाद्य की पापवृत्तियों का हनन करके उसमें पुण्य संवर्द्धन के संस्कार पैदा    कर रही हैं। ऐसी भावना के साथ उसे चम्मच से मिलाकर एक दिल कर दें। जैसे यह सब भिन्न-भिन्न वस्तुएँ एक हो गयीं, उसी प्रकार भिन्न- भिन्न श्रेष्ठ संस्कार बालक को एक समग्र श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्रदान करें।

ॐ पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः।
सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेभवत्सरित्॥

सभी वस्तुएँ मिलाकर वह मिश्रण पूजा वेदी के सामने संस्कारित होने के लिए रख दिया जाए। इसके बाद अग्नि स्थापन से लेकर गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ पूरी करने तक का क्रम चलाया जाए।

गायत्री मन्त्र की आहुतियाँ पूरी हो जाने पर पहले तैयार की गयी खीर से ५ आहुतियाँ नीचे लिखे मन्त्र के साथ दी जाएँ। भावना की जाए कि वह    खीर इस प्रकार यज्ञ भगवान् का प्रसाद बन रही है।

ॐ देवीं वाचमजनयन्त देवाः तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति।
सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु स्वाहा॥

इदं वाचे इदं न मम। -ऋ० ८.१००.११

आहुतियाँ पूरी होने पर शेष खीर से बच्चे को अन्नप्राशन कराया जाए।

क्रिया और भावना-  
खीर का थोड़ा- सा अंश चम्मच से मन्त्र के साथ बालक को चटा दिया जाए। भावना की जाए कि वह यज्ञावशिष्ट खीर अमृतोपम गुणयुक्त है और बालक के शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक सन्तुलन, वैचारिक उत्कृष्टता तथा चारित्रिक प्रामाणिकता का पथ प्रशस्त करेगी।

नोट - अन्नप्राशन संस्कार के दौरान ज्यादा भीड़ न जुटाएं। हो सकता है अधिक लोगों को देखकर आपका बच्चा परेशान हो जाए। इस कार्यक्रम के दौरान बच्चे को भारी-भरकम ड्रेस पहनाने से बचें। इससे बच्चा असहज महसूस करने लगता है। इसके अलावा उसके शरीर पर रेशेज की समस्या भी हो सकती है। इसलिए बच्चे को हल्के व ढीले कपड़े पहनाएं। इस संस्कार के दौरान कई जगह कई लोग बच्चे को खाना खिलाते हैं। इस मौके पर आपको थोड़ा अलर्ट होने की जरूरत है। दरअसल छोटी उम्र में बच्चा बहुत ज्यादा भोजन पचा नहीं सकता, इसलिए उसे ज्यादा खिलाने से बचें।

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मुंडन (चूड़ाकर्म) संस्कार विधि

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चूड़ाकर्म संस्कार – हिंदू धर्म में आठवां संस्कार मुंडन संस्कार होता है। यह संस्कार पहले या तीसरे साल में किया जाता है। चूड़ाकर्म संस्कार, जिसे “चौलकर्म’ भी कहा जाता है, केवल पुत्र संतति के लिए किया जाता है। इसका अर्थ है “शिशु का मुण्डन पूर्वक “शिखा’ ( चूड़ा ) का निर्धारण करना’। सभी हिंदू शास्रकारों ने इसका वर्णन किया है।

माना जाता है कि शिशु जब माता के गर्भ से बाहर आता है तो उस समय उसके केश अशुद्ध होते हैं। शिशु के केशों की अशुद्धि दूर करने की क्रिया ही चूड़ाकर्म संस्कार कही जाती है। दरअसल हमारा सिर में ही मस्तिष्क भी होता है इसलिये इस संस्कार को मस्तिष्क की पूजा करने का संस्कार भी माना जाता है। जातक का मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहे व वह अपने दिमाग को सकारात्मकता के साथ सार्थक रुप से उसका सदुपयोग कर सके यही चूड़ाकर्म संस्कार का उद्देश्य भी है। इस संस्कार से शिशु के तेज में भी वृद्धि होती है।

बाल कटवाने से शरीर की अनावश्यक गर्मी निकल जाती है, दिमाग व सिर ठंडा रहता है व बच्चों में दांत निकलते समय होने वाला सिर दर्द व तालु का कांपना बंद हो जाता है। शरीर पर और विशेषकर सिर पर विटामिन-डी (धूप के रूप) में पड़ने से कोशिकाएं जाग्रत होकर खून का प्रसारण अच्छी तरह कर पाती हैं जिनसे भविष्य में आने वाले केश बेहतर होते हैं।

कब करें- 
मनुस्मृति के अनुसार द्विजातियों को प्रथम अथवा तृतीय वर्ष में यह संस्कार करना चाहिये। अन्नप्राशन संस्कार के कुछ समय पश्चात प्रथम वर्ष के अंत में इस संस्कार को किया जा सकता है। लेकिन तीसरे वर्ष यह संस्कार किया जाये तो बेहतर रहता है। इसका कारण यह है कि शिशु का कपाल शुरु में कोमल रहता है जो कि दो-तीन साल की अवस्था के पश्चात कठोर होने लगता है। ऐसे में सिर के कुछ रोमछिद्र तो गर्भावस्था से ही बंद हुए होते हैं। चूड़ाकर्म यानि मुंडन संस्कार द्वारा शिशु के सिर की गंदगी, कीटाणु आदि दूर हो जाते हैं। इससे रोमछिद्र खुल जाते हैं और नये व घने मजबूत बाल आने लगते हैं। यह मस्तिष्क की रक्षा के लिये भी आवश्यक होता है। कुछ परिवारों में अपनी कुल परंपरा के अनुसार शिशु के जन्म के पांचवे या सातवें साल भी इस संस्कार को किया जाता है।

अधिकतर धर्मशास्रकारों ने इसे जन्म से तीसरे वर्ष में किये जाने का प्रस्ताव किया है, किंतु बौधा० ( 2/8 ), पार० गृ० सू० ( 2.1.1- 2 ) तथा मनु० (2.35 ) के अनुसार उसे जन्म के प्रथम या तृतीय वर्ष में संपन्न किया जाना चाहिए

लेकिन आश्व० गृ० सू० (1/17/1 पर नारायणी टीका ) तथा अन्य उत्तरकालीन “संस्कारप्रकाश’ आदि संस्कार पद्धतियों में कहा गया है कि चौल कर्म के लिए यद्यपि प्रथम, तृतीय या पंचम वर्षों को सर्वाधिक उपयुक्त समझा गया है

असुविधा होने पर इसे इससे पूर्व या बाद में अथवा उपनयन संस्कार के साथ भी किया जा सकता है। इसीलिए कई सामाजिक वर्गों में इसे उपनयन के साथ ही किये जाने की परिपाटी पायी जाती है।

कहां करें- 
उत्तर भारत में अधिकतर गंगा तट पर, दुर्गा मंदिरों के प्रांगण में तथा दक्षिण भारत में तिरुपति बालाजी मंदिर तथा गुरुजन देवता के मंदिरों में मुंडन संस्कार किया जाता है। संस्कार के बाद केशों को दो पुड़ियों के बीच रखकर जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। कहीं-कहीं केश वैसे ही विसर्जित कर दिए जाते हैं। जब सूर्य मकर, कुंभ, मेष, वृष तथा मिथुन राशियों में हो, तब मुंडन शुभ माना जाता है। परंतु बड़े लड़के का मुंडन जब सूर्य वृष राशि पर हो और मां 5 माह की गर्भवती हो, तब उस वर्ष नहीं करना चाहिए।

गर्भाधान मतश्र्च पुंसवनकं सीमंत जातामिधे नामारण्यं सह निष्क्रमेण च तथा अन्नप्राशनं कर्म च।
चूड़ारण्यं व्रतबन्ध कोप्यथ चतुर्वेद व्रतानां पुरः, केशांतः सविसिर्गकः परिणयः स्यात षोडशी कर्मणाम्‌”॥

जन्म के पश्चात्‌ प्रथम वर्ष के अंत या फिर तीसरे, पांचवें या सातवें वर्ष की समाप्ति के पूर्व शिशु का मुंडन संस्कार करना आमतौर पर प्रचलित है क्योंकि हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार एक वर्ष से कम उम्र में मुंडन करने से शिशु के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। साथ ही अमंगल होने का भय बना रहता है।

कुल परंपरा के अनुसार मुंडन संस्कार- 
कुल परंपरा के अनुसार प्रथम, तृतीय, पंचम या सप्तम वर्ष में भी मुंडन संस्कार करने का विधान है। शास्त्रीय एवं पौराणिक मान्यताएं यह हैं कि शिशु के मस्तिष्क को पुष्ट करने, बुद्धि में वृद्धि करने तथा गर्भावस्था की अशुचियों को दूर कर मानवतावादी आदर्शों हेतु मुंडन संस्कार किया जाता है। इसका उद्देश्य बुद्धि, विद्या, बल, आयु और तेज की वृद्धि करना है।

देवस्थान और तीर्थ स्थल पर मुंडन का महत्व- 
मुंडन संस्कार किसी देवस्थल या तीर्थ स्थल पर इसलिए कराया जाता है कि उस स्थल के दिव्य वातावरण का लाभ शिशु को मिले तथा उसके मन में सुविचारों की उत्पत्ति हो।

मुंडन संस्कार से दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है। शिशु सुंदर तथा कल्याणकारी कार्यों की ओर प्रवृत्त होने वाला बनता है।

तेन ते आयुषे वयामि सुश्लोकाय स्वस्तये”। आश्वलायन गृह्यसूत्र 1/17/12

जिस शिशु का मुंडन संस्कार सही समय एवं शुभ मुहूर्त में नहीं किया जाता है उसमें बौद्धिक विकास एवं तेज शक्ति का अभाव पाया जाता है। इसलिए शिशु का मुंडन शास्त्रीय विधि से अवश्य किया जाना चाहिए।

यजुर्वेद तो यहां तक कहता है कि दीर्घायु के लिये, अन्न ग्रहण करने में सक्षम करने, उत्पादकता के लिये, ऐश्वर्य के लिये, सुंदर संतान, शक्ति व पराक्रम के लिये चूड़ाकर्म अर्थात मुंडन संस्कार करना चाहिये।

नि वर्त्तयाम्यायुषेड्न्नाद्याय प्रजननाय।
रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय॥

अर्थात हे बालक! मैं तेरी दीर्घायु के लिए, तुझे अन्न-ग्रहण करने में समर्थ बनाने के लिए, उत्पादन शाक्ति प्राप्ति के लिए, ऐश्वर्य वृद्धि के लिए, सुंदर संतान के लिए एवं बल तथा पराक्रम प्राप्ति के योग्य होने के लिए तेरा चूडाकर्म संस्कार (मूडंन) करता हूं।

संस्कार कर्म -
सर्व प्रथम शिशु अथवा बालक को गोद में लेकर उसका चेहरा हवन की अग्नि के पश्चिम में किया जाता है। पहले कुछ केश पंडित के हाथ से और फिर नाई द्वारा काटे जाते हैं। इस अवसर पर गणेश पूजन, हवन, आयुष्य होम आदि पंडित जी से करवाया जाता है। फिर बाल काटने वाले को, पंडित आदि को आरती के पश्चात्‌ भोजन व दान दक्षिणा दी जाती है।

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विद्यारंभ संस्कार

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हिन्दू धर्म संस्कारों में विद्यारंभ संस्कार दशम संस्कार है। विद्यारंभ संस्कार का संबंध उप नयन संस्कार की भांति गुरूकुल प्रथा से था, जब गुरूकुल का आचार्य बालक को यज्ञोपवीत धारण कराकर, वेदाध्ययन करता था। गुरूजनों से वेदों और उपनिषदों का अध्ययन कर तत्वज्ञान की प्राप्ति करना ही इस संस्कार का परम प्रयोजन है। जब बालक-बालिका का मस्तिष्क शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाता है, तब यह संस्कार किया जाता है। आमतौर पर 5 वर्ष का बच्चा इसके लिए उपयुक्त होता है।

मंगल के देवता गणेश और कला की देवी सरस्वती को नमन करके उनसे प्रेरणा ग्रहण करने की मूल भावना इस संस्कार में निहित होती है। बालक विद्या देने वाले गुरू का पूर्ण श्रद्धा से अभिवादन व प्रणाम इसलिए करता है कि गुरू उसे एक श्रेष्ठ मानव बनाए। ज्ञानस्वरूप वेदों का विस्तृत अध्ययन करने के पूर्व मेधाजनन नामक एक उपांग संस्कार करने का विधान भी शास्त्रों में वर्णित है।

इसके करने से बालक में मेधा, प्रज्ञा, विद्या, तथा श्रद्धा की अभिवृद्धि होती है। इससे वेदाध्ययन आदि में न केवल सुविधा होती है, बल्कि विद्याध्ययन में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती।

ज्योतिर्निबंध में लिखा हैं-

विद्यया लुप्यते पापं विद्ययाअयु: प्रवर्धते।
विद्यया सर्वसिद्धि: स्याद्विद्ययामृतमश्नुते।।

अर्थात- वेदविद्या के अध्ययन से सारे पापों का लोप होता है, आयु की वृद्धि होती है, सारी सिद्धियां प्राप्त होती हैं, यहां तक कि विद्यार्थी के समक्ष साक्षात अमृतरस अशन पान के रूप में उपलब्ध हो जाता है।

शास्त्रवचन है कि जिसे विद्या नहीं आती, उसे धर्म, अर्थ,ख्काम, मोक्ष के चारों फलों से वंचित रहना पडता है। इसलिए विद्या की आवश्यकता अनिवार्य है।

सामजिक परिप्रेक्ष्य में विद्यारंभ संस्कार की आवश्यकता-
विद्या और ज्ञान का इंसान के जीवन में क्या महत्व है इसको हर कोई भली-भांति जानता है। हर इंसान का शिक्षित होना समाज को भी सुधारता है। जिस समाज में शिक्षित लोगों की संख्या जितनी ज्यादा होती है वहां उपद्रव उतने ही कम होते हैं। हालांकि सिर्फ किताबों से ली गई जानकारी को ज्ञान नहीं कहा जा सकता असली ज्ञान या विद्या वो है जो इंसान में विवेक बुद्धि का विकास कर सके। जब इंसान में विवेक का उदय हो जाता है तो वो अच्छे-बुरे में सही तरीके से फर्क कर पाता है और समाज में सही मूल्यों का सूत्रपात होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए विद्यारंभ संस्कार का सामजिक परिप्रेक्ष्य में ये महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है ताकि आने वाले समय में बच्चा अपनी विद्या और अपने ज्ञान को विवेक के साथ इस्तेमाल कर सके।

विद्यारम्भ संस्कार– कर्मकांड
  • विद्या, ज्ञान और शिक्षा का प्रतीक माँ सरस्वती और भगवान गणेश को माना जाता है इसलिए विद्यारंभ के दौरान पूजा स्थल पर इन दोनों की प्रतिमाएं या चित्र होने चाहिए।
  • पूजन स्थल में पट्टी, दवात, लेखनी, स्लेट और खड़िया भी रखी जानी चाहिए।
  • गुरु पूजन के लिए यदि बच्चे के गुरु उपस्थित हों तो उनकी पूजा की जानी चाहिए नहीं तो प्रतीक रूप में नारियल की पूजा की जानी चाहिए।
  • उपर्युक्त तैयारियाँ करने के बाद भगवान गणेश और माँ सरस्वती का श्रद्धापूर्वक पूजन किया जाता है। इसमें सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है उसके बाद माँ सरस्वती की पूजा की जाती है।


गणेश पूजन                                                 सरस्वती पूजन
क्रियाबच्चे के हाथ में फूल, अक्षत, रोली देकर मंत्र जाप के साथ-साथ भगवान गणेश की मूर्ति या चित्र के सामने अर्पित करें।बच्चे के हाथ में फूल, अक्षत, रोली देकर मंत्र जाप के साथ-साथ माँ सरस्वती की मूर्ति या चित्र के सामने अर्पित करें।
भावनापूजन के दौरान अपने मन में प्रार्थना करें कि विवेक के अधिष्ठाता गणपति बालक पर अपनी कृपा रखें और उनके आशीर्वाद से बालक के विवेक में निरंतर वृद्धि हो। साथ ही बालक/बालिका की बुद्धि भी प्रखर हो।पूजा के दौरान मन में प्रार्थना करें कि बालक/बालिका को ज्ञान, कला और संवेदना की देवी माँ सरस्वती का आशीर्वाद मिले और, माँ सरस्वती के आशीर्वाद से ज्ञान और कला के प्रति बालक/बालिका का रुझान हमेशा बना रहे।
मंत्र“गणानां त्वा गणपतिं हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे |
निधीनां त्वा निधिपतिं हवामहे वसो मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम्||”
“ॐ गणपतये नमः। आवाहयामि, स्थापयामि ध्यायामि||”
“ॐ पावका नः सरस्वती, वाजेभिवार्जिनीवती। यज्ञं वष्टुधियावसुः।”
“ॐ सरस्वत्यै नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।”
भगवान गणेश और माँ सरस्वती के पूजन के बाद शिक्षा ग्रहण करने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले उपकरणों (दवात, कलम और पट्टी) का पूजन करें।

विद्या प्राप्ति में इन उपकरणों के महत्व को देखते हुए इन्हें विद्यारंभ संस्कार के दौरान वेदमंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है ताकि इनका शुरूआती प्रभाव मंगलकारी हो सके।

अधिष्ठात्री देवी पूजन
  • उपासना विज्ञान की मान्यताओं के अनुसार कलम की अधिष्ठात्री देवी ‘धृति’ हैं, पट्टी या स्लेट की अधिष्ठात्री देवी ‘तुष्टि’ हैं और दवात की अधिष्ठात्री देवी पुष्टि हैं।
  • षोडश मातृकाओं में तीनों देवियां धृति, पुष्टि और तुष्टि उन तीन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं जो ज्ञान और विद्या हासिल करने के लिए बहुत जरुरी और आधारभूत हैं।
  • अतः विद्यारंभ संस्कार के दौरान कलम, दवात और पट्टी का पूजन करते समय इनसे संबंधित अधिष्ठात्री देवियों का पूजन किया जाता है।

लेखनी पूजन
विद्यारंभ संस्कार के दौरान बालक/बालिका के हाथ में कलम दी जाती है। चूकि कलम की देवी धृति को माना जाता है जिनका भाव ‘अभिरुचि’ है। विद्या प्राप्त करने वाले के मन में यदि विद्या पाने की अभिरुचि होगी तो जीवन में वो हमेशा आगे बढ़ता जाएगा। अगर ऐसा नहीं होता तो जीवन के कई क्षेत्रों में इंसान पीछे रह जाता है। अतः कलम पूजन के दौरान धृति देवी से प्रार्थना करनी चाहिए कि शिक्षार्थी की अभिरुचि निरंतर अध्ययन में बढ़ती ही जाए और वो शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे परिणाम हासिल करे।

क्रिया- कलम पूजन के लिए बालक/बालिका के हाथ में पुष्प, अक्षत और रोली देकर पूजा स्थल पर स्थापित कलम पर मंत्र को उच्चारित करते हुए चढ़ाएं।

मंत्र-   “ॐ पुरुदस्मो विषुरूपऽ इन्दुः अन्तमर्हिमानमानंजधीरः।

एकपदीं द्विपदीं त्रिपदीं चतुष्पदीम्, अष्टापदीं भुवनानु प्रथन्ता स्वाहा।” ….-८.३०

भावना- पूजन के दौरान अभिभावकों को यह भावना रखनी चाहिए कि धृति शक्ति भविष्य में शिक्षार्थी की रूचि ज्ञान और विद्या में लगाए रखेगी।

दवात पूजन
कलम का इस्तेमाल बिना दवात के नहीं किया जाता। कलम स्याही या खड़िया के सहारे ही लिख पाने में समर्थ होती है। इसी वजह से कलम के बाद दवात पूजन किया जाता है। दवात की अधिष्ठात्री देवी ‘पुष्टि’ को माना गया है। पुष्टि का भाव एकाग्रता होता है, इंसान के अंदर यदि एकाग्रता है तो वो कठिन से कठिन विषय को भी वे आसानी से समझ सकता है। इसलिए पुष्टि देवी की आराधना करना अति आवश्यक है। इसके लिए पूजा स्थल में राखी दवात के कंठ पर कलावा बांधा जाता है और रोल, धूप, अक्षत और पुष्प से दवात का पूजन किया जाता है।

क्रिया- पूजा स्थल पर रखी दवात पर मंत्र का जाप करते हुए बालक/बालिका के हाथों से पूजन सामग्री चढ़ाएं।

मंत्र-  “ॐ देवीस्तिस्रस्तिस्रो देवीवर्योधसं, पतिमिन्द्रमवद्धर्यन्।

जगत्या छन्दसेन्दि्रय शूषमिन्द्रे, वयो दधद्वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज॥”   …. -२८.४१

भावना- माता-पिता को मन में यह भावना रखनी चाहिए कि पुष्टि शक्ति के सान्निध्य से बालक/बालिका में तीव्र बुद्धि का विकास हो और उनके अंदर एकाग्रता का गुण आए।

पट्टी पूजन
कलम और दवात के बाद पट्टी का पूजन किया जाता है। कलम और दवात का उपयोग तभी हो पाता है जब पट्टी या कागज़ उपलब्ध हों, इनकी अधिष्ठात्री देवी ‘तुष्टि’ हैं। तुष्टि का भाव है मेहनत और श्रमशीलता। अच्छा ज्ञान प्राप्त करने के लिए श्रम की भी आवश्यकता होती है। कई लोग ऐसे होते हैं जिनमें पढ़ने के प्रति रूचि भी होती है और मन एकाग्र भी हो जाता है लेकिन उनके अंदर सुस्ती होने के कारण वो जीवन में कुछ नहीं कर पाते इसलिए तुष्टि देवी से कामना की जाती है कि वो शिक्षार्थी को श्रमशील बनाएं।

क्रिया- पट्टी पूजन के दौरान मंत्रोच्चारण के साथ बालक/बालिका के हाथों से पूजा-स्थल पर स्थापित पट्टी पर पूजन सामग्री अर्पित कराए।

मंत्र-  ॐ सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां, पतनी सुकृतं बिभर्ति।

अपारसेन वरुणो न साम्नेन्द्र, श्रियै जनयन्नप्सु राजा॥” . – १९.९४

भावना- अभिभावक मन में यह भावना रखें कि तुष्टि शक्ति शिक्षार्थी को श्रमशील बनाए और वह जीवन के हर मोड़ पर मेहनत कर सके।

गुरु पूजन
शिक्षा प्राप्त करने के लिए अध्यापक का होना अनिवार्य है। जैसे अंधकार में एक दिया उजाला कर देता है उसी प्रकार गुरु भी शिष्य में छिपे अँधेरे को ज्ञान रुपी दिए से दूर कर देता है। विद्यारंभ संस्कार के दौरान बालक/बालिका द्वारा गुरु की भी पूजा की जाती है। इससे शिक्षार्थी के मन में अपने गुरु के प्रति सम्मान में वृद्धि होती है और शिक्षक भी शिक्षार्थी को उचित ज्ञान देने के लिए प्रतिबद्ध होता है। हमारे शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा से भी ऊपर माना गया है क्योंकि गुरु के द्वारा ही हमें संसार का ज्ञान होता है।

क्रिया- पूजन प्रक्रिया के दौरान अगर बालक/बालिका के गुरु समक्ष न हों तो गुरु के प्रतीक स्वरूप नारियल का मंत्रोच्चारण के द्वारा पूजन करें।

मंत्र-
“ॐ बृहस्पते अति यदयोर्ऽ, अहार्द्द्युमद्विभाति क्रतुमज्ज्जनेषु,
यद्दीदयच्छवसऽ ऋतप्रजात, तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।

उपयामगृहीतोऽसि बृहस्पतये, त्वैष ते योनिबृर्हस्पतये त्वा॥
ॐ श्री गुरवे नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।”   …..-२६.३, तैत्ति०सं० १.८.२२.१२।

भावना- बालक में शिष्योचित गुण विकसित हों और वो अपने शिक्षक की बातों को भली भाँती समझ पाए यह भावना मन में होनी चाहिए। इसके साथ ही यह भावना भी मन में बनी रहनी चाहिए कि शिक्षार्थी गुरु का कृपा पात्र बना रहे।

अक्षर लेखन और पूजन
पट्टी या कागज़ पर बालक/बालिका द्वारा ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ लिखा जाए। ऐसा भी किया जा सकता है कि खड़िया के द्वारा शिक्षक स्लेट पर ये शब्द लिख दे और उसके बाद माता पिता के हाथों की सहायता से बालक उन शब्दों के ऊपर लिखे। या शिक्षार्थी का हाथ पकड़कर गुरु स्लेट या कागज पर  ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ लिखवाए। ॐ भूर्भुवः स्वः में ॐ परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ नाम है, भू: का अर्थ है श्रम, भुवः का अर्थ है संयम और स्वः का अर्थ है विवेक। ये सारे गुण शिक्षा प्राप्ति के लिए बहुत जरुरी हैं इसलिए विद्याआरंभ संस्कार के दौरान शिक्षार्थी द्वारा यह शब्द लिखवाए जाते हैं। यह काम अगर गुरु द्वारा करवाया जाए तो बहुत शुभ होता है।

क्रिया- अभिभावक अक्षर लेखन करवाने के बाद बालक के हाथों से मंत्र का जाप करते हुए उनपर फूल, अक्षत चढ़वाएं।

मंत्र- 
“ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च,
नमः शंकराय च मयस्कराय च, नमः शिवाय च शिवतराय च।”  ….- १६.४१

भावना- ज्योतिषियों अनुसार अगर ज्ञान को अभिव्यक्त न किया जा सके तो उस ज्ञान का कोई महत्व नहीं रह जाता इसलिए अक्षर पूजन के द्वारा बालक/बालिका में अभिव्यक्ति के गुण डालने की कोशिश की जाती है। ज्ञान के प्रथम चरण में अभिभावकों को अक्षर पूजन कर बालक/बालिका के अंदर खुद को अभियक्त करने की जिज्ञासा डालने का प्रयास किया जाता है।

विशेष आहुति
विद्यारंभ संस्कार के अंतिम चरण में हवन सामग्री में कुछ मिष्ठान मिलाकर पांच बार निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ पांच आहुतियां  बालक/बालिका से डलवाएं। मन में भावना करें कि यज्ञ से आयी ऊर्जा से बालक/बालिका में अच्छे संस्कार आए और मानसिक रूप से शिक्षार्थी बलिष्ठ हो।

मंत्र- 
“ॐ सरस्वती मनसा पेशलं, वसु नासत्याभ्यां वयति दशर्तं वपुः।
रसं परिस्रुता न रोहितं, नग्नहुधीर्रस्तसरं न वेम स्वाहा। इदं सरस्वत्यै इदं न मम।” …..-१९.८३

विशेष आहुति होने के बाद यज्ञ के बाकी कर्म पूरे कर लेने चाहिए और उसके बाद आशीर्वचन, विसर्जन और जयघोष किया जाना चाहिए। अंत में प्रसाद वितरण करने के बाद विद्यारंभ संस्कार का समापन किया जाना चाहिए।

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