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डिलीवरी के बाद सेक्स (संभोग)

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नयी नयी मां बनी महिलाओं को डॉक्टर ये सलाह देते हैं कि प्रसव के छह हफ्ते बाद तक जब तक कि उनकी पोस्टपार्टम जांच (डिलीवरी के बाद की जांचें) न हो जाये तब तक संभोग न करें। ये समय आपके पूरी तरह से ठीक होने का मौका होता है, और लोकिया  बचा हुआ रक्त और गर्भाशय के ऊतकों का निकलना) बंद होता है। अपने शरीर पर ध्यान दें।

डिलीवरी के बाद सेक्स में आने वाली समस्याओं और उनसे निजात पाने के तरीकों पर इस लेख में चर्चा की गयी है।

डिलीवरी के बाद कब सेक्स करना चाहिए - 

चाहे आपकी नार्मल डिलीवरी हो या सी-सेक्शन, आपके शरीर को ठीक होने में थोड़ा समय लगता ही है। जब तक डॉक्टर आपको सेक्स करने के लिए हामी न भर दें तब तक सेक्स करने के लिए इंतजार करना बेहतर होगा। अक्सर ये समय बच्चे के जन्म के चार से छह हफ़्तों बाद का होता है। इस समय, प्रसव के बाद होने वाले रक्तस्राव को रोकने और किसी भी प्रकार की क्षति या कटे फटे भाग के खुद ठीक करने के लिए गर्भाशय ग्रीवा (Cervix) बंद होती है।

अन्य महत्वपूर्ण समय सीमा आपकी खुद की है। कुछ महिलाएं जन्म देने के कुछ ही हफ्तों में सेक्स करने के लिए तैयार होती हैं, जबकि कुछ को कुछ महीनों या उससे भी ज्यादा समय की आवश्यकता होती है। थकान, तनाव और दर्द का डर आदि कारक आपकी कामेच्छा पर प्रभाव डाल सकते हैं।

क्या बच्चे के जन्म के बाद संभोग करने में तकलीफ होती है - 

इस दौरान शरीर में आये हार्मोनल परिवर्तन योनि को शुष्क और असहज बनाते हैं, खासकर यदि आप स्तनपान कराती हैं तो, इसलिए बच्चे के जन्म के बाद संभोग करने में तकलीफ हो सकती है । इसके अलावा यदि आप एपीसीओटॉमी या पेरिनियल टीयर्स (Episiotomy or perineal tears- सर्जरी द्वारा योनि और मलद्वार के बीच के में लगे चीरा) ठीक हो रहा है तो आपको सेक्स के दौरान दर्द भी महसूस हो सकता है।

अगर सेक्स के दौरान किसी भी तरह की परेशानी हो तो अधिक तेज़ी से संभोग न करें। योनि के सूखेपन की समस्या के लिए लुब्रीकेंट क्रीम या जेल का उपयोग करें। घाव वाले क्षेत्रों पर पड़ने वाले दवाव से बचने के लिए सेक्स करने की विभिन्न स्थितियों का प्रयास करें। जब तक संभोग के लिए आपका शरीर पूरी तरह से तैयार नहीं हो जाता आप आलिंगन (Cuddling), किसिंग या मालिश कर सकती हैं।

आप दर्द से राहत पाने के लिए कुछ तरीके भी अपना सकती हैं, जैसे मूत्राशय को पूरा खाली करें, गर्म पानी से स्नान करें या ओवर-द-काउंटर दर्द निवारक गोली लें। यदि आपको सेक्स के बाद जलन का अनुभव हो तो, एक छोटी सी तौलिया में बर्फ लपेटकर उस क्षेत्र में लगाएं। अगर इनके बावजूद सेक्स करने में दर्द हो तो, अन्य उपचारों के लिए डॉक्टर से सलाह लें।

क्या प्रसव के बाद संभोग करने पर अलग अनुभव होता है - 

प्रसव के बाद, योनि की मांसपेशियों का टोन कम हो सकता है। जिसके कारण सेक्स के दौरान सुखद अनुभव नहीं हो पाता है, जो उत्तेजना के लिए एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यह आमतौर पर अस्थायी है।

अपनी श्रोणि क्षेत्र की मांसपेशियों को टोन करने के लिए, कीगल एक्सरसाइज करें। इसे करने के लिए सिर्फ अपनी पैल्विक मांसपेशियों को कस लें जैसे मूत्र को रोका जाता है उस प्रकार। मांसपेशियों को एक बार में 10 सेकंड के लिए संकुचित करें। रोज़ाना कम से कम तीन सेट इस एक्सरसाइज के करें।

डिलीवरी के बाद गर्भधारण पर नियंत्रण - 

डिलीवरी के बाद सेक्स के लिए, चाहे आप स्तनपान कराती हों या न कराती हों, एक भरोसेमंद जन्म नियंत्रण विधि ज़रूरी होती है। प्रेग्नेंसी की जटिलताओं और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम करने के लिए, रिसर्चों से पता चलता है कि महिलाओं को दोबारा गर्भधारण करने से पहले कम से कम 18 से 24 महीनों का इंतज़ार करना चाहिए।

डॉक्टर आपको दूसरी गर्भावस्था के बीच अंतर रखने की सलाह देंगे। डिलीवरी के तुरंत बाद आपके पास केवल प्रोजेस्टिन (Progestin) नामक गर्भनिरोधक का विकल्प होता है, जो गोली या इंजेक्शन के रूप में लिया जा सकता है।

आप लंबे समय तक स्थायी गर्भनिरोधक का उपयोग भी कर सकती हैं, जैसे कॉपर या हार्मोनल आईयूडी। आपके डॉक्टर इसको चुनने में आपकी मदद कर सकते हैं।

जन्म नियंत्रण विधियों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टिन दोनों का उपयोग भी किया जा सकता है, जैसे इन दोनों से समृद्ध, संयुक्त जन्म नियंत्रण की गोलियां (Combined birth control pills)। एक स्वस्थ महिला प्रसव के तुरंत बाद अर्थात 5-6 हफ़्तों तक संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियों और अन्य प्रकार के संयुक्त हार्मोनल गर्भनिरोधकों का उपयोग कर सकती है। हालांकि ऐसा माना जाता था कि ऐसे गर्भनिरोधक तरीकों से जिनमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टिन दोनों हार्मोन मौजूद होते हैं, स्तनपान कराने वाली महिलाओं में दूध कम बनता है, लेकिन हाल में हुए एक शोध में ये सिद्ध हो गया है कि ये बिलकुल गलत मान्यता है।

प्रसव के बाद जब आप डॉक्टर के पास जाएं तो उनसे उपयोग कर सकने वाले गर्भनिरोधक विकल्पों और उनका उपयोग करने के लिए उचित समय के बारे में जानकारी ज़रूर ले लें।

बच्चा होने के बाद संभोग के बाद थकान होना - 

नवजात शिशु की देखभाल करना थकान भरा काम होता है, इसलिए हो सकता है कि आप सोते समय सेक्स करने के लिए थका हुआ महसूस करें, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपमें कामेच्छा की कमी हो गयी है। ऐसी स्थिति में आप समय में फेर बदल कर सकती हैं जैसे रात की जगह सुबह या फिर जब बच्चा सो रहा हो या किसी दोस्त / पारिवारिक सदस्य के पास हो तब सेक्स किया जा सकता है।

डिलीवरी के बाद कामेच्छा में कमी - 

अगर डिलीवरी के बाद आपकी कामेच्छा में कमी आ भी गयी है तो इस बारे में परेशान न हों। वैसे भी अब आपके पास सेक्स के अलावा और भी अधिक गहरे संबंध ध्यान देने के लिए हैं, खासकर तब जब आप नए बच्चे के साथ जीवन जीने की कोशिश कर रही हैं। यदि आप सेक्स के मूड में नहीं हैं या आपको सेक्स के दौरान चोट लगने का डर है, तो अपनी इन चिंताओं को अपने पति को ज़रूर बताएं।

जब तक आप सेक्स करने के लिए तैयार नहीं हैं, अन्य तरीकों से अंतरंगता बनाए रखें। बच्चे के बिना एक दूसरे के साथ समय बिताएं। एक दूसरे से संपर्क बनाये रखें। ऐसा करने से आपके संबंध मज़बूत होंगे।

अगर संपर्क बनाये रखने का तरीका काम नहीं आ रहा है, तो डिलीवरी के बाद डिप्रेशन (Postpartum depression) में न चली जाएं। चिड़चिड़ापन और गुस्सा, अत्यधिक थकान, जीवन में खुशियों की कमी और बच्चे से कम लगाव जैसे लक्षणों से सावधान रहें। अगर आपको लगता है कि आपको प्रसवोत्तर अवसाद हो रहा है, तो डॉक्टर से संपर्क करें और जल्द से जल्द इसका उपचार करने की कोशिश करें।

प्रेग्नेंसी के बाद कामेच्छा बढ़ाने के उपाय - 
गर्भावस्था या डिलीवरी के बाद कामेच्छा एक साल के अंदर वृद्धि हो जाती है।

इस बीच, अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करें। उदाहरण के लिए -
  •     जो गुण आप एक माता-पिता में देखना चाहते हैं उन्हें अपने अंदर उत्पन्न करें।
  •     खूब सारा पानी पिएं और स्वस्थ आहार खाएं।
  •     अपनी दैनिक दिनचर्या में शारीरिक गतिविधियों को शामिल करें।
  •     जितना हो सके उतना आराम करें।
  •     सहायता के लिए अपने पति, प्रियजनों और दोस्तों से कहें।
  •     नई माताओं के लिए एक सहायता समूह में शामिल हों।
याद रखें, जितनी अच्छी तरह से आप अपना ख्याल रखेंगी उतनी ही ज़िंदादिल आप खुद होंगी।


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पीसीओएस के ट्रीटमेंट के लिए 18 योगासन

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पीसीओएस आजकल महिलाओं के लिए एक बुरे सपने जैसा बन गया है: यह सिर्फ आपके शरीर के नॉर्मल फंक्शन को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि यह आपके व्यवहार को भी प्रभावित करता है। इसके साथ ही पीसीओएस की वजह से महिलाएं गर्भधारण नहीं कर पाती हैं। क्या योग पीसीओएस और इसकी सभी समस्याओं को खत्म कर सकता है?

पीसीओएस क्या है? 
पीसीओएस यानि पोलिसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम जिसमें महिला के शरीर में एंड्रोजेंस (पुरुष हार्मोन) बढ़ जाते हैं और इसके परिणामस्वरूप महिला के शरीर के आंतरिक अंगों की मॉर्फोलॉजी और फंक्शन में बदलाव होता है। एक महिला में पीसीओएस के ज्यादातर निम्नलिखित लक्षण दिखाई देते हैं, आइए जानें;

  • ओवरीज में सिस्ट (फ्लूइड से भरा हुआ सैक) होना जिसे सोनोग्राफी में देखा जा सकता है। 
  • ओवुलेशन देर से या न होने की वजह से पीरियड्स अनियंत्रित हो जाते हैं। 
  • शरीर पर बहुत ज्यादा बाल आते हैं और एक्ने भी हो सकता है। 
  • वजन कम होने में कठिनाई होती है। 
  • गर्भधारण करने में कठिनाई होती है। 

अकन्थोसिस निगरिकन्स – यह एक ऐसी समस्या है जिसमें त्वचा काली, मोटी होने लगती है और इसमें विशेषकर स्किन फोल्ड्स में पैचेज पड़ने लगते हैं (जैसे बगलों में, गर्दन में, आंतरिक अंगों में)। 
ऐसा कोई एक कारण नहीं बताया जा सकता जिसकी वजह से पीसीओएस होता है – यह सिर्फ हेरिडिटी और वातावरण कारकों के कॉम्बिनेशन की वजह से होता है। पीसीओएस की समस्या आमतौर पर स्ट्रेस की वजह से बढ़ती है और इसमें स्वास्थ्य संबंधी अन्य कॉम्प्लीकेशंस भी हो सकते हैं, जैसे ओबेसिटी, डायबिटीज, मूड डिसऑर्डर इत्यदि। 

यद्यपि ओवरियन सिस्ट पीसीओएस का सबसे महत्वपूर्ण लक्षण है पर यह समस्या को बताने वाला सिर्फ एक ही लक्षण नहीं है। पीसीओएस थायरॉइड के फंक्शन को प्रभावित करने के लिए भी जाना जाता है। 

चूंकि पीसीओएस का सटीक कारण नहीं बताया जा सकता इसलिए यह पूरी तरह से ठीक नहीं होता है। हालांकि लाइफस्टाइल में बदलाव करके महिलाएं पीसीओएस से प्रभावित हुए बिना भी जिंदगी जी सकती हैं और यहाँ तक कि गर्भधारण भी कर सकती हैं। 

पीसीओएस को ठीक करने के लिए योग क्यों प्रभावी है 
योग सिर्फ एक एक्सरसाइज नहीं है – यह आपकी पूरी जीवनशैली को बेहतर बनाता है। यदि आप इसे अपने जीवन में परिवर्तन लाने के लिए करना चाहती हैं तो इसके कुछ सिद्धांत हैं जो आपको मोक्ष के समीप ले जाते हैं। 

योग के सिद्धांतों की मदद से शरीर के पाँचों सेंसेस, विभिन्न अंगों, विचार, भावनाओं और पूर्ण शरीर को शांति मिलती है।

अक्सर लोग ज्यादा से ज्यादा हठ योग करने का प्रयास करते हैं। हठ योग करने से निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं, आइए जानें;

  • मिताहार यानी संतुलित आहार 
  • षट्कर्म यानी शरीर का शुद्धिकरण 
  • आसन यानी शरीर का सही पोज 
  • प्राणायाम यानी सांसों का सही आदान-प्रदान 
  • ध्यान यानी मेडिटेशन 
  • कुण्डलिनी, रीढ़ की हड्डी के आधार पर स्थित एनर्जी का एक रूप

जीवन को समग्र रूप से जीने से इसके हर पहलू की गुणवत्ता बढ़ जाती है – चाहे वह स्वास्थ्य संबंधी हो, विचारों से हो, मानसिक हो या सिर्फ खुश रहने के लिए हो। पीसीओएस सिर्फ एक रोग है जिसके प्रभाव को कम करने में योग सकारात्मक रूप से मदद करता है – इसके और भी बहुत सारे फायदे हैं। 

पीसीओएस का उपचार करने के लिए योग के फायदे 
लोग अक्सर अलग-अलग समस्याओं को ठीक करने के लिए योग करते हैं जिसमें एल्जाइमर रोग से लेकर कैंसर तक शामिल हैं। योग में ज्यादातर ध्यान या मेडिटेशन किया जाता है। पीसीओएस के प्रभाव को कम करने के लिए योग करने के बहुत सारे फायदे हैं:

  • यह अन्य दवाओं व ट्रीटमेंट्स के विपरीत बहुत सस्ता है जिसकी मदद से महिलाओं में सिर्फ पीसीओएस का प्रभाव ही कम नहीं होता है बल्कि यह दूसरी परेशानियों को भी ठीक करता है। 
  • योग में किसी भी दवाई या डिवाइस का उपयोग नहीं किया जाता है इसलिए इसका अन्य किसी चीज पर कोई भी नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता है। 
  • योग करने से कोई भी साइड-इफेक्ट्स नहीं होते हैं – इसे करने के बाद आपको सिर्फ सकारात्मक, स्वस्थ और ताजगी भरा महसूस होगा। शरीर को एक्टिव करने के लिए दवाओं की जरूरत पड़ सकती है (विशेषकर तब जब ओवुलेशन होता है), इसकी ज्यादातर दवाइयां शरीर को प्रभावित करती हैं जिससे आपको साइड-इफेक्ट्स भी हो सकते हैं। 

पीसीओएस के लिए 14 योगासन 
यदि आप अपनी किसी भी समस्या को ठीक करने के लिए योग करना शुरू करती हैं तो यह ध्यान में रखना जरूरी है कि योग के ज्यादा से ज्यादा फायदे प्राप्त करने के लिए इसे रोजाना करना चाहिए। पीसीओएस के लिए यहाँ पर 14 योगासन बताए गए हैं, आइए जानें;

1. बद्धकोणासन या बटरफ्लाई पोज 
यह पोज निजी अंगों की मांसपेशियों, जांघों के आंतरिक भाग और अब्डॉमिनल कैविटी में मौजूद अंगों को ठीक करने में मदद करता है। यह महिलाओं की ओवरीज के फंक्शन को नियंत्रित और पीरियड्स को आरामदायक करने के लिए जाना जाता है। 

2. सुप्त बद्धकोणासन या रेक्लाइनिंग बटरफ्लाई पोज 
यह बद्धकोणासन का ही दूसरा रूप है और इसके फायदे भी उसी के जैसे होते हैं। 

3. भुजंगासन या कोबरा पोज 
यह सूर्य नमस्कार का सातवां पोज है। भुजंगासन स्वाधिस्थान चक्र को प्रभावित करता है जो सैक्रम में होता है। भुजंगासन कुण्डलिनी (जीवन चक्र की मुख्य एनर्जी) को जागृत करने के लिए जाना जाता है जिससे पीसीओएस के लक्षण भी नियंत्रित होते हैं। 

4. नौकासन या बोट पोज 
नौकासन करने से पेट की मांसपेशियों और अब्डॉमिनल कैविटी में मौजूद अंगों को काफी मदद मिलती है। यह थायरॉइड के फंक्शन को नियंत्रित करता है जिससे पीसीओएस में प्रभाव पड़ता है। 

5. धनुरासन या बो पोज 
यह पोज कब्ज जैसी समस्याओं को ठीक करने के लिए बहुत जरूरी है। धनुरासन करने से पीरियड्स में हो रही असुविधाओं में भी आराम मिलता है, जैसे क्रैंप्स, कड़कपन और इत्यादि। यह रिप्रोडक्टिव ऑर्गन्स को भी उत्तेजित करता है और इसे ठीक से फंक्शन करने में मदद करता है। 

6. बालासन या चाइल्ड पोज 
बालासन से किसी भी शरीर के किसी भी अंग में सीधा प्रभाव नहीं पड़ता। हालांकि यह हिप्स की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए सबसे अच्छा आसन है। इसके अलावा पीसीओएस के लिए योगासन की लिस्ट में यह आसन सबसे बेहतरीन है क्योंकि यह एक अच्छा ‘काउंटर आसन’ है जो अलग-अलग आसन करने की वजह से स्ट्रेच्ड और एक्सटेंडेड शरीर को नॉर्मल होने में मदद करता है। 

7. मार्जरी आसन या कैट पोज 
कई लोग पीठ का दर्द कम करने के लिए कैट पोज करते हैं। यह रीढ़ की हड्डी को मजबूत करने के लिए सबसे सही पोज है। महिलाओं में कैट पोज के कई फायदे हैं: कैट पोज महिलाओं की मुख्य मांसपेशियों को मजबूत बनाने में मदद करता है, बच्चे के जन्म के लिए एनर्जी देता है और पीरियड्स के समय क्रैंप्स में भी आराम देता है। 

8. बीतिलासन या कैमल पोज 
कैमल पोज कैट पोज से बिलकुल विपरीत होता है। यह कैट पोज को बैलेंस करने में मदद करता है और इन दोनों आसन को हमेशा एक साथ करना चाहिए। 

9. प्रसारित पदोत्तासन या वाइड लेग्ड फॉरवर्ड बेंड  
यह आसन भी हिप्स को लूज करने में मदद करता है और इस आसन से हिप्स की मांसपेशियां ढीली हो जाती है और बच्चे का जन्म होने में आसानी होती है। प्रसारित पदोत्तासन पेट की मांसपेशियों और शरीर के अंगों को टोन करने में मदद करता है। 

10. पद्मासन या लोटस पोज 
यह आसन महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए बहुत अच्छा है क्योंकि यह दोनों के ही रिप्रोडक्टिव ऑर्गन्स को ठीक करने में मदद करता है। पुरुषों में पद्मासन को साइटिका भी कहते हैं। महिलाओं में पद्मासन में बैठने से पीरियड्स के दौरान क्रैम्प्स को कम करने में मदद मिलती है। इस आसन से पेल्विक गर्डल पर भी प्रभाव पड़ता है। 

11. सेतु बंध सर्वांगासन या ब्रिज पोज 
ब्रिज पोज थायरॉइड के फंक्शन को ठीक करने में मदद करता है जो पीसीओएस का एक जरूरी पहलू है। यह आसन पेट के ऑर्गन्स को उत्तेजित करने के लिए भी जाना जाता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण फायदा यह है कि इससे मेनोपॉज के लक्षणों में मदद मिलती है जिससे पीसीओएस में भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। 

12. पश्चिमोत्तानासन या सीटिड फॉरवर्ड बेंड 
पश्चिमोत्तानासन पीसीओएस के सबसे बड़े साइड इफेक्ट को कम करने में मदद करता है – ओबेसिटी और वजन बढ़ना। कई महिलाएं जिन्हें पीसीओएस है उन्हें वजन कम करने में कठिनाई होती है – पश्चिमोत्तानासन करने से आपको इस समस्या में मदद मिल सकती है।

13. शलभासन या लोकस्ट पोज 
यह भी एक प्रकार का योगासन है जो महिलाओं में ओवरी और यूटराइन के विकारों के लिए फायदेमंद होता है। जैसा कि हम जानते हैं कि पीसीओएस ओवरीज को प्रभावित करता है और इसलिए यह पोज पीसीओएस के प्रभाव को कम करने में मदद करता है। डायबिटीज भी पीसीओएस की वजह से ही होता है और लोकस्ट पोज (या सुपरमैन पोज) डायबिटीज को नियंत्रित करने के लिए ही जाना जाता है (यदि इसे रोजाना किया जाए तो)। 

14. मालासन या गारलैंड पोज 
मालासन और स्क्वैट्स के फायदे एक समान होते हैं – ये दोनों आसन हिप्स व पेल्विक गर्डल को सुविधाजनक करने में मदद करते हैं जिससे महिलाओं में अनियंत्रित पीरियड्स को ठीक करने और गर्भधारण में मदद मिलती है। 

पीसीओएस के लिए 4 प्राणायाम 
कोई भी एक्सरसाइज करते समय सांसों का आदान-प्रदान किस प्रकार से होना चाहिए यह जानना बहुत जरूरी है। चाहे आप जिम में वेट ट्रेनिंग करती हों या फिर घर में योग करती हों – इसे करते समय सांस लेने और छोड़ने का एक पैटर्न होता है। इसके साथ योग एक्सरसाइज का एक अलग सेट है जो सिर्फ सांस लेने के अलग-अलग तरीके और तकनीक पर फोकस करता है। यहाँ पर पीसीओएस के लिए 4 प्रकार के प्राणायाम बताए गए हैं, आइए जानें;

1. योनि मुद्रा 
योनि मुद्रा हाथों का एक पोस्चर है जो महिला की वजायना को दर्शाता है। इसे करने के लिए पहले आप पद्मासन में बैठकर अपने दोनों हाथों को योनि मुद्रा में जोड़ लें और साथ ही गहरी सांस लें। इससे आपको पीसीओएस को मैनेज करने में बहुत मदद मिलेगी। यह आसन विशेषकर रिप्रोडक्टिव सिस्टम के फंक्शन को नियंत्रित करने और इसमें फायदे पहुँचाने में मदद करता है। 

2. नाड़ी शोधन 
नाड़ी शोधन सांस लेने और सांस छोड़ने की प्रक्रिया है। यह एक साथ किया जाता है; पहले आप लगातार धीरे-धीरे दाहिने ओर से सांस लें और फिर बाएं ओर छोड़ें। इस प्राणायाम का सबसे सीधा संबंध शरीर में मेल व फीमेल एनर्जी को संतुलित करने से है जिससे पीसीओएस के प्रभाव को कम करने में मदद मिलती है। यह प्राणायाम शरीर में अलग-अलग हॉर्मोन्स को संतुलित करने में भी मदद करता है। 

3. भ्रामरी 
पीसीओएस की वजह से आपकी मानसिक शांति भी खत्म हो सकती है। खुद को शांत करने के लिए सबसे बेहतरीन एक्सरसाइज भ्रामरी है जिससे आपकी एंग्जायटी और अस्थिरता कम हो सकती है। इसे करने के लिए आप अपने दोनों हाथों को कान के ऊपर रखें, आँखें बंद करें, गहरी सांस लें और सांस को धीरे-धीरे बाहर छोड़ते हुए हमिंग आवाज निकालें। यदि आपके लिए हाथों को रखना कठिन है तो आप ऊपर फोटो पर दिए अनुसार ही आँखें और कान बंद करें। 

4. कपालभाति 
वजन को नियंत्रित करने के लिए कपालभाति सबसे बेस्ट एक्सरसाइज है। इससे पेट की व मूल मांसपेशियों पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ता है। कपालभाति करने से डायबिटीज भी नियंत्रित हो जाता है। इससे पीसीओएस से संबंधित दो कॉम्प्लीकेशंस कम हो सकते हैं और यह महिलाओं के लिए बेहतरीन एक्सरसाइज है। 

जरूरी बात: कपालभाति सांस लेने की सबसे ज्यादा प्रभावी एक्सरसाइज है जो सिर्फ पीसीओएस ही नहीं बल्कि रेस्पिरेटरी सिस्टम के लिए भी फायदेमंद है। 

  • इसे करने के लिए पहले आप ध्यान की अवस्था में बैठ जाएं। 
  • अब गहरी सांस लें और सीने को चौड़ा करें। 
  • फिर पेट की मांसपेशियों का उपयोग करते हुए नाक से तेजी में सांस बाहर छोड़ें। 
  • इस प्राणायाम को आप 10 बार दोहराएं। यह इसकी 1 साइकिल है। 
  • इसी प्रकार से आप इस प्राणायाम की 3 साइकिल पूरी करें। इस बात का ध्यान रखें कि हर एक साइकिल को पूरा करने के बाद आप गहरी सांस लें और इसे धीरे-धीरे छोड़ें। 

सामान्य तौर पर चाहे आप पद्मासन में बैठकर गहरी सांस लें या फिर कुर्सी पर बैठकर गहरी सांस लें – इससे आपके मस्तिष्क को शांति मिलती है, विचार नियंत्रित होते हैं और स्ट्रेस में आराम मिलता है। पीसीओएस का प्रभाव अक्सर स्ट्रेस लेने से ही बढ़ता है – कई महिलाएं रोजाना अधिक से अधिक स्ट्रेस महसूस करती हैं जिसकी वजह से उन्हें पीसीओएस जैसी समस्याएं होती हैं। यदि रोजाना के 5 मिनट आपके जीवन की इस समस्या को ठीक कर सकते हैं तो आप इसे क्यों न करें।

योग के दौरान रखी जानेवाली सावधानियां 
यद्यपि योग करने से स्वास्थ्य संबंधी कई फायदे होते हैं पर यदि आप इसके लिए बिलकुल नई हैं तो आपको योग शुरू करते समय बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। हालांकि यह बहुत ज्यादा तेजी से की जानेवाली या अधिक प्रभावी एक्सरसाइज नहीं है पर इसमें फ्लेक्सिबिलिटी की जरूरत होती है। योग करते समय आपके शरीर के सभी जोड़ व मांसपेशियां काम करना शुरू कर देती हैं इसलिए यदि आप ज्यादा नहीं टहलती हैं तो आपको दर्द हो सकता है या क्रैम्प भी आ सकता है। पीसीओएस के लिए योग करते समय निम्नलिखित सावधानियों पर ध्यान दें;

  • योग करते समय योगा मैट का उपयोग करें। सभी आसन करते समय बैठने के लिए यह बहुत जरूरी है। यदि आप योगा मैट नहीं खरीदना चाहती हैं तो आप किसी कार्पेट या मोटे ब्लैंकेट पर भी बैठ सकती हैं। बस इस बात का ध्यान रखें कि वह थोड़ा मोटा हो और इधर-उधर न खिसके (गिरने या फिसलने से बचने के लिए)। 
  • स्ट्रेच होनेवाले कपड़ों का उपयोग करें – विशेष रूप से पैंट। योग करने से शारीरिक फ्लेक्सिबिलिटी में सुधार आता है। पर यदि आपके कपड़े स्ट्रेचेबल नहीं हैं तो आपको मुड़ने या झुकने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए योग के दौरान कौन से कपड़े पहनने हैं इसका चयन भी ध्यान से करें। 
  • अपने शरीर की सुनें। यदि आप किसी आसन को ठीक से नहीं कर पा रही हैं तो खुद के साथ जबरदस्ती न करें। पहले अपनी मांसपेशियों व शरीर को सही तरीके से मूव करने, मुड़ने, स्ट्रेच करने और झुकने की आदत डालें (रोजाना अभ्यास करके) और फिर धीरे-धीरे सही पोस्चर बनाने का प्रयास करें। आप योग धीरे-धीरे और आराम से शुरू करें। 
  • तेज म्यूजिक चलाने के बजाय शांत और सरल म्यूजिक चलाएं। योग सिर्फ शरीर पर फोकस करना ही नहीं है बल्कि यह आपकी मानसिक व भावनात्मक स्थिति में भी सुधार लाता है। इस दौरान वाइट नॉइस या सॉफ्ट इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक चलाना ही सबसे बेस्ट होगा। योग करते समय आप मंत्र जाप का म्यूजिक भी चला सकती हैं। 
  • योग करने से पहले ज्यादा न खाएं। यद्यपि किसी भी वर्कआउट के लिए यही सही है पर विशेषकर योग करते समय यह बहुत जरूरी है क्योंकि बहुत सारे आसन करने से पेट पर बल पड़ता है। भरे पेट के साथ यह आसन करने से आपको क्रैम्प आ सकता है या आपको मतली, उल्टी या एसिड रिफ्लक्स भी हो सकता है। 
  • योग करते समय पानी पीना न भूलें। योग करने से भले पसीना न आए पर शरीर को हाइड्रेटेड रखने के लिए पानी पीना बहुत जरूरी है। इसके लिए आप बेस्ट टिप फॉलो कर सकती हैं: हर आसन करने के बाद एक घूंट पानी पिएं। 
  • अपना मोबाइल पास न रखें। यदि आप म्यूजिक चलाना चाहती हैं तो इसे एरोप्लेन मोड पर करके रखें। क्योंकि योग के ज्यादा से ज्यादा लाभ पाने के लिए आपको अलिप्त होने जैसी स्थिति में जाना जरूरी है। 

योग करते समय सबसे पहले आसन करें, उसके बाद प्राणायाम और फिर ध्यान करें। इस सीक्वेंस को बिलकुल भी मिक्स न करें। 
अक्सर पूछे जानेवाले सवाल 
1. योग से पीसीओएस की समस्या कब तक खत्म हो जाती है?
योग करने से पीसीओएस की समस्या खत्म नहीं होती है। वास्तव में पीसीओएस किसी भी दवाई से ठीक नहीं हो सकता। हालांकि योग करने से पीसीओएस के विशेष रूप से वो लक्षण काफी हद तक कम हो जाते हैं जिनसे फर्टिलिटी प्रभावित होती है और समय के साथ यह उन दवाइयों को भी कम कर देता है जो आप हॉर्मोन्स को नियंत्रित करने के लिए लेती हैं।

2. पीसीओएस के मरीज के लिए क्या ज्यादा जरूरी है? योग करना या जिम जाना?
योग करने से एक बहुत बड़ा फायदा मिलता है जो जिम में जाने से नहीं मिल सकता – इससे स्ट्रेस कम हो जाता है। हालांकि कोई भी एक्सरसाइज आपके स्ट्रेस को कम कर सकती है पर योग की मेडिटेटिव तकनीक (जिसमें सांस पर ध्यान लगाया जाता है) से स्ट्रेस पूरी तरह से खत्म भी हो सकता है और हम सभी जानते हैं कि पीसीओएस की वजह से एक महिला को कितना ज्यादा स्ट्रेस होता है। इसके साथ यह भी पाया गया है कि जिम में बहुत ज्यादा एक्सरसाइज करने से एंड्रोजेंस बढ़ते हैं जो पीसीओएस पर प्रतिकूल प्रभाव भी डाल सकते हैं। 

3. क्या योग करना अत्यधिक एक्सरसाइज करने से बेहतर है?
हाँ, पीसीओएस का सबसे बड़ा साइड-इफ्फेक्ट यह कि इसमें महिला अपना वजन कम नहीं कर पाती है। जिसकी वजह से महिलाएं जल्द से जल्द कैलोरीज कम करने की वजह से ज्यादा प्रभावी एक्सरसाइज करना शुरू कर देती हैं। हालांकि इसके लिए योग करना ज्यादा सही है क्योंकि यह सिर्फ वजन कम करने में और स्ट्रेस को नियंत्रित रखने (जैसे कि पहले भी बताया गया है) में ही मदद नहीं करता है बल्कि शरीर के विभिन्न अंगों के लिए इसके अनेक फायदे भी हैं (जो बहुत ज्यादा एक्सरसाइज करने से नहीं होते हैं)। योग एक समाधान से ज्यादा है जो शरीर को पूरी तरह से ठीक रखने से भी ज्यादा मदद करता है – शरीर के जो भी अंग पीसीओएस की वजह से प्रभावित होते हैं, योग विशेष रूप से उन सभी अंगों को ठीक करता है। 

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महिला नसबंदी (ट्यूबेक्टॉमी या ट्यूबल लिगेशन) के लिए एक मार्गदर्शिका

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पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए गर्भनिरोध के कई तरीके उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ मामूली सर्जिकल प्रक्रियाएं हैं और यह आमतौर पर गर्भनिरोध के स्थायी तरीके हैं। नसबंदी, जिसे महिलाओं की ट्यूबल नसबंदी (बंध्याकरण) के रूप में भी जाना जाता है, यह एक सामान्य प्रक्रिया है और इसे करने के कई तरीके हैं।

महिला नसबंदी क्या है?
आम भाषा में नसबंदी को डिंबवाहिका बंध्याकरण के रूप में भी जाना जाता है। महिला नसबंदी के इस तरीके में आपके अंडाशय से डिंब ले जाने वाली डिंबवाही नलिकाओं को बांध के, बंद करके या अलग करके अवरुद्ध किया जाता है। यह शुक्राणुओं को डिंब तक पहुँच कर निषेचित करने से रोकता है और इस तरह से यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से गर्भावस्था को रोकती है। इस प्रकार का नसबंदी एक लेप्रोस्कोपिक प्रक्रिया, मिनी-लैपरोटॉमी या ट्यूबल प्रत्यारोपण के माध्यम से किया जा सकता है।

नसबंदी कितनी प्रभावी होती है?
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नसबंदी को लगभग 100% प्रभावी माना जाता है, लेकिन 0.5% (1000 में से 5) की संभावना है कि जिन महिलाओं को नसबंदी हुई है वे इस प्रक्रिया के लगभग एक साल बाद गर्भवती हो सकती हैं। नसबंदी होने के लगभग पाँच वर्षों बाद गर्भवती होने की 1.3% संभावना है। ग़लत तरीके से हुई सर्जरी या प्रक्रिया के दौरान गर्भावस्था, वह कारण हैं जिसकी वजह से नसबंदी के बाद भी गर्भधारण हो सकता है।

क्या नसबंदी आप के लिए सही है?
नसबंदी की सलाह केवल उन महिलाओं को दी जाती है, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि उन्हें और बच्चे नहीं चाहिए। यह उन लोगों के लिए भी एक अच्छा विकल्प है, जिनको ऐसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं जो गर्भधारण करने से और बढ़ सकती हैं और कुछ गंभीर वंशानुगत समस्याओं से पीड़ित उन महिलाओं के लिए भी है जो इन समस्याओं को अगली पीढ़ी नहीं पहुँचाना चाहती हैं । क्या यह आपके लिए अच्छा विकल्प है, इसका निर्णय लेने से पहले अपने जीवनसाथी, परिवार और डॉक्टर से चर्चा करें।

क्या नसबंदी दर्दनाक है?
किसी-किसी प्रकार की नसबंदी में आपके शरीर पर एक चीरा लगाया जा सकता है। जिस प्रकार की नसबंदी आपने चुनी है, उसके आधार पर डॉक्टर भी आपको सामान्य अथवा लोकल एनेस्थीसिया देगा। सामान्य एनेस्थीसिया दिए जाने पर आप सो जाएंगी और प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद ही जागेंगी जबकि लोकल एनेस्थीसिया आपको पूरे समय जगाए रखता है, और सिर्फ प्रभावी क्षेत्र सुन्न किया जाता है इसलिए आपको उस दौरान कुछ भी महसूस नहीं होता है।

नसबंदी प्रक्रियाओं के प्रकार
सामान्य प्रकार की नसबंदी का वर्गीकरण इस प्रकार से किया जा सकता है कि एक वह जिसमें चीरा लगाने की आवश्यकता होती है और एक वह जिसमें नहीं होती है। लेप्रोस्कोपी और मिनी-लैपरोटॉमी पूर्व श्रेणी में हैं, जबकि ट्यूबल प्रत्यारोपण को ‘एश्यूर’ नाम से भी जाना जाता है जो बाद की श्रेणी में आता है।

1. चीरा नसबंदी
चीरा नसबंदी की दो पद्धतियाँ हैं जिन्हें लैप्रोस्कोपी और मिनी-लैपरोटॉमी कहा जाता है और दोनों में स्थानीय या सामान्य एनेस्थीसिया की आवश्यकता होती है।

कम दर्दनाक और कम आक्रामक और जल्दी स्वास्थ्य लाभ होने के कारण लेप्रोस्कोपी को प्राथमिकता दी जाती है। इसकी पूरी प्रक्रिया में केवल 30 मिनट लगते हैं और यह त्वचा पर कम से कम निशान बनाता है, इस सर्जरी के बाद अधिकांश महिलाएं उसी दिन घर लौट सकती हैं।

मिनी-लैपरोटॉमी को एक प्रमुख शल्य-क्रिया माना जाता है और आमतौर पर यह सामान्य एनेस्थीसिया के अंतर्गत प्रसव के पहले या दूसरे दिन के दौरान और इसके अलावा इसे सी-सेक्शन के दौरान भी किया जाता है।

2. ट्यूबल (डिंबप्रणालीय) प्रत्यारोपण
‘एश्यूर’ या ‘ट्यूबल प्रत्यारोपण’ करने की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के चीरे की आवश्यकता नहीं होती है क्योंकि यह गर्भाशय ग्रीवा और योनि के माध्यम से किया जाता है। डिंबवाही नलिकाओं में धातु के स्प्रिंग को डाला जाता है और धीरे-धीरे इसके चारों ओर निशान बन जाते हैं, जिससे नलिकाओं में स्थायी रुकावट हो सकती है।

नसबंदी के प्रक्रिया की तैयारी कैसे करें?
नसबंदी किसी भी अस्पताल में या किसी निजी क्लीनिक में भी किया जा सकता है। आपका डॉक्टर उन कारणों पर चर्चा कर सकते हैं कि आप इस प्रक्रिया को क्यों चुन रहे हैं और वह जानना चाहेंगे कि क्या यह आपका एक सुविचारित निर्णय है।आपकी व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुकूल आपको नसबंदी प्रक्रिया के प्रकार के बारे में जानकारी दी जाएगी। कई महिलाएं बच्चे के जन्म के तुरंत बाद या अन्य किसी सर्जरी के साथ संयुक्त रूप से यह सर्जरी करवाने का निर्णय लेती हैं। यदि आप यह प्रक्रिया बच्चे के जन्म के तुरंत बाद नहीं करवा रही हैं, तो आपको प्रक्रिया से एक महीने पहले और एक महीने बाद तक गर्भनिरोधक का उपयोग करने के लिए कहा जा सकता है।

चीरा नसबंदी की प्रक्रिया
नसबंदी और मिनी लैपरोटॉमी के लिए होने वाली लेप्रोस्कोपिक प्रक्रिया को चीरा नसबंदी कहा जाता है।
लैप्रोस्कोपिक नसबंदी में आपको स्थानीय या सामान्य बेहोशी दी जाती है जिसके बाद डॉक्टर आपके खाली पेट में गैस पंप करते हैं, ताकि अंगों को बेहतर ढंग से देखने में मदद मिल सके। नाभि के पास दो छोटे चीरे लगाए जाते हैं जिसके माध्यम से डॉक्टर आपके डिंबवाही नलिकाओं का सही निर्धारण करने के लिए लेप्रोस्कोप लगाते हैं। एक बार स्थित होने पर, नलिकाएं बंद कर दी जाती हैं और इसी के साथ यह प्रक्रिया पूर्ण हो जाती, इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 30 मिनट लगते हैं।

मिनी-लैपरोटॉमी आमतौर पर बच्चे के जन्म के बाद किया जाता है और इस प्रक्रिया में डॉक्टर नाभि के पास चीरा लगाते हैं। डिंबवाही नलिकाओं को इस छिद्र के माध्यम से ऊपर लाया जाता है और उन्हें बंद करने के लिए क्लिप का उपयोग किया जाता है, जबकि कुछ मामलों में नलिकाओं के एक हिस्से को काट दिया जाता है।

ट्यूबल प्रत्यारोपण के लिए प्रक्रिया
यदि नसबंदी की पद्धति ट्यूबल प्रत्यारोपण है, तो किसी प्रकार की बेहोशी की कोई आवश्यकता नहीं होती है। आपका डॉक्टर प्रक्रिया से ठीक पहले गर्भाशय ग्रीवा को बड़ा कर देगा और फिर योनि और गर्भाशय ग्रीवा के माध्यम से एक पतले कैथेटर (एक प्रकार की नली) को किसी एक डिंबवाही नलिका में डाल देते हैं। यह कैथेटर उस नलिका में एक प्रत्यारोपण लगाता है और फिर इसी प्रक्रिया को दूसरी नलिका के साथ दोहराई जाती है। बाद में एक्स-रे के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि प्रत्यारोपण को सही ढंग से रखकर डिंबवाही नलिकाओं को अवरुद्ध कर दिया गया है।

नसबंदी के बाद आप कैसा महसूस करेंगी?
आपको बिलकुल वैसी ऐंठन का अनुभव होगा जैसी मासिक धर्म के दौरान होती है या प्रक्रिया के दौरान गर्भाशय में होने वाली हलचल के परिणामस्वरूप योनि से थोड़ा रक्तस्राव का अनुभव भी कर सकती हैं। यदि आपने लेप्रोस्कोपिक प्रक्रिया करवाई थी, तो इस्तेमाल की हुई गैस की वजह से आपका पेट एक या दो दिन के लिए फूला हुआ रह सकता है, इस गैस के कारण कुछ समय के लिए पीठ या कंधे में दर्द भी हो सकता है। यदि आपके चीरे में से रक्तस्त्राव प्रारम्भ हो जाता है, आपको बुखार या चकत्ते आ रहे हैं, सांस लेने में मुश्किल हो रही है, आपके पेट में लगातार दर्द हो रहा है या आपकी योनि से असामान्य स्त्राव हो रहा है, तो चिकित्सक को तुरंत संपर्क करना महत्वपूर्ण है।


नसबंदी के बाद भी आपकी माहवारी रजोनिवृत्ति तक पहुँचने से पहले तक रहती है। गर्भनिरोध के तरीके जो कि हॉर्मोनल कारकों पर निर्भर होते हैं, उनके विपरीत नसबंदी से किसी भी प्रकार का हॉर्मोनल असंतुलन नहीं होता है।

सामान्य रूप से नसबंदी के बाद स्वास्थ्य-लाभ में कितना समय लगता है?
स्वास्थ्य-लाभ की अवधि आपकी जीवनशैली, प्रक्रिया से पहले आपके स्वास्थ्य और आपके द्वारा चुनी गई नसबंदी के प्रकार के आधार पर अलग-अलग होती है। लैप्रोस्कोपिक नसबंदी के बाद आपके उसी दिन घर जाने की संभावना हो सकती है। मिनी लैपरोटॉमी के बाद स्वास्थ्य-लाभ में कुछ दिन लग सकती हैं। यदि आपने ट्यूबल प्रत्यारोपण करवाया है, तो आप उसी दिन अपनी सामान्य दिनचर्या में वापस आने में सक्षम हो सकती हैं। प्रक्रिया के बाद दो हफ्तों तक आगे की जाँच के लिए परीक्षण निर्धारित किए जाते हैं।

क्या नसबंदी के प्रभाव को उलटाया जा सकता है?
कुछ स्थितियों में नसबंदी के प्रभाव उलटाया जा सकता है, हालांकि यह एक बड़ी सर्जरी है और आपको कुछ दिनों तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है। एक सफल प्रक्रिया की संभावना कुछ कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि की गई नसबंदी का प्रकार, आपकी उम्र, प्रक्रिया के बाद कितना समय बीत चुका है और आपकी डिंबवाही नलिकाओं को कितना नुकसान हुआ है। प्रक्रिया उलटाने के बाद गर्भावस्था की दर काफी भिन्न और 30% से 85% के बीच होती है।

नसबंदी के उलटाने की प्रक्रिया से आप अस्थानिक गर्भावस्था का अत्यधिक खतरा हो सकता है और यह स्थिति जानलेवा भी हो सकती।

ख़तरे और जटिलताएं
चूंकि नसबंदी पेट की एक ऐसी शल्य चिकित्सा है जिसे बेहोशी देकर पूर्ण किया जाता, इस वजह से कुछ ख़तरे और जटिलताएं हो सकती हैं, जैसे:

  • आँतों, मूत्राशय या प्रमुख रक्त वाहिकाओं में नुकसान।
  • बेहोशी देने पर प्रतिक्रिया होना।
  • घाव ठीक होने में असफलता और संक्रमण की संभावना।
  • पेड़ू या पेट में दर्द जो लंबे समय तक रहता है।
  • चीरे वाली जगह पर स्थायी दाग।
  • इससे पहले अगर आपकी पेट या पेड़ू की सर्जरी हुई है, तो जटिलताओं का खतरा अधिक होता है। मोटापे या मधुमेह होने पर भी नसबंदी के बाद जटिलताओं की संभावना बढ़ जाती है।

नसबंदी के कितने समय बाद आप संभोग कर सकती हैं?
डॉक्टर आपको नसबंदी की प्रक्रिया के बाद सुरक्षित रूप से संभोग शुरू कर सकने से संबंधित एक समय-सारिणी दे सकते हैं, हालांकि ज़्यादातर लोग एक या दो हफ्ते तक इंतज़ार करते हैं। अगर नसबंदी, प्रसव के तुरंत बाद की गई है तो प्रतीक्षा का समय कम से कम चार सप्ताह तक हो सकता है। कुछ महिलाओं को एश्यूर प्रत्यारोपण के लगभग एक साल बाद तक संभोग के दौरान दर्द या परेशानी का अनुभव हो सकता है ।

क्या यह एस.टी.डी. से सुरक्षा प्रदान करता है?
नहीं, ट्यूबल बंधाव स्थायी नसबंदी का केवल एक प्रकार है और पुरुषों या महिलाओं के लिए यौन संचारित रोगों (एस.टी.डी.) से किसी भी प्रकार की सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। नसबंदी, प्रभावी गर्भनिरोध का केवल एक माध्यम है। पुरुष या महिला के रूप में एस.टी.डी. को रोकने या फैलने की संभावनाओं को कम करने के लिए कंडोम का उपयोग करना सबसे अच्छा तरीका है क्योंकि पुरुष या महिला नसबंदी का इसमें कोई योगदान नहीं होता है।

चीरा नसबंदी के बाद, किसी प्रकार के अतिरिक्त गर्भनिरोध की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन यदि ट्यूबल प्रत्यारोपण किया गया है, तो यह सलाह दी जाती है कि आप लगभग तीन महीने तक गर्भनिरोध के किसी अन्य रूप का प्रयोग करें। इस अवधि के बाद, एक एक्स-रे इस बात की पुष्टि करने में मदद कर सकता है कि प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूर्ण हुई है और आप गर्भनिरोध के अन्य तरीकों का प्रयोग करना बंद कर सकती हैं। ऐसा सोचना सामान्य है कि नसबंदी आपमें किसी तरह का बदलाव ला सकता है। हालांकि, आपका वज़न नहीं बढ़ेगा, चेहरे पर बाल नहीं आएंगे या आप रजोनिवृत्ति पर नहीं आएंगी। पर इससे पहले कि आप आगे बढ़ें, बस यह सुनिश्चित करें कि नसबंदी आपके लिए सबसे अच्छा विकल्प है।

डिस्क्लेमर : यह जानकारी सिर्फ़ एक मार्गदर्शिका है और किसी अनुभवी पेशेवर द्वारा दी गई चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है।

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प्राकृतिक परिवार नियोजन (एन.एफ.पी)- प्रजनन जागरूकता के तरीके

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प्रजनन जागरूकता, प्राकृतिक परिवार नियोजन (नैचुरल फैमिली प्लानिंग – एन.एफ.पी.) व रिदम पद्धति, आपके अंडोत्सर्ग की तारीख का पता लगाने के तरीके हैं, ताकि आप गर्भावस्था से बच सकें। कुछ अलग-अलग एन.एफ.पी. विधियां होती हैं जो जब एक साथ उपयोग की जाती हैं, तो गर्भावस्था से बचने में सफलता की दर 90% से अधिक हो सकती है। प्राकृतिक परिवार नियोजन के तरीकों और उसके काम करने की पद्धतियों के बारे में जानने का सबसे प्रभावी तरीका है किसी नर्स, काउंसलर या डॉक्टर से संपर्क करना, जो इसे सही तरीके से कैसे उपयोग किया जाए इसकी जानकारी दे सकें।

प्राकृतिक परिवार नियोजन क्या है?
प्राकृतिक परिवार नियोजन जन्म नियंत्रण की एक विधि है, जो दवाओं या उपकरणों के उपयोग के बिना की जाती है।

इन तरीकों में मासिक धर्म चक्र और संबंधित शारीरिक कार्यप्रणाली को समझना शामिल है, जिसमें यह निर्धारित किया जाता है कि किन दिनों में महिला के गर्भधारण करने की सबसे अधिक संभावना है। चूंकि यह उन तरीकों का एक संग्रह है, जिसमें शरीर की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को समझना शामिल है, इसलिए इसे प्रजनन जागरूकता भी कहा जाता है। प्राकृतिक जन्म नियंत्रण के लिए महीने के उन दिनों या अवधि का पता लगाया जाता है जिस दौरान महिला की प्रजनन क्षमता चरम पर होती है और हर महीने इसका रिकॉर्ड रखा जाता है। यह शरीर के प्रजनन संकेतों पर भी ध्यान देता है, जैसे गर्भाशय ग्रीवा से होने वाला स्राव, शरीर का तापमान और हार्मोन में बदलाव, जिससे यह पता चलता है कि कब असुरक्षित यौन संबंध बनाया जा सकता है या फिर गर्भधारणा के लिए कब संभोग किया जा सकता है।

यह क्यों किया जाता है?
प्रजनन जागरूकता एक महिला को ये अनुमान लगाने में मदद करती है कि महीने में किस समय उसका अंडोत्सर्ग होने की संभावना है। इस जानकारी का दो तरह से उपयोग किया जा सकता है:

1. गर्भवती होने के लिए
गर्भधारण करने की कोशिश कर रहे जोड़े जब अंडोत्सर्ग के दिनों के करीब संभोग करते हैं, तो उनके सफल होने की संभावना ज्यादा होती है।

2. गर्भधारण से बचने के लिए
निम्नलिखित स्थितियों में प्राकृतिक परिवार नियोजन का उपयोग जोड़ों द्वारा जन्म नियंत्रण की एक विधि के रूप में किया जा सकता है:

  • धार्मिक मान्यताएं जन्म नियंत्रण के मौजूदा तरीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाती हैं।
  • परिवार नियोजन के प्राकृतिक तरीकों के लिए वरीयता।

नोट: प्राकृतिक परिवार नियोजन का चयन करते समय दंपति को दो चीजें करने को तैयार होना चाहिए: अंडोत्सर्ग के दिनों में सेक्स न करना और हर महीने महिला के पूरे माहवारी चक्र को ट्रैक करना।

प्राकृतिक परिवार नियोजन की प्रभावशीलता
प्राकृतिक परिवार नियोजन की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि जोड़े कितनी अच्छी तरह से इन तरीकों को समझते हैं और इसका उपयोग कितनी अच्छी तरह करते हैं।


ऐसे जोड़े जो गर्भावस्था से बचने के लिए प्राकृतिक परिवार नियोजन का उपयोग करते हैं, यदि वे एकदम सही तरीके से उपयोग करें तो 100 में से 5 से भी कम महिलाएं पहले वर्ष में गर्भवती होती हैं। सही का मतलब महिला के पूरे मासिक धर्म चक्र के दौरान इस तरीके को सही और लगातार उपयोग करने से है।

प्राकृतिक परिवार नियोजन के तरीके तब अच्छी तरह से काम करते हैं, जब अंडोत्सर्ग और मासिक धर्म को ट्रैक करने के लिए कई तरीकों का एक साथ उपयोग किया जाता है। काउंसलर, डॉक्टर या नर्स से मार्गदर्शन लेना भी बेहतर होता है, जो तरीकों को अच्छी तरह से समझते हैं और आपको उन्हें सही तरीके से उपयोग करने के निर्देश देते हैं। इसके अलावा, प्राकृतिक परिवार नियोजन उन महिलाओं के लिए अच्छी तरह काम नहीं करता जो नियमित रूप से अपने प्रजनन संकेतों को ट्रैक नहीं करती हैं या जिनका मासिक धर्म चक्र अनियमित है।

प्राकृतिक परिवार नियोजन की तैयारी कैसे करें?
यदि कोई दंपति प्राकृतिक परिवार नियोजन को अपनाते है तो महिला को अंडोत्सर्ग के अपने पैटर्न का पता रखने की आवश्यकता होती है। यह तीन या चार मासिक धर्म चक्रों का एक अच्छा रिकॉर्ड रखकर किया जा सकता है। हालांकि यह जानना महत्वपूर्ण है कि प्राकृतिक परिवार नियोजन ज्यादातर उन महिलाओं के लिए ही काम करता है जिनका मासिक धर्म नियमित होता है।

शरीर के तापमान को मापने के लिए, एकबेसल बॉडी थर्मामीटर दवाई की दुकान या परिवार नियोजन चिकित्सालय से खरीद लेना चाहिए। मानक (स्टैंडर्ड) थर्मामीटर के विपरीत ये शरीर के तापमान में छोटी सी भिन्नता भी दिखा सकता है और तापमान विधि का उपयोग करते समय काम में आता है। दंपति को प्राकृतिक परिवार नियोजन विधियों को एक साथ इस्तेमाल करने के लिए इच्छुक होना चाहिए और उस अवधि के दौरान जब महिला की प्रजनन क्षमता चरम पर होती है, सेक्स से दूर रहना चाहिए या गर्भनिरोधक का उपयोग करने के लिए तैयार होना चाहिए। यदि जन्म नियंत्रण के लिए दंपति द्वारा चुना गया एकमात्र तरीका एन.एफ.पी. हो, तो उन्हें अनियोजित गर्भावस्था के लिए भी तैयार रहना होगा।

प्राकृतिक परिवार नियोजन के तरीके
प्राकृतिक परिवार नियोजन में पहला काम मासिक धर्म चक्र के प्रति जागरूकता , और प्रजनन पैटर्न का चार्ट तैयार करना है। औसत मासिक धर्म चक्र 28 से 32 दिनों के बीच रहता है, और इसे विभिन्न चरणों में विभाजित किया जा सकता है।

  • माहवारीका पहला दिन तब होता है जब चक्र शुरू होता है और आमतौर पर तीन से पाँच दिनों तक जारी रहता है।
  • सातवें दिन तक एक डिंब शुक्राणु द्वारा निषेचन के लिए अंडाशय में से निकलने की तैयारी कर रहा होता है ।
  • 28 दिनों के मासिक धर्म के चक्र में, 11-21वें दिन के दौरान जब शरीर द्वारा स्रावित हार्मोन के कारण अंडाशय एक डिंब जारी करता है, तो इस प्रक्रिया को अंडोत्सर्ग कहा जाता है।
  • इस अवधि के दौरान, जो 12-24 घंटों तक रहती है, डिंब फैलोपियन ट्यूब के माध्यम से गर्भाशय की ओर जाता है। यदि इस समय के दौरान शुक्राणु अंडे में प्रवेश करता है, तो निषेचित डिंब नीचे चला जाएगा, और खुद को गर्भाशय की दीवार से जोड़ देगा और बढ़ना शुरू कर देगा। अगर निषेचन नहीं होता है, तो डिंब टूट जाता है।
  • 28 दिन तक, अगर गर्भाशय की दीवार में कोई निषेचित डिंब नहीं चिपकता है, तो हार्मोन का स्तर कम हो जाता है, जिससे गर्भाशय की दीवार पतली होने लगती है और जिससे माहवारी शुरु हो जाती है।
  • यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मासिक धर्म चक्र का पहला चरण (अंडोत्सर्ग से पहले) सभी महिलाओं में भिन्न होता है और यहाँ तक कि महीने से महीने भी भिन्न हो सकता है। आमतौर पर, अंडोत्सर्ग से पहले दिनों की संख्या 13 से 20 दिनों के बीच होती है। अंडोत्सर्ग के बाद मासिक चक्र का आखिरी आधा हिस्सा औसतन हर महिला के लिए एक जैसा ही होता है, क्योंकि अंडोत्सर्ग के दिन से लगभग 12-16 दिन के बाद उनकी अगली माहवारी की शुरुआत होती है।


एक बार जब आप अपने मासिक चक्रों से परिचित हो जाती हैं तो निम्नलिखित प्रजनन जागरूकता विधियों का उपयोग अंडोत्सर्ग की भविष्यवाणी करने के लिए किया जा सकता है:

1. कैलेंडर (रिदम) विधि
इस विधि का सफलतापूर्वक उपयोग करने के लिए मासिक धर्म चक्र का 6 से 8 महीने तक का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखा जाना जरुरी है। गौर करें कि क्या आपका मासिक धर्म नियमित है और यह कितने दिनों तक रहता है और इसे प्राकृतिक परिवार नियोजन कैलेंडर पर लिख लें। अगर चक्र 28 दिन लंबा और नियमित है, तो मासिक धर्म का रक्तस्राव शुरू होने के 14 से 15 दिनों के बाद अंडोत्सर्ग होने की संभावना सबसे अधिक है।

– यह कैसे किया जाता है?
चक्र की लंबाई का पता लगाने के लिए, मासिक धर्म यानी पीरियड के पहले दिन को नोट कर लें। फिर अगले पीरियड के पहले दिन को नोट कर लें प्रत्येक माहवारी (पीरियड) के पहले दिनों के बीच के दिनों की संख्या गिनने पर चक्र की लंबाई का पता चलता है। 8 महीने की अवधि में सबसे लंबे और सबसे छोटे मासिक धर्म चक्र को नोट करें।

वो पहला दिन पता लगाने के लिए जब आपकी प्रजनन क्षमता चरम पर होगी, सबसे कम मासिक धर्म चक्र के दिनों की संख्या से 18 घटाएं। यह परिणाम आपकी माहवारी शुरू होने के बाद आपके पहले सबसे जननक्षम दिन (जब आपकी प्रजनन क्षमता चरम पर होती है) के बारे में आपको बताता है। एक उदाहरण के रूप में, यदि सबसे छोटा मासिक धर्म चक्र 26 दिनों तक रहता है, तो 18 को 26 में से घटाने पर 8 बाकी रहता है। इसलिए आपका पहला जननक्षम दिन आपके मासिक धर्म का रक्तस्राव शुरू होने से 8वां दिन होगा।

आपके जननक्षम होने का आखिरी दिन पता करने के लिए सबसे लंबे मासिक धर्म चक्र में दिनों की संख्या से 11 घटाएं। जो संख्या मिलेगी वो आपकी माहवारी शुरू होने के बाद आपके जननक्षम होने का सबसे आखिरी दिन होगा। उदाहरण के लिए, अगर आपका सबसे लंबा मासिक धर्म चक्र 30 दिन का है, तो 30 में से 11 घटाकर 19 आता है। इसलिए आपका अंतिम जननक्षम दिन मासिक धर्म का रक्तस्राव शुरु होने के बाद 19वें दिन होगा।

– परिणाम
यदि आप गर्भवती होने का इरादा रखती हैं, तो अपने पहले से आखिरी जननक्षम दिन तक हर दिन या हर दूसरे दिन संभोग करें।

गर्भधारण से बचने के लिए, जननक्षम दिनों में सेक्स से बचें या उस दौरान गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करना न भूलें। ऊपर दिए गए उदाहरण को ध्यान में रखते हुए, जननक्षम दिनों की अवधि 8वें दिन से 19वें दिन के बीच है, इसलिए इन दिनों के दौरान सुरक्षा या बचाव दोनों में से कोई एक तरीका अपनाएं।

– इस विधि को क्या प्रभावित करता है?
यह विधि अनियमित, लंबे या छोटे मासिक धर्म चक्र में काम नहीं करेगी। साथ ही 6 महीने से अधिक समय तक स्तनपान कराना और स्तनपान कराने के साथ बोतल से दूध पिलाना इस तरीके को प्रभावित करता है।

2. मानक दिनों की विधि (स्टैंडर्ड डेज़ मैथड – एस.डी.एम.)
मानक दिनों की विधि (एस.डी.एम.) कैलेंडर पद्धति की तरह ही होती है और यह प्रजनन जागरूकता के तरीकों में सबसे आसान भी है। इसका उपयोग करने के लिए, आपको एक ऐप की जरूरत होगी या फिर सायकल बीड्स (चक्रमाला) की जो कि एस.डी.एम. के लिए बनाई गई एक विशेष प्रकार की माला होती है। सायकल बीड्स (चक्रमाला) में 33 रंगीन मनके होते हैं। इनमें से ज्यादातर भूरे और सफेद रंग के मनके होते हैं और एक लाल रंग का मनका होता है जो आपकी माहवारी (पीरियड) के पहले दिन को इंगित करने के लिए होता है। बीच में एक गहरे भूरे रंग का मनका भी आपको यह बता देता है अगर आपका मासिक चक्र 26 दिनों से छोटा हो । मनके से मनके की ओर जाने के लिए एक काले रबर के छल्ले (रिंग) का उपयोग किया जाता है।

– यह कैसे किया जाता है?
आपके पीरियड के पहले दिन रबर के छल्ले को सायकल बीड (चक्र माला) के लाल मनके पर ले जाएं। हर एक दिन को एक मनके के रूप में गिना जाता है। सभी भूरे रंग के मनके वे दिन होते हैं जब आपके गर्भवती होने की संभावना कम से कम होती है; ये आपके प्राकृतिक परिवार नियोजन (एन.एफ.पी.) के लिए सुरक्षित दिन हैं। सभी सफेद मनके उन दिनों की ओर इशारा करते हैं, जिनमें आपके गर्भवती होने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। गहरे भूरे रंग का मनका 26वें दिन की ओर इशारा करता है। लाल से पहले आखिरी भूरा मनका 32वां दिन होता है।

– नतीजा
असुरक्षित यौन संबंध 1 से 7 दिनों के बीच बनाए जा सकते हैं। 8 से 19 तक के दिनों में सेक्स से बचें या अन्य गर्भ निरोधक का इस्तेमाल करें और 20वें दिन से चक्र के अंत तक, आप असुरक्षित यौन संबंध बना सकते हैं।

– इस विधि को क्या प्रभावित करता है?
यह महत्वपूर्ण है कि आपका मासिक धर्म हमेशा नियमित रहे। यदि आपके एक से अधिक चक्र हैं जो 26 दिनों से कम या 32 दिनों से अधिक लंबे हैं, तो यह विधि जन्म नियंत्रण के लिए उपयुक्त नहीं है।

3. गर्भाशय ग्रीवा श्लेम पद्धति (बिलिंग्स मैथड)
इस तरीके में आप अपने गर्भाशय ग्रीवा के श्लेम को देखकर और उसमें होने वाले बदलावों को ट्रैक करके अंडोत्सर्ग का अनुमान लगा सकती हैं। दरसल यह गर्भाशय ग्रीवा श्लेम पूरे मासिक चक्र के दौरान आपकी योनि से स्राव के रुप में निकलता है। मासिक धर्म चक्र के दौरान गर्भाशय ग्रीवा श्लेम के रंग, बनावट और मात्रा में बदलाव होता है, विशेष रूप से अंडोत्सर्ग के दौरान।

– यह कैसे किया जाता है?
हर दिन अपनी योनि में एक उंगली डालकर अपने श्लेम की जांच करें और मात्रा और रंग को नोट करें । तर्जनी और अंगूठे के बीच इसकी एक बूंद रखकर देखें कि यह कितना पतला या गाढ़ा है और इसमें होने वाले “खिंचाव” को भी देखें। उंगलियों को अलग फैलाएं और देखें कि यह कितना फैल सकता है।

आपके मासिक चक्र के ठीक बाद बहुत ज्यादा ग्रीवा श्लेम नहीं होगा। यह गाढ़ा, चिपचिपा और बादल जैसा धुंधला हो सकता है। जैसे ही आपका अंडोत्सर्ग निकट आता है, श्लेम की मात्रा बढ़ जाती है और यह पतला और स्पष्ट भी हो जाता है। अंडोत्सर्ग से पहले, इसका फैलावलगभग 2.5 से.मी. तक हो सकता है।

– परिणाम
गर्भवती होने के लिए, श्लेम के साफ और लचीला होने के दिनों से शुरू करके उसके चिपचिपा और बादल की तरह धुंधला होने के दिनों तक संभोग करें। गर्भधारण से बचने के लिए उन दिनों के दौरान जब श्लेम स्पष्ट और लचीला (खिंचाववाला) होता है जन्म नियंत्रण के अन्य तरीकों का इस्तेमाल करें। “2 दिन” विधि का भी उपयोग किया जा सकता है; स्वयं से पूछें – क्या मुझे कल स्राव हुआ था? क्या आज मुझे स्राव हुआ है? यदि दोनों सवालों का जवाब हाँ है, तो आपके जननक्षम होने की संभावना सबसे अधिक है।

– इस विधि को क्या प्रभावित करता है?
यह विधि अच्छी तरह से काम नहीं करेगी यदि आप नलधावन (डूश- नली से योनि साफ करना/खंगालना) करती हैं, योनि ल्यूब्रिकेंट का उपयोग करती हैं, स्तनपान करा रही हैं, आपकी योनि में संक्रमण है या आपकी रजोनिवृत्ति निकट है।

4. शरीर का बुनियादी तापमान (बेसल बॉडी टेम्प्रेचर) तरीका
मासिक धर्म चक्र के दौरान शरीर के तापमान में थोड़ा सा बदलाव होता है और एक खास अंडोत्सर्ग थर्मामीटर से इसका पता लगाया जा सकता है। इसमें 0.1 डिग्री तक के तापमान में बदलाव को भी देखा जा सकता है और इसके इस्तेमाल से अनुमान लगाया जा सकता है कि आपका अंडोत्सर्ग कब शुरु होगा।

– यह कैसे किया जाता है?
कुछ महीनों तक सुबह उठते ही प्रतिदिन, खाने या पीने से पहले या कुछ भी काम करने से पहले शरीर का तापमान मापें। गुदा के रास्ते या मुँह के द्वारा तापमान मापने के लिए अंडोत्सर्ग थर्मामीटर का उपयोग करें। हर दिन एक ही स्थान पर थर्मामीटर का उपयोग करना सुनिश्चित करें और सटीक रीडिंग प्राप्त करने के लिए इसे पूरे 5 मिनट के लिए उस स्थान पर रखें। रीडिंग लिख लें, थर्मामीटर को साफ करें और इसे रख दें। शरीर के बुनियादी (बेसल) तापमान के ट्रेंड का निरीक्षण करने के लिए हर दिन एक चार्ट या एक ग्राफ पर तापमान रिकॉर्ड करें। अंडोत्सर्ग के कारण बी.बी.टी. 0.4 डिग्री फारेनहाइट या 0.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है और एक सप्ताह से अधिक समय तक बढ़ा रहता है।

– नतीजा
अगर आप गर्भधारण करना चाहती हैं, तो प्रतिदिन या फिर एक दिन छोड़कर संभोग करें, ऐसा अपने पहले जननक्षम दिन से लेकर बी.बी.टी. तापमान बढ़ने के तीन दिन बाद तक करें। गर्भधारण से बचने के लिए इन दिनों में जन्म नियंत्रण के दूसरे तरीकों को अपनाएं। इस बात का ध्यान रखें कि आपके बी.बी.टी. बढ़ने और पूरे तीन दिनों तक बढे रहने के बाद आपकी जननक्षम अवधि खत्म हो जाती है और इन तीन दिनों में आपका तापमान आपके चक्र के दूसरे दिनों की तुलना में अधिक रहता है।

– इस विधि को क्या प्रभावित करता है?
बुखार, तनाव, यात्रा और एस्पिरिन जैसी दवाएं लेना इस पद्धति को प्रभावित करते हैं। असंगत मापने जैसे कि थर्मामीटर को बहुत जल्द बाहर निकालना और दिन के अलग-अलग समय पर तापमान लेना भी गलती का कारण बनता है।

5. संयुक्त (सिम्प्टोथर्मल) विधि
संयुक्त विधि में आपके चक्र में सबसे जननक्षम दिनों की पूर्व सूचना देने के लिए किए गए कुछ अन्य तरीकों का उपयोग एक साथ किया जाता है।

– यह कैसे किया जाता है?
आप अपने शरीर के बुनियादी तापमान, ग्रीवा श्लेम में परिवर्तन और एक हार्मोन परीक्षण की जांच करके शुरू कर सकती हैं। यदि सभी परीक्षणों के परिणाम अंडोत्सर्ग की ओर मिलते हैं तो अतिरिक्त संकेतों जैसे कि स्तनों की संवेदनशीलता, पेट का दर्द और अपने मिज़ाज (मूड स्विंग) पर ध्यान रखें।

– परिणाम
अंडोत्सर्ग का संकेत देने वाले परीक्षणों के साथ, स्तनों के दर्द और यौन इच्छा में वृद्धि जैसे लक्षणों को देखें। जैसा कि प्रत्येक चक्र में केवल एक अंडाशय में से एक डिंब निकलता है, आपको पेट के केवल एक तरफ दर्द महसूस होगा। इस दर्द को मिटेलश्मेर्त्ज कहा जाता है, और यह तेज या हल्का हो सकता है और अंडाशय के उस तरफ होता है जो डिंब को निकालता है।

– इस विधि को क्या प्रभावित करता है?
परीक्षणों में से किसी एक के परिणाम में कोई परिवर्तन भी संयुक्त विधि के नतीजों को बदल सकता है।

6. हार्मोन की निगरानी
अंडोत्सर्ग के दौरान, हार्मोन में बदलाव की निगरानी अंडोत्सर्ग प्रेडिक्टर किट, सलाईवा या “फर्निंग” माइक्रोस्कोप या फर्टिलिटी मॉनिटर की मदद से होती है। उनका उपयोग अंडोत्सर्ग के दौरान शरीर में ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन और एस्ट्रोजन जैसे दूसरे हार्मोन में हुई बढ़ोतरी को मापने के लिए किया जा सकता है।

– यह कैसे किया जाता है?
  • अधिकांश दवाई की दुकानों पर उपलब्ध अंडोत्सर्ग प्रेडिक्टर किट मूत्र में ल्यूटिनाइजिंग (एल.एच.) की मात्रा का परीक्षण करती हैं। ये किट हार्मोन में वृद्धि को बता सकती हैं जो आपके अंडोत्सर्ग होने से 12 से 36 घंटे पहले होती है और 90% से अधिक सटीक होती हैं।
  • फर्निंग माइक्रोस्कोप छोटे होते हैं और कभी-कभी लिपस्टिक की तरह दिखने के लिए भी डिज़ाइन किए जाते हैं। वे आपकी लार के नमूने की जांच करते हैं। जब एस्ट्रोजन का स्तर अंडोत्सर्ग के दौरान बढ़ता है, तो लार में नमक का स्तर बढ़ जाता है। जब माइक्रोस्कोप की मदद से इस लार की जांच की जाती है, तो नमक एक पैटर्न का कारण बनता है जो एक फर्न पौधे की पत्तियों जैसा दिखता है। वे आगामी 24-72 घंटे की अवधि के लिए अंडोत्सर्ग के बारे में अनुमान लगा सकते हैं।
  • फर्टिलिटी मॉनिटर महंगे होते हैं लेकिन इनके कारण एक महत्वपूर्ण फायदा ये है कि वे संभावित प्रजनन क्षमता के 6 या 7 दिनों का अनुमान बता सकते हैं (भविष्यवाणी कर सकते हैं) जबकि अधिकांश अंडोत्सर्ग प्रेडिक्टर्स केवल 2 दिनों तक की अवधि के बारे में अनुमान देते हैं। वे यूरिन में एल.एच. और एक अन्य हार्मोन ई.3जी. को मापते हैं। नतीजे एक स्क्रीन पर दिखाए जाते हैं और यन्त्र में भी दर्ज हो जाते हैं। इन उपकरणों की सटीकता लगभग 90% होती है।

– परिणाम
हार्मोन मॉनिटरिंग किट ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (एल.एच.) के स्तर को मापते हैं और परिणाम एक प्रदर्शन इकाई या एक परीक्षण पट्टी पर प्रदर्शित करते हैं।

– इस विधि को क्या प्रभावित करता है?
यदि किट पर के निर्देशों का पालन नहीं किया जाता है तो हार्मोन मॉनिटरिंग के परिणाम गलत हो सकते हैं।

प्राकृतिक परिवार नियोजन के जोखिम
प्राकृतिक परिवार नियोजन से कोई दुष्प्रभाव या शरीर के लिए खतरा नहीं होता। इस तरीके में एकमात्र जोखिम केवल एक अनियोजित गर्भावस्था ही है। इन तरीकों का उपयोग करते हुए गर्भावस्था को रोकने के लिए, ऐसे किसी भी दिन या समय में संभोग न करें जिस दौरान डिंब के निषेचित होने की संभावना हो। इसमें अंडोत्सर्ग से पहले 5 दिन शामिल हैं क्योंकि सेक्स के बाद शुक्राणु योनि में 3 से 5 दिन रह सकते हैं।

क्या प्रजनन जागरूकता प्रतिवर्ती है?
हाँ। चूंकि प्रजनन संबंधी जागरूकता का पुरुष या महिला के प्रजनन प्रणाली पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इसलिए इस पद्धति को अपनाने के बाद बिना देरी के गर्भधारण संभव है। प्रजनन केवल अनचाहे गर्भ को रोकने के लिए ही नहीं बल्कि आसानी से गर्भधारण में भी मदद करती है, क्योंकि अब बच्चे के जन्म की योजना बना रहे जोड़ों को महिला को होने वाले अंडोत्सर्ग की जानकारी होती है।

अंडोत्सर्ग के शारीरिक संकेत
शरीर की कुछ हरकतों और होने वाले बदलावों पर ध्यान देकर, जिन्हें महसूस किया जा सकता है या पहचाना जा सकता है, आपकी प्रजनन विधि को पहचानना संभव है। अंडोत्सर्ग के इन शारीरिक लक्षणों में शामिल हैं:

  • गर्भाशय ग्रीवा में बदलाव जैसे की वह नर्म होकर और अधिक खुल जाती है।
  • स्तनों में संवेदनशीलता।
  • अंडाशय के किसी भी एक भाग में हल्का दर्द।

ध्यान रखें कि यदि प्रजनन जागरूकता विधियों का उपयोग जन्म नियंत्रण करने के लिए एकमात्र पद्धति के रुप में किया जा रहा है, तो इन अतिरिक्त लक्षणों पर विशेष रूप से भरोसा नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें पुख्ता करने के लिए ग्रीवा श्लेम और बेसल बॉडी टेम्परेचर जैसे प्राथमिक लक्षणों को परखना हमेशा बेहतर होता है।

प्राकृतिक परिवार नियोजन के लाभ
  • सही तरीके से और लगातार इस्तेमाल करने पर प्रभावी जन्म नियंत्रण पद्धति ।
  • कोई दुष्प्रभाव या स्वास्थ्य जोखिम नहीं ।
  • तुरंत रोका जा सकता है।
  • सस्ती या लगभग मुफ्त।
  • क्लिनिक के चक्कर काटने, दवाएं लेने या किसी भी तरह के उपकरण के इस्तेमाल का झंझट नहीं ।
  • इसमें हृदय की समस्याओं के खतरे को बढ़ा सकने वाले एस्ट्रोजन जैसे हार्मोन्स नहीं होते ।
  • गर्भनिरोध से संबंधित धार्मिक प्रतिबंध वाले जोड़ों के बीच स्वीकार्य जन्म नियंत्रण उपाय ।
  • दोनों तरीकों के लिए अच्छी तरह से काम करता है, चाहे वह जोड़ा गर्भधारण के लिए प्रयास कर रहा हो या गर्भाधान से बचना चाहता हो।

प्राकृतिक परिवार नियोजन के नुकसान
  • दोनों ही साथियों का सावधान रहना आवश्यक है।
  • महीने का लगभग एक तिहाई समय सेक्स से दूर रहने में या गर्भ निरोधकों के दूसरे तरीकों के इस्तेमाल में चला जाता है।
  • मासिक धर्म चक्र का एकदम सही और लगातार रिकॉर्ड रखना बेहद जरुरी होता है।
  • उन महिलाओं के लिए चुनौतीपूर्ण है जिनका मासिक धर्म चक्र अनियमित है।

आपके मासिक धर्म चक्र और प्रजनन क्षमता जागरुकता के तरीकों की पूरी समझ के साथ, प्राकृतिक परिवार नियोजन को एक प्रभावी प्राकृतिक गर्भनिरोधक के रूप में उपयोग करना संभव है। सस्ता, और आसानी से समझ में आने वाला, एन.एफ.पी. दुनिया भर में अक्सर इस्तेमाल किया जाने वाला तरीका है।

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प्रसव की नियत तारीख की गणना कैसे करें

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एक औसतन गर्भावस्था 40 सप्ताह तक चलती है जबकि मनुष्य में वास्तविक गर्भधारण की अवधि लगभग 38 सप्ताह होती है। यही कारण है कि 38 सप्ताह के बाद किसी भी समय पैदा हुए बच्चे को पूर्ण–अवधि के बाद पैदा हुआ बच्चा माना जाता है। प्रसव की नियत तारीख की गणना आमतौर पर एल.एम.पी., ‘नेईगेल के नियम’ या गर्भावस्था चक्र जैसे विभिन्न तरीकों में से किसी के द्वारा की जाती है। ये सभी विधियाँ अनुमानित तारीख की गणना करने में मदद करती हैं परंतु केवल 5% महिलाएँ ही वास्तव में अपनी नियत तारीख पर बच्चे को जन्म देती हैं। आइए गहराई से नियत तारीख की गणना पर एक नज़र डालें।

प्रसव की नियत तारीख क्या है?
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जिस तारीख पर आपके बच्चे के जन्म की उम्मीद की जाती है, उसे प्रसव की नियत तारीख के रूप में जाना जाता है। यह आमतौर पर आपके आखिरी मासिक धर्म के पहले दिन से लगभग 40 सप्ताह बाद की रहती है। लेकिन यदि आपको गर्भधारण की सही तारीख पता हो तो उस दिन से ठीक 38 सप्ताह बाद आपके प्रसव का समय होगा।

बच्चे के विकास या अन्य कारणों के आधार पर आपकी गर्भावस्था के दौरान आपके चिकित्सक आपकी नियत तारीख को बदल सकते हैं। नियत तारीख आपके चिकित्सक को विभिन्न प्रसवपूर्व परीक्षणों का समय निर्धारित करने, भ्रूण के विकास का अनुमान लगाने, और प्रसव की तारीख निकल जाने पर किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता है या नहीं इस बात पर विचार करने में मदद करती है।

प्रसव की नियत तारीख की गणना
हर डॉक्टर प्रसव की नियत तारीख पर की गणना अपने पसंदीदा तरीके से करता है। नियत तारीख का अनुमान लगाने के लिए आपको विभिन्न प्रकार के तरीके ऑनलाइन मिल सकते हैं। हालांकि, उपयोग में आने वाले तीन सबसे लोकप्रिय तरीके हैं:

1. प्रसव की नियत तारीख की गणना के लिए ‘नेईगेल का नियम’
यह नियम जर्मन प्रसूति विशेषज्ञ ‘फ्रांज़ कार्ल नेईगेल’ के नाम पर है, और इस नियम के अनुसार गर्भावस्था 280 दिनों तक की होती है और एक मासिक धर्म 28 दिनों की अवधि का होता है। इसका अर्थ है कि आपकी अपेक्षित नियत तारीख (ई.डी.डी.) आपके आखिरी मासिक धर्म के पहले दिन में 280 दिन (9 महीने और 7 दिन) जोड़कर अनुमानित की जा सकती है। लेकिन अगर आपका मासिक धर्म छोटा होता है, मान लीजिए 27 दिन का होता है, तो आपको एक दिन कम जोड़ना होगा, अर्थात 9 महीने और 6 दिन, आदि। यदि आपका चक्र लंबा है, तो आपको अपने ई. .डी. का अनुमान लगाने के लिए अतिरिक्त दिनों को 9 महीने और 7 दिनों में जोड़ना होगा।

2. प्रसव की नियत तारीख की गणना करने के लिए गर्भाधान की तारीख विधि
इसे एल.एम.पी (अंतिम मासिक धर्म) विधि के रूप में भी जाना जाता है, और इस तरीके में आपके गर्भधारण की तारीख के आधार पर आपके प्रसव की अपेक्षित नियत तारीख का अनुमान लगाया जाता है। इस विधि के सिद्धांत के अनुसार अधिकांश महिलाओं का मासिक धर्म 28 दिनों का होता है और इस मामले में, 14 वें दिन पर या उसके थोड़ा आगे पीछे डिंबोत्सर्जन होता है। इस पद्धति में, 40 सप्ताह उस तारीख में जोड़े जाते हैं जिस दिन आपका आखिरी मासिक धर्म हुआ था। इस तारीख से, आप प्रसव की अपेक्षित नियत तारीख प्राप्त करने में दो सप्ताह का समय कम कर दें। यह डिंबोत्सर्जन होने के लिए है जो आपके पिछले मासिक धर्म के बाद पहले दो हफ्तों के भीतर हुआ होगा।

3. गर्भावस्था का पहिया
गर्भावधि कैलकुलेटर के नाम से भी जाना जाने वाला गर्भावस्था का पहिया आपके प्रसव की अपेक्षित नियत तारीख का अनुमान लगाने का एक आसान तरीका बन गया है। यह आपके अंतिम मासिक धर्म की तारीख के आधार पर आपके प्रसव की नियत तारीख की गणना करता है।

आमतौर पर, इसमें आपकी गर्भावस्था के विभिन्न चरणों की जानकारी भी होती है। एक गर्भावस्था के पहिये में साल के महीनों, प्रसवपूर्व विकास के चरणों एवं तिमाहियों की शुरुआत और अंत को प्रदर्शित करने के लिए अलग–अलग छड़ियां होती हैं।

क्या गणना की गई प्रसव की नियत तारीख गलत हो सकती है?
प्रसव की अपेक्षित नियत तारीख की गणना करने की विधियों में से कोई भी विधि दोष मुक्त नहीं है और यह गारंटी नहीं दी जा सकती कि आपका बच्चा किसी विशेष तारीख को ही पैदा होगा। आपकी अनुमानित नियत तारीख से दो सप्ताह पहले या बाद में प्रसव होनासामान्य है। आंकड़े इंगित करते हैं कि 20 में से केवल 1 महिला ही अपनी नियत तिथि पर शिशु को जन्म देती है। पहली बार गर्भधारण कर रही महिलाओं में से लगभग 10 प्रतिशत प्रसव की अपेक्षित नियत तारीख के दो सप्ताह बाद शिशु को जन्म देती हैं। इसके अलावा, लगभग 70 प्रतिशत गर्भावस्था जो प्रसव की नियत तारीख के बाद तक चलती हैं, आमतौर पर उनमें तारीख की गणना में गलती हुई होती है।

प्रसव की नियत तारीख के लिए सुझाव
जैसे–जैसे आपकी नियत तारीख नजदीक आती है, आप में कई सारी भावनाएं उथल–पुथल करती हैं – चिंता से लेकर खुशी और फिर राहत कि लंबा इंतजार लगभग खत्म हो गया है। इस समय शिशु के लिए आपके गर्भ में जगह की कमी होने के कारण आपकी शारीरिक अस्वस्थता अपने चरम पर होगी– यह तो निश्चित है। यदि यह आपका पहला बच्चा है, तो प्रसव–पीड़ा और जन्म देने की चिंता से आप परेशान हो सकती हैं। तो, यहाँ बताया गया है कि उन अंतिम दिनों में आप क्या कर सकती हैं:

व्यायाम – गर्भावस्था के दौरान आप जो भी व्यायाम करती रही हैं, उसे करना जारी रखें। यह प्रसव–पीड़ा को प्रेरित कर सकता है और आपको प्रसव के लिए लचीला बनाने में मदद कर सकता है।

अस्पताल ले जाने वाले थैले में रखने वाली चीज़ों के लिए जाँच करें– अच्छा होगा अगर आप अस्पताल ले जाने वाले थैले में रखने वाली चीज़ों की एक बार फिर जाँच कर लें। देखें कि क्या कुछ है जो आप भूल गई हैं जिसकी आपको या शिशु को पहले दो दिनों में ज़रूरत पड़ सकती है।

भरपूर सोएं – दिन में भी जितना हो सके सो लें एक बार जब आपका शिशु घर आ जाएगा, तो शुरुआती कुछ महीनों के दौरान नींद तो खराब होनी ही है!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. प्रसव की नियत तारीख कितनी सही होती है?
सभी शिशुओं में से लगभग 5% शिशु प्रसव की नियत तारीख पर पैदा होते हैं । 90% शिशुओं का जन्म नियत तारीख से दो सप्ताह पहले या बाद में होता है। 37 सप्ताह से 42 सप्ताह के बीच का कोई भी समय सामान्य माना जाता है।

2. क्या नियत तारीख बदल सकती है?
हाँ , भ्रूण के विकास, गर्भावस्था में समस्याओं और माँ के समग्र स्वास्थ्य जैसे विभिन्न कारणों के आधार पर नियत तारीख बदल सकती है।

3. क्या नियत तारीख की गणना करने के लिए कोई अन्य तरीके हैं?
हाँ! अल्ट्रासाउंड आपको अपेक्षित नियत तारीख जानने में भी मदद कर सकता है। ये आमतौर पर गर्भावस्था के आठ और बीस सप्ताह के बीच में किए जाते हैं। बच्चे के शरीर और अंगों के विभिन्न हिस्सों के माप डॉक्टरों और रेडियोलॉजिस्ट को अनुमानित गर्भावस्था के चरण का पता लगाने में मदद करते हैं। पहली तिमाही के अल्ट्रासाउंड को नियत तारीख के अनुमान के लिए सबसे सटीक माना जाता है।

4. क्या होगा अगर मुझे अपनी आखिरी अंतिम मासिक धर्म की तारीख मालूम न हो?
ऐसे अन्य तरीके हैं जिनसे आपके डॉक्टर नियत तारीख का पता कर सकते हैं, जैसे कि अल्ट्रासाउंड।

5. क्या होगा यदि मेरा मासिक धर्म चक्र लंबे समय तक चलता है या अनियमित है?
ऐसे मामलो मे गर्भावस्था का पहिया बच्चे की नियत तारीख की गणना करने में मदद कर सकता है।

यह जानने के स्पष्ट लाभ के अलावा कि आपके शिशु के कब पैदा होने की संभावना है, यह जानना कि आपकी नियत तारीख कब है कुछ अन्य तरीकों से मददगार साबित हो सकती है। यह आपको बच्चे का कमरा तैयार करने के लिए आपके हाथ में आने वाले समय का अंदाजा देता है और यह भी निर्धारित करने में मदद करता है कि आप गर्भावस्था और मातृत्व अवकाश कब शुरू करें। लेकिन याद रखें कि यह तारीख सिर्फ एक अनुमान है और इसके बारे में चिंता नहीं करनी चाहिए। बस अपने स्वास्थ्य और अपने अजन्मे बच्चे की सेहत और तंदरुस्ती का ध्यान रखें!

डिस्क्लेमर : यह जानकारी एक डॉक्टर द्वारा दी जाने वाली चिकित्सा सलाह के विकल्प के रूप में नहीं ली जानी चाहिए।

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पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पी.सी.ओ.एस) कारण, लक्षण और इलाज

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पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पी.सी.ओ.एस) प्रजनन उम्र की लगभग 5 से 10 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करता है, लेकिन कुछ जातीय वर्गों में यह बीमारी अधिक व्यापक हो सकती है। यह एक महिला के शरीर में पुरुष हार्मोन की अधिकता के कारण होता है। कुछ महिलाएँ, जिन्हें पी.सी.ओ.एस है, उनके अंडाशयों पर पुटी के उभरने को यह नाम संदर्भित करता है।

पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पी.सी.ओ.एस) क्या है?
पी.सी.ओ.एस, हार्मोनल असंतुलनों के कारण होता है। इसका प्रजनन प्रणाली पर प्रभाव पड़ता है और यह हृदय के साथ–साथ शरीर की रक्त शर्करा को संभालने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है। यह गर्भधारण की कोशिश कर रही महिलाओं में कठिनाइयाँ पैदा कर सकता है और यह बांझपन के सामान्य कारणों में से एक माना जाता है।

यह बीमारी विलंबित मासिक धर्म और कुछ शारीरिक परिवर्तनों का कारण बन सकती है। पी.सी.ओ.एस में, सेक्स हार्मोन अस्त–व्यस्त हो सकते हैं, जिससे चेहरे और शरीर पर अतिरिक्त बाल निकल सकते हैं या शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध हो सकता है। हालांकि नाम से पता चलता है कि इस स्थिति वाली महिलाओं को कई पुटियाँ होंगी, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि जिसमें भी पी.सी.ओ.एस का निदान हो उसे पुटियाँ हों। इसी तरह, पुटियों वाली प्रत्येक महिला में पी.सी.ओ.एस का निदान नहीं होगा। वास्तव में, ये ‘पुटियाँ‘, अंडों वाले आंशिक रूप से बने रोम हैं।

यह गर्भावस्था को कैसे प्रभावित करता है?
पी.सी.ओ.एस वाली जो महिलाएँ गर्भधारण करती हैं, उनकी गर्भावस्था के दौरान ध्यानपूर्वक निगरानी की जानी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसी महिलाओं में गर्भपात होने की संभावना तीन गुना अधिक होती है। गर्भावस्था के दौरान उत्पन्न होने वाले, पी.सी.ओ.एस के कुछ दुष्प्रभाव हैं गर्भावधि मधुमेह और समय से पूर्व प्रसव। एक डॉक्टर गर्भपात की संभावना को कम करने के लिए गर्भावस्था के दौरान मेटफॉर्मिन जारी रखने की सलाह दे सकता है।

जब माँ को पी.सी.ओ.एस हो तो गर्भावस्था के दौरान नियमित व्यायाम की आवश्यकता होती है । हल्के व्यायाम से शरीर के इंसुलिन का उपयोग बढ़ेगा, हार्मोनल संतुलन बनेगा और वज़न नियंत्रण में रखने में मदद मिलेगी। टहलने और हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को गर्भवती महिलाओं के लिए सबसे अच्छा व्यायाम माना जाता है। पी.सी.ओ.एस के साथ गर्भवती होने पर आहार का भी महत्त्व है। प्रोटीन और फाइबर का अधिक सेवन गर्भावस्था के दौरान इंसुलिन के स्तर को सही बनाए रखने में मदद कर सकता है।

पी.सी.ओ.एस वाली अधिकतर गर्भवती महिलाओं के लिए सिज़ेरियन सेक्शन, प्रसव का पसंदीदा तरीका है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि माता को पी.सी.ओ.एस होने पर जटिलताओं का खतरा अधिक होता है और सी–सेक्शन से प्रसव के दौरान कुछ भी गलत होने की संभावना कम हो जाती है।

पी.सी.ओ.एस के बावजूद गर्भवती होना असंभव नहीं है, लेकिन पी.सी.ओ.एस के साथ गर्भ धारण करने की कोशिश करना निश्चित रूप से अधिक कठिन हो सकता है जो अन्यथा नहीं होता। ऐसा इसलिए है क्योंकि पी.सी.ओ.एस वाली महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन होता है जो सामान्य अंडोत्सर्ग और मासिक धर्म चक्र में बाधा डाल सकता है। यह बीमारी अंडे की गुणवत्ता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है जिससे नतीजन गर्भधारण में भी समस्याएँ हो सकती हैं। पी.सी.ओ.एस और बांझपन के बीच संबंध पर लंबे समय से चर्चा और अध्ययन किया गया है।

पी.सी.ओ.एस और गर्भावस्था
इस बीमारी वाली कई महिलाएँ गर्भवती हो सकती हैं और किसी भी रूप में चिकित्सीय हस्तक्षेप की आवश्यकता के बिना ही पूर्ण अवधि होने पर बच्चे को जन्म दे सकती हैं। लेकिन जिन्हें चिकित्सीय सहायता की आवश्यकता होती है, प्रसूति और प्रजनन संबंधी एंडोक्राइनोलॉजिस्ट उन्हें गर्भधारण करने और समस्या–मुक्त प्रसव के लिए मार्गदर्शन कर सकते हैं। पी.सी.ओ.एस गर्भावस्था की दर आशावादी है, विशेष रूप से हर दिन विज्ञान में हो रही प्रगति की वजह से। बड़ी संख्या में पी.सी.ओ.एस वाली महिलाएँ गर्भवती होती हैं और एक बार उपचार करवाने के बाद स्वस्थ संतान पाती हैं। निम्नलिखित आँकड़े चिकित्सीय हस्तक्षेप के बिना पी.सी.ओ.एस गर्भधारण पर प्रकाश डालते हैं; यह ध्यान में रखना अच्छा होगा कि हर महिला का शरीर अलग होने के कारण डॉक्टर की सुविज्ञ राय लेना सबसे अच्छा है।

पी.सी.ओ.एस के साथ गर्भवती होने की संभावना :
पी.सी.ओ.एस वाली महिलाओं को अक्सर बांझपन के मुद्दों का सामना करना पड़ता है, और चिकित्सकीय हस्तक्षेप के बिना गर्भवती होना मुश्किल हो सकता है

पी.सी.ओ.एस प्रजनन उम्र की 8 – 10% महिलाओं को प्रभावित करता है और यह बांझपन की बहुत उच्च दर से जुड़ा हुआ है। चूँकि इससे अंडोत्सर्ग या तो कभी–कभी होता है या बिल्कुल नहीं होता है, इसलिए पी.सी.ओ.एस बिना सहायता वाले गर्भधारण को बहुत मुश्किल बना देता है।

पी.सी.ओ.एस होने के संभावित कारण
पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम का कोई सटीक कारण अभी तक नहीं पाया गया है। लेकिन ऐसा दृढ़ विश्वास है कि इंसुलिन प्रतिरोध और हार्मोन असंतुलन के साथ–साथ आनुवांशिकी एक कारक है। अगर किसी परिवार के सदस्य जैसे उसकी माँ, बहन या बुआ को पी.सी.ओ.एस है तो एक महिला में पी.सी.ओ.एस का जोखिम लगभग 50 प्रतिशत बढ़ जाता है।

जिन महिलाओं में पी.सी.ओ.एस का पता चलता है उनमें से लगभग 80 प्रतिशत में इंसुलिन प्रतिरोध मौजूद होता है। यहीं पर शरीर को शर्करा को तोड़ने के लिए अतिरिक्त इंसुलिन का उत्पादन करने के लिए समय से ज़्यादा काम करना पड़ता है। यह बदले में, अंडाशय को अधिक टेस्टोस्टेरोन पैदा करने के लिए उत्तेजित कर सकता है, जो तब रोमों के सामान्य विकास को बाधित करता है। इससे अक्सर अंडोत्सर्ग में अनियमितता होती है।

जीवनशैली वाले कारक आनुवंशिक कारक की ही तरह इंसुलिन प्रतिरोध के एक सामान्य कारण हैं। अधिक वज़न होना इंसुलिन प्रतिरोध का एक और कारण है। हार्मोन के असंतुलन जैसे कि टेस्टोस्टेरोन का बढ़ा हुआ स्तर, ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन का उच्च स्तर (एल.एच), और प्रोलैक्टिन का अधिक स्तर भी पी.सी.ओ.एस का कारण बन सकता है।

पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम के लक्षण
पी.सी.ओ.एस के लक्षणों की शुरुआत धीरे–धीरे होती है और अक्सर इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता है। हालांकि लक्षण किशोरावस्था से ही शुरू हो सकते हैं, लेकिन यह स्थिति तब तक छिपी रह सकती है जब तक कि महिला अच्छी मात्रा में वज़न न बढ़ा ले।

मासिक धर्म संबंधी समस्याएं जैसे कि मासिक धर्म का कभी–कभी होना या बिल्कुल न होना, मासिक धर्म के दौरान भारी, अनियमित रक्तस्राव, सिर से बालों का गिरना, जबकि शरीर के बाकी हिस्सों पर बालों का उगना बढ़ जाता है जैसे चेहरा, बार–बार गर्भपात, विषाद, इंसुलिन प्रतिरोध, और ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया, पी.सी.ओ.एस के कुछ चेतावनी संकेत हैं।

त्वचा के गहराए धब्बे, मिज़ाज के उतार–चढ़ाव और गर्भवती होने में कठिनाई, ये कुछ अन्य लक्षण हैं। अक्सर, इन्हें अनदेखा किया जाता है या अन्य कारणों को वजह समझा जाता है और परिणामस्वरूप पी.सी.ओ.एस निदान में देरी होती है। इन लक्षणों के अलावा, पी.सी.ओ.एस से पीड़ित महिलाओं को मधुमेह, उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्रॉल जैसी स्वास्थ्य समस्याएँ हो सकती हैं।

पी.सी.ओ.एस का निदान कैसे होता है?
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चूँकि प्रत्येक महिला अलग होती है, किसी में भी पी.सी.ओ.एस के सभी लक्षण दिखाई नहीं देंगे। पी.सी.ओ.एस के लिए कोई एकल विशिष्ट परीक्षण भी नहीं है, और परिणामस्वरूप, निदान की विधि हर डॉक्टर की थोड़ी भिन्न होगी।

सबसे पहले डॉक्टर, महिला के चिकित्सीय इतिहास की समीक्षा करेगा और वज़न, बी.एम.आई, मासिक धर्म, आहार और व्यायाम दिनचर्या जैसी जानकारी को सूचीबद्ध करेगा। विशेष रूप से हार्मोन की समस्याओं और मधुमेह के संबंध में पारिवारिक इतिहास की तलाश की जाएगी।

इसके बाद स्तनों, थायरॉइड ग्रंथि, त्वचा और पेट का एक शारीरिक परीक्षण होने की संभावना है। एक पेडू का परीक्षण या पी.सी.ओ.एस अल्ट्रासाउंड यह देखने के लिए किया जा सकता है कि क्या अंडाशयों की कोई असामान्यता है या नहीं। यदि पी.सी.ओ.एस के लक्षण जैसे कि पुटियाँ और बढ़े हुए अंडाशय मौजूद हैं, तो वे परीक्षण के दौरान दिखाई देंगे।

डॉक्टर अन्य परीक्षणों में टेस्टोस्टेरोन, प्रोलैक्टिन, ट्राइग्लिसराइड्स, कोलेस्ट्रॉल, थायराइड स्टिमूलेटिंग हार्मोन (टी.एस.एच) और इंसुलिन के स्तर की जाँच के लिए भी रक्त परीक्षण करने को कह सकते हैं। लिपिड स्तर परीक्षण, खाली पेट ग्लूकोज़ परीक्षण, और थायरॉयड फंक्शन परीक्षण डॉक्टरों को सभी आवश्यक जानकारी प्रदान करेगा।

इस स्थिति का निदान तब मिलता है जब रोगी निम्नलिखित तीन मानदंडों में से कम से कम दो पर सही बैठता है :

  • मासिक धर्म की गड़बड़ी जिसका अर्थ हो सकता है मासिक धर्म का न होना या मासिक धर्म में अनियमितता।
  • रक्त में पुरुष हार्मोन के उच्च स्तर की उपस्थिति जो मुँहासे या अतिरिक्त बाल उगने के रूप में प्रकट हो सकती है, विशेष रूप से शरीर और चेहरे पर।
  • अंडाशय जो पॉलीसिस्टिक हैं वे एक या दोनों अंडाशयों के आकार में वृद्धि दिखाते हैं; या एक अंडाशय पर 12 या अधिक रोमों की उपस्थिति।

पॉलीसिस्टिक ओवेरियन बीमारी का उपचार
पी.सी.ओ.एस का कोई इलाज नहीं है, लेकिन इसे वज़न घटाने, स्वस्थ आहार, नियमित व्यायाम और दवाइयों के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है। सुझाया गया उपचार लक्षणों के साथ–साथ महिला की माँ बनने की योजनाओं पर आधारित होगा।

वज़न घटाना :
अधिक वज़न वाली महिलाओं के लिए, अतिरिक्त वज़न को घटाना अक्सर सबसे अच्छा उपचार साबित हो सकता है। 5 प्रतिशत वज़न भी कम करने से मासिक धर्म चक्र सामान्य हो सकता है और उससे अंडोत्सर्ग भी।

व्यायाम और संतुलित आहार :
कम वसा वाले डेयरी उत्पाद, साबुत अनाज सब्जियाँ और फल एक संतुलित आहार का हिस्सा होते हैं। व्यायाम के साथ–साथ, एक संतुलित आहार आपके हार्मोन को संतुलित करने में मदद करता है।

धूम्रपान छोड़ना :
धूम्रपान करने वाली महिलाओं में एंड्रोजेन या पुरुष लिंग के हार्मोन अधिक मात्रा में मौजूद होते हैं। ये वही हार्मोन हैं जो पी.सी.ओ.एस के लिए जिम्मेदार हैं। धूम्रपान छोड़ने से पी.सी.ओ.एस के उपचार में मदद मिल सकती है।

दवाई लेना :
पी.सी.ओ.एस के लक्षणों के उपचार के लिए अक्सर दवा दी जाती है। मासिक धर्म नियमित करने के लिए गर्भनिरोधक गोलियाँ लेनी पड़ सकती हैं। बालों की अत्यधिक उगाई या बालों के झड़ने को उन दवाओं के माध्यम से भी नियंत्रित किया जा सकता है जो पुरुष हार्मोन के प्रभाव का विरोध कर सकें।

लेप्रोस्कोपी :
चूँकि बांझपन पी.सी.ओ.एस का एक दुष्प्रभाव है, इसलिए गर्भधारण की कोशिश करने वालों को लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग (एल.ओडी) नामक मामूली ऑपरेशन से फायदा हो सकता है। यहाँ, अंडाशय पर गर्मी दी जाती है या लेज़र मारा जाता है जिससे कि एण्ड्रोजन (पुरुष हार्मोन) पैदा करने वाले ऊतक को खत्म किया जा सके। यह हार्मोन के स्तर को संतुलित करने में मदद कर सकता है जिससे अंडाशय सामान्य रूप से गर्भावस्था के लिए कार्य कर सके। लेकिन कुछ मामलों में, यह एक अल्पकालिक समाधान साबित हो सकता है।

पी.सी.ओ.एस से पीड़ित अधिकांश महिलाएँ सही उपचार से गर्भवती हो सकती हैं। इसमें व्यक्ति के लक्षणों और स्थिति के आधार पर क्लोमीफीन या मेटफॉर्मिन का एक कोर्स शामिल हो सकता है। आई.वी.एफ भी अक्सर पी.सी.ओ.एस वाली उन महिलाओं के लिए एक विकल्प है जिन पर दवाइयों का कोई असर नहीं हो रहा।

पी.सी.ओ.एस से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम
पी.सी.ओ.एस वाली महिलाओं में बांझपन, मधुमेह, एंडोमेट्रियल कैंसर, दिल का दौरा, उच्च रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर, स्लीप एपनिया, स्तन कैंसर, चिंता और विषाद जैसी स्थितियों का खतरा अधिक होता है। स्लीप एपनिया विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है क्योंकि नींद के दौरान ऊपरी वायुमार्ग बाधित होता है। मेटाबोलिक सिंड्रोम भी एक और स्थिति है जो पी.सी.ओ.एस के परिणामस्वरूप हो सकती है जबकि पी.सी.ओ.एस वाली महिलाओं में हृदय संबंधी जोखिम दोगुना होता है।

जब पी.सी.ओ.एस वाली महिलाएँ गर्भवती हो जाती हैं, तो उन्हें अक्सर उच्च जोखिम वाले गर्भधारण के मामलों में अनुभवी डॉक्टर के पास भेजा जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पी.सी.ओ.एस के साथ गर्भधारण की संभावित जटिलताओं में गर्भपात, गर्भकालीन मधुमेह और समय से पहले जन्म का खतरा अधिक होता है।

पी.सी.ओ.एस के बावजूद गर्भधारण कैसे करें
चूँकि पी.सी.ओ.एस एक हार्मोनल विकार है जिससे अंडोत्सर्ग कभी–कभार हो जाता है और अंडों की गुणवत्ता खराब हो सकती है, एक प्रसूति विशेषज्ञ और प्रजनन संबंधी एंडोक्रिनोलॉजिस्ट का मार्गदर्शन पीड़ित महिलाओं को जल्दी गर्भवती होने में मदद कर सकता है। गर्भ धारण करने की कोशिश शुरू करने का फैसला करते ही उनके सुझाव लेना महत्त्वपूर्ण है। वे एक सफल गर्भावस्था के लिए निम्नलिखित सुझाव दे सकते हैं :

मासिक धर्म की निगरानी :
इससे बारंबारता का नमूना बनाने में मदद मिलती है – चूँकि पी.सी.ओ.एस अनियमित मासिक धर्म का कारण बन सकता है, इसका मतलब है कि अंडोत्सर्ग की संभावना कम है जिससे हर चक्र में गर्भधारण की संभावना और कम हो जाती है। यही कारण है कि डॉक्टर यह निर्धारित करने के लिए कि अंडोत्सर्ग हो रहा है या नहीं, मासिक धर्म का चार्ट बनाने का सुझाव देते हैं।

2. अंडोत्सर्ग पैटर्न पर नज़र रखना :
प्रत्येक चक्र में अंडोत्सर्ग के होने और न होने का पता लगाने में अंडोत्सर्ग परीक्षण किट का उपयोग और शरीर के बुनियादी तापमान की निगरानी बहुत मदद कर सकते हैं। डॉक्टर द्वारा परिणामों को सही ढंग से समझने के लिए न्यूनतम छह महीने तक यह करना होगा।

3. एक स्वस्थ वज़न बनाए रखना :
पी.सी.ओ.एस वाली कुछ महिलाओं के लिए अतिरिक्त वज़न ही गर्भधारण के लिए एकमात्र बाधा हो सकती है। एक स्वस्थ आहार खाने और कुछ किलो कम करने से हार्मोनल संतुलन बहाल हो सकता है और नतीजन गर्भाधारण हो सकता है।

4. स्वास्थ्यवर्धक खाना :
चूँकि पी.सी.ओ.एस शरीर की इंसुलिन को विनियमित करने की क्षमता को प्रभावित करता है, पी.सी.ओ.एस के उपचार वाला आहार प्रोटीन और रेशे में समृद्ध होना चाहिए जो स्थिति का मुकाबला कर सकता है। संसाधित खाद्य पदार्थ और शर्करा से दूर रहना यह सुनिश्चित करने का और हार्मोनल संतुलन को बहाल करने का एक तरीका है। इससे सामान्य अंडोत्सर्ग हो सकता है और इस प्रकार, गर्भधारण भी।

5. दवाई लेना :
यदि अनियमित या देरी से अंडोत्सर्ग होता है, तो डॉक्टर अंडोत्सर्ग को विनियमित करने में और मासिक धर्म के होने को सुनिश्चित करने में मदद करने के लिए मेटफॉर्मिन या क्लोमिड दे सकता है। अंडोत्सर्ग के न होने से डॉक्टर प्रोवेरा दे सकता है।

6. गोनैडोट्रॉपिंस :
डॉक्टर गोनैडोट्रॉपिंस से उपचार का एक और विकल्प सुझा सकते हैं। इस उपचार में दैनिक निगरानी की आवश्यकता होती है।

7. आईवीएफ :
जब दवाइयाँ परिणाम देने में विफल हों या किसी विशेष व्यक्ति के लिए उपयुक्त न हों, तो डॉक्टर आईवीएफ या इन–विट्रो निषेचन का चयन करने की सलाह दे सकते हैं। कुछ मामलों में, पी.सी.ओ.एस का अंडों पर प्रभाव पड़ सकता है, और फिर दाता अंडे की आवश्यकता पड़ सकती है।

8. लैप्रोस्कोपी :
लैप्रोस्कोपिक ओवेरियन ड्रिलिंग एक मामूली प्रक्रिया है जो पी.सी.ओ.एस के कुछ मामलों में गर्भधारण में मदद कर सकती है। पुरुष हार्मोन बनाने वाले ऊतक को नष्ट करने के लिए अंडाशय पर हमला किया जाता है, और यह शरीर के प्राकृतिक हार्मोन संतुलन को बहाल कर सकता है जिससे गर्भधारण हो सकता है।

9. गर्भधारण के बाद की देखभाल :
एक बार गर्भवती होने के बाद, गर्भावस्था को बनाए रखने के लिए देखभाल करना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि पी.सी.ओ.एस से गर्भपात का खतरा बढ़ जाता है। सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करने के लिए दवाओं को पूरी गर्भावस्था के दौरान जारी रखना पड़ सकता है।

जब आपको पी.सी.ओ.एस हो तो डॉक्टर से कब सलाह लें
पी.सी.ओ.एस के लक्षण अन्य स्थितियों जैसे कि थायराइड की समस्या, मोटापा, और मधुमेह के समान हो सकते हैं। तो, यह जानना मुश्किल हो सकता है कि डॉक्टर से कब मिलना है। स्थिति का शुरुआत में पता लगाना और उपचार करना दीर्घकालिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है, खासकर हृदय रोग और मधुमेह को रोकने में। निगरानी रखने के और तुरंत डॉक्टर से परामर्श करने के लिए कुछ चेतावनी संकेत हो सकते हैं कि योनि से अत्यधिक रक्तस्राव, विषाद या मिजाज़ के बदलाव, और मधुमेह के लक्षण।

अधिक प्यास लगना, बार–बार पेशाब आना, बहुत भूख लगना, बिना कारण वज़न कम होना, धुंधली दृष्टि और हाथों और पैरों में झुनझुनी कुछ ऐसे लक्षण हैं जो मधुमेह होने का संकेत दे सकते हैं। जिन महिलाओं के नियमित मासिक धर्म चक्र होते हैं, लेकिन 12 या अधिक महीनों की कोशिश के बाद भी गर्भवती नहीं हो पाती हैं, उन्हें भी तुरंत अपने डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए क्योंकि इंतज़ार करके देखने का तरीका पी.सी.ओ.एस में मदद नहीं करता है। पी.सी.ओ.एस के लिए घरेलू उपचारों का सहारा लेना उन महिलाओं के लिए सबसे अच्छा तरीका नहीं हो सकता जो जल्दी गर्भधारण करना चाहती हैं।

तनाव के बढ़ते स्तर, प्रदूषण, देर से गर्भधारण और कई अन्य कारकों के कारण पी.सी.ओ.एस दुनिया भर में एक आम मुद्दा बन गया है जिसका महिलाओं को सामना करना पड़ता है । हालांकि यह गर्भधारण में देरी का कारण बन सकता है, और गर्भावस्था के दौरान अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है, यह एक ऐसी स्थिति है जिसे संबोधित किया जा सकता है। उपचार के दौरान अनुकूल परिणाम के लिए तनाव से बचना और सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है।

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