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श्री ब्रह्मा चालीसा

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।। दोहा ।।
जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू, चतुरानन सुखमूल।
करहु कृपा निज दास पै, रहहु सदा अनुकूल।।

तुम सृजक ब्रह्माण्ड के, अज विधि घाता नाम।
विश्वविधाता कीजिये, जन पै कृपा ललाम।।

।। चौपाई ।।
जय जय कमलासान जगमूला, रहहू सदा जनपै अनुकूला।
रुप चतुर्भुज परम सुहावन, तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन।

रक्तवर्ण तव सुभग शरीरर, मस्तक जटाजुट गंभीरा।
ताके ऊपर मुकुट बिराजै, दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै।

श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर, है यज्ञोपवीत अति मनहर।
कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं, गल मोतिन की माला राजहिं।

चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये, दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये।
ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा, अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा।

अर्द्धागिनि तव है सावित्री, अपर नाम हिये गायत्री।
सरस्वती तब सुता मनोहर, वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर।

कमलासन पर रहे बिराजे, तुम हरिभक्ति साज सब साजे।
क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा, नाभि कमल भो प्रगट अनूपा।

तेहि पर तुम आसीन कृपाला, सदा करहु सन्तन प्रतिपाला।
एक बार की कथा प्रचारी, तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी।

कमलासन लखि कीन्ह बिचारा, और न कोउ अहै संसारा।
तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा, अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा।

कोटिक वर्ष गये यहि भांती, भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती।
पै तुम ताकर अन्त न पाये, ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये।

पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा महापघ यह अति प्राचीन।
याको जन्म भयो को कारन, तबहीं मोहि करयो यह धारन।

अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं, सब कुछ अहै निहित मो माहीं।
यह निश्चय करि गरब बढ़ायो, निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये।

गगन गिरा तब भई गंभीरा, ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा।
सकल सृष्टि कर स्वामी जोई, ब्रह्म अनादि अलख है सोई।

निज इच्छा इन सब निरमाये, ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये।
सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा, सब जग इनकी करिहै सेवा।

महापघ जो तुम्हरो आसन, ता पै अहै विष्णु को शासन।
विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई, तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई।

भैतहू जाई विष्णु हितमानी, यह कहि बन्द भई नभवानी।
ताहि श्रवण कहि अचरज माना, पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना।

कमल नाल धरि नीचे आवा, तहां विष्णु के दर्शन पावा।
शयन करत देखे सुरभूपा, श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा।

सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर, क्रीटमुकट राजत मस्तक पर।
गल बैजन्ती माल बिराजै, कोटि सूर्य की शोभा लाजै।

शंख चक्र अरु गदा मनोहर, पघ नाग शय्या अति मनहर।
दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू, हर्षित भे श्रीपति सुख धामू।

बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन, तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन।
ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना, ब्रह्मारुप हम दोउ समाना।

तीजे श्री शिवशंकर आहीं, ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही।
तुम सों होई सृष्टि विस्तारा, हम पालन करिहैं संसारा।

शिव संहार करहिं सब केरा, हम तीनहुं कहँ काज धनेरा।
अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु, निराकार तिनकहँ तुम जानहु।

हम साकार रुप त्रयदेवा, करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा।
यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये, परब्रह्म के यश अति गाये।

सो सब विदित वेद के नामा, मुक्ति रुप सो परम ललामा।
यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा, पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा।

नाम पितामह सुन्दर पायेउ, जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ।
लीन्ह अनेक बार अवतारा, सुन्दर सुयश जगत विस्तारा।

देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं, मनवांछित तुम सन सब पावहिं।
जो कोउ ध्यान धरै नर नारी, ताकी आस पुजावहु सारी।

पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई, तहँ तुम बसहु सदा सुरराई।
कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन, ता कर दूर होई सब दूषण।
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श्री गुरु गोरख नाथ चालीसा

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।।  दोहा  ।।
गणपति  गिरजा  पुत्र  को सुमिरु  बारम्बार ।
हाथ  जोड़  बिनती  करू शारद  नाम  आधार ।।

।। चौपाई ।।
जय  जय  जय  गोरख  अविनाशी। कृपा  करो  गुरुदेव  प्रकाशी  ।।
जय  जय  जय  गोरख   गुण  ज्ञानी । इच्छा  रूप  योगी  वरदानी  ।।
अलख  निरंजन  तुम्हरो  नामा । सदा  करो  भक्त्तन  हित  कामा  ।।
नाम  तुम्हारो  जो  कोई  गावे। जन्म  जन्म  के  दुःख  मिट  जावे ।।
जो  कोई  गोरख  नाम  सुनावे । भूत  पिसाच  निकट  नहीं  आवे  ।।
ज्ञान  तुम्हारा  योग  से  पावे । रूप  तुम्हारा  लख्या  न  जावे  ।।
निराकार  तुम  हो  निर्वाणी। महिमा  तुम्हारी  वेद  न  जानी  ।।
घट - घट  के  तुम  अंतर्यामी । सिद्ध   चोरासी  करे  परनामी  ।।
भस्म  अंग  गल  नांद  विराजे। जटा  शीश  अति  सुन्दर  साजे ।।
तुम  बिन  देव  और  नहीं  दूजा। देव  मुनिजन  करते  पूजा  ।।
चिदानंद  संतन   हितकारी।| मंगल  करण  अमंगल  हारी ।।
पूरण  ब्रह्मा सकल  घट  वासी।गोरख  नाथ  सकल  प्रकाशी ।।
गोरख  गोरख  जो  कोई  धियावे । ब्रह्म   रूप  के  दर्शन  पावे ।।
शंकर  रूप  धर  डमरू  बाजे।  कानन  कुंडल  सुन्दर  साजे  ।।
नित्यानंद  है  नाम  तुम्हारा । असुर  मार  भक्तन  रखवारा ।।
अति  विशाल  है  रूप  तुम्हारा। सुर  नर  मुनि  जन  पावे  न  पारा  ।।
दीनबंधु  दीनन  हितकारी। हरो  पाप  हम  शरण  तुम्हारी ।।
योग  युक्ति  में  हो  प्रकाशा।सदा  करो  संतान  तन  बासा।।
प्रात : काल  ले नाम  तुम्हारा। सिद्धि  बढे  अरु  योग  प्रचारा ।।
हठ  हठ  हठ  गोरछ  हठीले । मर  मर  वैरी  के  कीले ।।
चल चल चल गोरख  विकराला । दुश्मन  मार  करो  बेहाला।।
जय जय  जय  गोरख  अविनाशी। अपने  जन  की  हरो  चोरासी  ।।
अचल  अगम  है  गोरख  योगी। सिद्धि  दियो  हरो  रस  भोगी ।।
काटो  मार्ग  यम  को  तुम आई। तुम  बिन  मेरा  कोन  सहाई ।।
अजर  अमर  है  तुम्हारी  देहा। सनकादिक  सब  जोरहि  नेहा ।।
कोटिन  रवि  सम  तेज  तुम्हारा । है  प्रसिद्ध  जगत  उजियारा  ।।
योगी  लखे  तुम्हारी  माया। पार  ब्रह्म  से  ध्यान   लगाया  ।।
ध्यान  तुम्हारा  जो  कोई  लावे । अष्ट  सिद्धि  नव  निधि  पा जावे  ।।
शिव  गोरख  है  नाम  तुम्हारा ।पापी  दुष्ट अधम  को  तारा ।।
अगम  अगोचर  निर्भय  नाथा। सदा  रहो  संतन  के  साथा ।।
शंकर  रूप  अवतार  तुम्हारा ।गोपीचंद, भरथरी  को  तारा  ।।
सुन  लीजो  प्रभु  अरज  हमारी । कृपासिन्धु  योगी  ब्रहमचारी ।।
पूर्ण  आस  दास  की   कीजे । सेवक  जान  ज्ञान  को  दीजे  ।।
पतित  पवन  अधम  अधारा।तिनके  हेतु  तुम  लेत  अवतारा  ।।
अखल  निरंजन  नाम  तुम्हारा  । अगम  पंथ  जिन  योग  प्रचारा ।।
जय  जय  जय  गोरख  भगवाना । सदा  करो  भक्त्तन कल्याना।।
जय  जय  जय  गोरख  अविनाशी । सेवा  करे  सिद्ध  चोरासी ।।
जो  यह  पढ़े  गोरख  चालीसा  । होए  सिद्ध  साक्षी  जगदीशा ।।
हाथ  जोड़कर  ध्यान  लगावे । और  श्रद्धा  से  भेंट  चढ़ावे  ।।
बारह  पाठ  पढ़े  नित  जोई  । मनोकामना  पूर्ण  होई  ।।
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श्री नवग्रह चालीसा

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जन्म कुंडली में अगर सभी ग्रहो से परेशानी है तब अकसर नवग्रह शांति पाठ की सलाह दी जाती है लेकिन हर कोई व्यक्ति इतनी सामर्थ्य नहीं रखता कि ब्राह्मण को बुलाकर शांति पाठ करा सके, इसलिए नवग्रह मन्त्र जाप अथवा नवग्रह स्तोत्र की सलाह दी जाती है।  लेकिन यहाँ हम अपने पाठको को श्रीनवग्रह चालीसा के पाठ को दे रहे है जो नवग्रहों की शांति का सर्वोत्तम उपाय माना जाता है।  कोई भी व्यक्ति जब इस पाठ का पहली बार आरम्भ करे तो उसे इस पाठ को किसी शुभ दिन में शुरू करना चाहिए जैसे अमृत सिद्धि योग या गुरु पुष्य योग या पूर्णिमा का दिन या शुक्ल पक्ष का कोई शुभ दिन। जिस दिन पाठ शुरू करे तो स्नान आदि से निबट कर स्वच्छ वस्त्र पहन कर उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर मुँह कर के बैठे।  नवग्रह के नाम से नौ दीये जलाएं और उसके बाद पूरी श्रद्धा से नियमित रूप से रोज पाठ करे।  लगभग तीन महीने लगातार पाठ करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।  जो भी रुकावट अथवा बाधाएं व्यक्ति के जीवन में होती है सभी दूर हो जाएगीं।  मानसिक कष्ट हो या शारीरिक कष्ट हो – व्यक्ति सभी से निजात पाता है. घर में सुख-समृद्धि रहती है और वातावरण में सकारात्मकता भी रहती है।

।। चौपाई ।।
श्री गणपति गुरुपद कमल, प्रेम सहित सिरनाय।
नवग्रह चालीसा कहत, शारद होत सहाय।।
जय जय रवि शशि सोम बुध जय गुरु भृगु शनि राज।
जयति राहु अरु केतु ग्रह करहुं अनुग्रह आज।।

।। श्री सूर्य स्तुति ।।
प्रथमहि रवि कहं नावौं माथा, करहुं कृपा जनि जानि अनाथा।
हे आदित्य दिवाकर भानू, मैं मति मन्द महा अज्ञानू।
अब निज जन कहं हरहु कलेषा, दिनकर द्वादश रूप दिनेशा।
नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर, अर्क मित्र अघ मोघ क्षमाकर।

।। श्री चन्द्र स्तुति ।।
शशि मयंक रजनीपति स्वामी, चन्द्र कलानिधि नमो नमामि।
राकापति हिमांशु राकेशा, प्रणवत जन तन हरहुं कलेशा।
सोम इन्दु विधु शान्ति सुधाकर, शीत रश्मि औषधि निशाकर।
तुम्हीं शोभित सुन्दर भाल महेशा, शरण शरण जन हरहुं कलेशा।

।। श्री मंगल स्तुति ।।
जय जय जय मंगल सुखदाता, लोहित भौमादिक विख्याता।
अंगारक कुज रुज ऋणहारी, करहुं दया यही विनय हमारी।
हे महिसुत छितिसुत सुखराशी, लोहितांग जय जन अघनाशी।
अगम अमंगल अब हर लीजै, सकल मनोरथ पूरण कीजै।

।। श्री बुध स्तुति ।।
जय शशि नन्दन बुध महाराजा, करहु सकल जन कहं शुभ काजा।
दीजै बुद्धि बल सुमति सुजाना, कठिन कष्ट हरि करि कल्याणा।
हे तारासुत रोहिणी नन्दन, चन्द्रसुवन दुख द्वन्द्व निकन्दन।
पूजहिं आस दास कहुं स्वामी, प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी।

।। श्री बृहस्पति स्तुति ।।
जयति जयति जय श्री गुरुदेवा, करूं सदा तुम्हरी प्रभु सेवा।
देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी, इन्द्र पुरोहित विद्यादानी।
वाचस्पति बागीश उदारा, जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा।
विद्या सिन्धु अंगिरा नामा, करहुं सकल विधि पूरण कामा।

।। श्री शुक्र स्तुति।।
शुक्र देव पद तल जल जाता, दास निरन्तन ध्यान लगाता।
हे उशना भार्गव भृगु नन्दन, दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन।
भृगुकुल भूषण दूषण हारी, हरहुं नेष्ट ग्रह करहुं सुखारी।
तुहि द्विजबर जोशी सिरताजा, नर शरीर के तुमही राजा।

।। श्री शनि स्तुति ।।
जय श्री शनिदेव रवि नन्दन, जय कृष्णो सौरी जगवन्दन।
पिंगल मन्द रौद्र यम नामा, वप्र आदि कोणस्थ ललामा।
वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा, क्षण महं करत रंक क्षण राजा।
ललत स्वर्ण पद करत निहाला, हरहुं विपत्ति छाया के लाला।

।। श्री राहु स्तुति ।।
जय जय राहु गगन प्रविसइया, तुमही चन्द्र आदित्य ग्रसइया।
रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा, शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा।
सैहिंकेय तुम निशाचर राजा, अर्धकाय जग राखहु लाजा।
यदि ग्रह समय पाय हिं आवहु, सदा शान्ति और सुख उपजावहु।

।। श्री केतु स्तुति ।।
जय श्री केतु कठिन दुखहारी, करहु सुजन हित मंगलकारी।
ध्वजयुत रुण्ड रूप विकराला, घोर रौद्रतन अघमन काला।
शिखी तारिका ग्रह बलवान, महा प्रताप न तेज ठिकाना।
वाहन मीन महा शुभकारी, दीजै शान्ति दया उर धारी।

।। नवग्रह शांति फल ।।
तीरथराज प्रयाग सुपासा, बसै राम के सुन्दर दासा।
ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी, दुर्वासाश्रम जन दुख हारी।
नवग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु, जन तन कष्ट उतारण सेतू।
जो नित पाठ करै चित लावै, सब सुख भोगि परम पद पावै।।

।। दोहा ।।
धन्य नवग्रह देव प्रभु, महिमा अगम अपार।
चित नव मंगल मोद गृह जगत जनन सुखद्वार।।
यह चालीसा नवोग्रह, विरचित सुन्दरदास।
पढ़त प्रेम सुत बढ़त सुख, सर्वानन्द हुलास।

।। इति श्री नवग्रह चालीसा समाप्त ।।

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श्री काली चालीसा



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।। दोहा ।।
जय जय सीता राम के मध्य वासिनी अम्ब ।
देहु दरस जगदम्ब अब करहु न मातु विलम्ब ।।

।। चौपाई।।
जय काली कंकाल मालिनी । जय मंगला महाकपालिनी ।।
रक्तबीज वधकारिणी माता । सदा भक्तन की सुखदाता ।।

षिरोमालिका भूषित अंगे । जय काली मधु मद्य तंरगे ।।
हर हृदयारविन्द सुविलासिनी । जय जगदम्ब सकल दुखनासिनी ।।

हृीं काली श्री महाकाराली । क्रीं कल्याणी दक्षिणकाली ।।
क्लावती जय जय विद्यावति । जय तारासुन्दरी महामति ।।

देहु सुबुद्धि हरहु दुख द्वन्द्वा । काटहु सकल जगत के फन्दा ।।
जय ओम् कारे जय हूँकारे । महाषक्ति जय अपरम्पारे ।

कमला कलियुग दर्प विनाषिनी । सदा भक्तजन की भयनाषिनी ।।
अब जगदम्ब न देर लगावहु । दुख दरिद्र सब मोर हटातहु ।।

जयति कराल काल की माता । कालानल समान द्युतिगाता ।।
जय शंकरी सुरेषि सनातनी । कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनी ।।

कपर्दिनी कलि कल्मष मोचनी । जै विकसित नव नलिन विलोचनी ।।
आनन्दा आनन्द निधाना। देहु मातु मोहि निर्मल ज्ञाना ।।

करूणामृत सागरा कृपामयि । होहु दुष्ट जन कहं तुम निर्दयी ।।
सकल जीव तोहि परम पियारे । सकल विष्व तव रहहिं अधारे ।।

प्रलय काल महं नर्तन कारिणि । जग जननी सब जग की पालिनी ।।
महोदरी माहेष्वरी माया । हिमगिरि सुता विष्व की छाया ।।

स्वच्छच्छरद मरद धुनि माहीं । गरजत  तू ही और कोउ नाही ।।
स्फुरित मणिगणाकर प्रताने । तारागण तू व्योम विताने ।।

श्रीधाने सन्तन हितकारिणी । अग्निपाणि तुम दुष्ट विदारिणि ।।
धूम्र विलोचन प्राण विमोचिनी । शुम्भ निषुम्भ मथनि वर लोचनि ।।

सहस्रभुजी सरोरूह मालिनी । चामुण्डे मरघट की वासिनी ।।
खप्पर मध्य सुषोणित साजी । संहारेउ महिषासुर पाजी ।।

अम्ब अम्बिका चण्ड चण्डिका । सब एके तुम आदि कालिका ।।
अजा एकरूपा बहुरूपा । अकथ चरित्रा शक्ति अनूपा ।।

कलकत्ता के दक्षिण द्वारे । मूरति तोरि महेषि अपारे ।।
कादम्बरी पानरत श्यामा । जय माँतगी अनूप अकामा ।।

कमलासन वासिनी कमलायनि । जय जय श्याम जय यामायनि ।।
रासरते नवरसे प्रकृति है । जयति भक्त उर कुमति सुमति है ।।

जयति ब्रह्म षिव विष्णु कामदा । जयति अहिंसा धर्म जन्मदा ।।
जलथल नभ मण्डल में व्यापिनी । सौदामिनी मध्य आलापिनि ।।

झननन तच्छुमरिन रिन नादिनी । जय सरस्वती वीणा वादिनी ।।
ओं ऐं हृीं क्लीं श्रीं चामुण्डा । कलित कण्ठ शोभित नरमुण्डा ।।

जय ब्रह्माण्ड सिद्ध कवि माता । कामाख्या काली विख्याता ।।
हिंगुलाज विन्ध्याचल वासिनी । अट्टहासिनी अधिगण नासिनी ।।

कहं लगि अस्तुति करहुं अखण्डे । तू ब्रह्माण्ड शक्तिजित चण्डे ।।
शतमुख रावण मारनि अम्बा | करहु कृपा सब पर अवलंबा ।।

चतुर्भुजी काली तुम श्यामा । रूप तुम्हार महा अभिमाना ।।
खड्ग और खप्पर कर सोहत । सुर नर  मुनि सबको मन मोहत ।।

तुम्हारी कृपा पावे जो कोई । रोग शोक नहिं ता कहं होई ।।
जो यह पाठ करै चालीसा । तापर कृपा करहिं गौरीशा  ।।

।। दोहा ।।
जय  कपालिनी षिवा जय जय जय जगदम्ब ।
सदा भक्तजन केरि दुख हरहु मातु अविलम्ब ।।

।। इति श्री काली चालीसा समाप्त ।।
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श्री वैष्णो देवी चालीसा

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।।  दोहा ।।
गरूड़ वाहिनी वैष्णवी त्रिकुटा पर्वत धाम ।
काली, लक्ष्मी, सरस्वती शक्ति तुम्हें प्रणाम ।।

      ।। चौपाई  ।।
नमो नमो वैष्णो वरदानी । कलिकाल में शुभ कल्यानी ।।
मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी । पिंडी रूप में हो अवतारी ।।

देवी-देवता अंष दियो है । रत्नाकर घर जन्म लियो है ।।
करी तपस्या राम को पाऊं । त्रेता की शक्ति कहलाऊं ।।

कहा राम मणि पर्वत जाओ । कलियुग की देवी कहलाओ ।।
विष्णु रूप से कल्की बनकर । लूंगा शक्ति रूप बदलकर ।।

तब तब त्रिकुटा घाटी जाओ । गुफा अंधेरी जाकर पाओ ।।
काली लक्ष्मी सरस्वती मां । करेंगी पोषण पार्वती मां ।।

ब्रह्मा, विष्णु शंकर द्वारे । हनुमत, भैंरो प्रहरी प्यारे ।।
रिद्धि, सिद्धि चंवर डुलायें । कलियुग वासी पूजन आवें ।।

पान सुपारी ध्वजा नारियल । चरणामृत चरणों का निर्मल ।।
दिया फलित वर मां मुस्काई । करन तपस्या पर्वत आई ।।

कलि-काल की भड़की ज्वाला । इक दिन अपना रूप निकाला ।।
कन्या बन नगरोटा आई । योगी भैरों दिया दिखाई ।।

रूप देख सुन्दर ललचाया । पीछे-पीछे भागा आया ।।
कन्याओं के साथ मिली मां । कौल-कंदौली तभी चली मां ।।

देवा माई दर्षन दीना । पवन रूप हो गई प्रवीणा ।।
नवरात्रों में लीला रचाई । भक्त श्रीधर के घर आई ।।

योगिन को भण्डारा दीना । सबने रूचिकर भोजन कीना ।।
मांस, मदिरा भैरों मांगी । रूप पवन कर इच्छा त्यागी ।।

बाण मारकर गंगा निकाली । पर्वत भागी हो मतवाली ।।
चरण रखे आ एक षिला जब । चरण-पादुका नाम पड़ा तब ।।

पीछे भैरो  था बलकारी । छोटी गुफा में जाय पधारी ।।
नौ माह तक किया निवासा । चली फोड़कर किया प्रकाषा ।।

आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी । कहलाई मां आदि कुंवारी ।।
गुफा द्वार पहुंची मुस्काई । लांगुर वीर ने आज्ञा पाई ।।

भागा-भागा भैरो  आया । रखा हित निज शस्त्र चलाया ।।
पड़ा शीष जा पर्वत ऊपर । किया क्षमा जा दिया उसे वर ।।

अपने संग में पुजवाऊंगी । भैरो घाटी बनवाऊंगी ।।
पहले मेरा दर्षन होगा । पीछे तेरा सुमरन होगा ।।

बैठ गई मां पिण्डी होकर । चरणों में बहता जल झर-झर ।।
चौंसठ योगिनी-भैरो  बरवन । सप्तऋषि आ करते सुमरन ।।

घंटा ध्वनि पर्वत बाजे । गुफा निराली सुन्दर लांगे ।।
भक्त श्रीधर पूजन कीना । भक्ति सेवा का वर लीना ।।

सेवक ध्यानूं तुमको ध्याया । ध्वजा व चोला आन चढ़ाया ।।
सिंह सदा दर पहरा देता । पंजा शेर का दुःख हर लेता ।।

जम्बू द्वीप महाराज मनाया । सर सोने का छत्र चढ़ाया ।।
हीरे की मूरत संग प्यारी । जगे अखण्ड इक जोत तुम्हारी ।।

आष्विन चैत्र नवराते आऊं । पिण्डी रानी दर्षन पाऊं ।।
सेवक '' सरिता  '' शरण तिहारी । हरो वैष्णो विपत हमारी ।।

।।  दोहा ।।
कलियुग में तेरी, है मां अपरम्पार ।
धर्म की हानि हो रही, प्रगट हो अवतार ।।

।। इति श्री वैष्णो देवी चालीसा समाप्त ।।
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श्री अन्नपूर्णा चालीसा

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।। दोहा।।
विश्वेश्वर पदमदम की रज निज शीश लगाय।
अन्नपूर्णे,तव सुयश बरनौं कवि मतिलाय।।

।। चौपाई।।
नित्य अन्नद करिणी माता,वर अरू अभय भाव प्रख्याता।
जय! सौंदर्य सिन्धु जग जननी,अखिल पाप हर भव-हय हरनी।।

श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि,संतन तुव पद सेवत .ऋषिमुनि।
काशी पुराधीश्वरी माता,माहेश्वरी सकल जग त्राता।।

वृषभारूढ नाम रूद्रणी,विश्व विहारिणी जय! कल्याणी।
पतिदेवता सुतीत शिरोमणि,पदवी प्राप्त कीन्ह गिरी नंदिंन।।

पति विछोह दुःख सहि नहि पावा,योग अग्नि तब बदन जरावा।
देह तजत शिवच रण सनेहू,राखेहु जात हिमगिर गेहू।।

प्रकटी गिरजा नाम धरायो,अति आन्नद भवन मॅंह छायो।
नारद ने तब तोहिं भरमायहु,ब्याह करन हित पाठ पढायहु।।

ब्रहमा वरूण कुबेर गनाये,देवराज आदिक कहि गाये।
सब देवन को सुजस बखानी,मति पलटन की मन मॅह ठानी।।

अचल रही तुम प्रण पर धान्या,कीहनी सिद्ध हिमाचल कन्या।
निज कौ तब नारद घबराये,तब प्रण पूरण मंन्त्र पढाये।

करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ,संत बचन तुम सत्य परेखेहु।।
गगनगिरा सुनि टरी न टारे,ब्रम्हा तब तुव पास पधारे।

कहेउ पुत्रि वर माॅंगु अनूपा,देहूँ आज तुव मति अनुरूपा।।
अब संदेह छांडि कछु मोसों,है सौगन्ध नही छल तोसों।

करत वेद विद ब्रहमा जानहु,वचन मोर यह सांचा मानहु।।
तजि संकोचि कहहु निज इच्छा,देहौ मै मनमानी भिक्षा।

सुनि ब्रहमा की मधुरी बानी,मुख सों कछु मुसकाय भवानी।।
बोली तुम का कहहु विधाता,तुम तो जगके स्रष्टाधाता।

मम कामना गुप्त नहिं तोंसों,कहवावा चाहहु का मोंसो।
दक्ष यज्ञ मह मरती बारा,शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा।

सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये,कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये।।
तब गिरजा शंकर तव भयऊ,फल कामना संशयो गयऊ।

चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा, तब आनन मंह करत निवासा।।
माला पुस्तक अंकुश सोहै,कर  मंह अपर पाश मन मोहै।

अन्नपूर्णे! सदापूर्णे,अज अनवघ अनंत पूर्णे।।
कृपा सागरी क्षेमंकरि मां,भव विभूति आनंद भरी मां।

कमल विलोचन विलसित भाले,देवि कालिके चण्डि सिंधुजा।।
स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी,मत्र्य लोक लक्ष्मी पदपायी।।

विलसी  सब मंह सर्व सरूपा,सेवत तोहिं अमर पुर भूपा।
जे पढिहहिं यह तव चालीसा,फल पाइंहहि शुभ साखी ईसा।।

प्रात समय जो जन मन लायो,पढिहहिं भक्ति सुरूचि अघिकायो।।
स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत, परमैश्रवर्य लाभ लहि अद्भुत।

राज विमुख को राज दिवावै,जस तेरो जन सुजस बढावै।।
पाठ महा मुद मंगल दाता,भक्त मनोवांछित निधि पाता।

।। दोहा।।
जे यह चालीसा सुभग,पढि नावैगें माथ।
तिनके कारज सिद्ध सब राखी काशी नाथ।।
।। इति श्री मां अन्नपूर्णा चालीसा।।

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श्री विश्वकर्मा चालीसा

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।। दोहा ।।
श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊं, चरणकमल धरिध्यान।
श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण, दीजै दया निधान।।

।। चौपाई ।।
जय श्री विश्वकर्म भगवाना। जय विश्वेश्वर कृपा निधाना।।
शिल्पाचार्य परम उपकारी। भुवना-पुत्र नाम छविकारी।।

अष्टमबसु प्रभास-सुत नागर। शिल्पज्ञान जग कियउ उजागर।।
अद्‍भुत सकल सृष्टि के कर्ता। सत्य ज्ञान श्रुति जग हित धर्ता।।

अतुल तेज तुम्हतो जग माहीं। कोई विश्व मंह जानत नाही।।
विश्व सृष्टि-कर्ता विश्वेशा। अद्‍भुत वरण विराज सुवेशा।।

एकानन पंचानन राजे। द्विभुज चतुर्भुज दशभुज साजे।।
चक्र सुदर्शन धारण कीन्हे। वारि कमण्डल वर कर लीन्हे।।

शिल्पशास्त्र अरु शंख अनूपा। सोहत सूत्र माप अनुरूपा।।
धनुष बाण अरु त्रिशूल सोहे। नौवें हाथ कमल मन मोहे ।।

दसवां हस्त बरद जग हेतु। अति भव सिंधु मांहि वर सेतु।।
सूरज तेज हरण तुम कियऊ। अस्त्र शस्त्र जिससे निरमयऊ।।

चक्र शक्ति अरू त्रिशूल एका। दण्ड पालकी शस्त्र अनेका।।
विष्णुहिं चक्र शूल शंकरहीं। अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं।।

इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा। तुम सबकी पूरण की आशा।।
भांति-भांति के अस्त्र रचाए। सतपथ को प्रभु सदा बचाए।।

अमृत घट के तुम निर्माता। साधु संत भक्तन सुर त्राता।।
लौह काष्ट ताम्र पाषाणा। स्वर्ण शिल्प के परम सजाना।।

विद्युत अग्नि पवन भू वारी। इनसे अद्भुत काज सवारी।।
खान-पान हित भाजन नाना। भवन विभिषत विविध विधाना।।

विविध व्सत हित यत्रं अपारा। विरचेहु तुम समस्त संसारा।।
द्रव्य सुगंधित सुमन अनेका। विविध महा औषधि सविवेका।।

शंभु विरंचि विष्णु सुरपाला। वरुण कुबेर अग्नि यमकाला।।
तुम्हरे ढिग सब मिलकर गयऊ। करि प्रमाण पुनि अस्तुति ठयऊ।।

भे आतुर प्रभु लखि सुर-शोका। कियउ काज सब भये अशोका।।
अद्भुत रचे यान मनहारी। जल-थल-गगन मांहि-समचारी।।

शिव अरु विश्वकर्म प्रभु मांही। विज्ञान कह अंतर नाही।।
बरनै कौन स्वरूप तुम्हारा। सकल सृष्टि है तव विस्तारा।।

रचेत विश्व हित त्रिविध शरीरा। तुम बिन हरै कौन भव हारी।।
मंगल-मूल भगत भय हारी। शोक रहित त्रैलोक विहारी।।

चारो युग परताप तुम्हारा। अहै प्रसिद्ध विश्व उजियारा।।
ऋद्धि सिद्धि के तुम वर दाता। वर विज्ञान वेद के ज्ञाता।।

मनु मय त्वष्टा शिल्पी तक्षा। सबकी नित करतें हैं रक्षा।।
प्रभु तुम सम कृपाल नहिं कोई। विपदा हरै जगत मंह जोई।।

जै जै जै भौवन विश्वकर्मा। करहु कृपा गुरुदेव सुधर्मा।।
इक सौ आठ जाप कर जोई। छीजै विपत्ति महासुख होई।।

पढाहि जो विश्वकर्म-चालीसा। होय सिद्ध साक्षी गौरीशा।।
विश्व विश्वकर्मा प्रभु मेरे। हो प्रसन्न हम बालक तेरे।।

मैं हूं सदा उमापति चेरा। सदा करो प्रभु मन मंह डेरा।।

।। दोहा ।।
करहु कृपा शंकर सरिस, विश्वकर्मा शिवरूप।
श्री शुभदा रचना सहित, ह्रदय बसहु सूर भूप।।

।। इति श्री विश्वकर्मा चालीसा समाप्त ।।

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श्री सूर्य चालीसा

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भारतीय परंपरा में प्रतिदिन सूर्य देव की पूजा और सूर्य को अर्घ्य देने का खास महत्व है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सूर्य देव हिन्दू धर्म के देवता हैं। सूर्य देव को एक प्रत्यक्ष देव माना जाता है। सूर्य देव इस जगत की आत्मा है।खास तौर पर छठ पर्व के दौरान सूर्य की उपासना करने का विशेष महत्व माना गया है। अत: सूर्य की आराधना करते समय श्री सूर्य चालीसा का पाठ बहुत ही लाभदायी माना गया है। अगर आप भी हर तरह की सुख-संपत्ति और पुत्र की प्राप्ति चाहते हैं तो आपको इस चालीसा का पाठ अवश्‍य करना चाहिए। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं सूर्य चालीसा का संपूर्ण पाठ।

। दोहा ।।
कनक बदन कुंडल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग।।

।। चौपाई ।।
जय सविता जय जयति दिवाकर, सहस्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर।
भानु, पतंग, मरीची, भास्कर, सविता, हंस, सुनूर, विभाकर।

विवस्वान, आदित्य, विकर्तन, मार्तण्ड, हरिरूप, विरोचन।
अम्बरमणि, खग, रवि कहलाते, वेद हिरण्यगर्भ कह गाते।

सहस्रांशु, प्रद्योतन, कहि कहि, मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि।
अरुण सदृश सारथी मनोहर, हांकत हय साता चढ़ि रथ पर।

मंडल की महिमा अति न्यारी, तेज रूप केरी बलिहारी।
उच्चैश्रवा सदृश हय जोते, देखि पुरन्दर लज्जित होते।

मित्र, मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर, सविता,
सूर्य, अर्क, खग, कलिहर, पूषा, रवि,

आदित्य, नाम लै, हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै।
द्वादस नाम प्रेम सो गावैं, मस्तक बारह बार नवावै।

चार पदारथ सो जन पावै, दुख दारिद्र अघ पुंज नसावै।
नमस्कार को चमत्कार यह, विधि हरिहर कौ कृपासार यह।

सेवै भानु तुमहिं मन लाई, अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई।
बारह नाम उच्चारन करते, सहस जनम के पातक टरते।

उपाख्यान जो करते तवजन, रिपु सों जमलहते सोतेहि छन।
छन सुत जुत परिवार बढ़तु है, प्रबलमोह को फंद कटतु है।

अर्क शीश को रक्षा करते, रवि ललाट पर नित्य बिहरते।
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत, कर्ण देश पर दिनकर छाजत।

भानु नासिका वास करहु नित, भास्कर करत सदा मुख कौ हित।
ओठ रहैं पर्जन्य हमारे, रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे।

कंठ सुवर्ण रेत की शोभा, तिग्मतेजसः कांधे लोभा।
पूषा बाहु मित्र पीठहिं पर, त्वष्टा-वरुण रहम सुउष्णकर।

युगल हाथ पर रक्षा कारन, भानुमान उरसर्मं सुउदरचन।
बसत नाभि आदित्य मनोहर, कटि मंह हंस, रहत मन मुदभर।

जंघा गोपति, सविता बासा, गुप्त दिवाकर करत हुलासा।
विवस्वान पद की रखवारी, बाहर बसते नित तम हारी।

सहस्रांशु, सर्वांग सम्हारै, रक्षा कवच विचित्र विचारे।
अस जोजजन अपने न माहीं, भय जग बीज करहुं तेहि नाहीं।

दरिद्र कुष्ट तेहिं कबहुं न व्यापै, जोजन याको मन मंह जापै।
अंधकार जग का जो हरता, नव प्रकाश से आनन्द भरता।

ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही, कोटि बार मैं प्रनवौं ताही।
मन्द सदृश सुतजग में जाके, धर्मराज सम अद्भुत बांके।

धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा, किया करत सुरमुनि नर सेवा।
भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों, दूर हटत सो भव के भ्रम सों।

परम धन्य सो नर तनधारी, हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी।
अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन, मध वेदांगनाम रवि उदय।

भानु उदय वैसाख गिनावै, ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै।
यम भादों आश्विन हिमरेता, कातिक होत दिवाकर नेता।

अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं, पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं।

।। दोहा ।।
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहै विविध, होंहि सदा कृतकृत्य।।

।। इति श्री सूर्य चालीसा समाप्त ।।

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श्री तुलसी चालीसा

Shree Tulsi Chalisa
श्री तुलसी चालीसा के नियमित पाठ से आरोग्य और सौभाग्य का वरदान तो मिलता ही है साथ ही जीवन में पवित्रता आती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।  गर नियमित तुलसी चालीसा न पढ़ सकें तो देव प्रबोधिनी एकादशी पर इसका वाचन अवश्य करें...

।। दोहा ।।
जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी।
नमो नमो हरी प्रेयसी श्री वृंदा गुन खानी।।
श्री हरी शीश बिरजिनी , देहु अमर वर अम्ब।
जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब ।।

।। चौपाई ।।
धन्य धन्य श्री तलसी माता । महिमा अगम सदा श्रुति गाता ।।
हरी के प्राणहु से तुम प्यारी । हरीहीं हेतु कीन्हो ताप भारी।।

जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो । तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो ।।
हे भगवंत कंत मम होहू । दीन जानी जनि छाडाहू छोहु ।।

सुनी लख्मी तुलसी की बानी । दीन्हो श्राप कध पर आनी ।।
उस अयोग्य वर मांगन हारी । होहू विटप तुम जड़ तनु धारी ।।

सुनी तुलसी हीं श्रप्यो तेहिं ठामा । करहु वास तुहू नीचन धामा ।।
दियो वचन हरी तब तत्काला । सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला।।

समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा । पुजिहौ आस वचन सत मोरा।।
तब गोकुल मह गोप सुदामा । तासु भई तुलसी तू बामा ।।

कृष्ण रास लीला के माही । राधे शक्यो प्रेम लखी नाही ।।
दियो श्राप तुलसिह तत्काला । नर लोकही तुम जन्महु बाला ।।

यो गोप वह दानव राजा । शंख चुड नामक शिर ताजा ।।
तुलसी भई तासु की नारी । परम सती गुण रूप अगारी ।।

अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ । कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ।।
वृंदा नाम भयो तुलसी को । असुर जलंधर नाम पति को ।।

करि अति द्वन्द अतुल बलधामा । लीन्हा शंकर से संग्राम ।।
जब निज सैन्य सहित शिव हारे । मरही न तब हर हरिही पुकारे ।।

पतिव्रता वृंदा थी नारी । कोऊ न सके पतिहि संहारी ।।
तब जलंधर ही भेष बनाई । वृंदा ढिग हरी पहुच्यो जाई ।।

शिव हित लही करि कपट प्रसंगा । कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा ।।
भयो जलंधर कर संहारा। सुनी उर शोक उपारा ।।

तिही क्षण दियो कपट हरी टारी । लखी वृंदा दुःख गिरा उचारी ।।
जलंधर जस हत्यो अभीता । सोई रावन तस हरिही सीता ।।

अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा । धर्म खंडी मम पतिहि संहारा ।।
यही कारण लही श्राप हमारा । होवे तनु पाषाण तुम्हारा।।

सुनी हरी तुरतहि वचन उचारे । दियो श्राप बिना विचारे ।।
लख्यो न निज करतूती पति को । छलन चह्यो जब पारवती को ।।

जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा । जग मह तुलसी विटप अनूपा ।।
धग्व रूप हम शालिगरामा । नदी गण्डकी बीच ललामा ।।

जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं । सब सुख भोगी परम पद पईहै ।।
बिनु तुलसी हरी जलत शरीरा । अतिशय उठत शीश उर पीरा ।।

जो तुलसी दल हरी शिर धारत । सो सहस्त्र घट अमृत डारत ।।
तुलसी हरी मन रंजनी हारी। रोग दोष दुःख भंजनी हारी ।।

प्रेम सहित हरी भजन निरंतर । तुलसी राधा में नाही अंतर ।।
व्यंजन हो छप्पनहु प्रकारा । बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा ।।

सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही । लहत मुक्ति जन संशय नाही ।।
कवि सुन्दर इक हरी गुण गावत । तुलसिहि निकट सहसगुण पावत ।।

बसत निकट दुर्बासा धामा । जो प्रयास ते पूर्व ललामा ।।
पाठ करहि जो नित नर नारी । होही सुख भाषहि त्रिपुरारी ।।

।। दोहा ।।
तुलसी चालीसा पढ़ही तुलसी तरु ग्रह धारी ।
दीपदान करि पुत्र फल पावही बंध्यहु नारी ।।

सकल दुःख दरिद्र हरी हार ह्वै परम प्रसन्न ।
आशिय धन जन लड़हि ग्रह बसही पूर्णा अत्र ।।

लाही अभिमत फल जगत मह लाही पूर्ण सब काम।
जेई दल अर्पही तुलसी तंह सहस बसही हरीराम ।।

तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सूत सुखराम।
मानस चालीस रच्यो जग महं तुलसीदास ।।

।। इति श्री तुलसी चालीसा समाप्त ।।
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श्री दुर्गा चालीसा

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।। चौपाई।।
नमो नमो दुर्गा सुख करनी । नमो नमो अम्बे दुखहरनी ।।
निराकार है ज्योति तुम्हारी ।  तिहूं लोक फैली उजियारी ।।

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भुकुटी विकराला।।
रूप मातु को अधिक सुहावे । दरस करत जन अति सुख पावे।।

तुम संसार शक्ति लय कीना ।  पालन हेतु अत्र धन दीना ।।
अत्रपूर्णा हुई जगपाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।।

प्रलयकाल सब नाशन हारी।  तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ।।
शिवयोगी तुम्हारे गुण गावे।  ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें।।

रूप सरस्वती का तुम धारा ।  दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा।।
धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भई फाड़ के खम्भा।।

रक्षा कर प्रहलाद बचायो।  हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ।।
लक्ष्मी रूप धरो जगमाहीं। श्री नारायण अंग समाही।।

क्षीर सिंधु में करत बिलासा । दया सिंधु कीजे मन आशा ।।
हिंगलाज में तुम्ही भवानी। महिमा अमित न जात बखानी ।।

मातंगी धूमावति माता । भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ।।
श्री भैरव तारा जगतारिनि। छिन्न भाल भव दुःख निवारिनि।।

केहरि वाहन सौह भवानी । लंगुर बीर चलत अगवानी ।।
कर में खप्पर खंग बिराजे। जाको देखि काल डर भाजे ।।

सोहे अस्त्र शस्त्र और तिरशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला ।।
नव कोटि में तुम्हीं विराजत । तिहूं लोक में डंका बाजत।।

शुंभ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्त बीज संखन संहारे ।।
महिषासुर नृप अति अभिमानी। जोहि अघ भारि मही अकुलानी ।।

रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तेहि संहारा ।।
परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहया मातु तुम तब तब।।

अमरपुरी अरु बासव लोका। तव महिमा सब रहे अशोका ।।
ज्वाला मैं है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजत नरनारी ।।

प्रेम भक्ति से जो नर गावै।  दुःख दारिद्र निकट नहिं आवे ।।
ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म मरन ते सो छुटी जाई ।।

योगी सुरमुनि कहत पुकारी ।  योग न होय बिन शक्ति तुम्हारी।।
शंकर आचरज तप कीनो।कामहु क्रोध जीत सब लीनो ।।

निशिदिनि ध्यान धरत शंकर को । काहू काल नहीं सुमिरो तुमको।।
शक्ति रूप को मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछतायो।।

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी।।
भई प्रसत्र आदि जगदम्ब । दई शक्ति नहीं कीन विलंबा ।।

मोको मातु कष्ट अति धेरो।  तुम बिन कौन हरे दुःख मेरो ।।
आशा तृष्णा निपट सतावै । रिपु मुरख हो अति डर पावै ।।

शत्रु नाश कीजे महारानी । सुमिरो इक चित्त तुम्हें भवानी।।
करो कृपा हे मातु दयाला । ऋद्धि सिद्धि दे करहू निहाला।।

जब लगि जियो सदा फलपाउं । सब सुख भोग परमपत पाउं।।
देवीदास’ शरण निज जानी । करहू कृपा जगतम्ब भवानी।।

।। दोहा ।।
शरणागत रक्षा करे, भक्त रहे निशंक |
मै आया तेरी शरण में, मातु लीजिये अंक ।।

।। इति श्री दुर्गा चालीसा समाप्त ।।
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श्री गंगा चालीसा

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।। स्तुति ।।
मात शैल्सुतास पत्नी ससुधाश्रंगार धरावली ।
स्वर्गारोहण जैजयंती भक्तीं भागीरथी प्रार्थये ।।

।। दोहा ।।
जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग ।
जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग ।।

।। चौपाई ।।
जय जय जननी हराना अघखानी। आनंद करनी गंगा महारानी ।।
जय भगीरथी सुरसरि माता। कलिमल मूल डालिनी विख्याता ।।

जय जय जहानु सुता अघ हनानी। भीष्म की माता जगा जननी ।।
धवल कमल दल मम तनु सजे। लखी शत शरद चंद्र छवि लजाई ।।

वहां मकर विमल शुची सोहें। अमिया कलश कर लखी मन मोहें ।।
जदिता रत्ना कंचन आभूषण। हिय मणि हर, हरानितम दूषण ।।

जग पावनी त्रय ताप नासवनी। तरल तरंग तुंग मन भावनी ।।
जो गणपति अति पूज्य प्रधान। इहूँ ते प्रथम गंगा अस्नाना ।।

ब्रम्हा कमंडल वासिनी देवी। श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि ।।
साथी सहस्त्र सागर सुत तरयो। गंगा सागर तीरथ धरयो ।।

अगम तरंग उठ्यो मन भवन। लखी तीरथ हरिद्वार सुहावन ।।
तीरथ राज प्रयाग अक्षैवेता। धरयो मातु पुनि काशी करवत ।।

धनी धनी सुरसरि स्वर्ग की सीधी। तरनी अमिता पितु पड़ पिरही ।।
भागीरथी ताप कियो उपारा। दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा ।।

जब जग जननी चल्यो हहराई। शम्भु जाता महं रह्यो समाई ।।
वर्षा पर्यंत गंगा महारानी। रहीं शम्भू के जाता भुलानी ।।

पुनि भागीरथी शम्भुहीं ध्यायो। तब इक बूंद जटा से पायो
ताते मातु भें त्रय धारा। मृत्यु लोक, नाभा, अरु पातारा ।।

गईं पाताल प्रभावती नामा। मन्दाकिनी गई गगन ललामा ।।
मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनी। कलिमल हरनी अगम जग पावनि ।।

धनि मइया तब महिमा भारी। धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी ।।
मातु प्रभवति धनि मन्दाकिनी। धनि सुर सरित सकल भयनासिनी ।।

पन करत निर्मल गंगा जल। पावत मन इच्छित अनंत फल ।।
पुरव जन्म पुण्य जब जागत। तबहीं ध्यान गंगा महँ लागत ।।

जई पगु सुरसरी हेतु उठावही। तई जगि अश्वमेघ फल पावहि ।।
महा पतित जिन कहू न तारे। तिन तारे इक नाम तिहारे ।।

शत योजन हूँ से जो ध्यावहिं। निशचाई विष्णु लोक पद पावहीं ।।
नाम भजत अगणित अघ नाशै। विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशे ।।

जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना। धर्मं मूल गँगाजल पाना ।।
तब गुन गुणन करत दुःख भाजत। गृह गृह सम्पति सुमति विराजत ।।

गंगहि नेम सहित नित ध्यावत। दुर्जनहूँ सज्जन पद पावत ।।
उद्दिहिन विद्या बल पावै। रोगी रोग मुक्त हवे जावै ।।

गंगा गंगा जो नर कहहीं। भूखा नंगा कभुहुह न रहहि ।।
निकसत ही मुख गंगा माई। श्रवण दाबी यम चलहिं पराई ।।

महँ अघिन अधमन कहं तारे। भए नरका के बंद किवारें ।।
जो नर जपी गंग शत नामा।। सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा ।।

सब सुख भोग परम पद पावहीं। आवागमन रहित ह्वै जावहीं ।।
धनि मइया सुरसरि सुख दैनि। धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी ।।

ककरा ग्राम ऋषि दुर्वासा। सुन्दरदास गंगा कर दासा ।।
जो यह पढ़े गंगा चालीसा। मिली भक्ति अविरल वागीसा ।।

।। दोहा ।।
नित नए सुख सम्पति लहैं। धरें गंगा का ध्यान ।।
अंत समाई सुर पुर बसल। सदर बैठी विमान ।।

संवत भुत नभ्दिशी। राम जन्म दिन चैत्र ।।
पूरण चालीसा किया। हरी भक्तन हित नेत्र ।।

।।इति श्री गंगा चालीसा समाप्त ।।

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श्री भैरव चालीसा

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।। दोहा ।।
श्री गणपति, गुरु गौरि पद, प्रेम सहित धरि माथ ।
चालीसा वन्दन करों, श्री शिव भैरवनाथ ।।

श्री भैरव संकट हरण, मंगल करण कृपाल ।
श्याम वरण विकराल वपु, लोचन लाल विशाल ।।

।।चौपाई ।।
जय जय श्री काली के लाला । जयति जयति काशी-कुतवाला ।।
जयति बटुक भैरव जय हारी । जयति काल भैरव बलकारी ।।

जयति सर्व भैरव विख्याता । जयति नाथ भैरव सुखदाता ।।
भैरव रुप कियो शिव धारण । भव के भार उतारण कारण ।।

भैरव रव सुन है भय दूरी । सब विधि होय कामना पूरी ।।
शेष महेश आदि गुण गायो । काशी-कोतवाल कहलायो ।।

जटाजूट सिर चन्द्र विराजत । बाला, मुकुट, बिजायठ साजत ।।
कटि करधनी घुंघरु बाजत । दर्शन करत सकल भय भाजत ।।

जीवन दान दास को दीन्हो । कीन्हो कृपा नाथ तब चीन्हो ।।
वसि रसना बनि सारद-काली । दीन्यो वर राख्यो मम लाली ।।

धन्य धन्य भैरव भय भंजन । जय मनरंजन खल दल भंजन ।।
कर त्रिशूल डमरु शुचि कोड़ा । कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोड़ा ।।

जो भैरव निर्भय गुण गावत । अष्टसिद्घि नवनिधि फल पावत ।।
रुप विशाल कठिन दुख मोचन । क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन ।।

अगणित भूत प्रेत संग डोलत । बं बं बं शिव बं बं बोतल ।।
रुद्रकाय काली के लाला । महा कालहू के हो काला ।।

बटुक नाथ हो काल गंभीरा । श्वेत, रक्त अरु श्याम शरीरा।।
करत तीनहू रुप प्रकाशा । भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा।।

रत्न जड़ित कंचन सिंहासन । व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ।।
तुमहि जाई काशिहिं जन ध्यावहिं । विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं ।।

जय प्रभु संहारक सुनन्द जय । जय उन्नत हर उमानन्द जय ।।
भीम त्रिलोकन स्वान साथ जय । बैजनाथ श्री जगतनाथ जय ।।

महाभीम भीषण शरीर जय । रुद्र त्र्यम्बक धीर वीर जय ।।
अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय । श्वानारुढ़ सयचन्द्र नाथ जय ।।

निमिष दिगम्बर चक्रनाथ जय । गहत अनाथन नाथ हाथ जय ।।
त्रेशलेश भूतेश चन्द्र जय । क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ।।

श्री वामन नकुलेश चण्ड जय । कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ।।
रुद्र बटुक क्रोधेश काल धर । चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ।।

करि मद पान शम्भु गुणगावत । चौंसठ योगिन संग नचावत ।।
करत कृपा जन पर बहु ढंगा । काशी कोतवाल अड़बंगा ।।

देयं काल भैरव जब सोटा । नसै पाप मोटा से मोटा ।।
जाकर निर्मल होय शरीरा। मिटै सकल संकट भव पीरा ।।

श्री भैरव भूतों के राजा । बाधा हरत करत शुभ काजा ।।
ऐलादी के दुःख निवारयो । सदा कृपा करि काज सम्हारयो ।।

सुन्दरदास सहित अनुरागा । श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ।।
श्री भैरव जी की जय लेख्यो । सकल कामना पूरण देख्यो ।।

।। दोहा ।।
जय जय जय भैरव बटुक, स्वामी संकट टार ।
कृपा दास पर कीजिये, शंकर के अवतार ।।

जो यह चालीसा पढ़े, प्रेम सहित सत बार ।
उस घर सर्वानन्द हों, वैभव बड़े अपार ।।

।। इति श्री भैरव चालीसा समाप्त ।।

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श्री चित्रगुप्त चालीसा

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।। दोहा ।।
सुमिर चित्रगुप्त ईश को, सतत नवाऊ शीश।
ब्रह्मा विष्णु महेश सह, रिनिहा भए जगदीश ।।

करो कृपा करिवर वदन, जो सरशुती सहाय।
चित्रगुप्त जस विमलयश, वंदन गुरूपद लाय ।।

।।चौपाई ।।
जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर । जय यमेश दिगंत उजागर ।।
अज सहाय अवतरेउ गुसांई । कीन्हेउ काज ब्रम्ह कीनाई ।।

श्रृष्टि सृजनहित अजमन जांचा । भांति-भांति के जीवन राचा ।।
अज की रचना मानव संदर । मानव मति अज होइ निरूत्तर ।।

भए प्रकट चित्रगुप्त सहाई । धर्माधर्म गुण ज्ञान कराई ।।
राचेउ धरम धरम जग मांही । धर्म अवतार लेत तुम पांही ।।

अहम विवेकइ तुमहि विधाता । निज सत्ता पा करहिं कुघाता ।।
श्रष्टि संतुलन के तुम स्वामी । त्रय देवन कर शक्ति समानी ।।

पाप मृत्यु जग में तुम लाए । भयका भूत सकल जग छाए ।।
महाकाल के तुम हो साक्षी । ब्रम्हउ मरन न जान मीनाक्षी ।।

धर्म कृष्ण तुम जग उपजायो । कर्म क्षेत्र गुण ज्ञान करायो ।।
राम धर्म हित जग पगु धारे । मानवगुण सदगुण अति प्यारे ।।

विष्णु चक्र पर तुमहि विराजें । पालन धर्म करम शुचि साजे ।।
महादेव के तुम त्रय लोचन । प्रेरकशिव अस ताण्डव नर्तन ।।

सावित्री पर कृपा निराली । विद्यानिधि माॅं सब जग आली ।।
रमा भाल पर कर अति दाया । श्रीनिधि अगम अकूत अगाया ।।

ऊमा विच शक्ति शुचि राच्यो । जाकेबिन शिव शव जग बाच्यो ।।
गुरू बृहस्पति सुर पति नाथा । जाके कर्म गहइ तव हाथा ।।

रावण कंस सकल मतवारे । तव प्रताप सब सरग सिधारे ।।
प्रथम् पूज्य गणपति महदेवा । सोउ करत तुम्हारी सेवा ।।

रिद्धि सिद्धि पाय द्वैनारी । विघ्न हरण शुभ काज संवारी ।।
व्यास चहइ रच वेद पुराना । गणपति लिपिबध हितमन ठाना ।।

पोथी मसि शुचि लेखनी दीन्हा । असवर देय जगत कृत कीन्हा ।।
लेखनि मसि सह कागद कोरा । तव प्रताप अजु जगत मझोरा ।।

विद्या विनय पराक्रम भारी । तुम आधार जगत आभारी ।।
द्वादस पूत जगत अस लाए । राशी चक्र आधार सुहाए ।।

जस पूता तस राशि रचाना । ज्योतिष केतुम जनक महाना ।।
तिथी लगन होरा दिग्दर्शन । चारि अष्ट चित्रांश सुदर्शन ।।

राशी नखत जो जातक धारे । धरम करम फल तुमहि अधारे।।
राम कृष्ण गुरूवर गृह जाई । प्रथम गुरू महिमा गुण गाई ।।

श्री गणेश तव बंदन कीना । कर्म अकर्म तुमहि आधीना ।।
देववृत जप तप वृत कीन्हा । इच्छा मृत्यु परम वर दीन्हा ।।

धर्महीन सौदास कुराजा । तप तुम्हार बैकुण्ठ विराजा ।।
हरि पद दीन्ह धर्म हरि नामा । कायथ परिजन परम पितामा ।।

शुर शुयशमा बन जामाता । क्षत्रिय विप्र सकल आदाता ।।
जय जय चित्रगुप्त गुसांई । गुरूवर गुरू पद पाय सहाई ।।

जो शत पाठ करइ चालीसा । जन्ममरण दुःख कटइ कलेसा ।।
विनय करैं कुलदीप शुवेशा । राख पिता सम नेह हमेशा ।।

।। दोहा ।।
ज्ञान कलम, मसि सरस्वती, अंबर है मसिपात्र।
कालचक्र की पुस्तिका, सदा रखे दंडास्त्र।।

पाप पुन्य लेखा करन, धार्यो चित्र स्वरूप।
श्रृष्टिसंतुलन स्वामीसदा, सरग नरक कर भूप।।

।। इति श्री चित्रगुप्त चालीसा समाप्त ।।

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श्री गणेश चालीसा

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।। दोहा ।।
जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।
विघ्न हरण मंगल करण,जय जय गिरिजालाल।।

।। चौपाई ।।
जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू।।
जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्घि विधाता।।

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन।।
राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला।।

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं।।
सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित।।

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता।।
ऋद्घि-सिद्घि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्घारे।।

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी।।
एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी।।

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्घिज रुपा।।
अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी।।

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा।।
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्घि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला।।

गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रुप भगवाना।।
अस कहि अन्तर्धान रुप है। पलना पर बालक स्वरुप है।।

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना।।
सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं।।

शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं।।
लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा।।

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं।।
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो।।

कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई।।
नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ।।

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा। बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा।।
गिरिजा गिरीं विकल है धरणी। सो दुख दशा गयो नहीं वरणी।।

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा।।
तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये।।

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण, मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो।।
नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्घि निधि, वन दीन्हे।।

बुद्घि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा।।
चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्घि उपाई।।

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे।।
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें।।

तुम्हरी महिमा बुद्घि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई।।
मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी।।

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दर्वासा।।
अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै।।

श्री गणेश यह चालीसा।पाठ करै कर ध्यान।।
नित नव मंगल गृह बसै।लहे जगत सन्मान।।

।। दोहा ।।
सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।
पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश।।

।। इति श्री गणेश चालीसा समाप्त ।।

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श्री सरस्वती चालीसा

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।। चौपाई ।।
जय श्रीसकल बुद्घि बलरासी । जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ।।
जय जय जय वीणाकर धारी । करती सदा सुहंस सवारी ।।

रुप चतुर्भुज धारी माता । सकल विश्व अन्दर विख्याता ।।
जग में पाप बुद्घि जब होती । तबहि धर्म की फीकी ज्योति ।।

तबहि मातु का निज अवतारा । पाप हीन करती महितारा ।।
बाल्मीकि जी थे हत्यारा । तव प्रसाद जानै संसारा ।।

रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि पदवी को पाई ।।
कालिदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता ।।

तुलसी सूर आदि विद्घाना । और भये जो ज्ञानी नाना ।।
तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अमबा ।।

करहु कृपा सोई मातु भवानी । दुखित दीन निज दासहिं जानी ।।
पुत्र करइ अपराध बहूता । तेहि न धरइ चित एकउ माता ।।

राखु लाज जननी अब मेरी । विनय करउं भांति बहुतेरी ।।
मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदम्बा ।।

मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्घ विष्णु से ठाना ।।
समर हजार पांच में घोरा । फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा ।।

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला । बुद्घि विपरीत भई खलहाला ।।
तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ।।

चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता ।।
रक्तबीज से समरथ पापी । सुर मुन हृदय धरा सब कांपी ।।

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा । बार बार बिनवउं जगदंबा ।।
जगप्रसिद्घ जो शुंभ निशुंभा । क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा ।।

भरत-मातु बुद्घि फेरेउ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई ।।
एहि विधि रावन वध तू कीन्हा । सुन नर मुनि सबको सुख दीन्हा ।।

को समरथ तव यश गुन गाना । निगम अनादि अनंत बखाना ।।
विष्णु रुद्र जस सकैं न मारी । जिनकी हो तुम रक्षाकारी ।।

रक्त दन्तिका और शताक्षी । नाम अपार है दानवभक्षी ।।
दुर्गम काज धरा पर कीन्हा । दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ।।

दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता ।।
नृप कोपित को मारन चाहै । कानन में घेरे मृग नाहै ।।

सागर मध्य पोत के भंगे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे ।।
भूत प्रेत बाधा या दुःख में । हो दरिद्र अथवा संकट में ।।

नाम जपे मंगल सब होई । संशय इसमें करइ न कोई ।।
पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई ।।

करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ।।
धूपादिक नैवेघ चढ़ावै । संकट रहित अवश्य हो जावै ।।

भक्ति मातु की करै हमेशा । निकट न आवै ताहि कलेशा ।।
बंदी पाठ करै सत बारा । बंदी पाश दूर हो सारा ।।

रामसागर बांधि हेतु भवानी । कीजै कृपा दास निज जानी ।।

।। दोहा ।।
मातु सूर्य कान्त तव, अन्धकार मम रुप ।
डूबन से रक्षा करहु परुं न मैं भव कूप ।।

बलबुद्घि विघा देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु ।
रामसागर अधम को आश्रय तू दे दातु ।।

।। इति श्री सरस्वती चालीसा समाप्त ।।
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श्री लक्ष्मी चालीसा

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।। चौपाई ।।
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही । ज्ञान बुद्घि विघा दो मोही ।।
तुम समान नहिं कोई उपकारी । सब विधि पुरवहु आस हमारी ।।

जय जय जगत जननि जगदम्बा । सबकी तुम ही हो अवलम्बा ।।
तुम ही हो सब घट घट वासी । विनती यही हमारी खासी ।।

जगजननी जय सिन्धु कुमारी । दीनन की तुम हो हितकारी ।।
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी । कृपा करौ जग जननि भवानी ।।

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी ।।
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी । जगजननी विनती सुन मोरी ।।

ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता । संकट हरो हमारी माता ।।
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो । चैदह रत्न सिन्धु में पायो ।।

चौदह रत्न में तुम सुखरासी । सेवा कियो प्रभु बनि दासी ।।
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा । रुप बदल तहं सेवा कीन्हा ।।

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा । लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ।।
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं । सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ।।

अपनाया तोहि अन्तर्यामी । विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ।।
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी । कहं लौ महिमा कहौं बखानी ।।

मन क्रम वचन करै सेवकाई । मन इच्छित वांछित फल पाई ।।
तजि छल कपट और चतुराई । पूजहिं विविध भांति मनलाई ।।

और हाल मैं कहौं बुझाई । जो यह पाठ करै मन लाई ।।
ताको कोई कष्ट न होई । मन इच्छित पावै फल सोई ।।

त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि । त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी ।।
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै । ध्यान लगाकर सुनै सुनावै ।।

ताकौ कोई न रोग सतावै । पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ।।
पुत्रहीन अरु संपति हीना । अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना ।।

विप्र बोलाय कै पाठ करावै । शंका दिल में कभी न लावै ।।
पाठ करावै दिन चालीसा । ता पर कृपा करैं गौरीसा ।।

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै । कमी नहीं काहू की आवै ।।
बारह मास करै जो पूजा । तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ।।

प्रतिदिन पाठ करै मन माही । उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं ।।
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई । लेय परीक्षा ध्यान लगाई ।।

करि विश्वास करै व्रत नेमा । होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा ।।
जय जय जय लक्ष्मी भवानी । सब में व्यापित हो गुण खानी ।।

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं । तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं ।।
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै । संकट काटि भक्ति मोहि दीजै ।।

भूल चूक करि क्षमा हमारी । दर्शन दजै दशा निहारी ।।
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी । तुमहि अछत दुःख सहते भारी ।।

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में । सब जानत हो अपने मन में ।।
रुप चतुर्भुज करके धारण । कष्ट मोर अब करहु निवारण ।।

केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई । ज्ञान बुद्घि मोहि नहिं अधिकाई ।।

।। दोहा ।।
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास ।
जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश ।।

रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर ।
मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर ।।

।। इति श्री लक्ष्मी चालीसा समाप्त ।।
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श्री गायत्री चालीसा

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।। दोहा ।।
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचण्ड।।
शान्ति कान्ति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखण्ड।।

जगत जननी मङ्गल करनि गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम।।

।। चौपाई ।।
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। गायत्री नित कलिमल दहनी।।
अक्षर चैविस परम पुनीता। इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता।।

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। सत्य सनातन सुधा अनूपा।।
हंसारूढ श्वेताम्बर धारी। स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी।।

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला।।
ध्यान धरत पुलकित हित होई। सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई।।

कामधेनु तुम सुर तरु छाया। निराकार की अद्भुत माया।।
तुम्हरी शरण गहै जो कोई। तरै सकल संकट सों सोई।।

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। दिपै तुम्हारी ज्योति निराली।।
तुम्हरी महिमा पार न पावैं। जो शारद शत मुख गुन गावैं।।

चार वेद की मात पुनीता। तुम ब्रह्माणी गौरी सीता।।
महामन्त्र जितने जग माहीं। कोउ गायत्री सम नाहीं।।

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। आलस पाप अविद्या नासै।।
सृष्टि बीज जग जननि भवानी। कालरात्रि वरदा कल्याणी।।

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। तुम सों पावें सुरता तेते।।
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे।।

महिमा अपरम्पार तुम्हारी। जय जय जय त्रिपदा भयहारी।।
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। तुम सम अधिक न जगमे आना।।

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा।।
जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। पारस परसि कुधातु सुहाई।।

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। माता तुम सब ठौर समाई।।
ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे।।

सकल सृष्टि की प्राण विधाता। पालक पोषक नाशक त्राता।।
मातेश्वरी दया व्रत धारी। तुम सन तरे पातकी भारी।।

जापर कृपा तुम्हारी होई। तापर कृपा करें सब कोई।।
मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। रोगी रोग रहित हो जावें।।

दरिद्र मिटै कटै सब पीरा। नाशै दुःख हरै भव भीरा।।
गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। नासै गायत्री भय हारी।।

सन्तति हीन सुसन्तति पावें। सुख संपति युत मोद मनावें।।
भूत पिशाच सबै भय खावें। यम के दूत निकट नहिं आवें।।

जो सधवा सुमिरें चित लाई। अछत सुहाग सदा सुखदाई।।
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। विधवा रहें सत्य व्रत धारी।।

जयति जयति जगदंब भवानी। तुम सम और दयालु न दानी।।
जो सतगुरु सो दीक्षा पावे। सो साधन को सफल बनावे।।

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी। लहै मनोरथ गृही विरागी।।
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। सब समर्थ गायत्री माता।।

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। आरत अर्थी चिन्तित भोगी।।
जो जो शरण तुम्हारी आवें। सो सो मन वांछित फल पावें।।

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। धन वैभव यश तेज उछाउ।।
सकल बढें उपजें सुख नाना। जे यह पाठ करै धरि ध्याना।।

।। दोहा ।।
यह चालीसा भक्तियुत पाठ करै जो कोई।
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय ।।

।। इति श्री गायत्री चालीसा समाप्त ।।
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श्री शीतला चालीसा

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।। दोहा ।।
जय जय माता शीतला तुमही धरे जो ध्यान।
होय बिमल शीतल हृदय विकसे बुद्धी बल ज्ञान ।।

घट घट वासी शीतला शीतल प्रभा तुम्हार।
शीतल छैंय्या शीतल मैंय्या पल ना दार ।।

।। चौपाई ।।
जय जय श्री शीतला भवानी । जय जग जननि सकल गुणधानी ।।
गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजती । पूरन शरन चंद्रसा साजती ।।

विस्फोटक सी जलत शरीरा । शीतल करत हरत सब पीड़ा ।।
मात शीतला तव शुभनामा । सबके काहे आवही कामा ।।

शोक हरी शंकरी भवानी । बाल प्राण रक्षी सुखदानी ।।
सूचि बार्जनी कलश कर राजै । मस्तक तेज सूर्य सम साजै ।।

चौसट योगिन संग दे दावै । पीड़ा ताल मृदंग बजावै ।।
नंदिनाथ भय रो चिकरावै । सहस शेष शिर पार ना पावै ।।

धन्य धन्य भात्री महारानी । सुर नर मुनी सब सुयश बधानी ।।
ज्वाला रूप महाबल कारी । दैत्य एक विश्फोटक भारी ।।

हर हर प्रविशत कोई दान क्षत । रोग रूप धरी बालक भक्षक ।।
हाहाकार मचो जग भारी । सत्यो ना जब कोई संकट कारी ।।

तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा । कर गई रिपुसही आंधीनी सूपा ।।
विस्फोटक हि पकड़ी करी लीन्हो । मुसल प्रमाण बहु बिधि कीन्हो ।।

बहु प्रकार बल बीनती कीन्हा । मैय्या नहीं फल कछु मैं कीन्हा ।।
अब नही मातु काहू गृह जै हो । जह अपवित्र वही घर रहि हो ।।

पूजन पाठ मातु जब करी है । भय आनंद सकल दुःख हरी है ।।
अब भगतन शीतल भय जै हे । विस्फोटक भय घोर न सै हे ।।

श्री शीतल ही बचे कल्याना । बचन सत्य भाषे भगवाना ।।
कलश शीतलाका करवावै । वृजसे विधीवत पाठ करावै ।।

विस्फोटक भय गृह गृह भाई । भजे तेरी सह यही उपाई ।।
तुमही शीतला जगकी माता । तुमही पिता जग के सुखदाता ।।

तुमही जगका अतिसुख सेवी । नमो नमामी शीतले देवी ।।
नमो सूर्य करवी दुख हरणी । नमो नमो जग तारिणी धरणी ।।

नमो नमो ग्रहोंके बंदिनी । दुख दारिद्रा निस निखंदिनी ।।
श्री शीतला शेखला बहला । गुणकी गुणकी मातृ मंगला ।।

मात शीतला तुम धनुधारी । शोभित पंचनाम असवारी ।।
राघव खर बैसाख सुनंदन । कर भग दुरवा कंत निकंदन ।।

सुनी रत संग शीतला माई । चाही सकल सुख दूर धुराई ।।
कलका गन गंगा किछु होई । जाकर मंत्र ना औषधी कोई ।।

हेत मातजी का आराधन । और नही है कोई साधन ।।
निश्चय मातु शरण जो आवै । निर्भय ईप्सित सो फल पावै ।।

कोढी निर्मल काया धारे । अंधा कृत नित दृष्टी विहारे ।।
बंधा नारी पुत्रको पावे । जन्म दरिद्र धनी हो जावे ।।

सुंदरदास नाम गुण गावत । लक्ष्य मूलको छंद बनावत ।।
या दे कोई करे यदी शंका । जग दे मैंय्या काही डंका ।।

कहत राम सुंदर प्रभुदासा । तट प्रयागसे पूरब पासा ।।
ग्राम तिवारी पूर मम बासा । प्रगरा ग्राम निकट दुर वासा ।।

अब विलंब भय मोही पुकारत । मातृ कृपाकी बाट निहारत ।।
बड़ा द्वार सब आस लगाई । अब सुधि लेत शीतला माई ।।

यह चालीसा शीतला पाठ करे जो कोय ।
सपनेउ दुःख व्यापे नही नित सब मंगल होय ।।

बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल भाल भल किंतू ।
जग जननी का ये चरित रचित भक्ति रस बिंतू ।।

।। इति श्री शीतला चालीसा समाप्त।।

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श्री राम चालीसा

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।। चौपाई ।।
श्री रघुवीर भक्त हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।
निशिदिन ध्यान धरै जो कोई । ता सम भक्त और नहिं होई ।।

ध्यान धरे शिवजी मन माहीं । ब्रहृ इन्द्र पार नहिं पाहीं ।।
दूत तुम्हार वीर हनुमाना । जासु प्रभाव तिहूं पुर जाना ।।

तब भुज दण्ड प्रचण्ड कृपाला । रावण मारि सुरन प्रतिपाला ।।
तुम अनाथ के नाथ गुंसाई । दीनन के हो सदा सहाई ।।

ब्रहादिक तव पारन पावैं । सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ।।
चारिउ वेद भरत हैं साखी । तुम भक्तन की लज्जा राखीं ।।

गुण गावत शारद मन माहीं । सुरपति ताको पार न पाहीं ।।
नाम तुम्हार लेत जो कोई । ता सम धन्य और नहिं होई ।।

राम नाम है अपरम्पारा । चारिहु वेदन जाहि पुकारा ।।
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो । तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो ।।

शेष रटत नित नाम तुम्हारा । महि को भार शीश पर धारा ।।
फूल समान रहत सो भारा । पाव न कोऊ तुम्हरो पारा ।।

भरत नाम तुम्हरो उर धारो । तासों कबहुं न रण में हारो ।।
नाम शक्षुहन हृदय प्रकाशा । सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ।।

लखन तुम्हारे आज्ञाकारी । सदा करत सन्तन रखवारी ।।
ताते रण जीते नहिं कोई । युद्घ जुरे यमहूं किन होई ।।

महालक्ष्मी धर अवतारा । सब विधि करत पाप को छारा ।।
सीता राम पुनीता गायो । भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ।।

घट सों प्रकट भई सो आई । जाको देखत चन्द्र लजाई ।।
सो तुमरे नित पांव पलोटत । नवो निद्घि चरणन में लोटत ।।

सिद्घि अठारह मंगलकारी । सो तुम पर जावै बलिहारी ।।
औरहु जो अनेक प्रभुताई । सो सीतापति तुमहिं बनाई ।।

इच्छा ते कोटिन संसारा । रचत न लागत पल की बारा ।।
जो तुम्हे चरणन चित लावै । ताकी मुक्ति अवसि हो जावै ।।

जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा । नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा ।।
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी । सत्य सनातन अन्तर्यामी ।।

सत्य भजन तुम्हरो जो गावै । सो निश्चय चारों फल पावै ।।
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं । तुमने भक्तिहिं सब विधि दीन्हीं ।।

सुनहु राम तुम तात हमारे । तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे ।।
तुमहिं देव कुल देव हमारे । तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ।।

जो कुछ हो सो तुम ही राजा । जय जय जय प्रभु राखो लाजा ।।
राम आत्मा पोषण हारे । जय जय दशरथ राज दुलारे ।।

ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा । नमो नमो जय जगपति भूपा ।।
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा । नाम तुम्हार हरत संतापा ।।

सत्य शुद्घ देवन मुख गाया । बजी दुन्दुभी शंख बजाया ।।
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन । तुम ही हो हमरे तन मन धन ।।

याको पाठ करे जो कोई । ज्ञान प्रकट ताके उर होई ।।
आवागमन मिटै तिहि केरा । सत्य वचन माने शिर मेरा ।।

और आस मन में जो होई । मनवांछित फल पावे सोई ।।
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै । तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ।।

साग पत्र सो भोग लगावै । सो नर सकल सिद्घता पावै ।।
अन्त समय रघुबरपुर जाई । जहां जन्म हरि भक्त कहाई ।।

श्री हरिदास कहै अरु गावै । सो बैकुण्ठ धाम को पावै ।।

।। दोहा ।।
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय ।
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय ।।

राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय ।
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्घ हो जाय ।।

।। इति श्री राम चालीसा समाप्त ।।
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श्री शनि चालीसा

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।। चौपाई ।।
जयति जयति शनिदेव दयाला । करत सदा भक्तन प्रतिपाला ।।
चारि भुजा, तनु श्याम विराजै । माथे रतन मुकुट छवि छाजै ।।

परम विशाल मनोहर भाला । टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ।।
कुण्डल श्रवण चमाचम चमके । हिये माल मुक्तन मणि दमके ।।

कर में गदा त्रिशूल कुठारा । पल बिच करैं आरिहिं संहारा ।।
पिंगल, कृष्णों, छाया, नन्दन । यम, कोणस्थ, रौद्र, दुख भंजन ।।

सौरी, मन्द, शनि, दश नामा । भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ।।
जा पर प्रभु प्रसन्न है जाहीं । रंकहुं राव करैंक्षण माहीं ।।

पर्वतहू तृण होई निहारत । तृण हू को पर्वत करि डारत ।।
राज मिलत बन रामहिं दीन्हो । कैकेइहुं की मति हरि लीन्हों ।।

बनहूं में मृग कपट दिखाई । मातु जानकी गई चतुराई ।।
लखनहिं शक्ति विकल करि डारा । मचिगा दल में हाहाकारा ।।

रावण की गति-मति बौराई । रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ।।
दियो कीट करि कंचन लंका । बजि बजरंग बीर की डंका ।।

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा । चित्र मयूर निगलि गै हारा ।।
हार नौलाखा लाग्यो चोरी । हाथ पैर डरवायो तोरी ।।

भारी दशा निकृष्ट दिखायो । तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो ।।
विनय राग दीपक महं कीन्हों । तब प्रसन्न प्रभु है सुख दीन्हों ।।

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी । आपहुं भरे डोम घर पानी ।।
तैसे नल परदशा सिरानी । भूंजी-मीन कूद गई पानी ।।

श्री शंकरहि गहयो जब जाई । पार्वती को सती कराई ।।
तनिक विलोकत ही करि रीसा । नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ।।

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी । बची द्रौपदी होति उघारी ।।
कौरव के भी गति मति मारयो । युद्घ महाभारत करि डारयो ।।

रवि कहं मुख महं धरि तत्काला । लेकर कूदि परयो पाताला ।।
शेष देव-लखि विनती लाई । रवि को मुख ते दियो छुड़ई ।।

वाहन प्रभु के सात सुजाना । जग दिग्ज गर्दभ मृग स्वाना ।।
जम्बुक सिंह आदि नखधारी । सो फल जज्योतिष कहत पुकारी ।।

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं । हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं ।।
गर्दभ हानि करै बहु काजा । गर्दभ सिद्घ कर राज समाजा ।।

जम्बुक बुद्घि नष्ट कर डारै । मृग दे कष्ट प्रण संहारै ।।
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी । चोरी आदि होय डर भारी ।।

तैसहि चारि चरण यह नामा । स्वर्ण लौह चांजी अरु तामा ।।
लौह चरण पर जब प्रभु आवैं । धन जन सम्पत्ति नष्ट करावै ।।

समता ताम्र रजत शुभकारी । स्वर्ण सर्व सुख मंगल कारी ।।
जो यह शनि चरित्र नित गावै । कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ।।

अदभुत नाथ दिखावैं लीला । करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ।।
जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई । विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ।।

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत । दीप दान दै बहु सुख पावत ।।
कहत रामसुन्दर प्रभु दासा । शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ।।

॥ दोहा ॥
पाठ शनिश्चर देव को, की हों विमल तैयार ।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ।।

।। इति श्री शनि चालीसा समाप्त ।।
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