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कजरी तीज पौराणिक महत्व व्रत कथा व पूजा विधि

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हर साल भादो माह में कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि का दिन कजरी तीज के रूप में मनाया जाता है। हरियाली तीज की भांति ही कजरी तीज पर भी सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए व्रत करती हैं। कजरी तीज को कजली तीज, सातूड़ी तीज और बूढ़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। कजरी तीज की पूजा के दौरान इससे जुड़ी व्रत कथा का भी खास महत्व है। ऐसा माना जाता है कि जब तक पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ न किया जाए तब तक इसका पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता है।
कजरी कजली तीज का महत्व -
दुसरे तीज त्यौहार की तरह इस तीज का भी अलग महत्त्व है. तीज एक ऐसा त्यौहार है जो शादीशुदा लोगों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. हमारे देश में शादी का बंधन सबसे अटूट माना जाता है. पति पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए तीज का व्रत रखा जाता है. दूसरी तीज की तरह यह भी हर सुहागन के लिए महत्वपूर्ण है. इस दिन भी पत्नी अपने पति की लम्बी उम्र के लिए व्रत रखती है, व कुआरी लड़की अच्छा वर पाने के लिए यह व्रत रखती है.

कजली तीज नाम क्यों पड़ा? 

पुराणों के अनुसार मध्य भारत में कजली नाम का एक वन था. इस जगह का राजा दादुरै था. इस जगह में रहने वाले लोग अपने स्थान कजली के नाम पर गीत गाते थे जिससे उनकी इस जगह का नाम चारों और फैले और सब इसे जाने. कुछ समय बाद राजा की म्रत्यु हो गई और उनकी रानी नागमती सती हो गई. जिससे वहां के लोग बहुत दुखी हुए और इसके बाद से कजली के गाने पति – पत्नी के जनम – जनम के साथ के लिए गाये जाने लगे.

इसके अलावा एक और कथा इस तीज से जुडी है. माता पार्वती शिव से शादी करना चाहती थी लेकिन शिव ने उनके सामने शर्त रख दी व बोला की अपनी भक्ति और प्यार को सिद्ध कर के दिखाओ. तब पार्वती ने 108 साल तक कठिन तपस्या की और शिव को प्रसन्न किया. शिव ने  पार्वती से खुश होकर इसी तीज को उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकारा था. इसलिए इसे कजरी तीज कहते है. कहते है बड़ी तीज को सभी देवी देवता शिव पार्वती की पूजा करते है.

कजली तीज मनाने का तरीका -

कजली तीज को निम्न तरह से मनाया जाता है :
  • इस दिन हर घर में झूला डाला जाता है. और औरतें इस में झूल कर अपनी ख़ुशी व्यक्त करती है.
  • इस दिन औरतें अपनी सहेलियों के साथ एक जगह इकट्ठी होती है और पूरा दिन नाच गाने मस्ती में बिताती है.
  • औरतें अपने पति के लिए व कुआरी लड़की अच्छे पति के लिए व्रत रखती है.
  • तीज का यह व्रत कजली गानों के बिना अधूरा है. गाँव में लोग इन गानों को ढोलक मंजीरे के साथ गाते है.
  • इस दिन गेहूं, जौ, चना और चावल के सत्तू में घी मिलाकर तरह तरह के पकवान बनाते है.
  • व्रत शाम को चंद्रोदय के बाद तोड़ते है, और ये पकवान खाकर ही व्रत तोड़ा जाता है.
  • विशेषतौर पर गाय की पूजा होती है.
  • आटे की 7 रोटियां बनाकर उस पर गुड़ चना रखकर गाय को खिलाया जाता है. इसके बाद ही व्रत तोड़ते है.
कजरी कजली तीज पूजा विधि -
सामग्री : कजरी कजली तीज के लिए कुमकुम, काजल, मेहंदी, मौली, अगरबत्ती, दीपक, माचिस, चावल, कलश, फल, नीम की एक डाली, दूध, ओढ़नी, सत्तू, घी, तीज व्रत कथा बुक, तीज गीत बुक और कुछ सिक्के आदि पूजा सामग्री की आवश्यकता होती है.

विधि : कजरी कजली तीज की पूजा विधि इस प्रकार हैं :
  • पहले कुछ रेत जमा करें और उससे एक तालाब बनाये. यह ठीक से बना हुआ होना चाहिए ताकि इसमें डाला गया जाल लीक ना हो.
  • अब तालाब के किनारे मध्य में नीम की एक डाली को लगा दीजिये, और इसके ऊपर लाल रंग की ओढ़नी डाल दीजिये.
  • इसके बाद इसके पास गणेश जी और लक्ष्मी जी की प्रतिमा विराजमान कीजिये, जैसे की आप सभी जानते हैं इनके बिना कोई भी पूजा नहीं की जा सकती.
  • अब कलश के ऊपरी सिरे में मौली बाँध दीजिये और कलश पर स्वास्तिक बना लीजिये. कलश में कुमकुम और चावल के साथ सत्तू और गुड़ भी चढ़ाइए, साथ ही एक सिक्का भी चढ़ा दीजिये.
  • इसी तरह गणेश जी और लक्ष्मी जी को भी कुमकुम, चावल, सत्तू, गुड़, सिक्का और फल अर्पित कीजिये.
  • इसी तरह तीज पूजा अर्थात नीम की पूजा कीजिये, और सत्तू तीज माता को अर्पित कीजिये. इसके बाद दूध और पानी तालाब में डालिए.
  • विवाहित महिलाओं को तालाब के पास कुमकुम, मेंहदी और कजल के सात राउंड डॉट्स देना पड़ता है. साथ ही अविवाहित स्त्रियों को यह 16 बार देना होता है.
  • अब व्रत कथा शुरू करने से पहले अगरबत्ती और दीपक जला लीजिये. व्रत कथा को पूरा करने के बाद महिलाओं को तालाब में सभी चीजों जैसे सत्तू, फल, सिक्के और ओढ़नी का प्रतिबिंब देखने की जरूरत होती है, जोकि तीज माता को चढ़ाया गया था. इसके साथ ही वे उस तालाब में दीपक और अपने गहनों का भी प्रतिबिंब देखती हैं.
  • व्रत कथा खत्म हो जाने के बाद के कजरी गीत गाती हैं, और सभी माता तीज से प्रार्थना करती है. अब वे खड़े होकर तीज माता के चारों ओर तीन बार परिक्रमा करती हैं.
कजरी कजली तीज की कथा -
यहाँ बहुत सी कथाएं प्रचलित है. अलग- अलग स्थान में इसे अलग तरह से मनाते है इसलिए वहां की कथाएं भी अलग है. मै आपको कुछ प्रचलित कथाएं बता रही हूँ.

कजली तीज की पौराणिक व्रत कथा के अनुसार एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। भाद्रपद महीने की कजली तीज आई। ब्राह्मणी ने तीज माता का व्रत रखा। ब्राह्मण से कहा आज मेरा तीज माता का व्रत है। कही से चने का सातु लेकर आओ। ब्राह्मण बोला, सातु कहां से लाऊं। तो ब्राह्मणी ने कहा कि चाहे चोरी करो चाहे डाका डालो। लेकिन मेरे लिए सातु लेकर आओ।

रात का समय था। ब्राह्मण घर से निकला और साहूकार की दुकान में घुस गया। उसने वहां पर चने की दाल, घी, शक्कर लेकर सवा किलो तोलकर सातु बना लिया और जाने लगा। आवाज सुनकर दुकान के नौकर जाग गए और चोर-चोर चिल्लाने लगे।

साहूकार आया और ब्राह्मण को पकड़ लिया। ब्राह्मण बोला मैं चोर नहीं हूं। मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। मेरी पत्नी का आज तीज माता का व्रत है इसलिए मैं सिर्फ यह सवा किलो का सातु बना कर ले जा रहा था। साहूकार ने उसकी तलाशी ली। उसके पास सातु के अलावा कुछ नहीं मिला।

चांद निकल आया था ब्राह्मणी इंतजार ही कर रही थी। साहूकार ने कहा कि आज से तुम्हारी पत्नी को मैं अपनी धर्म बहन मानूंगा। उसने ब्राह्मण को सातु, गहने, रुपए, मेहंदी, लच्छा और बहुत सारा धन देकर ठाठ से विदा किया। सबने मिलकर कजली माता की पूजा की। जिस तरह ब्राह्मण के दिन फिरे वैसे सबके दिन फिरे... कजली माता की कृपा सब पर हो।

सात बेटों की कहानी
एक साहूकार था उसके सात बेटे थे. सतुदी तीज के दिन उसकी बड़ी बहु नीम के पेड़ की पूजा कर रही होती है तभी उसका पति मर जाता है. कुछ समय बाद उसके दुसरे बेटे की शादी होती है, उसकी बहु भी सतुदी तीज के नीम के पेड़ की पूजा कर रही होती है तभी उसका पति मर जाता है. इस तरह उस साहूकार के 6 बेटे मर जाते है. फिर सातवें बेटे की शादी होती है और सतुदी तीज के दिन उसकी पत्नी अपनी सास से कहती है कि वह आज नीम के पेड़ की जगह उसकी टहनी तोड़ कर उसकी पूजा करेगी. तब वह पूजा कर ही रही होती है कि साहूकार के सभी 6 बेटे अचानक वापस आ जाते है लेकिन वे किसी को दिखते नहीं है. तब वह अपनी सभी जेठानियों को बुला कर कहती है कि नीम के पेड़ की पूजा करो और पिंडा को काटो. तब वे सब बोलती है कि वे पूजा कैसे कर सकती है जबकि उनके पति यहाँ नहीं है. तब छोटी बहुत बताती है कि उन सब के पति जिंदा है. तब वे प्रसन्न होती है और नीम की टहनी की पूजा अपने पति के साथ मिल कर करती है. इसके बाद से सब जगह बात फ़ैल गई की इस तीज पर नीम के पेड़ की नहीं बल्कि उसकी टहनी की पूजा करनी चाहिए.

सत्तू की कहानी
एक किसान के 4 बेटे और बहुएं थी. उनमें से तीन बहुएं बहुत संपन्न परिवार से थी. लेकिन सबसे छोटी वाली गरीब थी और उसके मायके में कोई था भी नहीं . तीज का त्यौहार आया, और परंपरा के अनुसार तीनों बड़ी बहुओं के मायके से सत्तू आया लेकिन छोटी बहु के यहाँ से कुछ ना आया. तब वह इससे उदास हो गई और अपने पति के पास गई. पति ने उससे उदासी का कारण पुछा. उसने सब बताया और पति को सत्तू लेन के लिए कहा. उसका पति पूरा दिन भटकता रहा लेकिन उसे कहीं सफलता नहीं मिली. वह शाम को थक हार के घर आ गया. उसकी पत्नी को जब यह पता चला कि उसका पति कुछ ना लाया तब वह बहुत उदास हुई. अपनी पत्नी का उदास चेहरा देख चोंथा बेटा रात भर सो ना सका.  

अगले दिन तीज थी जिस वजह से सत्तू लाना अभी जरुरी हो गया था. वह अपने बिस्तर से उठा और एक किरणे की दुकान में चोरी करने के इरादे से घुस गया. वहां वह चने की दाल लेकर उसे पीसने लागा, जिससे आवाज हुई और उस दुकान का मालिक उठ गया. उन्होंने उससे पुछा यहाँ क्या कर रहे हो? तब उसने अपनी पूरी गाथा उसे सुना दी. यह सुन बनिए का मन पलट गया और वह उससे कहने लगा कि तू अब घर जा, आज से तेरी पत्नी का मायका मेरा घर होगा. वह घर आकर सो गया.

अगले दिन सुबह सुबह ही बनिए ने अपने नौकर के हाथ 4 तरह के सत्तू, श्रृंगार व पूजा का सामान भेजा. यह देख छोटी बहुत खुश हो गई. उसकी सब जेठानी उससे पूछने लगी की उसे यह सब किसने भेजा. तब उसने उन्हें बताया की उसके धर्म पिता ने यह भिजवाया है. इस तरह भगवान ने उसकी सुनी और पूजा पूरी करवाई.



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योग योगेश्वर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष

 
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देश में महापुरूषों की कमी नही रही है। अनेक महापुरूषों ने देश में अपने-अपने तरीके से समाज सुधार व मानव कल्याण के कार्य किए हैं। जिन्होंने अपने क्रियाकलापों से समाज की धारा को ही बदलने का कार्य किया है उन्हें अवतार कहा जाने लगा। वैदिक वांगम्य में उन्हें आप्त पुरूष के नाम से जाना जाता है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण इन महापुरूषों की श्रेणी में अग्रणी हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण महानता की चरम सीमा पार कर चुके थे, इसीलिए उन्हें आप्त पुरूष कहा जाता है। उनके मुख से निकले शब्द शास्त्र बन जाते थे, जिनका पथ प्रबुद्घ लोगों का मार्ग बन जाता था तथा उनके द्वारा किए गए कर्म एक उदाहरण प्रस्तुत करने वाले होते थे। उसी श्रीकृष्ण ने अपने गीता के उपदेश में कहा कि-

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम॥

यानि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्घि होती है, धर्म की स्थापना के लिए तब-तब वे संसार में प्रकट होते हैं। हालांकि यह गौणिक वाक्य हैं, परन्तु इसे समझने की आवश्यकता है। ऐसे महामना जिनके जन्म दिवस को पूरी दुनिया बड़े चाव व खुशी से मनाती है तो प्रत्येक व्यक्ति उनके जन्म समय के बारे में जानना चाहता है। अब प्रश्न उठता है कि योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म कब हुआ। उनके जन्म विषय में कम्प्युटर ज्योतिषी  ने काल गणना की है। यह गणना वैदिक विद्वानों से भी मेल खाती है। इस गणना पर विश्वास किया जा सकता है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण का जन्म भाद्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था श्रीकृष्ण ने दुष्टों का नाश करने के लिए अपने जीवन में अनेक युद्घ किए थे। महाभारत का युद्घ उन सभी युद्घों में सबसे बड़ा और भयानक युद्घ था। महाभारत के युद्घ के दौरान एक पखवाडा 15 दिनों की बजाय 13 दिनों का आया था। इसी दिन सम्पूर्ण सूर्य ग्रहण भी लगा था तथा इस दिन जयद्रथ का वध भी हुआ था। इस युद्घ में श्रीकृष्ण की आयु 89 वर्ष 7 माह बनती है। इसके ठीक 36 वर्ष पश्चात फिर एक पखवाडा 13 दिनों का आया था, उस दिन श्रीकृष्ण ने अपने प्राण त्याग दिए थे।

श्रीकृष्ण के गुणों का बखान करना मुश्किल ही नही बल्कि असम्भव हैं। वे सम्पूर्ण मानव थे। वे योगियों में महायोगी, ऋषियों में महर्षि, तपस्वियों में तपस्वी, विद्वानों में महाविद्वान तथा महान दार्शनिक, अपराजय यौद्घा और उत्तम कोटी के वैज्ञानिक थे। श्रीकृष्ण एक अच्छे शिक्षक, लेखक और महान तत्ववेता थे। वे आप्त पुरूष थे, जिनकी तुलना किसी से नही की जा सकती है। इन गुणों के भंडार के कारण मृत्यु लोक के जन उन्हें भगवान कह कर पुकारते हैं। ऐसा कह कर वे न केवल अपनी जिम्मेदारियों से भागते हैं बल्कि श्रीकृष्ण की महानता को नकार कर उन्हें भगवान के चोले में समाहित कर रहे हैं। भगवान सृष्टि के जनक होते हैं परन्तु श्रीकृष्ण ऐसे नही थे लेकिन उनके अनेक गुण भगवान से मेल खाते थे। इसलिए उन्हें भगवान कहा जाने लगा। वैसे ऐसे महापुरूष जिनमें ‘बल, बुद्घि, ज्ञान, तप, यश और ऐश्वर्य’ ये छः गुण विद्यमान हों उन्हें भगवान कहा जाता है। श्रीकृष्ण में ये सभी गुण मौजूद थे।

बल - योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कंस के धनुषकोटी यज्ञ के दौरान कंस सहित बडे़-बड़े महाबलियों को मलयुद्घ में पछाड़ कर यह सिद्घ कर दिया था कि उनसे अधिक बलशाली पृथ्वी पर कोई और नही है।

बुद्घि - कहा जाता है कि ‘बुद्घिर्यस्य बलम तस्य’ अर्थात जिनके पास बौद्घिक बल होता है, उसके समान बलवान कोई नही होता। जहां शारीरिक बल काम नही आया श्रीकृष्ण ने वहां बौद्घिक बल से शत्रु का नाश किया था। कालयवन की मृत्यु इसका अच्छा उदाहरण है।

ज्ञान - योगेश्वर श्रीकृष्ण महान विद्वान थे। चारों वेदों की अधिकतम ऋचाएं उन्हें कंठस्थ थी। इसी के परिणामस्वरूप उन्होंने महाभारत के युद्घ के दौरान मात्र एक घंटे में अर्जुन का मोह भंग किया था।

तप - कृष्णदत्त ब्रह्मचारी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि श्रीकृष्ण एक महान तपस्वी थे। उन्होंने केदारनाथ में अपने 12 वर्ष की अखंड तपस्वा व शौध के फलस्वरूप सुदर्शन चक्र अस्त्र का निर्माण किया था। इस अस्त्र की काट संसार के किसी भी यौद्घा के पास नही थी। उन्होंने ब्रह्मचर्य तप का पालन करते हुए विवाह के 12 वर्षों पश्चात प्रद्युम्न जैसे परमवीर पुत्र को जन्म दिया था।

यश - श्रीकृष्ण की संसार में व्यापकता जगजाहिर है। अपने समकाल के दौरान उनकी महानता की गाथा से ऋषि, मुनि, महात्मा, राजा, प्रजा तथा आम नागरिक परिचित था। यह प्रसिद्घि ही यश कहलाती है।

ऐश्वर्य - बड़े से बडे़ राजा, सम्राट तथा इन्द्र आदि भी उनके ऐश्वर्य के सामने फीके थे। संसार में उपभोग की प्रत्येक वस्तु उनके पास थी। कहीं कोई न्यूनता या अभाव दृष्टिगोचर नही होता था। अतः श्रीकृष्ण सम्पूर्ण ऐश्वर्यशाली थे।

इन सभी छः गुणों से युक्त व्यक्ति विरले ही होते है। श्रीकृष्ण उनमें विरलों में से एक विरले थे। इसीलिए उन्हें भगवान की उपाधि से नवाजा गया है।

संसार में यह आम धारणा बनी हुई है कि भगवान श्रीकृष्ण के 16108 गोपियां थी और वे उनमें रमण रहते थे। इस पर भी कृष्णदत्त ब्रह्मचारी ने बड़ा सुन्दर विवरण किया है। उन्होंने लिखा है कि गोपियां वेद की ऋचाओं यानि वेद मंत्रों को कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण को वेद के कुल 19404 मंत्रों में से 16108 मंत्र कंठस्थ थे और वे उन्हीं मंत्रों के ज्ञान विज्ञान में रमण रहते थे। भगवान श्रीकृष्ण इन्हीं ऋचाओं का मंथन कर उनसे समाज के उत्थान का मार्ग ढूंढते रहते थे। श्रीकृष्ण जैसे पुरूष द्वारा 16 हजार रानियां अपने रनिवास में रखना तथ्यपरक भी नही लगता है।

भगवान श्रीकृष्ण की महानता के कारण उन्हें सम्पूर्ण षोडश कला युक्त माना जाता है, जबकि श्रीराम को 12 कलाओं के ज्ञाता समझा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की 16 कलाओं से पहले हमें कला की परिभाषा को जानना होगा। आखिर कला होती क्या है? किसी भी कार्य में विलक्षण प्रतिभा का होना कला कहलाती है। चन्द्रमा की भी 16 कलाएं होती है, जोकि शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर प्रतिदिन बढती हुई पूर्णिमा को सम्पूण चन्द्रमा होने पर 16 कलाएं पूर्ण मानी जाती है। इसी प्रकार श्रीकृष्ण की प्रतिभा भी चंद्रकलाओं की भांति प्रतिदिन बढती हुई पूर्णता को प्राप्त होती रही है। इसी लिए उन्हें 16 कलाओं से युक्त महापुरूष माना जाता है।

षोडश कलाओं के विषय में अलग-अलग विद्वानों के भिन्न-भिन्न विचार हैं। अपने चिंतन के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की 16 कलाएं 16 विभिन्न विषय हैं, जिनमें उन्हें पारंगतता प्राप्त थी। इन कलाओं के जानने के पश्चात संसार में जानने लायक कुछ और नही रह जाता। अकेले श्रीकृष्ण को उन 16 विषयों में महारत हासिल थी, जिन एक-एक विषय पर आजकल पीएचडी करवाई जाती है। ये कलाएं इस प्रकार से हैं।

श्रृंगार कला - भगवान श्रीकृष्ण को श्रृंगार की बारिकियों का इतना ज्यादा ज्ञान था कि उसके श्रृंगार रूप को देखकर गोकुल की कन्याएं (गोपिया) उनके मनमोहक रूप को निहारती रहती थी। उनके गले में दुपट्टा, कमर पर तगड़ी, पीताम्बर अंग वस्त्र, सिर पर छोटा मुकुट तथा उसपर मोर पंख श्री की सुन्दरता में चार चांद लगाता था।

वादन कला - भगवान को वादन के सभी स्वरों का पूर्ण ज्ञान था, जिसके परिणास्वरूप वे अपनी बांसूरी से बड़े बड़ों को अपने अनुचर बना लेते थे।

नृत्य कला - श्रीकृष्ण को नृत्य का पूर्ण ज्ञान था, इसी लिए गोकुल की देवियां उनके नृत्य की प्रशंसा करते-करते श्रीकृष्ण का नृत्य देखने की हठ करती थी।

गायन कला - श्रीकृष्ण एक अच्छे गायक भी थे। वेद के मंत्रों का गायन कर उन्होंने अर्जुन को मोहपाश के मुक्त कर दिया था।

वाकमाधूर्य कला - श्रीकृष्ण की वाणी में विलक्षण मधुरता व्याप्त थी। वे जिस किसी से भी वार्ता करते थे, वह हमेशा के लिए उनका हो जाता था।

वाकचातुर्य कला - उनकी वाणी में चतुरता भी थी। वे बडे़ सहज भाव से अपनी बात को मनवा लेते थे और सामने वाले को अपना विरोद्घि भी नही बनने देते थे। महाभारत में ऐसे अनेक प्रकरण सामने आए हैं।

वक्तृत्व कला - भगवान एक महान वक्ता थे। बड़े-बड़े धूरंधरों को उन्होंने अपने प्रभावशाली वक्तव्यों से धराशाही कर उनको उनके ही बनाए जाल में फांस लिया था। कालयवन उसका एक अच्छा उदाहरण है।

लेखन कला - श्रीकृष्ण ने मात्र एक घंटे के सुक्ष्मकाल में गीता की रचना कर एक ऐतिहासिक कार्य किया है। उनका मुकाबला आज तक या इससे पहले कोई नही कर सका। अतः भगवान एक उत्तम कोटी के लेखक भी थे।

वास्तुकला - भगवान श्रीकृष्ण को वास्तुकला का भी अकाटय ज्ञान था। पांडवों के लिए इन्द्रप्रस्थ और स्वयं अपने लिए राजधानी द्वारका का निर्माण वास्तुकला के बेजोड़ नमूने थे।

पाककला - भगवान श्रीकृष्ण पाक शास्त्र के भी महान पंडित थे। सम्राट युधिष्ठर के राजसूय यज्ञ के दौरान खाने-पीने का पूरा सामान उनकी देख-रेख में ही तैयार किया गया था।

नेतृत्व कला - कृष्ण में नेतृत्व करने की क्षमता बेजोड थी। वे जहां भी गए नेतृत्व उनके पीछे-पीछे हो जाता था। सभी युद्घों से लेकर आम सभाओं में हमेशा सभी ने उन्हीं के नेतृत्व को स्वीकार किया था।

युद्घ कला - श्रीकृष्ण की अधिकतर आयु युद्घों में ही व्यतीत हुई थी परन्तु हमेशा उन्होंने सभी में विजय प्राप्त की। वे युद्घ की सभी विधाओं का सम्पूर्ण ज्ञान रखते थे।

शस्त्रास्‍त्र कला - योगेश्वर श्रीकृष्ण को युद्घ में प्रयोग होने वाले सभी व्यूहों की रचना, उन्हें भंग करने की कला तथा आग्नेयास्त्र, वरूणास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र सहित सभी अस्त्र शस्त्रों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त था।

अध्यापन कला - भगवान श्रीकृष्ण एक सफल अध्यापक भी थे। युद्घ क्षेत्र में जिस प्रकार उन्होंने अर्जुन को निष्कामकर्म योग, सांख्य योग, विभूति योग, भक्ति योग, मोक्ष सन्यास योग तथा विश्वरूप दर्शन योग का पाठ पढाया, वह हमेशा अनुक्रणीय रहेगा।

वैद्यक कला - श्रीकृष्ण आयूर्वेद के भी सम्पूर्ण ज्ञाता थे। कंस की फूल चुनने वाली दासी कुबड़ी के शरीर को सीधा करना तथा महाभारत युद्घ में अश्वथामा के प्रहार से मृतप्रायः हुए परीक्षित को जीवन दान देना इसके अकाट्य उदाहरण है।

पूर्वबोध कला - भगवान ने तप से अपनी आत्मा को इतना पवित्र और उर्द्घव गति को प्राप्त करवा लिया था कि उन्हें किसी भी घटना का पहले से ही अनुमान हो जाता था। यदि देखा जाए तो इन कलाओं को जानने के पश्चात और कुछ जानने योग्य नही रह जाता। इसलिए श्रीकृष्ण एक सम्पूर्ण मानव थे।

वैदिक विद्वान स्वामी विदेह योगी ने श्रीकृष्ण के विषय में कहा कि वे एक महामानव थे और उनकी तुलना अभी तक किसी भी महापुरूष से नही की जा सकती। पौराणिक मान्यताओं में राम और कृष्ण को छोड़ किसी भी अवतार के साथ कलाओं का जिकर नही आता है। राम सूर्यवंशी थे और संसार में 12 आदित्य माने जाते है। इसलिए राम को 12 कलाओं से युक्त माना जाता है। परन्तु श्रीकृष्ण चंद्रवंशी थे और चंद्रमा की 16 कलाएं होती हैं इसलिए उन्हें 16 कलाओं का ज्ञाता माना जाता है।

स्वामी जी ने कहा कि संसार में आम व्यक्ति अपने दिमाग का 2 से अढाई फीसदी ही प्रयोग करता है परन्तु कोई वैज्ञानिक 3 से साढे तीन फीसदी दिमाग प्रयोग करता है। लेकिन श्रीराम अपने दिमाग का 12 फीसदी और श्रीकृष्ण 16 फीसदी दिमाग का प्रयोग करते थे। इसलिए उन्हें 12 व 16 कलाओं से युक्त माना जाता है। चाहे कुछ भी हो श्रीकृष्ण एक महामानव थे और उनका जन्मदिन मनाना तभी सार्थक होगा जब हम उनके किसी एक गुण का भी अनुक्रण कर सकेंगे।



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हनुमान चालीसा में सूर्य से पृथ्वी की दूरी बताई गयी है ?

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यह निस्संदेह सत्य है कि ” हनुमान चालीसा” में पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी का उल्लेख है । मॉडरेन एस्ट्रोनॉमी एंड साइंस के अनुसार, हम जानते हैं कि सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा एक वृत्त नहीं है और थोड़ा अण्डाकार है । इसलिए, पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी पूरे वर्ष बदलती रहती है। सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा दीर्घवृत्त पर अपने निकटतम बिंदु पर, पृथ्वी सूर्य से 91,445,000 मील (147,166,462 किलोमीटर) दूर है। पृथ्वी की कक्षा में इस बिंदु Periapsis (के रूप में जाना जाता है नेपच्यून ) और यह जनवरी 3 के आसपास होता। पृथ्वी 3 जुलाई के आसपास सूर्य से सबसे दूर है जब यह सूर्य से 94,555,000 मील (152,171,522 किमी) दूर है। पृथ्वी की कक्षा में इस बिंदु को  Apoapsis कहा जाता है।  पृथ्वी से सूर्य की औसत दूरी 92,955,807 मील (149,597,870.691 किमी) है।
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हनुमान चालीसा में उल्लिखित सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी:-

रिकॉर्ड्स के अनुसार, 1672 में पहली बार जीन रिचर और जियोवानी डोमेनिको कैसिनी ने दूरी नापी, पृथ्वी और सूर्य के बीच पृथ्वी की त्रिज्या का 22,000 गुना है। (पृथ्वी की त्रिज्या 6,371 किलोमीटर है)। यानी 22000 * 6371 किलोमीटर = 140,162,000 किलोमीटर (140 मिलियन किलोमीटर)। हिंदू प्रार्थना की दो पंक्तियाँ “हनुमान चालीसा” इस दूरी की गणना बड़ी सरलता से करती हैं।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।

यह दोहा अवधी भाषा में है इस दोहे का हिंदी भाषा में अर्थ है कि हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।

दोहे के हर एक शब्द के गणित को वैदिक ज्योतिष के आधार पर ऐसे समझिए-
सतयुग = 4800 दिव्य वर्ष
त्रेतायुग = 3600 दिव्य वर्ष
द्वापरयुग = 2400 दिव्य वर्ष
कलियुग = 1200 दिव्य वर्ष

जुग( युग) = 12000 वर्ष
एक सहस्त्र = 1000
एक जोजन (योजन) = 8 मील
भानु = सूर्य

युग x सहस्त्र x योजन = पर भानु यानि सूर्य की दूरी
12000 x 1000 x 8 मील = 96000000 मील
एक मील = 1.6 किमी
96000000 x 1.6 = 153600000 किमी
इसी के आधार गोस्वामी तुलसीदास ने बता दिया था कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है।
 

दोहे का पूरा प्रसंग इस प्रकार है-

हनुमानजी को भगवान शंकर का अवतार माना गया है और उनको जन्म से ही कई दिव्य शक्तियां प्राप्त हैं। हनुमान चालीसा के अनुसार बहुत छोटी अवस्था में जब बाल हनुमान खेल रहे थे, तब उन्हें सूरज ऐसे दिखाई दे रहा था जैसे वह कोई मीठा फल हो। उस फल को प्राप्त करने के लिए बाल हनुमान सूर्य तक उड़कर चले गए। अपनी दिव्य शक्तियों के बल से उन्होंने अपना आकार इतना बड़ा कर लिया कि सूर्य उनके मुंह में समा गया। सभी देवी- देवता जब डर गए तब इंद्र ने बाल हनुमान की ठोड़ी पर वज्र से प्रहार कर दिया। इस प्रहार से केसरी नंदन की ठोड़ी कट गई और इसी वजह से वे हनुमान कहलाए। संस्कृत में ठोड़ी को हनु कहा जाता है।

सूर्य से पृथ्वी की दूरी को 1AU (astronomical unit) कहा जाता है , जो 149,597,870,700 मीटर  के बराबर है। ये दूरी आज के आधुनिक उपकरणों से नापी गयी है ।

अब अगर हम इस से ये समझें की तुलसीदास जी ने सूर्य से पृथ्वी की दूरी का वर्णन हनुमान चालीसा में कर दिया, तो ये आस्था के हिसाब से गलत नहीं है। दोनों दूरियां लगभग एक सामान ही हैं।

कुछ व्यक्ति इस हिसाब को संशय की दृष्टी से देखते हैं।  उनका ये मानना है कि इन तीनो अंकों में केवल सहस्र ही एक ऐसा अंक है जिसका मान बिना किसी संशय के 1000 बताया जा सकता है । युग और योजन का मान अलग अलग पुस्तकों में अलग अलग दिया गया है । कोई व्यक्ति युग का 12000 वर्ष का बताता है, तो कोई 1200 दिव्य वर्ष का और एक दिव्य वर्ष का पृथ्वी के 360 वर्षों के बराबर भी बताया गया है ।

विकिपीडिया पर एकत्रित जानकारी के अनुसार चारों युगों की अवधि अलग अलग है , कलियुग 1200 दिव्य वर्ष , द्वापर युग 2400 दिव्य वर्ष , त्रेता युग 3600 दिव्य वर्ष और सतयुग 4800 दिव्य वर्ष के बताये गए हैं । इस प्रकार चारों युगों को मिला कर बनने वाला एक महा-युग 12000 दिव्य वर्षों के बराबर बनता है , जिसका उल्लेख हनुमान चालीसा की इस चौपाई में हुआ है । हालांकि इस चौपाई में "महा-युग" शब्द का प्रयोग न करके केवल "युग" शब्द का प्रयोग हुआ है। किन्तु एक कवि को पंक्तियों में ताल मेल बिठाने के लिए शब्दों में इतना हेर फेर तो करना ही पड़ता है।

योजन एक संस्कृत भाषा का शब्द है जिसे दूरी नापने के लिए वैदिक काल से उपयोग किया जा रहा है | अलग अलग समय और स्थान पर इसकी लम्बाई अलग अलग पाई गई है।  वैसे एक योजन को 4 कोस के बराबर माना जाता है , और कोस लगभग 2 से 3.5 km का होता है।  इस प्रकार योजन की लम्बाई 12 से 15 km के बराबर होती है । अर्थशास्त्र में दिए गए तथ्यों के अनुसार योजन की सर्वमान्य लम्बाई 12.3 km है ।

इन तीनो अंकों की गुणा से जो अंक प्राप्त होता है वह सूर्य की लगभग औसत दूरी ही है।

अब यदि हम थोडा और गहराई में जाएँ तो ये प्रश्न मन में उठता है की क्या गोस्वामी तुलसीदास जी ने पृथ्वी से सूर्य की दूरी की गणना करी थी। इस का बड़ा सरल सा जवाब है , नहीं । तुलसीदास जी सोलहवी सदी के कवि थे , जो केवल 500 साल पुरानी बात है । उस समय से पहले ही बहुत से खगोलीय खोजें हो चुकी थी । वैसे भी भारत वैदिक काल से ही महान विद्वानों और गणितज्ञों की भूमि रही है। शून्य की खोज से लेकर ज्यामिति (Geometry) तक की खोज में इनका योगदान रहा है। इसलिए सूर्य की दूरी भी इस समय से पहले ही भारतीय विद्वानों ने खोज ली होगी , जिसका वर्णन तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में किया है।

लगभग 250 BC में Aristarchus नामक ग्रीक विद्वान ने सूर्य की दूरी खोज ली थी और सन 1653 में पश्चिमी विद्वान Christiaan Huygens ने भी यह खोज की थी | पुराने समय में अपनी खोजों को पेटेंट (Patent) कराने की कोई व्यवस्था नहीं थी , अन्यथा भारतीय विद्वानों के नाम अनगिनत और खोजों के पेटेंट होते।

हनुमान चालीसा की चौपाई से ये प्रमाणित होता है की भारत के विद्वानों को सूर्य की दूरी ज्ञात थी और शायद यह पुराने गुरुकुलों में पढाई भी जाती थी , इसीलिये गोस्वामी तुलसीदास ने इतनी सरलता से इसे पंक्तिबद्ध भी कर दिया।



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रामायण व महाभारत के कौन से पात्र जो अमर हैं और उनके आज भी जीवित होने की बात कही जाती है?

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इससे पहले कि मैं उत्तर दूं, एक बात समझना बहुत आवश्यक है कि "चिरंजीवी" का अर्थ ये नही कि वे कभी मृत्यु को प्राप्त ही नही होंगे। यहाँ चिरंजीवी का अर्थ है कि ये सभी लोग कलियुग के अंत तक जीवित रहेंगे। कई स्थान पर ये भी लिखा गया है कि ये सभी कल्प (ब्रह्मा जी का आधा दिन) के अंत तक जीवित रहेंगे। किन्तु जब कल्पान्त पर प्रलय आएगी तो इनका अंत भी हो जाएगा।

इसीलिए ये कभी ना समझें कि ये सभी सदा के लिए अमर हैं। किंतु चूंकि एक चतुर्युग, या उससे भी अधिक एक कल्प (1000 चतुर्युग) इतना बड़ा कालखंड है कि हम मान लेते हैं या आम भाषा मे कह देते हैं कि ये अमर हैं। अमर यहाँ कोई नही है। यहाँ तक कि परमपिता ब्रह्मा भी अपनी आयु समाप्त कर परमात्मा में लीन हो जाते हैं।

अब यदि आपको चिरंजीवी का वास्तविक अर्थ समझ आ गया हो तो आपके मूल प्रश्न पर आते हैं। वैसे तो हमारे धार्मिक ग्रंथों में कई व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें चिरंजीवी माना गया है किंतु उनमे से भी सात ऐसे लोग हैं जो प्रसिद्ध हैं और इन्हें "सप्तचिरंजीवी" कहा जाता है। इनके बारे में एक श्लोक कहा गया है-

अश्वत्थामाबलिर्व्यासोहनुमांश्च विभीषण:कृपश्चपरशुरामश्च सप्तैतेचिरंजीविन:।

अर्थात: अश्वत्थामा, बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य एवं परशुराम सप्तचिरंजीवी हैं।

कई जगह "अष्टचिरंजीवी" का भी वर्णन मिलता है जिसमें मार्कण्डेय ऋषि को भी जोड़ा जाता है।

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:। कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥ सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित॥

अर्थात: अश्वत्थामा, बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य एवं परशुराम, इन सप्तचिरंजीवियों के साथ आठवें चिरंजीवी मार्कण्डेय का प्रतिदिन स्मरण करने से मनुष्य को कोई व्याधि (बीमारी) नही होती और वो शतायु (100 वर्ष) होता है।

यह है अष्टचिरंजीवी -

  • अश्वत्थामा: द्रोणाचार्य और कृपी के महारथी पुत्र जिन्हें श्रीकृष्ण ने कलियुग के अंत तक जीवित रहने का श्राप दिया था। वैसे अमरत्व का वरदान इन्हें इनके पिता द्रोण ने दिया था।
  • बलि: दैत्यराज बलि हिरण्यकशिपु के प्रपौत्र, प्रह्लाद के पौत्र एवं विरोचन के पुत्र थे जिनके उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने वामन रूप में अवतार लिया था। उन्होंने ही इन्हें अमरता का वरदान दिया था।
  • वेदव्यास: महर्षि पराशर और सत्यवती के पुत्र जिन्होंने वेदों को संजोया एवं महाभारत एवं 18 पुराणों की रचना की। इन्हें अमरत्व परमपिता ब्रह्मा से मिला था।
  • हनुमान: रामभक्त, महावीर पवनपुत्र। इनके शौर्य की गाथाओं से हमारे धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं। इन्हें श्रीराम ने अमरत्व का वरदान दिया था।
  • विभीषण: विश्रवा एवं कैकसी पुत्र, रावण एवं कुम्भकर्ण के छोटे भाई एवं रावण के पश्चात लंका के राजा। इन्हें भी श्रीराम ने ही अमरत्व प्रदान किया था।
  • कृपाचार्य: महर्षि शरद्वान के पुत्र और कृपी के भाई। महान योद्धा और कौरवों और पांडवों के कुलगुरु। इन्हें अमरत्व श्रीकृष्ण ने प्रदान किया था।
  • परशुराम: जमदग्नि पुत्र, शिव शिष्य, सहस्त्रबाहु हंता परशुराम श्रीहरि के छठे अवतार हैं। जब इन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अपनी माता रोहिणी का मस्तक काटा तब जमदग्नि ऋषि ने ही इन्हें अमरत्व का वरदान प्रदान किया।
  • मार्कण्डेय: महान शिवभक्त, महर्षि भृगु के पोते। इन्हें 16 वर्ष की आयु प्राप्त हुई किन्तु इन्होंने महाकाल को प्रसन्न कर काल को भी परास्त किया। महादेव से इन्हें अमरत्व का वरदान मिला।

इन सबके अलावा कई और हैं जो अमर माने जाते हैं किंतु उनका वर्णन सप्तचिरंजीवियों या अष्टचिरंजीवियों में नही होता। उनमे प्रमुख हैं लोमश ऋषि, काकभुशुण्डि, प्रत्येक मन्वंतर के सभी सप्तर्षि इत्यादि।

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क्या रामायण काल के वो 12 पात्र जो महाभारत काल में भी मौजूद थे

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भगवान राम त्रेता युग में थे और भगवान कृष्ण द्वापर युग में। हालांकि दोनों ही देवता भगवान विष्णु के ही अवतार माने जाते हैं लेकिन दोनों का जन्म अलग अलग युगों में हुआ और इन दोनों के जीवन के विभिन्न घटनाओं से प्रेरित दो बेहद ही महत्वपूर्ण और पवित्र ग्रंथ हमारे धर्म में मौजूद है; रामायण और महाभारत।

यकीनन दोनों ही इष्टों का जन्म अलग-अलग युगों में हुआ ऐसे में यह बात असंभव प्रतीत होती है कि कोई भी एक इंसान इन दोनों ही इष्टों के दर्शन कर पाया हो या फिर यूं कहें कि इन दोनों के अस्तित्व में होने का साक्षी रहा हो लेकिन आज हम आपको इस लेख में ऐसे बारह महापुरुषों के बारे में बताएँगे जो रामायण काल के भी साक्षी रहे और महाभारत काल को भी उन्होंने देखा था।

जामवंत

जामवंत रामायण के एक बहुत ही महत्वपूर्ण किरदार थे और भगवान श्री राम के वानर सेना के सदस्य भी थे। ये जामवंत ही थे जिन्होंने समुद्र लांघते वक़्त भगवान हनुमान को उनकी शक्तियां याद दिलाई थी जिसकी वजह से हनुमान जी माता सीता से लंका जाकर मिल पाये। 

लेकिन जामवंत का महाभारत के समय में भी होने के साक्ष्य मिलते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार स्यमंतक मणि को हासिल करने के लिए जामवंत ने भगवान कृष्ण से नंदिवर्धन पर्वत पर 27 दिनों तक युद्ध किया था। बाद में जब उन्हें भगवान कृष्ण के विष्णु अवतार होने की बात पता चली तो उन्होंने युद्ध बंद कर दिया और अपनी पुत्री जामवंती से श्री कृष्ण का विवाह करवाया।

दुर्वासा ऋषि

मान्यता है कि दुर्वासा ऋषि सतयुग, त्रेता और द्वापर तीनों ही युगों में मौजूद थे। दुर्वासा ऋषि को उनके अत्यंत क्रोधी स्वभाव की वजह से जाना जाता है। मान्यता है कि उन्होंने ही शकुंतला को श्राप दिया था कि उनका प्रेमी उन्हें भूल जाये। 

खैर, रामायण के वक़्त भी ऋषि दुर्वासा का जिक्र मिलता है जब भगवान राम और यमराज किसी विषय पर चिंतन कर रहे होते हैं और यमराज भगवान राम के सामने यह शर्त रखते हैं कि जो भी इस चिंतन में व्यवधान डालेगा उसकी मृत्यु हो जाएगी। इस वजह से भगवान राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण को द्वार की रक्षा करने को भेजते हैं ताकि कोई भी अंदर न आ सके। लेकिन इस चिंतन व विमर्श के बीच दखल तब पड़ जाता है जब लक्ष्मण को ऋषि दुर्वासा क्रोधित होकर यह कह बैठते हैं कि अगर अभी इसी वक़्त भगवान राम ऋषि दुर्वासा से नहीं मिले तो वे समस्त अयोध्या नगरी को श्राप दे देंगे। बाद में ऋषि दुर्वासा के श्राप के भय से लक्ष्मण को उस चिंतन और विमर्श के बीच दखल डालना पड़ा था।

ऋषि दुर्वासा का जिक्र महाभारत में भी मिलता है। राजा कुंतिभोज ने कुंती नामक एक कन्या को गोद लिया था। एक बार ऋषि दुर्वासा राजा कुंतिभोज के यहां पधारते हैं। कुंती को ऋषि दुर्वासा के शीघ्र क्रोधित होने के स्वभाव का भान था इसलिए उन्होंने ऋषि दुर्वासा के आवभगत में कोई कमी नहीं रखी। इस आवभगत से ऋषि दुर्वासा कुंती पर बेहद प्रसन्न होते हैं और जाते जाते कुंती को अथर्ववेद का वो मंत्र बताते हैं जिससे कोई भी स्त्री अपने इष्ट का ध्यान कर संतान प्राप्त कर सकती है। कुंती ने ऋषि दुर्वासा के बताए मंत्र की शक्ति को देखने के लिए विवाह से पूर्व ही भगवान सूर्य का ध्यान किया था जिस वजह से कर्ण का जन्म हुआ था।

नारद मुनि

नारद मुनि का भी महाभारत और रामायण, दोनों ही ग्रन्थों में अलग-अलग जगहों पर जिक्र मिलता है। रामायण काल में ये नारद मुनि ही थे जिन्होंने ऋषि वाल्मीकि को रामायण लिखने का सुझाव दिया था।

महाभारत काल में नारद मुनि का जिक्र उस समय आता है जब भगवान कृष्ण कौरवों के पास पांडवों का शांति समझौता लेकर गए थे जिसमें पांडवों ने कौरवों से बस पांच गांव मांगे थे। 

भगवान परशुराम

भगवान परशुराम का भी जिक्र दोनों ही काल में मिलता है। रामायण में भगवान परशुराम भगवान राम पर तब क्रोधित हो जाते हैं जब माता सीता के स्वयंवर के दौरान प्रभु श्री राम भगवान शंकर का धनुष उठा कर तोड़ देते हैं। आपको बता दें कि भगवान शंकर परशुराम के गुरु थे।

महाभारत में भी भगवान परशुराम का जिक्र कई जगहों पर आता है लेकिन सबसे चर्चित वाकया उनका कर्ण के साथ है क्योंकि कर्ण के गुरु परशुराम ही थे। चूंकि परशुराम सिर्फ ब्राह्मणों को ही शिक्षा देते थे ऐसे में छल कर भगवान परशुराम से विद्या प्राप्त करने की वजह से कर्ण को भगवान परशुराम का क्रोध भी झेलना पड़ा था।

भगवान हनुमान

भगवान हनुमान तो रामायण के महत्वपूर्ण किरदारों में से एक थे। श्री राम के परम भक्त के तौर पर वे पूरे जीवन भगवान राम की सेवा करते रहे।

वहीं महाभारत में भी भगवान हनुमान का कई जगहों पर जिक्र मिलता है। खास कर के एक किस्सा तो बहुत ही चर्चित है जब भीम और अर्जुन को अपनी शक्तियों का घमंड हो गया था, तब हनुमान जी ने ही उन दोनों का घमंड दूर किया था। भगवान कृष्ण के आदेश पर वे महाभारत युद्ध के दौरान सूक्ष्म रूप से अर्जुन के रथ पर भी विराजमान रहे थे। 

विभीषण

रामायण काल में विभीषण का जिक्र तो मिलता ही मिलता है। विभीषण भले ही दानव कुल में पैदा हुए और भगवान राम के शत्रु रावण के भाई थे लेकिन चरित्र और मन से वे पवित्रात्मा थे। उन्होंने ही भगवान राम को रावण की मृत्यु का भेद बताया था।

विभीषण का जिक्र महाभारत काल में तब मिलता है जब पांडव राजसूय यज्ञ कर रहे होते हैं। इस राजसूय यज्ञ में पांडव विभीषण को भी आमंत्रित करते हैं और विभीषण इस यज्ञ का हिस्सा भी बनते हैं जिसमें वे पांडवों को काफी धन और हीरे-जवाहरात दान में देते हैं।

मायासुर

मायासुर के बारे में शायद आप में से ज़्यादातर लोगों को जानकारी न हो। ऐसे में आपको बता दें कि मायासुर रावण के ससुर थे और मंदोदरी के पिता थे। 

वहीं महाभारत काल में मायासुर का जिक्र तब मिलता है जब पांडव दंडकारण्य के जंगल में आग लगा देते हैं। इस दौरान अर्जुन मायासुर के प्राणों की रक्षा करते हैं जिसके फलस्वरूप मायासुर पांडवों के लिए इंद्रप्रस्थ में एक मायावी महल का निर्माण करते हैं।

वायु देवता
रामायण काल में माता अंजनी ने पवन देव के पुत्र हनुमान को जन्म दिया था। वहीं महाभारत काल में पवन देव का तब जिक्र आता है जब कुंती राजा पांडु के अनुरोध पर महर्षि दुर्वासा के बताए मंत्र से पवन देवता का आवाहन करती हैं और फिर भीम का जन्म होता है। कहा जाता है कि भीम और हनुमान जी आपस में भाई ही थे।

ऋषि शक्ति
रामायण काल में प्रभु राम और लक्ष्मण जी के गुरु के रूप में हमें ऋषि वशिष्ठ का जिक्र मिलता है। ऋषि वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती का एक पुत्र भी था जिसका नाम शक्ति था। शक्ति भी आगे चल कर एक ऋषि बनते हैं। बाद में महाभारत काल में भी शक्ति ऋषि का जिक्र मिलता है। महाभारत में ऋषि शक्ति को पराशर मुनि का पिता बताया गया है। पराशर मुनि ही विष्णु पुराण के रचयिता हैं।

महर्षि भारद्वाज
महर्षि भारद्वाज का जिक्र रामायण में तब आता है जब भगवान राम माता सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के लिए निकलते हैं। तब उनकी सबसे पहले मुलाक़ात महर्षि भारद्वाज से ही होती है। महर्षि भारद्वाज वनवास काल के दौरान भगवान राम से उनकी कुटिया में ही रुक जाने का आग्रह करते हैं लेकिन भगवान राम बड़ी ही शालीनता से उनका अनुनय निवेदन ठुकरा देते हैं। वहीं महाभारत में महर्षि भारद्वाज को द्रोणाचार्य का पिता बताया गया है। द्रोणाचार्य पांडवों और कौरवों के गुरु थे। 

कुबेर
रामायण काल में कुबेर का जिक्र रावण के भाई के रूप में होता है। कुबेर के बेटे नलकुबेर के ही श्राप की वजह से रावण सीता माता को न अपने महल में रख पाया और न ही उनका कभी स्पर्श कर पाया।

महाभारत में कुबेर का वर्णन पुलस्त्य ऋषि के पुत्र के रूप में मिलता है। कहा जाता है कि कुबेर का जन्म एक गाय के गर्भ से हुआ था।

अगस्त्य मुनि
अगस्त्य मुनि ने ही अगस्त्य संहिता की रचना की थी। अगस्त्य मुनि को वशिष्ठ मुनि का बड़ा भाई बताया जाता है। वशिष्ठ मुनि ही श्री राम और लक्ष्मण के गुरु थे। बाद में जब भगवान राम माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाने लंका जा रहे थे तब वशिष्ठ मुनि उनसे मिलने आते हैं और उन्हें दिव्य तीर और धनुष सौंपते हैं। वहीं महाभारत में उनका जिक्र तब आता है जब उन्होंने विंध्य पर्वत को सूर्य देवता के आग्रह पर झुका दिया था।

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इस धरती पर मच्छरों का अस्तित्व कब से है, क्या रामायण व महाभारत काल में भी मच्छर थे

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मूल रूप से, मच्छरों का अस्तित्व है क्योंकि वे बाहर पोंछना असंभव के बगल में हैं। प्रजातियाँ एक निर्वात में मौजूद नहीं होती हैं; जब तक वे भोजन पा सकते हैं और उनके खिलाफ पर्यावरणीय दबाव नहीं है, वे जारी रखेंगे। मच्छर एक प्रजाति के रूप में लाखों साल पुराने हैं। पारिस्थितिक तंत्र में, वे अन्य प्रजातियों (पक्षियों, मेंढक, और मछली) के लिए भोजन और परागणकों के रूप में सेवा करते हैं। लार्वा पानी को साफ करने में मदद करता है, इसे साफ करने में मदद करता है। मच्छरों की 3,000 से अधिक प्रजातियां हैं, लेकिन केवल लगभग 200 काटने वाले मनुष्य हैं। यह हम सभी जानते है कि  मच्छर इंसान के जीवन में आने वाला शायद एकमात्र ऐसा जीव है जो उसके जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत उसके आसपास बना रहता है। यह तो हम सभी जानते हैं कि मच्छर गंदगी से पैदा होते हैं। परन्तु यहाँ प्रश्न यह है कि पृथ्वी पर मच्छरों का अस्तित्व कब से है। क्या रामायण काल या महाभारत काल में  भी मच्छर हुआ करते थे। 

क्या रामायण व महाभारत काल में भी मच्छर का अस्तित्वा था ? 

इस घटना के बारे में त्रेता युग में महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा के प्रथम महाकाव्य रामायण में इसका उल्लेख विस्तार से किया है। और तुलसी दास  रामचरित मानस  के पाचवें कांड (सुंदरकांड) के भाग 1  चतुर्थ पद में इसका वर्णन किया है - ("माता सीता की खोज मे हनुमान का लंका प्रस्थान" मे मसक (मच्छर) का जिक्र किया गया है। महर्षि वाल्मीकि व रामचरित के रचियता तुलसीदास ने लिखा है कि :-

चौपाई
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।

पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

दोहा/सोरठा
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

भावार्थ— हनुमान्‌ जी मच्छर के समान (छोटा सा) रूप धारण कर नर रूप से लीला करने वाले भगवान्‌ श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके लंका को चले (लंका के द्वार पर) लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली- मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है ?॥1॥

हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना जहाँ तक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्‌जी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर ल़ुढक पड़ी ॥2॥

वह लंकिनी फिर अपने को संभालकर उठी और डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। (वह बोली-) रावण को जब ब्रह्माजी ने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाश की यह पहचान बता दी थी कि ॥3॥

जब तू बंदर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्री रामचंद्रजी के दूत (आप) को नेत्रों से देख पाई ॥4॥

हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥4॥

पृथ्वी पर मच्छरों का अस्तित्व कब से है 

जैसा कि हम ऊपर पढ़ चुके हैं कि त्रेता युग में महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत के महाकाव्य रामायण में मच्छर का उल्लेख किया है। और तुलसीदास ने भी रामचरित मानस के पाचवें कांड (सुंदरकांड) के भाग 1  चतुर्थ पद में इसका वर्णन किया है - ("माता सीता की खोज मे हनुमान का लंका प्रस्थान" मे मसक (मच्छर) का जिक्र किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि त्रेता युग में भी मच्छरों का अस्तित्व था। उसके बाद भगवान श्री कृष्ण अवतार का द्वापर युग आया और अब इस समय कलयुग चल रहा है। यदि हिंदू धर्म शास्त्रों में की गई गणना के अनुसार देखे तो त्रेता युग में 1296000 सौर वर्ष थे और द्वापर युग में 864000 सौर वर्ष थे। यदि कलयुग के वर्ष को शामिल न किया जाए तब भी यह करीब-करीब 21 लाख 4 वर्षों से मच्छरो का अस्तित्वा इस पृथ्वी पर है।   

मच्छरों के बारे में 16 दिलचस्प तथ्य

मच्छरों , जो कीड़े सार्वभौमिक रूप से दुनिया से नफरत करते हैं। इन pesky, रोग ले जाने वाले कीटों में से कुछ भी, जो हमारे सहित चलता है, के बारे में खून चूसकर जीवन बनाते हैं। लेकिन मच्छर के दृष्टिकोण से चीजों को देखने के लिए एक क्षण ले लो। मच्छर वास्तव में दिलचस्प प्राणी हैं।

मच्छर पृथ्वी पर सबसे घातक जानवर हैं

उस सप्ताह ले लो, शार्क सप्ताह! ग्रह पर किसी भी अन्य जानवर की तुलना में अधिक मौतें मच्छरों से जुड़ी हैं। मच्छरों से मलेरिया, डेंगू बुखार, पीला बुखार, जीका और इंसेफेलाइटिस सहित कई जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं । मच्छर हार्टवॉर्म भी करते हैं, जो आपके कुत्ते के लिए घातक हो सकता है।

मच्छर कब तक जीते हैं?

एक वयस्क मच्छर 5 से 6 महीने तक जीवित रह सकता है। कुछ शायद यह है कि लंबे समय तक, हमारी प्रवृत्ति को देखते हुए उन्हें चुपचाप थप्पड़ मारा जब वे हम पर उतरते हैं। लेकिन सही परिस्थितियों में, एक वयस्क मच्छर में काफी लंबी जीवन प्रत्याशा होती है, जैसे कि कीड़े जाते हैं। अधिकांश वयस्क मादा दो से तीन सप्ताह तक जीवित रहती हैं। अपने गैरेज में उन सर्दियों के लिए, हालांकि - बाहर देखो। अंडे आठ महीने तक सूख सकते हैं और फिर भी हैच हो सकते हैं।

मादाएं मनुष्य को काटती हैं जबकि नर अमृत पर भोजन करते हैं

मच्छरों का मतलब व्यक्तिगत कुछ भी नहीं है जब वे आपका खून लेते हैं। मादा मच्छरों को अपने अंडों के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है और प्रजनन के लिए उन्हें रक्त का भोजन लेना चाहिए। क्योंकि पुरुष युवा पैदा करने का भार नहीं उठाते हैं, वे आपसे पूरी तरह से बचेंगे और फूलों के बदले सिर लेंगे। जब अंडे का उत्पादन करने की कोशिश नहीं की जाती है, तो महिलाएं अमृत से चिपककर खुश होती हैं।

कुछ मच्छर इंसानों को काटने से बचते हैं

मच्छरों की सभी प्रजातियाँ लोगों पर नहीं होती हैं। कुछ मच्छर अन्य जानवरों पर विशेषज्ञ होते हैं और हमें बिल्कुल भी परेशान नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए, कुलीसेटा मेलानुरा पक्षियों को लगभग विशेष रूप से और शायद ही कभी मनुष्यों को काटता है। एक और मच्छर प्रजाति,  यूरेनोटेनिया सैफिरिना , सरीसृप और उभयचरों को खिलाने के लिए जाना जाता है।

मच्छर धीरे-धीरे उड़ते हैं
मच्छरों की औसत उड़ान 1 से 1.5 मील प्रति घंटा होती है। यदि सभी उड़ने वाले कीड़ों के बीच एक दौड़ आयोजित की जाती, तो लगभग हर दूसरा प्रतियोगी पोके मच्छर को हरा देता। तितलियों, टिड्डियों, और मधुमक्खियों के छत्ते के आगे सब ठीक हो जाएगा।

एक मच्छर की पंख प्रति सेकंड 300-600 बार हराया
यह समझाता है कि चिड़चिड़ाहट भरी ध्वनि आप पर और मच्छरों के काटने से ठीक पहले सुनाई देती है।

मच्छर उनकी विंग बीट्स को सिंक्रोनाइज़ करते हैं
वैज्ञानिकों ने एक बार सोचा था कि केवल पुरुष मच्छर ही अपने संभावित साथियों की पंखों की धड़कन सुन सकते हैं, लेकिन एडीज एजिप्टी मच्छरों पर किए गए हालिया शोध ने साबित किया कि महिलाएं प्रेमियों के लिए भी सुनती हैं। जब नर और मादा मिलते हैं, तो उनके भिनभिनाने की गति समान होती है।

नमक मार्श मच्छरों को दूर कर सकते हैं 100 मील दूर
अधिकांश मच्छर अपने पानी के प्रजनन के मैदान से निकलते हैं और घर के बहुत करीब रहते हैं। लेकिन कुछ, नमक मार्श मच्छरों की तरह, रहने के लिए उपयुक्त स्थान खोजने के लिए लंबी दूरी की उड़ान भरेंगे, वे सभी अमृत और रक्त के साथ जो वे पीना चाहते थे।

सभी मच्छरों को नस्ल के लिए पानी चाहिए - लेकिन ज्यादा नहीं
बस कुछ इंच पानी एक मादा को अपने अंडे जमा करने में लगता है। टाइनी मच्छर का लार्वा बर्डबैथ, रूफ गटर, और पुराने टायरों में खाली जगह में जल्दी विकसित होता है। कुछ प्रजातियाँ बारिश के मौसम के बाद बचे हुए पोखरों में प्रजनन कर सकती हैं। यदि आप अपने घर के आसपास मच्छरों को नियंत्रण में रखना चाहते हैं, तो आपको हर कुछ दिनों में किसी भी खड़े पानी को डंप करने के बारे में सतर्क रहने की आवश्यकता है ।

अधिकांश मच्छर केवल 2-3 मील की यात्रा कर सकते हैं
आपके मच्छर मूल रूप से आपकी (और आपके पड़ोसियों की) समस्या हैं। एशियाई टाइगर मच्छर जैसी कुछ किस्में केवल 100 गज की दूरी पर उड़ सकती हैं।

मच्छर CO2 75 फीट दूर का पता लगाते हैं
कार्बन डाइऑक्साइड, जो मनुष्य और अन्य जानवर पैदा करते हैं, मच्छरों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है कि एक संभावित रक्त भोजन निकट है। उन्होंने हवा में CO2 के प्रति गहरी संवेदनशीलता विकसित की है । एक बार जब एक महिला आसपास के क्षेत्र में सीओ 2 को होश में लेती है, तो वह सीओ 2 प्लम के माध्यम से आगे और पीछे उड़ती है जब तक कि वह अपने शिकार का पता नहीं लगाती है ।

बग जैपर मच्छरों को आकर्षित नहीं करते हैं
बग जैपर प्रकाश को छोड़ देते हैं जो गनट्स, बीटल्स, पतंगे और इस तरह आकर्षित करते हैं, लेकिन क्योंकि मच्छरों को CO2 द्वारा आकर्षित किया जाता है, वे मच्छरों को मारने में प्रभावी नहीं हैं । वे संभवतः अधिक लाभकारी कीटों को मारते हैं और जो मच्छरों की तुलना में गीतकारों द्वारा खाया जाता है। यहां तक ​​कि वे परजीवी ततैया भी निकालते हैं, जो अन्य प्रजातियों को नियंत्रित करती हैं।

आप मच्छरों को कैसे मारते हैं?
फोगर मशीनें जो सीओ 2 के साथ मच्छरों को आकर्षित करती हैं और फिर उन्हें फँसाने का काम करती हैं, लेकिन आपके यार्ड और स्वयं के लिए repellants जाने का सबसे आसान और सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है।

मच्छर क्यों होते हैं?
मूल रूप से, मच्छरों का अस्तित्व है क्योंकि वे बाहर पोंछना असंभव के बगल में हैं। प्रजातियाँ एक निर्वात में मौजूद नहीं होती हैं; जब तक वे भोजन पा सकते हैं और उनके खिलाफ पर्यावरणीय दबाव नहीं है, वे जारी रखेंगे। मच्छर एक प्रजाति के रूप में लाखों साल पुराने हैं। पारिस्थितिक तंत्र में, वे अन्य प्रजातियों (पक्षियों, मेंढक, और मछली) के लिए भोजन और परागणकों के रूप में सेवा करते हैं। लार्वा पानी को साफ करने में मदद करता है, इसे साफ करने में मदद करता है। मच्छरों की 3,000 से अधिक प्रजातियां हैं, लेकिन केवल लगभग 200 काटने वाले मनुष्य हैं।

मच्छर की लार से एलर्जी हर किसी को नहीं होती है
मच्छर की लार, जो त्वचा में ग्लाइड करने के लिए सूंड को चिकनाई देती है, आपकी त्वचा पर खुजली और टक्कर के लिए जिम्मेदार है, लेकिन हर किसी को मच्छर की लार से एलर्जी नहीं होती है। कुछ लोग काटे जाने से भी बचते हैं और रिपेलेंट विकसित करने के लिए उनके पसीने का अध्ययन किया जाता है।

मच्छरों ने विज्ञान को फायदा पहुंचाया है
उनके सूंड के डिज़ाइन ने वैज्ञानिकों को कम दर्दनाक हाइपोडर्मिक सुइयों को डिजाइन करने, सुई सम्मिलन को आसान बनाने के लिए रणनीतियों की जांच करने, और मस्तिष्क में छोटे इलेक्ट्रोडों को बेहतर जगह देने के लिए सम्मिलन मार्गदर्शिका बनाने के लिए प्रेरित किया है।



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जाने क्या रामायण काल में भी होते थे मोबाइल?

 
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आपको यह सुनकर संभवत: विश्वास न हो लेकिन इस पर विचार किए जाने में कोई बुराई नहीं है। दरअसल, भारत के लोगों ने दूसरों के कहने पर अपने इतिहास को मिथक ही मान लिया है। उस पर कभी वृहत्तर रूप में शोध नहीं किया। प्राचीन इतिहास के प्रमाण कभी नहीं ढूंढ गए। आजादी के बाद तो देश को धूल-मिट्टी में मिला दिया गया। खैर...

कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि लंका में दूरसंचार यंत्रों का भी निर्माण होता था जिसे आजकल 'दूरभाष' या 'टेलीफोन' कहते हैं। अब तो मोबाइल है तो क्या रामायण काल में भी मोबाइल होते थे?

माना जाता है कि दूरभाष की तरह उस युग में 'दूर नियंत्रण यंत्र' था जिसे 'मधुमक्‍खी' कहा जाता था। जब इससे वार्ता की जाती थी तो वार्ता से पूर्व इससे भिन्न-भिन्न प्रकार की ध्‍वनि प्रकट होती थी। संभवत: इसी ध्‍वनि प्रस्‍फुटन के कारण इस यंत्र का नामकरण 'मधुमक्‍खी' किया गया होगा। ये यंत्र राजपरिवार के लोगों के पास रहते थे और इसके बल पर वे दूर से दूर बैठे लोंगे से बात कर लेते थे। यह बेतार प्रणाली थी।

शोधानुसार वि‍भीषण को लंका से निष्काषित कर दिया था, तब वह लंका से प्रयाण करते समय मधुमक्‍खी और दर्पण यंत्रों के अलावा अपने 4 विश्‍वसनीय मंत्री अनल, पनस, संपाती और प्रभाती को भी राम की शरण में ले गया था। राम की हित-पूर्ति के लिए रावण के विरुद्ध इन यंत्रों का उपयोग भी किया गया था।

लंका के 10,000 सैनिकों के पास 'त्रिशूल' नाम के यंत्र थे, जो दूर-दूर तक संदेश का आदान-प्रदान करते थे। संभवत: ये त्रिशूल वायरलैस ही होंगे। इसके अलावा दर्पण यंत्र भी था, जो अंधकार में प्रकाश का आभास प्रकट करता था। लड़ाकू विमानों को नष्‍ट करने के लिए रावण के पास भस्‍मलोचन जैसा वैज्ञानिक था जिसने एक विशाल 'दर्पण यंत्र' का निर्माण किया था। इससे प्रकाश पुंज वायुयान पर छोड़ने से यान आकाश में ही नष्‍ट हो जाते थे। लंका से निष्‍कासित किए जाते वक्‍त विभीषण भी अपने साथ कुछ दर्पण यंत्र ले आया था। इन्‍हीं 'दर्पण यंत्रों' में सुधार कर अग्‍निवेश ने इन यंत्रों को चौखटों पर कसा और इन यंत्रों से लंका के यानों की ओर प्रकाश पुंज फेंका जिससे लंका की यान शक्‍ति नष्‍ट होती चली गई।

एक अन्य प्रकार का भी दर्पण यंत्र था जिसे ग्रंथों में 'त्रिकाल दृष्‍टा' कहा गया है, लेकिन यह यंत्र त्रिकालदृष्‍टा नहीं बल्‍कि दूरदर्शन जैसा कोई यंत्र था। लंका में यांत्रिक सेतु, यांत्रिक कपाट और ऐसे चबूतरे भी थे, जो बटन दबाने से ऊपर-नीचे होते थे। ये चबूतरे संभवत: लिफ्‍ट थे।

संदर्भ ग्रंथ सूची:-
1.वाल्‍मीकि रामायण।
2.रामकथा उत्‍पत्ति और विकास: डॉ. फादर कामिल बुल्‍के।
3.लंकेश्‍वर (उपन्‍यास): मदनमोहन शर्मा ‘शाही'।
4.हिन्‍दी प्रबंध काव्‍य में रावण: डॉ. सु
रेशचंद्र निर्मल।
5.रावण-इतिहास: अशोक कुमार आर्य।
6. प्रमाण तो मिलते हैं: डॉ. ओमकारनाथ श्रीवास्‍तव (लेख) 27 मई 1973।
7. महर्षि भारद्वाज तपस्‍वी के भेष में एयरोनॉटिकल साइंटिस्‍ट (लेख) विचार मीमांसा 31. अक्‍टूबर 2007।
8. विजार्ड आर्ट।
9.चैरियट्‌स गॉड्‌स: ऐरिक फॉन डानिकेन।
10.क्‍या सचमुच देवता धरती पर उतरे थे डॉ. खड्‌ग सिंह वल्‍दिया (लेख) धर्मयुग 27 मई 1973।

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नर्मदा नदी को पुराणों में रेवा भी कहा गया है

 
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भारत ही नहीं विश्व की सबसे प्राचीन नदी है नर्मदा नदी। नर्मदा नदी को पुराणों में रेवा भी कहा गया है। आओ जानते हैं नर्मदा नदी के बारे में 5 रोचक तथ्य।

1. नर्मदा परिक्रमा : 

प्राचीन काल से ही नर्मदा परिक्रमा का प्रचलन रहा है। नर्मदाजी की प्रदक्षिणा यात्रा में एक ओर जहां रहस्य, रोमांच और खतरे हैं वहीं अनुभवों का भंडार भी है। इस यात्रा के बाद आपकी जिंदगी बदल जाएगी। कुछ लोग कहते हैं कि ‍यदि अच्छे से नर्मदाजी की परिक्रमा की जाए तो नर्मदाजी की परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और 13 दिनों में पूर्ण होती है, परंतु कुछ लोग इसे 108 दिनों में भी पूरी करते हैं। परिक्रमावासी लगभग 1,312 किलोमीटर के दोनों तटों पर निरंतर पैदल चलते हुए परिक्रमा करते हैं। परिक्रमा अमरकंटक से प्रारंभ होकर अमरकंटक में ही समाप्त होती है। अमरकंटक से निकलकर नर्मदा विन्ध्य और सतपुड़ा के बीच से होकर भडूच (भरुच) के पास खम्भात की खाड़ी में अरब सागर से जा मिलती है। नेमावर में इसका नाभि स्थल है।

2. सबसे प्राचीन सभ्यता : 

विश्व की प्राचीनतम नदी सभ्यताओं में से एक नर्मदा घाटी की सभ्यता का का जिक्र कम ही किया जाता है, जबकि पुरात्ववेत्ताओं अनुसार यहां भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता के अवशेष पाए गए हैं। आश्चर्य की यहां डायनासोर के अंडे भी पाए गए हैं। नर्मदा घाटी के प्राचीन नगरों की बात करें तो महिष्मती (महेश्वर), नेमावर, हतोदक, त्रिपुरी, नंदीनगर आदि ऐसे कई प्राचीन नगर है जहां किए गए उत्खनन से उनके 2200 वर्ष पुराने होने के प्रमाण मिले हैं। जबलपुर से लेकर सीहोर, होशंगाबाद, बड़वानी, धार, खंडवा, खरगोन, हरसूद आदि तक किए गए और लगातार जारी उत्खनन कार्यों ने ऐसे अनेक पुराकालीन रहस्यों को उजागर किया है।

संपादक एवं प्रकाशक डॉ. शशिकांत भट्ट की पुस्तक 'नर्मदा वैली : 

कल्चर एंड सिविलाइजेशन' नर्मदा घाटी की सभ्यता के बारे में विस्तार से उल्लेख मिलता है। इस किताब के अनुसार नर्मदा किनारे मानव खोपड़ी का पांच से छः लाख वर्ष पुराना जीवाश्म मिला है। इससे यह खुलासा होता है कि यहां सभ्यता का काल कितना पुराना है। यहां डायनासोर के अंडों के जीवाश्म पाए गए, तो दक्षिण एशिया में सबसे विशाल भैंस के जीवाश्म भी मिले हैं।

इसके अलवा एकेडेमी ऑफ इंडियन न्यूमिस्मेटिक्स एंड सिगिलोग्राफी, इंदौर ने नर्मदा घाटी की संस्कृति व सभ्यता पर केंद्रित देश-विदेश के विद्वानों के 70 शोध पत्रों पर आधारित एक विशेषांक निकाला था, जो इस प्राचीन सभ्यता की खोज और उससे जुड़ी चुनौतियों को प्रस्तुत करता है।


3. नर्मदा तट के तीर्थ : 
वैसे तो नर्मदा के तट पर बहुत सारे तीर्थ स्थित है लेकिन यहां कुछ प्रमुख तीर्थों की लिस्ट। अमरकंटक, मंडला (राजा सहस्रबाहु ने यही नर्मदा को रोका था), भेड़ा-घाट, होशंगाबाद (यहां प्राचीन नर्मदापुर नगर था), नेमावर, ॐकारेश्वर, मंडलेश्वर, महेश्वर, शुक्लेश्वर, बावन गजा, शूलपाणी, गरुड़ेश्वर, शुक्रतीर्थ, अंकतेश्वर, कर्नाली, चांदोद, शुकेश्वर, व्यासतीर्थ, अनसूयामाई तप स्थल, कंजेठा शकुंतला पुत्र भरत स्थल, सीनोर, अंगारेश्वर, धायड़ी कुंड और अंत में भृगु-कच्छ अथवा भृगु-तीर्थ (भडूच) और विमलेश्वर महादेव तीर्थ।


नर्मदा की कुल 41 सहायक नदियां हैं। उत्तरी तट से 19 और दक्षिणी तट से 22। नर्मदा बेसिन का जलग्रहण क्षेत्र एक लाख वर्ग किलोमीटर है। यह देश के भौगोलिक क्षेत्रफल का तीन और मध्य प्रदेश के क्षेत्रफल का 28 प्रतिशत है। नर्मदा की आठ सहायक नदियां 125 किलोमीटर से लंबी हैं। मसलन- हिरन 188, बंजर 183 और बुढ़नेर 177 किलोमीटर। मगर लंबी सहित डेब, गोई, कारम, चोरल, बेदा जैसी कई मध्यम नदियों का हाल भी गंभीर है। सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में जंगलों की बेतहाशा कटाई से ये नर्मदा में मिलने के पहले ही धार खो रही हैं।

4. गुफाओं में एलियन : 
नर्मदा घाटी क्षेत्र में कई गुफाएं हैं उनमें से एक भीमबैठका की गुफाएं हैं। भीमबैठका रातापानी अभयारण्य में स्थित है। यह भोपाल से 40 किलोमीटर दक्षिण में है। यहां से आगे सतपुडा की पहाड़ियां शुरू हो जाती हैं। भीमबेटका (भीमबैठका) भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के रायसेन जिले में स्थित एक पुरापाषाणिक आवासीय पुरास्थल है। यह आदिमानव द्वारा बनाए गए शैलचित्रों और शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है। इन चित्रों को पुरापाषाण काल से मध्यपाषाण काल के समय का माना जाता है। यहां मिले शैलचित्रों में स्पष्ट रूप से एक उड़नतश्तरी बनी हुई है। साथ ही इस तश्तरी से निकलने वाले एलियंस का चित्र भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो आम मानव को एक अजीब छड़ी द्वारा निर्देश दे रहा है। इस एलियंस ने अपने सिर पर हेलमेट जैसा भी कुछ पहन रखा है जिस पर कुछ एंटीना लगे हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि लगभग 30 हजार वर्ष पूर्व बनाए गए ये चित्र स्पष्ट करते हैं कि यहां एलियन आए थे, जो तकनीकी मामले में हमसे कम से कम हजारों वर्ष आगे हैं ही।

5. नर्मदा नदी के मगरमच्छ : 
नर्मदा के जल का राजा है मगरमच्छ जिसके बारे में कहा जाता है कि धरती पर उसका अस्तित्व 25 करोड़ साल पुराना है। माँ नर्मदा मगरमच्छ पर सवार होकर ही यात्रा करती हैं।


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सुद्युम्न को हर माह माता पार्वती के कारण बदलना होता था अपना जेंडर

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ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान और विवस्वान के वैवस्वतमनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध।

जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि इल सबसे बड़ा था लेकिन इसका लड़का नहीं लड़की के रूप में जन्म हुआ था। कैसे? दरअसल, वैवस्वत मनु को कोई संतान नहीं हो ही थी तो उन्होंने गुरु वशिष्ठ के कहने पर पुत्र की कामने से यज्ञ कराया। लेकिन उनकी पत्नी श्रद्धा चाहती थी कि पहलेपूल लड़की ही हो। ऐसा कहते हैं कि तब उन्होंने पुरोहित से यज्ञ के समय कान में कहा कि लड़की के हेतु ही आहुति डालें। पुरोहित ने श्रद्धा की बात मान ली और बाद में एक बिटिया का जन्म हुआ जिसका नाम इला रखा गया।

यह देखकर वैवस्वत मनु प्रसन्न नहीं हुए और उन्होंने गुरु वशिष्ठ से कहा कि लड़के का संकल्प करने के बाद भी लड़की कैसे हो गई इसका आप उत्तर दें गुरुवर। गुरुवर ने सारा माजरा वैवस्वत मनु को समझा दिया। उन्होंने कहा कि पुरोहित ने लड़की का संकल्प पढ़ा इसलिए ऐसा हुआ। लेकिन चूंकि मैंने लड़का होने का आशीर्वाद दिया है तो मैं तुम्हारी लड़की को लड़का बना दूंगा। गुरु वशिष्ठ ने कुछ वर्ष बाद ऐसा ही किया।

गुरु वशिष्ठ ने अपने योगबल से इला को लड़का बना दिया और उसका नाम रखा सुद्युम्न। एक दिन सुद्युम्न अपने कुछ साथियों के साथ शिकार करने घने जंगल गए। संयोग से उस जंगल में शंकरजी देवी पार्वती के साथ प्रेम के क्षण में मगन थे। उसी दौरान कुछ ऋषि मुनि उनसे मिलने आ धमके। देवी पार्वती को शर्म महसूस हुई और तब उनके जाने के बाद रुष्ठ होकर शिवजी से कहा कि यह तो अच्छा नहीं हुआ। इस तरह व्यक्तिगत क्षणों में किसी को आप कैसे मिलने की अनुमति देते हैं और कोई कैसे आपसे मिलने जा जाता है। क्या उसे मर्यादा का ध्यान नहीं रखना चाहिए?

भगवान शंकर से देवी के क्रोध के देखते हुए कहा कि अब से जो भी पुरुष इस जंगल में आएगा वह स्त्री बन जाएगा। ऐसे में जब इला जंगल में था तो वह स्‍त्री बन गया। उसे गुरु वशिष्ठ ने पुरुष बनाया था, लेकिन शिव के वचन के चलते वह स्त्री बन गया। जब यह बात गुरु वशिष्ठ को पता चली तो उन्होंने भगवान शंकर से विनती की और कहा कि सुद्युम्न कर दीजिए उसे पुन: पुरुष बना दीजिए। तब भगवान शंकर ने कहा कि ऐसा तो संभव नहीं है। गुरु वशिष्ठ ने बहुत विनय किया तब भगवान शंकर ने कहा कि यह एक माह पुरुष और एक माह स्त्री बनकर रहेगा। बस मैं इतना ही कर सकता हूं।

एक बार बुध देवता ने सुद्युम्न को लड़की रूप में देखा और उन्हें उससे प्यार हो गया। तब दोनों ने विवाह किया और उनका पुरुरवा नाम का एक बेटा हुआ।

स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, नवम स्कंद, प्रथम अध्याय

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कलयुग का प्रारंभ कब हुआ था

 
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पौराणिक मान्यता अनुसार एक युग लाखों वर्ष का होता है, जैसा कि सतयुग लगभग 17 लाख 28 हजार वर्ष, त्रेतायुग 12 लाख 96 हजार वर्ष, द्वापर युग 8 लाख 64 हजार वर्ष और कलियुग 4 लाख 32 हजार वर्ष का बताया गया है। कलयुग का प्रारंभ कब हुआ था इस संबंध में मतभेद हैं।

1.कहते हैं कि युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के बाद कलिकाल का प्रारंभ हुआ था तो कुछ उनके स्वर्ग में सशरीर चले जाने के बाद कलिकाल का प्रारंभ हुआ था।

2 . राजा परीक्षित से जुड़ी है कलयुग के प्रारंभ संबंधी घटना। कहते हैं कि कलयुग उनके मुकुट में छुपा हुआ था। उसने बाहर निकलकर राजा परीक्षित से जो वार्तालाप की उसका पुराणों में उल्लेख मिलता है।

3 . आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत के युद्ध 3136 ईसा पूर्व को हुआ था। महाभारत युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी तभी से कलियुग का आरंभ माना जाता है। भागवत पुराण ने अनुसार श्रीकृष्‍ण के देह छोड़ने के बाद 3102 ईसा पूर्व कलिकाल का प्रारंभ हुआ था।

कलियुग संवत के विषय में सबसे प्राचीन संकेत आर्यभट्ट द्वारा दिया गया है। उन्होंने कहा है कि जब वे 23 वर्ष के थे तब कलियुग के 3600 वर्ष व्यतीत हो चुके थे अर्थात वे 476 ई. में उत्पन्न हुए। पश्चात्कालीन ज्योतिःशास्त्रीय ग्रन्थों के अनुसार कलियुग संवत के 3719 वर्षों के उपरान्त शक संवत का आरम्भ हुआ। मध्यकाल के भारतीय ज्योतिषियों ने माना है कि कलियुग एवं कल्प के प्रारम्भ में सभी ग्रह, सूर्य एवं चन्द्र को मिलाकर चैत्र शुक्ल-प्रतिपदा को रविवार के सूर्योदय के समय एक साथ एकत्र थे।


अधिकतर विद्वानों के अनुसार कलियुग का प्रारंभ 3102 ईसा पूर्व हुआ था। इस मान से कलियुग का काल 4,36,000 साल लंबा चलेगा। अभी कलियुग का प्रथम चरण ही चल रहा। कलियुग का प्रारंभ 3102 ईसा पूर्व से हुआ था, जब पांच ग्रह; मंगल, बुध, शुक्र, बृहस्‍पति और शनि, मेष राशि पर 0 डिग्री पर हो गए थे। इसका मतलब 3102+2020= 5122 वर्ष कलियुग के बित चुके हैं और 426882 वर्ष अभी बाकी है।


वर्तमान में यह 28वें चतुर्युगी का कृतयुग बीत चुका है और यह कलियुग चल रहा है। यह कलियुग ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध में श्‍वेतवराह नाम के कल्प में और वैवस्वत मनु के मन्वंतर में चल रहा है। इसका प्रथम चरण ही चल रहा है।

श्रीमद्भागवत पुराण अनुसार शुकदेवजी राजा परीक्षित से कहते हैं जिस समय सप्तर्षि मघा नक्षत्र में विचरण कर रहे थे तब कलिकाल का प्रारंभ हुआ था। कलयुग की आयु देवताओं की वर्ष गणना से 1200 वर्ष की अर्थात मनुष्‍य की गणना अनुसार 4 लाख 32 हजार वर्ष की है।- 12.2.31-32


इस तरह होती गई धर्म की हानि:-

1.सतयुग : 
सतयुग में मनुष्य की लंबाई 32 फिट अर्थात लगभग 21 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्र 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है। पुण्य की मात्रा 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है।

2.त्रेतायुग : 

त्रेतायुग में मनुष्य की लंबाई 21 फिट अर्थात लगभग 14 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्रा 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है और पुण्य की मात्रा 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है।


3.द्वापर : 

द्वापरयुग में मनुष्य की लंबाई 11 फिट अर्थात लगभग 7 हाथ बतायी गई है। इस युग में पाप की मात्रा 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है जबकि पुण्य की मात्रा 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है।

4.कलियुग : 
कलियुग में मनुष्य की लंबाई 5 फिट 5 इंच अर्थात लगभग साढ़े तीन हाथ बतायी गई है। इस युग में धर्म का सिर्फ एक  चौथाई  अंश ही रह जाता है। इस युग में पाप की मात्रा 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है, जबकि पुण्य की मात्रा 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है।


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हिन्दुओं ने मंदिर बनाकर कब से पूजा और प्रार्थना करना शुरू किया?

 
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हिन्दुओं ने मंदिर बनाकर कब से पूजा और प्रार्थना करना शुरू किया। आखिर हिन्दू मंदिर निर्माण की शुरुआत कब हुई और क्यों? मंदिर की प्राचीनता के प्रमाण क्या हैं? आओ जानते हैं इसका उत्तर।

1.प्राचीनकाल में वैदिक लोग अपने आश्रम या सभा स्थल पर वेदी बनाकर इकट्ठे होकर समूह रूप में प्रार्थना करते थे। इसके पहले से ही हिन्दू समाज के अधिकतर लोग किसी वृक्ष के नीचे एक पत्‍थर रखकर उसे अपना देवता मानकर उसे पूजते थे। वो पत्थर उनके देवता का प्रतीक होता था। आज भी यह प्रचलन में है।

2. सोमनाथ के मंदिर के होने का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है इससे यह सिद्ध होता है भारत में मंदिर परंपरा कितनी पुरानी रही है। इतिहासकार मानते हैं कि ऋग्वेद की रचना 7000 से 1500 ईसा पूर्व हई थी अर्थात आज से 9 हजार वर्ष पूर्व। यूनेस्को ने ऋग्वेद की 1800 से 1500 ई.पू. की 30 पांडुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को की 158 सूची में भारत की महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की सूची 38 है। पांडुलिपियों के लेखन से पूर्व ही वेदों के ज्ञान को परंपरा के तहत कंठस्थ किए जाने का प्रचलन रहा है। भाषा विज्ञानियों के अनुसार 10 हजार वर्ष पूर्व भाषाओं की लिपियों का अविष्कार हुआ था।

3. वैदिक ऋषि जंगल के अपने आश्रमों में ध्यान, प्रार्थना और यज्ञ करते थे। हालांकि लोकजीवन में मंदिरों का महत्व उतना नहीं था जितना आत्मचिंतन, मनन और शास्त्रार्थ का था। फिर भी आम जनता शिव और पार्वती के अलावा नगर, ग्राम और स्थान के देवी-देवताओं की प्रार्थना करते थे। सिंधुघाटी की सभ्यता में पाई गई शिव और नंदी की मूर्ति के अलावा अन्य देवताओं की मूर्ति और मुद्राएं इस बात कर प्रमाण है।

4. राम के काल में सीता द्वारा गौरी पूजा करना इस बात का सबूत है कि उस काल में देवी-देवताओं की पूजा का महत्व था और उनके घर से अलग पूजास्‍थल होते थे। इसी प्रकार महाभारत में दो घटनाओं में कृष्ण के साथ रुक्मणि और अर्जुन के साथ सुभद्रा के भागने के समय दोनों ही नायिकाओं द्वारा देवी पूजा के लिए वन में स्थित गौरी माता (माता पार्वती) के मंदिर की चर्चा है। इसके अलावा युद्ध की शुरुआत के पूर्व भी कृष्ण पांडवों के साथ गौरी माता के स्थल पर जाकर उनसे विजयी होने की प्रार्थना करते हैं।

5.देश में सबसे प्राचीन शक्तिपीठों और ज्योतिर्लिंगों को माना जाता है। प्राचीनकाल में यक्ष, नाग, शिव, दुर्गा, भैरव, इंद्र और विष्णु की पूजा और प्रार्थना का प्रचलन था। रामायण काल में मंदिर होते थे इसके प्रमाण हैं। राम का काल आज से 7 हजार 135 वर्ष पूर्व था अर्थात 5114 ईस्वी पूर्व।


6. मुंडेश्वरी देवी का मंदिर बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर अंचल में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इसकी स्थापना 108 ईस्वी में हुविश्‍क के शासनकाल में हुई थी। यहां शिव और पार्वती की पूजा होती है। प्रमाणों के आधार पर इसे पार्वती का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है।

7. शिवलिंग की पूजा का प्रचलन सबसे प्राचीन है। रामायण काल में भगवान राम ने रामेश्‍वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी। शिवलिंग को उस काल में आदिवासी और वनवासी लोग पूजते थे। शिवलिंग पूजन के बाद धीरे-धीरे नाग और यक्षों की पूजा का प्रचलन बढ़ने लगा।


8. बौद्धकाल में बुद्ध और महावीर की मूर्ति‍यों को अपार जन-समर्थन मि‍लने के कारण राम और कृष्ण की मूर्तियां और उनके मंदिर बनाए जाने लगे। सबसे ज्यादा मंदिर इसी काल में बने। हिन्दू मंदिरों को खासकर बौद्ध, चाणक्य और गुप्तकाल में भव्यता प्रदान की जाने लगी और जो प्राचीन मंदिर थे उनका पुन: निर्माण किया गया। ये सभी मंदिर ज्योतिष, वास्तु और धर्म के नियमों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। अधिकतर मंदिर कर्क रेखा या नक्षत्रों के ठीक ऊपर बनाए गए थे। उनमें से भी एक ही काल में बनाए गए सभी मंदिर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। प्राचीन मंदिर ऊर्जा और प्रार्थना के केंद्र थे लेकिन आजकल के मंदिर तो पूजा-आरती के केंद्र हैं।

9. तिरुपति शहर में बना विष्‍णु मंदिर 10वीं शताब्‍दी के दौरान बनाया गया था, यह विश्‍व का सबसे बड़ा धार्मिक गंतव्‍य है। रोम या मक्‍का जैसे धार्मिक स्‍थलों से भी बड़े इस स्‍थान पर प्रतिदिन औसतन 30 हजार श्रद्धालु आते हैं। कई शताब्दी पूर्व बना यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला और शिल्प कला का अद्भुत उदाहरण हैं।

10. विश्‍व का प्रथम ग्रेनाइट मंदिर तमिलनाडु के तंजौर में बृहदेश्‍वर मंदिर है। इसका निर्माण 1003- 1010 ई. के बीच चोल शासक राजाराज चोल 1 ने करवाया था। इस मंदिर के शिखर ग्रेनाइट के 80 टन के टुकड़े से बने हैं। यह भव्‍य मंदिर राजाराज चोल के राज्‍य के दौरान केवल 5 वर्ष की अवधि में (1004 एडी और 1009 एडी के दौरान) निर्मित किया गया था।

11. विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर अब सिर्फ कंबोडिया के अंकोरवाट में ही बचा हुआ है। अंकोर का पुराना नाम 'यशोधरपुर' था। इसका निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53 ई.) के शासनकाल में हुआ था। यह विष्णु मंदिर है जबकि इसके पूर्ववर्ती शासकों ने प्रायः शिव मंदिरों का निर्माण किया था।

12. अंकोरवाट के मंदिर से पहले अयोध्या, मथुरा और काशी में इससे भी बड़े मंदिर बने थे जिसे मुस्लिम आक्रांताओं को तोड़ने में महीनों लगे थे। मथुरा में श्रीकृष्ण का पहला मंदिर 80-57 ईसा पूर्व बनाया गया था। इस संबंध में महाक्षत्रप सौदास के समय के एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि किसी 'वसु' नामक व्यक्ति ने यह मंदिर बनाया था। इसके बहुत काल के बाद दूसरा मंदिर सन् 800 में विक्रमादित्य के काल में बनवाया गया था, जबकि बौद्ध और जैन धर्म उन्नति कर रहे थे। इस भव्य मंदिर को सन् 1017-18 ई. में महमूद गजनवी ने तोड़ दिया था। बाद में इसे महाराजा विजयपाल देव के शासन में सन् 1150 ई. में जज्ज नामक किसी व्यक्ति ने बनवाया। यह मंदिर पहले की अपेक्षा और भी विशाल था, जिसे 16वीं शताब्दी के आरंभ में सिकंदर लोदी ने नष्ट करवा डाला। ओरछा के शासक राजा वीरसिंह जू देव बुन्देला ने पुन: इस खंडहर पड़े स्थान पर एक भव्य और पहले की अपेक्षा विशाल मंदिर बनवाया। इसके संबंध में कहा जाता है कि यह इतना ऊंचा और विशाल था कि यह आगरा से दिखाई देता था। लेकिन इसे भी मुस्लिम शासकों ने सन् 1669 ईस्वी में नष्ट कर इसकी भवन सामग्री से जन्मभूमि के आधे हिस्से पर एक भव्य ईदगाह बनवा दी गई, जो कि आज भी विद्यमान है। इस ईदगाह के पीछे ही महामना पंडित मदनमोहन मालवीयजी की प्रेरणा से पुन: एक मंदिर स्थापित किया गया है, लेकिन अब यह विवादित क्षेत्र बन चुका है क्योंकि जन्मभूमि के आधे हिस्से पर ईदगाह है और आधे पर मंदिर। यही हाल काशी के मंदिर का हुआ।

13.मध्यकाल में मुस्लिम आक्रांताओं ने जैन, बौद्ध और हिन्दू मंदिरों को बड़े पैमाने पर ध्वस्त कर दिया। मलेशिया, इंडोनेशिया, अफगानिस्तान, ईरान, तिब्बत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, कंबोडिया आदि मुस्लिम और बौद्ध राष्ट्रों में अब हिन्दू मंदिर नाममात्र के बचे हैं। अब ज्यादातर प्राचीन मंदिरों के बस खंडहर ही नजर आते हैं, जो सिर्फ पर्यटकों के देखने के लिए ही रह गए हैं। अधिकतर का तो अस्तित्व ही मिटा दिया गया है। काशी, अयोध्या, मथुरा और आगरा जैसे कई स्थान हैं, जहां पर हिन्दुओं के मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई जाने का प्रमाण मौजूद है। कई इतिहासकार मानते हैं कि ताजमहल पहले तेजो महालय था जिसमें शिवलिंग स्थापित था।


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पद्मनाभ मंदिर के खजाने के 10 खास रहस्य

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सुप्रीम कोर्ट ने केरल के तिरुवनंतपुरम स्थित ऐतिहासिक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रबंधन एवं प्रशासन में त्रावणकोर के पूर्ववर्ती शाही परिवार के अधिकार को सोमवार को बरकरार रखा। न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय खंडपीठ ने केरल उच्च न्यायालय के 2011 के फैसले के खिलाफ त्रावनकोर रॉयल परिवार की अपील मंजूर कर ली। शाही परिवार ने केरल उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती दी थी। आओ जानते हैं मंदिर के खजाने के 10 खास रहस्य जो आप नहीं जानते होंगे।

1. अनुमानीत 5,00,000 करोड़ का खजाना : 

सन् 2011 में इसका खुलासा हुआ। दक्षिण भारत के पद्मनाभ मंदिर में छिपा था 5,00,000 करोड़ का खजाना है जिसे गिनने में आधुनिक मशीनें और कई लोगों की टीमें लगीं।

2. त्रावणकोर के महाराजा का खजाना :

 2011 में कैग की निगरानी में पद्मनाभस्वामी मंदिर से करीब एक लाख करोड़ रुपए मूल्य का खजाना निकाला गया था। यह खजाना त्रावणकोर के महाराजा का बताया जाता है।

3. तहखाने को खोलने की मनाही : 

तहखाने से पाए गए खजाने में से कुछ तहखाने को खोलकर देखने की मनाही थी, क्योंकि मंदिर प्रशासन और भक्तजनों को किसी अननोही घटना और अशुभ के होने का डर था।

4. विष्णु के मंदिर में रखा है खजाना : पद्मनाभस्वामी मंदिर केरल के तिरुअनंतपुरम् में मौजूद भगवान विष्णु का प्रसिद्ध मंदिर है, लेकिन यहां से अपार मात्रा में 'लक्ष्मी' की प्राप्ति हुई थी। भारत के प्रमुख वैष्णव मंदिरों में शामिल यह ऐतिहासिक मंदिर तिरुवनंतपुरम के पर्यटन स्थलों में से एक है। इस मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विराजमान है जिसे देखने के लिए रोजाना हजारों भक्त दूर-दूर से यहां आते हैं। इस प्रतिमा में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। यहां लक्ष्मीजी की मूर्ति भी विराजमान है।

5. नाग के नाम पर है नगर का नाम : मान्यता है कि तिरुअनंतपुरम् नाम भगवान के 'अनंत' नामक नाग के नाम पर ही रखा गया है। यहां पर भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को 'पद्मनाभ' कहा जाता है। मान्यता है कि सबसे पहले इस स्थान से विष्णु भगवान की प्रतिमा मिली थी जिसके बाद यहां पर मंदिर का निर्माण किया गया।

6. राजा मार्तंड ने कराया था निर्माण : मंदिर का निर्माण राजा मार्तंड ने करवाया था। भगवान विष्णु को समर्पित पद्मनाम मंदिर को त्रावणकोर के राजाओं ने बनाया था। इसका जिक्र 9वीं शताब्दी के ग्रंथों में भी आता है, लेकिन मंदिर के मौजूदा स्वरूप को 18वीं शताब्दी में बनवाया गया था। 1750 में महाराज मार्तंड वर्मा ने खुद को पद्मनाभदास बताया। इसके बाद शाही परिवार ने खुद को भगवान पद्मनाभ को समर्पित कर दिया। माना जाता है कि इसी वजह से त्रावणकोर के राजाओं ने अपनी दौलत पद्मनाभ मंदिर को सौंप दी।

7. सरकार ने नहीं लिया अपने कब्जे में : त्रावणकोर के राजाओं ने 1947 तक राज किया। आजादी के बाद इसे भारत में विलय कर दिया गया, लेकिन पद्मनाभ स्वामी मंदिर को सरकार ने अपने कब्जे में नहीं लिया। इसे त्रावणकोर के शाही परिवार के पास ही रहने दिया गया, तब से पद्मनाभ स्वामी मंदिर का कामकाज शाही परिवार के अधीन एक प्राइवेट ट्रस्ट चलाता आ रहा है।

8. कैसा है मंदिर : मंदिर में एक स्वर्ण स्तंभ भी बना हुआ है, जो मंदिर की खूबसूरती में इजाफा करता है। मंदिर के गलियारे में अनेक स्तंभ बनाए गए हैं जिन पर सुंदर नक्काशी की गई है, जो इसकी भव्यता में चार चांद लगा देती है। मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को धोती और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य है।

9. 22 सौ करोड़ डॉलर का खजाना : भारत के केरल में सन् 2011 में श्रीपद्मनाभ स्वामी मंदिर की सुरक्षा उस वक्त कड़ी कर दी गई जब यहां सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर मंदिर के तहखाने में बने पांच खुफिया दरवाजे खोल दिया जो सदियों से बंद थे। और हर दरवाजे के पार उन्हें सोना और चांदी के अंबार मिलते गए जिनकी अनुमानीत कीमत करीब 22 सौ करोड़ डॉलर थी।

10. चेम्बर-बी : लेकिन जब वे आखरी चेम्बर-बी पर पहुंचे तो वे उसे खोलने में नाकाम हो गए। वहां तीन दरवाजे हैं। पहला दरवाजा लोहे की झड़ों से बना दरवाजा है। दूसरा लकड़ी से बना एक भारी दरवाजा है और अंतिम दरवाजा लोहे का बना बड़ा ही मजबूत दरवाजा है जो बंद है और उसे खोला नहीं जा सकता क्योंकि उसे पर लोहे के दो नाग बने हैं और वहां चेतावनी लिखी है कि इसे खोला गया तो अंजाम बहुत बुरा होगा।
इस पर न तो ताले लगे हैं और न ही कोई कुंडी। कहा जाता है कि उसे एक मंत्र से बंद किया गया है। उसे कहते हैं अष्टनाग बंधन मंत्र। मगर वो मंत्र क्या है ये कोई नहीं जानता। वह चेम्बर एक अनोखे शाप से ग्रस्त है। यदि कोई भी उसे चेम्बर के दरवाजे तक जाने का प्रयास करता है तो वह बीमार हो जाता है या उसकी मौत भी हो सकती है।

17 जुलाई 2011 में पहले पांच कक्षों को खोलने के बाद ही टी.पी सुंदरराजन यानी वे शख्स जिन्होंने इन दरवाजों को खुलवाने के लिए अदालत में याचिका दी थी, पहले वे बीमार पड़े और फिर उनकी मौत हो गए। अगले ही महीने मंदिर प्रशासन ने यह चेतावनी जारी कर दी की यदि किसी ने भी उस अंतीम कक्ष को खुलवाने या खोलने की कोशीश की तो अंजाम बहुत बुरा होगा।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि चेम्बर बी के दरवाजे के पीछे आखिर क्या रखा है? अपार सोना, कोई खतरनाक हथियार या कि प्राचीन भारत की कोई ऐसी टेक्नोलॉजी का राज छुपा है जिसे जानकर दुनिया हैरान रह सकती है। यह कहीं ऐसा तो नहीं कि वहां कोई ऐसा रास्ता हो जहां से पाताल लोग में जाया जा सकता हो।

पद्मनाभ स्वामी मंदिर का पूरा रहस्य
केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित पद्मनाभ स्वामी मंदिर अपने गुप्त तहखानो और अरबो के खजाने के लिए प्रसिद्ध है। इस मदिर में 7  तहखाने हैं और यह सभी तहखाने मंदिर के बीच में भगवान विष्णु जी के मंदिर के ठीक नीचे हैं। 2011 में सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से सात लोगो की कमिटी बनाई गयी और 30 जून 2011 को ये तहखाने खोले गए कमेटी ने इन तहखानो को A,B,C,D,E,F,G तक नाम दिया और 31 जुलाई 2011 को कोर्ट में यह आदेश किया की के गर्भ ग्रुप पद्मनाभ स्वामी मंदिर के इन तहखानो को खोल जाए और उसका  मुलांकन किया जाये। तो सवाल अब यह उठता है कि आखिर सदियों पुराने इस इस खाजाने की बात सरकार तक पहुची कैसे ?

दरअसल हुआ ऐसे कि  T.P सुन्दर राज जो Indian intelligence bureau के भूतपूर्व अधिकारी थे और पद्मनाभ स्वामी मंदिर के एक भक्त भी,उन्होंने मंदिर पर राज परिवार के अधिकार को खंडन करने की याचिका high court में दाखिल की थी यहाँ पर राजपरिवार मतलब   त्रावनकोर के वंशज महाराज उत्तरोतम मार्तंड वर्मा जिनको भले ही महाराज कहा जाता हो और अपने पुवाजो के कारण वहां का राजा कहा जाता हो लेकिन महाराज के नाम पर उनके पास कुछ भी नहीं था। उनके आवास को महल तो कहा जाता है। लेकिन वह एक छोटा सा टीनामेंट घर से बढ़कर कुछ भी नहीं है। महाराज उत्तरोतम मार्तंड वर्मा ने अपने जीवन के पिछले साल भी आर्थिक कठिनाइयो  में बिताया है महाराज उत्तरोतम मार्तंड वर्मा का देहांत 2013 में हो गया लेकिन उन्होंने  खजाने पर कभी अपना दावा  नहीं किया इस परिस्थिति में की T.P सुन्दर राज की कोर्ट  में अपील करने की मन्शा क्या थी यह तो वही जानते हैं।  त्रावनकोर के महाराज, खजाना और उनके इतिहास की बातो को  अल्पविराम देते हैं और जानते थे की कितना खजाना था ?

पद्मनाभ स्वामी मंदिर में कितना खजाना था ?
जब सुप्रीम कोर्ट ने जब आदेश दिया तो खजाने का पहला द्वार खोला गया यह द्वार बहुत पुराना था। और जब इसे खोला गया तो अंदर बहुत धुल जमी हुई थी और अँधेरे के साथ प्रदूषित हवा भी थी। जिसको ऑक्सीजन युक्त हवा के माध्यम से शुद्ध किया गया और अंदर रौशनी की गयी और जब यहाँ खजाने का जो भंडार मिला उसको देखकर सब दंग रह गए इस पहले ही खंड में सोने के कई सारे आभूषण सोने की मोहरे और शुद्ध सोने के से बने वस्त्र भंडार थे। वहाँ पर 7 फीट लम्बा एक गले का हार भी था। कई बड़ी बोरियो में हीरे भी थे कई सारे सोने के बर्तन और हीरा मोती से सुसज्जित बर्तन सोना रत्न और हीरे से बने बड़े बड़े मुकुट सोने की मूर्तियाँ और सोने से बने तान्दोर भी वहां पर मौजूद थे ।

निरीक्षको ने जब इन सारी चीजो का वजन किया तो पाया की इस खजाने का वजन एक मैट्रिक टन (1000km) से भी ज्यादा था। इतनी सारी चीजो की गणना और उसका दस्तावेजो का रिकॉर्ड बनाने में महीनो का समय निकल जाये ये परिस्थिति थी और उसका मूल्य का आंकलन लगाना तो उस भी बड़ा बड़ी समस्या थी। फिर भी कुछ हद तक सोने की कीमत के साथ उसका आंकलन करके उसका मूल्यांकन किया गया तब खजाने की कीमत का जो आंकड़ा सामने आया वह था लगभग 1,20,000 करोड़(12000000000000) । यह आंकड़ा सिर्फ सोने की कीमत थी लेकिन यह बात तो हम सब जानते हैं की पुरानी और ऐतिहासिक चीजो की कीमत उसकी धातु से तय नहीं की जाती बल्कि वह कितनी पुरानी और और कितनी फेमस है उस से निर्धारित होती है। यहाँ   पर प्रथम द्वार से मिले खजाने की कीमत अगर एतिहासिक चीज (Antic Wealth) के मूल्यांकन से किया जाए तो वह हमारे सोच से भी परे है और यह तो सिर्फ एक ही द्वार से ही मिला था 6 द्वार अभी बाकि थे ।अब सवाल यह आता है कि यह आखिर पद्मनाभ स्वामी मंदिर में इतना खजाना कहाँ से आया ? इसको जानने के लिए हमें थोडा इतिहास के पन्नो को पलटना होगा तो आइये जानते हैं कि

पद्मनाभ स्वामी मंदिर में खजाना कहाँ से आया
बात कुछ सदियों पहले की है जब दक्षिण भारत में चोरा, पांड्या और चेरा इन तीन मुख्या साम्राज्यों की त्रिटी थी ।लेकिन एक महत्वाकंशी राजा ठाकुर मार्तंड वर्मा ने अपने आस पास के राज्यों को जीत कर एक बड़े राज्य का गठन किया नाम था त्रावनकोर  मैंने इस लेख के शुरुवात में जिस मार्तंड वर्मा की बात की थी वह थे उत्तरोतम मार्तंड वर्मा । जो ठाकुर मार्तंड वर्मा के 13 वें वंशज और उनके स्थापित किये हुए राज्य त्रावनकोर को  13वें वरिस थे  जबकि ठाकुर मार्तंड वर्मा त्रावनकोर साम्राज्य संस्थापक और उसके पहले राजा थे ।अब  ठाकुर मार्तंड भगवान  पद्मनाथ या भगवान विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। वो अपनी हर जीत  का का श्रेय अपने कुल देवता  श्री भगवान् विष्णु को ही देते थे।

उस समय इस विष्णु भक्त ने एक निर्णय लिया उन्होंने यह ज़ाहिर किया कि उनके पास जो कुछ भी सम्पति है ।वह उसको भगवन विष्णु के चरणों में अर्पित कर देंगे सिर्फ इतना ही नहीं उनका राज्य  और राज्य की हर सम्पदा और उनकी जीती हुई अब तक की हर वस्तु को अपने कुलदेवता भगवन पद्मनाभ को समर्पित कर दी और अपने आप को भगवन पद्मनाभ का दास घोषित कर दिया ।यहाँ पर एक काम की बात है कि दास और सेवक दोनो में बहुत अंतर है ।

सेवक वह होता है जो किसी फल या पुरुस्कार की आशा में सेवा या चाकरी करता है और कभी भी अपने मालिक को छोड़कर जा सकता है ।

जबकि दास वह होता है जो किसी फल या आशा किये बगैर अपने आप को मालिक को समर्पित कर देता है ।

यहाँ पर भी महाराज वर्मा ने अपने आप को अपने  कुलदेवता पद्मनाभ (भगवान विष्णु)  को समर्पित कर दिया था। इस लिए वे अपने राज्य त्रावनकोर के राजा नहीं बल्कि  दास और एक रक्षक थे और उन्होंने यह प्रण लिया कि उनकी आने वाली हर पीढ़ी इस राज्य की रक्षक और भगवान्  पद्मनाभ का दास बनकर अपना जीवन व्यतीत करेगी ।और यही हुआ बही ठाकुर मार्तंड वर्मा और उनके बाद आने वाले 13 के 13 राजाओ ने अपने जीवन से जो भी पाया वो उसको अपने इस मदिर के गर्भगृह में इकठा कर  दिया। उसके बाद कई छोटे बड़े राज्य और राजाओ ने अपने राज्य को त्रावनकोर में विलीन कर दिया  लेकिन त्रावनकोर के रक्षक या दास होने के ठाकुर  मार्तंड वर्मा  ने उन राजाओ  से प्राप्त उस धन को भी पद्मनाभा स्वामी को समर्पित कर दिया। और ऐसे ही ठाकुर  मार्तंड वर्मा से लेकर अब तक के त्रावनकोर के जितने राजा हुए उन्होंने अपनी वास्तु या पुरुस्कार में आई वस्तु या राज्य के द्वारा किसी दुसरे राज्य से जीती हुयी वस्तुओ को अपनी जागीर न मानते हुए धीरे धीरे धन इकट्ठा करते रहे ।और इस तरह सालो के इतिहास का धन धीरे धीरे करके पद्मनाभ स्वामी मंदिर में इतनी बड़ी मात्र में इकठा हुआ है ।

जिसका आजतक किसी भी राजा ने खुद के लिए उपयोग नहीं किया इस परम भक्ति वाद का आज की भौंतिक और आधुनिक समाज के साथ कोई मेल नहीं खाता। लेकिन एक बात तो है कि त्रावनकोर के पहले राजा से लेकर अब तक हुए सभी राजाओ में से सभी ने अपने पूर्वजो की परंपरा को निभाया और अपना सम्पूर्ण जीवन त्रावनकोर का दास और रक्षक बनकर व्यतीत किया ।

पद्मनाभ स्वामी मंदिर का धन किसका है 
इस खाजेने की चर्चा पर कुछ लोगो ने कहा कि खजाना सर्कार को सौंप देना चाहिए कुछ लोगो ने कहा की जरूरत मंदों को दे देना चाहिए और कुछ ने कहा की जहाँ पर है। वही रखना चहिये लोगो ने अपने अपने हिसाब से अपने अनुमान को प्रकट किया लेकिन यहाँ पर हम सामाजिक नियमो ओर कानूनी कौर से यह जानने की कोशिश करते हैं कि इस खाजाने का हक़दार कौन है।

कानूनी तौर पर 1878  में Indian Treasure Trove act का गठन किया गया था ।उस act के तहत यदि किसी व्यक्ति   को अचानक कोई खजाना मिलता है तो वह खजाना 50% उस पाने वाले व्यक्ति का और 50%  सरकार का होता है ।लेकिन पद्मनाभ स्वामी मंदिर का खजाना आकस्मिक नहीं मिला है। वह खजाना हमेशा से वहां पर मौजूद था। और जब सुप्रीम कोर्ट ने आज्ञा दी तब वह लोगो के सामने आया था  इसलिए कायदे से वह खजाना न तो राज्य सरकार का है। और ना ही केंद्र सरकार का तो फिर उसका मालिक कौन  यहं पर स्पस्ट  रूप से देखा जाए तो राजघराने की और वर्तमान महाराज की मालकियत इस खजाने पर बिलकुल नहीं होती क्योंकि आगे के किसी भी राजा ने इस खजाने पर अपना दावा नहीं किया था वर्तमान ने कोर्ट में जब आखिरी राजा राम वर्मा से उनकी मालकियत की वसीयत मांगी तो तो महाराज ने खजाने की या मंदिर की किसी भी चीज का उसमें ज़िक्र नहीं किया था।अब    इस परिस्थिति में खजाने का ऐतिहासिक महत्व देखते हुए उस पर एक ही क़ानून लागू होता है जिसको Antique and treasure act कहते हैं। भारत की ऐतिहासिक और पुरानी चीजो के लिए यह act बनाया गया था जिसके अनुसार भारत की ऐतिहासिक धरोहर या कोई प्राचीन संपत्ति हो वह में antique and treasure act में आता  है ।उसके अनुसार भारत सरकार का यह फर्ज है कि देश में उस चीज की हिफाज़त हो और किसी भी तरह उन वस्तुओ को भारत की सीमाओ से बाहर नहीं  जाने दिया जाये ।

तो फिर यह खजाना किसी का न होकर आजतक सँभालते हुए आ रहे पद्मनाभ स्वामी मंदिर का हुआ और दूसरा उसका एतिहासिक महत्व देखते हुए वह खजाना भारत की धरोहरों में से एक है । पद्मनाभ स्वामी मंदिर को दुनिया का सबसे अमीर मंदिर माना जाता है जिस्तना खजाना पद्मनाभ स्वामी मंदिर में है उतना किसी और मंदिर में नहीं और अभी तो सिर्फ एक ही द्वार खुला है जहा से इतना खाजाना मिला बाकि खुलेंगे तो फिर पद्मनाभ स्वामी दुनिया की सबसे अमीर सम्पति और धरोहरों में से एक हो जायेगा



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