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गाय पालन के बारे में सम्पूर्ण जानकारी

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गाय का यूं तो पूरी दुनिया में ही काफी महत्व है, लेकिन भारत के संदर्भ में बात की जाए तो प्राचीन काल से यह भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही है। चाहे वह दूध का मामला हो या फिर खेती के काम में आने वाले बैलों का। वैदिक काल में गायों की संख्‍या व्यक्ति की समृद्धि का मानक हुआ करती थी। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है। गाय पालन ,दूध उत्पादन व्यवसाय या डेयरी फार्मिंग छोटे व बड़े स्तर दोनों पर सबसे ज्यादा विस्तार में फैला हुआ व्यवसाय है। गाय पालन व्यवसाय, व्यवसायिक या छोटे स्तर पर दूध उत्पादन किसानों की कुल दूध उत्पादन में मदद करता है और उनकी आर्थिक वृद्धि को बढ़ाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि, भारत में कई वर्षों से गाय पालन कर डेयरी फार्मरों ने दूध उत्पादन से आर्थिक वृद्धि में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गाय पालन कर दूध उत्पादन ने हमारे देश की अर्थव्यवस्था में बड़े स्तर पर भागीदारी की है और बहुत से गरीब किसानों को गाय पालन कर अपना व्यवसाय स्थापित करने में सहयोग किया है। यदि किसी के पास दूध उत्पादन का व्यवसाय स्थापित करने के लिए प्रारंभिक पूँजी है तो, दूध उत्पादन व्यवसाय को किसी भी क्षेत्रों में आसानी से स्थापित किया जा सकता है।

गाय की नस्ल का चुनाव – 

जब कभी भी आप गाय पालन का व्यवसाय करने को सोंचे तो आपके लिए ये जानना बहुत जरुरी है की कौन सी नस्ल की गाय सबसे ज्यादा दूध देती है। किस नस्ल की गाय का बछड़ा दूध का उत्पादन करने के जल्दी बढ़ता है या फिर पुरुष बछड़ों को आप कितना बेच सकते है इन सभी बातों का अच्छे से पता कर लेना चाहिए । गाय को अपने शहर के जलवायु के अनुसार हीं खरीदना चाहिए ताकि वे आपके शहर की जलवायु को बर्दास्त कर सके इसलिए बेहतर होगा की गाय आप अपने शहर से हीं ख़रीदे। आपके लिए ये जानना भी बेहत जरुरी है की किस नस्ल के दूध के लिए स्थानीय मांग ज्यादा है । हम आपको बताएँगे की कौन सी नस्ल की गाय ज्यादा दूध उत्पादन करती है :- क्लिक कर आगे पढ़े -गाय की देशी तथा अन्य नस्लों के बारे में जानकारी ।

गाय पालन की जगह-

जब भी आप गाय पालन व्यवसाय का सोच रहे हों तो सबसे पहले आपको गाय को रखने के लिए जगह की अव्यश्कता होगी। गाय को रखने के लिए ऐसे जगह का चयन करना चाहिए जो बाजार से  ज्यादा दूर ना हो और उस जगह पर यातायात की सुविधा भी अच्छी हो। भले हीं आप व्यवसाय 2-3 गाय से शुरु कर रहे हों लेकिन जगह का चुनाव इतना बड़ा जरुर से करे जिससे आप भविष्य  में और भी गाय को वहां रख सकें ।

गाय रखने वाली जगह पर कुछ और चीजो की जरूरत होती है जैसे की :- 
  • उस जगह पर गाय के रहने के लिए केवल ऊपर से shade किया हुआ छोटा छोटा घर बना दें जो की चारो ओर से हवादार हो ।
  • जमीन चिकनी और हलकी ढलाव वाली होनी चाहिए ताकि जब गाय पेशाब (toilet) करे तो वो जमने के वजय आसानी से बह जाए ।
  • चिकनी जमीं पर गाय की गोबर को उठाने में भी आसानी होती है ।

प्रजनन-

  • अपनी आय को अधिक दूध वाले सांड के बीज से फलावें ताकि आने वाली संतान अपनी माँ से अधिक दूध देने वाली हो| एक गाय सामान्यत: अपनी जिन्दगी में 8 से 10 बयात दूध देती हैं आने वाले दस वर्षों तक उस गाय से अधिक दूध प्राप्त होता रहेगा अन्यथा आपकी इस लापरवाही से बढ़े हुए दूध से तो आप वंचित रहेंगे ही बल्कि आने वाली पीढ़ी भी कम दूध उत्पादन वाली होगी। अत: दुधारू गायों के बछड़ों को ही सांड बनाएँ|
  • गाय के बच्चा देने से 60 से 90 दिन में गाय पुन: गर्भित हो जाना चाहिए| इससे गाय से अधिक दूध, एवं आधिक बच्चे मिलते हैं तथा सूखे दिन भी कम होते है।
  • गाय के फलने के 60 से 90 दिन बाद किसी जानकार पशु चिकित्सा से गर्भ परिक्षण करवा लेना चाहिए| इससे वर्ष भर का दूध उत्पादन कार्यक्रम तय करने में सुविधा होती है।
  • गर्भावस्था के अंतिम दो माह में दूध नहीं दूहना चाहिए तथा गाय को विशेष आहार देना चाहिए। इससे गाय को बच्चा जनते वक्त आसानी होती है तथा अगले बयात में गाय पूर्ण क्षमता से दूध देती है।

गाय पालन के लिए आहार -

इस नसल की गायों को जरूरत के अनुसार ही खुराक दें। फलीदार चारे को खिलाने से पहले उनमें तूड़ी या अन्य चारा मिला लें। ताकि अफारा या बदहजमी ना हो। आवश्यकतानुसार खुराक का प्रबंध नीचे लिखे अनुसार है।

खुराक प्रबंध
जानवरों के लिए आवश्यक खुराकी तत्व: उर्जा, प्रोटीन, खनिज पदार्थ और विटामिन।

खुराकी वस्तुएं:
अनाज और इसके अन्य पदार्थ: मक्की, जौं, ज्वार, बाजरा, छोले, गेहूं, जई, चोकर, चावलों की पॉलिश, मक्की का छिलका, चूनी, बड़ेवें, बरीवर शुष्क दाने, मूंगफली, सरसों, बड़ेवें, तिल, अलसी, मक्की से तैयार खुराक, गुआरे का चूरा, तोरिये से तैयार खुराक, टैपिओका, टरीटीकेल आदि।

हरे चारे: बरसीम (पहली, दूसरी, तीसरी, और चौथी कटाई), लूसर्न (औसतन), लोबिया (लंबी ओर छोटी किस्म), गुआरा, सेंजी, ज्वार (छोटी, पकने वाली, पकी हुई), मक्की (छोटी और पकने वाली), जई, बाजरा, हाथी घास, नेपियर बाजरा, सुडान घास आदि।

सूखे चारे और आचार: बरसीम की सूखी घास, लूसर्न की सूखी घास, जई की सूखी घास, पराली, मक्की के टिंडे, ज्वार और बाजरे की कड़बी, गन्ने की आग, दूर्वा की सूखी घास, मक्की का आचार, जई का आचार आदि।

अन्य रोज़ाना खुराक भत्ता: मक्की/ गेहूं/ चावलों की कणी, चावलों की पॉलिश, छाणबुरा/ चोकर, सोयाबीन/ मूंगफली की खल, छिल्का रहित बड़ेवे की ख्ल/सरसों की खल, तेल रहित चावलों की पॉलिश, शीरा, धातुओं का मिश्रण, नमक, नाइसीन आदि।

नस्ल की देख रेख-

शैड की आवश्यकता
अच्छे प्रदर्शन के लिए, पशुओं को अनुकूल पर्यावरणीय परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। पशुओं को भारी बारिश, तेज धूप, बर्फबारी, ठंड और परजीवी से बचाने के लिए शैड की आवश्यकता होती है। सुनिश्चित करें कि चुने हुए शैड में साफ हवा और पानी की सुविधा होनी चाहिए। पशुओं की संख्या के अनुसान भोजन के लिए जगह बड़ी और खुली होनी चाहिए, ताकि वे आसानी से भोजन खा सकें। पशुओं के व्यर्थ पदार्थ की निकास पाइप 30-40 सैं.मी. चौड़ी और 5-7 सैं.मी. गहरी होनी चाहिए।

गाभिन पशुओं की देखभाल-
अच्छे प्रबंधन का परिणाम अच्छे बछड़े में होगा और दूध की मात्रा भी अधिक मिलती है। गाभिन गाय को 1 किलो अधिक फीड दें, क्योंकि वे शारीरिक रूप से भी बढ़ती है।

बछड़ों की देखभाल और प्रबंधन-
जन्म के तुरंत बाद नाक या मुंह के आस पास चिपचिपे पदार्थ को साफ करना चाहिए। यदि बछड़ा सांस नहीं ले रहा है तो उसे दबाव द्वारा बनावटी सांस दें और हाथों से उसकी छाती को दबाकर आराम दें। शरीर से 2-5 सैं.मी. की दूरी पर से नाभि को बांधकर नाडू को काट दें। 1-2 प्रतिशत आयोडीन की मदद से नाभि के आस पास से साफ करना चाहिए।

सिफारिश किए गए टीके
जन्म के बाद कटड़े/बछड़े को 6 महीने के हो जाने पर पहला टीका ब्रूसीलोसिस का लगवाएं। फिर एक महीने बाद आप मुंह खुर का टीका लगवाएं और गलघोटू का भी टीका लगवाएं।  एक महीने के बाद लंगड़े बुखार का टीका लगवाएं। बड़ी उम्र के पशुओं की हर तीन महीने बाद डीवॉर्मिंग करें। कट्डे/बछड़े के एक महीने से पहले सींग ना दागें। एक बात का और ध्यान रखें कि पशु को बेहोश करके सींग ना दागें आजकल इलैक्ट्रोनिक हीटर से ही सींग दागें।

गाय को होने वाले प्रमुख रोग एवं उनके लक्षण-

मवेशी या अन्य पशुधन के बीमार हो जाने पर उनका इलाज करने के वनिस्पत उन्हें तंदुरूस्त बनाये रखने का इंतजाम करना ज्यादा अच्छा है। कहावत प्रसिद्ध है  “समय से पहले चेते किसान”। पशुधन के लिए साफ-सुथरा और हवादार घर – बथान, सन्तुलित खान – पान तथा उचित देख भाल का इंतजाम करने पर उनके रोगग्रस्त होने का खतरा किसी हद तक टल जाता है। रोगों का प्रकोप कमजोर मवेशियों पर ज्यादा होता है। उनकी खुराक ठीक रखने पर उनके भीतर रोगों से बचाव करने की ताकत पैदा हो जाती है। बथान की सफाई परजीवी से फैलने वाले रोगों और छूतही बीमारियों से मवेशियों का रक्षा करती है। सतर्क रहकर पशुधन की देख – भाल करने वाले पशुपालक बीमार पशु को झुंड से अलग कर अन्य पशुओं को बीमार होने से बचा सकते हैं। इसलिए पशुपालकों और किसानों को निम्नांकित बातों पर ध्यान देना चाहिए-
  • पशुधन या मवेशी को प्रतिदिन ठीक समय पर भर पेट पौष्टिक चार-दाना दिया जाए। उनकी खुराक में सूखा चारा के साथ हरा चारा खल्ली – दाना और थोड़ा- सा नमक शामिल करना जरूरी है।
  • साफ बर्तन में ताजा पानी भरकर मवेशी को आवश्यकतानुसार पीने का मौका दें।
  • मवेशी का बथान साफ और ऊँची जगह पर बनाए। घर इस प्रकार बनाएं कि उसमें सूरज की रौशनी और हवा पहुँचने की पूरी - पूरी गूंजाइश रहे। घर में हर मवेशी के लिए काफी जगह होनी चाहिए।
  • बथान की नियमित सफाई और समय- समय पर रोगाणुनाशक दवाएँ जैसे फिनाइल या दूसरी दवा के घोल से उसकी धुलाई आवश्यक है।
  • मवेशियों या दुसरे पशुधन के खिलाने की नाद ऊँची जगह पर गाड़ी जाए। नाद के नीचे कीचड़ नहीं बनने दें।
  • घर बथान से गोबर और पशु- मूत्र जितना जल्दी हो सके खाद के गड्ढे में हटा देने का इंतजाम किया जाए।
  • बथान को प्रतिदिन साफ कर कूड़ा – करकट को खाद के गड्ढे में डाल दिया जाए।
  • मवेशियों को प्रतिदिन टहलने – फिलने का मौका दिया जाए।
  • मवेशियों के शरीर की सफाई पर पूरा – पूरा ध्यान दिया जाए।
  • उनके साथ लाड़ – प्यार भरा व्यवाहर किया जाए।

मवेशियों में फैलनेवाले अधिकतर संक्रामक रोग (छूतही बीमारियाँ) एंडेमिक यानी स्थानिक होते हैं। ये बीमारियाँ एक बार जिस स्थान पर जिस समय फैलती है, उसी स्थान पर और उसी समय बार- बार फ़ैला करती है। इसलिए समय से पहले ही मवेशियों को टिका लगवाने का इंतजाम करना जरूरी है। टिका पशुपालन विभाग की ओर से उपलब्ध रहने पर नाम मात्र का शुल्क लगाया जाता है। खुरहा – मुहंपका का टिका प्रत्येक वर्ष पशु स्वास्थ्य रक्षा पखवाड़ा के अंतर्गत मुफ्त लगाया जाता है- क्लिक कर आगे पढ़े -गाय को होने वाले प्रमुख रोग एवं उनके लक्षण और उनसे बचाव ?

जल प्रबंधन -

जिस जगह पर आप गाय को रख रहे हों ध्यान रहे की उस जगह पर जल का प्रबंध अच्छा होना चाहिए । गायों को नहाने के लिए या फिर उनके जगह की साफ़ सफाई के लिए पानी की बहुत खपत होती है ।

नित्य पशु का दूध निकाले – दूध उत्पादक जानवर आमतौर पर एक दिन में दो या तीन बार दूध देते है। इसलिए आपको चाहिए की आप नित्य हीं उनका दूध निकाले । दूध निकालने का सही समय होता है :-

सुबह 5 से 7 बजे – सुबह में 5 बजे से 7 बजे के बिच का समय गाय का दूध दुहना सही रहता है । इस समय में गाय अच्छे गुणवत्ता में  दूध देती है ।

शाम 4 से 6 बजे – सुबह के बाद शाम के समय में गाय का दूध निकलने से ज्यादा दूध की प्राप्ति होती है । इस तरह से आप एक दिन में 2 बार कर के ज्यादा से ज्यादा गुणवत्ता में दूध की प्राप्ति कर सकते है ।

दूध कैसे निकालें – 
गाय को हर वक्त बांध कर नहीं रखना चाहिए उन्हें समय समय पर खुली हवा में घांस चढ़ने के लिए छोड़ देना चाहिए इससे गाय स्वस्थ रहती है और दूध भी ज्यादा देती है । गाय के दूध को दुहने का भी एक तरीका होता है । चलिए हम बताते है कैसे गाय का दूध निकला जाता है :-

  • जब कभी भी गाय का दूध दुहना हो तो उन्हें छाँव में ले आयें जहां उनके पुआल खाने का इन्तेजाम किया हुआ हो । 
  • जब गाय पुआल खाने में व्यस्त हो जाती है तो उसी वक्त उसका दूध दुह लेना चाहिए । 
  • दूध दुहने वक्त अपने हाँथो में हल्का सरसों तेल लगा लें इससे हांथो पर ज्यादा जोड़ नहीं पड़ता है और दूध भी आसानी से निकल जाता है । 
  • जो लोग इस काम में कुशल होते है वो लोग इस तरह से एक बार में कई गायों का दूध दुह लेते है। 
  • जब तक आप एक गाय को दुह रहें हो तब तक के लिए बांकी की गायों को घांस चरने  के लिए छोड़ दें । 


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गाय की देशी तथा अन्य नस्लों के बारे में जानकारी

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गाय का नाम अक्सर सुर्खियों में रहता है लेकिन इनकी नस्लों के बारे में शायद ही किसी को जानकारी होगी। भारत में साहीवाल, गिर, थारपारकर और लाल सिंधी समेत कई अन्य देसी नस्ल है जिनको भारतीय पशु आंनुवशिक संस्थान ब्यूरो में रजिस्टर्ड किया गया है। भारतीय पशु आंनुवशिक संस्थान ब्यूरो के मुताबिक अपने देश में 43 प्रकार की देसी नस्ल की गायें है। आइये आपको इन सभी देसी नस्ल की गायों के बारे में पूरी जानकारी बताते हैं-

01-बरगुर-

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इस नसल का जन्म स्थान भारत के पश्चिमी तामिलनाडू में मौजूद कृष्णागिरि जिले का बरगुर क्षेत्र है। इसके पूरे शरीर पर सफेद या भूरे रंग के धब्बे होते हैं। इसके हड्डीदार और पतले अंग होते हैं। सींग सिरे से तीखे होते हैं और हल्के भूरे रंग के होते हैं। गहरे फर के साथ आकर्षित माथा होता है। इस पशु को दोहरे मंतव के लिए प्रयोग किया जाता है। इस नसल के दूध के कई औषधीय गुण होते हैं। यह गऊ एक ब्यांत में 250-1300 लीटर दूध देती है।

02-हल्लीकर-

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यह मुख्यत: मंड्या, बैंगलोर, टुमकुर, कोलार और दक्षिण कर्नाटक के चित्रदुर्गा जिले में पायी जाती है। यह पशु छोटे आकार का होता है। इसका शरीर सफेद से सलेटी रंग का होता है। लंबे सींग होते हैं, जो कि सीधे और पीछे की तरफ झुके हुए होते हैं। बड़ा लेवा होता है और कंधे और पुट्ठे गहरे रंग के होते हैं। यह नसल अच्छा प्रदर्शन कर सकती है यदि इसके हरे चारे में ज्वार, बाजरा शामिल हो। यह गाय प्रति ब्यांत में औसतन 500-550 लीटर दूध देती है। दूध में 5.7 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है।

03-डांगी-

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इस नसल का प्रयोग भारी बारिश में अच्छे काम के लिए किया जाता है। इसका जन्म स्थान महाराष्ट्र में मौजूद नसिल और अहमदनगर जिले में डांग के पहाड़ी क्षेत्र हैं। इस नसल को नाम, इसके मूल स्थान से दिया गया है। इस नसल को ‘कंदादी’ भी कहा जाता है और यह ज्यादातर गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ जिलों में पायी जाती है। इस नसल का बड़े पैमाने पर जोताई और अन्य कृषि के कार्यों के लिए किया जाता है। ये मध्यम आकार के पशु होते हैं। जिनके सींग छोटे, छोटा सिर, छोटी और मजबूत टांगे और मध्यम आकार का लेवा होता है। यह गाय प्रति ब्यांत में औसतन 430 लीटर दूध देती है। दूध में 4.3 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है।

04-दिओनी-

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इसे डोंगरी, डोंगरपति, सुरती, वनेरा आदि नामों से भी जाना जाता है। इसका जन्म स्थान कर्नाटक का बिदार जिला और महाराष्ट्र राज्य का लातुर जिला है। यह दोहरे मंतव वाली नसल है। यह मध्यम आकार का पशु है जिसके शरीर पर अनियमित काले रंग के धब्बे होते हैं। इसकी त्वचा पतली और ढीली होती है। सिर चौड़ा, मोटा होता है और मध्यम आकार के सींग होते हैं। गहरी और चौड़ी छाती होती है। लंबे कान होते हैं जो कि झुके हुए होते हैं। यह गाय प्रति ब्यांत में औसतन 1135 लीटर दूध देती है। दूध में 4.3 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है। इस नसल के सांड का औसतन भार 6 क्विंटल  और गाय का 4.5 क्विंटल होता है।

05-गाओलाओ-

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यह दोहरे मंतव वाली नसल है जिसका जन्म स्थान भारत है। यह नसल मुख्यत: नागपुर, चिंदवाड़ा और वरधा में पायी जाती है। यह मध्यम आकार का पशु है जिसका शरीर सफेद से सलेटी रंग का होता है। इसका सिंर लंबा, मध्यम आकार के कान और छोटे सींग होते हैं। यह गाय प्रति ब्यांत में औसतन 470-725 लीटर दूध देती है। दूध में 4.32 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है।

06-गिर-

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यह नसल राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में पायी जाती है। इसे देसण, गुजराती, सूरती, काठियावाड़ी, और सोरठी भी कहा जाता है। इसका शरीर लाल रंग का होता है जिस पर सफेद धब्बे, सिर गुबंद के आकार का और लंबे कान होते हैं। यह गाय प्रति ब्यांत में औसतन 2110 दूध देती है।

07-गंगातिरी-
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यह नसल मुख्यत: उत्तर प्रदेश और बिहार में पायी जाती है। यह दोहरे मंतव वाली नसल है। इसे शाहाबादी या पूर्वी हरिआणा के नाम से भी जाना जाता है। यह मुख्यत: उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर, गाज़ीपुर, वाराणसी और बलियां जिलों में और बिहार के भोजपुर जिले में पायी जाती है। यह नसल मध्यम आकार की होती है और इसका माथा आकर्षित होता है। यह प्रति ब्यांत में औसतन 900-1200 लीटर दूध देती है। इसके दूध में 4.1-5.2 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है।

08-साहीवाल-
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इस नसल का पिछला जिला मोंटगोमेरी (पाकिस्तान) है। इस नसल के पशुओं के शरीर का रंग लाल-भूरा, आकार मध्यम, छोटी टांगे, सिर चौड़ा होता है। छोटे और भारी सींग, गर्दन के नीचे लटकती हुई भारी चमड़ी और भारी लेवा होता है। यह सबसे ज्यादा दूध देने वाली भारतीय नसल है। यह नसल पंजाब के फिरोजपुर और अमृतसर जिलों में और राजस्थान के श्री गंगानगर जिले में पायी जाती है। पंजाब में फिरोजपुर जिले के फाज़िलका और अबोहर कस्बों में शुद्ध साहीवाल गायों के झुंड उपलब्ध रहते हैं। इस नसल के बैल सुस्त और काम में धीमे होते हैं। इस नसल को लंबी बार, लोला, मोंटगोमेरी, मुल्तानी और तेली के नाम से जाना जाता है। इस नसल के प्रौढ़ बैल का औसतन भार 5.5 क्विंटल और गाय का औसतन भार 4 क्विंटल होता है।

09-खेरीगढ़-
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यह स्वदेशी नसल है जिसका जन्म स्थान उत्तर प्रदेश का लखमीरपुर जिला है। इसे खेर, खारीगढ़ या खारी के नाम से भी जाना जाता है। यह पशु छोटे आकार का होता है जिसका शरीर सफेद या सलेटी रंग का, छोटा और संकुचित चेहरा, पतले और बड़े सींग, गहरी आंखें, अच्छी तरह विकसित लेवा और एक लंबी पूंछ होती है। इस नसल के प्रौढ़ सांड का औसतन भार 4.7 क्विंटल और गाय का औसतन भार 3.4 क्विंटल होता है। यह गाय प्रति ब्यांत में औसतन 300-500 किलो दूध देती है।

10-लाल सिंधी-
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इस नसल का जिला पहले सिंध (पाकिस्तान) था। इसे रेड कराची, सिंधी और माही के नाम से जाना जाता है। यह नसल मध्यम ऊंचाई की होती है। इसके शरीर का रंग गहरा लाल होता है। स्वस्थ शरीर होता है जो कि आकार में मध्यम होता है। सिर चौड़ा, छोटे और मोटे सींग, लंबी पूंछ, छोटी टांगे और ढीली त्वचा होती है। यह नसल विभिन्न मौसमों को सहन कर सकती है। इस नसल को बीमारियां कम लगती हैं। यह गाय प्रति ब्यांत में औसतन 1600 लीटर दूध देती है। दूध में 5.0 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है। इस नसल का बैल खेतों में अच्छे से काम करता है। प्रौढ़ बैल का औसतन भार 4.5 क्विंटल और गाय का भार 3.15 क्विंटल होता है।

11-हरिआणा-
यह नसल हरियाणा के रोहतक, हिसार, करनाल और गुड़गांव जिलों से है। यह उत्तर प्रदेश, पंजाब और मध्य प्रदेश के भागों में भी प्रसिद्ध है। इस नसल का शरीर, सफेद या हल्का धुएं के रंग जैसा, तंग और मध्यम आकार का होता है। सिर छोटा, माथा और पुट्ठे गहरे सलेटी रंग के होते हैं। टांगे लंबी, जो कि सीधी होती है। पूंछ पतली और छोटी होती है। बैल खेती का काम अच्छा करते हैं। इस नसल के बैल का औसतन भार 5 क्विंटल और गाय का भार 3.5 क्विंटल होता है। यह गाय औसतन 1.5 किलो दूध प्रतिदिन देती है। इस नसल की गाय का प्रति ब्यांत में औसतन दूध 1000 लीटर होता है। दूध में 4.4 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है।

12-थारपारकर-
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यह नसल थारपारकर जिला (पश्चिमी पाकिस्तान) से है। यह भारत में मुख्यत जोधपुर, कच्छ और जैसलमेर क्षेत्रों में पायी जाती है। इसे ग्रे सिंधी, वाइट सिंधी और थारी के नाम से भी जाना जाता है। इसके शरीर का रंग राख के जैसा, मध्यम आकार का और चौड़ा सिर होता है। सींग वीणा के आकार के और किनारों पर से तीखे होते हैं। इनकी टांगे छोटी, पतली और लंबी पूंछ, बड़ा और चौड़ा कूबड़ और बड़े आकार का लेवा होता है, जिसमें निप्पल उचित फासले पर होते हैं। यह गाय प्रति ब्यांत में 1400 लीटर दूध देती है। यह नसल एक मिश्रित नसल है। इस नसल के बैल खेत में अच्छा काम करते हैं।

13-एच एफ होल्सटीन फ़्रिसियन-
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इस नसल का जन्म स्थान होलैंड है। यह दूध के उत्पादन में सबसे अच्छी नसल है। यह गाय प्रति ब्यांत में औसतन 5500-6500 किलो दूध देती है और दूध में 3.5-4.0 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है। हर रोज़ यह औसतन 25 लीटर दूध देती है। इस गाय की मिश्रित नसल रोज़ 10-15 लीटर दूध देती है। इस गाय का औसतन भार 580 किलो होता है।

14-जर्सी-
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यह गाय यू. के., जर्सी द्वीप से है। इसके शरीर का रंग लाल हल्का पीला, कोणीय और सघन शरीर और माथा डिश के आकार का होता है। यह अन्य सभी नसलों में से सबसे छोटी नसल है। इसके भूरे रंग के शरीर पर लाल धब्बे होते है।। यह रोज़ 20 लीटर दूध देती है। यह गाय प्रति ब्यांत में 3500-4000 किलो दूध देती है और दूध में 5 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है। बैल का औसतन भार 540-820 किलो और गाय का भार 400-500 किलो होता है। भारत में होशियारपुर, रोपड़ और गुरदासपुर मुख्य जिले हैं जहां जर्सी गाय पायी जाती है।

15-ब्राउन स्विस-
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यह नसल स्विटज़रलैंड में एल्पज़ की ढलानों से है। इस नसल का कद मध्यम होता है। यह रंगों की विभिन्न किस्मों हल्के से गहरे रंग में पायी जाती है। यह प्रति ब्यांत में 4500-5000 किलो दूध देती है और इसके दूध में 3.9-4.2 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है। यह अच्छी गुणवत्ता वाले बछड़े का उत्पादन करती है। इसका पहली बार दोहरे मंतवों के लिए पटियाला, संगरूर और बठिंडा क्षेत्रों में उपयोग किया गया। इस नस्ल के बैल का औसतन भार 590-635 किलो होता है और गाय का भार 900 किलो होता है।

16-रेड डेन-
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इसका जन्म स्थान डेनमार्क देश है। इस नसल के पशु का भार मध्यम से भारी होता है। इसके शरीर का रंग गहरा लाल होता है। यह नसल प्रति ब्यांत में 4500-5500 किलो दूध देती है और इसके दूध में 4 प्रतिशत वसा की मात्रा होती है। पहली बार इस नसल का दोहरे मंतव के लिए प्रयोग पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी लुधियाना में किया गया था। इस नसल के बैल का औसतन भार 1000 किलो और गाय का 660 किलो होता है।

17-अंबलाचेरी-
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इस नसल को ‘मोतईमधु’ या ‘दक्षिणी’ या ‘जाथीमांडू’ या ‘थेरकुथीमांडु’ या ‘तंजोर’ के नाम से भी जाना जाता है। यह नसल तामिलनाडू के थिरूवारूर और नागापटीनम जिले में पायी जाती है। इस नसल की मादा की त्वचा का रंग मुख्य तौर पर सलेटी होता है और चेहरे पर सफेद रंग के धब्बे होते हैं और नर का रंग गहरा भूरा और टांगे काले रंग की होती हैं। इनका माथा चौड़ा और अलग होता है। इस नसल के नर का औसतन कद 135 सैं.मी. और मादा का औसतन कद 105 सैं.मी. होता है। इस नसल की गाय एक ब्यांत में औसतन 495 किलो दूध देती है, जिसकी वसा 4.9 प्रतिशत तक होती है।

18-बचौर-
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इस नसल को “भूटिया” के नाम से भी जाना जाता है। यह नसल मुख्य तौर पर बिहार में पायी जाती है। यह ज्यादातर बिहार के धरबंगा, सीतामढ़ी और मधुबनी इलाकों में पायी जात है। यह नसल लगभग हरियाणा नसल जैसी ही है। बचौर नसल की खाल का रंग सफेद या सलेटी सफेद होता है। इस नसल की कमर सीधी, गर्दन छोटी, सुडौल कंधे, लटके हुए कान, छोटे और मोटे सींग और शरीर गोल होता है। इसका माथा चौड़ा, आंखे बड़ी, और सींग मध्यम आकार के, जो बाहर की तरफ मुड़े हुए होते हैं। इस नसल के नर का औसतन भार 250 किलो और मादा का औसतन भार 200 किलो होता है। इसकी पहले ब्यांत के लिए उम्र 31-36 महीने की होनी चाहिए और इसका एक ब्यांत 11-14 महीने का होता है। इस नसल की गायें बढ़िया दूध उत्पादक नहीं है। यह नसल एक ब्यांत में लगभग 225-630 किलो दूध पैदा करती है और दूध की वसा 5 प्रतिशत होती है।

19-अमृतमहल-
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इस नसल को “जवारीदाना”, “दोडादाना” और “नंबरदाना” के नाम से भी जाना जाता है। अमृतमहल का भाव दूध का घर है। यह नसल मुख्य तौर पर सलेटी और सफेद से काले रंग में आती है। कुछ गायों पर सफेद - सलेटी रंग का निशान देखा जाता है। इसका सिर बढ़िया आकार का लंबा, आंखे लाल, कान छोटे और पतले, पतली लटकी हुई अतिरिक्त चमड़ी, अच्छी तरह विकसित कूबड़, घना शरीर, मजबूत और लंबी गर्दन, पतली त्वचा और चमकदार छोटे बालों वाली खाल होती है। इस नसल के नर का औसतन भार 500 किलो और मादा का औसतन भार 318 किलो होता है। इस नसल के नर की औसतन लंबाई 134.1 सैं.मी. और मादा की औसतन लंबाई 126 सैं.मी. होती है। इसके पहले ब्यांत के लिए उम्र 36-72 महीने की होनी चाहिए। ब्याने के बाद यह 210-310 दिनों तक दूध देती है। इस नसल की गायें बढ़िया दूध उत्पादक नहीं हैं। इस नसल की गायें एक ब्यांत में 572 किलो दूध पैदा करती है और दूध की वसा 5.7 प्रतिशत होती है। यह नसल मुख्य तौर पर कर्नाटक के फार्मों में रखी जाती है।

20-बिंझारपुरी-
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इस नसल को “देशी” के नाम से भी जाना जाता है। यह नसल ज्यादातर जयपुर और उड़ीसा के भदरक और केंद्रापारा जिले में पायी जाती है। इस नसल की खाल का मुख्य रंग सफेद होता है, पर यह काले, भूरे या सलेटी रंग में भी मिल सकती है। इस नसल के नर की गर्दन, कूबड़, चेहरे का कुछ भाग और कमर काले रंग की होती है। इस नसल के सींग काले और मध्यम आकार के होते हैं, जो ऊपर की तरफ मुड़े होते हैं। यह नसल एक ब्यांत में लगभग 915-1350 किलो दूध पैदा करती है। इसकी पहले ब्यांत में उम्र 41-42 महीने की होनी चाहिए और इसका एक ब्यांत 13 महीने का होता है। इसके दूध में वसा 4.3-4.4 प्रतिशत होती है। इसके रोजाना दूध की पैदावार लगभग 5 किलो प्रतिदिन होती है। इस नसल के नर का औसतन भार 254-261 किलो और मादा का औसतन भार 207-211 किलो होता है।

21-घुमसारी-
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इस नसल को “देशी” के नाम से भी जाना जाता है। यह नसल मुख्य तौर पर उड़ीसा में पायी जाती है। यह जानवर छोटे आकार के और मजबूत होते हैं। यह नसल मुख्य रूप में सफेद रंग में आती है। पर कुछ भूरे रंग की शेड में आती हैं। इनके सींग मध्यम आकार के होते हैं जो ऊपर  और अंदर की तरफ को मुड़े हुए होते हैं। सिर छोटा और चपटा और माथा चौड़ा होता है। इस नसल के नर का औसतन भार 208 किलो  और मादा का औसतन भार 168 किलो होता है। इस नसल के नर की औसतन लंबाई 116 सैं.मी. हाती है और मादा की औसतन लंबाई 107 सैं.मी. होती है। इसके पहले ब्यांत में गाय की उम्र 42 महीने होनी चाहिए  और इसका एक ब्यांत 13 महीने का होता है। यह एक ब्यांत में औसतन 450-650 किलो दूध पैदा करती है, जिसकी वसा 4.8- 4.9 प्रतिशत तक होती है।

22-कनक्रेज़-
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इस नसल को “वगाड़िया” या “बोनई” या “वागाद”  या “तालबंदा” नाम से भी जाना जाता है। यह नसल मुख्य तौर पर गुजरात के जिला बनासकांठा में पायी जाती है। इस नसल के जानवर बड़े आकार के होते हैं। यह नसल मुख्य तौर पर सिल्वर, सलेटी और आयरन सलेटी से काले रंग में आती है। इस नसल के नर का माथा चौड़ा, मुंह छोटा, नाक थोड़ा मुड़ा हुआ, कान लटके हुए और सींग मुड़े हुए होते हैं। इस नसल की गाय एक ब्यांत में औसतन 1800 किलो दूध देती है। इस नसल के बैल का औसतन भार 550-770 किलो और गाय का औसतन भार 330-370 किलो होता है। इसके दूध की वसा 4.8 प्रतिशत होती है। इस नसल की गाय का पहले ब्यांत के समय गाय की उम्र 39-56 महीने होनी चाहिए।

23-केनकथा-
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यह भारत की देसी नसल है, इसे केनवारिया भी कहा जाता है। इस नसल का जानवर छोटे आकार वाला होता है, जो उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड में पाया जाता है। इस नसल का मूल स्थान उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश है। इसका शरीर छोटा, सिर छोटा और चौड़ा, माथा डिश के आकार का, कमर सीधी और और कान लटके हुए होते हैं। इस नसल की पूंछ की लंबाई मध्यम, कूबड़ पूरी तरह से विकसित और नर्म-भारी लटक हुई चमड़ी होती है। इस नसल के पशु की औसतन लंबाई 103 सैं.मी. होती है। इसका रंग सिलवर से सलेटी और आयरन सलेटी या स्टील काला होता है। इस नसल के नर का औसतन भार 350 किलो और मादा औसतन भार 300 किलो होता है।

24-खारियार-
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इस नसल का मूल स्थान उड़ीसा का नुआपाड़ा जिला है। यह छोटे आकार की नसल है, जिसके सींग सीधे, कमर और चेहरे का कुछ हिस्सा गहरे काले रंग का होता है। इसकी खाल का रंग भूरा  होता है। पर यह कभी कभी सलेटी भी होता है। इस नसल के नर का औसतन कद 106 सैं.मी. और मादा का औसतन कद 102 सैं.मी. होता है। इस नसल की गाय एक ब्यांत में औसतन 450 किलो दूध देती है और दूध की वसा 4-5 प्रतिशत होती  है।

25-खिलारी-
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इस नसल को मंदेशी या शिकारी या थिल्लर के नाम से भी जाना जाता है। इस नसल का मूल स्थान महाराष्ट्र और कर्नाटक के जिले हैं और यह पश्चिमी महाराष्ट्र में पायी जाती है। इस नसल का नाम खिलार शब्द से लिया गया है, जिसका मतलब है पशुओं का झुंड। इस नसल के अंग मजबूत, सींग लंबे, सिर तंग, खाल हल्की और बढ़िया, कान छोटे, कमर ओर छोटा कूबड़ और शरीर बेलनाकार होता है। इसकी खाल मुख्य तौर पर सलेटी - सफेद रंग की होती है। इस नसल के नर का औसतन भार 450 किलो और गाय का औसतन भार 360 किलो होता है। इसके दूध की वसा लगभग 4.2 प्रतिशत होती है। यह नसल एक ब्यांत में औसतन 240-515 किलो दूध देती है।

26-कृष्णा घाटी-
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इस नसल को कृष्णा घाटी के नाम से भी जाना जाता है। यह उत्तरी कर्नाटक की देसी नसल है। यह एक पालतू नसल है, जो खेतीबाड़ी के लिए प्रयोग की जाती है। यह मुख्य तौर पर सलेटी - सफेद रंग में पायी जाती है। इस नसल के सींग छोटे, चमड़ी लटकी हुई, कान छोटे और तीखे, शरीर छोटा और टांगे छोटी और मोटी होती है। यह नसल एक ब्यांत में औसतन 900 किलो दूध देती है।

27-मलवी-
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इस नसल को मालवी या मनथानी या महांदिओपुरी नाम से भी जाना जाता है। यह नसल ज्यादातर मध्य प्रदेश में पायी जाती है। इसकी खाल का रंग मुख्य तौर पर सफेद सलेटी या सफेद होता है। इस नसल के पशु छोटे आकार के होते हैं जिनके सींग मुड़े हुए, शरीर घना, टांगे और खुर मजबूत, मुंह चौड़ा, कान तीखे और छोटे और माथा डिश के आकार का होता है। यह नसल एक ब्यांत में औसतन 627-1227 किलो दूध देती है और दूध की वसा 4.3 प्रतिशत होती है। इस नसल की मादा की औसतन लंबाई 130 सैं.मी. और नर की औसतन लंबाई 140 सैं.मी. होती है।

28-मेवाती-
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यह नसल राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पायी जाती है। इसे महवाती या कोसी नाम से भी जाना जाता है। यह नसल राजस्थान के भरतपुर और अलवर जिले, हरियाणा के फरीदाबाद और गुड़गांव जिले और उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले तक फैली हुई है। इसका रंग मुख्य तौर पर सफेद होता है। यह पशु मध्यम  आकार का होता है जिसके सींग तीखे और लटके हुए होते हैं। इसका मुंह चौड़ा और वर्गाकार, पूंछ और टांगे लंबी, माथा थोड़ा उभरा हुआ, मजबूत अंग, छाती घनी और होते हैं। यह नसल एक ब्यांत में औसतन 958 किलो दूध देती है और एक दिन में दूध की पैदावार 5 किलो होती है।

29-मोतू-
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यह नसल उड़ीसा, छत्तीसगढ़  और मध्य प्रदेश में पायी जाती है। इस नसल का नाम उड़ीसा के मलकानगिरी जिले के स्थानक क्षेत्र मोतू के नाम पर रखा गया है। इस नसल का रंग मुख्य तौर पर भूरा या कई बाद सलेटी और सफेद होता है। यह पशु छोटे आकार के होते हैं जिनके सींग सीधे, पूंछ काली और खुर काले रंग के होते हैं। यह नसल एक ब्यांत में औसतन 100-140 किलो दूध देती है और दूध की वसा 4.8-5.3 प्रतिशत होती है। इस नसल की मादा का औसतन भार 137 किलो और नर का औसतन भार 171 किलो होता है। इस नसल की मादा की औसतन लंबाई 104 सैं.मी. और नर की औसतन लंबाई 107 सैं.मी. होता है। इस नसल के पहले ब्यांत के समय गाय की उम्र 52 महीने होनी चाहिए और एक ब्यांत से दूसरे ब्यांत का अंतराल 13 महीने होता है।

30-नागोरी-
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इस नसल का मूल स्थान राजस्थान है। इस नसल राजस्थान के जोधपुर, बीकानेर और नागौर जिलों तक फैली हुई है। इसकी खाल का रंग सफेद होता है। इसका मुंह लंबा, माथा चपटा और तंग, कान लंबे और लटके हुए, सींग मध्यम आकार के, आंखे छोटी, शरीर का अगला हिस्सा पूरी तरह विकसित और कमर सीधी होती है। यह एक ब्यांत में औसतन 479-905 किलो दूध पैदा करती है और दूध की वसा 5.8 प्रतिशत होती है।

31-निमारी-
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इस नसल को खरगोनी या खरगाओं या खुरगोनी के नाम से भी जाना जाता है। इस नसल का मूल स्थान मध्य प्रदेश है। इसका रंग सफेद, काला या हल्का लाल, लाल, हल्का जामुनी और सफेद या पीला होता है। इसकी चमड़ी हल्की और ढीली, माथा उभरा हुआ, शरीर भारा, सींग तीखे, कान चौड़े और सिर लंबा होता है। यह नसल एक ब्यांत में औसतन 600-954 किलो दूध देती है और दूध की वसा 4.9 प्रतिशत होती है।

32-पोंवार-
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इसे ‘पुरनिया’ के नाम से भी जाना जाता है। इस नसल का मूल स्थान आंध्र प्रदेश है। इस नसल के सींग मध्यम आकार के, मुंह तंग, कान बड़े और पतले, आंखे चमकीली, गर्दन छोटी और ताकतवर, शरीर छोटा और तंग, कूबड़ अच्छी तरह से विकसित, पूंछ लंबी और किनारे से पतली, धड़ लंबा और लटकी हुई चमड़ी हल्की और पतली होती है। इनकी खाल सफेद और काले रंग की होती है। इस नसल की मादा की औसतन लंबाई 109 सैं.मी. और नर की औसतन लंबाई 116 सैं.मी. होती है। यह एक ब्यांत में औसतन 460 किलो दूध पैदा करती है। यह नसल भार ढोने और खेतीबाड़ी के कामों के लिए प्रयोग की जाती है।

33-पुंगानूर-
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यह नसल आंध्र प्रदेश के चितूर जिले में पैदा हुई है। इस नसल के पशु छोटे आकार के होते हैं, जिनकी खाल हल्के भूरे और सफेद रंग की होती है। यह नसल कई बार लाल या हल्के से गहरे भूरे रंग में पायी जाती है। इसका माथा चौड़ा और सींग छोटे और मुड़े हुए होते हैं। इस नसल की मादा का औसतन भार 115 किलो और नर का औसतन भार 225 किलो होता है। इस नसल का औसतन कद 70-90 सैं.मी. होता है। यह एक ब्यांत में औसतन 194-1100 किलो दूध पैदा करती है और दूध की वसा लगभग 5 प्रतिशत होती है।

34-राठी-
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इस नसल का मूल स्थान राजस्थान है। यह नसल राजस्थान के थार मारूस्थल, बीकानेर, गंगानगर और जैसलमेर जिलों तक फैली हुई है। इसकी खाल मुख्य तौर पर भूरे रंग की होती है, जिस पर सफेद धब्बे बने होते हैं और कई बार इसकी खाल काले या भूरे रंग की होती है, जिसपर सफेद धब्बे बने होते हैं। इसके बाकी शरीर के मुकाबले शरीर का निचला भाग रंग में हल्का होता है। इसका चौड़ा मुंह, पूंछ लंबी और लटकी हुई चमड़ी कोमल और ढीली होती है। यह एक ब्यांत में औसतन 1000-2800 किलो पैदा करती है। पहले ब्यांत के समय इस नसल की गाय की उम्र 36-52 महीने होनी चाहिए और इसका एक ब्यांत 15-20 महीने का होता है।

35-लाल कंधारी-
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इस नसल का मूल स्थान, कंधार, तहसील नंदेड़, जिला महाराष्ट्र है। इसे ‘लखलबुंदा’ नाम से भी जाना जाता है। यह महाराष्ट्र के नंदेड़, परभानी, अहमद नगर, बीड और लतूर जिले में पायी जाती है। इस नसल के पशु दरमियाने आकार वाले और गहरे लाल रंग के होते हैं। यह नसल हल्के लाल से भूरे रंग में आती है। इसके सींग टेढ़े, माथा चौड़ा, कान लंबे, कूबड़ और लटकी हुई चमड़ी नर्म, आंखे चमकदार और पिछली ओर काले रंग के गोल धब्बे बने होते हैं। इस नसल के नर का औसतन कद 1138 सैं.मी. और मादा का औसतन कद 128 सैं.मी. होता है। यह नसल एक ब्यांत में औसतन 598 किलो दूध देती है, जिसकी वसा लगभग 4.5 प्रतिशत तक होती है। पहले ब्यांत के समय इस नसल की मादा की उम्र 30-45 महीने होनी चाहिए और इसका एक ब्यांत 12-24 महीने का होता है।

36-वेचुर-
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इस नसल का मूल स्थान केरला है। यह नसल नमी और गर्म जलवायु के अनुकूल होती है। इसके सींग छोटे और शरीर का पिछला हिस्सा गहरे या गहरे सलेटी रंग के होता है। इस नसल का औसतन कद 90 सैं.मी. और औसतन भार 130 किलो होता है। यह नसल एक ब्यांत में औसतन 561 किलो दूध देती है, जिसकी वसा लगभग 4.7 - 5.8 प्रतिशत तक होती है।

37-सीरी-
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इसका मूल स्थान सिक्किम और पश्चिमी बंगाल है। यह ज्यादातर त्रभूम या बनावटी सीरी या कच्चा सीरी के नाम से भी जाना जाता है। इसकी त्वचा का रंग मुख्य तौर पर काला या भूरा होता है, जिस पर सफेद रंग के धब्बे होते हैं। इसका शरीर दरमियाने आकार का होता है। इसकी सींग बड़े, टांगे और पैर मजबूत, हल्की लटकी हुई त्वचा और काले रंग का मुंह होता है। यह एक ब्यांत में औसतन 430 लीटर दूध देती है, जिसकी वसा 2.8-5.5 प्रतिशत होती हैं इस नसल की मादा का औसतन भार 210-300 किलो नर का औसतन भार 260-360 किलो होता है। इस नसल के नर का औसतन कद 138 सैं.मी. और मादा का औसतन कद 100 सैं.मी. होता है।

38-उंगोल-
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यह नसल आंध्र प्रदेश में पैदा हुई है। इसे ‘नेलोर’ के नाम से भी जाना जाता है। यह नस्ल बड़े आकार की होती है, जिसके अंग लंबे और सुडौल, गर्दन छोटी, शरीर लंबा, माथा चौड़ा, आंखे अंडाकार कान लंबे और लटके हुए और सींग छोटे तथा मोटे होते हैं। इस नसल के नर का भार लगभग 500 किलो और मादा का भार लगभग 432-455 किलो होता है।


39-कंगायम(तमिलनाडु)-
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इस प्रजाति के गोवंश काफी फुतीले होते है। इस जाति के गोवंश कोयम्बटूर के दक्षिणी इलाकों में पाये जाते हैं। दूध कम देने के बावजूद भी यह गाय 10-12 सालों तक दूध देती है।








40-कांकरेज (गुजरात और राजस्थान)
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कांकरेज गाय राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी भागों में पाई जाती है, जिनमें बाड़मेर, सिरोही तथा जालौर ज़िले मुख्य हैं। इस नस्ल की गाय प्रतिदिन 5 से 10 लीटर तक दूध देती है। कांकरेज प्रजाति के गोवंश का मुँह छोटा और चौड़ा होता है। इस नस्ल के बैल भी अच्छे भार वाहक होते हैं। अतः इसी कारण इस नस्ल के गौवंश को 'द्वि-परियोजनीय नस्ल' कहा जाता है।





41-अंगोल (आंध्रप्रदेश) -
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अंगोल प्रजाति तमिलनाडु के अंगोल क्षेत्र में पायी जाती है। इस जाति के बैल भारी बदन के और ताकतवर होते हैं। इनका शरीर लम्बा, किन्तु गर्दन छोटी होती है। यह प्रजाति सूखा चारा खाकर भी जीवन निर्वाह कर सकती है। इस नस्ल के ऊपर ब्राजील काम कर रही है।







42-कोसली (छत्तीसगढ़)-
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कोसली नस्ल की गायें भारत में छत्तीसगढ़ राज्य में पाई जाती हैं। इसका प्रमुख निवास स्थान छत्तीसगढ़ राज्य के मैदानी जिले जैसे रायपुर, राजनांदगांव, दुर्ग और बिलासपुर हैं। इनका आकार छोटा होता हैं। एक मादा का वजन 160-200 कि.ग्रा. और नर का वजन 200-300 कि.ग्रा. तक होता है। कोसली नस्ल की गायों के सींग छोटे आकार के होते हैं। 






43-बद्री (उत्तराखंड) -
बद्री गाय केवल पहाड़ी जिलों में पाई जाती है और पहले इसे 'पहाड़ी' गाय के रूप में जाना जाता था। इनका रंग भूरा, लाल, सफ़ेद होता है। इनके कान छोटे से मध्यम आकार की लम्बाई के होते हैं और इनकी गर्दन छोटी एवं पतली होती है। बद्री गायों का प्रतिदिन औसत दुग्ध उत्पादन लगभग 1.12 किग्रा है, लेकिन कुछ गायें 6.9 किग्रा तक दूध का उत्पादन करती हैं। इनका दुग्धकाल 275 दिनों का होता है।

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गाय को होने वाले प्रमुख रोग एवं उनके लक्षण और उनसे बचाव ?

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मवेशी या अन्य पशुधन के बीमार हो जाने पर उनका इलाज करने के वनिस्पत उन्हें तंदुरूस्त बनाये रखने का इंतजाम करना ज्यादा अच्छा है। कहावत प्रसिद्ध है  “समय से पहले चेते किसान”। पशुधन के लिए साफ-सुथरा और हवादार घर – बथान, सन्तुलित खान – पान तथा उचित देख भाल का इंतजाम करने पर उनके रोगग्रस्त होने का खतरा किसी हद तक टल जाता है। रोगों का प्रकोप कमजोर मवेशियों पर ज्यादा होता है। उनकी खुराक ठीक रखने पर उनके भीतर रोगों से बचाव करने की ताकत पैदा हो जाती है। बथान की सफाई परजीवी से फैलने वाले रोगों और छूतही बीमारियों से मवेशियों का रक्षा करती है। सतर्क रहकर पशुधन की देख – भाल करने वाले पशुपालक बीमार पशु को झुंड से अलग कर अन्य पशुओं को बीमार होने से बचा सकते हैं। इसलिए पशुपालकों और किसानों को निम्नांकित बातों पर ध्यान देना चाहिए-
  • पशुधन या मवेशी को प्रतिदिन ठीक समय पर भर पेट पौष्टिक चार-दाना दिया जाए। उनकी खुराक में सूखा चारा के साथ हरा चारा खल्ली – दाना और थोड़ा- सा नमक शामिल करना जरूरी है।
  • साफ बर्तन में ताजा पानी भरकर मवेशी को आवश्यकतानुसार पीने का मौका दें।
  • मवेशी का बथान साफ और ऊँची जगह पर बनाए। घर इस प्रकार बनाएं कि उसमें सूरज की रौशनी और हवा पहुँचने की पूरी - पूरी गूंजाइश रहे। घर में हर मवेशी के लिए काफी जगह होनी चाहिए।
  • बथान की नियमित सफाई और समय- समय पर रोगाणुनाशक दवाएँ जैसे फिनाइल या दूसरी दवा के घोल से उसकी धुलाई आवश्यक है।
  • मवेशियों या दुसरे पशुधन के खिलाने की नाद ऊँची जगह पर गाड़ी जाए। नाद के नीचे कीचड़ नहीं बनने दें।
  • घर बथान से गोबर और पशु- मूत्र जितना जल्दी हो सके खाद के गड्ढे में हटा देने का इंतजाम किया जाए।
  • बथान को प्रतिदिन साफ कर कूड़ा – करकट को खाद के गड्ढे में डाल दिया जाए।
  • मवेशियों को प्रतिदिन टहलने – फिलने का मौका दिया जाए।
  • मवेशियों के शरीर की सफाई पर पूरा – पूरा ध्यान दिया जाए।
  • उनके साथ लाड़ – प्यार भरा व्यवाहर किया जाए।
  • मवेशियों में फैलनेवाले अधिकतर संक्रामक रोग (छूतही बीमारियाँ) एंडेमिक यानी स्थानिक होते हैं। ये बीमारियाँ एक बार जिस स्थान पर जिस समय फैलती है, उसी स्थान पर और उसी समय बार- बार फ़ैला करती है। इसलिए समय से पहले ही मवेशियों को टिका लगवाने का इंतजाम करना जरूरी है। टिका पशुपालन विभाग की ओर से उपलब्ध रहने पर नाम मात्र का शुल्क लगाया जाता है। खुरहा – मुहंपका का टिका प्रत्येक वर्ष पशु स्वास्थ्य रक्षा पखवाड़ा के अंतर्गत मुफ्त लगाया जाता है।

बीमारियां और रोकथाम-

पाचन प्रणाली की बीमारियां: 

सादी बदहजमी का इलाज:-
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  • जल्दी पचने वाली खुराक दें।
  • भूख बढ़ाने वाले मसाले दें।
तेजाबी बदहजमी का इलाज:-
  • ज्यादा निशाचन वाली खुराक बंद कर दें।
  • मठ्ठी बीमारी की हालत में मुंह के द्वारा खारे पदार्थ जैसे कि मीठा सोडा आदि और मिहदे को ताकत देने वाली दवाइयां दें।
खारी बदहजमी का इलाज:-
  • मठ्ठी बीमारी में रयूमन की पी एच हल्के तेजाब जैसे कि 5 प्रतिशत एसटिक एसिड को 5-10 मि.ली. प्रति किलो पशु के भार के मुताबिक या अंदाजा 750 मि.ली. सिरका देकर ठीक करें।
  • यदि दिमागी दौरे पड़ रहे हों और 2-3 बार दवाई देने के साथ भी फर्क ना पड़े तो पशुओं वाले डॉक्टर से रयूमोनोटोमी ऑप्रेशन करवायें।
कब्ज  का इलाज:-
  • शुरू में अलसी का तेल 500 मि.ली. दें और सूखे मठ्ठे  ना डालें और ज्यादा पानी पीने के लिए दें।
  • बड़े जानवरों के लिए 800 ग्राम मैगनीशियम सल्फेट पानी में घोलकर और 30 ग्राम अदरक का चूरा मुंह द्वारा दें।
अफारे का इलाज:-
  • तारपीन का तेल 30-60 मि.ली., हींग का अर्क 60 मि.ली. या सरसों अलसी का 500 मि.ली. तेल पशु को दें। तारपीन का तेल ज्यादा मात्रा में ना दें, इससे पेट खराब हो सकता है।
  • यदि किसी पशु को बार-बार अफारा हो तो एक्टीवेटड चारकोल, 40 प्रतिशत फार्मलीन 15-30 मि.ली. और डेटोल का पानी भी दिया जा सकता है।
  • बीमारी की किस्म और पशु की हालत देखते हुए डॉक्टर की सहायता लें।
मोक/मरोड़/खूनी दस्त का इलाज:-
  • मुंह द्वारा या टीके से सलफा दवाइयां दें और साथ ही 5 प्रतिशत गुलूकोज़ और नमक का पानी ज्यादा दें।
  • गोबर की जांच करवायें यदि इसमें कीड़े मिलें तो उसके मुताबिक मलप निकालने वाली दवाई दें।
  • एंटीबायोटिक, सलफा दवाइयां और ओपीएट, टैनोफॉर्म या लोहे के तत्व देने से भी मरोड़ रोके जा सकते हैं।

पीलिया:

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पीलिया की किस्में-
  • प्री हैपटिक या हीमोलिटक पीलिया - लाल रक्ताणुओं के नष्ट होने के कारण
  • इंटरा हैपटिक या जहरीला पीलिया’- जिगर की बीमारी के कारण
  • पित्ते की नाली बंद होने से पीलिया
पीलिये का इलाज-
  • सब से पहले जहरीले पीलिये का कारण ढूंढकर उसे दूर करें।
  • जिन पशुओं में लाग और खून के कीड़ों की बीमारी है, उन्हें एकदम बाकी पशुओं से दूर कर दें|
  • गुलुकोज़ और नमक का घोल, कैलशियम गलूकानेट, विटामिन ए और सी दें और उस के साथ-साथ एंटीबायोटिक दवाइयां भी देनी चाहिए।
  • पशु को हरा चारा और चर्बी रहित खुराक के साथ लिवर टॉनिक दें|
  • फासफोरस की कमी में जानवरों को सोडियम एसिड मोनोफासफेट दें। 
तिल्ली का रोग (एंथ्रैक्स) : -
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यह एक तेज बुखार की बीमारी है। यह बीमारी आमतौर पर कीटाणु और दूषित
पानी या खुराक से होती है। यह बीमारी अचानक और एकाएक भी हो सकती है या कुछ समय भी ले सकती है और शरीर के कुदरती रास्तों में लुक जैसा खून बहने लग जाता है।इस बीमारी में पशु को तेज बुखार होता है और वह मुश्किल से सांस लेता है, टांगें मारता है और उसे दौरे पड़ते हैं। जानवर का शरीर अकड़ जाता है और चारों टांगे बाहर को खींची जाती हैं। नासिका, गोबर वाले स्थान और योनी में से गहरा लुक जैसा खून बहता है।

इलाज:  इसका कोई असरदायक इलाज नहीं है। हर वर्ष इसके बचाव  के लिए टीके लगवाये जाने चाहिए। मरे हुए जानवरों का पोस्टमार्टम नहीं करवाना चाहिए। मरा हुआ पशु कम से कम 1 मीटर गहरे गड्ढे में आबादी से दूर दबाना चाहिए और 15 सैं.मी. चूने की परत पशु के शरीर के आस पास डालनी चाहिए। पशुओं का बिछौना और उसके संपर्क में आने वाली वस्तुओं को जला देना चाहिए।

एनाप्लाज़मोसिस : -
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यह एक संक्रमक बीमारी है जो एनाप्लाज़मा मार्जिनल के कारण होती है। इसके कारण शरीर का तापमान बढ़ जाता है। नाक में से गहरा तरल पदार्थ निकलता है, खून की कमी, पीलिया और मुंह में से लार गिरती है।

इलाज:  परजीवी की संख्या की रोकथाम के लिए अकार्डीकल दवाई दें। इस बीमारी की जांच के लिए सीरोलोजिकल टेस्ट करवाएं। यदि परिणाम पोज़िटिव आता है तो तुरंत किसी अच्छे पशुओं के डॉक्टर से उपचार करवाएं।

अनीमिया : -
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इसके लक्षण हैं मासपेशियों की कमज़ोरी, तनाव, और ताप दर का बढ़ना है। यह रोग खराब पोषन प्रबंधन, आहार में पोशक तत्वों की कमी के कारण होता है।

इलाज: आहार में विटामिन ए, बी और ई दें और अनीमिया से बचाव के लिए आयरन डेक्सट्रिन 150 मि.ग्रा. का टीका पशु को लगवाएं।

मुंह खुर रोग : -
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यह एक विषाणु रोग है और चार किस्मों ओ ए सी और ऐशिया 1 भारत में प्रचलित है। इस बीमारी से तेज बुखार, मुंह में से पानी गिरना, भूख ना लगना, भार कम हो जाना, दूध कम हो जाना और मुह में छाले होना  हैं। दूध पीते कटड़ों को उनकी मां से यह बीमारी हो सकती है। यह बीमारी, बीमार पशुओं के संपर्क से और अन्य चीज़ें जैसे बर्तन, चारा और मजदूरों, जो बीमार पशुओं के संपर्क में आये हों, से भी यह बीमारी फैलती है। मुंह, लेवे और खुरों के बीच जख्म हो जाते हैं। जख्म कई बार मिहदे, दिल, रस ग्रंथियों पर भी मौजूद होते हैं।

इलाज: बीमारी के बचाव के टीके लगवाने चाहिए। मुंह और खुर के छालों को लाल दवाई वाले पानी से धोया जा सकता है। पैरों पर फिनाइल और लुक 1:5 के अनुपात में प्रयोग किए जा सकते हैं। जब बीमारी फैली हुई हो, तो कोई नया पशु नहीं लेकर आना चाहिए और बीमार पशुओं को अलग रखना चाहिए।

मैगनीश्यिम की कमी : -
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यह  भैंसों, गायों, सांडों और कटड़ों, बछड़ों में आ सकती है। बछड़ों में इसकी कमी के कारण उन्हें हरे चारे के स्थान पर तीन महीने की उम्र के बाद भी सिर्फ दूध ही देना होता है क्योंकि दूध में मैग्नीशियम नहीं होता, इसकी कमी से पशुओं में मिर्गी के दौरे पड़ते हैं और पशु की मौत भी हो सकती है।

इलाज : इसकी कमी को पूरा करने के लिए खुराक में 5 ग्राम मैग्नीशियम ऑक्साइड या मैगनीश्यिम कार्बोनेट 8 ग्राम डाला जा सकता है।

सिक्के का जहर : --
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इसके मुख्य लक्ष्ण पशुओं का चलते समय लड़खड़ाना, आंखे घुमाना और मुंह में से झाग निकलना है। यह ज्यादातर पेंट के चाटने या उन चीज़ों के चाटने, जहां पर पेंट किया हो, हो सकता है। पशुओं का वहां पर चरना जहां सिक्का पिघलाया जाता है या पुरानी बैटरी ढाली जाती हैं।

इलाज : अगर जहर पेट में से आगे निकल गया हो तो कैल्शियम वरसेनेट 25 प्रतिशत दिन में दो बार देना चाहिए।

रिंडरपैस्ट (शीतला माता) : -
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यह पशुओं में होने वाली गंभीर बीमारी है। संक्रमण की बहुत जल्दी फैलने वाली बीमारी है। इस बीमारी को होने में 6-9 दिन लगते हैं। इसमें तेज बुखार, मुंह से पानी बहना और खूनी दस्त लग जाते हैं। भूख नहीं लगती, दूध कम हो जाता है। आंखों और जनन अंगों में सोजिश आ जाती हैं, मुंह, नाक की झिल्ली में सोजिश आ जाती है। जबड़ों, जीभ और मसूड़ों पर जख्म हो जाते हैं। इसके बाद एक दम मोक लग जाती है जिसमें खून आता है। शरीर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। 

इलाज : इसका स्ट्रेप्टोमाइसिन या पेंसीलिन से इलाज किया जा सकता है। लेकिन तब, जब यह प्राथमिक अवस्था में हो।

ब्लैक क्वार्टर : -
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यह जीवाणु संक्रमण, पशुधन पर घातक प्रभाव डालते हैं पशु ज्यादातर 6-24 महीने की युवा अवस्था में इससे संक्रमित होते हैं। यह संक्रमण ज्यादातर बरसात के मौसम में मिट्टी से पैदा होते हैं। पशु तेज बुखार से ग्रस्त हो जाता है। श्वास लेने में कठिनाई होती है।

इलाज : बीमारी का जल्दी पता लगने पर पैनसीलिन के टीके प्रभावित निचले हिस्से और मास में लगाए जा सकते हैं। 4 माह से 3 वर्ष के पशु सूजन वाले भाग में 2 प्रतिशत हाइड्रोजन पेरोक्साइड और पोटेशियम परमैगनेट से ड्रैसिंग करें।

निमोनिया : -
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पशुओं में निमोनिया मुख्यत: गीले फर्श या गीले बिस्तर के कारण होता है। यह संक्रमक एजेंट जैसे पेरेनफ्लुएंजा, बोवाइन श्वसन साइंकिटिल वायरम, मायकोप्लाज़मा आदि के कारण होता है और संक्रमित जानवरों के संपर्क से भी होता है।

इलाज : उचित सूखे बैड और उचित हवा की आवश्यकता होती है।

डायरिया : -
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इस बीमारी में पहले पानी की अत्याधिक कमी हो जाती है फिर एसिडोसिस और डीहाइड्रेशन होता है और फिर पशु की मृत्यु हो जाती है। रोग मुख्य रूप से अस्वच्छ स्थिति, अशुद्ध जल पीने और अपौष्टिक आहार प्रणाली के कारण होता है।

इलाज : स्वच्छता की स्थिति रखें। नाइट्रोफुराज़ोन 20 मि.ग्रा. प्रति किलो या ट्रिमथोप्रिम और सल्फाडोक्सिन से इस बीमारी का इलाज किया जा सकता है।

अंदरूनी परजीवी : -
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इसके लक्षण त्वचा पर खुजली, उत्तेजना, जलन और फोड़े होना है। यह रोग मुख्य रूप से अशुद्ध वातावरण और गीला रहने की स्थिति के कारण होता है।

इलाज : नारियल मूंगफली का तेल (3:1) को सल्फर में मिक्स करके इसके इलाज के लिए उपयोग किया जाता है।

बाहरी परजीवी :- 
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इसके लक्षण दस्त, सुस्तता आदि हैं। रोग मुख्य रूप से अशुद्ध वातावरण, दीवारों को चाटना और संक्रमित फर्श के कारण होता है।

इलाज :  पीने को साफ पानी दें। डीवार्मिंग को पहले 2 सप्ताह में और फिर 6 महीनों के अंतराल पर देना आवश्यक है। बीमारी का इलाज करने के लिए सल्फामैथाइज़िन/ सल्फैडीमिडाइन की खुराक दी जाती है।

थनैला रोग : -

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यह दुधारू पशुओं को लगने वाला एक रोग है। थनैला रोग से प्रभावित पशुओं को रोग के प्रारंभ में थन गर्म हो जाता है तथा उसमें दर्द व सूजन हो जाती है। शारीरिक तापमान भी बढ़ जाता है। लक्षण प्रकट होते ही दूध की गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है। दूध में खून एवं पस की अधिकता हो जाती है। पशु खाना पीना छोड़ देता है एवं अरूचि से ग्रसित हो जाता है। थनैला बीमारी पशुओं में कई प्रकार के जीवाणु, विषाणु, फंगस तथा मोल्ड के संक्रमण से होता है।

इलाज : रोग का उपचार प्रारम्भिक अवस्थाओं में ही संभव है अन्यथा रोग के बढ़ जाने पर थन बचा पाना कठिन हो जाता है। इससे बचने के लिए दुधारू पशु के दूध की जांच समय पर करवाकर जीवाणुनाशक औषधियों द्वारा उपचार पशु चिकित्सक द्वारा करवाना चाहिए। यह औषधियां थन में ट्यूब चढ़ाकर तथा साथ ही मांसपेशी में इंजेक्शन द्वारा दी जाती है।

दाद : -
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यह त्वचा का रोग एक किस्म की फंगस से होता है। जिस कारण पशु की चमड़ी पर गोल गोल निशान बन जाते हैं। यह बीमारी ज्यादातर सर्दियों के महीने में देखी जाती है और छोटी उम्र के जानवरों में अधिक होती है। बीमारी के दौरान गोल धब्बे इस तरह दिखाई देते हैं जैसे कि चमड़ी पर आटा छिड़का हुआ हो। बीमारी की पहचान के लिए प्रभावित स्थान से बालों को उखाड़कर या चमड़ी को खुरच कर साफ कागज़ के ऊपर रखकर लैबोरेटरी में भेजा जा सकता है। इलाज के लिए वैटरनी चिकित्सक की सलाह लें। 

पैरों का गलना : -
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यह कीटाणुओं के द्वारा होने वाली बीमारी हैं जो कि जानवरों के खुरों पर असर करती है। गर्म और नमी वाले वातावरण में यह रोग ज्यादा होता है। इस बीमारी का कीटाणु जानवर के पैरों की त्वचा द्वारा शरीर के अंदर प्रवेश होता है, विशेष कर जब त्वचा पर जख्म हो।

इलाज : इलाज के लिए एंटीबायोटिक टीके लगवाएं। पैरों में हुए जख्मों पर नीला थोथा 5 फीसदी घोल, फार्मालीन 2 फीसदी या जिंक सल्फेट 10 फीसदी का घोल बनाकर लगाने से पैरों में हुए जख्म ठीक हो जाते हैं। बचाव के लिए जानवर को साफ सुथरी जगह पर रखें।   

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