गोण्डा लाइव न्यूज एक प्रोफेशनल वेब मीडिया है। जो समाज में घटित किसी भी घटना-दुघर्टना "✿" समसामायिक घटना"✿" राजनैतिक घटनाक्रम "✿" भ्रष्ट्राचार "✿" सामाजिक समस्या "✿" खोजी खबरे "✿" संपादकीय "✿" ब्लाग "✿" सामाजिक "✿" हास्य "✿" व्यंग "✿" लेख "✿" खेल "✿" मनोरंजन "✿" स्वास्थ्य "✿" शिक्षा एंव किसान जागरूकता सम्बन्धित लेख आदि से सम्बन्धित खबरे ही निःशुल्क प्रकाशित करती है। एवं राजनैतिक , समाजसेवी , निजी खबरे आदि जैसी खबरो का एक निश्चित शुल्क भुगतान के उपरान्त ही खबरो का प्रकाशन किया जाता है। पोर्टल हिंदी क्षेत्र के साथ-साथ विदेशों में हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय है और भारत में उत्तर प्रदेश गोण्डा जनपद में स्थित है। पोर्टल का फोकस राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को उठाना है और आम लोगों की आवाज बनना है जो अपने अधिकारों से वंचित हैं। यदि आप अपना नाम पत्रकारिता के क्षेत्र में देश-दुनिया में विश्व स्तर पर ख्याति स्थापित करना चाहते है। अपने अन्दर की छुपी हुई प्रतिभा को उजागर कर एक नई पहचान देना चाहते है। तो ऐसे में आप आज से ही नही बल्कि अभी से ही बनिये गोण्डा लाइव न्यूज के एक सशक्त सहयोगी। अपने आस-पास घटित होने वाले किसी भी प्रकार की घटनाक्रम पर रखे पैनी नजर। और उसे झट लिख भेजिए गोण्डा लाइव न्यूज के Email-gondalivenews@gmail.com पर या दूरभाष-8303799009 -पर सम्पर्क करें।
Showing posts with label शिशु-की-देखभाल. Show all posts
Showing posts with label शिशु-की-देखभाल. Show all posts

पेनलेस वैक्सीनेशन बच्चों के लिए

Image SEO Friendly

हर माता-पिता अपने बच्चे को सभी बीमारियों से दूर रखना चाहते हैं और इसलिए वे समय समय पर उन्हें टीका भी दिलवाते हैं। लेकिन टीकाकरण के दौरान आप अपने बच्चे को दर्द से रोता देखकर परेशान भी हो जाते होंगे। ऐसे में आप पेनलेस वैक्सीनेशन एक ऑप्शन है जिसके बारे में विचार कर सकते हैं। पेनलेस वैक्सीनेशन एसेलुलर टीके होते हैं, जिनमें कम मात्रा में एंटीजन होते हैं और एक सिरिंज के द्वारा दिए जाते हैं। चूंकि इस टीकाकरण से बच्चों को कम दर्द होता है, इसलिए ये आज के माता-पिताओं के लिए बेस्ट विकल्प बन गए हैं। लेकिन इससे पहले कि आप अपने बच्चे के लिए दर्द रहित टीकाकरण चुनें, आपको यह समझना चाहिए कि ये टीके क्या हैं, और वे प्रभावी हैं या नहीं।

पेनलेस वैक्सीनेशन क्या है?
शिशुओं के लिए पेनलेस वैक्सीनेशन इम्यूनोलॉजी के क्षेत्र में एक हाल ही में किया गया आविष्कार है। पेनलेस टीका एक कॉम्बिनेशन वैक्सीन के रूप में दिया जाता है, जो है DaPT (डिप्थीरिया, एसेलुलर पर्टुसिस और टेटनस)। यह टीका दर्दरहित है या कम दर्द होता है और इंजेक्शन वाले एरिया में सूजन भी नहीं होता है। यह डीपीटी टीका दर्द रहित होने के साथ-साथ उतना ही प्रभावी है जितना कि नॉर्मल टीके।

क्या पेनलेस टीके वास्तव में प्रभावी हैं?
जैसा कि हाल ही के स्टडीज से पता चला है पेनलेस या दर्द वाले नॉर्मल टीके, दोनों ही समान रूप से प्रभावी हैं। एक दर्द रहित टीका भी डीपीटी और इसके गंभीर रूपों को रोक सकता है। हालांकि, यह बता ध्यान में रखी जानी चाहिए कि कोई भी टीका 100 प्रतिशत प्रभावी नहीं होता है। यद्यपि टीका लगाया गया बच्चा इम्यून हो सकता है, फिर भी उसके द्वारा अन्य बच्चों को जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है या जिसकी इम्युनिटी कमजोर है उसे यह रोग हो सकता है। ठीक उसी प्रकार, यदि बच्चे की इम्युनिटी कम है, तो उसे भी इन्फेक्शन हो सकता है।

क्या पेनलेस टीके सुरक्षित हैं?
हाँ, पैनल्स टीके बिलकुल सुरक्षित हैं – वे आमतौर पर बच्चों को नॉर्मल टीके के बाद होने वाले बुखार और दर्दनाक सूजन से बचाते हैं।

पेनलेस टीकाकरण के लाभ
यहाँ पेनलेस टीकाकरण के कुछ लाभ दिए गए हैं, आइए देखें:

  • पेनलेस टीकाकरण से बच्चे को नाम मात्रा दर्द होता है।
  • इंजेक्शन वाले एरिया पर सूजन नहीं होता है या बिलकुल नाममात्र होता है।
  • अन्य टीकों के विपरीत, पेनलेस टीके के बाद बच्चे को बुखार होने की संभावना बहुत कम होती है।
  • बच्चों में पेनलेस टीके के साइड इफेक्ट्स
आमतौर पर, बच्चो में पेनलेस टीकों के कोई साइड इफेक्ट्स नहीं होते हैं। लेकिन, ये टीके पूरी तरह से पेनलेस नहीं होते हैं। यह नॉर्मल टीकों के जैसे ही इंजेक्ट किए जाने पर दर्द देता है, लेकिन टीकाकरण के बाद इसमें दर्द नाममात्र ही रहता है और बुखार की संभावना भी कम होती है। इस टीकाकरण का एकमात्र नेगेटिव पॉइंट यह है कि यह महंगा है। वास्तव में, पेनलेस टीकों की कीमत पेनफुल टीकों की लागत से दोगुनी होती है।

नॉर्मल वैक्सीन बनाम पेनलेस वैक्सीन

  • DPT (डिप्थीरिया, पर्टुसिस और टेटनस) टीकाकरण का एक पेनफुल रूप है। इसे ‘इजी-फाइव’ या ‘पेंटावैक’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • DaPT (डिप्थीरिया, एकेलुलर पर्टुसिस और टेटनस) टीकाकरण का पेनलेस टीका है और इसे ‘पेंटाक्सिम’ के नाम से भी जाना जाता है।
पेंटाडिक (पेनफुल टीका) डिप्थीरिया, पर्टुसिस, टेटनस, हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी और हेपेटाइटिस बी से बचाता है, जबकि पेंटाक्सिम (पेनलेस टीका) हेपेटाइटिस बी को छोड़कर इन्हीं समान बीमारियों से बचाता है।
नॉर्मल या पेनफुल टीकाकरण, इंजेक्शन वाले क्षेत्र में सूजन का कारण बनता है और जिसके बाद अक्सर बुखार हो जाता है जबकि पेनलेस टीकाकरण के बाद इतने गंभीर प्रभाव नहीं होते हैं।

पेनलेस या नॉर्मल टीका – कौन है बेहतर?
पेनलेस और पेनफुल टीके, दोनों उतने ही प्रभावी हैं। तो आप अपने बच्चे के लिए दोनों में से किसी एक को चुन सकते हैं। लेकिन ध्यान रखें कि पेनलेस टीके महंगे होते हैं।

टीकाकरण की पसंद के आधार पर वैक्सीनेशन शेड्यूल
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (IAP) के अनुसार, एक सामान्य व पेनफुल वैक्सीन को इस प्रकार दिया जाना चाहिए:
प्राथमिक टीकाकरण: यह 6 सप्ताह, 10 सप्ताह और 14 सप्ताह के उम्र के बच्चों को दिया जाना चाहिए।

बूस्टर शॉट्स: बूस्टर शॉट्स बच्चे को तब दिया जाना चाहिए, जब वह डेढ़ साल और पांच साल का हो जाए।

इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (IAP) के अनुसार, एक पेनलेस वैक्सीन को इस प्रकार दिया जाना जाना चाहिए:

प्राथमिक टीकाकरण: IAP रेकमेंड करता है कि प्राथमिक टीकाकरण के लिए केवल विशेष परिस्थितियों में ही पेनलेस टीका दिया जाए। कुछ विशेष परिस्थितियां जैसे पिछले पेनफुल टीके के कारण एलर्जी हुआ हो या जब बच्चा न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से पीड़ित हो।

बूस्टर शॉट्स: ये डेढ़ साल और पांच साल की उम्र में कभी भी दिए जा सकते हैं।

नोट: IAP के नए दिशानिर्देशों के अनुसार, पेनलेस वैक्सीन और पेनफुल वैक्सीन का शेड्यूल एक ही है।

एक माता-पिता होने के नाते, आप सामान्य व पेनफुल वैक्सीन के बाद के होने वाले परिणामों से अपने बच्चे को बचाना चाहते हैं, लेकिन पेनलेस टीके की तुलना में नॉर्मल टीकों के लाभ अधिक हैं। बूस्टर शॉट्स के लिए आप अपने बच्चे को पेनलेस टीके दिला सकते हैं, लेकिन उनकीअच्छी इम्युनिटी के लिए, नॉर्मल टीके दिए जाने चाहिए।

[ Read More ]»

टाइफाइड का टीका बच्चों के लिए

Image SEO Friendly

टाइफाइड भारत में होने वाली एक प्रमुख स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, जिसका खतरा वयस्कों की तुलना में बच्चों को अधिक होता है। इसे मियादी बुखार या आंत्र बुखार के नाम से भी जाना जाता है। यह संक्रामक रोग दूषित भोजन और पानी से फैलता है और साल्मोनेला टाइफी नामक बैक्टीरिया के कारण होता है। यह बच्चों में शारीरिक और कॉग्निटिव (संज्ञानात्मक) विकास को बाधित कर सकता है। टाइफाइड से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है कि आप सही समय पर अपने बच्चे को इसका टीका लगवाएं।

टाइफाइड का टीका – यह क्या है?
टाइफाइड के टीके टाइफाइड को रोकने में मदद करते हैं। इस बीमारी के खिलाफ टीकाकरण जरूरी है, अन्यथा, यह गंभीर जटिलताओं को जन्म दे सकता है। टाइफाइड छोटे बच्चों को हानिकारक रूप से प्रभावित करता है। टाइफाइड की रोकथाम के लिए विभिन्न प्रकार के टीके उपलब्ध हैं। यह जानने के लिए कि कौन-सा टीका आपके बच्चे के लिए उपयुक्त होगा, आपको हमेशा अपने पेडिअट्रिशन (बाल रोग विशेषज्ञ) से परामर्श करना चाहिए।

टाइफाइड के टीके के प्रकार
टाइफाइड एक गंभीर समस्या है और इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। टाइफाइड के टीके दो प्रकार के होते हैं:

  • टाइफाइड पॉलीसैकराइड वैक्सीन
  • टाइफाइड कंजुगेट वैक्सीन
टाइफाइड से बचने के लिए किसे टीकाकरण करवाना चाहिए?
आमतौर पर, नीचे बताए गए लोगों के लिए टाइफाइड के टीकाकरण की सिफारिश की जाती है:

  • भारत में पैदा होने वाला प्रत्येक बच्चा
  • वे लोग, जो किसी संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क में हैं
  • वे लोग, जो साल्मोनेला टाइफी बैक्टीरिया के संपर्क में काम करते हैं
भारत में, हालांकि, टाइफाइड के नियमित टीकाकरण की सलाह दी जाती है क्योंकि हमें संक्रमण का खतरा अधिक है। शिशुओं को टाइफाइड का टीका जल्दी ही, 9-12 महीने की उम्र में भी दिया जा सकता है।

टाइफाइड कंजुगेट वैक्सीन या टीसीवी तब दी जाती है, जब बच्चा 9 से 12 महीने का होता है। आईएपी (इंडियन एकेडमी ऑफ़ पेडियाट्रिक्स) के दिशानिर्देशों के अनुसार, टीसीवी की बूस्टर खुराक देने की आवश्यकता नहीं है।

भारत में टाइफाइड के टीके की कीमत
भारत में टाइफाइड के टीके की कीमत वैक्सीन के प्रकार (पॉलीसेकेराइड या कंजुगेट) और टीके के ब्रांड के आधार पर भिन्न हो सकती है।

टाइफाइड टीकाकरण कार्यक्रम
बाल रोग विशेषज्ञों ने, बच्चे के जन्म के ठीक बाद जिन अनिवार्य टीकाकरणों का सुझाव दिया है, उस लिस्ट में टाइफाइड का टीका भी शामिल है। लेकिन बच्चे को इसे देने से पहले इन महत्वपूर्ण बातों को याद रखें:

खुराक की संख्या
9 से 12 महीने की उम्र के बीच टीसीवी की केवल एक खुराक पर्याप्त होती है।


अनुशंसित आयु
आदर्श रूप से, 2 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए टाइफाइड के टीके की सिफारिश की जाती है। इसे हर 3 वर्ष में दोहराना होगा। वैकल्पिक रूप से, टीसीवी 9-12 महीने की उम्र में दिया जा सकता है।

टाइफाइड का टीका लगवाने से पहले या बाद में सावधानियां
अपने बच्चे को टाइफाइड का टीका लगवाने से पहले इन बातों का ध्यान रखें:

  • यदि आपके बच्चे को टीके के किसी भी घटक से एलर्जी है तो यह टीका नहीं दिया जा सकता। यदि कोई एलर्जी हो, तो टीकाकरण से बहुत पहले ही डॉक्टर को इस बारे में बता दिया जाना चाहिए।
  • टीकाकरण के समय आपका बच्चा मामूली रूप से भी बीमार नहीं होना चाहिए।
  • यदि टीके की पिछली खुराक पर शरीर में गंभीर रिएक्शन हुआ हो, उसे उसी टीके की दूसरी खुराक नहीं दी जानी चाहिए।
हालांकि टाइफाइड का टीका बिल्कुल सुरक्षित है, आपके बच्चे को टीका लगने के एक या दो दिन बाद तक बुखार रह सकता है। घबराने की जरूरत नहीं हैं, पर बुखार बहुत देर तक रहने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं।

क्या होता है, अगर आपके बच्चे की खुराक छूट जाती है
यदि आप चिंतित हैं कि आपके बच्चे को नौवें महीने में टीका नहीं लग पाया, तो चिंता न करें, आप अभी भी उसके एक साल का होने से पहले टीका लगवा सकते हैं। इसके अलावा, टीसीवी आपके बच्चे को किसी भी समय दिया जा सकता है।

टीके के संभावित जोखिम और साइड इफेक्ट्स
टाइफाइड के टीके के साइड इफेक्ट आम तौर पर हल्के होते हैं – वे कुछ ही दिनों में दूर हो जाते हैं। दुर्लभ मामलों में, एलर्जी की प्रतिक्रिया हो सकती है। नीचे इन दुष्प्रभावों की चर्चा की गई है:

गंभीर दुष्प्रभाव
आमतौर पर, टाइफाइड के टीके का कोई गंभीर साइड इफेक्ट नहीं होता। निम्न स्थितियों में अपने पेडिअट्रिशन से संपर्क करें:

  • चक्कर आना, पित्ती और चेहरे और गले पर सूजन आदि गंभीर एलर्जी की प्रतिक्रिया के संकेत
  • सांस लेने में तकलीफ
  • दुर्बलता
  • बहुत तेज बुखार
  • व्यवहार में परिवर्तन
  • हालांकि ये प्रतिक्रियाएं दुर्लभ हैं, पर ये टीकाकरण लेने के कुछ घंटों के भीतर प्रकट हो सकती हैं।
कम गंभीर दुष्प्रभाव
टाइफाइड टीके के कुछ कम गंभीर दुष्प्रभाव हैं:

  • बुखार
  • सिरदर्द
  • लाली और सूजन
  • उस स्थान पर खुजली और पीड़ा, जहां टीका लगाया गया है
  • सामान्य बेचैनी
टाइफाइड एक गंभीर बीमारी है, जिसे छोटे बच्चों में सबसे अच्छी तरह से रोका जा सकता है। यदि आप सतर्क और सावधान हैं, तो आप अपने छोटे से बच्चे के लिए एक स्वस्थ बचपन सुनिश्चित कर सकते हैं। बस नियमित टीकाकरण और समय पर उसकी देखभाल आपको ऐसा करने में मदद करेगी।


[ Read More ]»

प्रीमैच्योर बच्चे की घर पर देखभाल करने के टिप्स

Image SEO Friendly

यदि आपका बच्चा 37 सप्ताह से पहले पैदा होता है, तो वह एक प्रीटर्म या प्रीमैच्योर बच्चा कहलाता है। आपका बच्चा नीयोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट में कुछ दिन बिताने के बाद जल्द ही आपके पास घर आ जाता है। प्रीमैच्योर बच्चे थोड़े छोटे और ज्यादा नाजुक होते हैं, तो आपको लग सकता है कि आप इतने छोटे बच्चे को कैसे संभाल पाएंगे। चिंता न करें, इस लेख में हम कुछ टिप्स के बारे में बात करेंगे जिनसे आपको अपने प्री मैच्योर बच्चे की देखभाल करने में मदद मिलेगी।

प्रीमैच्योर बच्चे कैसे होते हैं
प्रीटर्म बेबी को विशेष देखभाल और निगरानी की आवश्यकता होती है जो कि इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे का जन्म समय से कितने पहले हुआ है। इसके अलावा, आपके बच्चे में फुल टर्म वाले बच्चे से कुछ अलग विशेषताएं होंगे, हालांकि समय बीतने के साथ-साथ इन विशेषताओं पर ज्यादा ध्यान नहीं जाता है।


  • आपके बच्चे के शरीर में कम वसा पाई जा सकती है। नवजात शिशुओं के शरीर में गर्मी पैदा करने के लिए वसा बहुत जरूरी है। त्वचा के नीचे यह वसा, जिसे ब्राउन फैट कहा जाता है, पीठ, कंधे, गर्दन, बगल और गुर्दे के पास पाया जाता है।
  • बच्चे का तंत्रिका तंत्र यानि नर्वस सिस्टम ठीक से विकसित नहीं हुआ होगा।
  • हो सकता है आपके बच्चे के फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं हुए होंगे। इसलिए, उसे सांस लेने में परेशानी हो सकती है।
  • आपके प्री मैच्योर बच्चे में लानुगो की कमी होती है, जो कि बहुत ही महीन बाल होते हैं जो आपके बच्चे के शरीर को ढंकते हैं। हालांकि, यदि आपका बच्चा समय से पहले पैदा हुआ है, पर उसका जन्म प्रसव की तारीख के करीब है, तो उसके हल्के बाल हो सकते हैं।
  • यदि आपका बच्चा 26वें सप्ताह से पहले पैदा हुआ है, उसकी आँखें बंद हो सकती है।
  • हो सकता है कि आपका शिशु ज्यादा ना हिले क्योंकि शरीर में वसा कम है। जो बच्चा 29वें से 32वें सप्ताह के बीच पैदा हुआ है वो बार-बार झटकेदार गतिविधियां कर सकता है। हालांकि, 29वें सप्ताह से पहले पैदा होने वाले शिशुओं में कोई पर्याप्त हलचल नहीं हो सकती है।
  • प्रीटर्म शिशुओं में प्रतिरक्षा बहुत कम होती है, जो उन्हें संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है।
  • आपके प्री मैच्योर बच्चे को दूध पिलाने में समस्या हो सकती है और इसलिए, वह ठीक से दूध नहीं पी पता होगा।
प्रीमैच्योर बच्चों को खास देखभाल की आवश्यकता क्यों है?
प्रीमैच्योर बच्चे पूर्ण अवधि के शिशुओं की तरह नहीं होते हैं, और इसलिए उन्हें खास देखभाल और निगरानी की आवश्यकता होती है। इंटेंसिव केयर के बिना उनका शरीर पूरी तरह से विकसित नहीं हो सकता है। मेडिकल टेक्नोलॉजी ने जबरदस्त तरक्की की है, और ऐसे शिशुओं को अपनी माँ की कोख के बाहर या कई दिनों या महीनों के लिए अतिरिक्त देखभाल दी जा सकती है, जब तक उनका शरीर बाहरी सहारे के बिना खुद को संभालने के लिए पूरी तरह मजबूत नहीं होता है।

घर पर प्रीमैच्योर बच्चे की देखभाल के लिए टिप्स
यहाँ उन माता-पिता के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं जो उन्हें घर पर अपने बच्चे की देखभाल करने में उनकी मदद कर सकते हैं:

1. स्तनपान जरुरी है
नवजात बच्चों को स्तनपान कराना सबसे जरुरी है लेकिन कभी-कभी आपके बच्चे को निप्पल से दूध पीने में समस्या हो सकती है या हो सकता है कि वे बिल्कुल भी दूध ना पी पाएं। आप दूध को पंप से निकालकर रख सकती हैं और बच्चे को बोतल से दूध पिला सकती हैं। कुछ मामलों में, आपका डॉक्टर आपको अपने बच्चे को फॉर्मूला दूध पिलाने की सलाह दे सकता है; प्रीटर्म शिशुओं के लिए कई बार अलग फॉर्मूला दूध हो सकता है।

2. बच्चे को दूध पिलाने का एक समय-सारणी बनाएं
एक प्रीमैच्योर बच्चे को एक दिन में 8-10 बार स्तनपान की आवश्यकता होती है। इसलिए, सुनिश्चित करें कि आप नियमित अंतराल पर अपने बच्चे को दूध पिलाएं। दिन में कभी भी खाने में 4 घंटे से ज्यादा का अंतर न होने दें क्योंकि इससे निर्जलीकरण की संभावना बढ़ सकती है, जो आपके बच्चे के लिए खतरनाक हो सकती है।

3. बच्चे के विकास का रिकॉर्ड रखें
प्रीटर्म बच्चे पूर्ण अवधि के शिशुओं की तुलना में अलग तरह से बढ़ते हैं। हालांकि, बाद में वो अन्य बच्चों जैसे हो जाते हैं। आपका डॉक्टर आपके बच्चे के विकास का रिकॉर्ड रखने के लिए आपको एक अलग विकास चार्ट दे सकता है।

4. अपने डॉक्टर के साथ संपर्क में रहें
अस्पताल छोड़ने के बाद भी, आपको नियमित रूप से अपने बच्चे के डॉक्टर के साथ संपर्क में रहना चाहिए और अपने बच्चे की देखभाल करने के तरीके के बारे में सुझाव लेते रहना चाहिए। यदि आवश्यकता होती है, तो आप अपने डॉक्टर से मिल भी सकते हैं।

5. बच्चे की नींद का खयाल रखें
आपके प्रीटर्म बच्चे को भरपूर नींद की जरूरत होती है, और वह अपना ज्यादातर समय केवल सोने में बिता सकता है। सुनिश्चित करें कि उसे एक मजबूत गद्दे पर, बिना तकिए के साथ लिटाएं। इसके अलावा, अपने बच्चे को कभी भी उसके पेट के बल ना लिटाएं; उसे हमेशा उसकी पीठ पर सुलाएं।

6. ठोस आहार
आपको बच्चे को ठोस आहार देने के लिए थोड़ा ज्यादा इंतजार करना पड़ सकता है क्योंकि प्रीटर्म बच्चों को भोजन निगलने में मुश्किल हो सकती है। आपका डॉक्टर आपको शिशु की असली डिलीवरी तारीख के 4 से 6 महीने बाद ठोस आहार शामिल करने की सलाह दे सकता है, न कि उसकी वास्तविक जन्मतिथि के हिसाब से।

7. बच्चे को घर से बाहर कम ही ले जाएं
डॉक्टर के पास जाने के अलावा, आपको अपने बच्चे को कई हफ्तों तक बाहर निकालने से बचाना होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि बच्चे को संक्रमण होने का खतरा अधिक होता है, जो उसके लिए हानिकारक हो सकता है।

8. घर पर कंगारू केयर का अभ्यास करें
आपको अस्पताल में कंगारू केयर के बारे में बताया गया होगा, और घर पर भी कुछ हफ्तों तक इसका अभ्यास करना अच्छा रहेगा। त्वचा से त्वचा का संपर्क आपके बच्चे के लिए अच्छा है।

9. बच्चे को सभी आवश्यक टीके लगवाएं
अपने बच्चे के टीकाकरण कार्यक्रम का ध्यान रखें और अनुसूची के अनुसार अपने बच्चे का टीकाकरण करवाएं।

10. मेहमानों का आना जाना कम रखें
आपके बच्चे की प्रतिरक्षा बहुत कम है। इसलिए घर पर मेहमानों का आना जाना कम ही रखें, खासकर उनका जिनकी तबियत खराब है या जो धुम्रपान करते हैं। सुनिश्चित करें कि जो भी आपके बच्चे से मिलता है या उसे छूता है, उसे ऐसा करने से पहले अपने हाथों को धोएं।

प्रीमैच्योर माता-पिता के लिए तनाव से राहत के तरीके

  • आप अपने बच्चे को स्पर्श कर सकते हैं, सहला सकते हैं और अपनी गोद में ले सकते हैं, जैसे ही डॉक्टर ऐसा करने की सलाह देता है।
  • आप समय समय पर अपने बाल रोग विशेषज्ञ को अपने बच्चे के स्वास्थ्य और विकास के बारे में बताती रहें व सलाह लें।
  • यदि आप अपने बच्चे को पकड़ते हैं, तो डॉक्टर से पूछ कर आप अपने बच्चे के साथ नियोनेटल युनिट में अधिक समय भी बिता सकते हैं।
  • यदि आपका डॉक्टर सुझाव देता है, तो आप अपने बच्चे को दूध पिलाना शुरू कर सकती हैं।
  • जब आप बच्चे को हॉस्पिटल से घर ले जाते हैं तो डॉक्टर के कहे अनुसार पालन करें और बच्चे का भरपूर खयाल रखें।
कुछ सवाल जो आपको अपने डॉक्टर से पूछने चाहिए
प्रीमैच्योर बच्चों की देखभाल से जुड़े कुछ सवाल जो आपको अपने डॉक्टर से पूछने चाहिए:

1. अगर मेरा पहला बच्चा प्रीमैच्योर है, तो क्या दूसरा बच्चा भी प्री मैच्योर होने का कोई खतरा है?
यदि आपके बच्चे का जन्म 37 से 42 सप्ताह के बीच हुआ है, तो आपको अगली बार फुल टर्म बच्चे की डिलीवरी की संभावना है। हालांकि, यदि आपने 20 से 31 सप्ताह के बीच अपने बच्चे को जन्म दिया है, तो इस बात की अधिक संभावना है कि आपकी फिर से समय से पहले डिलीवरी होगी।

2. मुझे क्या करना चाहिए, कि मेरे प्रीमैच्योर बच्चे का विकास अन्य फुल टर्म बच्चों जैसे अच्छे से हो?
ज्यादातर, प्रीमैच्योर बच्चे फुल टर्म बच्चों की तरह ही विकसित हो सकते हैं अगर वे बहुत जल्दी पैदा नहीं होते हैं, या कुछ चिकित्सीय जटिलता ना हो। अच्छी देखभाल करना, पर्याप्त नींद और कंगारू केअर सुनिश्चित करेंगे आपके बच्चे को बेहतर तरीके से विकसित करने में मदद होगी।

3. परिवार के बाकि सदस्यों से प्रीमैच्योर बच्चे को कब मिलवाना चाहिए?
आपके प्रीमैच्योर बच्चे को संक्रमण होने का खतरा अधिक होता है और इस प्रकार परिवार के किसी भी सदस्य को कोई भी संक्रमण जैसे सर्दी या फ्लू हो, तो बच्चे से दूर रहना चाहिए। जब भी किसी को बच्चे को छूने की इच्छा हो, तो उन्हें अपने हाथों को अच्छी तरह से धोने के लिए कहें।

4. क्या प्रीमैच्योर बच्चों को लंबी स्वास्थ्य समस्या होने का खतरा है?
आपके प्री मैच्योर बच्चे को कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं क्योंकि उसके पास विकसित होने के लिए पूरा समय नहीं रहा था। यह देखा गया है कि बच्चा जितना ज्यादा जल्दी पैदा होता है, उतनी ही स्वास्थ्य समस्याएं जैसे कि सांस लेने में कठिनाई, कमजोर मांसपेशियां, सुनने में कमी, हृदय की समस्याएं आदि की संभावना अधिक होती है।

हालांकि, प्रीमैच्योर बच्चों को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन समय के साथ उनका विकास भी फुल टर्म बच्चों की तरह ही हो जाता है। समय-समय पर अपने डॉक्टर से सलाह लेते रहें जिससे आपके बच्चे को बेहतर तरह से बढ़ने में मदद मिले।

[ Read More ]»

ग्राइप वाटर बच्चो को क्या देना चाहिए?

Image SEO Friendly

नवजात शिशु और बच्चे अक्सर बिना किसी स्पष्ट कारण के रोते हैं। ऐसे मामलों में बच्चों को कोलिक या होने की संभावना रहती है। उदरशूल क्या है, इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है, लेकिन यह एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग तब किया जाता है, जब बच्चे एक लंबी अवधि के लिए अत्यधिक रोते हैं। यह आमतौर पर उन शिशुओं में देखा जाता है जो तीन सप्ताह से तीन महीने के बीच के होते हैं। पेट में गैस के कारण होने वाली बेचैनी को व्यापक रूप से कोलिक का कारण माना जाता है और कई माता-पिताओं के लिए, ग्राइप वाटर पसंदीदा उपाय है।

ग्राइप वॉटर क्या है?
ग्राइप वाटर एक ऐसा घोल है जिसका उद्देश्य बच्चों में पेट फूलना, उदरशूल, अपच, हिचकी और दाँत निकलते समय दर्द के कारण होने वाली बेचैनी को शांत करना है। इस घोल के अलग-अलग प्रकार उपलब्ध हैं, और इनमें विभिन्न जड़ी-बूटियों का मिश्रण है।

ग्राइप वॉटर में क्या पाया जाता है?
सौंफ, अदरक, कैमोमाइल, मुलेठी, दालचीनी, और लेमन बाम कुछ ऐसे तत्व हैं जो ग्राइप वॉटर में पाए जाते हैं। मूल रूप से इस घोल की सामग्री में पानी, अल्कोहल, सोआ बीज का तेल, चीनी और सोडियम बाइकार्बोनेट शामिल होते हैं। कुछ ब्रांडों में ग्लिसरीन का भी उपयोग किया जाता हैं। माता-पिता और डॉक्टरों की आपत्तियों के बाद अब ग्राइप वॉटर में अल्कोहल का उपयोग बंद कर दिया गया है। कुछ ब्रांडों को कृत्रिम मिठास का उपयोग करने के लिए भी जाना जाता है जो बच्चे के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। पुदीने का तेल कुछ भारतीय ब्रांड में पाया जा सकता है। नारंगी या स्ट्रॉबेरी जैसे विभिन्न स्वादों में ग्राइप वॉटर उपलब्ध है।

क्या ग्राइप वॉटर बच्चों के लिए सुरक्षित है?
कोई ठोस सबूत नहीं है जो यह साबित कर सके कि बच्चों के लिए ग्राइप वॉटर सुरक्षित नहीं है। इस बात पर कई अलग-अलग राय है कि क्या ग्राइप वॉटर प्रभावी है क्योंकि कुछ ने इसे अपने बच्चों के लिए उपयोगी पाया है जबकि अन्य ने नहीं। जहाँ तक सुरक्षा की बात है, शिशुओं के लिए अल्कोहल, कृत्रिम मिठास या सोडियम बाइकार्बोनेट की सलाह नहीं दी जाती है।

यहाँ ग्राइप वॉटर के सामग्रियों में कुछ विस्तार से समझाए गए हैं और वे बच्चे को कैसे प्रभावित करते हैं यह भी बताया गया है:

अल्कोहल: अल्कोहल शिशुओं के लिए उपयुक्त नहीं है और इससे बच्चे को इसकी लत लग सकती है।

सोडियम बाइकार्बोनेट: बेकिंग सोडा के रूप में भी जाना जाता है, इससे दूध-क्षार सिंड्रोम हो सकता है जो खून में कैल्शियम की मात्रा में वृद्धि का कारण बनता है। चूंकि छह महीने से कम उम्र के बच्चों को सिर्फ माँ का दूध या पाउडर वाला दूध दिया जाता है, इसलिए उन्हें इस स्थिति का अधिक खतरा होता है, जिससे किडनी की भी समस्या हो सकती है।

चीनी: अतिरिक्त चीनी से दाँतों में सड़न हो सकता है और चीनी पर निर्भरता विकसित हो सकती है।

सोआ बीज का तेल: यह एक वनस्पति तेल है जो कि अपच से राहत प्रदान करता है। हालांकि, कुछ शिशुओं को इससे एलर्जी हो सकती है, इसलिए इस प्रकार की सामग्री का उपयोग करते समय सावधानी बरतनी चाहिए।

प्राकृतिक सामग्री और शिशु आहार संरचना के बारे में बढ़ती जागरूकता के बावजूद, कुछ ब्रांडों के निर्माण में पैराबेंस, वनस्पति कार्बन या डेयरी उत्पाद शामिल हो सकते हैं जिनका उपयोग नहीं की जानी चाहिए। डॉक्टरों की राय भी इस बात पर विभाजित है कि क्या शिशुओं को ग्राइप वॉटर दिया जा सकता है। बाजार में विभिन्न ब्रांड हैं और शिशुओं को वही दिया जाना चाहिए जो उनकी स्थिति के लिए सबसे उपयुक्त हो।

ग्राइप वॉटर का क्या उपयोग है
कहा जाता है कि ग्राइप वॉटर शिशुओं में पाचन संबंधी समस्याएं और हिचकियां कम करने में बहुत लाभदायक होता है। जिन शिशुओं को पेट फूलने और साथ ही एसिडिटी जैसी जठरांत्र संबंधी समस्या होते हैं, उन्हें भी इसका सेवन करने से फायदा हो सकता है। जिन बच्चों का दाँत निकलना शुरू होता है वे चिड़चिड़े होते हैं और बहुत रोते हैं। जिस कारण उनके पेट में काफी हवा जाती है जिससे बाद में पेट फूल सकता है। हिचकी जो डायफ्राम उत्तेजित होने से होती है, शिशुओं को परेशान कर सकती है और पेट फूलना, एसिड रिफ्लक्स या अपच के कारण होती है। ग्राइप वॉटर डायफ्राम को राहत दिलाने के लिए जाना जाता है और इस तरह से बच्चों को हिचकी से राहत मिलती है।

बच्चे ग्राइप वॉटर कब पी सकते हैं?
ग्राइप वॉटर के निर्माता दावा करते हैं कि यह दो सप्ताह के शिशुओं को भी दिया जा सकता है। हालांकि, एक महीने से कम उम्र के बच्चों को इसे देना उचित नहीं है क्योंकि उनका पाचन तंत्र अभी भी विकसित हो रहा होता है और संवेदनशील हो सकता है। ऐसे लोग भी हैं जो यह मानते हैं कि शिशुओं को छह महीने तक माँ के दूध या पाउडर वाले दूध के अलावा कुछ नहीं दिया जाना चाहिए। तो, शिशु को ग्राइप वॉटर देने के संबंध में अपने बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श करना सबसे अच्छा विकल्प है।

बच्चों को ग्राइप वॉटर कैसे दें?
बच्चे को थोड़ा ग्राइप वॉटर देने का सबसे अच्छा समय दूध पिलाने के लगभग दस मिनट बाद का है। एक ड्रॉपर या एक चम्मच का उपयोग करके बच्चे को दिया जा सकता है और इसके अच्छे स्वाद के कारण, अधिकांश बच्चे बिना कोई उपद्रव मचाए इसे पी जाएंगे। यह आमतौर पर दिन में एक बार दिया जाता है लेकिन अपने डॉक्टर से जरूर सलाह लें।

ग्राइप वॉटर के दुष्प्रभाव
चिकित्सीय दृष्टि से ग्राइप वॉटर के कोई दुष्प्रभाव नहीं हैं। हालांकि, यह संभव है कि आपके बच्चे को किसी विशेष ब्रांड में एक या अधिक सामग्री से एलर्जी हो। बोतल के पीछे लिखे सामग्री की सूची की जाँच करके ही खरीदें। ग्राइप वॉटर के सेवन के बाद पित्ती, आँखों से पानी, सूजे हुए होंठ या जीभ, उल्टी, खुजली और सांस लेने के पैटर्न में कोई परिवर्तन होना एलर्जिक प्रतिक्रिया के संकेत हो सकते हैं। अगर आपके शिशु में इस तरह के दुष्प्रभाव दिखाई देते हैं, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

क्या ग्राइप वॉटर पाउडर वाले दूध के साथ मिलाया जा सकता हैं?
पाउडर वाले दूध के साथ ग्राइप वॉटर मिलाने के लिए पाउडर वाला दूध तैयार करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पानी की जगह थोड़ा ग्राइप वॉटर का इस्तेमाल करें। इससे पाउडर वाले दूध का स्वाद बदल सकता है। आप इसे पानी या माँ के दूध के साथ मिला सकते हैं लेकिन ऐसा हो सकता है कि आपका बच्चा हर समय इस मिश्रण की माँग करना शुरू करें। सर्वोत्तम परिणामों के लिए, इसे बच्चे को उसके मूल रूप में दें।

ग्राइप वॉटर के अन्य विकल्प
ग्राइप वॉटर के अलावा, कुछ तरीके हैं जिनसे आप अपने बच्चे को शांत कर सकते हैं और उसे बेहतर महसूस करने में मदद कर सकते हैं। पेट के दर्द और गैस से छुटकारा पाने में मदद करने के लिए पेट की हल्की मालिश करें। पाउडर वाले दूध के ब्रांड को बदलना कुछ बच्चों के लिए मददगार साबित हो सकता है। जब आपका बच्चा चिड़चिड़ा होता है तो उसे अपने कंधे के ऊपर रखें और धीरे से उनकी पीठ पर थपथपाएं ताकि उन्हें डकार आ सकें। कई बार सिर्फ इतना ही करना आपके बच्चे को बेहतर महसूस करने में मदद करने के लिए आवश्यक होता है। अपने बच्चे को कपड़े में ठीक से लपेटने (स्वैडलिंग) से वह शांत हो सकता है और उसे आराम मिल सकता है। यदि संभव हो, तो सुनिश्चित करें कि आपका बच्चा छह महीने की उम्र तक सिर्फ माँ का दूध पी रहा है, क्योंकि जठरांत्र संबंधी मार्ग को स्वस्थ रखने के लिए माँ का दूध सबसे अच्छा होता है।

ग्राइप वॉटर चुनने और पिलाने के टिप्स
यदि आपको अपने बच्चे को ग्राइप वॉटर पिलाना हैं, तो अपने शिशु के लिए सही प्रकार सुनिश्चित करने के लिए इन युक्तियों का पालन करें।

  • ऐसा ग्राइप वॉटर ने चुनें जिसमें सोडियम बाइकार्बोनेट हो, क्योंकि यह आपके बच्चे के पेट के पीएच स्तर में असंतुलन पैदा कर सकता है।
  • यह सुनिश्चित करने के लिए कि आपके बच्चे को किसी भी तरह की एलर्जी न हो, सामग्री सूची अच्छी तरह से पढ़ें।
  • किसी भी दुष्प्रभाव या प्रतिक्रिया पर नजर रखें।
  • खुराक और उपयोग किए जाने वाले ब्रांड के बारे में अपने डॉक्टर से परामर्श करें।
  • एक ऐसा ब्रांड ढूँढने की कोशिश करें जो अधिक से अधिक प्राकृतिक सामग्री का उपयोग करता हो।
  • वह ग्राइप वॉटर न खरीदें जिसमें अल्कोहल हो।
  • सुक्रोज, वनस्पति कार्बन या चारकोल वाले ग्राइप वॉटर से दूर रहें।
  • निर्देशों को ठीक से पढ़ें और सलाह के अनुरूप प्रबंधित सही खुराक दें।

छोटे बच्चों में चिड़चिड़ापन व उदरशूल हमेशा से बना रहा है! लेकिन हर बार ग्राइप वॉटर समाधान नहीं हो सकता है। आपके लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि आपका शिशु चिढ़ा हुआ या दर्द में क्यों हैं। अगला कदम है किसी भी बाहरी पदार्थ के उपयोग के बिना छोटे बच्चे को शांत करना और आराम पहुँचाना। यदि आप पहली बार माता-पिता बने है तो यह मुश्किल हो सकता है क्योंकि ऐसा लग सकता है कि कुछ भी काम नहीं कर रहा है। हालांकि, एक बार जब आपको इसकी आदत हो जाती है, तो सब ठीक हो जाएगा और आपको पता चल जाएगा कि आपके बच्चे को कैसे शांत करना है।

[ Read More ]»

दांतों को ब्रश करना बच्चे को कैसे शुरू करें

Image SEO Friendly

आपके नन्हे-मुन्ने के मोती जैसे सफेद छोटे-छोटे दाँत जल्द ही निकल आएंगे जो उसकी मुस्कान को और अधिक प्यारी बना देंगे। यह सुनिश्चित करना आपका काम है कि भविष्य में किसी भी तरह की गंभीर दंत समस्याओं से बचाने के लिए शुरुआत से ही शिशु के दाँतों की साफ-सफाई और सुरक्षा करें। कम उम्र से ही दैनिक रूप से दाँतों की सफाई का नियम बनाने से आपके बच्चे को इसकी आदत हो जाएगी और यह उसे और उसके दाँतों को स्वस्थ रखने में मदद करेगी । इससे दाँतों में सड़न नहीं होगी और शिशु के पोषण और बोलने संबंधी विकास में भी कोई समस्या नहीं आएगी । जानिए, अपने बच्चे के दाँतों को ब्रश करने की शुरुआत कैसे करनी चाहिए।

बच्चे के दाँतों के लिए ब्रश कब शुरू करें
अपने बच्चे के दाँतों को ब्रश करना या साफ करना शुरू करने का सबसे अच्छा समय तब होता हैं जब उसका पहला दाँत निकलता है। यह समय तीन माह से नौ माह के बीच कभी भी हो सकता है। प्रत्येक शिशु के दाँत निकलने की आयु अलग होती है, कुछ शिशुओं के दाँत एक वर्ष के बाद भी नहीं निकलते।

बच्चे के दाँतों को ब्रश करने के लिए आवश्यक चीजें
अपने बच्चे के दाँतों को ब्रश करने के लिए आपको एक छोटे टूथब्रश और फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट की आवश्यकता होगी। यदि बच्चा बहुत छोटा है, तो आप एक साफ नम कपड़े, अपनी उंगली या एक गॉज़ पैड की मदद से उसके दाँतों की सफाई कर सकती हैं। याद रखें कि यह काम धीरे-धीरे करें ताकि उसे कोई परेशानी न हो । यदि आप एक बेबी टूथब्रश का उपयोग कर रही हैं, तो सुनिश्चित करें कि इसका सिरा छोटा, ब्रिसल्स मुलायम और हैंडल चौड़ा हो। बच्चे के लिए केवल चावल के एक दाने जितनी ही टूथपेस्ट की मात्रा का उपयोग करें।

बच्चे के दाँतों को ब्रश करने का तरीका
बच्चे के दाँतों को आरामदायक तरीके से ब्रश करने के लिए आप इसे हल्के हाथों से करें। यहाँ बच्चे के दाँत ब्रश करने का एक बेहतरीन तरीका बताया गया है।

  • ऐसी जगह पर बैठें जहाँ भरपूर रोशनी हो। अपने बच्चे के सिर को अपनी गोद में रखें।
  • अपने बच्चे के टूथब्रश यागॉज़ पैड पर जरा सा टूथपेस्ट लें। याद रखें, बच्चे के लिए टूथपेस्ट की चावल के एक दाने जितनी मात्रा भी बहुत होती है।
  • धीरे से इसे अपने बच्चे के मुँह के पास ले जाएं और हल्के हाथों से प्रत्येक दाँत को ब्रश करें। आपको प्रत्येक दाँत के आगे और पीछे के हिस्से को कोमलता से और चारों ओर ब्रश घुमाते हुए सफाई करनी होगी। दिन में दो बार ऐसा करने की आवश्यकता होगी ।
  • उसकी जीभ को भी टूथब्रश से साफ करें। यह जीवाणुओं को जमा होने से रोकेगा और सांस की दुर्गंध से बचाएगा।
  • भले टूथपेस्ट की मात्रा कम हो लेकिन बच्चे को पानी से कुल्ला करवाने का प्रयास करें और टूथब्रश को पानी से साफ करके सूखने रख दें।
  • अगर बच्चे को दाँत साफ करना पसंद न हो तो क्या करें

शिशुओं के मसूड़े संवेदनशील होते हैं और अगर उनके दाँत निकल रहे हैं तो उनमें दर्द भी हो सकता है । इसलिए, यह संभावना है कि आपका बच्चा दाँत ब्रश करने की पूरी प्रक्रिया का विरोध करेगा। यदि शिशु दाँतों को साफ करने के लिए बहुत इच्छुक नहीं है तो आप निम्नलिखित युक्तियों/सुझावों का प्रयोग कर सकती हैं:

  • कोमलता से व्यवहार करें: शिशुओं के मसूड़े संवेदनशील होते हैं। यदि आपका बच्चा विशेष रूप से टूथब्रश को पसंद नहीं करता है, तो आप नरम वॉशक्लॉथ या गॉज़ पैड इस्तेमाल कर सकती हैं।
  • ध्यान भंग करें: शिशुओं का ध्यान एक चीज पर केंद्रित होने की आवश्यकता होती हैं। इसलिए थोड़ा गाने गाकर या कहानी सुनाकर उसका ध्यान भंग करके ब्रश करने की कोशिश करें ।
  • बच्चे के साथ ब्रश करें: आप ब्रश करने की प्रक्रिया को शिशु के लिए एक खेल की तरह कर सकती हैं। उसे दिखाएं कि आप अपने दाँतों को कैसे ब्रश करती हैं और फिर उसे कोशिश करने के लिए कहें और आपको उसके दाँत ब्रश करने दें।
  • उसकी उत्सुकता को शांत करें: शिशुओं को नई चीजों के साथ खेलना पसंद होता है। अपने बच्चे को दाँत साफ करने के दौरान आसपास के माहौल और टूथब्रश का आनंद लेने के लिए पर्याप्त समय दें।
  • बच्चे को दिन में कितनी बार ब्रश करवाना चाहिए
  • आप अपने बच्चे के दाँतों को दिन में दो बार ब्रश करवाने की आदत डालें । एक बार सुबह उठने के बाद और दूसरी बार रात को सोने से पहले।

क्या एक नवजात शिशु के मसूड़ों को ब्रश किया जा सकता है
जब कि स्तनपान के बाद अपने बच्चे के मसूड़ों की सफाई करने से बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकने में मदद मिल सकती है, लेकिन बेहतर यह होगा कि आप इसके लिए टूथब्रश का उपयोग न करें। इसके बजाय आप एक नरम और साफ गीले कपड़े का उपयोग कर सकती हैं। सिलिकॉन या रबर फिंगर ब्रश भी बाज़ार में मिलते हैं जो आपके बच्चे के संवेदनशील मसूड़ों के लिए नरम होते हैं। मसूड़ों को साफ करने के लिए आपको टूथपेस्ट की आवश्यकता नहीं होती। आप शिशु के दाँत निकलने से पहले ही उसके मसूड़ों की सफाई करना शुरू कर सकती हैं।

यदि बच्चे के दाँतों में ब्रश करवाते समय रक्तस्राव हो तो क्या करें
यदि आप अपने बच्चे के दाँतों को ब्रश करवाते समय रक्तस्राव देखती हैं, तो यह संक्रमण का संकेत हो सकता है। मसूड़ों में सूजन और जलन जैसे किसी भी अन्य लक्षण की जांच करें। यह संभव है कि नियमित रूप से ब्रश करने और दाँतों की देखभाल करने से यह समस्या कम हो जाए। हालांकि, अगर ऐसा नहीं होता है तो बच्चे को तुरंत डेंटिस्ट के पास ले जाएं ।

क्या हर स्तनपान के बाद बच्चे को ब्रश कराना आवश्यक है
नहीं। हर बार स्तनपान कराने पर उसके दाँतों को ब्रश करने की आवश्यकता नहीं होती। नाश्ते के बाद और रात को सोने से पहले दिन में दो बार ब्रश करवाना पर्याप्त है। हालांकि, आप बैक्टीरिया को पनपने से रोकने के लिए स्तनपान के बाद बच्चे के मसूड़ों को गीले व मुलायम कपड़े से पोंछ सकती हैं।

क्या नारियल तेल से बच्चे के दाँत साफ किए जा सकते हैं
बच्चे के दाँतों के लिए उसके डेंटिस्ट द्वारा सुझाए गए टूथपेस्ट या किसी स्टैंडर्ड फ्लोराइडयुक्त टूथपेस्ट का उपयोग करना सबसे अच्छा होता है। इस बात का कोई वैध प्रमाण नहीं है जो यह साबित करता हो कि नारियल का तेल दाँतों के लिए अच्छा होता है।

बच्चों को कैविटीज और दंत क्षय का भी खतरा हो सकता है। किसी बच्चे के दाँतों को ठीक तरह से साफ करने के तरीके को जानने से आपको भविष्य में दाँत की किसी भी गंभीर जटिलता से बचाव में मदद मिल सकती है। यह सबसे बेहतर है कि आप शिशु के दाँतों को साफ करने में तब तक उसकी सहायता करें जब तक कि वह छह या सात साल का न हो जाए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह इसे सही तरीके से कर रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर दूध के दाँतों में कैविटीज और सड़न हो जाए, या मसूड़े किसी संक्रमण से प्रभावित हों, तो यह बाद में स्थाई दाँतों को प्रभावित कर सकते हैं। शुरुआत से ही अपने बच्चे के दाँतों में ब्रश कराना इन समस्याओं को रोक सकता है।

[ Read More ]»

बच्चे के दाँत निकलने के बारे में मिथक और अंधविश्वास

Image SEO Friendly

विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में प्रगति के साथ बच्चों की देखभाल व पालन-पोषण के विषय में भी बहुत बदलाव हुए हैं। बच्चे की वृद्धि और विकास कैसे होता है, इसकी बेहतर समझ आ गई है। हालांकि, अभी भी इसके संबंध में कई अंधविश्वास हैं, जो परंपरागत सोच के रूप में चले आ रहे हैं और माता-पिता व अन्य रिश्तेदारों को बच्चे की प्रगति के बारे में चिंतित करते हैं। इस संबंध में कई मौजूद उदाहरणों में सबसे ज्यादा प्रचलित मिथक है, दाँत निकलने के समय आने वाला बुखार और ऐसे कई अन्य मिथक जिससे बच्चे की दाँत निकलने की प्रक्रिया पर असामान्य ध्यान केंद्रित होता है। मिथक और वास्तविकता के बीच के अंतर को जानने से आपको बेहतर तरीके से स्थिति को संभालने में मदद मिल सकती है।

बच्चे के दाँत निकलने के बारे में मिथक और अंधविश्वास
एक बच्चे के विकास के क्रम में दाँत निकलना काफी महत्वपूर्ण पड़ाव है। हमने इस बारे में प्रचलित अनेक मिथक और उनके पीछे के वास्तविक तथ्यों को एक साथ आपके सामने रखा है, जो आपको बच्चे के साथ क्या हो रहा है, इसकी बेहतर जानकारी देने में आपकी मदद कर सकते हैं।

1. मिथक
आपको अपने बच्चे के लिए फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह उसके लिए काफी खतरनाक हो सकता है और उसके नए दाँतों को नुकसान पहुँचा सकता है।

तथ्य:
हाँ, आपका बच्चा अपने मुँह में प्रवेश करने वाली हर चीज को निगल सकता है और इससे आपको उसके टूथपेस्ट खाने के बारे में भी चिंता हो सकती है। बच्चे के दाँतों की सफाई करते समय टूथपेस्ट की थोड़ी मात्रा का उपयोग करके इसे अच्छी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है। फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट का उपयोग उसके नए दाँतो को किसी भी तरह की कैविटी बचाने के लिए आवश्यक है।

2. मिथक
यदि बच्चे के दाँत आने की शुरुवात ऊपर के दाँतों के साथ होती है, तो यह उसके मामा के लिए दुर्भाग्यशाली हो सकता है, यहाँ तक कि मामा के जीवन के लिए खतरा भी हो सकता है।

इसका परिमार्जन अनेक तरीकों से किया जा सकता है। उनमें से कुछ में माँ को पैदल अपने घर जाना होता है और रास्ते में अपने भाई को मिलना होता है। अन्य परिवार बालक के दाँत को छूने के लिए तांबे के सिक्के का उपयोग करते हैं।

तथ्य:
यह सुनने में आपको बेतुका लग सकता है, लेकिन यह विशेष रूप से देश के उत्तरी क्षेत्रों में काफी प्रचलित मिथक है। इस मिथक या अभिशाप का परिमार्जन करने के तरीके इससे भी ज्यादा हास्यास्पद हैं। यह समझना आवश्यक है कि जबड़े से दाँत निकलने वाली कोई भी घटना किसी भी तरह से किसी इंसान को प्रभावित नहीं कर सकती है।

3. मिथक
छोटे बच्चे के दाँतों को ब्रश करना अच्छा नहीं है। कुछ साल बड़े होने के बाद ही दाँत के लिए ब्रश का उपयोग करना चाहिए। उन्हें ऐसे किसी अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता नहीं है।

तथ्य:
आपके बच्चे के मसूड़े थोड़े संवेदनशील और कोमल हो सकते हैं लेकिन मसूड़ों से बाहर निकलने के समय से ही उसके दाँतों को अच्छी देखभाल की आवश्यकता होती है जिससे वह ठीक रह सकते हैं। थोड़ी सी टूथपेस्ट के साथ अपनी उंगलियों का उपयोग करके उसके मसूड़ों की मालिश करने के साथ-साथ उसके दाँतों की सफाई करना भी जरूरी है।

4. मिथक
दाँत निकलने की प्रक्रिया के दौरान दर्द होना अच्छा संकेत नहीं है और यह पहला दाँत निकलने के बाद एक मुर्गे को मारकर देवताओं को बलिदान देने से कम किया जा सकता है।

कुछ धर्मों में ऐसा माना जाता है कि जैसे ही आप बच्चे का पहला दाँत देखते हैं, तब उसके मुँह पर थप्पड़ मारने से उसके दर्द को कम किया जा सकता है। कुछ अन्य लोग दर्द हस्तांतरण करने के लिए गधे को चूमते हुए उसके आसपास घूमते हैं, या एक कच्चा अंडा बच्चे के झूले पर टांगते हैं।

तथ्य:
दर्द के मिथक का परिमार्जन करने के तरीके एक के बाद एक अजीब होने लगते हैं। वे न केवल अतार्किक हैं, बल्कि उनमें से कुछ बच्चे को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं और उसे या परिवार के अन्य सदस्यों को घायल होने के खतरे में डाल सकते हैं और उनको गंभीर हानि पहुँचा सकते हैं। अपने बच्चे की पीड़ा कम करने के लिए दाँत निकलते समय के बिस्कुट और खिलौनों यानि टीथर का उपयोग करना एक बेहतर विकल्प है।

5. मिथक
हमें दाँतों की समस्या होने पर ही डेंटिस्ट (दंत-चिकित्सक) के पास जाने की जरूरत है। आमतौर पर 3 वर्ष से अधिक उम्र के होने तक बच्चों को दंत चिकित्सक की आवश्यकता नहीं होती है। उनका पहला परीक्षण सभी दाँत आने तक या स्थायी दाँत उभरने तक प्रलंबित किया जा सकता है।

तथ्य:
प्रचलित मान्यता के विपरीत, दंत चिकित्सक की भूमिका तभी से शुरू करने की सलाह दी जाती है जब आप अपने बच्चे के मुंह में दाँत निकलता देखना शुरू करते हैं। बच्चे के पहले दाँत का निकलना उसके भविष्य के अच्छे दंत स्वास्थ्य की ओर इशारा करता है और आपके डेंटिस्ट को किसी भी दंत समस्याओं के उभरने की संभावना के बारे में  चौकन्ना कर सकता है।

6. मिथक
लगभग 8 महीने की उम्र के बाद ही बच्चे में दाँत निकलते हैं। यदि बच्चा अपने मुँह में एक या दो दाँत के साथ पैदा होता है, तो यह एक अपवित्र संकेत है और वह स्वयं शैतान का निशान है। वह पिशाच या राक्षस है और उसे बुरा इंसान बनने से रोकने के लिए दाँतों को तुरंत बाहर निकालना चाहिए ।

तथ्य:
यह उपरोक्त सभी मिथकों की तरह हास्यास्पद है…शायद और भी अधिक! बच्चे के गर्भ में होने के दौरान ही उसके दाँत होने के ठोस कारण साबित करना कठिन है, लेकिन कुछ हार्मोनल कारणों से या कुछ उत्तेजक पदार्थों के सेवन जैसे अनेक कारणों से ऐसा होने का अनुमान है। फिर भी, यदि एक दाँत मौजूद है और लगता है कि काफी ढीला लटका हुआ है, तो आपका डॉक्टर बाद में किसी भी जटिलता को रोकने के लिए इसे हटाने का विकल्प चुन सकता है।

7. मिथक
अगर किसी बच्चे को दाँत जल्दी निकलते हैं, तो उसके भाई-बहन होंगे जिनके साथ वह अगले साल खेल सकता है।

तथ्य:
कुछ शिशुओं के दाँत 6 महीने के होने पर ही निकल आते हैं। लेकिन इसका महिला के गर्भवती होने से कोई लेना-देना नहीं है। हर कोई एक महिला के गर्भवती होने की प्रक्रिया से अच्छी तरह से वाकिफ है और शिशु दाँत के निकलने का इससे कोई संबंध नहीं है।

8. मिथक
अगर किसी बच्चे के दाँतों में कैविटी होने लगता है, तो उसे तुरंत भरने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ये दाँत वैसे भी गिरने ही वाले हैं।

तथ्य:
भले ही दाँत बाद में गिरने वाले हैं, लेकिन कैविटी अपने आप में रोग-संचार का कारण बन सकती है और बाद में बच्चे के लिए बहुत तकलीफ देह साबित हो सकती है। उसे भरना आवश्यक है और आप इसमें जितना विलंब करेंगे, दंत चिकित्सक के लिए इसका प्रबंध करना उतना ही कठिन हो सकता है।

9. मिथक
दाँत निकलने के समय हमेशा ही बच्चे को बुखार आता है, जिससे बच्चे को परेशानी हो सकती है और तुरंत दवा लेने की जरूरत होती है।

तथ्य:
निश्चित रूप से, दाँत निकलने के समय कुछ लक्षण होते हैं जैसे कि ठीक से नींद न आना, जलन और शरीर के तापमान में मामूली बढ़ोतरी। लेकिन तापमान में बदलाव मामूली होता है और उसे बुखार नहीं कहा जा सकता है। यदि आपके बच्चे को बुखार है, तो यह संभवतः एक अन्य संक्रमण या बीमारी का संकेत है जिसे डॉक्टर से जांच करवा लेने की आवश्यकता है।

10. मिथक
बच्चे को चबाने के लिए कुछ आरोग्यदायी बीड्स की माला के साथ चिकन या अन्य जानवरों की मांस की हड्डियों का उपयोग करने से दाँत निकलने के समय के दर्द को कम किया जा सकता है और साथ ही दाँतों की रक्षा भी की जा सकती है।

तथ्य:
हालांकि मसूड़ों को एक साथ दबाने से दाँत निकलने के समय के दर्द को कम किया जा सकता है, लेकिन मांस उत्पादों या अन्य हर्बल बीड्स का उपयोग करने से परहेज किया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें मौजूद रसायन और अन्य तत्व बच्चे के लिए घातक हो सकते हैं। इसके बजाय घर पर बने हुए टीथिंग बिस्किट्स का उपयोग करें।

बच्चे के दाँत निकलने के समय के मिथक और कल्पनाएं पढ़ना मनोरंजनात्मक हो सकता है। हालांकि इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहिए और वास्तविक जीवन में समस्या के समाधान के रूप में इसे लागू नहीं किया जाना चाहिए। दाँत निकलना एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और हर बच्चा अपने तरीके से इसका प्रत्युत्तर देता है। हालांकि, यह कई बार एक चुनौती हो सकती है, क्योंकि प्रत्येक दाँत के निकलते समय दर्द और अन्य लक्षण सामने आते हैं। दाँत निकलने के विभिन्न चरणों के बारे में सजग रहें, ताकि आप आने वाले समय में उनमें से हर एक से निपटने के लिए, युक्तियों और तरकीबों से सज्ज हों।


[ Read More ]»

बच्चों के चेहरे पर सफेद पैचेज होने के कारण और उन्हें हटाने के घरेलू टिप्स

Image SEO Friendly

चेहरे पर सफेद पैचेज यानि दाग-धब्बे होना शिशुओं और बच्चों में एक आम समस्या है। हालांकि, इसे लेकर चिंतित होने की कोई बात नहीं है, क्योंकि ऐसे पैचेज होने के कई मामलों में उपचार काफी आसान होता है। बच्चों के चेहरे पर होने वाले सफेद पैचेज को लेकर कई गलत धारणाएं हैं। वास्तव में ऐसा क्यों होता है और इसके लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं, जानिए ।

बच्चे के चेहरे पर सफेद पैचेज होने के सामान्य कारण क्या हैं
१. विटामिन की कमी
बहुत से बच्चों के चेहरे पर सफेद धब्बे पड़ने का यह एक सामान्य कारण है। हम सभी जानते हैं कि एक संतुलित और स्वस्थ आहार हमारे शरीर के लिए कितना आवश्यक है मगर कई बच्चे ठीक से खाना ही नहीं खाते। परिणामस्वरूप बच्चों में कई आवश्यक पोषक तत्वों की कमी हो जाती है और विटामिन की कमी उनमें से एक है।

विटामिन बी 12 शरीर में मेलेनिन का उत्पादन करता है। इस विटामिन की कमी से सफेद धब्बे हो सकते हैं। ये न केवल चेहरे पर, बल्कि शरीर के किसी भी हिस्से में दिख सकते हैं, विशेषतः बांह पर। विटामिन की बहुत ज्यादा कमी होने से खुजली होने लगती है और त्वचा की रंगत और सफेद पड़ जाती है। कुछ मामलों में त्वचा लाल या गुलाबी भी हो सकती है।

डॉक्टर से परामर्श करने के बाद बच्चे को एक स्वस्थ और संतुलित आहार देना इन दागों के इलाज का सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

जिंक और कैल्शियम की कमी से भी यह समस्या हो सकती है।

२. जन्मजात चिन्ह
ऐसे कई मामले देखे गए हैं जहां बच्चे के चेहरे के दाग जन्मजात होते हैं। अगर ऐसा है, तो चिंता करने की जरूरत नहीं है।

३. टीनिया वर्सिकलर
टीनिया वर्सिकलर / पीटीरिऑसिस वर्सीकलर, मैलेसेज़िया के कारण होने वाला एक फंगल संक्रमण है। यह फंगस शरीर में एक ऐसे एसिड का उत्पादन करता है जो मेलेनिन बनने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

ऐसे मामले में दाग का रंग, बच्चे की सामान्य त्वचा के रंग की तुलना में हल्का अथवा गहरा हो सकता है। कई बार इसमें खुजली होती है और पपड़ी भी पड़ जाती है। ये दाग ज्यादातर शरीर के मध्य भाग और कंधों पर दिखाई देते हैं, लेकिन गर्दन, चेहरे और पेट पर भी दिखाई दे सकते हैं।

आर्द्र या गर्म जलवायु में रहने वाले लोग इससे अधिक प्रभावित होते हैं। सूर्य की किरणों के संपर्क में आने से पैच अधिक स्पष्ट हो सकते हैं क्योंकि इन पर टैनिंग से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस स्थिति में सुधार करने के लिए आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपके बच्चे में इम्युनिटी संबंधी समस्याएं न हों और वो संतुलित आहार ले रहा हो।

स्वच्छता की कमी भी इस समस्या का एक कारण है।

४. विटिलिगो
विटिलिगो त्वचा की एक समस्या है जो कई माता-पिता को चिंतित करती है, हालांकि ये दाग हानिरहित होते हैं। त्वचा पर सफेद धब्बे पिग्मेंटेशन के क्षय के कारण पड़ते हैं। विटिलिगो एक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है। इसका मतलब है कि आपका शरीर अपने मेलानोसाइट्स पर हमला कर रहा है। मेलेनिन का निर्माण करने वाली कोशिकाओं को मेलानोसाइट्स कहा जाता है।

आमतौर पर ये दाग शरीर के उन हिस्सों पर देखे जाते हैं जो सूर्य के प्रकाश के संपर्क में आते हैं लेकिन ये शरीर के किसी अन्य हिस्से पर भी हो सकते हैं। यह समस्या अधिकतर सांवले अथवा श्याम रंगत के बच्चों में पाई जाती है, हालांकि यह किसी भी बच्चे को प्रभावित कर सकता है। विटिलीगो संक्रामक नहीं है, इसलिए चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। ये दाग चूंकि काफी विचित्र दिखते हैं इस वजह से लोग इस स्थिति से काफी डर जाते हैं। इस बीमारी के बारे में उचित ज्ञान ना होने कारण इस प्रकार के दाग लोगों में अपराधबोध का कारण बन जाते हैं।

५. चोट अथवा जलने के दाग
कई बार, त्वचा के किसी विशेष भाग पर आघात या चोट लगने के कारण पिग्मेंटेशन में कमी या अभाव हो सकता है।

६. कृमि संक्रमण
यद्यपि यह कारण थोड़ा संदिग्ध है लेकिन कई बार ऐसा कहा जाता है कि पेट में कीड़े होने के कारण सफेद दाग होते हैं। हालांकि यह कारण निश्चित नहीं है, फिर भी आप अपने बच्चे को कभी-कभार कृमिनाशक दवा दे सकते हैं।
  • घरेलू तरीकों से अपने बच्चे के चेहरे के सफेद पैचेज से छुटकारा कैसे पाएं
  • बच्चे के चेहरे पर सफेद दाग के लिए यहाँ कुछ घरेलू उपचार दिए गए हैं।
  • बच्चे के बाहर जाने से पहले उसके चेहरे पर एक व्यापक स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन लगाएं।
  • सुनिश्चित करें कि आपका बच्चा ढेर सारे फल और सब्जियां खा रहा हो।
  • हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि पेट के कीड़े धब्बे का कारण बनते हैं, लेकिन बच्चे को कृमिनाशक दवा खिलाने में कोई नुकसान नहीं है। ऐसा आप हर छह महीने में कर सकते हैं।
  • अधिकतर बाल रोग विशेषज्ञ इत्र और डाई रहित इमोलिएंट्स का उपयोग करने की सलाह देते हैं। इससे त्वचा की शुष्की को रोका जा सकता है जो कभी-कभी पीटीरिऑसिस अल्बा नामक सफेद धब्बों की समस्या का भी कारण बन सकती है।
  • यदि सफेद दाग फंगल संक्रमण के कारण हुए हैं, तो आप संक्रमण को खत्म करने के लिए एंटीफंगल क्रीम का उपयोग कर सकते हैं।
  • पीटीरिऑसिस अल्बा के कारण होने वाले सफेद पैचेज का इलाज कैसे करें
  • जब कारण ज्ञात न हों तो उपचार कठिन हो जाता है। यह सुनिश्चित करें कि आपका बच्चा स्वास्थ्यप्रद फल और सब्जियां खाता हो। आप निम्नलिखित उपाय भी कर सकते हैं:

१. सनस्क्रीन का प्रयोग करें
सुनिश्चित करें कि आपका बच्चा एक ब्रॉड स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन लगाकर ही घर से बाहर निकले। यह सूरज से होने वाली किसी भी प्रकार की क्षति को रोकने में मदद करेगी और आपके बच्चे की सुरक्षा करेगी।

२. गंधरहित एमिलाएंट या मॉइस्चराइजर का उपयोग करें
ये दाग अपने आस पास की त्वचा की तुलना में अधिक संवेदनशील होते हैं इसी वजह से गंधरहित अथवा रसायनरहित मॉइस्चराइजजर का उपयोग करना बेहतर होता है। आपके बच्चे के लिए कौन सा मॉइस्चराइजर सबसे बेहतर रहेगा इसकी जानकारी आपका बाल रोग विशेषज्ञ ही आपको सलाह दे सकता है।

डॉक्टर के पास कब जाएं
उपरोक्त कारणों में से किसी भी कारण से सफेद दाग या धब्बे हो सकते हैं। हालांकि ज्यादातर पैचेज हानिरहित होते हैं, पर कई बार ये खतरनाक भी हो सकते हैं। तो बेहतर होगा कि सही समाधान के लिए एक डॉक्टर से जांच कराएं।

इसके अलावा, अगर आपको पैचेज के साथ निम्न दिए गए लक्षणों में से कोई भी दिखाई दे तो डॉक्टर से सलाह लें।

तेज खुजली
  • दाग के रंग में बदलाव (आमतौर पर लाल होना)
  • प्रभावित क्षेत्र की त्वचा का असंवेदनशील होना
  • सफेद पैचेज से ग्रस्त एक बच्चे की मदद कैसे करें ताकि उसका आत्मविश्वास प्रभावित न हो
  • छोटे बच्चे अपने रूप-रंग की ज्यादा परवाह नहीं करते हैं। लेकिन उम्र के साथ-साथ उनकी आत्म-जागरूकता बढ़ने लगती है। चेहरे पर सफेद दाग-धब्बों की उपस्थिति उनके आत्मविश्वास पर चोट कर सकती है।

यदि आपका बच्चा इस अवस्था से ग्रसित है और उसका इलाज नहीं किया जा सकता, तो माता-पिता को इस स्थिति का सामना करने में बच्चे की मदद करनी होगी।

यहाँ कुछ बातें हैं जिन्हें आपको ध्यान में रखना चाहिए
उनसे बात करके शुरूआत करें और यह सुनिश्चित करें कि वे अपने रूप-रंग को लेकर सहज महसूस करते हैं।
यदि आपको लगता है कि आप उनकी मदद नहीं कर सकते, तो आपको किसी काउंसलर की सहायता लेनी चाहिए।
  • सुनिश्चित करें कि वे आपसे बात करने में सहज है या नहीं । इस तरह, आप ये पता लगा सकते हैं कि कहीं कोई आपके बच्चे को उसके रंग-रूप के कारण तंग तो नहीं कर रहा है।
  • आवश्यकता पड़ने पर आप अपने बच्चे के शिक्षक (टीचर) से इस बारे में बात कर सकते हैं।
  • किसी भी तरह गलतफहमी को दूर करने के लिए उसके दोस्तों को शिक्षित करें।
  • यदि इनमें से कोई भी उपाय काम न करे, तो आप बेशक सौंदर्य प्रसाधनों का उपयोग करके चेहरे के दाग-धब्बों को छुपा सकते हैं।

एक बच्चे के चेहरे पर सफेद दाग लोगों की सोच से अधिक सामान्य होते हैं। विभिन्न कारणों से ऐसा हो सकता है, और उनमें से अधिकांश को ठीक किया जा सकता है।

[ Read More ]»

बच्चों के पेट में कीड़े के कारण, लक्षण व इलाज

Image SEO Friendly

बच्चों के पेट में कीड़े होना एक आम समस्या है । बढ़ते बच्चे में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं अक्सर होती हैं और पेट में कीड़े होना उनमें से एक है। पेट के कीड़े यानि आंतों में पनपने वाले परजीवी होते हैं जिन्हें पिनवर्म, थ्रेडवर्म या सीटवर्म भी कहा जाता है। यद्यपि पेट में उत्पन्न होने वाले कीड़े वयस्कों को भी प्रभावित करते हैं किंतु ये संक्रमण ज्यादातर बच्चों में होता है। इसे घरेलू उपचार की मदद से भी ठीक किया जा सकता है। इस लेख में हमने बच्चों के पेट में होने वाले कीड़ों के कारण व उपचार से संबंधित चर्चा की है, आइए जानते हैं।
पिनवर्म संक्रमण क्या होता है

पिनवर्म, पेट में सफेद रंग के छोटे-छोटे कीड़े होते हैं जिनकी लंबाई 2 मिमी. से लेकर 13 मिमी. तक हो सकती है। ये कीड़े दाँत साफ करने वाले धागे या बहुत पतले और सफेद सूती धागे जैसे दिखते हैं, इसलिए इन कीड़ों को थ्रेडवर्म भी कहा जाता है। ये कीड़े या इसके अंडे अत्यधिक संक्रामक होते हैं और किसी संक्रमित व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आने पर तेजी से फैलते हैं ।

पिनवर्म संक्रमण कैसे फैलता है
यदि आपका बच्चा पिनवर्म से संक्रमित है तो सोते समय बच्चे में मादा कीड़े अधिक सक्रिय होते हैं। ये कीड़े आंतों की प्रणाली में प्रवेश करते हैं और गुदा व मलाशय के आसपास की त्वचा पर चिपक जाते हैं।

पिनवर्म या पेट के कीड़े मानव शरीर के बाहर लगभग 3 सप्ताह तक जीवित रह सकते हैं। इसलिए यदि परिवार में किसी को यह समस्या है तो अन्य लोग भी सरलता से संक्रमित हो सकते हैं। पिनवर्म जैसी समस्या को रोकने के लिए उपचार की अत्यधिक आवश्यकता होती है। हालांकि परिवार में संक्रमित व्यक्ति से अलग रहना संभव नहीं है किंतु फिर भी प्रभावित व्यक्ति के किसी भी सामान का उपयोग और स्पर्श न करने की सलाह दी जाती है। संक्रमित व्यक्ति की देखभाल करने के बाद आप अपने हाथों को अच्छी तरह से एंटीसेप्टिक साबुन से धोना सुनिश्चित करें।

बच्चों में पिनवर्म के कारण
यदि घर में किसी वयस्क को पिनवर्म का संक्रमण है, तो बच्चे भी सरलता से इस संक्रमण से ग्रसित हो सकते हैं। बच्चों में संक्रमण फैलने के निम्नलिखित कारण दिए गए हैं;
  • किसी दूषित वस्तु के सीधे संपर्क में होना।
  • दूषित भोजन को ग्रहण करना।
  • उस चादर व कपड़े का उपयोग, जिसमें पिनवर्म चिपके हो सकते हैं। यह संक्रमण कीड़ों का हवा के संपर्क में आने से होता है।
  • विशेष रूप से गुदा क्षेत्र के आसपास खुजली हो सकती है और आपका बच्चा अपने नाखूनों के माध्यम से पिनवर्म के अंडों को ग्रहण कर सकता है।

बच्चों में पिनवर्म के लक्षण
  • यदि आपको शंका है कि आपका बच्चा संक्रमित है तो निम्नलिखित संकेतों पर ध्यान दें;
  • गुदा क्षेत्र के चारों ओर खुजली के कारण नींद खराब होना और घबराहट होना।
  • अत्यधिक खुजली के कारण गुदा क्षेत्र के आसपास की त्वचा में बैक्टीरियल इन्फेक्शन होना जो पिनवर्म की संभावना को बढ़ाता है।
  • लड़कियों में पिनवर्म योनि के क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है जिससे योनि में खुजली या योनि से स्राव होता है।
  • कई मामलों में आंतों में अत्यधिक संक्रमण होने के कारण उबकाई और उल्टी हो सकती है।
  • पिनवर्म द्वारा अपेंडिक्स को अवरुद्ध करने के कारण अपेंडिसाइटिस की संभावना भी हो सकती है।

यदि आपको कोई अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देते हैं, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श करें।

पिनवर्म का निदान कैसे किया जाता है
यदि आपको संदेह है कि आपके बच्चे के पेट में कीड़े हो सकते हैं तो यहाँ कुछ उपाय बताए गए हैं जिनसे आप अपने बच्चे का निरीक्षण कर सकती हैं:
  • टॉर्च से बच्चे के गुदा क्षेत्र के चारों ओर जांच करें। चूंकि कीड़े रात के समय में अंडे देते हैं इसलिए सुबह के समय पर जांच करना अधिक उपयुक्त हो सकता है।
  • बच्चे के मल की सतह या योनि के अग्रभाग की जांच करना मददगार साबित हो सकता है।
  • ट्रांस्परेंट टेप को बच्चे के गुदा में हल्का सा लगाकर देखें कि क्या आपका बच्चा संक्रमित है। चूंकि पिनवर्म आमतौर पर गुदा के आसपास ही अंडे देते हैं इसलिए इन कीड़ों की पहचान करना आसान होता है।

बच्चों में पिनवर्म का उपचार
यदि आपका बच्चा पिनवर्म के संक्रमण से ग्रसित है तो उसकी नींद टूटने व खुजली के लक्षणों पर अधिक ध्यान दें। गंभीर संक्रमण अत्यधिक गंभीर समस्याएं उत्पन्न कर सकता है इसलिए इसे नियंत्रण में रखना मुख्य प्राथमिकता है।

डॉक्टर आपके बच्चे और परिवार को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित प्रक्रियाओं का सुझाव दे सकते हैं, वे इस प्रकार हैं;

  • दवाइयां: पेट के कीड़ों को खत्म करने के लिए मेबेंडाजोल, पाइरेंटेल या एल्बेंडाजोल दवाओं का सेवन आम है। हालांकि, उपयुक्त खुराक के लिए अपने बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श करें।
  • पुनरावृत्ति: चूंकि दवा एक सप्ताह में इन कीड़ों को नष्ट कर देती है, इसलिए दो सप्ताह बाद पिनवर्म द्वारा पहले दिए हुए अंडों से निकले कीड़ों को नष्ट करने के लिए बच्चे को फिर से दवाई दें ।


बच्चों में पिनवर्म के उपचार के लिए सुझाव
बच्चों में पेट के कीड़ों को नष्ट करने के लिए एलोपैथी इलाज की सलाह नहीं दी जाती है। कुछ अन्य सुझाव भी नीचे बताए गए हैं जिनका उपयोग आप कर सकती हैं;
  • डॉक्टर द्वारा दिए हुए चिकित्सा उपचार के निर्देशों का पालन करें।
  • रातभर गुदा की त्वचा में चिपके अंडे व कीड़ों को हटाने के लिए बच्चे को रोज सुबह स्नान करवाएं।
  • डायपर बदलने के दौरान, सुनिश्चित करें कि आप हर बार अपने बच्चे को पोंछ कर साफ करें।
  • दोबारा संक्रमण होने से रोकने के लिए, अपने आसपास सफाई रखें। घर की सफाई और गर्म पानी में सभी कपड़ों, चादरों और तौलियों को धोने से पिनवर्म व इनके अंडों को नष्ट किया जा सकता है।
  • बच्चे के खिलौनों को साबुन और गर्म पानी से साफ करें।
  • चूंकि पिनवर्म और उनके अंडे, सूरज की रोशनी के प्रति संवेदनशील होते हैं, इसलिए सुनिश्चित करें कि आपके सभी पर्दे और खिड़कियां खुली हैं व पर्याप्त धूप घर के अंदर आती है।

बच्चों में पिनवर्म के लिए घरेलू उपाय
यदि आपका बच्चा पिनवर्म से ग्रसित है तो निम्नलिखित घरेलू उपचार इस संक्रमण को नष्ट करने में आपकी मदद कर सकते हैं। इनका उपयोग करने से पहले सुनिश्चित करें कि आपके बच्चे को इस संक्रमण से एलर्जी न हो।
  • लहसुन: लहसुन, आपके बच्चे के आंत्र पथ में पिनवर्म को नष्ट करने में सक्षम है।
  • चकोतरे (ग्रेपफ्रूट) के बीज का अर्क: यह अर्क मल को नियंत्रित करने के लिए जाना जाता है, जो बच्चे के शरीर से पिनवर्म को ठीक से बाहर निकालने में सहायता करता है।
  • नारियल तेल: नारियल तेल में एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण होते हैं, जो आपके बच्चे में पिनवर्म के संक्रमण को नष्ट करने में मदद करते हैं।

पिनवर्म संक्रमण का फॉलो अप
पिनवर्म संक्रमण दोबारा हो सकता है, इसे नष्ट करने के लिए आप घरेलू उपाय भी अपना सकती हैं। तथापि यह भी सलाह दी जाती है कि बच्चे को पूरी तरह से स्वच्छ व साफ रखें और जांच के लिए डॉक्टर के पास ले जाएं।
यदि बच्चे में पिनवर्म का इलाज नहीं किया जाता है तो क्या होगा
  • चूंकि विशेषकर बच्चों के पेट में कीड़े होना एक गंभीर संक्रमण है, इसका तुरंत इलाज किया जाना चाहिए। यदि आप समय पर अपने बच्चे का इलाज नहीं करती हैं तो;
  • बच्चे के गुदा क्षेत्र के आसपास खुजली और चकत्ते हो सकते हैं।
  • आपकी बेटी की योनि में खुजली और स्राव हो सकता है।
  • बच्चे  को दस्त होने की संभावना होती है।
  • बच्चा बार-बार बिस्तर गीला करता है।

बच्चों में पिनवर्म को कैसे रोकें
बच्चों में पिनवर्म को रोकने के लिए अत्यधिक स्वच्छता की आवश्यकता है। इस स्थिति में अपने बच्चे के नाखूनों को छोटा व साफ रखें।
  • यदि आप अपने बच्चे को सुबह स्नान करवाती हैं तो रात में पिनवर्म द्वारा दिए हुए अंडों से निजात मिल सकती है।
  • बच्चे के डायपर और अंतर्वस्त्र की जांच करती रहें। नियमित अंतराल पर बच्चे का डायपर बदलें और प्रतिदिन अंतर्वस्त्रों का बदलना भी आवश्यक है।
  • अपने बच्चे के कमरे में और घर के आस-पास धूप आने दें, सूर्य की किरणें पिनवर्म को खत्म करने में मदद करती हैं।
  • प्रयास करें कि आपका बच्चा नाखून न चबाए व उंगलियां न चूसे।
  • अपने हाथों को साफ रखें क्योंकि पिनवर्म एक फैलने वाला संक्रमण है इसलिए हाथों को हमेशा साफ पानी से धोती रहें।
  • सुनिश्चित करें कि आपके बच्चे के हाथ खाने से पहले और टॉयलेट का उपयोग करने के बाद धोए जाएं ।
  • स्वास्थ्य लाभ की अवधि के दौरान, आप सभी कपड़ों, चादरों और तौलियों को गर्म पानी में धोना सुनिश्चित करें।
  • पिनवर्म संक्रमण को और फैलने से बचाने के लिए शौचालय को प्रतिदिन साफ करें।
  • सुनिश्चित करें कि आपका बच्चा किसी अन्य बच्चे के साथ बातचीत करने से पहले संक्रमण मुक्त हो और साथ ही अन्य बच्चों का संक्रमण-मुक्त होना भी अनिवार्य है।

बच्चे को कई संक्रमण हो सकते हैं और पिनवर्म आपके बच्चे में अत्यधिक समस्याएं उत्पन्न कर सकता है। सभी सावधानियों को ध्यान में रखते हुए इस समस्या का जल्द से जल्द इलाज करवाना आवश्यक है और याद रखें रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर होती है!

[ Read More ]»

शिशुओं के फटे होंठ के कारण, संकेत और इलाज

Image SEO Friendly

जब मौसम बदलने लगता है, तो इसके साथ वातावरण के तापमान और नमी में परिवर्तन आने लगता है। परिणाम स्वरुप आपके शिशु की त्वचा और होठों में शुष्की आ सकती है, जो आगे चलकर फटे या कड़क होंठों की समस्या में बदल सकती है। चूंकि शिशुओं की त्वचा दूध से नमी प्राप्त करती है, इसलिए उनकी त्वचा वयस्कों की तुलना में अधिक रूखी होती है और मौसम में बदलाव के कारण आसानी से प्रभावित हो सकती है।

शिशु के फटे होंठों के कारण क्या आपको चिंता करनी चाहिए?
छोटे बच्चों के लिए, विशेष रूप से जो नवजात शिशु हैं, उनके शुष्क होंठों के प्रति अधिक खयाल रखने की आवश्यकता है। शिशु के होंठ फट सकते हैं, उनमें दरारें पड़ सकती हैं और साथ ही उसके होंठों पर घाव भी हो सकता है।

कई बार, बच्चों में होंठों को लगातार चूसते रहने की आदत के कारण होंठ फट जाते हैं। हालांकि, फटे व सूखे होंठ निश्चित रूप से आपके बच्चे में डिहाइड्रेशन होने की स्थिति का एक प्रबल संकेत है। मौसम में बदलाव और हवा का संपर्क अक्सर रूखे होठों का कारण बन सकता है, लेकिन अगर आपका बच्चा नाक के बजाय अपने मुँह से ज्यादा सांस लेता है, तो इससे भी होंठ फट सकते हैं।

शिशुओं में होंठ फटने के क्या कारण हैं?
शिशु के रूखे होंठों के लिए व्यक्तिगत आदतों से लेकर वातावरण की स्थितियों तक अनेक कारण हो सकते हैं।

1. डिहाइड्रेशन
डिहाइड्रेशन का कारण दोतरफा है। पहला, यदि मौसम रूखा है तो वह शिशु की त्वचा से नमी कम करके उसे रूखा बना देता है, और दूसरा कि बच्चा ऐसे मौसम में है कि निरंतर रूप से उसे पसीना आ रहा हो और शरीर से नमी कम हो रही हो। इसके साथ ही यदि शिशु आवश्यकतानुसार दूध नहीं पी रहा है तो उसके शरीर में पानी की मात्रा कम हो जाती है जिसके कारण भी होंठ सूखे पड़ सकते हैं।

2. पोषण में कमी
बच्चे के शरीर में पोषण की कमी फटे होंठों का एक और कारण है। यदि नवजात शिशु में पोषण और विटामिन की अत्यधिक कमी होती है तो उसके होंठ भी नम और स्वस्थ नहीं होंगे। जिन बच्चों में रोग-प्रतिरोधक शक्ति कम होती है उनमें यह समस्या अधिक बढ़ जाती है।

3. एलर्जी की प्रतिक्रिया
बच्चों में एलर्जी होने की संभावना अनेक रूपों में होती है किन्तु कुछ प्रकार की एलर्जी ऐसी भी होती है जो विशेष कपड़े पहनने के कारण हो सकती है। संवेदनशील त्वचा किसी भी लोशन, क्रीम या यहाँ तक कि जो कपड़े आप अपने बच्चे को पहनाते हैं उन पर भी प्रतिक्रिया कर सकती है। यदि एक माँ किसी विशेष चैपस्टिक का उपयोग करती है और बच्चे को प्यार से चूमती है तो उसके स्पर्श से भी बच्चे को एलर्जी की संभावना हो सकती है।

4. मुँह से सांस लेने की प्रवृत्ति
मुँह से सांस लेने के कारण हवा का आदान-प्रदान होता है और वह आपके बच्चे के होंठों के चारों तरफ ही रहती है। हवा उसके मार्ग में आने वाली हर चीज से नमी को सोख लेती है। बच्चे में जुकाम या नाक बंद की समस्या के परिणामस्वरुप उसे मुँह से सांस लेनी पड़ती है किन्तु यह प्रक्रिया बच्चे के होंठों को रूखा बना देती है जो आगे चलकर उसके लिए अत्यधिक असुविधाजनक होते हैं।

5. मौसम में उतार-चढ़ाव
बच्चों को सुरक्षित और नियंत्रित वातावरण में रहने की आवश्यकता होती है, विशेषकर नवजात शिशुओं को। उनकी त्वचा बदलते मौसम का सामना करने में अक्षम होती है। अत्यधिक गर्मी या रूखी सर्दी या तेज हवा आपके बच्चे के शरीर से नमी को पूरी तरह से सोख लेती है जिस कारण से उसके होंठ फटने लगते हैं।

6. होंठों को चूसना या जीभ लगाना
शुरूआती हफ्तों में शिशुओं को कुछ न कुछ चूसने या मुँह में डालने की आदत होती है और इस तरह से वे अक्सर अपनी जीभ को बाहर निकालते हैं और अपने होंठों को चूसने का प्रयास करते हैं। मुँह में मौजूद सलाइवा बच्चे के होंठों पर आ जाता है और बाहरी वातावरण में वही सलाइवा सूख जाता है और होंठों को कड़क और रुखा बनाता है। बार-बार यह प्रक्रिया होने के कारण बच्चे के होंठों पर दरारें पड़ जाती हैं और वे फटने लगते हैं।

क्या शिशु के होंठ स्तनपान के कारण फटते हैं?
एक नवजात शिशु अपना ज्यादातर समय स्तनपान करते हुए बिताता है, जिस कारण से ऐसा लग सकता है कि स्तनपान की वजह से बच्चों के होंठ अत्यधिक फटते हैं। किन्तु स्तनपान के कारण बच्चों में होंठ फटने की समस्या नहीं होती है। माँ का दूध बच्चे के फटे होंठों को ठीक करने में मदद करता है। यदि बच्चा पूरे दिन में माँ का पर्याप्त दूध पीता है तो बच्चे के होंठ फटने की संभावना कम हो जाती है।

शिशु के होंठ फटने के संकेत क्या हैं?
नवजात शिशु के फटे हुए होंठ जिन लक्षणों से स्पष्ट होते हैं, वे इस प्रकार हैं:
  •     आपके स्वयं के रूखे होठों की तुलना में अधिक रूखापन।
  •     होंठ की सतह पर दिखने वाली दरारें जो गहराई तक जा सकती हैं।
  •     होंठों के आस-पास की त्वचा का रंग गहरा होने लगता है।
  •     होंठों में घाव होता है और उनमें हल्का लालपन होता है।
  •     दरारें गहरी होती हैं और कई बार खून रिसने लगता है।

आप शिशु के फटे हुए होंठों का इलाज कैसे कर सकते हैं?
शिशु के रूखे होंठों का उपचार करने के लिए अनेक तरीके हैं जो तेजी से राहत देने में मदद करते हैं और किसी भी असुविधा को कम कर सकते हैं।

1. शिशु के लिए लिप बाम
हमें बड़ों के लिए उपयोग किए जाने वाले बाम या क्रीम का उपयोग कभी भी शिशु के होंठों पर नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से नवजात शिशुओं के लिए बनाए गए विशिष्ट लिप बाम बाजार में उपलब्ध हैं। यह प्राकृतिक घटकों का उपयोग करके बनाए जाते हैं और शिशु की नाजुक त्वचा के लिए सौम्य होते हैं। बेहतर है कि अपने शिशु के होठों पर इसका उपयोग करने से पहले डॉक्टर से सलाह कर लें।

2. पेट्रोलियम जेली
लैनोलिन से निर्मित, यह आपके शिशु के होंठों के लिए एक प्रभावी मॉइस्चराइजर का काम करता है, जिससे होंठों पर पड़ी दरारें तेजी से ठीक होने लगती हैं। लैनोलिन के कारण यह जेली एक सौम्य उपचारक है और साथ ही पूरी तरह से सुरक्षित है, भले ही आपका शिशु अपने होंठों पर लगी जेली को चाट ही क्यों न ले।

इसका उपयोग करने के लिए अपने हाथ में थोड़ी सी जेली लेकर बच्चे के होठों पर लगाएं। पेट्रोलियम जेली का उपयोग रात में विशेषकर शिशु के सोते समय करें ताकि यह होठों पर अधिक समय तक रहे और प्रभावी रूप से राहत दे सके।

3. नारियल का तेल
नारियल का तेल एक सदियों पुराना उपाय है। घर पर आसानी से उपलब्ध होने के कारण कई परिवारों में इसका उपयोग किया जाता है। नारियल के तेल का मुख्य घटक लॉरिक एसिड होता है, जो मुख्य रूप से इलाज के लिए जाना जाता है और बच्चे पर इसका कोई दुष्प्रभाव भी नहीं होता। शिशु के होंठ सूखने या रूखे होने पर अपने हाथ में थोड़ा सा तेल लें और उसके होंठों पर लगा दें, किन्तु उससे पहले अपने हाथ साफ करना न भूलें।

4. निप्पल क्रीम
यह क्रीम दो चीजों को ध्यान में रखते हुए बनाई जाती है। पहली, निप्पल को रोग-मुक्त व सौम्य करने के लिए और दूसरी, दूध पीते समय शिशु के मुंह में क्रीम भी जा सकती है। इसलिए, यह क्रीम आपके शिशु के लिए पूरी तरह से सुरक्षित है और यह क्रीम शिशु के होठों पर लगाने से भी समान परिणाम मिलते हैं। तथापि इसका उपयोग करने से पहले एक बार डॉक्टर से परामर्श जरूर करें।

5. माँ का दूध
यह बच्चे के फटे होंठों को ठीक करने का सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक तरीका है। अपने शिशु के होंठों पर दूध लगाने के लिए निप्पल को धीरे से बच्चे के होठों पर रखकर दूध निकालें या अपनी उंगली से उसके होठों पर थोड़ा सा दूध लगाएं, खयाल रहे दूध को बच्चे के होठों पर रगड़ें नहीं। माँ का दूध बच्चे के होंठों को हाइड्रेट करता है और उसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व उसके फटे होठों को मुलायम रखते हैं।

क्या कारण है कि आपका शिशु हमेशा फटे होंठों से ग्रस्त रहता है?
यदि शिशु के होंठ हमेशा फटे रहते हैं, तो यह पोषण संबंधी कमी या विटामिन ‘ए’ की अतिरिक्त खुराक का संकेत हो सकता है। ऐसे दुर्लभ उदाहरण हैं जहाँ बच्चे ‘कावासाकी’ रोग से पीड़ित होते हैं, जो 6 माह से 2 साल तक के बच्चों को होता है। हालांकि उसमें रूखे होंठों के साथ-साथ बुखार और लाल आँखें सहित कई अन्य लक्षण भी दिखाई देते हैं। यदि ये लक्षण लंबे समय तक नजर आते हैं, तो बच्चे की जांच करवाएं।

शिशु के होंठ फटने से कैसे रोकें?
शिशु के होंठों को फटने से रोकने के लिए सबसे बेहतरीन तरीका है उसके होंठों को सूखने न दें। अपने घर के अंदर का तापमान अनुकूल बनाए रखें और आवश्यकतानुसार ह्यूमिडिफायर का उपयोग करें। बच्चे को सही कपड़ों से ढककर रखें और यहाँ तक कि घर के अंदर भी उसे तेज धूप या तेज हवा से बचाकर रखें।

बड़ों के लिए फटे हुए होंठ एक सामान्य समस्या होती है किन्तु बच्चों की संवेदनशील त्वचा और मुँह से दूध पीने की निर्भरता इस समस्या को उनके लिए दर्दनाक और असुविधाजनक बना देती है। शुरूआती समय पर संकेत दिखते ही इसका सही उपचार करने से आपके बच्चे को होंठ फटने की समस्या से सुरक्षित रखा जा सकता है।

[ Read More ]»

बच्चे का सिर मुंडवाने की सही उम्र क्या है?

Image SEO Friendly

बहुत से लोगों का मानना है कि सिर मुंडवाने से बच्चे के बाल घने होते हैं। यदि आपके शिशु के महीन या कम बाल हैं, तो हो सकता है आप भी इस विश्वास के चलते उसका सिर मुंडवाना चाहे, ताकि नए बाल मोटे और घने आएं। आप में से कुछ, बच्चे के बालों के अच्छे विकास के लिए उसके सिर मुंडवाते हैं, जबकि, कुछ लोग पारंपरिक मूल्यों के आधार पर भी बच्चों का मुंडन कराते हैं। लेकिन क्या शिशु का मुंडन कराना, वास्तव में बालों के विकास को बढ़ावा देता है या यह सिर्फ एक मिथक है? तो हमारा सुझाव है कि आप इस विषय पर और अधिक जानने के लिए निम्नलिखित लेख पढ़े।

बच्चे का सिर मुंडवाने की सही उम्र क्या है?
यदि आप बच्चे के सिर से बाल हटाने की सोच रहीं हैं, तो आपको यह सलाह दी जाती है कि आप कम से कम तब तक प्रतीक्षा करें, जब तक कि उसका सिर कठोर और मज़बूत न हो जाए। शुरुआत के कुछ महीनों में शिशुओं का सिर स्थिर नहीं होता है और वह लगातार हिलते-डुलते रहते हैं, जिसके कारण मुंडन करना न केवल मुश्किल हो जाता है, बल्कि इससे उन्हें चोट लगने का भी खतरा रहता है । कुछ संस्कृतियों में, ‘मुंडन’ बच्चे के पैदा होने के बाद उसके सातवें महीने में ही करवा दिया जाता है, जबकि कुछ अन्य में, मुंडन बच्चे के जन्म के बाद उसके पहले, दूसरे और यहाँ तक कि चौथे वर्ष तक कराते है।

क्या मुंडन करवाने से बच्चे के बाल घने होते हैं?
अगर आपको लगता है कि इससे बालों का बेहतर विकास होता है, तो एक बार फिर सोचें। कई विशेषज्ञों का कहना है कि मुंडन से बालों के विकास पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह आपको एक वैज्ञानिक तथ्य के माध्यम से ज्यादा बेहतर तरीके से समझाया जा सकता है। तथ्य कहते हैं कि बाल, बालों के रोमों से निकलते हैं, जो त्वचा के नीचे मौजूद होते हैं।जब आप बच्चे के बाल हटाते हैं, तो यह उनके रोमछिद्रों को प्रभावित नहीं करता है। यदि यह रोमछिद्रों को प्रभावित नहीं करता तो इससे बालों के विकास पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा । वास्तव में, आपके बच्चे के बाल चार महीने की उम्र के बाद बेहतर रूप बढ़ते हैं। इसके अलावा, आपके बच्चे के बालों की बनावट और घनत्व प्रमुख रूप से जीन (वंशाणु) पर निर्भर करता है, जिसका अर्थ है कि यदि आपके बाल चिकने और चमकदार हैं, तो इस बात की बहुत संभावना है कि बड़े होने के बाद आपके बच्चे के बाल भी वैसे ही होंगे।

बच्चे के मुंडन की भारतीय परंपरा
बहुत से देशों में बच्चे के सिर मुंडवाने की परंपरा का पालन किया जाता है। विभिन्न संस्कृतियों और नस्लों के लोग बच्चे के जन्म के कुछ वर्षों के भीतर उसका मुंडन करवाते हैं। यह भारतीय परंपरा और संस्कृति में भी बहुत अधिक प्रचलित है।यहाँ बच्चे का मुंडन करना धार्मिक रूप से शुभ माना जाता है। कई संस्कृतियों में, मुंडन सुंदरता का संकेत माना जाता है और यह स्वस्थ और मजबूत बालों के विकास में मदद करता है। जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, कि कोई वैज्ञानिक प्रमाण या सबूत नहीं है, जो यह बताता है कि मुंडन कराने से बालों की बेहतर वृद्धि हो सकती है। हालांकि, मुंडन के बाद बाल एक जैसे बढ़ सकते हैं, जो बालों को एक समान और स्वस्थ रूप प्रदान करता है।

बच्चे का सिर आसानी से मुंडवाने के लिए कुछ युक्तियां
यदि आप अपने बच्चे का सिर मुंडवाने की योजना बना रहे हैं, तो हमारा सुझाव है कि ऐसा करने के लिए एक पेशेवर और अनुभवी नाई को ही बुलाएं, जो मुंडन के बारे में बेहतर रूप जानते हैं । हालांकि आपकी आसानी के लिए, यहाँ कुछ सुझाव दिए गए हैं जो आपके बच्चे के सिर के बाल बिना किसी परेशानी के मुंडवाने में मदद करेंगे:
  • सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात बच्चे की मनोदशा को देखना जरूरी है। जब आप बच्चे के मुंडन कराने के लिए विचार कर रहीं हो, तो उस समय आपका शिशु शांत और खुश होना चाहिए। दिन के समय मुंडन कराना बेहतर होगा, क्योंकि दिन में बच्चे कम चिड़चिड़े होते हैं।
  • अगला आपके बच्चे की सुविधा से संबंधित है। यदि आपका शिशु बहुत छोटा है और बैठने में असमर्थ है, तो सुनिश्चित करें कि आप उसे अपनी गोद में आराम से लिटा लें। यदि वह बैठने के लिए पर्याप्त बड़ा है, तो ख्याल रखें कि वह एक आरामदायक जगह पर बैठा हो।
  • ध्यान भटकाने के लिए बच्चे के पसंदीदा खिलौने और अन्य चीज़ो को उनके पास में रखें। वह शांत रहें इसलिए आप उनके लिए गाना गाएं या फिर उनसे बातें करती रहें ।
  • यदि आपके बच्चे के बाल बहुत लंबे हैं, तो बालों को काटकर छोटा कर लें और फिर मुंडन करवाएं तो ज्यादा बेहतर रहेगा ।
  • पहले एक तरफ के बाल हटाने से शुरु करें और जैसे – जैसे एक भाग पूरा हो जाए, दूसरी ओर आगे बढ़ें।
  • बच्चे के सिर पर सौम्य शैम्पू लगाएं क्योंकि इससे बाल आसानी से और तेज़ी से कट सकेंगे।
  • यदि आप बच्चे के बाल उस्तरे से कटवा रहीं हैं, तो आपको अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ सकती है, क्योंकि इससे बच्चे के सिर कट जाने या खरोंच लगने का खतरा रहता है। यदि आप बच्चे के बाल हटाने के लिए ट्रिमर का प्रयोग करती हैं, तो यह बेहतर विकल्प होगा, क्योंकि इसमें बच्चे के सिर कटने का जोखिम कम होता है।
  • जब बच्चे के सिर के बाल हटाए जा रहे हों, तो चेहरे पर गिरने वाले बालों को साफ करती रहें, क्योंकि इससे उन्हें जलन या खुजली हो सकती है।
  • मुंडन पूरा हो जाने के बाद, आपको बच्चे को हलके गर्म पानी से नहला देना चाहिए ताकि शरीर पर लगे बाल अच्छी तरह से निकल जाएं।

मुंडन के बाद बच्चे के सिर पर क्या लगाएं
बच्चे को गुनगुने पानी से नहलाने के बाद, उसके सिर पर आप कोई भी अच्छा कीटाणुनाशक लगा सकती हैं। कीटाणुनाशक मुंडन की प्रक्रिया के दौरान लगने वाली किसी भी खरोंच या चोट को ठीक करने में मदद करता है। उसके बाद, खुजली और रूखेपन से बचाव के लिए आप किसी भी अच्छे तेल या मॉइस्चराइजर से बच्चे के सिर को नमी प्रदान कर सकती हैं ।

अगर बच्चे की ‘क्रैडल कैप’ है तो क्या आपको उसके सिर के बाल काटने चाहिए?
‘क्रैडल कैप’ सूखी और मृत त्वचा होती है, जो बच्चे की सिर पर मौजूद हो सकती है। कुछ माता-पिता सोचते हैं कि सिर के बाल हटाने से इससे छुटकारा मिल सकता है। हालांकि, ऐसा हमेशा नहीं होता। ‘क्रैडल कैप’ ठीक करने के लिए आप मुंडन की बजाय प्राकृतिक तेलों और औषधि युक्त शैंपू का प्रयोग और अन्य निवारक उपाय कर सकती हैं।

अपने बच्चे का मुंडन अपने अनुसार ही कराए, न की इसलिए, क्योंकि सब मुंडन कराने के लिए बोल रहे हैं। ध्यान रखें कि यदि आप बच्चे के मुंडन की योजना बना रहीं हैं, तो उसे भी इसके लिए तैयार रहना चाहिए। साथ ही, अच्छा होगा, अगर आप पहले बच्चे के डॉक्टर से परामर्श करें और फिर जानकारी के आधार पर मुंडन कराने का निर्णय लें।

[ Read More ]»
”go"