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सगोत्र विवाह क्यों वर्जित है ?

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श्रीमती जी ने, "सात जन्मों के बन्धन" के वैदिक विधान पर व्यंग किया,  तो उनको इस सात जन्मों के बन्धन का वैदिक तथा #वैज्ञानिक  तात्पर्य समझाया।  

 " पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नहीं होता "  अर्थात वीवाहोपरांत  कन्या  अपने पति के गोत्र को स्वीकारती है, इस विषय को क्रमशः समझा जाए,  तो हमे " गोत्र विज्ञान " को भली प्रकार समझना पड़ेगा। 
 ध्यान दीजिए, स्त्री में "xx  गुणसूत्र "  होते है,  और  पुरुष में " xy "  होते है। 
   
अब इनकी सन्तति जो उत्पन्न होगी वो,....  मान लीजए की  पुत्र हुआ,  अर्थात xy गुणसूत्र उत्पन्न हुआ, तो इस पुत्र में,  y  गुणसूत्र पिता से आया,  और x गुणसूत्र माता से।  अब, यदि  पुत्री हुई होती तो ( xx गुणसूत्र ) होते तो यह गुणसूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों  से आते। 

 जैसे :--   xx गुणसूत्र  
 xx  गुणसूत्र   अर्थात पुत्री  ! 
 ( इस xx  गुणसूत्र के जोड़े में,  एक x गुणसूत्र पिता से आया तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आया है। )   इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है। 

अब  xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र ! 
पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्यूँकी माता में y गुणसूत्र है ही नही, और दोनों गुणसूत्र अ-समान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता, केवल 5 % तक ही होता है, और 95 % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है। 

तो,  महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ !
जो कि पिता से ही आता है।  चूँकि  y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है, कि यह " पुत्र " में केवल पिता से ही आया है। बस , इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है,....   जो, हजारों..   लाखों ...  वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था।
 
वैदिक गोत्र प्रणाली, गुणसूत्र पर आधारित है,। या "y"  गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है।     
    
उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है,  तो उस व्यक्ति में विधमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है! या  कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल है!

चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नही होता यही कारण है की विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है।  वैदिक - हिन्दू संस्कृति में  एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण भी यही  है !! 
 
 एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व् स्त्री भाई बहन माने जाते हैं,   
अर्थात "सगोत्री" स्त्री पुरुष भाई बहन ही होंगे !!    "इसका एक मुख्य कारण एक ही गोत्र होने के कारन गुणसूत्रों में समानता का है"  

आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार,  यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो, तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों के साथ उत्पन्न होगी !!  ऐसे दंपत्तियों की संतान में किसी ना किसी प्रकार का अनुवांशिक दोष रहेगा। 

 विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है, कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष, जैसे , मानसिक_विकलांगता,  #अपंगता, जैसे और भी कई गंभीर रोग, जन्मजात ही पाए जाते हैं !  

शास्त्रों के अनुसार, इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर  प्रतिबंध लगाया गया था।  गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार,  पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके,  इसलिये , विवाह से पहले  #कन्यादान कराया जाता है ,  और " गोत्र मुक्त "  कन्या का  " पाणिग्रहण"  कर के भावी वर, उसे   अपने कुल गोत्र में, स्थान देता है।  अब इनसे उत्पन्न संतति, यदि पुत्र है, तो, 95%  पिता  और  5% माता का सम्मिलन है !   यदि  पुत्री है,  तो 50% पिता,  और  50% माता,  का सम्मिलन है !  अब फिर, यदि पुत्री की पुत्री हुई,  तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा,  फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% DNA रह जायेगा,  इस तरह से सातवीं पीढ़ी में पुत्री जन्म में यह %, घटकर 1%  रह जायेगा। अर्थात,  एक पति-पत्नी का ही DNA सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है, पुत्री के रूप में,   और यही " सात जन्मों का साथ " है। 
 

 प्रश्न :  जब पुत्र होता है तब ? 

तो पुत्र का गुणसूत्र, पिता के गुणसूत्रों का, 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है, और माता का 5%  (जो कि कई परिस्थितियों में "१%"  से कम भी हो सकता है)   DNA ग्रहण करता है,  और यही क्रम अनवरत चलता रहता है,  जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त, DNA बारम्बार जन्म लेता रहता हैं,  अर्थात यह 

 " जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता" है।
( " कन्यादान" का अर्थ किसी वस्तु का भौतिक रूप से दान करना नहीं वरन् ,  इस दान का विधान इस निमित किया गया है , कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये, और उस कुल की "कुल धात्री" बनने के लिये,  उसे गोत्र मुक्त किया गया है। 

DNA मुक्त नहीं ! क्योंकि भौतिक शरीर में, वे DNA  तो रहेंगे ही,  इसलिये "मायका"  अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है,  गोत्र यानी "पिता" के गोत्र का त्याग किया जाता है।)      तभी वह भावी वर को यह वचन देती है कि उसके कुल की मर्यादा का पालन करेगी,  यानी उसके गोत्र और DNA को करप्ट नहीं होने देगी !  क्योंकि कन्या, विवाह के बाद पति के कुल वंश को रजदान करती है,  यह    "रजदान" भी कन्यादान के समकक्ष  दान माना गया है जो पति को किया जाता है। 




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समयसूचक AM और PM का उदगम का वास्तविक इतिहास

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भारत ही था। पर हमें बचपन से यह रटवाया गया, विश्वास दिलवाया गया कि इन दो शब्दों AM और PM का मतलब होता है :

AM : एंटी मेरिडियन (ante meridian)

PM : पोस्ट मेरिडियन (post meridian)

एंटी यानि पहले, लेकिन किसके? 

पोस्ट यानि बाद में, लेकिन किसके?

यह कभी साफ नहीं किया गया, क्योंकि यह चुराये गये शब्द का लघुतम रूप था।

अध्ययन करने से ज्ञात हुआ और हमारी प्राचीन संस्कृत भाषा ने इस संशय को अपनी आंधियों में उड़ा दिया और अब, सब कुछ साफ-साफ दृष्टिगत है।

कैसे? 

देखिये...

AM = आरोहनम् मार्तण्डस्य Aarohanam Martandasya

PM = पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasya

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सूर्य, जो कि हर आकाशीय गणना का मूल है, उसीको गौण कर दिया। अंग्रेजी के ये शब्द संस्कृत के उस 'मतलब' को नहीं इंगित करते जो कि वास्तव में है। 

आरोहणम् मार्तण्डस्य Arohanam Martandasaya यानि सूर्य का आरोहण (चढ़ाव)।

पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasaya यानि सूर्य का ढलाव।

दिन के बारह बजे के पहले सूर्य चढ़ता रहता है - 'आरोहनम मार्तण्डस्य' (AM)।

बारह के बाद सूर्य का अवसान/ ढलाव होता है - 'पतनम मार्तण्डस्य' (PM)।

पश्चिम के प्रभाव में रमे हुए और पश्चिमी शिक्षा पाए कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि समस्त वैज्ञानिकता पश्चिम जगत की देन है।


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प्राचीन समय भारत मे कभी छुआछुत रहा ही नहीं, और ना ही कभी जातियाँ भेदभाव का कारण होती थी

 

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चलिए हजारो साल पुराना इतिहास पढ़ते हैं। 

सम्राट शांतनु ने विवाह किया एक मछवारे की पुत्री सत्यवती से।उनका बेटा ही राजा बने इसलिए भीष्म ने विवाह न करके,आजीवन संतानहीन रहने की भीष्म प्रतिज्ञा की।

सत्यवती के बेटे बाद में क्षत्रिय बन गए, जिनके लिए भीष्म आजीवन अविवाहित रहे, क्या उनका शोषण होता होगा?

महाभारत लिखने वाले वेद व्यास भी मछवारे थे, पर महर्षि बन गए, गुरुकुल चलाते थे वो।

विदुर, जिन्हें महा पंडित कहा जाता है वो एक दासी के पुत्र थे, हस्तिनापुर के महामंत्री बने, उनकी लिखी हुई विदुर नीति, राजनीति का एक महाग्रन्थ है।

भीम ने वनवासी हिडिम्बा से विवाह किया।

श्री कृष्ण दूध का व्यवसाय करने वालों के परिवार से थे, 

उनके भाई बलराम खेती करते थे, हमेशा हल साथ रखते थे।

यादव क्षत्रिय रहे हैं, कई प्रान्तों पर शासन किया और श्री कृष्ण सबके पूजनीय हैं, गीता जैसा ग्रन्थ विश्व को दिया।

राम के साथ वनवासी निषादराज गुरुकुल में पढ़ते थे।

उनके पुत्र लव कुश महर्षि वाल्मीकि के गुरुकुल में पढ़े जो वनवासी थे

तो ये हो गयी वैदिक काल की बात, स्पष्ट है कोई किसी का शोषण नहीं करता था,सबको शिक्षा का अधिकार था, कोई भी पद तक पहुंच सकता था अपनी योग्यता के अनुसार।

वर्ण सिर्फ काम के आधार पर थे वो बदले जा सकते थे, जिसको आज इकोनॉमिक्स में डिवीज़न ऑफ़ लेबर कहते हैं वो ही।

प्राचीन भारत की बात करें, तो भारत के सबसे बड़े जनपद मगध पर जिस नन्द वंश का राज रहा वो जाति से नाई थे । 

नन्द वंश की शुरुवात महापद्मनंद ने की थी जो की राजा नाई थे। बाद में वो राजा बन गए फिर उनके बेटे भी, बाद में सभी क्षत्रिय ही कहलाये।

उसके बाद मौर्य वंश का पूरे देश पर राज हुआ, जिसकी शुरुआत चन्द्रगुप्त से हुई,जो कि एक मोर पालने वाले परिवार से थे और एक ब्राह्मण चाणक्य ने उन्हें पूरे देश का सम्राट बनाया । 506 साल देश पर मौर्यों का राज रहा।

फिर गुप्त वंश का राज हुआ, जो कि घोड़े का अस्तबल चलाते थे और घोड़ों का व्यापार करते थे।140 साल देश पर गुप्ताओं का राज रहा।

केवल पुष्यमित्र शुंग के 36 साल के राज को छोड़ कर 92% समय प्राचीन काल में देश में शासन उन्ही का  रहा, जिन्हें आज दलित पिछड़ा कहते हैं तो शोषण कहां से हो गया? यहां भी कोई शोषण वाली बात नहीं है।

फिर शुरू होता है मध्यकालीन भारत का समय जो सन 1100- 1750 तक है, इस दौरान अधिकतर समय, अधिकतर जगह मुस्लिम आक्रमणकारियो का समय रहा और कुछ स्थानों पर उनका शासन भी चला।

अंत में मराठों का उदय हुआ, बाजी राव पेशवा जो कि ब्राह्मण थे, ने गाय चराने वाले गायकवाड़ को गुजरात का राजा बनाया, चरवाहा जाति के होलकर को मालवा का राजा बनाया।

अहिल्या बाई होलकर खुद बहुत बड़ी शिवभक्त थी। ढेरों मंदिर गुरुकुल उन्होंने बनवाये। 

मीरा बाई जो कि राजपूत थी, उनके गुरु एक चर्मकार रविदास थे और रविदास के गुरु ब्राह्मण रामानंद थे|।

यहां भी शोषण वाली बात कहीं नहीं है।

मुग़ल काल से देश में गंदगी शुरू हो गई और यहां से पर्दा प्रथा, गुलाम प्रथा, बाल विवाह जैसी चीजें शुरू होती हैं।

1800 -1947 तक अंग्रेजो के शासन रहा और यहीं से जातिवाद शुरू हुआ । जो उन्होंने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत किया। 

अंग्रेज अधिकारी निकोलस डार्क की किताब "कास्ट ऑफ़ माइंड" में मिल जाएगा कि कैसे अंग्रेजों ने जातिवाद, छुआछूत को बढ़ाया और कैसे स्वार्थी भारतीय नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसका राजनीतिकरण किया।

इन हजारों सालों के इतिहास में देश में कई विदेशी आये जिन्होंने भारत की सामाजिक स्थिति पर किताबें लिखी हैं, जैसे कि मेगास्थनीज ने इंडिका लिखी, फाहियान,  ह्यू सांग और अलबरूनी जैसे कई। किसी ने भी नहीं लिखा की यहां किसी का शोषण होता था।

योगी आदित्यनाथ जो ब्राह्मण नहीं हैं, गोरखपुर मंदिर के महंत  हैं, पिछड़ी जाति की उमा भारती महा मंडलेश्वर रही हैं। जन्म आधारित जाति को छुआछुत व्यवस्था हिन्दुओ को कमजोर करने के लिए लाई गई थी।

इसलिए भारतीय होने पर गर्व करें और घृणा, द्वेष और भेदभाव के षड्यंत्रों से खुद भी बचें और औरों को भी बचाएं।


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इस प्रहर में नहीं करना चाहिए यह काम ?

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सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है।'

हिन्दू धर्म में समय की बहुत ही वृहत्तर धारणा है। आमतौर पर वर्तमान में सेकंड, मिनट, घंटे, दिन-रात, माह, वर्ष, दशक और शताब्दी तक की ही प्रचलित धारणा है, लेकिन हिन्दू धर्म में एक अणु, तृसरेणु, त्रुटि, वेध, लावा, निमेष, क्षण, काष्‍ठा, लघु, दंड, मुहूर्त, प्रहर या याम, दिवस, पक्ष, माह, ऋतु, अयन, वर्ष (वर्ष के पांच भेद- संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर, अनुवत्सर, युगवत्सर), दिव्य वर्ष, युग, महायुग, मन्वंतर, कल्प, अंत में दो कल्प मिलाकर ब्रह्मा का एक दिन और रात, तक की वृहत्तर समय पद्धति निर्धारित है। हिन्दू धर्म अनुसार सभी लोकों का समय अलग अलग है। हम यहां जानकारी दे रहे हैं प्रहर की।

दिन और रात के 24 घंटे में ज्योतिष मान्यता अनुसार 8 प्रहर होते है जबकि व्यक्ति और प्रकृति में परिवर्तन होते रहते हैं। औसतन एक प्रहर तीन घंटे या साढ़े सात घटी का होता है जिसमें दो मुहूर्त होते हैं। एक प्रहर एक घटी 24 मिनट की होती है। दिन के चार और रात के चार मिलाकर कुल आठ प्रहर। किस प्रहर में कौन सा कार्य वर्जित माना गया है यह जानना जरूरी है ताकि कुछ बुरा होने से बचा जा सके।

आठ प्रहर के नाम :

दिन के चार प्रहर- 1.पूर्वान्ह, 2.मध्यान्ह, 3.अपरान्ह और 4.सायंकाल।

रात के चार प्रहर- 5.प्रदोष, 6.निशिथ, 7.त्रियामा एवं 8.उषा।

'संध्यावंदन : 

संध्यावंदन मुख्‍यत: दो प्रकार के प्रहर में की जाती है:- पूर्वान्ह और उषा काल। संध्या उसे कहते हैं जहां दिन और रात का मिलन होता हो। संध्यकाल में ही प्रार्थना या पूजा-आरती की जाती है ,यही नियम है। दिन और रात के 12 से 4 बजे के बीच प्रार्थना या आरती वर्जित मानी गई है। 

 

आठ प्रहर : 

एक प्रहर तीन घंटे का होता है। सूर्योदय के समय दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है जिसे पूर्वान्ह कहा जाता है। दिन का दूसरा प्रहर जब सूरज सिर पर आ जाता है तब तक रहता है जिसे मध्याह्न कहते हैं।

इसके बाद अपरान्ह (दोपहर बाद) का समय शुरू होता है, जो लगभग 4 बजे तक चलता है। 4 बजे बाद दिन अस्त तक सायंकाल चलता है। फिर क्रमश: प्रदोष, निशिथ एवं उषा काल। सायंकाल के बाद ही प्रार्थना करना चाहिए।


अष्टयाम : 

वैष्णव मन्दिरों में आठ प्रहर की सेवा-पूजा का विधान 'अष्टयाम' कहा जाता है। वल्लभ सम्प्रदाय में मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या-आरती तथा शयन के नाम से ये कीर्तन-सेवाएं हैं। अष्टयाम हिन्दी का अपना विशिष्ट काव्य-रूप जो रीतिकाल में विशेष विकसित हुआ। इसमें कथा-प्रबन्ध नहीं होता परंतु कृष्ण या नायक की दिन-रात की चर्या-विधि का सरस वर्णन होता है। यह नियम मध्यकाल में विकसित हुआ जिसका शास्त्र से कोई संबंध नहीं।

सुबह का प्रथम प्रहर

सूर्योदय के समय दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है जिसे पूर्वान्ह कहा जाता है। पंचम प्रहर को दिन का प्रथम प्रहर भी कहते हैं। इसका समय सुबह के 6 बजे से 9 बजे के बीच का होता है। यह प्रहर आंशिक रूप से सात्विक और राजसिक होता है, लेकिन नकारात्मक नहीं। इस प्रहर में सोना या संभोग करना वर्जित है। इस प्रहर में क्रोध को कदापि नहीं करना चाहिए अन्यथा इसका मन और मस्तिष्क पर तो बुरा असर पड़ता ही है साथ ही भविष्य भी खराब होता है। इस प्रहर में कटु वचन कहना या गृहकलह करना वर्जित है। इस प्रहर में घर में गंदगी बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इस प्रहर में घर में चंदन और गुलाब वाली सुगंध फैलाई जाए तो सुख और शांति बनी रहती है। 

सुबह का दूसरा प्रहर

दिन के दूसरे प्रहर को मध्याह्न भी कहते हैं। यह प्रहर सुबह 9 से दोपहर 12 बजे तक का रहता है। इस प्रहर में हमारा मस्तिष्क ज्यादा सक्रिय होता है इसलिए कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है। इस प्रहर में अगर हनुमानजी को लाल फूल चढ़ाया जाए तो संपत्ति का लाभ मिलता है और कर्ज से मुक्ति या राहत मिलती है। हालांकि इस प्रहर में मांगलिक कार्य करने और पेड़ पौधे लगाने से बचने की सलाह दी जाती है।

सुबह का तीसरा प्रहर

दिन के तीसरे प्रहर को अपरान्ह (दोपहर बाद) या सप्तम प्रहर कहते हैं। यह समय दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच तक का रहता है। यह तमोगुणी समय होता है। इस प्रहर में भोजन करना उत्तम है लेकिन सोना और स्नान करना उचित नहीं। इस प्रहर में नए काम की शुरुआत कर सकते हैं। इस प्रहर में भगवान श्रीकृष्ण की उपासना की जाए तो संतान उत्पत्ति की समस्या दूर होती है।

सुबह का चौथा प्रहर

दिन के चौथे और अंतिम प्रहर को सायंकाल कहते हैं। दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे के बीच का समय सायंकाल का होता है। यह प्रहर सात्विक तो होता है लेकिन इसमें तमोगुण की प्रधानता रहती है। इस प्रहर में विश्राम कर सकते हैं लेकिन भोजन से बचना चाहिए और कोई भी नया काम शुरू नहीं करना चाहिए। इस समय में अगर नियमित रूप से पौधों में जल डाला जाए तो माता और पिता का बच्चों के साथ उनका संबंध मथुर रहता है।

रात का प्रथम प्रहर

रात के प्रथम प्रहर को प्रदोष काल और प्रथम प्रहर कहते हैं। शाम को 6 बजे से रात को 9 बजे तक का समय रात का प्रथम प्रहर होता है। इस प्रहर में सतोगुण की प्रधानता रहती है। इस प्रहर में किसी भी प्रकार के तामसिक कार्य करना वर्जित है। क्रोध, कलह और बहस करना वर्जित है। इस प्रहर में भोजन करना और सोना वर्जित होता है। इस प्रहर में पूजा, प्रार्थना, संध्यावंदन, ध्यानआदि करने से बहुत लाभ मिलता है। इस समय में घर के पूजा के स्थान पर घी का या तिल के तेल का दीपक जलाना अच्छा रहता है।

रात का दूसरा प्रहर

रात के दूसरे प्रहर को निशिथ कहते हैं। यह प्रहर रात की 9 बजे से रात की 12 बजे के बीच का होता है। इस प्रहर में ता‍मसिक और राजसिक अर्थात दोनों ही गुणों की प्रधानता होती है लेकिन यह पूर्णत: नकारात्मक नहीं होता। इस प्रहर में भूलकर भी फूल या पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए और ना ही किसी वृक्ष को छोड़ना चाहिए। ऐसा करने से पाप लगता है। अस प्रहर में किसी भी प्रकार की खरीददारी भी नहीं करना चाहिए। इस प्रहर में बने भोजन का कुछ हिस्सा पशु को खिलाएंगे तो आर्थिक रूप से हमेशा मजबूत बने रहेंगे।

रात का तीसरा प्रहर

रात के तीसरे प्रहर को त्रियामा कहते हैं जो 12 बजे से रात के 3 बजे के बीच का होता है। इस मध्यरात्रि भी कहते हैं। यह समय शुद्ध रूप से तामिसक माना गया है। यह समय पूर्ण विश्राम का ही होता है। इस प्रहर में भोजन, स्नान या ध्यान करना वर्जित है। ऐसा करने से भारी नुकसान उठाना होता है। इस प्रहर में प्रार्थना करने से वह तुरंत फलदायी होती है।


रात का चौथा प्रहर

इस प्रहर को उषा काल कहते हैं। रात के 3 बजे से सुबह के 6 बजे के बीच के समय को रात का अंतिम प्रहर भी कहते हैं। यह प्रहर शुद्ध रूप से सात्विक होता है। इस प्रहर में भी अन्न जल ग्रहण करने से बचें। इस प्रहर में उठकर नित्यकर्मों से निपटकर पूजा, अर्चना या ध्यान करने से लाभ मिलता है। अगर इस प्रहर में शिवलिंग पर नियमित रूप से जल चढ़ाया जाए तो जीवन की सारी समस्याएं दूर हो जाती है।


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जमीन पर नीचे बैठकर खाना खाने के फायदे

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प्राचीनकाल से चली आ रही ज़मीन में खाने की परंपरा को आज लोग नकारने लगे हैं या यूं कहें कि जमीन पर बैठकर भोजन करने में वे अब शर्मिंदगी महसूस करने लगे हैं। कुर्सी टेबल पर बैठकर खाना खाना सभ्य और ज़मीन पर बैठकर खाना खाने की परंपरा को असभ्य मानकर अस्वीकार करने लगे हैं। जबकि यह बहुत प्राचीन परम्परा है, जिसके कई स्‍वास्‍थ्‍य लाभ हैं, इससे वज़न कम होता है, पाचन क्रिया ठीक रहती है, दिल स्वस्थ रहता और दिमाग़ तनाव रहित रहता है। ज़मीन पर पर बैठकर खाना खाते समय हम लोग सुखासन की स्थिति में होते हैं, यह पद्मासन का ही एक प्रकार है जो हमारे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए बहुत फ़ायदेमंद है। आइए जमीन पर बैठकर खाना खाने के फायदे जानते हैं।

आयुर्वेद कहता है कि नीचे ज़मीन पर बैठ कर ही खाना चाहिए ताकि खाने की प्रक्रिया के दौरान शरीर में उत्पन्न गर्मी जमीन में प्रवाहित हो जाए।।

विज्ञान इस बारे में अभी चूप हैं- जहां तक लाभ की बात है तो निश्चित तौर पर मै कुछ कहने की स्थिति में नहीं हूं। पर आप जानते हो की अपना आयुर्वेद यूं ही कोई नियम नहीं बनाता उसका कोई ना कोई तो लाभ है ही।।

जमीन पर बैठकर भोजन करने के फायदे

कुर्सी-टेबल पर बैठकर खाने को लोग सभ्‍य तरीका मानने लगे हैं, मगर जमीन पर बैठकर खाने के पीछे कई फायदे भी छिपे थे जिनसे आपको रूबरू कराते हैं।

पाचन क्रिया ठीक रहती है

जमीन पर बैठकर खाना खाते समय हम लोग सुखासन की मुद्रा में बैठते हैं। इस योग मुद्रा में बैठकर खाना खाने से खाना सही तरह से पच जाता है। जमीन पर बैठकर भोजन करते समय निवाला उठाते वक़्त आगे की ओर झुकते हैं और फिर निवाला निगलने के बाद पहले वाली पोजिशन में आना जाते हैं। ऐसा बार-बार करने से पेट की मांशपेशियां एक्टिव हो जाती हैं और खाना तेज़ी से पचने लगता है। इस मुद्रा में बैठने से पेट से जुड़ी कई समस्याएं भी कम हो जाती हैं।

वज़न कंट्रोल करें

मौजूदा जीवनशैली को देखते हुए लोगों में मोटापे की समस्‍या आम हो गई है, मगर आप यह जानकर जरूर हैरान रह जाएंगे कि जमीन पर बैठकर खाने से हमारा वजन भी नियंत्रित रहता है।  ज़मीन पर बैठकर खाना खाते समय आप सुखासन की अवस्था में बैठते हैं, जिससे दिमाग़ अपने आप शांत हो जाता है। ज़मीन पर बैठकर खाने से पेट और दिमाग़ को सही समय पर एहसास हो जाता है कि आपने भरपूर खा लिया है और आप ओवरईटिंग से बच जाते हैं। जिससे आपका वज़न कंट्रोल रहता है।

रिश्तों में मिठास को बढ़ाएं

जब पूरा परिवार एक साथ ज़मीन पर बैठ कर भोजन करता है। तो इससे रिश्तों में मधुरता आती है और आपसी प्यार बढ़ता है।

शरीर को लचीला बनाएं

ज़मीन पर बैठकर खाते समय जब आप पद्मासन की मुद्रा में बैठते हैं, तो आपकी पीठ और पेट के आसपास की मांसपेशियों में खिंचाव होता है। जिससे शरीर में लचीलापन बना रहता है।

गठिया रोग से बचाए

ज़मीन पर बैठकर खाना खाते समय पद्मासन और सुखासन की मुद्रा में होते हैं। यह एक ऐसी मुद्रा है जो न केवल हमारे पाचन तंत्र को ठीक रखती है, बल्कि जोड़ों को कोमल और लचीला बनाती है। इस लचीलेपन से जोड़ों की चिकनाई बनी रहती है, जिससे आगे चलकर उठने-बैठने में दिक्कत नहीं होती है और हड्डियों के रोग, जैसे ओस्टियोपोरोसिस और आर्थराइटिस की समस्या से भी बचे रहते हैं।

मन को शांत करें
जब हम लोग ज़मीन पर बैठकर सुखासन की मुद्रा में खाना खाते हैं। तो दिमाग़ तनाव रहित और शांत अवस्था में रहता है।

हार्ट को हेल्दी बनाएं
ज़मीन पर बैठकर खाना खाने से हमारे शरीर में रक्‍त का संचार अच्‍छे से होता है और हृदय बड़ी सहजता से सभी पाचन अंगों तक ख़ून पहुंचाता है, लेकिन कुर्सी मेज पर बैठ कर खाना खाने से ब्लड सर्कुलेशन विपरीत होने लगता है। इसलिए ज़मीन पर बैठकर भोजन करें और हार्ट को हेल्दी बनाएं। आज से ही ज़मीन पर बैठकर भोजन करें और इसका लाभ उठायें।

शरीर में खून का बहाव भी सही होता है
जमीन पर बैठकर खाने से हमारे शरीर में खून का बहाव भी सही होता है और इस तरह दिल बड़ी आसानी से पाचन में मदद करने वाले सभी अंगों तक खून पहुंचाता है, लेकिन जब आप कुर्सी पर बैठ कर खाना खाते हैं तो यहां ब्लड सर्कुलेशन विपरीत होता है। इसमें सर्कुलेशन पैरों तक होता है, जो कि खाना खाते समय जरूरी नहीं होता है।

खाया पिया अंग लगता है
कुछ लोग कहते है कि मुझे खाया पिया नहीं लगता है। टेबल पर भोजन करने से पाचन ठीक से नहीं होता है। इस वजह से शरीर को भोजन का पूर्ण रस नहीं मिल पाता है। फर्श पर बैठकर भोजन करने से ठीक से पाचन होता है जिससे खाया पिया अंग लगता है।

व्यक्तित्व में निखार
आसन मुद्रा में बैठकर भोजन करने से शरीर सीधा रहता है। सीधे होकर खाने से खाना ठीक से हजम होता है जिससे व्यक्तित्व में निखार आता है


भोजन के पहले ईश्वर को धन्यवाद
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हमारे पूर्वज खाने पर बहुत से नियम बनाये है , लेकिन आज के आधुनिकता युग मे सब नियम छूटते जा रहे है फिर अगर खाना खाने के पहले हम हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दे और प्रार्थना करे कि हे ईश्वर ये भोजन आपका दिया है , इस भोजन से हमे स्वस्थ रखे ।

भंडारे में खाते गरीब बच्चे
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फिर अगली बार से जमीन पर बैठकर खाना खाने में शर्म महसूस मत कीजिए. वैसे भी हमारे पूर्वजों ने जिस परंपरा को बनाया है, वह गलत तो नहीं हो सकती इसलिए आवश्यकता है कि उनकी वैज्ञानिकता को समझकर व्यवहार करें।

भोज समारोह में बैठ कर भोजन
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हर व्यक्ति अपने परिवार का पालन-पोषण करने के लिए दिन रात एक कर देता हैं. ताकि परिवार को सही तरह से भोजन मिल सके. भोजन व्यक्ति की आवश्यकता हैं. जिसके बिना उसका जीवन संभव नहीं हैं। रोटी-कपड़ा और मकान यही व्यक्ति की सबसे जरूरी आवश्यकता बन गया है. व्यक्ति अमीर हो या गरीब भूख लगने पर वह खाना अवश्य खाता है. यदि व्यक्ति भोजन करने से पहले कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखे तों उसके घर में धन की कभी कमी नहीं होती है।

पंगत में बैठ कर भोजन
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आप में से आधे लोगों का जवाब होगा कि अरे यह तो पूजा-पाठ का काम है, वरना जमीन पर बैठकर खाना कौन खाता है आजकल, आज तो हर कोई डाइनिंग टेबल पर बैठकर आराम से भोजन करता है लेकिन साथियों आपको बता दें कि जमीन पर बैठकर खाना खाने वाला इंसान टेबल पर बैठकर खाने वाले इंसान से कहीं ज्यादा स्वस्थ और निरोगी रहता है।

तो ये है फर्श पर बैठकर भोजन करने के फायदे। दोस्तों अगर आप स्वस्थ रहना चाहते है तो हमेशा फर्श पर बैठकर भोजन करें। फर्श पर बैठकर भोजन करने से न केवल आपका शरीर स्वस्थ रहता है बल्कि मन भी शांत रहता है।


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क्या है मृत्युभोज की परंपरा की शुरुआत

 
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हिंदू धर्म में मुख्य 16 संस्कार बनाए गए हैं। इनमें सबसे पहला संस्कार गर्भाधान है और अन्तिम व 16 वां संस्कार अन्त्येष्टि है। यानि कि इन 16 संस्कारों के बाद कोई 17 वां संस्कार है ही नहीं। अब जब 17 वां संस्कार की कोई बात ही नहीं कही गई है तो तेरहवीं संस्कार कहां से आ गया ? आज हम आपको महाभारत में मृत्युभोज से जुड़ी हुई एक कहानी के बारे में बताएंगे जिससे आपको एक हद तक समझ में आ जाएगा कि क्या वाकई में मृत्युभोज,में जाना उचित है या नहीं ?

इस कहानी में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने शोक या दुख की अवस्था में करवाए गए भोजन को ऊर्जा का नाश करने वाला बताया है। इस कहानी के अनुसार, महाभारत का युद्ध शुरू होने ही वाला था। भगवान श्री कृष्ण ने दुर्योधन के घर जा कर संधि करने का आग्रह किया। उन्होंने दुर्योधन के सामने युद्ध न करने का प्रस्ताव रखा। हालांकि दुर्योधन ने श्रीकृष्ण की एक ना सुनी। दुर्योधन ने संधि करने के आग्रह को ठुकरा दिया। जिससे श्री कृष्ण को काफी कष्ट हुआ। वह वहां से निकल गए। जाते समय दुर्योधन ने श्रीकृष्ण से भोजन ग्रहण कर जाने को कहा। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा कि, ‘सम्प्रीति भोज्यानि आपदा भोज्यानि वा पुनैः’ अर्थात हे दुर्योधन जब खिलाने वाले का मन प्रसन्न हो, खाने वाले का मन प्रसन्न हो, तभी भोजन करना चाहिए। इसके विपरीत जब खिलाने वाले एवं खाने वालों के मन में पीड़ा हो, वेदना हो, तो ऐसी स्थिति में कदापि भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए। महाभारत की इस कहानी को बाद में मृत्युभोज से जोड़ा दिया गया। जिसके अनुसार अपने किसी परिजन की मृत्यु के बाद मन में अथाह पीड़ा होती है, परिवार के सदस्यों के मन में उस दौरान बहुत दुख होता है। जाहिर सी बात है कि ऐसे में कोई भी प्रसन्नचित अवस्था में भोज का आयोजन नहीं कर सकता, वहीं दूसरी ओर मृत्युभोज में आमंत्रित लोग भी प्रसन्नचित होकर भोज में शामिल नहीं होते। ऐसा कहा गया कि इससे उर्जा का विनाश होता है। 

मृत्यु भोज क्यों करते है 

मृत्यु के पश्चात वातावरण में अशुद्धि, तथा उसके निवारण के लिए यह 13 दिन के नियम अपनाए गए हैं। जब कोई मनुष्य देह छोड़ता है तब एक बहुत ही भयानक ऊर्जा को प्रवाह होता है, जिसके कारण अन्य लोगो पर इसका असर आता है, दूसरा कई बार मृत व्यक्ति यदि गंभीर समस्या झेल कर गया है तो उसका भी उपाय आवश्यक है।  पहले के समय में उपचार की व्यवस्था इतनी सुविधाजनक व सशक्त व नहीं थी। अधिकांश घर कच्चे के होते थे। हैजा, कालरा जैसी घातक बीमारियों का प्रकोप फैलता था। इनसे या फिर वृद्धावस्था में बीमारी से मरने वाले व्यक्ति की देह से रोगाणु और विषाणु निकलते थे, जिनसे गंभीर बीमारियों के फैलने का खतरा रहता है। बीमारियां नहीं फैलें, इसलिए सफाई से पहले तक मृतक के परिजनों को स्पर्श करना या उसके घर जाना मना था। इसे सूतक का नाम दिया गया। जिसमें सुरक्षा का ही कवच है। जब घर का पूरी तरह शुद्धिकरण हो जाता था, तब औषधीय हवन कराकर घर के वातावरण को शुद्ध किया जाता था। इस प्रक्रिया के बाद लोग मृतक के परिवार में आना-जाना करने लगते हैं।

मृत्युभोज आयोजन के कारण

भारतीय या कहें हिन्दू परम्पराएं एक बहुत ही ऊंचे दर्जे की सोच से शुरू हुईं हैं जिनके पीछे प्राकृतिक विज्ञान,मनोविज्ञान,अध्यात्म और ज्योतिष का ज्ञान निहित है। सनातन विद्वानो ने किसी भी परम्परा की शुरूआत को बहुत ही सोच समझ कर शुरू किया होगा। मृत्यु के पश्चात वातावरण में अशुद्धि, एंव परिजनो में व्याप्त अत्यधिक शोक व पीडा के निवारण के लिए सम्भवतः मृत्यु भोज की परम्परां की शुरू हुई। कई बार किसी की मृत्यु से व्यथित उसका रिश्तेदार भी मानसिक आघात से मर जाता है ,या वह स्थायी तौर पर विक्षिप्त या अवसाद ग्रस्त हो सकता है । यह सभी सम्भावनाएं मृत्यु के 15 दिनों तक होने की ज्यादा प्रबल होती हैं । इसका उपाय मृत्युग्रस्त परिवार को तुरंत एक जरूरी कार्य में लगा देने से हो जाता है । मृत्युभोज का आयोजन मूलतः परिवार को शुरुआती 10-12 दिनों में मृत व्यक्ति के बारे में अतिशय दुखी होने से ध्यान हटाने के लिए होता है। मृत्यु से लेकर तेरहवी तक बनाये गये प्रक्रिया के समापन में परिजन इतने व्यस्त हो जाते कि वे सम्पूर्ण प्रक्रिया को पूर्ण होने के पश्चात वे लगभग अपनी सभी चिन्ताओ को भूल कर निढाल हो जाते है। और वे चैतन्य अवस्था में आने के बाद परिजनो को अपने कार्यो के प्रति चिन्ता भाव जाग्रत होना स्वभाविक है। और वे इस प्रकार अपने दैनिक दिनचर्या में व्यस्त हो जाते है। 

सनातनी मानते हैं की मृत्यु के बाद भी अस्तित्व समाप्त नहीं होता बस शरीर मिट जाता है अब आत्मा या चित्त सूक्ष्म शरीर को धारण करती है , जिनके साथ आपने पूरा जीवन बिताया हो उनसे मोह होना स्वभाविक है । तो ऐसे में आत्मा वही रुक कर शोक मनाती है और आगे की यात्रा पर निकलने के लिए वो तैयार नहीं होती, वो वहाँ से जाना ही नहीं चाहती । जब वो देखती है की उसके मृत्यु के बाद उसके सारे प्रियजन अब शोक से बाहर है सब खा पी रहे हैं तो उसे एक झटका लगता है और वो आगे की यात्रा पर निकल जाती है । इसी लिए जब भी कोई साधू महात्मा मरता है तो उसके लिए यह संस्कार नहीं मनाते क्यूँकि उन्हें सत्य का ज्ञान होता है और मृत्यु के बाद उनकी आत्मा शोक या मोह में नहीं पड़ती । और इसका दूसरा कारण यह भीे है की इस संस्कार के बहाने पूरा परिवार पूरा खानदान और सारे मित्र पड़ोसी शोकाकुल परिवार के पास इकट्ठा होता है और सांत्वना देता है इससे उन्हें हिम्मत मिलती है ।

मृत्युभोज के पीछे ज्योतिषीय कारण -

शनि को मृत्यु और दुख का कारक ग्रह माना जाता है । किसी घर में मृत्यु होने पर वहां रहने वाले किसी न किसी व्यक्ति पर शनि की दशा या साढेसाती , ढैय्या आदि गोचर अवश्य होते हैं । शनि को काले ( दुख) रंग का प्रतीक भी माना जाता है । इसलिए मृत्य के बाद बालों को मुड़वाने की परंपरा प्रारम्भ हुई । शनि बहुत धीमी चाल से चलता है अतः एक मृत्यु ही होगी ऐसा जरूरी नहीं है । कई बार किसी की मृत्यु से व्यथित उसका रिश्तेदार भी मानसिक आघात से मर जाता है ,या वह स्थायी तौर पर विक्षिप्त या अवसाद ग्रस्त हो सकता है । यह सभी सम्भावनाएं मृत्यु के 15 दिनों तक होने की ज्यादा होती हैं । इसका उपाय मृत्युग्रस्त परिवार को तुरंत एक जरूरी कार्य में लगा देने से हो जाता है । मृत्युभोज का आयोजन मूलतः परिवार को शुरुआती 10-12 दिनों में मृत व्यक्ति के बारे में अतिशय दुखी होने से ध्यान हटाने के लिए होता है । इसका दूसरा कारण परिवार पर शनि के प्रभाव को गुरु ग्रह के प्रभाव को बढ़ाकर दुख से जल्दी पार पाने के लिए किया जाता है । भोज के बहाने सभी परिचितों व रिश्तेदारों को न्योता दिया जाता है जिसमें लोगों का आना अनिवार्य माना जाता है । इन लोगों का गुरु अच्छा होने से व्यक्ति के परिवार को सामाजिक सम्बल मिलता है और परिवार फिर से सामान्य होने लगता है । नए लोगों के आने , मिलने , बात करने से नई मधुर स्मृतियां जन्म लेती हैं जो बीमारी और मृत्यु से जुड़ी कड़वी यादों को दबा देती हैं और परिवार फिर से सहज हो कर अपने दायित्वों को पूरा करने में लग जाता है । अन्यथा मृत व्यक्ति का परिवार महीनों तक अवसाद ग्रस्त और जिम्मेदारियों से विरत रह सकता है । शनि का उपाय ज्योतिष में गुरु और शुक्र को माना गया है । गुरु अर्थात पूजापाठ या ईश्वर में आस्था और शुक्र शारीरिक जरूरतें जिसमें पहले स्थान पर भोजन आता है । इसीलिए हिंदुओं में किसी अनिष्ट की आशंका पर पूजा और उसके बाद प्रसाद का चलन है । लेकिन ये कहीं भी आवश्यक नहीं है कि कोई अपनी क्षमता से ज्यादा या जबरदस्ती खर्च करे । अगर किसी का मनोबल मजबूत है तो वह इन उपायों के बिना भी काम चला सकता है । साधु सन्यासियों की मृत्यु में इस नियम का पालन नही किया जाता है क्योंकि वे परिवार से पहले से ही विरत होते हैं ।

सनातन धर्म में मृत्यु भोज नामक कोई परम्परा नहीं है।

कहीं किसी आमंत्रण पत्र में आपने मृत्यु भोज नहीं पढा होगा। अधिकांशतः ब्रह्मभोज, प्रीति भोज अथवा प्रसाद ग्रहण का ही आमंत्रण होता है। रही शास्त्रों में वर्णित होने की बात तो मृत्यु भोज जब शास्त्रों में नहीं आता तभी तो समाज में नहीं है । हमारी संस्कृति और विश्व की लगभग सभी संस्कृतियों में शोकाकुल परिवार के द्वार पर आये हुए अतिथियों के सत्कार में भोजन प्रबन्ध रहता है।हां उससे पहले ब्रह्मभोज होता है जिसमे लोग अपने पूज्यनीय सम्बधियों, गुरू, पुरोहित, उपाध्याय, आश्रित ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। जो की शास्त्रों में वर्णित है।  इसके लिए वायु पुराण, अग्नि पुराण, गरुड़ पुराण आदि का अध्ययन किया जा सकता है।

जाने क्या है मृत्युभोज निषेध अधिनियम 1960 

मृत्युभोज अधिनियम 1960-जानकारी देने जा रहे है। मृत्यु भोज अधिनियम 1960 राजस्थान में लागु किया गया।  राजस्थान सरकार द्वारा मृत्यु भोज बंद करने के लिए अपने गज़ट में  10 /02/1960 को  प्रकाशित किया।  जिस पर   राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर कर तीसरे दिन सहमती दे  दी गयी। 

जाने मृत्युभोज निषेध अधिनियम 1960  क्या है ?

मृत्यु भोज निषेध कानून जिसमे गंगा प्रसादी धार्मिक रूप से किसी भी पंडो पुजारियों के लिए धार्मिक संस्कार और परंपरा के नाम पर किसी  प्रकार के मृत्युभोज का आयोजन करना कानूनन अपराध है।  

मृत्युभोज क्या है - 
मृत्युभोज  किसी भी व्यक्ति के यहाँ यदि उनके किसी परिजन की मृत्यु हो जाती है तो मृत्यु के उपरांत धार्मिक परंपरा मानते हुए अपने समाज के लोगों को बुलाकर भोज का आयोजन करना जिसमे गंगा प्रसादी ,नुक्ता ,मौसर अदि मृत्यु के बाद कराये जाने वाला भोज मृत्यु कहलाता है। 

मृत्युभोज निषेध कानून की धाराएँ - 
धारा - 2  किसी परिजन की मृत्यु हो जाने पर किसी भी समय कराये जाने वाला भोज नुक्ता मौसर , गंगाप्रसादी मृत्यु भोज कहलाता है।   कोई भी व्यक्ति अपने परिजन समाज पंडो पुजारियों के  संस्कार या परंपरा के नाम पर मृत्यु भोज का आयोजन  नहीं करेगा। -मृत्युभोज कराने वाले और उसमे शामिल होना दोनों अपराध है। 

धारा -3  मृत्यु  भोज में कोई भी व्यक्ति न करेगा और ना ही शामिल होगा ऐसा करने पर दोनों को सजा व दंड 

धारा -4   में लिखा है  धारा 3 अनुसार यदि कोई व्यक्ति मृत्यु भोज के लिए उकसायेगा या साथ देगा ,या प्रेरित करता है उसको एक वर्ष का साधारण कारावास और 1000 रुपये जुर्माना। 

धारा 5  में लिखा है की स्थानीय जनप्रतिनिधि (पंच ,सरपंच) एवं पटवारी , लम्बरदार , ग्राम सेवक का दायित्व बनता है  जैसे ही उनको मृत्युभोज के बारे में जानकारी प्रदान होती है तो वो तुरंत न्यायिक मजिस्ट्रेड के पास प्रार्थना पत्र लेकर रुकवा सकते है।    

धारा 6  में लिखा है यदि कोई व्यक्ति धारा 5 की बातों को नहीं मनाता है। तो उसे १ वर्ष का कारावास और 1 हजार रुपये जुर्माना 
 
धारा 7  में लिखा गया है की यदि पंच सरपंच पटवारी या ग्रामसेवक इसके बारे में  बताते है तो उन्हें भी सजा का प्रावधान है। इसमें तीन माह तक की सजा हो सकता  है। 

धारा 8   में लिखा है यदि कोई व्यक्ति सेठ, माहंजन साहूकार या दूकानदार कोई हो मृत्युभोज के लिए रूपया या सामान उधार देता है  तो उन्हें उस रूपए को वसूलने का अधिकार नहीं होगा। और उसके द्वारा दिए गए सामान भी जप्त कर लिया जायेगा। 

राजस्थान पहला राज्य जिसने मृत्युभोज पर प्रतिबन्ध लगाया। 




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रीति रिवाज और परम्परा तथा धर्म का फर्क जानिए

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ऊर्दू के रिवाज को हिन्दी में परंपरा और अंग्रेजी में ट्रेडिशन कहते हैं। हिन्दू धर्म में ऐसी हजारों परंपराएं जुड़ी हुई है जिसका धर्म से संबंधित या धर्म से निकला मानकर धर्म की आलोचना की जाती है। अधिकतर लोग यह मानते हैं कि रिवाज के पीछे धर्म का बहुत बड़ा हाथ होता है जबकि यह सही नहीं है।

रिवाज की उत्पत्ति स्थानीय लोक कथाओं, संस्कृति, अंधविश्वास, रहन-सहन, खान-पान आदि के आधार पर होती है। दरअसल लोगों की जिंदगी से संबंध रखने वाला काम रिवाज होता है। यह रिवाज़ एक जगह या वहाँ के लोगों के लिए आम होता है। जैसे खाने के वक्‍त लोगों का व्यवहार कैसा होना चाहिए और उन्हें दूसरों के साथ किस तरह पेश आना चाहिए, कपड़े कैसे पहनना चाहिए और क्या खाना चाहिये। जैसे राजस्थान में धोती और पगड़ी पहनने का रिवाज है तो तमिलनाडु में धोती या लुंगी। यह स्थानीय परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है धर्म का नहीं। 

हालांकि बहुत से ऐसे रिजाव है जो पौराणिक कथाओं के आधार पर भी समाज में प्रचलित हो जाते हैं। बहुत से रिवाज ऐसे हैं जो हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार सही नहीं है, जैसे सती प्रथा, दहेज प्रथा, मूर्ति स्थापना और विसर्जन, माता की चौकी, अनावश्यक व्रत-उपवास और कथाएं, पशु बलि, जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, छुआछूत, ग्रह-नक्षत्र पूजा, मृतकों की पूजा, अधार्मिक तीर्थ-मंदिर, 16 संस्कारों को छोड़कर अन्य संस्कार आदि। 
 
अधिकतर रिवाजों को धर्म से जोड़ना उचित नहीं। अधिकतर रिवाज तो अंधविश्वास हैं जो हजारों वर्षों की परंपरा, भय और व्यापार के कारण समाज में प्रचलित हो गए हैं। इसीलिए ये रिवाज आज कोई धार्मिक मायने नहीं रखते। हिन्दू धर्म और रिवाजों में फर्क करना सीखना होगा।



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सनातन परम्पराएं, जिनके आगे विज्ञान भी नतमस्तक है

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भारत एकमात्र ऐसा देश है, जिसमे विभिन्न परम्पराएं, रीति-रिवाज और रस्में है। इस देश में जितने धर्म, जाति, संस्कृति है उनके पीछे कुछ छिपे हुए वैज्ञानिक तथ्य भी है, जिससे आप सभी को अवगत करना हमारा मुख्य उद्देश है। भारत एक कृषि-प्रधान और परम्पराओं का देश है, यहाँ जितने राज्य, शहर, गाँव, तहसील, बेड़े है, उसी के अनुसार विभिन्न परम्पराएं भी है, यहाँ जन्म से लेकर मृत्यू तक अनेकों रस्मे निभाई जाती है। आइये जानते है हिन्दू धर्म की वो 20 भारतीय परम्पराएं, जिसके पीछे छिपे है 20 वैज्ञानिक तथ्य। 

01- दोनों हाथों को जोड़कर नमस्कार करना

दोनों हाथ आपस में जोड़कर नमस्कार करना हिन्दू धर्म की बहुत प्राचीन परम्परा है। इस प्रकार नमस्कार करने से आप दूसरों को सम्मान देते है। 

वैज्ञानिक तर्क
दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करने की प्रक्रिया का वैज्ञानिक महत्व है, इस प्रकार नमस्कार करने से आपको शारीरिक लाभ मिलता है। जब हम दोनों हाथ आपस में जोड़ते है, तो हमारी हथेलियों और उँगलियों के उन बिन्दुओं पर दबाव पड़ता है, जिनका एक्यूप्रेशर के कारण सीधा सम्बन्ध हमारी आँख, कान, नाक, हृदय और दिमाग आदि अंगों पर होता है। इस प्रकार से नमस्कार करने का दूसरा तर्क यह भी है की हम सामने वाले के स्पर्श में नहीं आते, जिससे किसी प्रकार के संक्रमण का खतरा नहीं रहता है। सामनेवाले के शरीर के कीटाणु हम तक नहीं पहुँच पाते है।     

02- पैरों में बिछुए पहनना

पैरों के अंगूठे और अंगूठे के साथवाली अंगूली में बिछुए या रिंग पहनना भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन इसके पहनने का मतलब यह नहीं है कि इसे पहनने वाली महिला विवाहित है।

वैज्ञानिक तर्क
बिछुए पहनने के पीछे वैज्ञानिक तर्क है, बिछुए रक्त के प्रभाव को विनियमित करने का कार्य करते है। बिछुए अधिकतर चांदी के धातु से बनाए जाते है और चांदी ध्रुवीय ऊर्जा को अवशोषित कर शरीर को स्वस्थ बनाने का कार्य करता है। अधिकतर जगह देखा गया है कि बिछुए अंगूठे के साथ वाली अंगूली में पहने जाते है, इस ऊँगली की नसों का सम्बन्ध सीधा महिलाओं के हृदय और गर्भाशय से होता है, बिछुए पहनने के बाद गर्भाशय से सम्बंधित बीमारी का खतरा नहीं रहता। इसके संपर्क में आने से शरीर ऊर्जावान रहता है तथा मासिक धर्म नियमित रहता है।

03–माथे पर तिलक या कुमकुम लगाना

हमारे हिन्दू धर्म में महिलायें तथा पुरुष दोनों माथे के दोनों भौहों के बीचोबीच कुमकुम या तिलक लगाते है। यह प्रथा प्राचीनकाल से चली आ रही है। दोनों भौहों के बीच तिलक लगाने से एकाग्रता में वृद्धि होती है।

वैज्ञानिक तर्क
दोनों भौहों के बीच तिलक लगाने के पीछे वैज्ञानिक तर्क है, आँखों के बीच में माथे तक एक नस जाती है। तिलक या कुमकुम लगाने से उस जगह की ऊर्जा बनी रहती है। दोनों भौहों के बीच तिलक लगाने से उस बिन्दू पर दबाव पड़ता है, जो हमारे तंत्रिका तंत्र का ख़ास हिस्सा माना जाता है। माथे पर तिलक लगाते समय जब अंगूठे या अंगूली से दबाव पड़ता है, तब चेहरे की त्वचा को रक्त सप्लाई करनेवाली माँसपेशिया सक्रिय हो जाती है, इस प्रकार से चेहरे की सूक्ष्म से सूक्ष्म कोशिकाओं तक सुगम तरीके से रक्त पहुँचता है।

04-ताम्बे के सिक्के पानी में प्रवाहित करना

प्राचीन काल से ही ताम्बे के सिक्के का प्रचलन था। आज के भौतिक युग में ताम्बे की जगह स्टील के सिक्कों ने ली है। प्राचीन काल में ताम्बे की सिक्कों को नदी में फेंकना अच्छा माना जाता है, लेकिन इसके पीछे एक वैज्ञानिक कारण भी है।

वैज्ञानिक तर्क
प्राचीन काल में जो सिक्के प्रयोग में थे वो ताम्बे के ही होते थे, इसको नदी में बहाने का प्रचलन था। प्राचीन काल में लोग नदियों का पानी ही पीते थे, ताम्बा पानी को शुद्ध करता है। जब ताम्बे के सिक्कों को नदी में फेंका जाता था, तब इन सिक्कों से नदी के पानी में ताम्बा मिल जाता था और फिर यही पानी लोगों द्वारा पीया जाता था, ऐसा करने से लोगों के शरीर में ताम्बे का संतुलन बना रहता था, इससे शरीर में जरुरी आयरन की पूर्ति भी होती थी।   

05-भोजन की शुरुआत तीखे से और अंत मिष्ठान्न से

भारतीय लोग चटकदार मसाले खाने के लिए विख्यात है। मसालेदार भोजन ग्रहण करने के बाद मीठा खाने की परम्परा हिन्दू धर्म में है, इसके पीछे वैज्ञानिक तथ्य है।  

वैज्ञानिक तर्क
मसालेदार भोजन पाचक रस और एसिड को सक्रिय करने का काम करता है, जिसके कारण शरीर में भोजन को पचाने की प्रक्रिया अच्छी तरह से चलती है और मसालेदार भोजन खाने के बाद अंत में मीठा खाने से बनने वाले कार्बोहाइड्रेट पचे हुए भोजन को नीचे खींच लेते है। ऐसा भी कहा जाता है कि पहले मसालेदार खाने से शरीर के पाचन तंत्र के लिए जरुरी पाचक रस और आम्ल सक्रिय होते है और बाद में मीठा खाने से पाचक क्रिया नियंत्रित हो जाती है।   

06-मंदिर की घंटी बजाना

मंदिर वह पवित्र स्थान है जहां पर सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है। यहाँ आने से मन को शांति और सुकून मिलता है। 

वैज्ञानिक तर्क
मंदिर के घंटे की आवाज कानों में पड़ते ही आध्यात्मिक शांति मिलती है। मन शांत रहता है। मंदिर का गर्भगृह वो स्थान है जहाँ पृथ्वी की चुम्बकीय तरंगे सबसे ज्यादा होती है और वहां से ऊर्जा का प्रवाह सबसे ज्यादा होता है। घंटे की आवाज से बुरी आत्माओं को दूर किया जाता है। जब हम मंदिर में घंटा बजाते है तब करीब 7 सेकेण्ड तक हमारे कानों में उसकी प्रतिध्वनि गूंजती है, ऐसा माना जाता है कि इस दरम्यान घंटे की ध्वनि से हमारे शरीर में मौजूद सुकून पहुंचाने वाले सात बिन्दू सक्रिय हो जाते है।  

07-जमीन पर बैठकर भोजन करना
भारतीय हिन्दू संस्कृति में जमीन पर बैठकर खाना खाने की परम्परा है। यह परम्परा बहुत अच्छी मानी जाती है।   

वैज्ञानिक तर्क
जमीन पर बैठकर खाना खाने के पीछे इसका वैज्ञानिक कारण ये है कि जब हम जमीन पर दोनों पैर मोड़कर बैठते है तो इस अवस्था को सुखासन या अर्ध पद्मासन कहते है। इस पोजिशन में बैठने से दिमाग शांत रहता है। दूसरे शब्दों में कहे तो आलती-पालती मारकर बैठना एक प्रकार का योग आसन है। इस प्रकार से बैठने से दिमाग की धमनियों को सकारात्मक सन्देश पहुंचता है जो पाचन तंत्र से जुडा होता है।

08-उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर न सोना
सोने की सही दिशा का होना जरुरी है, कहते है दक्षिण दिशा की तरफ कोई पैर करके सोता है, तो बुरे सपने आयेंगे, नींद नहीं आयेगी, बुरे बुरे ख्यालात आयेंगे, इसलिए उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर न सोयें बल्कि उत्तर की ओर पैर करके सोना चाहिए।   

वैज्ञानिक तर्क
जब हम उत्तर की ओर सिर करके सोते है, तब हमारा शरीर पृथ्वी की चुम्बकीय तरंगों की सीध में आ जाता है। शरीर में मौजूद आयरन यानी लोह दिमाग की ओर संचारित होने लगता है। मानव शरीर का भी अपना एक चुम्बकीय क्षेत्र होता होता है। जब हम उत्तर दिशा में सिर करके सोते है तो पृथ्वी के चुम्बकीय बल से मानव का चुम्बकीय बल ठीक विपरीत होता है। इससे हृदय पर ज्यादा जोर पड़ने लगता है, दूसरा तर्क ये है की इस प्रकार से सोने से खून में मौजूद आयरन दिमाग में एकत्र होने लगता है, इससे दिमाग से सम्बंधित रोग होने लगते है, इसलिए उत्तर दिशा की ओर सिर रखकर नहीं सोना चाहिए।   

09- कान छेदन करना
कान छेदन करवाने की परम्परा हिन्दू धर्म में प्राचीन काल से ही है। आज के भौतिक युग में लोग सुंदर दिखने के लिए कान और नाक छेदन करवाते है। भारत में लगभग सभी धर्म के लोग नाक और कान छेदन करवाते है।  

वैज्ञानिक तर्क
कान छेदन करवाने से सोचने-समझने की शक्ति का विकास होता है। इससे बोली अच्छी होती है। कानों से होकर दिमाग तक जाने वाली नस का रक्त संचार नियंत्रित रहता है। हिन्दू मान्यता के अनुसार कानों में किसी प्रकार की बीमारी छेदन के बाद नहीं होती, बौद्धिक क्षमता का विकास भी होता है।   

10-हम उपवास क्यों करते है
मानव शरीर 80% पानी और 20% ठोस पदार्थों से मिलकर बना है। आयुर्वेद के अनुसार जिस प्रकार इस धरती पर पानी की मात्रा ज्यादा है और ठोस जमीन कम है, ठीक उसी प्रकार मानव शरीर का निर्माण भी हुआ है। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल शरीर के द्रव्य पदार्थों को प्रभावित करता है। कोई भी पूजा-पाठ या तीज-त्यौहार पर लोग व्रत रखते है इसके पीछे का वैज्ञानिक तथ्य आइए जानते है।

वैज्ञानिक तर्क
व्रत यानि उपवास करने से पाचन क्रिया अच्छी होती है और व्रत में जो फलाहार लेते है उससे शरीर का (detoxification) होता है अर्थात अंगों को आराम पहुँचाने, रक्त संचार सुधारने में और पसीना और मूत्र के माध्यम से शरीर से दूषित पदार्थों को बाहर करने में (detoxification) मदद करता है। व्रत करने से कैंसर का खतरा काफी हद तक कम होता है, साथ-ही साथ शुगर और हृदय की बीमारियों से भी बचाव होता है।    

11-पुरुष के सिर पर चोटी रखना
हमारा भारत देश साधू-संतों का देश है, यहाँ हिन्दू धर्म में ऋषि मुनि, साधु-संत अपने सिर पर छोटी रखते थे। हिन्दू धर्म में सिर पर छोटी रखने की परंपरा है।

वैज्ञानिक तर्क
शास्त्रों में बताया जाता है की सिर के जिस भाग में चोटी जिसे दूसरे शब्दों में शिखा भी कहते है, जिस जगह पर रखी जाती है उस जगह पर दिमाग की सारी नसें आकर मिलती है। वह भाग तंत्रिका तंत्र से सीधे संपर्क में होता है, इससे दिमाग स्थिर रहता है और इंसान को क्रोध नहीं आता, सोचने की क्षमता बढ़ती है। इससे शरीर को ऊर्जा मिलती है और एकाग्रता में वृद्धि होती है।

12-सूर्य नमस्कार
हिन्दू धर्म में सूर्य नमस्कार करने की परम्परा प्राचीन काल से ही अस्तित्व में है। सूर्य को जल देना और सूर्य नमस्कार का महत्व बहुत विख्यात है। भारतीय संस्कृति में सुबह की शुरुआत को सूर्य नमस्कार से जोड़ा गया है।

वैज्ञानिक तर्क
सूर्य को जल चढ़ाते समय जब पानी के बीच से आनेवाली सूर्य की किरणें जब आँखों में पहुंचती है, तब हमारी आँखों की रोशनी तेज होती है। पानी से टकराकर सूर्य की किरणें आँखों में पड़ने से आँखों की बीमारियाँ नहीं होती।  

13-मांग में सिन्दूर भरने की परम्परा
हिन्दू धर्म में मांग में विवाहित महिलायें सिन्दूर लगाती है, इसका वैवाहिक जीवन से गहरा सम्बन्ध होता है, पति की लम्बी आयु के लिए महिलायें मांग में सिन्दूर लगाती है।

वैज्ञानिक तर्क
सिन्दूर में हल्दी, चूना और मरकरी होती है, इन तीनों के मिश्रण से शरीर के रक्तचाप को नियंत्रित किया जाता है। हल्दी, चूना और मरकरी से बना सिन्दूर महिलाओं के शरीर में खून के बहाव को नियंत्रित करता है और कामेच्छा को बढ़ाने में कारगार होता है। यही कारण है कि विधवा महिलाओं को सिन्दूर लगाना मना होता है। सिन्दूर लगाने से स्ट्रेस कम हो जाता है।   

14-पीपल के वृक्ष की पूजा करना
पीपल यानि बरगद के पेड़ की पूजा का हिन्दू संस्कृति में बहुत महत्व है। इसे भारतीय संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। कहते है पीपल के पत्ते-पत्ते में देवताओं का वास रहता है। पीपल के पेड़ की पूजा करने से सभी परेशनियाँ दूर होती है।

वैज्ञानिक तर्क
पद्मपुराण में कहा गया है की पीपल के वृक्ष की पूजा करने तथा इसकी परिक्रमा करने से आयु में वृद्धि होती है। वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार पीपल का पेड़ ही एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो कभी कार्बन डाईऑक्साइड नहीं छोड़ता, इस कारण इसके पास जाने से कई रोगों से मुक्ति मिलती है। दूसरा तर्क यह भी है की इसकी पूजा इसलिए भी की जाती है की पेड़ों के प्रति लोगों में सम्मान बढे और उसे काटे नहीं तथा पीपल एकमात्र ऐसा पेड़ है जो रात को ओक्सीजन प्रवाहित करता है।

15-घर के आँगन में तुलसी लगाना
तुलसी का पौधा अपने आँगन में लगाने की परम्परा हिन्दू धर्म में प्राचीन काल से है। तुलसी केवल एक पौधा नहीं है। बल्कि अपने आप में सम्पूर्ण औषधीय गुणों से युक्त जड़ी-बूटी है। तुलसी की पूजा करने से घर में समृद्धि आती है, सुखशांति बनी रहती है।   

वैज्ञानिक तर्क
तुलसी शरीर के लिए बेहतरीन नैचुरल एंटीबायोटिक जड़ी है। तुलसी इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। अगर घर में तुलसी होगी तो इसकी पत्तियों का इस्तेमाल भी औषधी के रूप में किया जाता है, उससे कई तरह की बीमारियाँ दूर होती है। तुलसी कई असाध्य बीमारियों को ठीक करने में काम आती है। ये शरीर के तापमान को भी नियंत्रित रखती है।  

16- मूर्ति पूजन करना
भारत देश में पूजा अर्चना तथा मूर्ति पूजा करने की परम्परा है। भारत के अनेक राज्यों में मूर्ति पूजा बड़ी ही जोर शोर से की जाती है। लाखो भक्त इसमें सहभागी होते है, यहाँ श्रद्धालू धार्मिक आस्था का मेला लगते है।  

वैज्ञानिक तर्क
कहा जाता है की जो भी भक्त किसी मूर्ति के सामने खड़े होकर मूर्ति को देखकर प्रार्थना करता है, उसका पूरा ध्यान उसी आराध्य-देवता की तस्वीर या मूर्ति पर जाता है। ऐसा करने से मन एकदम प्रफुल्लित और एकाग्र हो जाता है, मन विचलित नहीं होता। स्वयं पर नियंत्रण रहता है, इसलिए भारत में आध्यात्मिक उन्नति के लिए मूर्ति पूजा का बहुत महत्व है। यह मानव जीवन का अहम हिस्सा है। मूर्ति पूजन से पहले मूर्ति के नीचे ताम्बे के पात्र या पत्रा रखा जाता है, जो चुम्बकीय तरंगो को अवशोषित करता है, इसे व्यक्ति को लाभ पहुंचता है।      

17-हाथों में कड़ा या चूड़िया पहनना   
कलाई हमारे हाथों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है भारतीय परंपरा के अनुसार भारतीय महिलायें हाथों में कड़ा या चूड़िया पहनती है।

वैज्ञानिक तर्क  
हाथों में चूडिया पहनने के पीछे वैज्ञानिक कारण है, चूडिया पहनने से त्वचा और चूड़ियों के बीच घर्षण होता है, इस प्रक्रिया में एक प्रकार की ऊर्जा उत्पन्न होती है, यह ऊर्जा शरीर के रक्त संचार को नियंत्रित करती है। जब ढेर सारी चूड़ियां एकसाथ पहनी जाती है तो उसके कारण ऊर्जा बाहर निकलने की बजाय शरीर के अंदर चली जाती है। इस प्रकार से शरीर की ऊर्जा बाहर न निकलकर वापिस शरीर में ही चली जाती है।  

18-हाथों और पैरों में मेहंदी लगाना
यह परम्परा पूरे भारतवर्ष में मनाई जाती है, शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार पर हाथों और पैरों में मेहंदी लगाने की परम्परा है, ताकि महिलाओं की सुन्दरता में चार चाँद लग जाए, महिलायें सुंदर दिखे।

वैज्ञानिक तर्क
मेहंदी एक जड़ी-बूटी है, जो ठंडी होने के साथ साथ इसमें औषधीय गुण भी है, जिसके लगाने से शरीर का तनाव, सिर दर्द, गर्मी, बुखार आदि से बचाव होता है। शरीर शीतल और ठंडा रहता है, इसके लगाने से वह नस ठंडी रहती है, जिसका सम्बन्ध सीधा अपने दिमाग से है। मेहंदी की ठंडक टेंशन कम करती है।

19-चरण स्पर्श करना  
हिन्दू धर्म में बड़ों का आदर – सम्मान करना उनके चरणस्पर्श करना एक अति प्राचीन परम्परा है। भारत के अधिकतर हिस्सों में बचपन से ही बच्चों को बड़ों के चरणस्पर्श करने की शिक्षा दी जाती है, ताकि वो बड़ों का आदर करें, उनके अंदर अच्छे संस्कार पले।

वैज्ञानिक तर्क
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाएँ तो विज्ञान में न्यूटन ने एक नियम का उल्लेख किया है कि इस भौतिक संसार में सभी वस्तुएं गुरुत्वाकर्षण के नियम से बंधी है और गुरुत्व भार सदैव आकृषित करने वाले की तरफ जाता है। यही नियम हमारे शरीर के लिए भी लागू होता है। सिर को उत्तरी ध्रुव और पैरों को दक्षिणी ध्रुव माना जाता है। मस्तिष्क से निकलने वाली ऊर्जा हाथों और सामने वाले पैरों से होते हुए एक चक्र पूरा करती है। इसे कॉस्मिक एनर्जी का प्रवाह कहते है। जब व्यक्ति चरण स्पर्श करता है तो जिस व्यक्ति के चरण स्पर्श किये जाते है, उसके हाथ सहज ही चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति के सिर पर जाते है और उसके सहस्रार चक्र से स्पर्श होते है। सहस्रार चक्र में सक्रियता उत्पन्न होती है जिससे ज्ञान, बुद्धि और विवेक का विकास सहज ही होने लगता है। 

20– मंदिर जाने का महत्व
हिन्दू धर्म में मंदिर जाने की परंपरा है। लोगों की आस्था का यह पवित्र स्थान है। यहाँ मूर्ति का पूजन भी किया जाता है। भगवान के सामने आपका मन स्थिर रहता है, मानसिक शांति मिलती है, मन प्रसन्न रहता है, आइये जानते है इसके पीछे का वैज्ञानिक तर्क क्या है।

वैज्ञानिक तर्क
वैदिक पद्धति के अनुसार मंदिर वही बनाया जाता है, जहां से पृथ्वी की चुम्बकीय तरंगे घनी होकर जाती है। जो व्यक्ति रोज मंदिर जाकर मूर्ति पूजा करता है तथा मूर्ति की घड़ी के चलने की दिशा में प्रदक्षिणा करता है वह शुद्ध एनर्जी को अवशोषित करता है, इससे सकारात्मक शक्ति का विकास होता है। मंदिर में मूर्ति के सामने प्रज्वलित दीप उष्मा की ऊर्जा का वितरण करता है। तीर्थ, जल, मंत्रोच्चार से मानसिक शांति का आभास होता है, चुम्बकीय ऊर्जा के घनत्व वाले स्थान में स्थित तामपत्र को स्पर्श करता है और यह कपूर और तुलसी से मिश्रित होता है, इस प्रकार यह दिव्य औषधी के रूप में व्यक्ति को लाभ पहुंचाता है।


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रीति रिवाज़ और परम्पराओं का वैज्ञानिक महत्त्व

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भारतीय संस्कृति मे रीति-रिवाज़ और परम्पराओं का वैज्ञानिक महत्त्व है.जैसे हमारे बुजुर्ग प्रातः उठकर अपने दोनों हाथों को देखते हैं और उसमें ईश्वर का दर्शन करते हैं.धरती पर पैर रखने से पहले धरती माँ को प्रणाम करते हैं क्योंकि जो धरती माँ धन-धान्य से परिपूर्ण करती है ,हमारा पालनपोषण करती है,उसी पर हम पैर रखते हैं.इसीलिए धरती पर पैर रखने से पहले उसे प्रणाम कर उससे माफ़ी मांगतेहैं.अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में ऐसा प्रसंग  है.

सूर्य ग्रहण  के समय घर से बाहर  न निकलने की परंपरा के पीछे वैज्ञानिक तथ्य छिपा हुआ है .दरअसल सूर्य ग्रहण के समय सूर्य से बहुत ही हानिकारक किरणें निकलती हैं जो हमें नुकसान पहुंचाती हैं.इसी तरह कहा जाता है  कि हमें सूर्योदय से पहले उठना चाहिए क्योंकि इस समय सूरज की किरणों में भरपूर विटामिन डी होता है और ब्रह्म मुहूर्त में उठने से हम दिनोंदिन तरोताजा रहते हैं और आलस हमारे पास भी नहीं फटकता .

हमारे वेद पुराणों में प्रकृति को माता और इसके हर रूप को देवी -देवताओं का रूप दिया गया है-हमने कुछ पेड़ों को जैसे-बरगद ,पीपल को देवताओं और तुलसी ,नदियों को देवी का रूप दिया है.यह कोई अन्धविश्वास नहीं है बल्कि इसके पीछे बहुत  बड़ा तथ्य छुपा हुआ है .हमारे पूर्वजों  ने  इन्हें देवी-देवताओं का दर्जा इसलिए दिया क्योंकि कोई व्यक्ति किसी की पूजा करता है तो वह कभी भी  उसको नुकसान नहीं पहुंचा सकता .

घर में पूजा पाठ करते समय धूप, अगरवत्ती ,ज्योति जलाते हैं तथा शंख बजाते हैं इन सबके पीछे वैज्ञानिक तथ्य छुपा हुआ है .ऐसा माना जाता है कि शंख बजाने से शंख-ध्वनि जहाँ तक जाती  है वहां तक की वायु से जीवाणु -कीटाणु सभी नष्ट हो जाते हैं .

हमारे यहाँ चारो धाम घूमने की परंपरा है इस परंपरा के पालन करने से हमें देश के भूगोल का ज्ञान होता है ,पर्यावरण के सौंदर्य का बोध होता है और साथ में ये यात्रायें हमारे स्वास्थ्य के लिए भी  लाभकारी हैं क्योंकि इससे हमारा मन प्रसन्न रहता है.

हमारे सभी रीति-रिवाज़ और त्यौहार हमारे संबंधों को मजबूत करते हैं जैसे-रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम को बढ़ाता है.करवाचौथ दाम्पत्य जीवन  में मधुरता लाता है.ऐसे ही छठ में माँ अपने बच्चे की लम्बी उम्र के लिए व्रत करती है.

विदेशी लोग भारत  आकर यहाँ की संस्कृति,रीति-रिवाजों और परम्पराओं को देख रहे हैं और अपना रहे हैं भारतीय संस्कृति से प्रभावित विदेशी पर्यटक मन की शांति के लिए भारत आते हैं और यहाँ आने पर उन्हें एक अजीब से सुकून का अनुभव होता है.

हमारी भारतीय संस्कृति में माता-पिता और गुरु के पैर छूने की परंपरा  है माता-पिताऔर बड़ों  को अभिवादन करने से मनुष्य की चार चीजे बढती हैं -आयु, विद्या ,यश और बल.

                अभिवादन शीलस्य नित्यं बृद्ध-उपसेविन:।
                चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं ।।
    
सज्जन और श्रेष्ठ लोगों का अपना एक प्रभा मंडल  होता है और जब हम अपने गुरु और अपने से बड़ों  के पैर छूते हैं तो उसकी कुछ  अच्छाईयां हमारे अंदर भी आ जाती हैं.
       
आज हम अपनी परम्पराएँ और रीति रिवाज भूलते जा रहे हैं और समाज विघटन की और अग्रसर हो रहा है ऐसे में आवश्यकता है की हम अपने रीति-रिवाजों और परंपरा के पीछे वैज्ञानिक कारणों को जाने और उन्हें अपनाकर अपना जीवन सुखमय बनायें.



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रक्षा सूत्र बाधने का वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व

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आपने देखा होगा अनुष्ठान हो या पूजा-पाठ, कोई मांगलिक कार्य हो या देवों की आराधना, सभी शुभ कार्यों में हाथ की कलाई पर लाल धागा यानि मौली बांधने की परंपरा है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर मौली यानि कलावा क्यों बांधते हैं? आखिर इसकी वजह क्या है? कलावा यानी रक्षा सूत्र बांधने के वैज्ञानिक और धार्मिक दोनों महत्व है.

बताया जाता है कि इंद्र जब वृत्रासुर से युद्ध करने जा रहे थे तब इंद्राणी शची ने इंद्र की दाहिनी भुजा पर रक्षा-कवच के रूप में कलावा बांध दिया था और इंद्र इस युद्ध में विजयी हुए। उसके बाद से ये रक्षा सूत्र बांधा जाता है। वहीं इसके अनुष्ठान की बाधांए दूर हो जाती है। शास्त्रों का ऐसा मत है कि कलावा बांधने से त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु व महेश तथा तीनों देवियों लक्ष्मी, पार्वती व सरस्वती की कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मा की कृपा से कीर्ति विष्णु की अनुकंपा से रक्षा बल मिलता है और शिव दुर्गुणों का विनाश करते हैं।

इसी प्रकार लक्ष्मी से धन, दुर्गा से शक्ति एवं सरस्वती की कृपा से बुद्धि प्राप्त होती है। वहीं अगर वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो स्वास्थ्य के अनुसार रक्षा सूत्र बांधने से कई बीमारियां दूर होती है, जिसमें कफ, पित्त आदि शामिल है। शरीर की संरचना का प्रमुख नियंत्रण हाथ की कलाई में होता है, अतः यहां रक्षा सूत्र बांधने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। ऐसी भी मान्यता है कि इसे बांधने से बीमारी अधिक नहीं बढती है। ब्लड प्रेशर, हार्ट एटेक, डायबीटिज और लकवा जैसे रोगों से बचाव के लिये मौली बांधना हितकर बताया गया है।

वैज्ञानिक लाभ

हाथ, पैर, कमर और गले में मौली बांधने से आपको स्वास्थ्य लाभ भी होता है, जैसे कि इससे त्रिदोष यानि वात, पित्त और कफ का संतुलन बना रहता है। इसके बांधने से रक्तचाप, हृदयाघात, मधुमेह और लकवा जैसे गंभीर बीमारियों से बचाव करने में भी लाभ होता है।

रक्षा सूत्र बाधने का  इतिहास

कहा जाता है श्रावण मास की पूर्णिमा को भगवान विष्णु ने राजा बलि को रक्षासूत्र बांधकर पाताल लोक में राज करने के लिए भेज दिया था इसलिए इस मंत्र के साथ कलावा बांधा जाता है जिसमे राजा बलि का वर्णन है।

"येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः  तेन त्वां प्रतिबध्नामि, रक्षंमाचल माचल । " इस मंत्र के द्वारा रक्षा सूत्र कलाई में बांधा जाता है।

मौली बांधना वैदिक परंपरा का हिस्सा है। यज्ञ के दौरान इसे बांधे जाने की परंपरा तो पहले से ही रही है, लेकिन इसको संकल्प सूत्र के साथ ही रक्षा-सूत्र के रूप में तब से बांधा जाने लगा, जबसे असुरों के दानवीर राजा बलि की अमरता के लिए भगवान वामन ने उनकी कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा था। इसे रक्षाबंधन का भी प्रतीक माना जाता है, जबकि देवी लक्ष्मी ने राजा बलि के हाथों में अपने पति की रक्षा के लिए यह बंधन बांधा था। मौली को हर हिन्दू बांधता है। इसे मूलत: रक्षा सूत्र कहते हैं।

मौली का अर्थ : 'मौली' का शाब्दिक अर्थ है 'सबसे ऊपर'। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।

मौली बांधने का मंत्र :

‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’

कैसी होती है मौली? : मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला और हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदेव।

कहां-कहां बांधते हैं मौली? : मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। इसके अलावा मन्नत के लिए किसी देवी-देवता के स्थान पर भी बांधा जाता है और जब मन्नत पूरी हो जाती है तो इसे खोल दिया जाता है। इसे घर में लाई गई नई वस्तु को भी बांधा जाता और इसे पशुओं को भी बांधा जाता है।

किस हाथ में मौली बांधे

सभी विद्वानों के इस बात को लेकर अलग अलग विचार हैं। कुछ का मानना है कि की अविवाहित लड़की और पुरुष के दाहिने हाथ में और विवाहित स्त्री के बाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। वहीं दूसरी ओर कुछ विद्वान सभी के दाहिने हाथ में कलावा बांधने का ही परामर्श देते हैं। उनका ये मानना होता है कि सभी धार्मिक कार्य दाहिने हाथ से होता है तो सभी के दाहिने हाथ में ही कलावा बांधना चाहिए।

कब बांधी जाती है मौली? :

  1. पर्व-त्योहार के अलावा किसी अन्य दिन कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है।
  2. हर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को पीपल के वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें।
  3. प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, यज्ञ की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि हिन्दू संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।
  4. मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है। 
  5. किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं।
  6. किसी देवी या देवता के मंदिर में मन्नत के लिए भी बांधते हैं।
  7. मौली बांधने के 3 कारण हैं- पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक।
  8. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।* हिन्दू धर्म में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।
  9. इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।

संकटों से रक्षा करती है मौली..

मौली करती है रक्षा : मौली को कलाई में बांधने पर कलावा या उप मणिबंध करते हैं। हाथ के मूल में 3 रेखाएं होती हैं जिनको मणिबंध कहते हैं। भाग्य व जीवनरेखा का उद्गम स्थल भी मणिबंध ही है। इन तीनों रेखाओं में दैहिक, दैविक व भौतिक जैसे त्रिविध तापों को देने व मुक्त करने की शक्ति रहती है।  इन मणिबंधों के नाम शिव, विष्णु व ब्रह्मा हैं। इसी तरह शक्ति, लक्ष्मी व सरस्वती का भी यहां साक्षात वास रहता है। जब हम कलावा का मंत्र रक्षा हेतु पढ़कर कलाई में बांधते हैं तो यह तीन धागों का सूत्र त्रिदेवों व त्रिशक्तियों को समर्पित हो जाता है जिससे रक्षा-सूत्र धारण करने वाले प्राणी की सब प्रकार से रक्षा होती है। इस रक्षा-सूत्र को संकल्पपूर्वक बांधने से व्यक्ति पर मारण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन, भूत-प्रेत और जादू-टोने का असर नहीं होता।

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सनातन धर्म में तिलक लगाने का महत्व

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चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़, तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर" हिंदू धर्म में तिलक की परंपरा वैदिक काल से चलती चली आ रही है। ब्रह्मण्ड पुराण, गरुड़ पुराण, पद्म पुराण, गर्ग संहिता एवं विष्णु संहिता में तिलक का वर्णन विस्तार से किया गया है। मस्तक पर लगाया जाने वाले तिलक की परंपरा भारत और हिंदू धर्म में अत्यंत प्राचीन है। हिंदू धर्मानुसार मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान निवास करते हैं इसलिए तिलक भी इसी स्थान पर लगाया जाता है। इसके अलावा तिलक लगाना देवी मां की आराधना से भी जुड़ा है। हिंदू धर्म में तिलक लगाने से पूर्व नित्यक्रिया से निवृत्त होकर स्नानादि के बाद तिलक लगाना चाहिए। तिलक हमेशा दोनों भौहों के बीच आज्ञाचक(चेतना केंद्र) पर भृकुटी पर लगाया जाता है। 

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तिलक लगाने के फायदे

स्नाने दाने जपे होमो देवता पितृकर्म च । 
तत्सर्वं निष्फलं यान्ति ललाटे तिलकं विना ।। 

अर्थात तिलक के बिना ही यदि तीर्थ स्नान, जप कर्म, दानकर्म, यज्ञ होमादि, पितर हेतु श्राद्ध कर्म तथा देवो का पुजनार्चन कर्म किया जाता है तो कर्म का फल नहीं मिलता है अर्थात कर्म निष्फल रहता है।  आमतौर पर जब आप किसी को तिलक  लगाए हुए देखते हैं तो आपके मन में एक सवाल उठता है कि आखिर तिलक लगाने से क्या फायदा मिलता है? कहीं इसे केवल दिखावे के लिए तो नहीं लगाया जाता है, तो हम आपको बता दें कि तिलक लगाने का अपना एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। दरअसल तिलक या टीका लगाने से आध्यात्मिक भावना के साथ-साथ दूसरों के लाभ की कामना भी है। आमतौर पर लोग कुमकुम, मिट्टी, हल्दी, भस्म और अक्षत का टीका लगाते हैं। कुमकुम का तिलक लगाने से आकर्षण बढ़ाकर स्फूर्तिवाला बनाता है। केसर का तिलक लगाने से मान-सम्मान में वृद्धि होती है। चंदन का तिलक लगाने से शीतलता मिलती है। भस्म का तिलक लगाने से अचानक आने वाले संकटों से मुक्ति मिलती है। वहीं कुछ लोग अपने तिलक को दिखाना नहीं चाहते हैं तो वे जल से माथे पर तिलक लगाते हैं। पुरुष को हमेशा चंदन का तिलक लगाना चाहिए और स्त्री को हमेशा कुमकुम का तिलक लगाना चाहिए।     
पद्म पुराण में बताया गया है की।....

वाम्-पार्श्वे स्थितो ब्रह्मा
दक्षिणे च सदाशिवः
मध्ये विष्णुम् विजनियात
तस्मान् मध्यम न लेपयेत् 

अर्थात तिलक के बायीं ओर ब्रह्मा जी विराजमान हैं, दाहिनी ओर सदाशिव एवं मध्य में श्री विष्णु का स्थान है। इसलिए मध्य भाग में कुछ लेपना नहीं चाहिए। 

तिलक लगाने के नियम

तिलक बनाते समय पद्म पुराण में वर्णित निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें:

ललाटे केशवं ध्यायेननारायणम् अथोदरे
वक्ष-स्थले माधवम् तु गोविन्दम कंठ-कुपके 
विष्णुम् च दक्षिणे कुक्षौ बहौ च मधुसूदनम् 
त्रिविक्रमम् कन्धरे तु वामनम् वाम्-पार्श्वके 
श्रीधरम वाम्-बहौ तु ऋषिकेशम् च कंधरे 
पृष्ठे-तु पद्मनाभम च कत्यम् दमोदरम् न्यसेत् 
तत प्रक्षालन-तोयं तु वसुदेवेति मूर्धनि

माथे पर तिलक लगाते समय ॐ केशवाय नमः का जाप (ध्यान) करें। नाभि के ऊपर- ॐ नारायणाय नमः, वक्ष-स्थल - ॐ माधवाय नमः,कंठ - ॐ गोविन्दाय नमः, उदर के दाहिनी ओर - ॐ विष्णवे नमः, दाहिनी भुजा - ॐ मधुसूदनाय नमः, दाहिना कन्धा - ॐ त्रिविक्रमाय नमः, उदर के बायीं ओर - ॐ वामनाय नमः, बायीं भुजा - ॐ श्रीधराय नमः, बायां कन्धा - ॐ ऋषिकेशाय नमः, पीठ का ऊपरी भाग - ॐ पद्मनाभाय नमः, पीठ का निचला भाग - ॐ दामोदराय नमः के जाप (ध्यान) के साथ तिलक लगाये। अंत में जो भी गोपी-चन्दन बचे उसे ॐ वासुदेवाय नमः का उच्चारण करते हुए शिखा में पोंछ लेना चाहिए। 

माथे पर तिलक लगाने के अलावा हिन्दू परंपराओं में गले, हृदय, दोनों बाजू, नाभि, पीठ, दोनों बगल आदि मिलाकर शरीर के इन्हीं 12 स्थानों पर तिलक लगाने का विधान है।

तिलक लगाने का महत्व

हिंदू धर्म में तिलक का अपना ही एक अलग महत्व है। यदि आप किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए जाते हैं या शुभ घटना से लेकर धार्मिक कार्यों, अनुष्ठानों या कहीं यात्रा पर जाते हैं तो शुभकामना के तौर पर तिलक लगाना शुभ माना जाता है। यदि कहं पर धार्मिक अनुष्ठान होता है तो सर्वप्रथम विघ्नहर्ता गणपति की पूजा की जाती है फिर सभी के माथे पर तिलक लगाया जाता है। मान्यता है कि सूने मस्तक को अशुभ माना जाता है और तिलक देवी का आशीर्वाद माना जाता है। अगर हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो तिलक लगाने से व्यक्ति में आत्मविश्वास और आत्मबल का विकास होता है। तिलक लगाने से आपके मस्तक को ऊर्जा और शांति मिलती है। इससे दिमाग में सेराटोनिन और बीटा एंडोर्फिन का स्राव संतुलित तरीके से होता है, जिससे उदासी दूर होती है और मन में उत्साह जागता है तथा सिरदर्द की समस्या का भी निवारण होता है। हल्दी का तिलक लगाने से त्वचा शुद्ध होती है क्योंकि हल्दी में एंटीबैक्टीरियल तत्व होते हैं। 

तिलक लगाने का विधान

विष्णु संहिता में तिलक लगाने के विधान के बारे विस्तार से वर्णन किया गया है। किस अंगुली से किस तरह का तिलक लगाना चाहिए, इसके बारे में बताया गया है। हाथ की 4 अंगुलियों का इस्तेमाल तिलक लगाने के लिए किया जाता है। तिलक हमेशा उत्तर की ओर मुख करके लगाना चाहिए। 

अंगूठे से लगाया गया तिलक मोक्ष प्राप्ति वाला होता है। 
तर्जनी अंगुली से तिलक लगाने से शत्रुओं का नाश होता है। 
मध्यमा अंगुली से तिलक लगाने से आयु में वृद्धि होती है और व्यक्ति धनवान बनता है। 
अनामिका अंगुली से तिलक लगाने से सुख-शांति प्राप्त होती है और मान-सम्मान में बढ़ोत्तरी होती है।

ध्यान रखने योग्य बात यह है कि देवी-देवताओं को अनामिक अंगुली से ही तिलक लगाना चाहिए। 

तिलक कई प्रकार के होते हैं:- 

मृतिका, भस्म, चंदन, रोली, केसर, सिंदूर, कुंकुम, गोपी आदि।  सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं। 
  • शैव परंपरा में ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है
  • शाक्त सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है।
  • वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- लालश्री तिलक-इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है।
  • विष्णुस्वामी तिलक यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भौंहों के बीच तक आता है। 
  • रामानंद तिलक विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है। 
  • श्यामश्री तिलक इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है। 
  • अन्य तिलक गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। कई साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते
चांदन का तिलक : चंदन का तिलक लगाने से पापों का नाश होता है, व्यक्ति संकटों से बचता है, उस पर लक्ष्मी की कृपा हमेशा बनी रहती है, ज्ञानतंतु संयमित व सक्रिय रहते हैं। चंदन का तिलक ताजगी लाता है और ज्ञान तंतुओं की क्रियाशीलता बढ़ाता है। चन्दन के प्रकार : हरि चंदन, गोपी चंदन, सफेद चंदन, लाल चंदन, गोमती और गोकुल चंदन।  
 
कुमकुम का तिलक:- कुमकुम का तिलक तेजस्विता प्रदान करता है।

मिट्टी का तिलक:- विशुद्ध मिट्टी के तिलक से बुद्धि-वृद्धि और पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
 
केसर का तिलक:-  केसर का तिलक लगाने से सात्विक गुणों और सदाचार की भावना बढ़ती है। इससे बृहस्पति ग्रह का बल भी बढ़ जाता है और भाग्यवृद्धि होती है।
 
हल्दी का तिलक:- हल्दी से युक्त तिलक लगाने से त्वचा शुद्ध होती है।
 
दही का तिलक:- दही का तिलक लगाने से चंद्र बल बढ़ता है और मन-मस्तिष्क में शीतलता प्रदान होती है।
 
इत्र का तिलक:- इत्र कई प्रकार के होते हैं। अलग अलग इत्र के अलग अलग फायदे होते हैं। इत्र का तिलक लगाने से शुक्र बल बढ़ता हैं और व्यक्ति के मन-मस्तिष्क में शांति और प्रसन्नता रहती है।

तिलकों का मिश्रण:- अष्टगन्ध में आठ पदार्थ होते हैं- कुंकुम, अगर, कस्तुरी, चन्द्रभाग, त्रिपुरा, गोरोचन, तमाल, जल आदि। पंचगंध में गोरोचन, चंदन, केसर, कस्तूरी और देशी कपूर मिलाया जाता है। गंधत्रय में सिंदूर, हल्दी और कुमकुम मिलाया जाता है। यक्षकर्दम में अगर, केसर, कपूर, कस्तूरी, चंदन, गोरोचन, हिंगुल, रतांजनी, अम्बर, स्वर्णपत्र, मिर्च और कंकोल सम्मिलित होते हैं।
 
गोरोचन:- गोरोचन आज के जमाने में एक दुर्लभ वस्तु हो गई है। गोरोचन गाय के शरीर से प्राप्त होता है। कुछ विद्वान का मत है कि यह गाय के मस्तक में पाया जाता है, किंतु वस्तुतः इसका नाम 'गोपित्त' है, यानी कि गाय का पित्त। हल्की लालिमायुक्त पीले रंग का यह एक अति सुगंधित पदार्थ है, जो मोम की तरह जमा हुआ सा होता है। अनेक औषधियों में इसका प्रयोग होता है। यंत्र लेखन, तंत्र साधना तथा सामान्य पूजा में भी अष्टगंध-चंदन निर्माण में गोरोचन की अहम भूमिका है। गोरोचन का नियमित तिलक लगाने से समस्त ग्रहदोष नष्ट होते हैं। आध्यात्मिक साधनाओं के लिए गारोचन बहुत लाभदायी है।

तिलक लगाने के मंत्र

01-केशवानन्न्त गोविन्द बाराह पुरूषोत्तम ।
     पुण्यं यशस्यमायुष्यं तिलकं में प्रसीदतु ।।

02- कान्ति लक्ष्मीं धृतिं सौख्यं सौभाग्यमतुलं बलम् ।
       ददातु चन्दनं नित्यं सततं धारयाम्यहम् ।।

जब आप किसी और को तिलक करे :---

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा:
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदा: । 

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः
स्वस्ति ना ब्रहुस्पतिर्दधातु ।। 

ॐभद्रं कर्णेभिःश्रुणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। 
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा घुम सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायु: ।। 

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।। 

अर्थात महती कीर्ति वाले ऐश्वर्या शाली इंद्र हमारा कल्याण करें, जिसको संसार का विज्ञान और जिसका सब पदार्थों में स्मरण हैं, सबके पोषणकर्ता वह पूषा (सूर्य) हमारा कल्याण करें। जिनकी चक्रधारा के समान गति को कोई नहीं रोक सकता, वे गरुड़देव हमारा कल्याण करें। देववाणी के स्वामी बृहस्पति हमारा कल्याण करें।  यजमान के रक्षक देवताओं हम दृढ़ अंगों वाले शरीर से पुत्र आदि के साथ मिलकर आपकी स्तुति करते हुए,कानों से कल्याण की बातें सुने, नेत्रों से कल्याणमयी वस्तुओं को देखें देवताओं की उपासना योग्य आयु को प्राप्त करें। 

किस दिन कौन-सा तिलक लगाना चाहिए
  1. सोमवार भगवान शिव का दिन होता है इसलिए सफेद तिलक या भस्म लगाना शुभ माना जाता है। इससे मन शांत और निर्मल रहता है।
  2. मंगलवार का दिन बजरंगबली को समर्पित होता है। इस दिन लाल या सिंदूरी तिलक लगाना शुभ माना जाता है। इससे मनुष्य पूरे दिन ऊर्जावान रहता है।
  3. बुधवार का दिन भगवान गणपति का होता है। इस दिन सादे सिंदूर का तिलक लगाना चाहिए, इससे मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है और सफलता मिलती है।
  4. गुरुवार देव गुरु का दिन होने के कारण पीत वर्ण यानि पीले रंग का तिलक लगाना चाहिए। जिससे सकारात्मक ऊर्जा और विचारों का आगमन होता है।
  5. शुक्रवार मां लक्ष्मी का दिन होता है इस दिन लाल चंदन लगाना शुभ माना जाता है, जिससे मनुष्य को सुख-समृद्धि और वैभव प्राप्त होता है।
  6. शनिवार को शनिदेव और यमराज का दिन कहा जाता है। इस दिन मस्तक पर विभूति, भस्म और लाल चंदन लगाना शुभ माना जाता है। 
  7. रविवार का दिन भगवान सूर्य और विष्णु को समर्पित रहता है। इस दिन लाल चंदन या हरि चंदन लगाने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और इंसान निर्भीक बनता है।
सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं। प्रत्येक सम्प्रदाय का अपना अपना तिलक चिन्ह होता है जिससे व्यक्ति को देख कर यह पता चल जाता है कि वह किस सम्प्रदाय का अनुयायी है। तीर्थों में देवताओं के दर्शनार्थ उपस्थित होने पर माथे पर तिलक लगाकर शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद दिया जाता है ताकि भक्तों को उसके दर्शन का पूर्ण एवं मनोवांछित फल प्राप्त हो सके। उत्तर भारत में तिलक हमेशा आरती के साथ बड़े ही आदर सत्कार द्वारा लगाया जाता है जो कि प्रसन्नता, सफलता, सात्विकता एवं शुभकामनाओं का प्रतीक माना गया है। 


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नाक क्यों छिदवाती हैं महिलाएं?, क्या है इसके पीछे असल वजह

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हमारी भारतीय संस्‍कृति में आभूषणों और शृंगार का विशेष महत्‍व है। भारतीय संस्‍कृति में हर आभूषण को पहनने के पीछे एक अलग कारण है जिसका उल्‍लेख प्राचीन वेदों में भी मिलता है। 16 शृंगार में से एक है नथ पहनना। हमारे देश में शादीशुदा और कुंवारी युवतियां और महिलाएं नाक छिदवाना पसंद करती है। हालांकि आजकल की कई मह‍िलाएं ट्रेंड के ह‍िसाब ऐसा करना पसंद करती है तो शादीशुदा महिलाएं भारतीय रीति रिवाज को फॉलो करते हुए नाक में नथ या तिनका पहनती है।

नाक छिदवाना भारतीय संस्कृति और परंपरा के हिसाब से बहुत जरूरी माना जाता है। लेकिन बहुत कम लड़कियां जानती है कि यह स्त्री की खूबसूरती बढ़ाने के साथ-साथ सेहत के ल‍िए भी लाभकारी है। भारतीय महिलाओं के नाक छिदवाने के पीछे का कारण बेहद कम लोग जानते होंगे। अधिकतर महिलाएं इसे सिर्फ शृंगार से जोड़कर ही देखती हैं। आज हम आपको बताएंगे कि भारतीय परंपरा के अनुसार महिलाओं का नाक छिदवाना क्यों जरूरी समझा जाता है।

16 वीं सदी में आई थी ये प्रथा -

नाक में छेद करवाने के लिए कोई विशेष उम्र नहीं होती। इसे बचपन, किशोरावस्था, वयस्क होने पर कभी भी करवा सकते हैं। गर्भावस्था में भी महिलाएं नाक छिदवा सकती है। इससे शिशु पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता है। भारत में नाक छिदवाने को संस्‍कृति से जोड़कर देखा जाता है। पर क्या आप जानती हैं की यह प्रथा पूर्वी देशों से आई है। 16वी सदी में यह प्रथा भारत में आई थी। वेदों में इसके फायदे के बारे में लिखा गया है।

नाक छिदवाने से फायदे -वेदों और शास्त्रों में लिखा गया है कि नाक छिदवाने से महिला को माहवारी पीड़ा से राहत मिलती है। इसके अलावा प्रसव के दौरान शिशु को जन्म देने में आसानी होती है। नाक छिदवाने से माइग्रेन में भी राहत मिलती है।

कैसे करता है मदद -

नाक छिदवाने से शरीर के विशिष्ट प्रेशर पॉइंट्स प्रभावित होते हैं। इनसे शरीर में एक खास किस्‍म का दबाव बनता है जो हॉर्मोन पैदा करता है। यह हॉर्मोन आपके दर्द को कम करने में मदद करते हैं। जिस तरह चाईनीज़ लोग एक्यूपेंचर पद्धति का इस्तेमाल करने से शरीर के विशिष्ट प्रेशर पॉइंट्स पर दबाव बनता है और आपको दर्द से राहत मिलती है वैसे ही नाक छिदवाने से महिला को दर्द से राहत मिलती है।

बाई ओर क्‍यों छिदवाई जाती है नाक-

आपने देखा होगा कि लड़कियों की बाई ओर की नाक छेदी जाती है क्योंकि उस जगह की नसें नारी के महिला प्रजनन अंगों से जुडी हुई होती हैं। नाक के इस हिस्से पर छेद करने से महिला को प्रसव के समय भी कम दर्द का सामना करना पड़ता है। इस वजह से बाई ओर नाक छिदवाई जाती है।

संक्रमण का ध्‍यान रखें ध्यान -
रहे की नाक छिदवाते समय आप ढंग की साफ़-सुथरी दुकान से विसंक्रमित उपकरणों से ही कान छिदवाएं। कई बार होता है कि कान छिदवाने में लापरवाही बरतने से महिलाओं की नाक के आस-पास सूजन आ जाती है।


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