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प्राचीन भारतीय संगीत वाद्य और उनका वर्गीकरण

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संगीत में वाद्य का स्थान अतुलनीय है। वाद्य का निर्माण संगीत की ध्वनि निकालने के प्रयोजन के लिये हुआ था। वाद्य द्वारा लय बद्ध तरीक़े से निर्मित संगीतमय ध्वनि को उत्पन्न करने का कार्य किया जाता था। वाद्य का इतिहास, मानव संस्कृति की शुरुआत से प्रारम्भ हुआ था।

ऐसी मान्यताए है कि हिन्दू देवी देवता भी संगीत के वाद्य यंत्र बजाते थे – श्री कृष्ण वाँसुरी बजाते थे एवं वे सदा ही अपने साथ बासुरी रखते थे। माँ सरस्वती हमेशा वीणा अपने साथ रखती हैं। शिव जी का डमरु उनके त्रिशूल की शोभा बढाता है। पोराणिक मान्यताओ को माने तो त्रिदेव भगवान – ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने ढोल का निर्माण किया था।

वाद्य में संगीत को किसी अन्य सहायक कला के बिना भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने का साम्र्ध्य प्राप्त है। वाद्य से निकलने वाली संगीतमय ध्वनि ही वाद्य को आकर्षक बना देती है। इस लिए संगीत जगत में वाद्य का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।

भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्य जैस वाँसुरी , वीणा , ढोल , हारमोनियम , गितार , सरंगी , तबला इत्यादि ना जाने कितने ही वाद्यों के बारे में हम जानते है। लेकिन क्या आपको पता है कि संगीत को रोचक बनाने वाले इन वाद्यों को किस प्रकार वर्गीकृत किया गया था? संगीत जगत के प्रमुख ग्रन्थकार “भरतमुनि, दत्तिल, पीड़ित शारंगदेव“ इत्यादि ने अपने ग्रन्थों में विभिन्न प्रकार की ध्वनि के उत्पादन एवं गुण की भिन्नता के आधार पर वाद्यों को चार वर्गों मे बाटा है –


तत् वाद्य यंत्र -

धातु के तार या पशु स्नायु से बने ताँत से युक्त होते है, जिन्हें तारो पर नख, मिज़रव या कोण के आधत से ध्वनि उत्पन्न करके बजाया जाता है। प्राचीन समय में तत् वाद्य के अन्तर्गत – प्राचीन मटकोकिल , एकतंत्री , विपची , किनारे, वीणा इत्यादि आते थे और वर्तमान समय में सितार , सरोद , सरंगी , वायलन इत्यादि आते है।

सुषिर वाद्य यंत्र -

छेदों वाले वाद्य होते है जिनमे फूँककर या वायु के दबाव से ध्वनि उत्पन्न की जाती है। प्राचीन समय में सुषिर वाद्य के अन्तर्गत – बाँसुरी, वेणु , नफ़ीरी इत्यादि आते थे,और वर्तमान समय में बाँसुरी, शहनाई, बीन और हारमोनियम आते है।

घन वाद्य यंत्र -

किसी धातु के ठोस टुकडो को परस्पर टकराकर या किसी अन्य ठोस पदार्थ से प्रहार करके या हिला डुला कर ध्वनि उत्पन्न करके बजाया जाता है ।
प्राचीन समय में घन वाद्य के अन्तर्गत – थाल, झाँझ, करताल इत्यादि आते थे और वर्तमान समय में मंजीरा घंटा इत्यादि आते है।


अवनद्ध वाद्ययंत्र -

वह वाद्य होते है जो भीतर से पोल होते है और जिनके मुख पर चमड़ा मढ़ा होता है। उनकी स्वरोत्पति उँगलियों, छड़ी या अन्य किसी वस्तु के आधात से उत्पन्न करके बजाया जाता है । प्राचीन समय मे अवनद्ध वाद्य के अन्तर्गत – त्रिपुष्कर, मृदंग, पटह, ढोल, नगाड़ा इत्यादि आते थे। और वर्तमान समय में पखावज , ढोलक, ड्रम, तबला इत्यादि आते है।

वाद्य का क्षेत्र अत्य्न्न्त व्यापक है। संगीत जगत में कुछ एसे वाद्य भी है जिनका प्रयोग स्वतन्त्र रूप के साथ साथ, किसी अन्य वाद्य की संगति के लिये भी किया जाता है। संगीत की अन्य कलायें जैसे गायन, वादन, नृत्य के साथ साथ नाटक और धार्मिक कार्य मे भी इन वाद्यों का महत्वपूर्ण स्थान है । इन अद्धभूद वाद्यों का महत्व केवल उनका वादन मात्र ही नहीं है अपितु ये वाद्य समृद्ध सांस्कृति का भी प्रतिबिम्ब हैं। इन वाद्यों के बारे में जानकर, उनका विकास करना न सिर्फ हमारा दायित्व भी है अपितु हमारा कर्तव्य भी है। क्योंकि हमारे जीवन में वाद्यों का महत्वपूर्ण अस्तित्व है ।






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हमारे जीवन में संगीत का महत्व

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जब प्राचीन समय में सृष्टि का आरंभ हुआ तब ना तो कोई भाषा का आविष्कार हुआ था और ना तो लिपि का। जानते है तब इन्सान अपने विचार और अपनी भावना को दूसरों से कैसे व्यक्त करता था? “ध्वनि के उतार चढ़ाव और अपने हाव भाव से”। ध्वनि का उतार चढ़ाव और अंगित मुद्रा का यही प्रदर्शन दरासल संगीत के आविष्कार का प्रथम चरण था।

जैसा की आप सभी जानते हैं कि संगीत के सात स्वर सा रे गा म प ध नी और पाश्चात्य संगीत के सात स्वर डो रे मी फ सो ला सी है। संगीत के यें सात स्वरों द्वारा भाव रस एव भावना को अभिव्यक्त किया जा सकता हैं। इन स्वर समूहों से निर्मित गीत भिन्न भिन्न भावना को प्रस्तुत करते हैं । उस समय जब दूरसंचार और आधुनिक मशीन का आविष्कार नहीं हुआ था तब सन्देश के लिये अलग अलग प्रकार की ध्वनि का वादन एव नृत्य के माध्यम से आपत्ति विपत्ति की सूचना देने का कार्य किया जाता था। आधुनिक समय मे भरतनाट्यम नामक एक नृत्य इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण हैं जिसमें नर्तक नृत्य के माध्यम से भगवान कृष्ण की कहानी का चित्रण करता है ।

गीत (राग), वाध (वादन) एव मुद्रा ( नृत्य) तीनो संगीत है। एक शोध से यह स्पष्ट हुआ है की संगीत में इंसान की भावनाओ और मनोदशाओं को परिवर्तित करने की छमता है।

दुखी इंसान को शृंगारिक राग सुनाकर उसकी मानसिक दशा मे सहज परिवर्तन किया जा सकता है। इसी प्रकार दुनिया भर में कईमनोचिकित्सक अपने मरीज़ के लिये संगीत का उपयोग करते है। संगीत से कई मानसिक बीमारियों का इलाज किया जा सकता है।

आजकल लोग फल और सब्ज़ी की खेती के दौरान संगीत का उपयोग करते है और जानवरो में भी नियमित संगीत सुनाकर उनकी दूध देने की छमता को बढ़ाया जा रहा है। संगीत से बोलचाल की भाषा भी ना समझने वाला शिशु भी अपनी माँ की मधुर सुर में लोरी सुन कर अपना रुदन भूल जाता है। संगीत एक मात्र साधन है जिसके द्वारा इंसान अपनी थकान ,द्वन्द , उलझनऔर पीढ़ा से ना केवल मुक्ति पा सकता है अपितु उन पर विजय प्राप्त करकेआगे भी बढ़ सकता है।

संगीत सीखने का अर्थ यह नहीं है की आप उसे अपना व्यवसाय बनाये , कैरियर के रूप मे आप कोई भी व्यवसाय चुने परन्तु अपने कोमल एव सुकुमारभावो की अभिव्यक्ति हेतु संगीत ही चुने। सुन्दर संगीत आत्मा का विकास करता है और चरित्र का निर्माण करता है। इसलिये संगीत हमारे जीवन में अत्यन्त महत्व रखता है।

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वैज्ञानिक उपकरणो का संगीत शिक्षा में प्रभाव

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संगीत एक कलात्मक विषय हैं जिसके अन्तर्गत गायन वादन एवम नृत्य तीनो कलायें आतीं हैं। शिक्षा एक सीखने एवम सिखाने की प्रक्रिया हैं ‘और संगीत शिक्षा का अर्थ हैं कि शिक्षक , पुस्तक या अन्य ऐसे साघन जिससे ज्ञान प्राप्त हो सके ‘से शिक्षार्थी को स्वर ,लय ताल के विषय में विस्तृत ज्ञान प्राप्त होऔर शिक्षार्थी अपने क्षमतानुसार संगीत की योग्यता प्राप्त कर सके।

संगीत शिक्षा के इतिहास पर दृष्टिकरे तो यह स्पष्ट होता हैं कि प्राचीन काल से मध्य काल तक संगीत शिक्षा गुरू – शिष्य परम्परा द्वारा दी जाती थी , मध्यकाल में जब राजनैतिक परिवर्तन के कारण राजाओं द्वारा संगीत के कलाकारों को राजश्य मिलना प्रारम्भ हुआ तब गुरु शिक्षा परम्परा की शिक्षा में नया मोड़ आया , अब राजश्य प्राप्त कलाकार अपने पश्चात अपने पुत्रों या शिष्यों को राजश्य प्राप्त हो , कि लालसा में शिक्षा प्रदान करने लगे और घराना परम्परा प्रारम्भ हो गयी जिसके कारण संगीत शिक्षा सभी को मिलना कठिन हो गयी । संगीत की यह दशा देखकर स्वं प० वि ० दी ० पुलस्क़र तथा स्वं वि० ना ० भातखंडे इन दोनो संगीत विभूतियों ने संगीत शिक्षा के प्रचार प्रसार का कार्य करने के उद्देश्य से संगीत विधालयो की स्थापना की जिससे संगीत कि शिक्षा सभी के लिये सहज- सुलभ हो सकी।

19वीसदी में जब वैज्ञानिक आविष्कारों का प्रारम्भ हुआ तब संगीत कला भी इससे अछूती नहीं रह सकी । इन वैज्ञानिक आविष्कारों ने संगीत जगत में उथल पुथल मचा दी जब फ़ोनोग्राफ़ और ग्रामोफ़ोन का आविष्कार हुआ तो संगीत को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाले मुख्य रूप से कारण रहे ‘वैज्ञानिक खोजो से उत्पन्न वैज्ञानिक उपकरण द्वारा संगीत सीखने की सर्वसुलभता। वैज्ञानिक उपकरणो के विकास से भारतीय संगीत को कई तरह से प्रभावित किया जिस कारण प्राचीन काल से चली आ रही गुरु शिष्य परम्परा या घराना परम्परा तक ही संगीत शिक्षा सीमित ना रह सकी । इन वैज्ञानिक उपकरणो का आविष्कार हुआ जिससे किसी भी प्रकार के या किसी भी संगीत प्रस्तुति को रिकार्ड कर उसे जनसाधारण के लिए उपलब्ध किया जाने लगा । सर्वप्रथम फ़ोनोग्राफ़ी ,ग्रामोफ़ोन , रिकार्ड प्लेयर , टेप रिकार्ड , रेडियो , ट्रजिस्टर, स्टीरियो , मूजिक सिस्टम आदि वैज्ञानिक उपकरणो द्वारा अन्य किसी का संगीत सुनने के लिये या अपना संगीत स्वयं को सुनने सुनाने के लिये सर्वसूलभ हो गया।

आज के वैज्ञानिक युग में Electronic technology की अत्याधुनिक Electronic ध्वनि तथा छाया उपकरणो ने संगीत की अपार सहायता की , अब तो गायन , वादन की सभाओं में अपनी कला प्रस्तुत करने वाले कलाकारी की ध्वनि एवम उसकी प्रत्यक्ष प्रस्तुति ( life telecast) हम सुन या देख सकते हैं अब तो Electronic तकनीकी के माध्यम से तानपुरा , तबला स्वरपेटि , लहरा आदि उपकरण का उपयोग सहज एव सरल हो गया हैं।

आज विज्ञान संगीत में अनेक आविष्कार कर संगीत को सरल तो कर रहा हैं परन्तु साथ ही एसे वाधो का आविष्कार भी कर रहा हैं जिनसे वर्तमान पीढ़ी बहुत प्रभावित हो रही है और परम्परा गत वाधो के प्रति थोडे उदासीन हो रही हैं । सिंथसाइज़र जैसे वाध वे वाध हैं जिनको बजाना बहुत सरल हैं इससे वाध तो क्या पूरा orchestra बजाया जा सकता हैं । वैज्ञानिक संगीत का प्रभाव समाज पर हावी हो रहा हैं फलतः इलैक्ट्रिक गिटार , आकटोपैड , कीबोड व ट्रमसैट संगीत के क्षेत्र में सहजता से प्रवेश करते जा रहे हैं जो परंपरागत वाधो का वादन गुरु के समक्ष बैठकर कठिन अभ्यास , कठोर अनुसाशन से सिखा जाता है और जिसके लिये लम्बी समय अवधि की आवश्यता है उतना धैर्य नवीन पीढ़ी में नहीं रह गया है । सहजता से बटन दबाकर तबले की आवाज़ निकल कर युवा पीढ़ी थिरकने लगती हैं तो फिर पँ अनोखेलाल , गुदई महाराज ,उ०ज़ाकिर हुसैन , इत्यादि कलाकारों के समान रियाज़ कोन करेगा ।

प्रश्न यह उठता हैं की हमारे परम्परागत वाधो में जो गुनवंता,कलात्मकता,रचनात्मकत और सरजनात्मकता हैं क्या Electronic उपकरण उनके विकल्प हो सकते हैं।

यद्यपि विज्ञान के आश्चर्यजनक उपकरण की संगीत में अहम् भूमिका हैं परन्तु फिर भी जिस प्रकार रोबोट सभी कार्य करने पर भी मनुष्य की जगह नहीं ले सकता , उसी प्रकार वैज्ञानिक उपकरण परम्परागत वाधो की बराबरी नहीं कर सकते हैं क्योंकि इन उपकरणो में जो ध्वनि हैं वो एक प्रकार की कृत्रिम ध्वनि है को स्वभाविक ध्वनि से समानता रखती है परन्तु उनमें प्राकृतिक सोंदर्य नहीं मिलता जो परम्परागत वाधो में उत्पन्न होता हैं । परम्परागत वाध सहजता से संगीत में नवरसों की सृष्टि कर सकते हैं जो वैज्ञानिक उपकरण से सम्भव नहीं हैं।

इसलिये हमें विज्ञान के इन नवीन उपकरण को परम्परागत उपकरण से जोड़ देना चाहिये, यदि परम्परागत उपकरण और नवीन उपकरण का प्रयोग साथ ही किया जाये तो वे भारतीय संस्कृति में संस्करिक ही होगा अथवा फ़्यूज़न संगीत की तरह ही एक नयी दिशा एक नया मार्ग बना लेगा , दोनो ही दिशा में भारतीय परम्परागत संगीत को हानि नहीं होगी और संगीत की अमृत धारा सदैव भारतीय संस्कृति की आत्मा से जुड़ी रहेगी।

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संगीत चिकित्सा या संगीत की हीलिंग शक्ति

 
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क्या आपने कभी शांत होने के लिए एक शांत गाना बजाया है? या उच्च ऊर्जा वाले संगीत को सुनते हुए काम किया? या एक खुश धुन को गुनगुनाया और अचानक महसूस किया कि आपका बुरा मूड गायब हो गया है? तब आपने संगीत की उपचार शक्ति का अनुभव किया है। वास्तव में, संगीत का उपयोग कुछ स्वास्थ्य चिंताओं के लिए एक चिकित्सा के रूप में किया जाता है।

संगीत चिकित्त्सा एक रचनात्मक कला चिकित्सा है, जिसमें एक ऐसी प्रक्रिया शामिल है जिसमें एक संगीत चिकित्सक संगीत का उपयोग करता है और इसके सभी पहलुओं – शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक, सामाजिक, सौंदर्य और आध्यात्मिक – ग्राहकों को उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सुधार करने में मदद करता हैं ।

संगीत चिकित्सा आमत्तोर पर एक ऐसी प्रणाली है, जिसने स्वास्थ्य देखभाल टीम का हिस्सा, एक संगीत चिकित्सक अपने लक्ष्यों तक पहुंचने के लिये और ग्राहकों के साथ काम करने के लिए, संगीत के सभी रूपों का उपयोग करता हैं और आकलन करने के बाद, वह गायन, वादन, वाद्ययंत्र, संगीत सुनना, संगीत की ओर बढ़ना, गीत या संगीत लिखना या संयोजन का उपयोग कर सकता है। संगीत चिकित्सा किसी भी उम्र में और कई स्वास्थ्य स्थितियों के साथ लोगों को लाभान्वित कर सकती है ।

संगीत चिकित्सा विशेष प्रकार से निम्न लोगों के लिए सहायक हो सकती है –
  • पुरानी बीमारी और दर्द (Chronic disease and pain) – संगीत हृदय गति और रक्तचाप को कम करने में मदद कर सकता है। यह तनाव को कम कर सकता है, हृदय रोग और मधुमेह के लिए एक प्रमुख जोखिम कारक है।
  • आत्मकेंद्रित (Autism) – संगीत फोकस को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, साथ ही चिंता और निराशा को दूर कर सकता है।
  • पार्किंसंस रोग (Parkinson’s disease) – ड्रमिंग, नृत्य और आंदोलन समूहों सहित संगीत, पार्किंसंस रोग के दुष्प्रभावों में सुधार कर सकते हैं।
  • मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे (Depression and  mental health issues) – संगीत से मन हल्का हो सकता है। यह लोगों को उनकी भावनाओं के बारे में अधिक आसानी से बात करने या सकारात्मक जीवन परिवर्तन करने में भी मदद कर सकता है।
संगीत थेरेपी के लाभ
मानसिक तनाव को कम करने से लेकर सिरदर्द और पुराने दर्द से राहत देने तक संगीत चिकित्सा कई तरह की स्थितियों से पीड़ित लोगों की मदद कर सकती है। संगीत चिकित्सा द्वारा कई प्रकार के उपचार में सहायता मिल सकती है, उदाहरण –
  • शारीरिक कार्य में सुधार
  • तनाव और चिंता में कमी
  • लोगों को आराम करने में मदद
  • नींद में सुधार
  • हर तरह के दर्द में कमी
  • याददाश्त और सोच को बड़ना
संगीत चिकित्सा का उपयोग कुछ चिकित्सा अस्पतालों, कैंसर केंद्रों, स्कूलों, शराब और नशीली दवाओं की वसूली कार्यक्रमों, मनोचिकित्सा अस्पतालों और सुधारात्मक सुविधाओं में भी किया जाता है।

संगीत को व्यापक अनुसंधान के माध्यम से संगीत चिकित्सक के लिए एक प्रभावी उपकरण माना गया है। यह किसी भी व्यक्ति के लिए, शारीरिक और मानसिक रूप से, बेहतर हृदय गति, घटी हुई चिंता, मस्तिष्क की उत्तेजना और बेहतर शिक्षा के माध्यम से लाभकारी है। संगीत चिकित्सक कई क्षेत्रों में अपने रोगियों की मदद करने के लिए अपनी तकनीक का उपयोग करते हैं ।

संगीत चिकित्सा के क्षेत्र में जो संगीत शिक्षा के क्षेत्र से उभरे हैं उनमें. अनाथ-स्कूलवर्क (orphan schoolworks), डेल्क्रोस यूरैडिक्स (dalkroos uradics ) और कोडाई पद्धति ( kodai methodology. ) शामिल है। संगीत थेरेपी से सीधे विकसित होने वाले मॉडल न्यूरोलॉजिकल म्यूज़िक थेरेपी (NMT) (Neurologic Music Therapy), नॉर्डऑफ़-रॉबिंस म्यूज़िक थेरेपी ( Nordoff-Robbins Music Therapy ) और डायरेक्टेड लैमागरी (Directed Imagery) संगीत की स्वास्थ्य विधि हैं।

संगीत चिकित्सक उन व्यक्तियों के साथ काम कर सकते हैं जिनके व्यवहार-भावनात्मक विकार हैं। इस आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए, संगीत चिकित्सकों ने वर्तमान मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों को लिया है और उन्हें विभिन्न प्रकार के संगीत चिकित्सा के आधार के रूप में उपयोग किया है। विभिन्न मॉडलों में व्यवहार थेरेपी, संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी और साइकोडायनामिक थेरेपी शामिल हैं। चिकित्सक के पास यह जिम्मेदारी होती है कि वह इस बात का मूल्यांकन करे कि ग्राहक चिकित्सा के लक्ष्यों को प्राप्त कर रहा है या नहीं और चिकित्सा के तरीके ग्राहक की मदद कर रहे हैं या नहीं।

इस प्रकार विभिन्न संगीत चिकित्सक इस दिशा में निरन्तर प्रयास रथ है, परन्तु यह पद्धति अभी तक पूर्ण रूप में स्थापित नहीं हो सकी है। संगीत चिकित्सा को विशेष रूप से स्वीकारा नहीं जा रहा है। जनमानस संगीत चिकित्सा से लाभान्वित हो इस हेतु सही ढंग से प्रचार-प्रसार एवं जनजागरण हेतु संगठित होने की आवश्यकता है, ताकी मानवकल्याण के लिए संगीत चिकित्सा पद्धति सुगठित, सुव्यवस्थित रूप से पुष्पित पल्लवित हो सके।


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समाज में संगीत का अस्तित्व

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प्रत्येक वर्ग के लोगों को मिला जुला सम समाज है। मनुष्य समाज की एक इकाई है। मनुष्य से ही समाज निर्मित होता है। प्रत्येक मानव का अपना एक समाज और संस्कृति का तानाबाना होता है। मनुष्य जन्म से तो स्वतंत्र है किन्तु हर क्षेत्र में वो बँधा है। विभिन्न दृष्टिकोण से मनुष्य जन्म से स्वतन्त्र नहीं प्रतीत होता, क्यूँकि वह आनुवंशिकता और परिवेश के बंधनो के अन्तर्गत जन्म लेता हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस समाज में जन्म लेता है उसके रीति रिवाज आचरण भाषा और संगीत को अपनाता है।

संगीत का समाज से घनिष्ठ और अटूट संबंध होता है। संगीत समाज का प्रतिनिधित्व करता है। संगीत हमारे समाज का अभिन्न अंग है परन्तु फिर भी संगीत के प्रति हमारी आधुनिक क्षीण दृष्टिकोण को हम नहीं देख पा रहे हैं। इस दृष्टिकोण में संगीत केवल मनोरंजन करने वाला एक तत्व रह गया है और कुछ नहीं।

मेरे इस लेख का मुख्य उद्देश्य, आज के समाज में संगीत के अस्तित्व को प्रकट करना है।

इसने कोई विवाद नहीं है कि समाज में संगीत मनोरंजन से लोगों को प्रभावित करता है। लोगों को प्रभावित करने के कुछ तरीके सकारात्मक हैं, लेकिन अन्य हानिकारक हैं। हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ हमेशा हानिकारक तरीके सकारात्मक को पछाड़ते हैं। यदि हम नकारात्मक से थोड़ा अधिक बार मनोरंजन के सकारात्मक रूपों की ओर बढ़ते हैं, तो हमारे समाज को कम समस्याएं होंगी। लोकप्रिय संगीत का समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और रचनात्मकता में कमी आती है। आज का सबसे लोकप्रिय संगीत हिंसा और विलासिता से प्रेरित है। संगीतकार उन एल्बमों को निर्मित कर रहे है जो हिंसा का महिमामंडन करते हैं और विलासिता को बढ़ावा देते हैं। जब एल्बम का निर्माण किया जाता है, तो कलाकार की यही सोच होती है कि यह व्यापारी को कैसे प्रभावित करेगा, आज आने वाले अधिकत्तर संगीत के बारे में आम तौर पर एक ही तथ्य सामने आता है की इसमें रचनात्मकता की कमी है क्योंकि कलाकार सिर्फ पैसा कमाने के लिए संगीत की रचना कर रहे हैं, न कि संगीत से प्यार के लिए।

यदि हम नागरिक समाज से निकलकर कुछ समय के लिये ग्रामीण समाज में रहे और उस अंचल की लोक संस्कृति का अध्ययन करे तो हम यह अनुभव करने लगेंगे की संगीत मात्र मनोरंजन का साधन नहीं , बल्कि उसकी हमारी सोच से भी अधिक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका है। गाँव का विशिष्ट जीवन संगीत से परिपूर्ण है एसा देखा जाता है कि अधिकांश समारोहों और उत्सवों पर तथा बीज बोने, धन कटाई, धन एकत्रीकरण आदि कई समारोहों पर विशिष्ट लोकगीत और लोकनृत्य पेश किए जाते हैं गानो की धुनो और लोकनृत्य प्रकारों से ग्रामीण समझ जाते है कि यह संगीत किस उपलक्ष्य में हो रहा हैं यदि हम इन धूनो और प्रकारों का संग्रह और विश्लेषण करे तो हम इस संगीत की तकनीक को समझ जाएँगे और जिससे भारतीय संस्कृति के विकास में सहायता मिल सकती हैं।

संगीत एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है, जो शब्दों से परे होती है, और उसमें अपने सामर्थ्य को साझा करने में सक्षम होती है, जिससे व्यक्तिगत, समूह, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान के विकास और रखरखाव को बढ़ावा मिलता है।संगीत व्यक्तिगत स्तर पर शक्तिशाली है क्योंकि वह कई प्रतिक्रियाओं – शारीरिक, आंदोलन, मनोदशा, भावनात्मक, संज्ञानात्मक और व्यवहार को प्रेरित कर सकता हैं।

संगीत की चिकित्सीय रूप से कार्य करने की शक्ति को लंबे समय से मान्यता प्राप्त है। संगीत थेरेपी में संगीत सुनना या सक्रिय रूप से संगीत बनाना शामिल है। इस थेरेपी के उपयोगों से रोगियों, बुजुर्गों, मस्तिष्क क्षति वाले विशेष समूहों और लगातार दर्द वाले लोगों को बड़े पैमाने पर सहायता मिली है इसका उपयोग लोगों के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए भी किया गया है जिन्हें चिकित्स द्वारा मदद नहीं मिल सकी है।

संक्षेप में, संगीत में सांस्कृति , भावनात्मक और चिकित्सा द्वारा हमारे समाज को प्रभावित करने की शक्ति है, हम अपने संगीत के माध्यम से जितनी ध्वनियाँ, संदेश, और मूड बनाते हैं और रिलीज़ करते हैं, हम उतने ही अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं, जो हमारे जीवन में गहरे सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।

संगीत हमारे समाज में एक अपरिवर्तनीय क्षमता में मौजूद है। यह हर संस्कृति, हर देश और यहां तक कि अंतरिक्ष के अंधेरे शून्य तक गहरी पहुंच के माध्यम से व्याप्त है। मानव जाति के लिए ज्ञात हर धर्म में संगीत भी मौजूद है, लेकिन क्या संगीत का हमारे समाज में वास्तविक अस्तित्व स्थापित हैं। आज लोगों के जीवन में रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, और मनोरंजन के अन्य साधनो को छोड़कर संगीत कम ही सम्मुखीन हो रहा हैं, यह दुखद है कि इस दृष्टिकोण से समाज में संगीत के अस्तित्व की उपेक्षा हो रही हैं । जिसपर समाज के प्रत्येक व्यक्ति को विचार करना अति आवश्यक हैं।


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प्राचीन समय और वर्तमान में संगीत के बीच मुख्य अंतर क्या हैं ?

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संगीत हम सभी को लुभाता है। कहा जाता है कि संगीत के पीछे भगवान चलता है। संगीत की महत्ता इसी बात से पता चल जाती है। शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जिसे संगीत पसंद न हो।

प्रचलित संगितिक ग्रन्थ पंडित शारंगदेव कृत “संगीत रत्नाकर” में संगीत की परिभाषा “गीतम, वादयम् तथा नृत्यं त्रयम संगीतमुच्यते” कहा गया है। गायन, वाद्य वादन एवम् नृत्य; तीनों कलाओं का समावेश संगीत शब्द में माना गया है ।

प्राचीन काल से संगीत का बड़ा महत्व रहा है। धार्मिक एवं सामाजिक परंपराओं में संगीत का प्रचलन होता रहा, संगीत हमारी संस्कृति की आत्मा मानी गयी है। वैदिक


काल में अध्यात्मिक संगीत को मार्गी तथा लोक संगीत को ‘देशी’ कहा जाता था। कालांतर में यही शास्त्रीय और लोक संगीत के रूप में दिखता है।

प्राचीन काल में ईश्वर आराधना हेतु भजनों के प्रयोग की परम्परा आरम्भ हुई , यहाँ तक की मन्दिर में यज्ञादि के अवसर पर भी समूहगान होते थे ।इसके अतिरिक्त प्राचीन काल में संगीत का प्रदर्शन निम्नलिखित अवसरों के दौरान किया जाता था जैसे कि: शाही दरबार में आयोजित जलसों के दौरान, संगीत समारोहों और त्योहारों में,गांवों में आयोजित मनोरंजिक कार्यक्रमों के दौरान, इत्यादि। वास्तव में संगीत की उत्पत्ति धार्मिक प्रेरणा और अनुष्ठान, सांस्कृतिक और पारंपरिक अभिव्यक्ति के लिए हुई थी,परन्तु संगीत धीरे-धीरे लौकिक जीवन से संबन्धित होने लगा , और इसी के साथ गायन वादन और नृत्य के नये-नये रूपों का आविष्कार होने लगे , कुछ १००एक साल पहले चित्र संगीत का आगमन हुआ, कई श्रेष्ट संगीतदिग्दार्शको ने इन फिल्मो में संगीत दिया,व् शास्त्रीय संगीत को लोकप्रियता के नए शिखरों परपहुचाया, वह फ़िल्म संगीत भी हमारी संगीतात्मकता का,लयात्मकता का,गुणात्मकता का उत्कृष्टनमूना था।

परन्तु प्राचीन समय में संगीत में जो पवित्रता थी वो वर्तमान समय में कम होती जा रही हैं ।पिछले कुछ वर्षो से फ़िल्म संगीत के स्तर में बहुत ही गिरावट आई हैं, जहा कभी मीरा के भजन गूंजा करते थे, पवित्र प्रेम के अफसाने हुआ करते थे, देवो की वंदना हुआ करती थी,व्हीअश्लील शब्दों की भरमार हैं, जहा स्वर,ताल ,लय का सुंदर सम्मिश्रण हुआ करता था की श्रोता सुनकर हीझूम उठे,वही बेसुरपनहैं, गायक को न स्वर से तात्पर्य हैं, न श्रुतियों,रागों से प्रेम फ़िल्म संगीत धिनचक-धिनचक की लय पर चल रहा हैं, और आज के श्रोता उसे सुन रहे हैं, खरे खरेशब्दों में कहा जाए तो पुराने सुंदर गीतों को बुरी तरह तहस नहस किया जा रहा हैं। अपवाद स्वरुप कुछएक गाने अच्छे बन रहे हैं। लेकिन संगीत की समझ दिनों दिन श्रोताओ में कम होती जा रही हैं ,वह संगीत जोपरब्रह्म स्वरुप था, जिसे सुनकर तमाम दुःख अवसाद रोग दूर हो जाते थे, वह संगीत जो अपनी भावपुर्नतासे श्रोता को आनंद की चरमसीमा पर पंहुचा देता था ,रुला देता था.वो संगीत कहा हैं, क्या हो गया हैं लोगो की पसंद को? कम ही लोग संगीत को जानना चाहते हैं,समझाना चाहते हैं, और जिन्हें इसकी समझ हैं वह इसकी स्थिति पर रो रहे हैं।

प्राचीन समय और वर्तमान समय के संगीत के बारे में आम तौर पर एक ही तथ्य सामने आता है की प्राचीन काल के संगीत की अपेछा वर्तमान काल के संगीत में रचनात्मकता की कमी है, और आज लोगों के जीवन में संगीत केवल मनोरंजन करने वाला एक तत्व रह गया है और कुछ नहीं हैं, आज की युवा पीढी बहुत ही गुनग्राही, व् समझदार हैं। कम से कम वह – इस क्षेत्र में अपनी जानकारी बढाये। अपने संगीत को समझे, सीखे, जाने,यह उनका दायित्व ही हैं,तभी हम वर्षो से संजोयी हुई इस श्रेष्ट कला को सहेज पाएंगे।


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भारतीय प्रचलित वाध यंत्र और उनकी मुख्य विशेषता

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संगीत सुनना सभी को पसंद है लेकिन संगीत वाद्य यंत्रों के बारे में हर किसी को नही पता है। संगीत के कई यंत्र है जिनकी जानकारी देने का प्रयास इस लेख के द्वारा मैंने किया हैं , ये वाद्य यंत्रों से निकली सुरीली धुन मन को मोह लेती है। तो आइए दोस्तो, संगीत वाद्य यंत्रों (Vadya Yantra) के बारे में जानते है, इन वाद्ययंत्रों को ध्वनि के आधार पर चार मुख्य प्रमुखों में वर्गीकृत किया गया है। भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में भारतीय संगीत वाद्ययंत्रों को चार व्यापक श्रेणियों में वर्गीकृत किया है – घन-वाद्य, अवनद्ध-वाद्य, सुषिर -वाद्य और तत-वाद्य।
  • घन-वाद्य में डंडे, घंटियों, मंजीरे आदि शामिल किए जाते हैं जिनको आपस में ठोककर मधुर ध्वनि निकाली जाती है।
  • अवनद्ध-वाद्य या ढोल में वे वाद्य आते हैं, जिनमें किसी पात्र या ढांचे पर चमड़ा मढ़ा होता है जैसे-ढोलक, तबला।
  • सुषिर-वाद्य में वे यंत्र शामिल होते हैं जो किसी पतली नलिका में फूंक मारकर संगीतमय ध्वनि उत्पन्न करने वाले होते हैं, जैसे-बांसुरी।
  • तत-वाद्य में वे यंत्र शामिल होते हैं, जिनसे तारों में कम्पन्न उत्पन्न करके संगीतमय ध्वनि निकाली जाती है, जैसे-सितार, वीणा।
इन वर्गों के हिसाब से आज हम आपको कुछ प्रचलित वाध यंत्र और उनकी विशेषता के बारे में बता रहे हैं। वैसे तो इन्हें शास्त्रीय संगीत के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन हिंदी फिल्मों के गीतों के लिए भी कई बार इन वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल  होता है।ये प्रचलित वाध यंत्र और उनकी विशेषता इस प्रकार हैं –

मंजीरा -

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मंजीरा भजन में प्रयुक्त होने वाला एक महत्वपूर्ण वाद्य है। इसमें दो छोटी गहरी गोल मिश्रित धातु की बनी कटोरियां जैसी होती है। इनका मध्य भाग गहरा होता है। इस भाग में बने गड्ढे के छेद में डोरी लगी रहती है। ये दोनों हाथ से बजाए जाते हैं, दोनों हाथ में एक-एक मंजीरा रहता है। इसे ढोलक व तबले के साथ में सहायक यंत्र के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं।

तबला-

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वर्तमान समय में संगीत जगत में तबला सर्वाधिक प्रचलित एव लोकप्रिय वाद्य माना गया है । इसका एक मात्र कारण है कि तबला अपने गुण एवं विशेषताओं से विभिन्न प्रकार कि वादन एवं गायन शैलियो में सरलता से अपना आधिपत्य स्थापित कर लेता है । आज किसी भी प्रकार के गायन में , तत् वाद्य में एवं नृत्य की संगति में यह एक अनिवार्य वाद्य बन चुका हैं । तबले के दो भाग होते हैं, एक छोटा और एक बढ़ा , जिसे क्रमशः तबला तथा डग्गा या डुग्गी कहा जाता है जो लकड़ी से बनाया जाता है और जो लकड़ी के खाले डिब्बे की तरह होती हैं , और जिनके ऊपर चमड़े से मढ़ा जाता हैं इन के ऊपर बीच में एक काली गोल आकृति होती है जो अक्सर या तो चंदन या एक अन्य काले पदार्थ की बनी होती है जिसे स्याही कहा जाता है। ये काली आकृति चमड़े के छाल के उपर लगी होती है। तबले को बजाने के लिये हथेलियों तथा हाथ की उंगलियों का प्रयोग किया जाता है। तबले के द्वारा अनेकों प्रकार के बोल निकाले जाते हैं।यह अवनद्ध वाद्य के अंतर्गत आता है ।

वीणा-

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वीणा भारत के लोकप्रिय वाद्ययंत्र में से एक है जिसका प्रयोग शास्त्रीय संगीत में किया जाता है। वीणा सुर ध्वनिओं के लिये भारतीय संगीत में प्रयुक्त सबसे प्राचीन वाद्ययंत्र है। समय के साथ इसके कई प्रकार विकसित हुए हैं -रुद्रवीणा, विचित्र वीणा वगैरह लेकिन इसका प्राचीनतम रूप एक-तन्त्री वीणा है। ऐसा कहा जाता है कि मध्यकाल में अमीर खुसरो दहलवी ने सितार की रचना वीणा और बैंजो (जो इस्लामी सभ्यताओं में  ​था) को मिलाकर किया, कुछ इसे गिटार का भी रूप बताते हैं।

सितार-
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सितार का नाम सुनते ही सबसे पहले मशहूर सितार वादक पंडित रविशंकर की याद आती है। सितार का प्रयोग शास्त्रीय संगीत से लेकर हर तरह के संगीत में किया जाता है। इसके इतिहास के बारे में अनेक मत हैं। सितार पूर्ण भारतीय वाद्य है क्योंकि इसमें भी वीणा की तरह भारतीय वाद्यों की तीनों विशेषताएं हैं। तंत्री या तारों के अलावा इसमें घुड़च, तरब के तार तथा सारिकाएँ होती हैं।  इसके महत्व का एक कारण यह भी है कि सेनिया धराने के लोग अपने घर के अलावा शिष्यों को सितार की शिक्षा देते थे। इस कारण वीणा वादन कुछ लोगों तक ही सीमित हो गया और सितार का प्रचार बढ़ता गया। सितार वाद्य का महत्व अनेक कारणों से देखा जा सकता है।

बांसुरी-
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बांसुरी लोकप्रिय सुषिर वाद्य यंत्र माना जाता है, क्योंकि यह प्राकृतिक बांस से बनायी जाती है, इसलिये लोग उसे बांस बांसुरी भी कहते हैं। बाँसुरी बनाने की प्रक्रिया कठिन नहीं है, सबसे पहले बांसुरी के अंदर के गांठों को हटाया जाता है, फिर उस के शरीर पर छेद खोदे जाते हैं। सबसे पहला छेद मुंह से फूंकने के लिये छोड़ा जाता है, बाक़ी छेद अलग अलग आवाज़ निकालने का कार्य देते हैं । बाँसुरी 3 प्रकार की होती हैं और सभी बाँस से बनी होती हैं-
  • मुरली- यह 7 छेद की होती है।
  • वेणु- यह 9 छेद की होती है।
  • वंशी- यह 12 छेद की होती है।
पियानो-
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पियानो भी एक लोकप्रिय वाद्ययंत्र है। इसका आविष्कार 10 वीं शताब्दी में हुआ था। इसे महावाद्य भी कहते हैं। पियानो में कुल 88 स्वर होते हैं जो अष्टको में विभक्त होते हैं। 49 वा स्वर पिच ऐ कहलाता है जिसकी आवृति 440 प्रति सेकंड होती है। पियानो का प्रत्येक स्वर निश्चित होता है। प्रत्येक स्वर मूल स्वर और सन्नादी स्वरों के मेल से बनता है।

इन मुख्य म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट के बारे में जानकारी आपके लिए उपयोगी सिर्द्ध होगी। इन वाद्य यंत्रों से निकली मधुर ध्वनि सात सुरों का शमा बांध देती है। ज्यादातर वाद्य यंत्रों को साथ में प्ले किया जाता है। जैसे पियानो, तबला, बांसुरी एक साथ क्लासिकल म्यूजिक में बजायी जाती है।वाध से निकलने वाली संगीतमय ध्वनि ही वाध को आकर्षित बना देती है , इस लिए संगीत जगत में वाध का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है ।


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सुषिर वाद्य यंत्र लिस्ट संख्या-पांच

ये वायु से बजने वाले वाद्य होते हैं। इनमें ध्वनि उत्पन्न करने के लिए, बिना तारों या झिल्ली के इस्तेमाल के और यंत्र के बिना कम्पित हुए, वायु के टुकड़े को कम्पित किया जाता है,जिससे ध्वनि में बढोत्तरी  होती है। इन उपकरणों की तान संबंधी गुणवत्ता उपयोग किए गए ट्यूब के आकार और आकृति पर निर्भर करती है। वे गहरे बास से लेकर कर्णभेदी तेज़ सुरों तक, जोर की और भारी ध्वनि उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। ये खोखले वाद्य हैं जिनमें हवा से ध्वनि उत्पन्न की जाती है। वाद्य में छिद्र खोलने और बंद करने के लिए उंगलियों का उपयोग करके ध्वनि के स्वरमान को नियंत्रित किया जाता है। शहनाई भारत का एक लोकप्रिय सुषिर वाद्य है। इन्हें बजाने के तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है:
  • हवा की यंत्रवत् रूप से आपूर्ति की जाती है जैसे कि हारमोनियम में
  • हवा की आपूर्ति श्वास द्वारा शहनाई या बांसुरी में की जाती है (मुंह से फूंककर) 

52-हारमोनियम
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हारमोनियम लकड़ी, धातु, पीतल और कपड़े से बना एक तार वाद्य यंत्र है। एक प्रकार की सुवाह्य लकड़ी की पेटी, जिसकी उत्पत्ति पश्चिम बंगाल में हुई थी। इस प्रकार हारमोनियम भारतीय संगीत का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। इसका संगीत और नृत्य दोनों के लिए लोक, शास्त्रीय, सूफी और ग़ज़ल रचनाओं के साथ संगत के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।

"हारमोनियम सुवाह्य लकड़ी की पेटी है, जो लगभग दो फ़ीट लंबी और दस इंच ऊँची होती है, जिसके पिछले भाग को धौंकनी कहा जाता है। धौंकनी के लिए लकड़ी का एक बाहरी आवरण होता है। इसमें लगभग १० छिद्र होते हैं जो वायु को धौंकनी से गुज़रने देते हैं। शीर्ष भाग एक कुंजीपटल के समान होता है जिसमें सभी तीन सप्तक: मंद्र, मध्य तथा तार में १२ कुंजियाँ होती हैं। सुर (संगीत) उत्पन्न करने हेतु कंपिकाओं को नियंत्रित करने के लिए कुंजियों के नीचे नौ घुंडियाँ लगी होती हैं। कुंजियाँ बजाई जाती हैं और धौंकनी को साथ-साथ दबाया जाता है। जब धौंकनी दबती है, तब वायु कंपिका से होकर गुजरती है, जिसके कारण कंपन होता है। इससे ध्वनि उत्पन्न होती है। कंपिका स्वर/स्वरमान को नियंत्रित करती है जबकि धौंकनी वायु तथा ध्वनि को उत्पन्न और नियंत्रित करती है। हारमोनियम १२ सुरों और २२ श्रुतियों को उत्पन्न कर सकता है। हारमोनियम को पहली बार क्रिश्चियन गॉटलीब क्राटज़ेनस्टाईन, कोपेनहेगन विश्वविद्यालय में शरीर विज्ञान के एक प्रोफ़ेसर, ने १७०० के दशक में डिज़ाइन किया था। उनके हारमोनियम का डिज़ाइन एक छोटे आकार के अंग की तरह था। इसमें पैर से चलने वाली धौंकनी से ध्वनि उत्पन्न की जाती थी, जिससे वायु, दबाव को एक सामान करने वाले वायु संग्रह, से गुजरती थी, जिसके कारण धातु की कंपिकाएँ (एक छोर पर स्थिर और दूसरे पर मुक्त) कंपन करती थीं। घुटने द्वारा संचालित वाल्व द्वारा वाद्य यंत्र की ध्वनि नियंत्रित की जाती थी, कुंजीपटल के ऊपर स्थित घुंडियाँ वायु को संग्रह से बाहर-बाहर निकालने देती थीं और बल से धौंकनी को पंप किया जाता था। जब यूरोपीय लोग संयुक्त राज्य अमेरिका में आए तब उन्होंने अमेरीका वासियों के सामने हारमोनियम प्रस्तुत किया। आखिरकार यह वाद्य यंत्र एशिया, अफ़्रीका और कैरिबियन उपनिवेशों में प्रचलित हुआ। २०वीं शताब्दी की शुरुआत में, संगीत में लोगों की बदलती रुचियों के कारण पश्चिमी लोक में हारमोनियम का उपयोग कम हो गया। इस प्रकार, यूरोपीय हारमोनियम ने अपना गौरव खो दिया और केवल संग्रहालयों में पाया जाने लगा। इस विलुप्त होते वाद्य यंत्र को भारत में दूसरा जीवन मिला। १८७५ में, द्वारकानाथ घोष ने कलकत्ता में भारतीय हाथ-पंपित हारमोनियम के अपने संस्करण को डिज़ाइन किया। परंपरागत रूप से, इसका उपयोग भारतीय शास्त्रीय संगीतकारों के साथ संगत के लिए किया जाता था क्योंकि वे प्रदर्शन के दौरान फर्श पर बैठते थे। यूरोपीय हारमोनियम में कुंजीपटल के नीचे पैर से चलने वाली धौंकनी को हारमोनियम के भारतीय संस्करण में पीछे की ओर हाथ से संचालित धौंकनी द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। हारमोनियम का नया अवतरण अधिक टिकाऊ था, निर्माण में कम खर्चीला था, और रखरखाव और मरम्मत करने के लिए आसान था। वाद्य यंत्र का आंतरिक रचनातंत्र घोष द्वारा सरल किया गया। भारतीय शास्त्रीय संगीत में स्वर-संगति उत्पन्न करने के लिए वाद्य यंत्र में ड्रोन घुंडियों को जोड़ा गया। हारमोनियम के भारतीय संस्करण में स्वरग्राम बदलने वाली तकनीक को भी जोड़ा गया। १९१५ तक, भारत हारमोनियम का अग्रणी निर्माता बन गया। इस प्रकार हारमोनियम भारतीय संगीत का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है। इसका संगीत और नृत्य दोनों के लिए लोक, शास्त्रीय, सूफी और ग़ज़ल रचनाओं के साथ संगत के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।“ 

53-रणसिंघा
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रणसिंघा पीतल से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह एक लोक वाद्य यंत्र है जो गुजरात में पाया जाता है। धार्मिक और सामाजिक समारोहों और लोक संगीत में मुख्यत: उपयोग किया जाता है।

‘काकड़ सिंघी' के नाम से भी जाना जाता है। शंक्वाकार छिद्र वाली दो मुड़ी हुई पीतल की नलियों से बनता है। कीप के आकार का मुख और मुख टेक के साथ संकलित मुखनाल। लंबवत स्थिति में पकड़कर बजाया जाता है। धार्मिक और सामाजिक समारोहों और लोक संगीत में उपयोग किया जाता है।

54-रोसेम
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रोसेम उम नामक पारंपरिक पानी के घड़े से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह त्रिपुरा में पाई जाने वाली एक स्वदेशी बाँसुरी है।

रोसेम एक स्वदेशी बाँसुरी है, जिसे उम से बनाया जाता है, जो त्रिपुरा की उन्नीस प्रमुख जनजातियों में से एक, डार्लोंग जनजाति द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक पारंपरिक पानी का घड़ा होता है। विभिन्न गाँवों में रहने वाले समुदाय के सदस्य, अंतर-ग्राम सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आयोजन करते हैं, जिसमें रोसेम संगीत के साथ संगत के लिए उपयोग किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि रोसेम का उपयोग पहली बार झूम महोत्सव, एक कृषि-आधारित उत्सव में किया गया था, जहाँ राजा भी अपने लोगों के साथ आनंद में सम्मिलित होते हैं। इन दिनों, रोसेम डार्लोंग के कई नृत्यों जैसे बाँस नृत्य, पक्षी नृत्य, इत्यादि, में एक महत्वपूर्ण संगत है। रोसेम डार्लोंग संगीत की विभिन्न लय जैसे डार-टेंग, डार-रेसबुआंड, आदि के साथ संगत दे सकता है।" त्रिपुरी उअख्रप राज्य का एक प्राचीन पारंपरिक वाद्य यंत्र है। उअख्रप दो संगीत आधारिक संरचनाओं - तार और चर्म झिल्ली - का एक संयोजन है। यंत्र का अर्ध-गोलाकार आधार गामई, कोरोई या गर्जम के पेड़ों की लकड़ी से बनाया जाता है। चार या पाँच खोखले बाँस के टुकड़े, चार से पाँच सेंटीमीटर लंबे, अर्ध-गोलाकार लकड़ी के आधार के बाहरी गोलार्ध पर लगे होते हैं। बाँस के टुकड़े, प्रत्येक नौ छिद्रों के साथ, एक दूसरे से जुड़े होते हैं और धातु के तारों द्वारा धातु की चकती से जुड़े होते हैं। भीतरी गोलार्ध में एक चमड़े का आवरण होता है। जब बाँस की छड़ियों से फैले हुए चर्म आवरण को पीटा जाता है तब लयबद्ध ध्वनि उत्पन्न होती है।

55-वेणु
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“वेणु धातु और बाँस से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह एक लोक वाद्य यंत्र है जो प्रमुख रूप से गुजरात और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में पाया जाता है। यह मुख्य रूप से गुजरात के गड़ेरियों और ग्वालों के द्वारा उपयोग किया जाता है।”

“इसमें धातु के एक बेलनाकार योजक से जुड़ी हुई उलटी बाँसुरियों की एक जोड़ी होती है। प्रत्येक बाँसुरी पर चार अंगुली छेद और एक संकीर्ण मुखनाल होता है। इन दोनों बाँसुरियों को एक साथ बजाने वाले एक ही छेद से बजाया जाता है। गुजरात के ग्वालों के द्वारा उपयोग किया जाता है। यह कई रंगों से रंगा हुआ होता है। यह एक रंगीन चित्रित, लोक वाद्य यंत्र है, जो बाँस की लंबी नलियों से बना होता है। इसमें तीन खंड होते हैं; दो बाँसुरियाँ और एक धातु योजक। प्रत्येक बाँसुरी पर एक मुखनाल और चार अंगुली छेद होते हैं। इसे मुखनाल से बजाया जाता है। गुजरात के गड़ेरियों और ग्वालों द्वारा उपयोग किया जाता है।”

56-शंख
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शंख समुद्री जीव के खोल से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह धार्मिक वाद्य यंत्र उड़ीसा में पाया जाता है। सीमित संगीत अनुप्रयोगों वाले इस वाद्य यंत्र को हिंदू धर्म में अत्यधिक धार्मिक महत्व वाला माना जाता है।

सीमित संगीत अनुप्रयोगों वाला एक वाद्य यंत्र, इसे हिंदू धर्म में अत्यधिक धार्मिक महत्व वाला माना जाता है। यह एक बड़े मांसभक्षी समुद्री घोंघे के खोल से बना होता है जो विशेष रूप से हिंद महासागर में पाया जाता है। बाहरी छिद्र से हवा को बहुत अधिक दबाव के साथ फूँका जाता है और हवा शंख के अंदर एक छोटे से छिद्र से होकर गुज़रती है। हवा शंख की आंतरिक दीवार में गूँजती है और ध्वनि तब उत्पन्न होती है जब हवा निचले मुख से गुज़रती है। यह वाद्य यंत्र हिंदू पौराणिक कथाओं में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी से जुड़ा हुआ है, यह प्राचीन काल में रण भेरी (युद्ध बिगुल) के रूप में उपयोग किया जाता था। ऐसा माना जाता है कि शंख बजाने से ध्वनि उत्पन्न होती है जो बुराई और पाप को नष्ट करने की क्षमता रखती है। शंख की आंतरिक बनावट खोखली होती है जबकि आंतरिक सतह बहुत चमकदार होती है।

57-शहनाई
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शहनाई लकड़ी और धातु से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह धार्मिक वाद्य यंत्र उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में पाया जाता है। यह एक शुभ वाद्य यंत्र माना जाता है और सामाजिक और धार्मिक समारोहों में बजाया जाता है। इसे उत्तर भारतीय संगीत कार्यक्रम में भी उपयोग किया जाता है।
उत्तर भारत की एक प्रधान वायु नली। फूँकने वाले छोर के निकट संकीर्ण होती लकड़ी की नली जो दूसरे छोर पर उत्तरोत्तर चौड़ी होती जाती है जिसमें धातु की घंटी स्थित की जाती है, जिसे प्याला भी कहा जाता है। इसमें सात अंगुल छिद्र होते हैं। इसे दो कंपिकाओं से फूँका जाता है जो इस वाद्य यंत्र का प्रमुख अंग है। बिना छिद्र के एक समान दिखने वाले वाद्य यंत्र के माध्यम से लगातार ड्रोन पेश किया जाता है। नक्कारा और दुक्कड़, संगत के लिए बजाए जाने वाले ताल वाद्य यंत्र हैं। एक शुभ वाद्य यंत्र माना जाता है और सामाजिक और धार्मिक समारोहों में बजाया जाता है। उत्तर भारतीय संगीत कार्यक्रम में भी इसे उपयोग में लाया जाता है।
सिक्किम में शहनाई-सहनाई या शहनाई भी पंचई बाजा का एक हिस्सा है। सहनाई धातु से बनी होती है और मुँह से हवा फूँक कर बजाई जाती है।

58-सिफुंग-
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"सिफुंग बाँस से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र असम में पाया जाता है। 'बोडो' संगीत और समूह नृत्य में रागात्मक संगत के लिए मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।"

"अपनी प्राकृतिक गाँठ से एक तरफ से बंद छोर वाली बाँस की नली। इसमें एक फूँकने वाला छिद्र और पाँच अंगुल छिद्र होते हैं। इस वाद्य यंत्र को बोडो संगीत और समूह नृत्य में रागात्मक संगत के लिए उपयोग किया जाता है।"

59-सींगा
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सींगा बाँस और भैंस के सींग से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह पारंपरिक वाद्य यंत्र उड़ीसा में पाया जाता है। इसे मुख्य रूप से याचकों द्वारा उपयोग किया जाता है।
उड़ीसा में सींगा-बाँस के मुखनाल से संलग्न भैंस का सींग। इसे दोनों हाथों में पकड़कर बाँस के मुखनाल से फूँका जाता है। इसे याचकों द्वारा उपयोग किया जाता है।
झारखंड में सींगा-सिंगा झारखंड का एक वायु वाद्य यंत्र है, जो इस राज्य की संगीत परंपरा का एक अभिन्न अंग है, जो विभिन्न अवसरों पर, विशेष रूप से शादी समारोहों में बजाया जाता है। यह पीतल का बना होता है और इसका आकार अंग्रेजी के अक्षर 'एस' ('S') के समान होता है, तथा इसे एक छोर पर मुँह से हवा फूँक कर बजाया जाता है, ताकि दूसरे सिरे पर दिए गए शंक्वाकार छेद से ध्वनि (आवाज़) निकल सके। सिंगा के गुंजायमान संगीत के बिना शादी की बारातें अधूरी होती हैं।

60-सुंदरी
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“सुंदरी शीशम और लकड़ी से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह दुर्लभ वाद्य यंत्र महाराष्ट्र में पाया जाता है। यह द्वि कंपिका वाद्य यंत्र खासकर सोलापुर जिले के अहेरवाड़ी क्षेत्र के जाधव परिवार तक ही सीमित है।“

“द्वि कंपिका वाला वायु वाद्य यंत्र। वायु नली पर सात से नौ अंगुलछिद्र होते हैं। इसे कंपिका के माध्यम से फूँका जाता है जबकि सुर को अंगुलछिद्रों से समायोजित किया जाता है। सुंदरी शहनाई का एक विस्तार है जो इसे 'शहनाई की छोटी बहन' का लोकप्रिय नाम देता है। खजूर वृक्ष की लकड़ी को इस वाद्य यंत्र को बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इस वाद्य यंत्र की ध्वनि शहनाई की तुलना में अधिक सौम्य होती है। यह एक दुर्लभ वाद्य यंत्र है, जो खासकर सोलापुर जिले के अहेरवाड़ी क्षेत्र के जाधव परिवार तक ही सीमित है।"

61-सुमुई
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सुमुई बाँस से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह त्रिपुरा में पाया जाने वाला प्राचीन वाद्य यंत्र है।

सुमुई, एक प्राचीन प्रकार की बाँसुरी, त्रिपुरा की संगीत परंपरा में सबसे सही और अल्पतम यांत्रिक वाद्य यंत्र है। त्रिपुरा में दो तरह की सुमुई हैं - एक में सात छिद्र होते हैं और दूसरे में आठ छिद्र होते हैं। सुमुई को बाँस के खोखले तने से बनाया जाता है, जिसे उपयुक्त लंबाई में काटा जाता है और फिर बाँसुरी के छिद्रों की दूरी को वादक द्वारा वादन की स्थिति के अनुसार निर्णय लेने के बाद निर्धारित किया जाता है। सुमुई को बजाने के दो तरीके होते हैं, या तो इसे मुँह के समानांतर रखकर पकड़ा जाता है या मुँह में रख कर पकड़ा जाता है।

62-सुरनाई

सुरनाई लकड़ी और धातु से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह धार्मिक वाद्य यंत्र हिमाचल प्रदेश में पाया जाता है। शुभ, सामाजिक और धार्मिक समारोहों में मुख्यत: उपयोग किया जाता है।

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हिमाचल प्रदेश में सुरनाई-एक लकड़ी की नली जिसमें एक सीधा छिद्र और कीप के आकार की घंटी होती है। सात उंगली के छिद्र और एक अंगूठे का छिद्र होता है। दोहरी कंपिका के साथ धातु की टोंटी होती है। शुभ, सामाजिक और धार्मिक समारोहों में उपयोग किया जाता है।

जम्मू और कश्मीर में सुरनाई-सुरनाई दो शब्दों सुर और नई का संयोजन है, सुर का अर्थ संगीत सुर और नाई का अर्थ बाँसुरी है। एक वायु वाद्य यंत्र, निचले हिस्से में घंटी के आकार के मुँह के साथ १८ इंच लंबी एक लकड़ी की नली होती है। इसमें सात निर्गम छिद्र और एक बजाने वाला छिद्र होता है। यह वाद्य यंत्र खोखली लकड़ी के टुकड़े में छिद्र करके बनाया जाता है। कश्मीर में कुलगाम क्षेत्र के कारीगरों द्वारा निर्मित, यह भांड नाट्यशैली का एक महत्वपूर्ण संगीत वाद्य यंत्र है। सुरनाई को गेहूँ की घास की पत्ती के साथ दाँतों के बीच रखा जाता है और इस तरह से इसे बजाकर और अटकाव पर उंगलियाँ रखकर संगीत के सुरों को उत्पन्न किया जाता है।



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सुषिर वाद्य यंत्र लिस्ट संख्या-चार

 ये वायु से बजने वाले वाद्य होते हैं। इनमें ध्वनि उत्पन्न करने के लिए, बिना तारों या झिल्ली के इस्तेमाल के और यंत्र के बिना कम्पित हुए, वायु के टुकड़े को कम्पित किया जाता है,जिससे ध्वनि में बढोत्तरी  होती है। इन उपकरणों की तान संबंधी गुणवत्ता उपयोग किए गए ट्यूब के आकार और आकृति पर निर्भर करती है। वे गहरे बास से लेकर कर्णभेदी तेज़ सुरों तक, जोर की और भारी ध्वनि उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। ये खोखले वाद्य हैं जिनमें हवा से ध्वनि उत्पन्न की जाती है। वाद्य में छिद्र खोलने और बंद करने के लिए उंगलियों का उपयोग करके ध्वनि के स्वरमान को नियंत्रित किया जाता है। शहनाई भारत का एक लोकप्रिय सुषिर वाद्य है। इन्हें बजाने के तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है:
  • हवा की यंत्रवत् रूप से आपूर्ति की जाती है जैसे कि हारमोनियम में
  • हवा की आपूर्ति श्वास द्वारा शहनाई या बांसुरी में की जाती है (मुंह से फूंककर) 

40-बाँसुरी

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बाँसुरी राजस्थान और बिहार में पाया जाने वाला एक वायु वाद्य यंत्र है। यह एक लंबी लकड़ी की बेलनाकार नली के समान होती है, इस यंत्र को लंबवत रूप में बजाया जाता है। यह लोक संगीत और नृत्यों में प्रयुक्त होती है। यह बिहार के चरवाहा और ग्वाला समुदायों द्वारा उपयोग की जाती है।
  • राजस्थान में बाँसुरी-एक दरार के साथ लंबी लकड़ी की बेलनाकार नली। इसका दूसरा छोर खुला होता है। चंचु के ठीक आगे एक संकीर्ण मुखनाल होता है। दूसरे छोर पर छह उँगलियों के लिए छिद्र जोड़ियों में और एक जोड़ी में तीन छिद्र होते हैं। बाँसुरी को एक छोर से लंबवत रूप में बजाया जाता है।
  • बिहार में बाँसुरी-फूँक मारने वाले छिद्र के साथ चोंच के आकार की बाँस की नली। इस पर छह अंगुलछिद्र होते हैं और एक संकीर्ण मुखनाल होता है। यह लोक संगीत और नृत्यों में उपयोग किया जाता है। इसे बिहार के चरवाहा और ग्वाला समुदायों द्वारा उपयोग किया जाता है।

41-बंकिया

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बांकिया काँसे से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। राजस्थान में पाया जाने वाला एक धार्मिक वाद्य यंत्र। यह सामाजिक समारोहों और शोभायात्राओं में प्रयुक्त एक तुरही के आकार का वाद्य यंत्र है।बांकिया काँसे से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। 

दो भागों में निर्मित एक काँसे की तुरही। बिगुल की तरह नली और संकलित मुखनाल सहित एक तश्तरी के आकार की घंटी। यह राजस्थान और पड़ोसी क्षेत्रों में शोभायात्राओं, धार्मिक और सामाजिक समारोहों में उपयोग की जाती है।

42-बंपाथ्यूट

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बंपाथ्यूट सिक्किम का एक वायु वाद्य यंत्र है। बाँस से बनी हुई एक पक्षी के आकार की सीटी। यह यंत्र मुख्य रूप से संकेतन के लिए जंगल में उपयोग किया जाता है।

एक पक्षी के आकार की बाँस से निर्मित सीटी, जिसका ऊपरी छोर खुला, और निचला छोर एक प्राकृतिक गाँठ द्वारा बंद होता है। बजाते समय, हाथ में पकड़ा जाता है, खुले सिरे को निचले होंठ पर रखा जाता है और फूँका जाता है।

43-बरगू
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बरगू काँसे से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। एक 'एस' आकार की तुरही जिसे ज़्यादातर राजस्थान के 'सरगरा' समुदाय द्वारा उपयोग किया जाता है।

यह दो भागों में बनी एक काँसे की तुरही है। कप के आकार की घंटी और संकलित मुखनाल सहित ‘एस' आकार की नली। राजस्थान के 'सरगरा' समुदाय द्वारा उपयोग किया जाता है।

44-भुंगल
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भुंगल काँसे से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। राजस्थान में पाया जाने वाला एक धार्मिक वाद्य यंत्र है। तुरही के आकार का वाद्य, प्रायः शादियों और त्योहारों के अवसरों पर धार्मिक और सामाजिक शोभायात्राओं में प्रयोग किया जाता है।

काँसे की लंबी सीधी तुरही, दो भागों में बनाई जाती है। कटोरे के आकार का मुख और एक संकलित मुखनाल। शादियों और त्योहारों के अवसरों पर धार्मिक और सामाजिक शोभायात्राओं में प्रयोग किया जाता है

45-मशक
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मशक बकरी की खाल और मोम से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र राजस्थान में पाया जाता है। मुख्य रूप से लोक संगीत और नृत्य में संगत के लिए उपयोग किया जाता है।

"एक मशकबीन जो पूर्ण आकार की बकरी की खाल से बनी होती है। एक अलंकृत बाँस से बनी फूँकने वाली नली जिसपर पाँच अंगुल छिद्र होते हैं, जिन्हें मोम की मदद से मशक में डालकर स्थित किया जाता है। इस वाद्य यंत्र को मुँह से फूँका जाता है। हवा से फूली हुई मशक एक वायु कक्ष के समान कार्य करती है और बाज़ुओं के दबाव से संचालित की जाती है। लोक संगीत और नृत्य में उपयोग किया जाता है।"

46-मसक तिट्टि
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मसक तिट्टी चमड़े से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह मशकबीन के आकार का वाद्य यंत्र आंध्र प्रदेश में पाया जाता है।

मसक तिट्टि एक मशकबीन है जो केवल एक ड्रोन तान देती है। कहानीकार थैले (बैग) में तब तक हवा फूँकता है जब तक कि वह पूरी तरह से फूल न जाए। फिर वह छोर पर लगी नलिका को खोलता है और धीरे-धीरे थैले को दबाता है। इस प्रकार छोड़ी जा रही हवा ड्रोन नलिका के माध्यम से बाहर निकलती है और इस प्रक्रिया के दौरान कंपिका को कंपित कर देती है। जैसे ही ड्रोन तान बजता है, कहानीकार श्रुति के अनुरूप गाता है और कहानी सुनाता है।

47-महुरी
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महुरी लकड़ी और धातु से निर्मित वायु वाद्य यंत्र है। यह धार्मिक वाद्य यंत्र उड़ीसा में पाया जाता है। मुख्यतः मांगलिक, सामाजिक और धार्मिक अवसरों पर उपयोग किया जाता है। यह 'दलखा' प्रस्तुति में एक प्रमुख संगत है।

एक लकड़ी की नली जिसमें दो आघाती कंपिका और उँगलियों के सात छिद्र होते हैं और आगे एक धातु की घंटी लगी होती है। इसे कंपिका के माध्यम से फूँका जाता है। मांगलिक, सामाजिक और धार्मिक अवसरों पर उपयोग किया जाता है। ‘दलखा’ प्रस्तुति में एक प्रमुख संगत।

48-मागुडी
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"मागुडी बाँस और तूमड़ी से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। नली के जैसा यह वाद्य यंत्र तमिलनाडु में पाया जाता है। मुख्य रूप से सँपेरों और बाजीगरों द्वारा उपयोग किया जाता है।"

"इस वाद्य यंत्र में बल्ब के समान गोल तूमड़ी का वायु कक्ष और फूँकने वाला छिद्र होता है। संभवतः बाँस से बनी दो नलियाँ वायु कक्ष में डाली जाती हैं। नलियों में से एक नली पर उँगलियों के लिए सात छिद्र और एक पिछला भाग और अन्य नलियों पर एक तरफ दो छिद्र होते हैं। यह सँपेरों और बाजीगरों द्वारा उपयोग किया जाता है।"

49-मुखवीणा
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“मुखवीणा बाँस और लकड़ी से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह पारंपरिक वाद्य यंत्र तमिलनाडु में पाया जाता है। दक्षिण भारत में कावेरी नदी के किनारे उगने वाले बाँस से कुछ सर्वश्रेष्ठ मुखवीणाएँ बनाई जाती हैं।"

“एक द्वि कंपिका वायु नली जिसमें सात बजाने वाले छिद्र होते हैं और पाँच सहायक छिद्र होते हैं। स्वरमान को समायोजित करने के लिए पाँच सहायक छिद्रों का उपयोग किया जाता है। मुखवीणा से उत्पन्न ध्वनि, बजाने वाले छिद्रों के साथ वादक की उँगलियों के संपर्क का परिणाम होता है। स्वर के साथ-साथ मींद, गमक जैसी तकनीकें अंगुलछिद्रों को पूरी तरह से या आंशिक रूप से खोलकर, साँस को नियंत्रित करके कंपिका पर होठ, जीभ और दाँतों के साथ क्रिया करके उत्पन्न की जाती हैं। सात सुरों के उत्पादन के लिए अपनाई गई उँगलियाँ चलाने की प्रणाली बाँसुरी के समान ही होती है। आधा और चौथाई सुर, बुद्धिमत्तापूर्ण उँगलियाँ चलाने और नली में फूँक के दबाव के समायोजन के समकालन का परिणाम होते हैं। दक्षिण भारत में कावेरी नदी के किनारे उगने वाले बाँस से कुछ सर्वश्रेष्ठ मुखवीणाएँ बनाई जाती हैं।"

50-मुरारी सुमुई
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“मुरारी सुमुई बाँस से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह आदिवासी वाद्य यंत्र त्रिपुरा में पाया जाता है। इसे मुख्य रूप से पश्चिम त्रिपुरा के सामुदायिक नृत्य और संगीत में उपयोग किया जाता है।

“बाँस से बनी एक जनजातीय बाँसुरी, सात अंगुल छेद और फूँकने के लिए एक छेद, दोनों तरफ से खुला। इसे दोनों हाथों से पकड़ा जाता है और फूँकने वाले छेद से बजाया जाता है। इसे पश्चिम त्रिपुरा के सामुदायिक नृत्य और संगीत में उपयोग किया जाता है।

51-मोइबुंग शंख
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मोइबुंग शंख एक वायु वाद्य यंत्र है जो समुद्री जीव के खोल से बना होता है। मोइबुंग का बजना मणिपुर में किसी भी शुभ अवसर की शुरुआत का प्रतीक है।

मोइबुंग या शंख एक सुंदर वाद्य यंत्र है जिसका उपयोग मणिपुर के मंदिरों में वैष्णव अनुष्ठानों में किया जाता है। सफेद पगड़ी पहने हुए, मोइबुंग वादक एक साथ दो शंख बजाते हैं। मोइबुंग का बजना किसी भी शुभ अवसर की शुरुआत का प्रतीक है।

सुषिर वाद्य यंत्र लिस्ट संख्या-चार -  पर जाने के लिए क्लिक करे -
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सुषिर वाद्य यंत्र लिस्ट संख्या-तीन

 ये वायु से बजने वाले वाद्य होते हैं। इनमें ध्वनि उत्पन्न करने के लिए, बिना तारों या झिल्ली के इस्तेमाल के और यंत्र के बिना कम्पित हुए, वायु के टुकड़े को कम्पित किया जाता है,जिससे ध्वनि में बढोत्तरी  होती है। इन उपकरणों की तान संबंधी गुणवत्ता उपयोग किए गए ट्यूब के आकार और आकृति पर निर्भर करती है। वे गहरे बास से लेकर कर्णभेदी तेज़ सुरों तक, जोर की और भारी ध्वनि उत्पन्न करने में सक्षम होते हैं। ये खोखले वाद्य हैं जिनमें हवा से ध्वनि उत्पन्न की जाती है। वाद्य में छिद्र खोलने और बंद करने के लिए उंगलियों का उपयोग करके ध्वनि के स्वरमान को नियंत्रित किया जाता है। शहनाई भारत का एक लोकप्रिय सुषिर वाद्य है। इन्हें बजाने के तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है:
  • हवा की यंत्रवत् रूप से आपूर्ति की जाती है जैसे कि हारमोनियम में
  • हवा की आपूर्ति श्वास द्वारा शहनाई या बांसुरी में की जाती है (मुंह से फूंककर) 

27-नागस्वरम्

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"नागस्वरम् लकड़ी और धातु से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह भक्ति वाद्य यंत्र तमिलनाडु में पाया जाता है। मुख्य रूप से शुभ और धार्मिक अवसरों पर यह शास्त्रीय संगीत कार्क्रमों में भी उपयोग किया जाता है।"

"कर्नाटक संगीत की एक प्रमुख वायु नली, इसने प्राचीन काल से एक मंगल वाद्यम् के रूप में उच्च स्थान प्रदान किया गया है। लकड़ी के बने इस द्वि कंपिका वाले वाद्य यंत्र में दो भाग होते हैं; शंक्वाकार नली और एक धातु की घंटी। छोर पर एक सींग के साथ नीचे की ओर बढ़ने वाली नली, एक धातु की घंटी से सुसज्जित होती है। इस पर सात अंगुल छिद्र और पाँच वायु छिद्र होते हैं। द्वि कंपिका जिसे 'एकु' कहा जाता है (तेलुगु में) एक कपाट (वेल्व) के रूप में कार्य करती है, जो धातु की स्टेपल से लगी होती है और नली में डाली जाती है। कंपिका को समायोजित करने के लिए लकड़ी की सुइयों के साथ अतिरिक्त कंपिकाओं को वाद्य यंत्र के साथ धातु की स्टेपल से लटकाकर रखा जाता है। इसके साथ में उपयोग किया जाने वाला ताल वाद्य यंत्र तविल है। कभी-कभी तालम, बड़े झांझ, भी नागस्वरम् के साथ बजाए जाते हैं। इस वाद्य यंत्र की पहचान मंदिरों और अन्य धार्मिक आयोजनों के साथ होती है। प्रमुख वाद्य यंत्र के रूप में नागस्वरम् के साथ वाद्य यंत्रों के सामूहिक प्रदर्शन को 'पेरियामेलम' कहा जाता है। इसे शास्त्रीय संगीत कार्यक्रमों के साथ-साथ शुभ और धार्मिक अवसरों पर भी उपयोग किया जाता है।”

28-देवलाई सांगू

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देवलाई सांगू पीतल और मोम से बना एक सुषिर वाद्य यंत्र है। यह एक धार्मिक वाद्य यंत्र है, जो तमिलनाडु में पाया जाता है। इसका मुख्य रूप से 'पंचवाद्य' सामूहिक प्रदर्शन तथा मंदिरों के अन्य धार्मिक और शुभ अवसरों में उपयोग किया जाता है।

एक शंख जिसमें हवा फूँकने वाले छोर पर कीप के आकार का पीतल का मुखनाल लगाया जाता है। मोम की सहायता से दूसरे छोर पर पीतल का एक विस्तृत सजावटी टुकड़ा जुड़ा होता है। यह 'पंचवाद्य' सामूहिक प्रदर्शन में प्रयुक्त होता है। यह मंदिरों में धार्मिक और शुभ अवसरों में भी उपयोग किया जाता है। 

29-नरसिंघ

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नरसिंघ ताँबे और धातु से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह एक लोक वाद्य यंत्र है जो हिमाचल प्रदेश और बिहार में पाया जाता है। यह 'एस' आकर की नली हिमाचल प्रदेश में सामाजिक समारोहों, लोक संगीत और नृत्य में और बिहार के ओराँव समुदाय द्वारा उपयोग की जाती है।
हिमाचल प्रदेश में नरसिंघ-एक विस्तृत कीपनुमा मुख के साथ तीन मुड़ी हुई तांबे की नलीयाँ और फूँकने वाले छोर पर तीन संकलित मुखनाल। इसका आकार 'एस' की तरह होता है। पाँच धातु के उत्थित छल्ले नली को घेरते हैं। यह सामाजिक समारोहों, लोक संगीत और नृत्य में उपयोग किया जाता है।
बिहार में नरसिंघ-तांबे से बनी 'एस' आकार की तुरही। मुखनाल से इसे बजाया जाता है। बिहार के 'ओराओं' जनजाति द्वारा इसका उपयोग किया जाता है।

30-नागफनी
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नागफनी काँसे और धातु से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह राजस्थान और गुजरात में पाया जाने वाला एक धार्मिक वाद्य यंत्र है। राजस्थान में धार्मिक और सामाजिक समारोहों में शोभायात्राओं के भाग के रूप में और गुजरात में अनुष्ठानिक सामाजिक समारोहों और उत्सवों में मुख्य रूप से इसका उपयोग किया जाता है।
  • राजस्थान में नागफनी-सर्पिल घंटियों सहित एक काँसे की नली। साँप के फन के आकार की घंटी जिसमें धातु की (जीह्वा) लटकन लगी होती है, चमकीले रंगों से रंगी। शोभायात्रा के भाग के रूप में धार्मिक और सामाजिक समारोहों में इसका उपयोग किया जाता है।
  • गुजरात में नागफनी-एक बेलनाकार काँसे की नली जिसमें नाग की तरह मुड़ी हुई डंडी और नाग के फन के आकार वाली घंटी जुड़ी होती है। एक खुला मुँह का छेद होता है। अनुष्ठानिक सामाजिक समारोहों और उत्सवों में इसका उपयोग किया जाता है।
31-नढ़
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“नढ़ कंगोर की लकड़ी से निर्मित एक सुषिर वाद्य यंत्र है। यह जनजातीय वाद्य यंत्र राजस्थान में पाया जाता है। इसे मुख्यतः राजस्थान के चरवाहा समुदाय द्वारा उपयोग में लाया जाता है।“

“कंगोर की लड़की से बनी एक नली। इस पर चार अंगुल छिद्र होते हैं। इसे ऊपरी छोर से फूँका जाता है, छिद्र उँगलियों द्वारा कुशलता से परिचालित किए जाते हैं। इसे राजस्थान के चरवाहा समुदाय द्वारा उपयोग में किया जाता है।“

32-पंथोंग पालित
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"पंथोंग पालित बाँस से बना एक एक वायु वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य सिक्किम में पाया जाता है। लोक और पारंपरिक संगीत शैलियों में मुख्यत: उपयोग किया जाता है। शादी के अवसर पर विशेष रूप से उपयोग किया जाता है।"

"एक क्षैतिज बाँसुरी, लगभग एक मीटर लंबी, बाँस से बनी हुई। फूँकने वाले छोर पर बंद होती है। बंद छोर से कुछ सेंटीमीटर नीचे बजाने वाला छिद्र होता है। चार अंगुल छिद्र होते हैं। लोक और पारंपरिक संगीत शैलियों में उपयोग किया जाता है। शादी के अवसर पर विशेष रूप से उपयोग किया जाता है।"

33-पालिथ किंग
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पालिथ किंग लकड़ी का बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह जनजातीय वाद्य यंत्र सिक्किम में पाया जाता है। चरवाहों द्वारा मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।

"एक सीधी बाँसुरी, जिसमें छह अंगुल छिद्र होते हैं। बजने वाले छिद्र के नीचे कुछ सेंटीमीटर की दूरी पर एक संकीर्ण मुखनाल है। दोनों हाथों से लंबवत पकड़ा जाता है और मुखनाल से बजाया जाता है। चरवाहों द्वारा उपयोग किया जाता है।"

34-पावरी

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“पावरी गाय के सींग, लकड़ी, और सूखी तूमड़ी से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह जनजातीय वाद्य यंत्र महाराष्ट्र में पाया जाता है। यह स्वदेशी वाद्य यंत्र सामान्यतः उतना प्रचलित नहीं है और केवल जनजाति के भीतर ही इसे बजाया और सीखा जाता है।““पावरी गाय के सींग, लकड़ी, और सूखी तूमड़ी से निर्मित एक वायु वाद्य यंत्र है। यह जनजातीय वाद्य यंत्र महाराष्ट्र में पाया जाता है। यह स्वदेशी वाद्य यंत्र सामान्यतः उतना प्रचलित नहीं है और केवल जनजाति के भीतर ही इसे बजाया और सीखा जाता है।“

“एक वायु वाद्य यंत्र जिसे 'तारफ़ा' के नाम से भी जाना जाता है। यह सींग नली (हॉर्न पाइप) का एक प्रकार है जो सामान्यतः लंबाई में तीन से चार फ़ीट की होती है। यह पारंपरिक रूप से महाराष्ट्र की कोकणा और गुजरात की डांग जनजाति से संबंधित है। एक द्वि कंपिका वायु नली जिसमें तले की ओर छह छिद्र होते हैं। इसे सामान्यतः पुंगी का एक बड़ा संस्करण माना जाता है। यह वाद्य यंत्र स्थानीय रूप से उगाए गए वृक्षों की लकड़ी से बना होता है और इसके अर्ध ऊपरी हिस्से में एक चोंच जैसी चित्रित संरचना जुड़ी होती है। इस वाद्य यंत्र से उत्पन्न ध्वनि भारतीय के साथ-साथ यूरोपीय संगीत के स्वरों से भी मिलती है। पावरी को मुख्यतः कोकणा जनजाति के शादी समारोहों और डांगी जनजाति के डांग दरबार (होली के समय मनाया जाने वाला तीन दिवसीय वार्षिकोत्सव) उत्सव में मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है। यह स्वदेशी वाद्य यंत्र सामान्यतः उतना प्रचलित नहीं है और केवल जनजाति के भीतर ही इसे बजाया और सीखा जाता है।“

35-पावो
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पावो चिकनी मिट्टी और बाँस से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह एक दोहरी बाँसुरी होती है, और गुजरात में पाई जाती है।

पावो बाँस से बनी एक दोहरी बाँसुरी होती है। इसमें प्रयुक्त दोनों बाँसुरियों की लंबाई 27 सेंटीमीटर होती है और यह यंत्र राजस्थान के अलगोजा वाद्य यंत्र जैसा होता है लेकिन इसका आकार काफी छोटा होता है। इस ड्रोन बाँसुरी में उंगली के लिए एक छेद होता है और मुख्य बाँसुरी में आगे सात और पीछे एक छेद होता है।

36-पिल्लगोवी
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पिल्लगोवी बाँस से बना एक वायु वाद्य यंत्र। ऐसा माना जाता है कि इसका आविष्कार भगवान श्रीकृष्ण ने किया है तथा यह दक्षिण भारत में पाया जाता है।

पिल्लगोवी बाँस से बना होता है और इसको मुरली के नाम से भी जाना जाता है, और पारंपरिक रूप से ऐसा माना जाता है कि इसका आविष्कार भगवान श्रीकृष्ण ने किया था, जिन्हें आमतौर पर इसे धारण किए हुए या इसे बजाते हुए दर्शाया जाता है। इस यंत्र को कभी-कभी बाँसुरी का नाम भी दिया जाता है। इसके स्वर नीचे और मधुर होते हैं, और यह वाद्य यंत्र हमेशा धीरे से बजाया जाता है; वास्तव में, कर्णभेदी स्वर इस वाद्य यंत्र पर उत्पन्न नहीं किए जा सकते हैं। यह वाद्य यंत्र काफी हद तक ग्रामीण प्रकृति का है और इसे गड़ेरियों तथा चरवाहों द्वारा बहुधा उपयोग किया जाता है। गाँव की कई सरल धुनों और रागों को, जब इस वाद्य यंत्र पर बजाया जाता है, तो उनमें अद्भुत आकर्षण होता है।

37-पुंगी
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पुंगी तूमड़ी, मोम, बाँस, धातु, मधुमोम और नारियल से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह दिलचस्प वाद्य यंत्र देश के अनेक हिस्सों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा में पाया जाता है। सँपेरों द्वारा मुख्यत: उपयोग किया जाता है।
  • उत्तर प्रदेश में पुंगी-लंबी गर्दन वाली एक गोल तूमड़ी। एक कंपिका के साथ दो बाँस की नलिकाओं को कलाबाश में से डाला जाता है और मोम से चिपकाया जाता है। एक नलिका के ऊपरी तरफ सात अंगुली के छिद्र और पीछे की तरफ एक अंगूठे का छिद्र होता है और दूसरी नलिका में दो छिद्र होते हैं। गर्दन के अंत में बना छेद से बजाया जाता है। सँपेरों द्वारा उपयोग किया जाता है।
  • मध्य प्रदेश में पुंगी-एक बड़ा गोल तुंबा और विस्तारित गर्दन जिसका कटा हुआ बजाने वाला छेद एक छोर पर होता है। एकल कंपिका के साथ तीन बाँस की नलियों को कलाबाश के माध्यम से घुसाया जाता है और मोम से जोड़ा जाता है। दायें हाथ की नली में सामने आठ अंगुल छेद और एक अंगूष्ठ छेद पीछे होता है। बीच वाली नली में तीन छेद। जबकि बायीं वाली एक लंबी धातु की नली के साथ जुड़ी होती है। दोनों हाथों से थामकर, चौड़े खुले हुए हिस्से की तरफ से बजाया जाता है। सपेरों द्वारा इसका उपयोग किया जाता है।
38-पेपा
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"पीपा भैंस के सींग से बना एक वायु वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र असम में पाया जाता है। इसे 'जोड़ीया पेपा' भी कहा जाता है, यह विशेष रूप से असम में 'बिहु' त्योहार के दौरान उपयोग किया जाता है।"

"दो भैंस के सींगों को, चार अंगुल छिद्र के साथ दो सरकंडे की नलिकाओं से, संकीर्ण छोर पर बाँधा जाता है। कंपिका से बजाया जाता है। इसे 'जोड़ीया पेपा' भी कहा जाता है। यह लोकप्रिय लोक वाद्य यंत्र है। असम में 'बिहु' त्योहार के दौरान विशेष रूप से उपयोग किया जाता है।"

39-पेली
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पेली बाँस से निर्मित एक सुषिर वाद्य यंत्र है। यह विशिष्ट रूप से राजस्थान में अलवर के मेयो समुदाय द्वारा उपयोग किया जाता है।

अलवर के मेयो समुदाय का पेली वाद्य यंत्र एक छोटी बाँसुरी है जिसके संगीत पर रतवाई को उच्च स्वरमान में गाया जाता है। बाँसुरी राजस्थानी लोक संगीत में भी बहुत प्रसिद्ध है। जिनमें से एक पेली है जो कि एक छोटी बाँसुरी है। इसी परिवार का अन्य यंत्र रतवाई है जिसे उच्च स्वरमान के लिए उपयोग किया जाता है।



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