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भारत के मिटटी के प्रकार



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मृदा अथवा मिट्टी पृथ्वी की सबसे उपरी परत होती है। मिट्टी का निर्माण टूटी चट्टानो के छोटे महीन कणों, खनिज, जैविक पदार्थो, बॅक्टीरिया आदि के मिश्रण से होता है। मिट्टी के कई परतें होती हैं, सबसे उपरी परत में छोटे मिट्टी के कण, गले हुए पौधे और जीवों के अवशेष होते हैं यह परत फसलों की पैदावार के लिए महत्त्‍वपूर्ण होती है। दूसरी परत महीन कणों जैसे चिकनी मिट्टी की होती है और नीचे की विखंडित चट्टानो और मिट्टी का मिश्रण होती है तथा आख़िरी परत में अ-विखंडित सख्‍त चट्टानें होती हैं। देश के सभी भागों में मिट्टी की गहराई आसमान रूप से पाई जाती है यह कुछ सेमी. से लेकर 30 मी. तक गहरी हो सकती है।

हर मिट्टी की अपनी विशेषता होती है। अपनी विशिष्ट  भौतिक, रासायनिक और जैविक विशेषताओं के माध्‍यम से विभिन्‍न प्रकार की फसलों को लाभ प्रदान करती है जलोढ मिट्टी उपजाऊ मिट्टी है जो पोटेशियम से भरपूर है और यह कृषि विशेष कर धान, गन्‍ना और केले की फसल के लिए बहुत उपयुक्‍त है। लाल मिट्टी में लौह मात्रा अधिक होती है और यह  चना, मूंगफली और अरण्‍डी के बीज की फसल के लिए उपयुक्‍त है। काली मिट्टी में कैल्शियम, पौटेशियम और मैग्निशियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है लेकिन इसमें नाइट्रोजन की मात्रा कम होती है। कपास, तम्‍बाकू, मिर्च तिलहन, ज्‍वार, रागी और मक्‍के जैसी फसलें इसमें अच्‍छी उगती हैं। रेतीली मिट्टी में पोषक तत्त्‍व कम होते हैं लेकिन यह अधिक वर्षा क्षेत्रों में नारियल, काजू और कैजुरिना के पेड़ों के विकास में उपयोगी है।

भारत में मिट्टी के प्रकार

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (Indian Council of Agricultural Research-I.C.A.R.) ने भारतीय मिट्टी को 8 भागों में बांटा है-
  1. लाल मिट्टी Red Soil
  2. काली मिट्टी Black Soil
  3. लैटेराइट मिट्टी Laterite Soil
  4. क्षारयुक्त मिट्टी Saline and Alkaline Soil
  5. हल्की काली एवं दलदली मिट्टी Peaty and Other Organic soil
  6. रेतीली मिट्टी Arid and Desert Soil
  7. कांप मिट्टी Alluvial Soil
  8. वनों वाली मिट्टी Forest Soil

लाल मिट्टी (Red Soil)

यह मिट्टी अपक्षय के प्रभाव से चट्टानों के टूट-फुट से बनती है| आयरन ऑक्साइड की अधिकता के कारण इस मिट्टी का रंग लाल दिखता है| यह मिट्टी प्रमुख रूप से मध्य-प्रदेश, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, छोटा नागपुर के पठार, आंध्र प्रदेश के दण्डकारण्य क्षेत्र, पश्चिम बंगाल और मेघालय में पाई जाती है| पठार तथा पहाड़ियों पर इन मिट्टियों की उर्वराशक्ति कम होती है और ये कंकरीली तथा रूखडी होती हैं, किंतु नीचे स्थानों में अथवा नदियों की घाटियों में ये दोरस हो जाती हैं और अधिक उपजाऊ हो जाती  है और इनमें निक्षालन (Leaching) भी अधिक हुआ है। तटीय मैदानों और काली मिट्टी के क्षेत्र को छोड़कर, प्रायद्वीपीय पठार के अधिकांश भाग में लाल मिट्टी पाई जाती है। इस मिट्टी में मोटे अनाज पैदा होते है जैसे गेंहू, धान, अलसी आदि।

कांप मिट्टी (Alluvial Soil)

उत्तर के विस्तृत मैदान तथा प्रायद्वीपीय भारत के तटीय मैदानों में मिलती है। यह अत्यंत ऊपजाऊ है इसे जलोढ़ या कछारीय मिट्टी भी कहा जाता है यह भारत के लगभग 40% भाग में पाई जाती है| यह मिट्टी सतलज, गंगा, यमुना, घाघरा,गंडक, ब्रह्मपुत्र और इनकी सहायक नदियों द्वारा लाई जाती है| इस मिट्टी में कंकड़ नही पाए जाते हैं। इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस और वनस्पति अंशों की कमी पाई जाती है| खादर में ये तत्व भांभर की तुलना में अधिक मात्रा में वर्तमान हैं, इसलिए खादर अधिक उपजाऊ है। भांभर में कम वर्षा के क्षेत्रों में, कहीं कहीं खारी मिट्टी ऊसर अथवा बंजर होती है। भांभर और तराई क्षेत्रों में पुरातन जलोढ़, डेल्टाई भागों नवीनतम जलोढ़, मध्य घाटी में नवीन जलोढ़ मिट्टी पाई जाती है। पुरातन जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र को भांभर और नवीन जलोढ़ मिट्टी के क्षेत्र  को खादर  कहा जाता है।

पूर्वी तटीय मैदानों में यह मिट्टी कृष्णा, गोदावरी, कावेरी और महानदी के डेल्टा में प्रमुख रूप से पाई जाती है| इस मिट्टी की प्रमुख फसलें खरीफ और रबी जैसे- दालें, कपास, तिलहन, गन्ना और गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी में जूट प्रमुख से उगाया जाता है।

काली मिट्टी (Black Soil)
यह मिट्टी ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा से बनती है| भारत में यह लगभग 5 लाख वर्ग-किमी. में फैली है| महाराष्ट्र में इस मिट्टी का सबसे अधिक विस्तार है। इसे दक्कन ट्रॅप से बनी मिट्टी भी कहते हैं। इस मिट्टी में चुना, पोटॅश, मैग्निशियम, एल्यूमिना और लोहा पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इसका विस्तार लावा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि नदियों ने इसे ले जाकर अपनी घाटियों में भी जमा किया है। यह बहुत ही उपजाऊ है और कपास की उपज के लिए प्रसिद्ध है इसलिए इसे कपासवाली काली मिट्टी कहते हैं। इस मिट्टी में नमी को रोक रखने की प्रचुर शक्ति है, इसलिए वर्षा कम होने पर भी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। इसका काला रंग शायद अत्यंत महीन लौह अंशों की उपस्थिति के कारण है।

इसकी मिट्टी की मुख्य फसल कपास है। इस मिट्टी में गन्ना, केला, ज्वार, तंबाकू, रेंड़ी, मूँगफली और सोयाबीन की भी अच्छी पैदावार होती है।

लैटेराइट मिट्टी (Laterite Soil)
यह मिट्टी रासायनिक क्रियाओं तथा चट्टानो के टूट-फूट द्वारा शुष्क मौसम में बनती है। इस मिट्टी में भी आइरन ऑक्साइड की अधिकता पाई जाती है। यह देखने में लाल मिट्टी की तरह लगती है, किंतु उससे कम उपजाऊ होती है। ऊँचे स्थलों में यह प्राय: पतली और कंकड़मिश्रित होती है और कृषि के योग्य नहीं रहती, किंतु मैदानी भागों में यह खेती के काम में लाई जाती है।  यह मिट्टी तमिलनाडु के पहाड़ी भागों, केरल, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा के कुछ भागों में,  दक्षिण भारत के पठार, राजमहल तथा छोटानागपुर के पठार, असम इत्यादि में सीमित क्षेत्रों में पाई जाती है। दक्षिण भारत में मैदानी भागों में इसपर धान की खेती होती है और ऊँचे भागों में चाय, कहवा, रबर तथा सिनकोना उपजाए जाते हैं। इस प्रकार की मिट्टी अधिक ऊष्मा और वर्षा के क्षेत्रों में बनती है। इसलिए इसमें ह्यूमस की कमी होती है और निक्षालन अधिक हुआ करता है।

रेतीली मिट्टी (Arid and Desert Soil)
यह मिट्टी शुष्क और अर्धशुष्क प्रदेशों जैसे – पश्चिमी राजस्थान और आरवाली पर्वत के क्षेत्रों, उत्तरी गुजरात, दक्षिणी हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पाई जाती है। सिंचाई के सहारे गेंहू, गन्ना, कपास, ज्वार, बाजरा  उगाये जाते हैं। जहाँ सिंचाई की सुविधा नहीं है वहाँ यह भूमि बंजर पाई जाती है।

क्षारयुक्त मिट्टी (Saline and Alkaline Soil)
शुष्क और अर्धशुष्क क्षेत्रों, दलदली क्षेत्रों, अधिक सिंचाई वाले क्षेत्रों में यह मिट्टी पाई जाती है। इन्हे थूर (Thur), ऊसर, कल्लहड़, राकड़, रे और चोपन के नामों से भी जाना जाता है। शुष्क भागों में अधिक सिंचाई के कारण एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल-प्रवाह दोषपूर्ण होने एवं जलरेखा उपर-नीचे होने के कारण इस मिट्टी का जन्म होता है। इस प्रकार की मिट्टी में भूमि की निचली परतों से क्षार या लवण वाष्पीकरण द्वारा उपरी परतों तक आ जाते हैं। इस मिट्टी में सोडियम, कैल्सियम और मैग्निशियम की मात्रा अधिक पायी जाने से प्रायः यह मिट्टी अनुत्पादक हो जाती है।

हल्की काली एवं दलदली मिट्टी (Peaty and Other Organic soil)
इस मिट्टी में ज़्यादातर जैविक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। यह सामान्यतः आद्र-प्रदेशों में मिलती है। दलदली मिट्टी उड़ीसा के तटीय भागों, सुंदरवन के डेल्टाई क्षेत्रों, बिहार के मध्यवर्ती क्षेत्रों, उत्तराखंड के अल्मोड़ा और तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी एवं केरल के तटों पर पाई जाती है।



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गेहूं की उन्नत खेती कैसे करें ?

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गेहूं, धान के बाद भारत की महत्तवपूर्ण अनाज के दानों वाली और मुख्य भोजन की फसल है। यह प्रोटीन, विटामिन और फाइबर का उच्च स्त्रोत है। भारत में इसे मुख्यत: रबी फसल के तौर पर उगाया जा सकता है।

गेहूं की तीन प्रजातियां T. aestivum, T. durum and T. dicoccum है, जिनकी खेती पूरे देश में की जाती है। भारत गेहूं का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक देश है और विश्व में पैदा होने वाली गेहूं की पैदावार में भारत का योगदान 8.7 फीसदी है। भारत में उत्तर प्रदेश मुख्य गेहूं उत्पादक राज्य हैं। गेहूं प्रोटीन के साथ साथ फाइबर का उच्च स्त्रोत है। यह मैगनीज और मैगनीशियम का भी अच्छा स्त्रोत है। भारत में उत्तर प्रदेश गेहूं का मुख्य उत्पादक राज्य है और इसके बड़े क्षेत्र में गेहूं की खेती की जाती है। राष्ट्रीय उत्पादन में इसका मुख्य योगदान है। यू पी के साथ हरियाणा और पंजाब मुख्य गेहूं उगाने वाले राज्य हैं। हरदोइ, बहराइच, खेड़ी, ईटावा, गोंडा, बस्ती    , मोरादाबाद, रामपुर, बदायुं, सहारनपुर, मुज्जफरनगर, मेरठ, यू पी के मुख्य गेहूं उत्पादक क्षेत्र हैं। उत्तर प्रदेश में गेहूं की उत्पादकता के कम होने का कारण पानी के स्तर का कम होना और खादों को असंतुलित प्रयोग करना आदि है।

उपयुक्त मिट्टी

इसे भारत की मिट्टी की कई किस्मों में उगाया जा सकता है। गेहूं की खेती के लिए चिकनी दोमट या दोमट बनतर, अच्छे ढांचे और पानी सोखने की सामान्य क्षमता वाली मिट्टी उचित होती है। छिद्रित और पानी कम सोखने वाली मिट्टी गेहूं की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती। सूखे हालातों, अच्छे जल निकास वाली भारी मिट्टी इसकी खेती के लिए अनुकूल होती है। भारी मिट्टी जिसका घटिया ढांचा और घटिया जल निकास हो इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती क्योंकि गेहूं की फसल जल जमाव के प्रति संवेदनशील होती है।

गेहूँ की खेती के लिए चिकनी दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है. लेकिन वर्तमान में गेहूँ की अच्छी देखरेख कर इसकी खेती और भी कई तरह की मिट्टी में की जा रही है. इसकी खेती के लिए अधिक अम्लीय या क्षारीय जमीन की जरूरत नही होती. इसके लिए सामान्य पी.एच. वाली भूमि उपयुक्त होती है.

जलवायु और तापमान

गेहूँ की खेती समशीतोष्ण जलवायु वाली जगहों पर की जाती है. भारत में इसकी बुवाई अक्टूबर और नवम्बर माह में की जाती है. इसकी खेती सर्दियों के टाइम में की जाती है. और सर्दियों में होने वाली मावठ इसकी खेती के लिए बहुत उपयोगी होती है. लेकिन फसल की कटाई के वक्त होने वाली बारिश इसकी फसल को नुक्सान पहुँचाती है.

इसके पौधों को वृद्धि करने के लिए सर्दी की जरूरत होती हैं. सर्दियों में पड़ने वाली ओस इसके पौधों के लिए बहुत उपयोगी होती है. लेकिन सर्दियों में पड़ने वाला पाला इसकी फसल को नुक्सान पहुँचाता है. गेहूँ की फसल को पकने के दौरान भी हलकी ठंड की जरूरत होती है. हल्की ठंड में इसके बीज अच्छे से पकते हैं.

गेहूँ की खेती के लिए सामान्य तापमान सबसे उपयुक्त होता है. बीज की बुवाई के वक्त इसकी खेती के लिए 20 से 25 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है. और फसल के पूरी तरह से तैयार होने के बाद कटाई के वक्त 30 डिग्री के आसपास तापमान होना चाहिए.

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

गेहूँ की वर्तमान में कई तरह की किस्में प्रचलन में हैं. जिन्हें भूमि और जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए उगाने से अच्छी पैदावार ली जा सकती हैं. गेहूँ की इन किस्मों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में रखा गया हैं.

सिंचित जगहों के लिए
सिंचित जगहों की किस्मों को भी दो प्रजातियों में रखा गया हैं. जिनकी बुवाई अलग अलग वक्त पर की जाती है.

अगेती किस्म

अगेती किस्मों की बुवाई अक्टूबर माह के लास्ट और नवम्बर माह के शुरुआत में कर दी जाती है. जिससे इनकी पैदावार जल्दी प्राप्त हो जाती हैं. इस श्रेणी की किस्मों को अधिक सिंचाई की जरूरत होती है. इस किस्म की पैदावार भी अधिक पाई जाती है. इस प्रजाति की किस्मों में देवा के 9107, एच पी 1731, राज्य लक्ष्मी, एचयूडब्लू468, एचयूडब्लू510, नरेन्द्र गेहूँ 1012, उजियार के 9006, डी एल 784-3, एच डी2888, एच डी2967, यूपी 2382, पी बी डब्लू443, पी बी डब्लू 343, एच डी 2824 जैसी कई किस्में शामिल हैं.

पछेती किस्में

इस प्रजाति की किस्मों को नवम्बर माह के आखिरी या दिसम्बर माह के शुरुआत में उगाते हैं. इन किस्मों को ज्यादातर कपास और गाजर उगाई हुई भूमि पर उगाया जाता है. इस किस्म की पैदावार अगेती किस्मों की अपेक्षा कम पाई जाती है. इस प्रजाति की किस्मों में त्रिवेणी के 8020, सोनाली एच पी 1633 एच डी 2643, गंगा, डी वी डब्लू 14, के 9162, के 9533, एचपी 1744, नरेन्द्र गेहूँ1014, नरेन्द्र गेहूँ 2036, नरेन्द्र गेहूँ1076, यूपी 2425, के 9423, के 9903, एच डब्लू2045,पी बी डब्लू373, पी बी डब्लू 16 जैसी कई किस्में मौजूद हैं.

असिंचित जगहों के लिए
इस श्रेणी की किस्मों की पैदावार काफी कम होती है. इस श्रेणी की किस्मों को भारत में उन जगहों पर उगाया जाता हैं, जहां नमी की मात्रा अधिक पाई जाती है. इस श्रेणी की किस्मों में मगहर के 8027, इंद्रा के 8962, गोमती के 9465, के 9644, मन्दाकिनी के 9251, एच डी- 2888, पी बी डब्ल्यू- 396, पी बी डब्ल्यू- 299, डब्ल्यू एच- 533, पी बी डब्ल्यू- 175 जैसी और भी कई किस्में शामिल हैं.

उसरीली भूमि वाली जगहों के लिए

उसरीली भूमि को बंज़र भूमि के नाम से भी जाना जाता है. अब गेहूँ की कुछ ऐसी किस्में तैयार कर ली गई है. जिनकी खेती उसरीली भूमि में भी की जा रही है. कई किस्में हैं जो उसरीली भूमि में अच्छी पैदावार दे रही हैं. जिनमें के आर एल 1, के आर एल 2, के आर एल 3, के आर एल 4, के आर एल 19, लोक 1, प्रसाद के 8434, एन डब्लू 1067 जैसी कई किस्में मौजूद हैं.

ज़मीन की तैयारी
गेहूं की फसल को अच्छे अंकुरन के लिए अच्छी तरह से तैयार, पर ठोस बीज बैड की आवश्यकता होती है। पिछली फसल की कटाई के बाद खेत की अच्छे तरीके से ट्रैक्टर की मदद से जोताई की जानी चाहिए। खेत को आमतौर पर ट्रैक्टर के साथ तवियां जोड़कर जोता जाता है और  उसके बाद दो या तीन बार हल या सुहागे से जोता जाता है।  खेत की जोताई शाम के समय की जानी चाहिए और रोपाई की गई ज़मीन को पूरी रात खुला छोड़ देना चाहिए ताकि वह ओस की बूंदों से नमी सोख सके। प्रत्येक जोताई के बाद सुहागा फेरना चाहिए। 

बारानी क्षेत्रों में फसल को दीमक के हमले से बचाव के लिए क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी 700 मि.ली. को 5 लीटर पानी में मिलाकर 100 किलो बीजों का उपचार करें। उसके बाद बीजों को छांव में सुखाएं।

बिजाई
बिजाई का समय

पश्चिमी यू पी में, सिंचित और सामान्य बिजाई स्थितियों में 1 नवंबर से 15 नवंबर तक बिजाई पूरी कर लें और पिछेती बिजाई की स्थितियों में 1 से 25 दिसंबर तक बिजाई पूरी कर लें।

पूर्वी यू पी के लिए, सिंचित और सामान्य बिजाई का उचित समय 1 नवंबर से 15 नवंबर तक है, जबकि पिछेती बिजाई के लिए 1 से 20 दिसंबर का समय उचित है।

ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों के लिए, सिंचित और सामान्य बिजाई का उचित समय अक्तूबर के दूसरे पखवाड़े से लेकर नवंबर का पहला पखवाड़ा है। जबकि पिछेती बिजाई के लिए 1 दिसंबर से 20 दिसंबर का समय उचित है।

निचले पहाड़ी क्षेत्रों के लिए, सिंचित और सामान्य बिजाई का उचित समय अक्तूबर के आखिरी सप्ताह से लेकर मध्य नवंबर तक का है जबकि पिछेती बिजाई के लिए नवंबर का दूसरा पखवाड़ा उचित समय है।

फासला
सामान्य बिजाई के लिए कतारों में 20-22-5 सैं.मी. के फासले की सलाह दी जाती है। यदि बिजाई देरी से करनी हो तो 15-18 सैं.मी. का फासला होना चाहिए।

बीज की गहराई
लंबी किस्मों के लिए 6-7 सैं.मी. की गहराई का प्रयोग करें जबकि अन्य किस्मों के लिए 5-6 सैं.मी. की गहराई का प्रयोग करें। 

बिजाई की विधि
बीज ड्रिल
बुरकाव विधि 

बीज
बीज की मात्रा
छोटे आकार की किस्मों के लिए 40 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें और मोटे किस्म के बीजों के लिए 50 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें। यदि पिछेती बिजाई करनी हो तो 60 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें। बिजाई से पहले बीज साफ और छांटे हुए होने चाहिए।

बीज का उपचार
बीजों को दीमक, झूठी कांगियारी से बचाने के लिए बिजाई से पहले क्लोरपाइरीफॉस 4 मि.ली. या टैबुकोनाज़ोल 2 डी एस 1.5-1.87 ग्राम या कार्बेनडाज़िम या थीरम 2 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद ट्राइकोडरमा विराइड 1.15 प्रतिशत डब्लयु पी 4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें।

खाद
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
 UREASSPMOP
Irrigated13015020
Unirrigated527515
Late sown1107527

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
 NITROGENPHOSPHORUSPOTASH
Irrigated602420
Unirrigated241215
Late sown501227

मिट्टी की जांच के आधार पर खादें डालें। मिट्टी की जांच के अनुसार ही हम मिट्टी में आवश्यक खादों की मात्रा दे सकते हैं। 

सिंचित क्षेत्रों के लिए, नाइट्रोजन 60 किलो (यूरिया 130 किलो), फासफोरस 24 किलो (एस  एस पी 150 किलो), पोटाश 12 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 20 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी नाइट्रोजन को पहली सिंचाई के समय डालें।

बारानी क्षेत्रों के लिए, नाइट्रोजन 24 किलो (यूरिया 52 किलो), फासफोरस 12 किलो (एस  एस पी 75 किलो), पोटाश 8 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 15 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोज, फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। 

सिंचित क्षेत्रों में पिछेती बिजाई के लिए, नाइट्रोजन 50 किलो (यूरिया 110 किलो), फासफोरस 12 किलो (एस  एस पी 75 किलो), पोटाश 16 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 27 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा और फासफोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी बची नाइट्रोजन की दो तिहाई मात्रा बिजाई के 35-40 दिनों के बाद डालें।

यह पाया गया है कि जिंक सल्फेट 10 किलो प्रति एकड़ में डालने से उपज में वृद्धि होती है। जिंक की कमी को पूरा करने के लिए जिंक सल्फेट 0.5 प्रतिशत की फोलियर स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दो से तीन स्प्रे करें।

अच्छी शाखाएं और उपज के लिए 19:19:19 घुलनशील खादें 5 ग्राम + स्टिकर 0.5 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर बिजाई के 30 दिनों के बाद स्प्रे करें।

खरपतवार नियंत्रण
सभ्याचारक पद्धति: सभ्याचारक पद्धति  से नदीनों की रोकथाम के लिए फसल बोने के समय, फसल बोने की पद्धति, फसल की किस्म, खाद की मात्रा, सिंचाई की पद्धति ये सभी तत्व महत्तवपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बिजाई के लिए हमेशा गेहूं के साफ और नदीन मुक्त बीजों का प्रयोग करें। गेहूं के बीजों का अंकुरन होने से पहले  नदीनों को उखाड़कर नाश कर दें। खालियों को नदीन रहित रखें। 

रासायनिक नदीन रोकथाम: इसमें कम मेहनत और हाथों से नदीनों को उखाड़ने से होने वाली हानि ना होने कारण ज्यादातर यह तरीका ही अपनाया जाता है। नुकसान से बचने के लिए पैंडीमैथालीन स्टांप (30 ई.सी.) 1320 मि.ली. को 200 लीटर पानी के घोल में मिलाके बीजने के 0-3 दिनों के अंदर अंदर छिड़काव करना चाहिए।

चौड़े पत्तों वाले नदीनों की रोकथाम: चौड़े पत्तों वाले नदीनों की रोकथाम के लिए बिजाई के 25-30 दिनों के बाद 2,4-डी 0.2-0.4 किलो को प्रति एकड़ में डालें। जब फसल को पहला पानी लग जाए तो जड़ें बनने के समय चौड़े पत्तों वाले नदीनों को रोकने के लिए फलूरोक्सीपर 0.08-0.24 किलो प्रति एकड़ में डालना 2,4-डी के स्थान पर अच्छा विकल्प है।

जब मिट्टी में पर्याप्त नमी मौजूद हो तो नदीननाश्क, पहले और बाद में की जाने वाली दोनों स्प्रे का प्रयोग करें। स्प्रे साफ और धूप वाले दिनों में करें।

नदीनों का फसल में मिलना एक बहुत बड़ी समस्या है। इसके लिए 30-35 दिनों में 160 ग्राम क्लोडिनाफॉप- प्रॉपरज़िल + मैटसलफिउरॉन - मिथाइल बना बनाया + 500 मि.ली. सरफकटैंट 200 लीटर पानी में डालकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 

सिंचाई-
सिंचाई की संख्या दिनों के अंतराल पर सिंचाई
पहली सिंचाई 20-25  दिनों में
दूसरी सिंचाई40-45  दिनों में
तीसरी सिंचाई60-65  दिनों में
चौथी सिंचाई80-85  दिनों में
पांचवी सिंचाई100-105  दिनों में
छठी सिंचाई115-120  दिनों में
सिंचाई की संख्या, पानी की उपलब्धता मिट्टी की किस्म पर पर निर्भर करती है। जड़ें बनने के समय और बालियां बनने के समय नमी का होना जरूरी है। छोटे कद वाली किस्मों और अच्छी पैदावार  के लिए बिजाई से पहले सिंचाई करें। गेहूं की फसल के लिए चार से छः सिंचाईयां बहुत होती हैं। बिजाई के 20-25 दिनों के बाद पहली सिंचाई देनी चाहिए। जड़ें बनने के समय पर नमी का होना पैदावार को कम होने से बचाता है। ठंडे क्षेत्रों में जैसे पहाड़ी क्षेत्रों और जहां पर गेहूं की पिछेती बिजाई की जाती है। वहां पर बिजाई के लगभग 25-30 दिनों के बाद पहली सिंचाई करें। बिजाई के 40-45 दिनों के बाद पौधा बनने के समय दूसरी सिंचाई करें। तीसरी सिंचाई 70-75 दिनों के बाद नोड्स बनने के समय करें। फूल निकलने के समय चौथी सिंचाई 90-95 दिनों में करें। पांचवी सिंचाई बिजाई के 110-115 दिनों के बाद करें जब दाने अपरिपक्व होते हैं।

कम पानी की स्थितियों में गंभीर अवस्था में सिंचाई करें। जब पानी एक ही सिंचाई के लिए उपलब्ध हो तो जड़ें बनने के समय पानी लगाएं। जब दो सिंचाईयों के लिए पानी उपलब्ध हो तो जड़ें बनने के समय और बालियां निकलने के समय पानी लगाएं। यदि तीन सिंचाइ्रयों के लिए पानी उपलब्ध हो तो पहला पानी जड़ें बनने के समय दूसरा बलियां बनने के समय और तीसरा पानी दानों में दूध बनने के समय लगाएं। जड़ें बनने की अवस्था सिंचाई के लिए बहुत महत्तवपूर्ण अवस्था होती है। यह सिद्ध हुआ है कि पहली सिंचाई के हर सप्ताह के बाद देरी करने से  80-120 किलोग्राम प्रति एकड़ पैदावार  में कमी आती है।

पौधे की देखभाल
हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा : 
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यह पारदर्शी, रस चूसने वाला कीट है। यदि यह बहुत ज्यादा मात्रा में हो तो यह पत्तों के पीलेपन या उनको समय से पहले सुखा देता है। आमतौर पर यह आधी जनवरी के बाद फसल के पकने तक के समय दौरान हमला करती है।

इसकी रोकथाम के लिए कराईसोपरला प्रीडेटर्ज़, जो कि एक, सुंडियां खाने वाला कीड़ा है, का प्रयोग करना चाहिए। 5-8 हज़ार कीड़े प्रति एकड़ या 50 मि.ली. प्रति लीटर नीम के घोल का उपयोग करें। बादलवाई के दौरान सूंडी का हमला शुरू होता है। थाइमैथोक्सम@80 ग्राम या इमीडाक्लोप्रिड 40-60 मि.ली. को 100 लीटर पानी में घोल तैयार करके एक एकड़ पर छिड़काव करें।

दीमक:  
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दीमक की तरफ से फसल के विभिन्न विभिन्न विकास के पड़ाव, बीज अंकुरन से लेकर पकने तक हमला किया जाता है। बुरी तरह ग्रसित पौधों की जड़ों को आराम से उखाड़ा जा सकता है और यह पत्ता लपेट और सूखे हुए नज़र आते हैं। यदि आधी जड़ खराब हो तो बूटा पीला पड़ जाता है।

इसकी रोकथाम के लिए एक लीटर क्लोरपाइरीफॉस 20 ई.सी. को 20 किलो मिट्टी में मिलाके एक एकड़ में बुरकाव करना चाहिए और उसके बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए।

बीमारियां और रोकथाम
कांगियारी : 
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यह बीजों से होने वाली बीमारी है। हवा से इसकी लाग और फैलती है। बालियां बनने के समय कम तापमान, नमी वाले हालात इसके लिए अनुकूल होते हैं।

यदि बीजों पर इस बीमारी का हमला ज्यादा हो तो फंगसनाशी जैसे कार्बोक्सिल (विटावैक्स 75 डब्लयू पी 2.5 ग्राम ), कार्बेनडाज़िम (बाविस्टिन 50 डब्लयु पी 2.5 ग्राम), टैबुकोनाज़ोल (रैक्सिल 2 डी एस 1.25 ग्राम) से प्रति किलो बीज का उपचार करें। यदि हमला कम हो तो ट्राइकोडरमा विराइड 4 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें और सिफारिश की गई खुराक कार्बोक्सिन विटावैक्स 75 डब्लयु पी  1.25 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें।

सफेद धब्बे : 
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इस बीमारी के दौरान पत्ते, खोल, तने और फूलों वाले भागों पर सफेद रंग की फंगस दिखनी शुरू हो जाती है। यह  फंगस बाद में काले धब्बों का रूप ले लेती है इससे पत्तों और बाकी के भाग सूखने शुरू हो जाते हैं।

जब इस बीमारी का हमला सामने आए तो फसल पर 2 ग्राम घुलनशील सल्फर को प्रति लीटर पानी में मिलाकर या 400 ग्राम कार्बेनडाज़िम का प्रति एकड़ में छिड़काव करें। गंभीर हालातों में 2 मि.ली.  प्रोपीकोनाज़ोल को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

भूरी कुंगी : 
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गर्म तापमान (15-30°C) और नमी वाले हालात इसका कारण बनते हैं। पत्तों के भूरेपन के लक्षण की पहचान पत्तों के ऊपर लाल - भूरे रंग के अंडाकार या लंबकार दानों से होती है। जब खुली मात्रा में नमी मौजूद हो और तापमान 20°C के नजदीक हो तो यह बीमारी बहुत जल्दी बढ़ती है। यदि हालात अनुकूल हों तो इस बीमारी के दाने हर 10-14 दिनों के बाद दोबारा पैदा हो सकते हैं।

इस बीमारी की रोकथाम के लिए अलग अलग किस्म की फसलों को एक ज़मीन पर एक समय लगाने के तरीके अपनाने चाहिए। नाइट्रोजन के ज्यादा प्रयोग से परहेज़ करना चाहिए। ज़िनेब Z-78 400 ग्राम की प्रति एकड़ में या प्रोपीकोनाज़ोल 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

करनाल बंट : 
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यह बीज और मिट्टी से होने वाली बीमारी है लाग की शुरूआत बालियां बनने के समय होती है। बालियां बनने से लेकर उसमें दाना पड़ने तक के पड़ाव के दौरान यदि बादलवाई रहती है तो यह बीमारी और भी घातक हो सकती है। यदि उत्तरी भारत के समतल क्षेत्रों में फरवरी महीने के दौरान बारिश पड़ जाए तो इस बीमारी के कारण बहुत ज्यादा नुकसान होता है।

इस बीमारी की रोकथाम के लिए करनाल बंट की रोधक किस्मों का प्रयोग करें। इस बीमारी की रोकथाम के लिए पत्ते के बनने के समय प्रोपीकोनाज़ोल (टिल्ट) 25 ई सी 2 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर बालियां बनने की अवस्था में एक स्प्रे करें।

पीली धारीदार कुंगी : 
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यह बीमारी जीवाणुओं के विकास और संचार के लिए 8-13 डिगरी सैल्सियस तापमान अनुकूल होता है और इनके बढ़ने फूलने के लिए 12-15 डिगरी सैल्सियस तापमान पानी के बिना अनुकूल होता है। इस बीमारी के कारण गेहूं की फसल की पैदावार में 5-30 तक कमी आ सकती है। इस बीमारी से बने धब्बों में पीले से संतरी पीले रंग के विषाणु होते हैं। जो आमतौर पर पत्तों पर बारीक धारियां बनाते हैं।

इस बीमारी की रोकथाम के लिए कुंगी की रोधक किस्मों का प्रयोग करें। फसली चक्र और मिश्रित फसलों की विधि अपनायें। नाइट्रोजन का ज्यादा प्रयोग ना करें। जब इस बीमारी के लक्षण दिखाई दें तो 5-10 किलोग्राम सल्फर का छिड़काव प्रति एकड़ या 2 ग्राम मैनकोजेब या 2 मि.ली. प्रोपीकोनाज़ोल 25 ई सी को प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में छिड़काव करना चाहिए।

फसल की कटाई
उच्च पैदावार वाली फसलों की किस्मों की कटाई पत्तों और तने के पीले पड़ने और सूखने के बाद की जाती है। हानि से बचने के लिए फसल की कटाई इसके पके हुए पौधों के सूखने से पहले की जानी चाहिए। ग्राहक की तरफ से इसे स्वीकारने और इसकी अच्छी गुण्वत्ता के लिए इसको सही समय पर काटना चाहिए। जब दानों में 25-30 प्रतिशत नमी रह जाती है तो यह इसे काटने का सही समय होता है। हाथ से गेहूं काटने के समय तेज धार वाली द्राती का प्रयोग करना चाहिए। कटाई के लिए कंबाइने भी उपलब्ध हैं, जिनकी सहायता से गेहूं की फसल की कटाई, दाने निकालना और छंटाई एक ही बार में की जा सकती है।

कटाई के बाद
हाथों से कटाई करने के बाद फसल को तीन से चार दिनों के लिए सुखाना चाहिए ताकि दानों में नमी 10-12 प्रतिशत के मध्य रह जाए और उसके बाद बैलों की मदद से चलने वाले थ्रैशर की मदद से दाने निकालने चाहिए। सीधा धूप में बहुत ज्यादा सुखाने से परहेज़ करना चाहिए और दानों को साफ-सुथरी बोरियों में भरना चाहिए ताकि नुकसान को कम किया जा सके।

पूसा बिन मिट्टी या ईंटों से बनाया जाता है और इसकी दीवारों में पॉलिथीन की एक परत चढ़ाई जाती है। जब कि बांस के डंडों के आस-पास कपड़ों की मदद से सिंलडर के आकार में ढांचा तैयार किया जाता है और इसका तल मैटल की ट्यूब की सहायता से तैयार किया जाता है। इसे हपूरटेका कहा जाता है, जिसके निचली ओर एक छोटा छेद किया जाता है ताकि इसमें से दानों को निकाला जा सके। बड़े स्तर पर दानों का भंडार सी ए पी और सिलोज़ में किया जाता है।

भंडार के दौरान अलग अलग तरह के कीड़ों और बीमारियों से दूर रखने के लिए बोरियों में 1 प्रतिशत मैलाथियोन रोगाणुनाशक का प्रयोग किया जाता है। भंडार घर को अच्छी तरह साफ करें, इसमें से आ रही दरारों को दूर करे और चूहे की खुड्डों को सीमेंट से भर दें। दानों को भंडार करने से पहले भंडार घर में सफेदी करवानी चाहिए। और इसमें 100 वर्गमीटर के घेरे में 3 लीटर मैलाथियान 50 ई.सी. का छिड़काव करना चाहिए। बोरियों के ढेर को दीवारों से 50 सै.मी. की दूरी पर रखना चाहिए और ढेरों के बीच में कुछ जगह देनी चाहिए। 


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जई की उन्नत खेती कैसे करें

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जई एक महत्तवपूर्ण अनाज और चारे की फसल है। जई की खेती गेहूं की खेती के बिल्कुल समान होती है। यह विशेष कर संयमी और उप उष्ण कटबंधी क्षेत्रों में उगाई जाती है। इसकी पैदावार ज्यादा ऊंचाई वाले तटी क्षेत्रों में भी बढ़िया होती है। यह अपने सेहत संबंधी फायदों के कारण काफी प्रसिद्ध है। जई वाला खाना मशहूर खानों में गिना जाता है। जई में प्रोटीन और रेशे की भरपूर मात्रा होती है। यह भार घटाने, ब्लड प्रैशर को कंटरोल करने और बीमारियों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाने में भी मदद करता है। इसे पराली, चारा और आचार बनाने के लिए भी प्रयोग किया जाता है।

रबी मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में जई का एक मुख्य स्थान है। हमारे देश में इसकी खेती अधिकतर सिंचित दशा में की जाती है, किंतु मध्य अक्टूबर तक भूमि पर्याप्त नमीं होने पर इसे असिंचित दशा में भी उगया जा सकता है। ऐसे सभी जलवायु क्षेत्रों में जहां गेहूं और जौ की खेती होती हो वहां इसकी खेती की जा सकती है| यह पाले एवं अधिक ठंड को सहन कर सकती है| जई पशुओं के खाने के लिए कोमल और सुपाच्य है।इसमें क्रूडप्रोटीन 10 से 12 प्रतिशत होता है| जई को भूसा या सूखे चारे के रूप में भी प्रयोग में लाया जाता है।

यह अपने सेहत संबंधी फायदों के कारण भी काफी प्रसिद्ध है| जई का खाना मशहूर खानों में गिना जाता है। जई में प्रोटीन और रेशे की भरपूर मात्रा होती है।यह भार घटाने, ब्लड प्रैशर को कंटरोल करने और बीमारियों से लड़ने की शक्ति को बढ़ाने में भी मदद करता है। यदि किसान बन्धु इसकी खेती वैज्ञानिक तकनीक से करें, तो जई की फसल से अच्छी उपज प्राप्त कर सकते है। इस लेख में जई की उन्नत खेती कैसे करें का उल्लेख किया गया है।

उपयुक्त जलवायु
जई की खेती के लिए ठंडी एवं शुष्क जलवायु उपयुक्त समझी जाती है, दक्षिण भारत में अधिक तापक्रम होने के कारण इसकी खेती अच्छी उपज नही देती है। इसलिए उत्तर भारत में कम तापक्रम के कारण इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसकी खेती के लिए 15 से 25 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान सर्वोतम माना जाता है। 

भूमि का चयन
यह हर तरह की मिट्टी में उगाई जाती है। अच्छे जल निकास वाली चिकनी रेतली मिट्टी, जिस में जैविक तत्व हों, जई की खेती के लिए उचित मानी जाती है। जई की खेती के लिए 5-6.6 पी एच वाली मिट्टी बढ़िया होती है।
जई की खेती सभी प्रकार की जमीनों में की जा सकती है, किन्तु दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिये सर्वोत्तम होती है।  हल्की जमीनों में इस फसल को अपेक्षाकृत जमीनों से अधिक जल की आवश्यकता होती है। 

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Brunker-10: यह तेजी से बढ़ने वाली अच्छी, छोटे और तंग आकार के नर्म पत्तों वाली किस्म है। यह सोके की प्रतिरोधक है। यह पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, और उत्तर प्रदेश के इलाकों में उगाई जाती है।

OS-6: यह भारत के सभी इलाकों में उगाई जा सकती है। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 210 क्विंटल प्रति एकड़ है।

OL-9: यह पंजाब के सारे सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसके दानों की औसतन पैदावार 7 क्विंटल और चारे के तौर पर औसतन पैदावार 230 क्विंटल प्रति एकड़ है।

Kent: यह भारत के सभी इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके पौधे का औसतन कद 75-80 सैं.मी. होता है। यह किस्म कुंगी, गर्दन तोड़ और झुलस रोग की प्रतिरोधक है। इसकी चारे की औसतन पैदावार 150 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म 180 दिनों में तैयार हो जाती है।

Bundel Jai 2001-3: इसकी हरे चारे की औसतन पैदावार 20 टन प्रति एकड़ और सूखे चारे की औसतन पैदावार 4 टन प्रति एकड़ होती है। 

OS 403: यह किस्म CSSHAU, हरियाणा द्वारा विकसित की गई है। यह सिंचित हालातों में समय पर बोने के लिए  उपयुक्त किस्म है। इसकी हरे चारे की औसतन पैदावार 183 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Weston-11: यह किस्म 1978 में पंजाब में जारी की गई। इस किस्म के पौधों का कद 150 सैं.मी. होता है। इसके दाने लंबे और सुनहरी रंग के जैसे होते हैं।

OL-10: यह पंजाब के सारे सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 270 क्विंटल प्रति एकड़ है।

दूसरे राज्यों की किस्में

Haryana Javi-114: यह अगेती बिजाई वाली किस्म है। यह किस्म 1974 में CCS HAU, हिसार द्वारा जारी की गई है। यह किस्म पूरे भारत में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह किस्म गर्दन तोड़ के प्रतिरोधी है। यह ज्यादा कटाई के लिए उपयुक्त है। इसके हरे चारे की औसतन उपज 50-230 क्विंटल और बीजों की उपज 54-83 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Bundel Jai 2004 (JHO-2000-4): यह किस्म 2002 में IGFRI,  झांसी द्वारा जारी की गई है। यह उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में उगाने के लिए अनुकूल है। यह एक कटाई के लिए उपयुक्त किस्म है। इसके हरे चारे की औसतन पैदावार 200 क्विंटल और सूखे चारे की पैदावार 40 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। यह किस्म तना गलन, कुंगी, पत्तों के ऊपरी धब्बा रोग, पत्तों के झुलस रोग और जड़ गलन को सहनेयोग्य है।

OL 125: यह 1995 में PAU, लुधियाणा द्वारा जारी की गई है। यह किस्म उत्तर पश्चिमी और केंद्रीय क्षेत्रों में खेती करने के लिए उपयुक्त है। यह एक कटाई और ज्यादा कटाई के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 240 क्विंटल प्रति एकड़ होती है। 

(Bundel Jai 851) JHO 851 और OL 529 भी जई की उपयुक्त किस्में हैं।

OL-10: यह पंजाब के सारे सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। इसके बीज दरमियाने आकार के होते हैं। इसकी चारे के तौर पर औसतन पैदावार 270 क्विंटल प्रति एकड़ है।

HFO-114: यह जई उगाने वाले सारे इलाकों में उगाई जा सकती है। यह 1974 में हिसार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी की तरफ से जारी की गई। यह किस्म लंबी और गर्दन तोड़ की रोधक है। इसके बीज मोटे होते हैं और इसके दानों की औसतन पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है।

Algerian: यह किस्म सिंचित इलाकों में उगाने योग्य किस्म है। पौधे का औसतन कद 100-120 सैं.मी. होता है। इसका शुरूआती विकास मध्यम होता है और पत्ते हल्के हरे रंग के होते हैं।

Bundel Jai 851: यह भारत के सभी इलाकों में उगाई जा सकती है। इसकी हरे चारे के तौर पर औसतन पैदावार 188 क्विंटल प्रति एकड़ है।

खेत की तैयारी

एक नदीन मुक्त खेत के रूप में खेत को अच्छे तरीके से तैयार करना चाहिए। मिट्टी के भुरभुरा होने तक खेत की 6-8 बार जोताई करें। जई की फसल जौं और गेहूं से ज्यादा के पी एच स्तर को सहन कर सकती है। जई फसल का अच्छा अंकुरण प्राप्त करने के लिये खेत की अच्छे से तैयारी करना जरूरी है, इसके लिये खेत में देशी हल से दो-तीन जुताईयां या ट्रेक्टर चलित यंत्रों में एक बार कल्टीवेटर चलाने के बाद दो बार हैरो चलाये| तत्पश्चात् पाटा चलाकर खेत को समतल करना चाहिये| खेत में पानी निकासी की उचित व्यवस्था करें|

बिजाई
बिजाई का समय
शुरूआती अक्तूबर से अंत नवंबर तक बिजाई पूरी कर लें।

फासला
कम शाखाओं वाली किस्मों के लिए कतारों में 20-25 सैं.मी. जबकि अधिक शाखाओं वाली किस्मों के लिए कतारों में 30 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।

बीज की गहराई
बीज की गहराई 3-4 सैं.मी. होनी चाहिए।

बिजाई का ढंग
बिजाई के लिए सीड ड्रिल का प्रयोग करें। पोरा और केरा विधि का प्रयोग किया जा सकता है।

बीज
बीज की मात्रा
एक एकड़ में बिजाई के लिए 24-28 किलो बीज की आवश्यकता होती है।

बीज का उपचार
कांगियारी रोग से बचाव के लिए विटावैक्स 2 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करना चाहिए।

खाद
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
UREASSPMOP
70100-

तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
NITROGENPHOSPORUSPOTASH
3216-
रूड़ी की खाद या गाय का गला हुआ गोबर 8-10 टन खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ में डालना चाहिए। एक कटाई की किस्म के लिए नाइट्रोजन 32 किलो (यूरिया 70 किलो) और फासफोरस 16 किलो (एस एस पी 100 किलो) प्रति एकड़ में खेत की तैयारी के समय डालें।

दोहरी कटाई वाली किस्मों के लिए नाइट्रोजन 50 किलो (यूरिया 110 किलो) और फासफोरस 16 किलो (एस एस पी 100 किलो) प्रति एकड़ में डालें। नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा टॉप ड्रेसिंग के तौर पर डालें। उसके बाद नाइट्रोजन को दो भागों में बांटे और पहली और दूसरे कटाई के समय बराबर मात्रा में डालें। 

सिंचाई
जई की खेती मुख्यत: बारानी फसल के तौर पर की जाती है। लेकिन अगर इसे सिंचित फसल के तौर पर उगाया जाये, तो चार से पांच सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। मिट्टी में नमी के आधार पर बिजाई से पहले सिंचाई करें। बाकी की सिंचाई महीने के अंतराल पर करें। प्रत्येक कटाई के बाद सिंचाई करें।

खरपतवार नियंत्रण
जई की फसल पर नदीनों का हमला कम होता है। 1-2 गोडाई की जा सकती है। यदि नदीन खड़ी फसल पर मौजूद हों तो 2,4-डी  250 ग्राम को प्रति एकड़ में डालें।

पौधे की देखभाल
हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा : 
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यह जई की फसल का मुख्य कीट है। यह पौधे के सैलों का रस चूस लेता है। इससे पत्ते मुड़ जाते हैं और इन पर धब्बे पड़ जाते हैं।

इन के हमले को रोकने के लिए डाइमैथोएट 30 ई सी 0.03 प्रतिशत का प्रयोग करें। स्प्रे करने के 10-15 दिनों के बाद जई की फसल को चारे के तौर पर पशुओं को ना डालें।

बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर काले धब्बे : 
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इससे फफूंदी सैलों में अपने आप पैदा हो जाती है। पौधों के शिखरों से कोंडिओफोरस स्टोमैटा के बीच में ही एक सिंगल राह बना लेते हैं। यह फंगस भूरे रंग से काले रंग की हो जाती है। शुरूआती बीमारी पत्तों के शिखरों से आती है और दूसरी बार यह बीमारी हवा द्वारा सुराखों में फैलती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए बीज का उपचार करना जरूरी है।

जड़ गलन : 
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यह जड़ों के विषाणुओं के कारण होता है। बिजाई से पहले बीजों को अच्छी तरह उपचार करने से इस बीमारी को रोका जा सकता है।

कटाई एवं उत्पादन
एक कटाई के लिये बोई गयी जई की फसल को 50 प्रतिशत फूल आने की अवस्था में (75 से 85 दिन) कटाई करना उपयुक्त रहता है। इससे लगभग 400 क्विटल हरा चारा प्राप्त होता है| दो कटाई के लिये ली जाने वाली फसल पहली कटाई 55 से 60 दिन में तथा दूसरी कटाई 50 प्रतिशत फूल आने पर करनी चाहिये| इससे लगभग 550 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा प्राप्त होता है। दो कटाई वाली फसल को काटते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिये कि पौधों की पहली कटाई 4 से 5 सेंटीमीटर ऊंचाई पर करें जिससे उसकी पुर्नवृद्धि अच्छी हो सके। 

बीज उत्पादन
बीज के लिये उगाई गई जई की फसल 50 से 55 दिन में एक बार हरा चारा के लिये कटाई करने के बाद बीज उत्पादन के लिये छोड़ देना चाहिये, ऐसा करने से लगभग 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हरा चारा के साथ 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज प्राप्त होता है। बीज उत्पादन के लिये ली गई फसल में चारे के लिये कटाई करने से पुर्नवृद्धि के बाद पौधे गिरते नहीं है। इससे बीज की गुणवत्ता तथा उत्पादन अच्छा प्राप्त होता है। फसल की कटाई न करने पर फसल के गिरने के कारण बीज उत्पादन पर विपरीत असर पड़ता है।

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जौ की उन्नत खेती कैसे करें ?

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उत्तर प्रदेश और  राजस्थान के साथ  बिहार जौं का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है। उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड जौं का मुख्य उत्पादक क्षेत्र है। जौं की सूखे के प्रति अच्छी प्रतिरोधक क्षमता होती है। जौं का मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं द्वारा भी उपभोग किया जाता है। जौं का प्रयोग शराब बनाने और आयुर्वेदिक दवाइयों आदि में भी किया जाता है।

मिट्टी
यह फसल हल्की ज़मीनों जैसे कि रेतली और कल्लर वाली ज़मीनों में भी कामयाबी से उगाई जा सकती है। इसलिए उपजाऊ ज़मीनों और भारी से दरमियानी मिट्टी इसकी अच्छी पैदावार के लिए सहायक होती हैं। तेजाबी मिट्टी में इसकी पैदावार नहीं की जा सकती।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

Ratna: यह किस्म IARI, नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई है। यह नमक वाली और क्षारीय मिट्टी को सहनेयोग्य है। यह किस्म 125-130 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Azad: यह किस्म C.S.A कानपुर द्वारा विकसित की गई है। यह किस्म पीली कुंगी रोग के प्रतिरोधक है। सिंचित हालातों में खेती करने पर यह अधिक उपज देती है। यह किस्म चारे और दाने लेने के लिए उपयुक्त किस्म है। यह 115-120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। सिंचित हालातों में, इसकी औसतन पैदावार 14-15 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Vijaya: यह किस्म C.S.A कानपुर द्वारा विकसित की गई है। यह 120-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 12-14 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Dolama: यह किस्म उत्तर प्रदेश के बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह 140-150 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है।  यह पीली कुंगी के प्रतिरोधक किस्म है। इसकी औसतन पैदावार 12-15 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Himani: यह किस्म शिमला में विकसित की गई है। यह यू पी के मध्यम और निचली पहाड़ी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 12.8-14 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

LSB 2: यह किस्म उत्तर प्रदेश के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह 145-150 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती हैं इसकी औसतन पैदावार 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Amber: यह किस्म C.S.A कानपुर द्वारा विकसित की गई है। यह 130-133 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। यह किस्म यू पी के बारानी क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। इसका प्रयोग बीयर बनाने के लिए किया जाता है। इसकी औसतन पैदावार 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Jyoti: यह किस्म C.S.A  कानपुर द्वारा विकसित की गई है। यह किस्म उत्तर प्रदेश के सिंचित क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। यह 120-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

C 164: यह लंबी प्रकार की किस्म है, इसकी बालियां सघन होती है। इसके दाने मोटे और सुनहरी होते हैं। यह पीली कुंगी के प्रतिरोधक किस्म है। यह सिंचित क्षेत्रों में खेती करने के लिए उपयुक्त किस्म है।

BG 108: यह किस्म HAU, हिसार द्वारा विकसित की गई है। यह पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त किस्म है। यह किस्म 120-125 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 8-10 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

Kedar: यह किस्म IARI, नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई है। यह पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त किस्म है। यह पीली कुंगी के प्रतिरोधक किस्म है।

Neelam: यह किस्म IARI, नई दिल्ली द्वारा विकसित की गई है। इसके दाने छिल्के वाले और सुनहरी रंग के होते हैं। यह किस्म सिंचित और बारानी दोनों क्षेत्रों में उगाने के लिए उपयुक्त है। 

ज़मीन की तैयारी

खेत को 2-3 बार जोतना चाहिए ताकि खेत में से नदीनों को अच्छी तरह नष्ट किया जा सके।
खेत की तैयारी के लिए तवियों का प्रयोग करें और फिर 2-3 बार सुहागा फेर दें ताकि फसल अच्छी तरह जम जाए। पहले बोयी गई फसल की पराली को हाथों से उठाकर नष्ट कर दें ताकि दीमक का हमला ना हो सके।

बिजाई
बिजाई का समय
अच्छी उपज के लिए, 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक बिजाई पूरी कर लें। सिंचित क्षेत्रों के लिए, 15 से 25 नवंबर तक बिजाई पूरी कर लें। बारानी क्षेत्रों में, बिजाई के लिए 15 अक्तूबर से 10 नवंबर का समय उपयुक्त होता है। यदि बिजाई देरी से की जाए तो दानों की उपज और गुणवत्ता कम हो जाती है और उपज बीयर बनाने के लिए उपयुक्त नहीं होती। 

फासला
बिजाई के लिए पंक्ति से पंक्ति का फासला 22.5 सैं.मी. होना चाहिए। यदि बिजाई देरी से की गई हो तो 18-20 सैं.मी. फासला रखें।

बीज की गहराई
सिंचाई वाले क्षेत्रों में गहराई 3-5 सैं.मी. रखें और बारिश वाले क्षेत्रों में 5-8 सैं.मी. रखें।

बिजाई का ढंग
इसकी बिजाई छींटे द्वारा और मशीन द्वारा की जाती है।

बीज
बीज की मात्रा
बीज की मात्रा अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग होती है। उत्तर प्रदेश के लिए 30-40 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें। बारानी और नमक वाली मिट्टी में ज्यादा बीजों का प्रयोग किया जाता है।

बीज का उपचार
अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए बाविस्टिन 2 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। इससे कांगियारी रोग नहीं लगता। बंद कांगियारी के रोग  से बचाने के लिए बीजने से पहले वीटावैक्स 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। दीमक से बचाने के लिए बीज को 250 मि.ली. फॉर्माथियोन को 5.3 लीटर पानी में डालकर बीज का उपचार करें।

खरपतवार नियंत्रण
अच्छी फसल और अच्छी पैदावार के लिए शुरू में ही नदीनों की रोकथाम बहुत जरूरी है। चौड़े और तंग पत्तों वाले नदीन इस फसल के गंभीर कीट हैं। चौड़े पत्तों वाले नदीनों की रोकथाम के लिए नदीनों के अंकुरण के बाद 2,4-D @ 250 ग्राम को 100 लीटर पानी में मिलाकर बिजाई के 30-35 दिनों के बाद डालें।

बारीक पत्तों जैसे नदीनों की रोकथाम के लिए आइसोप्रोटिउरॉन 75 प्रतिशत डब्लयु पी 500 ग्राम को  प्रति 100 लीटर पानी या पैंडीमैथालीन 30 प्रतिशत ई सी 1.4 लीटर को प्रति 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

खाद
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)

खादें हमेशा मिट्टी की जांच के आधार पर दें। बारानी क्षेत्रों में नाइट्रोजन 8-16 किलो प्रति एकड़ में प्रयोग करें, जबकि सिंचित क्षेत्रों में नाइट्रोजन 16-24 किलो प्रति एकड़ में प्रयोग करें। यदि खेती सूखी भूमि पर करनी हो तो नाइट्रोजन 8 किलो प्रति एकड़ में प्रयोग करें। सिंचित और समय पर बिजाई के लिए फासफोरस 8 किलो बीज प्रति एकड़ में प्रयोग करें।

बारानी क्षेत्रों के लिए, बिजाई के समय नाइट्रोजन की पूरी मात्रा डालें।  सिंचित क्षेत्रों में, नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फासफोरस की पूरी मात्रा बिजाई के समय डालें। बाकी की नाइट्रोजन को पहली सिंचाई के समय टॉप ड्रेसिंग के तौर पर डालें।  

पौधे की देखभाल

हानिकारक कीट और रोकथाम
सैनिक सुंडी : 
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इसका लार्वा हल्के हरे रंग का होता है और बाद की अवस्था में यह पीले रंग का हो जाता है। ये कीट पत्तों को किनारे पर से खाते हैं और कभी कभी पूरा पत्ता ही खा जाते हैं। पत्तों पर मौजूद इसके अंडे के गुच्छे रूई या फंगस की तरह लगते हैं।

रोकथाम : प्राकृतिक जीव सैनिक सुंडी के लार्वा को खा जाते हैं जो कि फसल को नुकसान करते हैं। बेसीलस थरीजिंनसिस की स्प्रे भी लाभदायक है।

इसके लक्षण जब भी दिखें तो मैलाथियॉन 5 प्रतिशत, 9.6 किलो या क्विनलफॉस 1.5 प्रतिशत 9.6 किलो का प्रति एकड़ में छिड़काव करें। कटाई के बाद खेत में से नदीनों और जड़ों को निकाल दें।

बदबूदार कीड़ा : 
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इस कीट का आकार ढाल जैसा होता है। यह कीट हरे या भूरे रंग का और इस पर पीले और लाल रंग के निशान बने होते हैं। इस कीट के मुंह में रोगजनक जीव होते हैं जो कि पौधे को गंभीर नुकसान पहुंचाते है और ये अंडे गुच्छों में देते हैं।

रोकथाम : इसकी रोकथाम के लिए फसल के आस-पास को नदीन रहित रखें। इसकी रोकथाम के लिए परमैथरिन और बाईफैथरिन दो कीटनाशक हैं जो इस कीड़े को मारने की क्षमता रखते हैं।

पतली सुंडी : 
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यह सुंडियां हल्के भूरे रंग की होती हैं। यह अपना जीवन 1-4 साल तक पूरा करती हैं। यह सुंडियां तने को मोड़ देती हैं और तने का शिखर सफेद रंग का हो जाता है।

रोकथाम : नुकसान होने पर इसका कोई हल मौजूद नहीं है पर फसल बीजने से पहले थाइमैथोक्सम 325 मि.ली. से प्रति 100 किलो बीजों का उपचार करें।

चेपा : 
यह रस चूसने वाला कीट है। चेपे के हमले से पत्ते पीले पड़ जाते हैं और आधे पके पत्ते गिर जाते हैं। ज्यादातर इसका हमला जनवरी के दूसरे पखवाड़े पर होता है।

रोकथाम : इसकी रोकथाम के लिए 4-6 हज़ार क्राइसोपरला प्रीडेटर प्रति एकड़ या 50 ग्राम नीम का घोल प्रति लीटर का प्रयोग करें। बादलवाई होने पर इसका हमला ज्यादा होता है। इसकी रोकथाम के लिए थाईमैथोक्सम या इमीडाक्लोप्रिड 30 मि.ली. को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।

बालियों का कीड़ा : 
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यह कीड़ा बालियां निकलने पर हमला करके जाल बना लेता है। इसके अंडे चकमीले सफेद रंग के होते हैं और गुच्छों में पाए जाते हैं। अंडों के ऊपर संतरी रंग के बाल होते हैं। इसकी सुंडियां भूरे रंग की होती हैं जिनके ऊपर पीले रंग की धारियां होती हैं और थोड़े बाल होते हैं। जवान कीड़ों की अगली टांगे भूरे रंग की होती हैं और पिछली टांगे पीले रंग की होती हैं।

रोकथाम : बालग कीड़ों की रोकथाम के लिए दिन के समय रोशनी यंत्र लगाएं। फूल से बालियां बनने पर 5 फेरोमोन कार्ड प्रति एकड़ पर लगाएं। गंभीर हालत में 1 ग्राम मैलाथियॉन या कार्बरिल 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

घास का टिड्डा : 
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नाबालिग और बालिग टिड्डे पत्ते को खाते हैं। नाबालिग हरे भूरे रंग के होते हैं और शरीर पर धारियां होती हैं।

रोकथाम : फसल की कटाई के बाद सारे पौधों को खेत में से हटा दें और अच्छी तरह सफाई कर दें। इसके अंडों को मारने के लिए गर्मियों में खेत की जोताई कर दें। जिससे धूप के कारण अंडे मर जाते हैं। गंभीर हालातों में 400 ग्राम कार्बरिल 50 डब्लयु पी की प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।

थ्रिप्स : 
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यह अक्सर सूखे मौसम में नज़र आती है।

रोकथाम : इसके गंभीर रूप का पता करने के लिए 6-8 नीले नीले चिपकने वाले कार्ड प्रति एकड़ में लगाएं। इसके हमले को कम करने के लिए 5 ग्राम वर्टीसिलियम लैकानी को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

गंभीर हालातों में इमीडाक्लोप्रिड 17.8% एस एल या फिप्रोनिल 1 मि.ली. या फिप्रोनिल 80 प्रतिशत डब्लयु पी 2.5 मि.ली. या एसीफेट 75 प्रतिशत डब्लयु पी 1.0  ग्राम को 100 लीटर पानी के हिसाब से स्प्रे करें| थाइमैथोक्सम 25 प्रतिशत डब्लयु जी 1.0 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

बीमारियां और रोकथाम
सफेद धब्बे : 
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इस बीमारी से पत्ते, तने और फूलों वाले भाग के ऊपर सफेद आटे जैसे धब्बे पड़ जाते हैं यह धब्बे बाद में सलेटी और भूरे रंग के हो जाते हैं और इससे पत्ते के अन्य भाग सूख जाते हैं इस बीमारी का हमला ठंडे तापमान और भारी नमी में बहुत होता है। घनी फसल, कम रोशनी और सूखे मौसम में इस बीमारी का हमला बढ़ जाता है।

बीमारी आने पर 2 ग्राम घुलनशील सल्फर प्रति लीटर पानी में या 200 ग्राम कार्बेनडाज़िम प्रति एकड़ में छिड़काव करें। गंभीर नुकसान होने पर 1 मि.ली. प्रॉपीकोनाज़ोल प्रति लीटर पानी मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से स्प्रे करें।

धारीदार जंग : 
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इस बीमारी को फैलने और हमला करने के लिए 8-13 डिगरी सैल्सियस तापमान चाहिए होता है और विकास के लिए 12-15 डिगरी सैल्सियस तापमान चाहिए और बहुत पानी चाहिए। इस बीमारी से 5 से 30 प्रतिशत तक पैदावार कम हो जाती है। पत्तों पर पीले धब्बे लंबी धारियों के रूप में दिखाई देते हैं जिन पर पीली हल्दीनुमा नज़र आती है।

रोकथाम : 
पीली कुंगी से बचाव के लिए रोग रहित किस्मों की बिजाई करें। मिश्रित खेती और फसली चक्र अपनाएं। ज्यादा मात्रा में नाइट्रोजन का प्रयोग ना करें। लक्षण दिखाई देने पर 35-40 किलो सल्फर प्रति एकड़ में छिड़काव करें या 2 ग्राम मैनकोज़ेब  या  प्रॉपीकोनाज़ोल 25 ई सी 1 मि.ली. को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

झंडा रोग : 
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यह बीज से पैदा होने वाली बीमारी है। यह बीमारी हवा द्वारा फैलती है यह बीमारी ठंडे और नमी वाले मौसम में फूल आने पर पौधे के ऊपर हमला करती है।

रोकथाम : बीज को फंगीनाशी जैसे कि कार्बोक्सिन 75 डब्लयु पी 2.5 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। ज्यादा बीमारी पड़ने पर कार्बेनडाज़िम 2.5 ग्राम, टैबुकोनाज़ोल 1.25 ग्राम से प्रति किलो बीज का उपचार करें। यदि नमी की मात्रा कम हो तो बीजों को टराईकोडरमा विराईड 4 ग्राम और कार्बोक्सिन (विटावैक्स 75 डब्लयु पी) 1.25 ग्राम  से प्रति किलो बीज का उपचार करें।

फसल की कटाई
फसल किस्म के अनुसार मार्च के आखिर और अप्रैल में पक जाती है। फसल को ज्यादा पकने से बचाने के लिए समय के अनुसार कटाई करें। फसल में 25-30 प्रतिशत नमी होने पर फसल की कटाई करें। कटाई के लिए दांतों वाली दरांती का प्रयाग करें। कटाई के बाद बीजों को सूखे स्थान पर स्टोर करें।

कटाई के बाद
जौं सिरका और शराब बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है।

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धान(चावल की उन्नत खेती कैसे करें ?

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धान भारत की एक महत्तवपूर्ण फसल है जो कि जोताई योग्य क्षेत्र के लगभग एक चौथाई हिस्से में उगाई जाती है और भारत की लगभग आधी आबादी इसे मुख्य भोजन के रूप में प्रयोग करती है। यह उत्तर प्रदेश की मुख्य फसल है और उत्तर प्रदेश के लगभग 5.4 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। Basmati, Kalajeera, Vishnu Parag  आदि धान की कुछ उच्च गुणवत्ता वाली किस्में हैं जिनकी खेती उत्तर प्रदेश में की जाती है।

धान (चावल) की फसल को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती हैं. इस कारण इसकी खेती अधिक जल धारण क्षमता वाली मिट्टी में की जाती है. इसकी खेती के लिए ज्यादा तापमान की जरूरत नही होती. धान की खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान भी ज्यादा नही होना चाहिए. धान को खेत में बीज के रूप में ना लगाकर पौध के रूप में लगाया जाता है. धान की खेती अधिक मेहनत वाली फसल है. अगर आप भी धान की खेती करना चाह रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

धान की खेती के लिए चिकनी काली मिट्टी सबसे उपयुक्त होती हैं. क्योंकि चिकनी मिट्टी में जल धारण की क्षमता अधिक होती हैं. इस तरह की मिट्टी में एक बार पानी देने के बाद कई दिनों तक पानी भरा रहता है. भारत में इसकी खेती उत्तर से लेकर दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों में की जा रही है. धान की खेती के लिए जमीन का पी.एच. मान 5.5 से 6.5 तक होना चाहिए. हालांकि इससे कम और ज्यादा पी.एच. वाली जमीनों को उपचारित कर उनमें भी इसकी खेती की जा रही है.

जलवायु और तापमान

धान की खेती के लिए उष्ण और उपोष्ण दोनो जलवायु वाले प्रदेश उपयुक्त होते हैं. भारत में इसकी खेती खरीफ के मौसम में की जाती है. धान की खेती ज्यादातर सिंचित क्षेत्रों में की जाती है. इसकी खेती के लिए ज्यादा बारिश की जरूरत होती है. धान की खेती के लिए 100 मिलीमीटर बारिश का होना जरूरी होता है. कम बारिश होने पर सिंचाई ज्यादा करनी पड़ती है. धान के पौधे के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. लेकिन ये अधिकतम 35 डिग्री तापमान को भी सहन कर लेता है. सामान्य तापमान पर इसका पौधा अच्छी पैदावार देता है, और पौधे की वृद्धि भी अच्छे से होती है.

उन्नत किस्में
धान की कई तरह की किस्में बाज़ार में मौजूद हैं. जिन्हें पकने के समय और भूमि की स्थिति के आधार पर कई प्रजातियों में बाँटा गया है.

शीघ्र पकने वाली प्रजाति

इस प्रजाति की किस्में बहुत जल्द पककर तैयार हो जाती है. इन्हें अगेती किस्म के रूप में उगाया जाता है.

नरेन्द्र-118
धान की इस किस्म को पकने में 85 से 90 दिन का टाइम लगता है. इस किस्म को कम सिंचित जगहों के लिए तैयार किया गया है. इसके दाना लम्बा, पतला और सफ़ेद रंग का होता है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 45 से 50 क्विंटल तक पाया जाता है. इस किस्म के धान से 65 से 70 प्रतिशत तक चावल प्राप्त होता है.

मनहर
धान की इस किस्म के दाने पतले लम्बे और सफ़ेद रंग के होते हैं. जिनसे 70 प्रतिशत तक चावल प्राप्त होते हैं. इस किस्म के पौधे को पककर तैयार होने में लगभग 100 दिन का वक्त लगता है. इस किस्म के पौधों पर झुलसे का रोग नही पाया जाता. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार लगभग 50 क्विंटल तक पाई जाती है.

मालवीय धान – 917
धान की इस किस्म का पौधा 135 दिन में पककर तैयार होता है. इसके दाने छोटे और सुगन्धित होते हैं. इस किस्म को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने तैयार किया है. जिसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 55 से 60 क्विंटल तक पाई जाती है. तेज आंधी और तूफ़ान का इस किस्म पर कोई प्रभाव नही पड़ता.

मध्यम समय में पकने वाली प्रजाति
इस प्रजाति की किस्में पकने में जल्दी पकने वाली किस्मों से थोड़ा ज्यादा टाइम लेती हैं. लेकिन इनकी पैदावार ज्यादा पाई जाती है.

नरेन्द्र-359
इस किस्म के पौधों को झुलसे का रोग नही लगता. इसके पौधे के सभी कल्लों में बाली खासतौर से निकलती हैं. इस किस्म के पौधे 130 से 135 दिन में पककर तैयार हो जाते हैं. जिनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 60 से 65 क्विंटल तक पाई जाती है. धान की इस किस्म से 72 प्रतिशत तक चावल प्राप्त होते हैं. जिनका आकार बड़ा, मोटा और रंग हल्का सफ़ेद होता है.

सीता
इस किस्म का धान लगभग 130 दिन में पककर तैयार हो जाता है. जो मध्यम आकार का होता है. इसका रंग सफ़ेद होता है. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार लगभग 50 क्विंटल पाई जाती है.

मालवीय धान-1
इस किस्म के धान को पकने में लगभग 125 दिन का वक्त लगता है. इसके दाने पतले और सफ़ेद होते हैं. जिनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 55 से 60 क्विंटल तक पाई जाती है. इस किस्म के धान से 70 प्रतिशत तक चावल प्राप्त होते हैं.

सूरज-52
धान की इस किस्म को झुलसा रोग नही लगता. इस किस्म के धान से 70 प्रतिशत चावल प्राप्त किये जा सकते हैं. इसके पौधे को पककर तैयार होने में लगभग 135 दिन का वक्त लगता है. इसके दाने लम्बे और मध्यम मोटाई वाला होता है. इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 60 क्विंटल के आसपास रहती है.

देर से पकने वाली प्रजाति
इस प्रजाति की किस्में ज्यादा समय में पककर तैयार होती है. और इनकी उपज भी सामान्य पाई जाती है.

महसूरी
इस किस्म के पौधों को पककर तैयार होने में लगभग 150 दिन का वक्त लगता है. इस किस्म के धान का दाना मध्यम आकार और हल्का सफ़ेद होता है. इस किस्म को 30 सेंटीमीटर गहरे पानी में भी उगाया जा सकता है. इसकी प्रति हेक्टेयर पैदावार लगभग 30 से 40 क्विंटल तक पाई जाती है. जिससे 70 प्रतिशत तक चावल प्राप्त होते हैं.

साम्बा महसूरी
धान की इस किस्म को पककर तैयार होने में 155 दिन का वक्त लग जाता है. इस किस्म के पौधे बौने आकार के होते हैं. जिनसे एक हेक्टेयर में 60 क्विंटल तक धान प्राप्त हो जाता है. जिनमें चावल की मात्रा 70 प्रतिशत तक पाई जाती है. इस किस्म के चावलों का आकर छोटा, पतला और रंग सफ़ेद होता है.

सुगंधित धान प्रजाति
इस प्रजाति की किस्मों को संकर किस्म के नाम से भी जाना जाता है. इस किस्म को जल्दी और अधिक पैदावार के लिए तैयार किया गया है.

कस्तूरी
धान की इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 40 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इसके पौधे लगभग 125 दिन में पककर तैयार हो जाते हैं. इस किस्म के पौधों को झुलसा और झोंका रोग नही लगता. धान की इस किस्म से 65 प्रतिशत तक चावल प्राप्त होते हैं. जो आकार में पतले और लम्बे पाए जाते हैं. इनका रंग सफ़ेद होता है.

हरियाणा बासमती-1
इस किस्म के पौधे 140 दिन में पककर तैयार हो जाते हैं. जिनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 45 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. धान की इस किस्म से 65 से 70 प्रतिशत तक चावल प्राप्त किये जा सकते हैं. जिनका आकार पतला लम्बा होता है. इस किस्म के धान पर हरे फुदके का रोग नही लगता.

तरावड़ी बासमती
इस किस्म के पौधा 140 से 150 दिन में पककर तैयार हो जाते हैं. इनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 30 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. इस किस्म पर कई तरह के कीट और बिमारिय रोग नही लगते. इस किस्म के धान से 68 प्रतिशत तक चावल प्राप्त किये जा सकते है, जो पतले लम्बे और सुगन्धित होते हैं.

पूसा आर एच-10
इस किस्म को पूरे विश्व की पहली संकर किस्म माना जाता है. इस किस्म के धान का दाना अत्यधिक सुगंधित, लंबा और पतला होता है. इस किस्म को तैयार होने में लगभग 120 दिन का वक्त लगता है. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 65 क्विंटल के आसपास पाई जाती है.

ऊसरीली धान प्रजाति
इस प्रजाति की किस्मों को बंज़र उसरीली भूमि में अधिक और जल्द पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है. इस किस्म के पौधों को कम पानी की जरूरत होती है.

नरेन्द्र ऊसर – 2 और 3
धान की इस किस्म को पककर तैयार होने में लगभग 130 दिन का वक्त लगता है. इस किस्म के पौधों से प्रति हेक्टेयर 50 क्विंटल की उपज प्राप्त की जा सकती है. इस किस्म के धान से 62 प्रतिशत तक दाने प्राप्त होते हैं. जिनका रंग हल्का सफ़ेद और आकर में लम्बे और गोल पाए जाते हैं. इस किस्म के पौधे पर भूरा धब्बा और झुलसा रोग नही पाया जाता.

सी०एस आर०-13
धान की इस किस्म को पककर तैयार होने में लगभग 120 दिन का वक्त लगता है. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 50 से 60 क्विंटल तक पाई जाती है. इस किस्म के धान से 60 प्रतिशत तक दाने प्राप्त किये जा सकते हैं. जो आकार में पतले और लम्बे होते हैं. इनका रंग सफ़ेद पाया जाता है.

ऊसर धान-1
धान की ये किस्म 140 से 150 दिन में पककर तैयार होती है. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 45 से 50 क्विंटल तक पाई जाती है. धान की इस किस्म से 65 प्रतिशत तक दाने प्राप्त किये जा सकते हैं. इसके दाने छोटे, मोटे और सफ़ेद रंग के होते हैं.

बाढ़ग्रस्त क्षेत्र के लिए
धान की इस प्रजाति की किस्मों को बारिश के वक्त ज्यादा बाढ़ आने वाले क्षेत्रों के लिए तैयार किया गया हैं. इसके पौधों को ज्यादा पानी की जरूरत होती है.

स्वर्णा सव-1
धान की इस किस्म को पककर तैयार होने ने में 140 से 150 दिन का वक्त लगता है. इस किस्म की प्रति हेक्टेयर पैदावार 40 क्विंटल के आसपास पाई जाती है. धान की इस किस्म से 75 प्रतिशत तक दाने प्राप्त किये जा सकते हैं. इसके दाने छोटे पतले और सफ़ेद रंग के होते हैं.

जल निधि
धान की इस किस्म का पौधा काफी लम्बा होता है. जो पानी में कमल की तरह बढ़ता है. जिन पर कई तरह के रोग भी नही लगते. इस किस्म के पौधे पककर तैयार होने में 180 दिन का वक्त लेते हैं. धान की इस किस्म से 65 से 70 प्रतिशत तक दाने प्राप्त किये जा सकते हैं. इसका दाना सुडौल, हल्का और चटपटा होता है. जो हल्की लालिमा लिए होता है.

मधुकर
धान की इस किस्म को सामयिक बाढ़ वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है. इस किस्म के पौधे 150 दिन में पककर तैयार हो जाते हैं. इनकी प्रति हेक्टेयर पैदावार 30 से 40 क्विंटल तक पाई जाती है. जिनसे 65 प्रतिशत तक दाने प्राप्त किये जाते हैं. इसके दाने छोटे, मोटे और सफ़ेद रंग के होते हैं.

खेत की जुताई
धान की खेती के लिए शुरुआता में खेत की दो से तीन गहरी जुताई कर मेडबन्दी कर दे. खेत की ये तैयारी बारिश के मौसम से पहले करें जिससे खेत में बारिश का पानी भर जाए. अगर बारिश ना हो तो खेत में पानी भर देना चाहिए. उसके बाद पानी भरी जमीन में मिट्टी पलटने वाले हल से दो से तीन अच्छी जुताई करनी चाहिए. इससे मिट्टी में कीच बन जाता है. जिसमें धान की रोपाई की जाती है.

नर्सरी तैयार करना
धान के बीज को सीधा खेत में नही उगाया जाता. बीज को पहले नर्सरी में तैयार किया जाता है. उसके बाद उसकी पौध को खेत में लगाते हैं. बीज को नर्सरी में उगाने से पहले उसे स्ट्रेप्टोमाइसिन सल्फेट या प्लान्टो माइसिन के घोल में एक रात के लिए डुबो दें. जिससे पौधे में झुलसा की बिमारी नही होती है. और यदि झुलसा की समस्या क्षेत्र में नही हो तो बीज को कार्बेन्डाजिम या थिरम से उपचारित कर बोना चाहिए.

बीज को नर्सरी में उगाने से पहले पानी में एक रात भिगोना चाहिए. इससे बीज में अंकुर निकल आते हैं. अंकुर निकले बीज को क्यारियों में छिड़क देते हैं. बीज को क्यारियों में उगाने के 10 दिन बाद उसमें ट्राइकोडर्मा का छिडकाव कर दें. और खैरा रोग से बचाव के लिए 15 दिन बाद जिंक सल्फेट और बुझे हुए चूने को उचित मात्रा को क्यारियों में छिड़क दें.

धान के बीज को पानी की ज्यादा जरूरत होती है. इसलिए क्यारियों में पानी की मात्रा उचित बनाएं रखे. धान का बीज लगभग एक से डेढ़ महीने में तैयार हो जाता है. उसके बाद इसे क्यारियों से निकालकर खेतों में लगा देते हैं. लेकिन पौधे को क्यारी से निकालने से पहले क्यारी को पानी से भर देना चाहिए ताकि पौधे को निकालने में आसानी रहे, और पौध खराब ना हो.

पौध की रोपाई का तरीका और टाइम
धान के पौधे की रोपाई किसान भाई हाथ और मशीन दोनों से करते है. लेकिन वर्तमान में मेडागास्कर विधि का उपयोग सबसे ज्यादा किया जा रहा है. इस विधि में हाथ से धान की पौध को खेत में लगाया जाता है. इस विधि को श्री पद्धति के नाम से भी जाना जाता है. इस विधि में धान को 15 सेंटीमीटर की दूरी पर पंक्तियों में लगाते है. दो पंक्तियों के बीच भी 15 सेंटीमीटर की दूरी रखते हैं. एक जगह पर धान के दो से तीन पौधे एक साथ लगाते हैं. इस विधि से धान की उपज ज्यादा होती हैं. साधारण तरीके में धान को 10 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाया जाता है. जिससे पौध भी ज्यादा लगती और पैदावार भी सामान्य रहती है.

धान की बुवाई मानसून आने से लगभग एक सप्ताह पहले कर देनी चाहिए. क्योंकि मानसून आने तक पौधा अच्छे से अंकुरित हो जाता है. जिससे मानसून में खेत में ज्यादा पानी भर जाने के बाद भी पौध अच्छे से विकास कर लेती है. धान की रोपाई के लिए जून का महीना सबसे उपयुक्त होता है.

पौधे की सिंचाई
धान के पौधे को पानी की ज्यादा जरूरत होती है. इस कारण इसके पौधे की उचित समय पर सिंचाई करते रहना चाहिए. धान की सिचाई के वक्त पौधों की कुछ ऐसी अवस्थाएं आती है, जब पौधे को पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. पौधे को खेत में लगाने के बाद कल्ले फूटने, बाली निकलने, फूल खिलने और बालियों में दाना भरते समय खेत में पानी भरा रहना चाहिए. क्योंकि इन वक्त पर अगर खेत में पानी नही भरा रहेगा तो पौधा ना तो अच्छे से विकास करेगा और ना ही पैदावार अच्छी होगी.

धान के पौधे को लगभग 15 से 20 सिंचाई की जरूरत होती है. जब भी खेत में पानी दिखाई देना बंद हो जाए और ऊपरी जमीन सूखने लगे तभी पौधों को पानी दे देना चाहिए.

उर्वरक की मात्रा
धान के पौधों को उर्वरक की ज्यादा जरूरत होती है. इसके लिए जुताई के वक्त खेत में लगभग 12 गाडी गोबर की खाद प्रति एकड़ के हिसाब से डालनी चाहिए. खाद को खेत में डालकर उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. इसके अलावा प्रति हेक्टेयर 25 से 30 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस और 40 किलो पोटाश की मात्रा को खेत में धान की रोपाई से पहले की जाने वाली आखिरी जुताई के वक्त डालनी चाहिए. उसके बाद 30 से 40 किलो नाइट्रोजन कल्ले बनते वक्त पौधों की सिंचाई के साथ दें. और लगभग 20 किलो नाइट्रोजन बाली में बीज बनने से पहले पौधों को देनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण
धान की फसल में खरपतवार ज्यादा नुक्सान पहुँचाती है. धान के पौधों में खरपतवार नियंत्रण नीलाई गुड़ाई और रासायनिक दोनों तरीके से की जा सकती है. साधारण प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए खेत में नीलाई गुड़ाई कर खरपतवार निकाल देनी चाहिए.

धान की रोपाई के लगभग 20 से 25 दिन बाद उसकी पहली नीलाई गुड़ाई कर देनी चाहिए. उसके बाद दूसरी गुड़ाई पहली गुड़ाई के लगभग 20 दिन बाद कर देनी चाहिए. इस तरह धान की दो से तीन गुड़ाई करना अच्छा होता है. क्योंकि धान के पौधे की दो से तीन गुड़ाई करने पर जमीन से कल्ले अधिक मात्रा में निकलते है. जिससे पैदावार भी अधिक मिलती है.

पौधे की देखभाल-
हानिकारक कीट और रोकथाम
जड़ की सुंडी : 
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जड़ को लगने वाली सुंडी की पहचान बूटों की जड़ और पत्तों को पहुंचे नुकसान से लगाई जा सकती है। यह सफेद रंग की बिना टांगों वाली होती है। यह मुख्य तौर पर पौधे की जड़ पर ही हमला करती है। इसके हमले के बाद पौधे पीले होने शुरू होने लगते है और उनका विकास रूक जाता है। इस कारण धान के पत्तों के ऊपर दानों के निशान उभर आते हैं।

इसका हमला दिखने पर कार्बरिल (4 जी) @ 10 किलो या फोरेट (10 जी) @4 किलो  या कार्बोफियूरॉन (3 जी) @10 किलो को प्रति एकड़ में डालें।

पौधे का टिड्डा : 
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इन कीटों का फसल के ऊपर हमला खड़े पानी वाले या वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में ज्यादा होता है। इनकी मौजूदगी का अंदाजा बूटों के ऊपर भूरे रंग में तबदील होने और पौधों की जड़ों के नजदीक शहद जैसी बूंदों की मौजूदगी से लगता है।

यदि इसका हमला दिखे तो डाइक्लोरवॉस 126 मि.ली. या कार्बरील 400 ग्राम को 250 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें या इमीडाक्लोप्रिड 40 मि.ली. या क्विनलफॉस 25 ई सी 400 मि.ली. या क्लोरपाइरीफॉस 1 लीटर को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में छिड़काव करें।

पत्ता लपेट सुंडी : 
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इन बीमारियों के कीटाणुओं का फसल के ऊपर उच्च नमी वाले क्षेत्रों में और खास तौर पर जिन इलाकों में धान की पैदावार लगातार की जा रही हो वहां ज्यादा देखने को मिलती है। इस कीटाणु का लार्वा पत्तों को लपेट देता है और बूटे के तंतुओं को खा जाता है। इसके हमले के बाद पत्तों में सफेद धारियां बन जाती हैं।

यदि इसके हमले के लक्षण दिखाई दे तो फसल के ऊपर कारटाईप हाइड्रोक्लोराइड 170 ग्राम या टराईज़ोफॉस 350 मि.ली.या एक लीटर क्लोरपाइरीफॉस को 100 लीटर पानी में मिला के प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।

राइस हिस्पा : 
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कुछ जिलों में धान की फसल पर इस कीट के हमले के ज्यादा केस सामने आते हैं। इस कीट का लार्वा पत्तों में छेद करके पत्तों को नष्ट कर देता है। इसके हमले के बाद पत्तों पर सफेद धारियां उभर आती हैं।

इसका हमला दिखाई देने पर फसल के ऊपर 120 मि.ली. पैराथियान या क्विनलफॉस 25 ई.सी. 400 मि.ली. या क्लोरपाइरीफॉस एक लीटर को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।

तना छेदक : 
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इस कीटाणु का लार्वा धान के पौधे की बन रही बालियों में प्रवेश करके उसको खा जाता है, जिससे बालियां धीरे धीरे सूख कर खाली हो जाती है जो बाद में सफेद रंग में तबदील हो जाती हैं।

यदि इसके हमले के लक्षण दिखाई दे तो फसल के ऊपर कार्टाइप हाइड्रोक्लोराईड 170 ग्राम या टराईजोफॉस 350 मि.ली. या एक लीटर कलोरपाइरीफॉस को 100 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए।

बीमारियां और रोकथाम 
भुरड़ रोग :
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झुलस रोग के कारण पत्तों के ऊपर तिरछे धब्बे जो कि अंदर से सलेटी रंग और बाहर से भूरे रंग के दिखाई देते हैं। इससे फसल की बालियां गल जाती हैं और उसके दाने गिरने शुरू हो जाते हैं। जिन क्षेत्रों में नाइट्रोजन का बहुत ज्यादा प्रयोग किया जाता है। वहां इस बीमारी का प्रभाव ज्यादा देखने को मिलता है।

इसका हमला दिखने पर ज़िनेब 500 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें।

करनाल बंट : 
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लाग की शुरूआत पहले बालियों के कुछ दानों पर होती है और इससे ग्रसित दाने बाद में काले रंग का चूरा बन जाते हैं। हालत ज्यादा खराब होने की सूरत में पूरे का पूरा सिट्टा प्रभावित होता है। और सारा सिट्टा खराब होकर काला चूरा बनके पत्ते दानों पर गिरना शुरू हो जाते है।

इस बीमारी की रोकथाम के लिए नाइट्रोजन की ज्यादा प्रयोग करने से परहेज़ करना चाहिए। जब फसल पर 10 प्रतिशत बालिया निकल जायें तब टिल्ट 25 ई सी 200 मि.ली. को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 10 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।

भूरे रंग के धब्बे : 
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पत्तों के भूरेपन के लक्षण की पहचान पत्तों के ऊपर अंदर से गहरे भूरे रंग और बाहरे से हल्के भूरे रंग के अंडाकार या लंबाकार धब्बों से होती है। यह धब्बे दानों के ऊपर भी पड़ जाते हैं। जिस मिट्टी में पौष्टिक तत्वों की कमी पाई जाती है। वहां इस बीमारी का हमला ज्यादा देखने को मिलता है।

इस बीमारी की रोकथाम के लिए सही मात्रा में मिट्टी में पौष्टिक तत्व डालते रहने चाहिए। जब बालियां बननी शुरू हो जाए उस समय 200 मि.ली. टैबूकोनाज़ोल या 200 मि.ली. प्रोपीकोनाज़ोल को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।

झूठी कांगियारी -
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इस रोग के कारण फफूंद की तरह हर दाने के ऊपर हरे रंग की परत जम जाती है। उच्च नमी, ज्यादा वर्षा और बादलवाई हालातों में यह बीमारी के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। नाइट्रोजन के ज्यादा प्रयोग से भी इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।

इसकी रोकथाम के लिए जब बालियां बननी शुरू हो जाये उस समय 500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें। 10 दिनों के अंतराल पर टिल्ट 25 ई सी 200 मि.ली. को 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

तने का झुलस रोग: 
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पत्तों की परत के ऊपर सलेटी रंग के जामुनी रंग की धारी वाले धब्बे पड़ जाते हैं। बाद में यह धब्बे बड़े हो जाते हैं। इस बीमारी का हमला ज्यादा हो तो फसल में ज्यादा दाना नहीं पड़ता। नाइट्रोजन का ज्यादा प्रयोग नहीं करना चाहिए। खेत का साफ सुथरा रखें।

यदि इसका हमला दिखे तो टैबुकोनाज़ोल या टिल्ट 25 ई सी 200 मि.ली. या कार्बेनडाज़िम 25 प्रतिशत 200 ग्राम को 200 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ में स्प्रे करें। 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा स्प्रे करें।

धान की कटाई और मड़ाई
धान का पौधा 100 से 150 दिन में पककर तैयार हो जाता है. प्रत्येक पौधे पर बाली निकलने के एक महीने बाद पौधा कटाई के लिए तैयार हो जाता है. इस दौरान पौधा पीला दिखाई देने लगता है. जब धान के बीज में 20 प्रतिशत नमी रहा जाएँ तब उन्हें काट लेना चाहिए.

काटने के बाद इसकी पुलियों को कुछ दिन धूप में सूखाने के बाद उनकी मड़ाई मशीन के माध्यम से की जाती है. इससे बनने वाले भूषे का इस्तेमाल पशुओं के खाने में किया जाता है. जबकि कुछ छोटे किसान भाई इसकी मड़ाई हाथों से ड्रम के माध्यम से करते हैं. इसकी भूसी का इस्तेमाल कई चीजों के परिवहन के दौरान टूटने और ख़राब होने से बचाने के लिए भी किया जाता है.

पैदावार और लाभ
धान की अलग अलग किस्मों की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार 50 से 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पाई जाती है. और धान का बाज़ार भाव चार हज़ार प्रति क्विंटल के आसपास पाया जाता है. जिससे किसान भाई एक बार में दो से तीन लाख तक की कमाई कर सकते हैं.

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