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भारत का एक ऐसा मंदिर,जिसकी पहरेदारी करता है शाकाहारी मगरमच्छ

 
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भारत सांस्कृतिक सम्पदा से सम्पन्न देश है। यहाँ के लगभग हर मोहल्ले, हर गली में कोई कहानी छुपी है। “हमारी धरोहर”  द बेटर इंडिया की  एक ऐसी श्रंखला है, जहाँ हम उन इमारतों, स्मारकों या विरासत स्थलों की सैर करते हैं, जहाँ अनूठी और दिलचस्प कहानियों का अम्बार छुपा हुआ है और जिन्हें सामने लाने की आवश्यकता है।  

अनंतपुर मंदिर कासरगोड, केरला में स्थित एकमात्र झील मंदिर है, और ‘बबिआ ‘ नाम के एक दिव्य मगरमच्छ की किंवदंती से प्रख्यात है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह मंदिर की रक्षा करता है। लोग यह भी कहते हैं कि जब झील में एक मगरमच्छ की मृत्य होती है तो रहस्यपूर्ण ढंग से एक दूसरा मगरमच्छ प्रकट हो जाता है! यह मंदिर भगवान अनंतपद्मनाभस्वामी (भगवान विष्णु) को समर्पित है। २ एकड़ की बड़ी झील के बीचों बीच समाया यह प्राकृतिक छटा एवं परिदृश्य का साक्षी है।

मंदिर प्रांगण की मूल मूर्तियां धातु औऱ पथ्थर की नहीं बनीं, बल्कि 70  से भी अधिक औषधीय सामग्रियों के समावेश से निर्मित हैं, जिसे  ‘कादु – शर्करा – योगं ‘ के नाम से जाना जाता है। १९७२ में इन मूर्तियों को पंचलौहधातु से निर्मित मूर्तियों से बदल दिया गया था। आजकल इन्हें ‘कादु – शर्करा – योगं ‘ से निर्मित मूर्तियों से बदलने के प्रयास जारी हैं। अनंतपुर झील मंदिर तिरुवनंतपुरम के अनंतपद्मनाभस्वामी का मूल स्थान है। यहाँ के पीठासीन देवता भगवान अनंतपद्मनाभ, सर्प देवता आदिशेष के ऊपर विराजते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है की भगवान मूलतः यहीं आकर स्थापित हुए थे।

मंदिर की दीवारें चित्रों से घिरी हुई हैं और यहाँ एक गुफा है जिसका मुख एक ऐसे तालाब की ओर खुलता है जहां का जलस्तर मौसम से अप्रभावित रहते हुए हमेशा समान रहता है। माना जाता है कि मंदिर की रक्षा करने वाला मगरमच्छ इस तालाब में करीब ६० साल विद्यमान है। देवता की पूजा के पश्चात, श्रद्धालुओं से मिला प्रसाद ‘बबिआ’ को खिलाया जाता है जो उसे सिर्फ मंदिर के प्रबंधन मण्डली के द्वारा अर्पण करने पर ही स्वीकार करता है। किसी हाथी की तरह बबिआ को भी को भी खाना उस के मुंह में डालकर खिलाया जाता है। यह भी मान्यता है कि यह मगरमच्छ शाकाहारी है और किसी को भी नुक्सान नहीं पहुंचाता, चाहे वो झील की अन्य प्रजातियां ही क्यों न हों।

कहते हैं वर्ष १९४५ में एक अँग्रेज़ सिपाही ने मगरमच्छ को गोली से मार डाला था। वो सिपाही कुछ ही दिनों में सांप के काटने से मर गया। लोग इसे सर्प देवता अनंत का प्रतिशोध मानते हैं। जल्द ही एक नया मगरमच्छ तालाब में अवतरित हो गया, और यदि आप भाग्यशाली रहे तो अब भी आप उसे देख सकते हैं। मंदिर के ट्रस्टी श्री रामचन्द्रभट्टजी कहते हैं, “हमारा दृढ़ विश्वास है कि ये मगरमच्छ ईश्वर का दूत है और जब भी मंदिर प्राँगण में या उसके आसपास कुछ भी अनुचित होने जा रहा होता है तो यह मगरमच्छ हमें सूचित कर देता है”।

अनंतपुर मंदिर कैसे पहुंचा जाये ? 

यदि आप ट्रेन से यात्रा कर रहे हैं तो आप कासरगोड में उतर के एक  रिक्शा या टॅक्सी लेकर मंदिर तक आ सकते हैं। मंदिर कासरगोड से १८ किलोमीटर दूर है। यदि आप हवाई जहाज़ से आते हैं तो मैंगलोर सबसे निकटतम हवाई अड्डा है। वहां से मंदिर लगभग ५० किलोमीटर दूर है। वहां से आप बस या ट्रेन पकड़ कर यहाँ पहुँच सकते हैं।ज़्यादा जानकारी के लिए उनकी वेबसाइट, Facebook या Twitter पर संपर्क करें।


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क्यों आज तक कैलाश पर्वत पर कोई चढ़ नहीं पाया

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हिंदू धर्म में कैलाश पर्वत का बेहद खास महत्व है। इसे भगवान शिव का निवास स्थल माना गया है। चीन के कब्जे वाले तिब्बत क्षेत्र में आने वाले कैलाश पर्वत और मानसरोवर की यात्रा हर साल हजारों श्रद्धालु करते हैं। इस यात्रा को बेहद मुश्किल माना जाता है। यहां तक जाने का रास्ता भी बेहद दुर्गम है। इसके बावजूद यात्री पूरे जोश और भक्ति में सराबोर होकर कैलाश मानसरोवर तक की यात्रा करते हैं।

हालांकि, क्या आप जानते हैं कि इस यात्रा पर जाने वाले भक्त मानसरोवर में तो डुबकी लगाते हैं पर उन्हें कैलाश पर्वत को दूर से ही प्रणाम कर लौटना पड़ता है। कैलाश मानसरोवर का स्थल हिंदुओं के साथ-साथ बौद्ध धर्म मानने वालों के लिए भी बेहद पवित्र माना गया है। वैसे, यह दिलचस्प और हैरान करने वाली बात है कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर 9 हजार से ज्यादा लोग चढ़ाई कर चुके हैं लेकिन कैलाश पर्वत की चोटी पर आज तक कोई नहीं पहुंच सका है। कई लोगों ने कोशिश जरूर की, लेकिन या कुछ अपनी जान गंवा बैठे तो कुछ को हार मानकर वापस लौटना पड़ा।

कैलाश की ऊंचाई करीब 6638 मीटर है और इस लिहाज से यह एवरेस्ट से लगभग 2200 मीटर कम है। इसके बावजूद कोई भी कैलाश पर नहीं चढ़ सका है। आखिर ऐसा क्यों हैं? क्यों दुनिया को कैलाश के बारे में बहुत कम पता है? जानिए, कैलाश पर्वत से जुड़े 10 रहस्य.... 

आइये जानते है इस पवित्र पर्वत से जुड़ी कुछ रहस्यों और सच्चाइयों को :-

1. पिरामिड है कैलाश!- 

रूस के एक डॉक्टर अर्नेस्ट मल्डासेव ने अपनी जांच के बाद यह थ्योरी दी कि कैलाश पर्वत दरअसल इंसानों द्वारा बनाया गया एक विशाल और प्राचीन पिरामिड है और चारों ओर से छोटे-छोटे पिरामिड से घिरा है। हालांकि, इस थ्योरी को लेकर कोई पुख्ता बात सामने नहीं आ सकी। बाद में ये तथ्य कई वैज्ञानिकों ने खारिज भी कर दिये।

2. कैलाश पर चढ़ाई के दौरान तेजी से बढ़ने लगती है उम्र: 

कैलाश पर चढ़ने की कोशिश करने वाले कई पर्वतारोहियों ने यह अनुभव किया है कि चढ़ाई के दौरान उनके बाल और नाखून तेजी से बढ़ने शुरू हो गये। एक बार साइबेरिया क्षेत्र के कुछ लोगों ने इस पर चढ़ने की कोशिश की लेकिन उन्होंने अनुभव किया कि वे बूढ़े होने लगे हैं। इन सभी को अपनी चढ़ाई बीच में छोड़कर लौटना पड़ा और इस घटना के एक साल बाद सभी की मृत्यु हो गई।

3. कैलाश पर चढ़ाई: 
कैलाश पर्वत पर चढ़ाई में अब तक कोई सफल नहीं हो सका है। कभी खराब मौसम के कारण, कभी स्वास्थ्य तो कभी रास्ता भटक जाने के कारण कोई भी इस पर्वत पर आज तक नहीं चढ़ सका। कई लोगों ने यह अनुभव बताया है कि तमाम तैयारियों के बावजूद वे रास्ता भूल गये।

4. दुनिया इन रहस्यों से अब भी अनजान:  

हिंदू और बौद्ध मान्यताओं के अनुसार कैलाश पर्वत के चारों ओर कई ऐसी गुफाए हैं, जिनके बारे में दुनिया को पता नहीं है। यहां दिव्य साधु-संत जाकर रहते हैं और तपस्या करते हैं। यह गुफाएं केवल कुछ लोग ही देख सके हैं।

5. कैलाश पर रहते हैं भगवान: 
तिब्बत की एक लोक कथा के अनुसार मिलारेपा नाम के एक बौद्ध संत कैलाश पर्वत पर सबसे ऊंचाई पर पहुंचने में सफल रहे। जब वे वहां से लौटे तो उन्होंने सभी को आगाह किया कि वे वहां जाने की कोशिश न करें क्योंकि वहां भगवान आराम कर रहे हैं।

6. कैलाश पर बैन है अब चढ़ाई करना: 
कैलाश पर्वत पर चढ़ने की आखिरी कोशिश 2001 में की गई थी। हालांकि, कई लोगों की मांग थी कि धार्मिक रूप से पवित्र स्थान होने के कारण इस पर चढ़ाई नहीं होनी चाहिए। इसके बाद चीन प्रशासन ने कैलाश पर्वत की चढ़ाई पर रोक लगा दी। 

7. कैलाश के रहस्यमी झील: 
कैलाश पर्वत से नीचे दो तालाब भी अपने आप में रहस्यमयी हैं। इनका नाम है ब्रम्ह ताल और राक्षस ताल। मान्यता है कि कि ब्रम्ह ताल भगवान ब्रम्ह की देन है। इसमें मीठा पानी आता है। वहीं, राक्षस ताल को रावण ने बनाया, इसमें खारा पानी है। यही नहीं, मौसम कैसा भी हो ब्रम्ह ताल में पानी हमेशा शांत रहता है जबकि वहीं, राक्षस ताल हमेशा अशांत नजर आता है। 

8. पृथ्वी का केंद्र है कैलाश: 
यह माना जाता है कि कैलाश पर्वत एक 'एक्सिस मुंडी' है। आप इसे आसान भाषा में कह सकते हैं कि यह पृथ्वी का केंद्र या पिलर है। एक्सिस मुंडी लैटिन का शब्द है, जिसका मतलब ब्रह्मांड का केंद्र होता है। यह भी मान्यता है कि यहां आसमान और धरती का मिलन होता है। 

9. हैरान करने वाले दावे: 
कई पर्वतारोहियों ने कहा है कि कैलाश पर चढ़ना असंभव है। अंग्रेज पर्वतारोही और रिसर्चर यू रटलेज ने कैलाश पर चढ़ाई को बिल्कुल असंभव बताया। ऐसे ही रूस के सरगे सिस्टियाकोव ने बताया कि जब वे पर्वत के बिल्कुल करीब पहुंचे तो उनका दिल तेजी से धड़कने लगा। सरगे के अनुसार अचानक उन्हें बहुत कमजोरी महसूस होने लगी और मन में ख्याल आया कि अब वहां और नहीं रुकना चाहिए। इसके बाद वे नीचे लौट गये।

10. चार धर्मों के लिए पवित्र है कैलाश: 
कैलाश और इसके आसपास का क्षेत्र हिंदू धर्म के लिए ही नहीं बल्कि तीन अन्य धर्मों जैन, बौद्ध और बोन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। कैलाश पर्वत का विशेष आकार भी बेहद चौंकाने वाला है। माना जाता है कि कैलाश पर्वत का आकार चौमुखी है और दिशा बताने वाले कम्पास की तरह है।


तिब्बती लोग कैलाश पर्वत की 3 और 13 परिक्रमा का महतब मानते है, इसे भगवान बुद्ध का निर्वाण स्थल होने के कारण बुद्ध धर्म में काफी पूजनीय माना जाता है। जैन धर्म का मानना है कि आदिनाथ ऋषभ देव का ये आदि स्थल है, यहाँ उन्हें ास्ट देव मान कर पूजा की जाती है। वही हिन्दू धर्म की माने तो यहाँ देवों के देव महादेव अपने पुरे परिवार के साथ निवास करते है।ऐसा माना जाता है कि यहाँ देवी सती का दायां हाथ कट कर गिरा था,इसलिए इसे और भी पूजनीय स्थल माना जाता है।

अब तक जितने भी लोग कैलाश पर्वत के समीप गये उन सभी का कहना है की यहाँ के वातावरण में ॐ की ध्वनि गूंजती रहती है, और जब कैलाश पर्वत का वर्फ पिघलना शुरू होता है तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि ऊपर पर्वत पर डमरू बज रहा है, जिकी गुंज चारों और साफ़ साफ़ सुनाई पड़ती है।

एक पुराणी दन्त कथा के अनुसार यह जगह कुबेर की नगरी माना जाता है, यही से भगवान विष्णु के कर कमलों से निकल कर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, यही पर मान सरोवर झील है जिसे पुराणों में झिल सागर भी कहा जाता है जिसमे की भगवान विष्णु माता लक्ष्मी  के साथ शेष नाग पर विराजमान है।

यदि यात्रा पर जा रहे हैं तो क्या करें?
यह यात्रा उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम और नेपाल के काठमांडू से प्रारंभ होती है। इसमें सिक्किम के नाथुरा दर्रा से जाना सबसे सुरक्षित है। यदि आप कैलाश मानसरोवर जा रहे हैं तो आपको 75 किलोमीटर पैदल मार्ग पर चलने और पहाड़ियों पर चढ़ने के लिए तैयार रहना होगा। इसके लिए जरूरी है कि आपका शरीर मजबूत और हर तरह के वातावरण और थकान को सहन करने वाला हो। यदि नाथुरा दर्रा से यात्रा करते हैं तो 10-15 किलोमीटर तक ही पैदल चलना होगा।

यहां पर ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम हो जाती है, जिससे सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ आदि परेशानियां प्रारंभ हो सकती हैं। यहां का तापमान शू्न्य से नीचे -2 सेंटीग्रेड तक हो जाता है। इसलिए ऑक्सीजन सिलेंडर भी साथ होना जरूरी है। साथ ही मुंह से बजाने की एक सीटी व कपूर की थैली आगे-पीछे होने पर व सांस भरने पर उपयोग की जाती है। आवश्यक सामग्री, गरम कपड़े आदि रखें और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार घोड़े-पिट्टू किराए से लें।

यह यात्रा भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों द्वारा आयोजित की जाती है। इधर इस सीमा का संचालन भारतीय सीमा तक कुमाऊं मण्डल विकास निगम द्वारा किया जाता है, जबकि तिब्बती क्षेत्र में चीन की पर्यटक एजेंसी इस यात्रा की व्यवस्था करती है। अंतरराष्‍ट्रीय नेपाल-तिब्बत-चीन से लगे उत्तराखंड के सीमावर्ती पिथौरागढ़ के धारचूला से कैलाश मानसरोवर की तरफ जाने वाले दुर्गम व 75 किलोमीटर पैदल मार्ग के अत्यधिक खतरनाक होने के कारण यह यात्रा बहुत कठिन होती है।

लगभग एक माह चलने वाली इस पवित्र यात्रा में काफी दुरुह मार्ग भी आते हैं अक्टूबर से अप्रैल तक इस क्षेत्र के सरोवर व पर्वतमालाएं दोनों ही हिमाच्छादित रहते हैं। सरोवरों का पानी जमकर ठोस रूप धारण किए रहता है। जून से इस क्षेत्र के तामपान में थोड़ी वृद्धि शुरू होती है। नेपाल के रास्ते यहां तक पहुंचने में करीब 28 से 30 दिन का समय लगता है अर्थात यह यात्रा यदि कोई व्यवधान नहीं हुआ तो घर से लेकर पुन: घर तक पहुंचने में कम से कम 45 दिनों की होती है।

नाथुला दर्रा से जाने के लिए आप सीधे सिक्किम पहुंचकर भी यात्रा शुरू कर सकते हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए नाथुला दर्रा भारत और तिब्बत के बीच एक बड़ा आवाजाही का गलियारा था जिसे 1962 के युद्ध के बाद बंद कर दिया गया था, लेकिन मोदी सरकार के प्रयासों से यह पुन: खोल दिया गया है। फिलहाल डोकलाम विवाद के बाद यह रास्ता पुन: बंद कर दिया गया है।

भारत सरकार सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर यात्रा प्रबंधित करती है। आप वायु मार्ग द्वारा काठमांडू तक पहुंचकर वहां से सड़क मार्ग द्वारा मानसरोवर झील तक जा सकते हैं। कैलाश तक जाने के लिए हेलीकॉप्टर की सुविधा भी ली जा सकती है। काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट तक पहुंचकर, वहां से हिलसा तक हेलीकॉप्टर द्वारा पहुंचा जा सकता है।

मानसरोवर तक पहुंचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं। काठमांडू से लहासा के लिए 'चाइना एयर' वायुसेवा उपलब्ध है, जहां से तिब्बत के विभिन्न कस्बों- शिंगाटे, ग्यांतसे, लहात्से, प्रयाग पहुंचकर मानसरोवर यात्रा पर जा सकते हैं। कहीं से भी जाएं आपको कुछ किलोमीटर पैदल तो चलना ही होगा।


रहस्यमयी तथ्य-
माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई 8848 M है और कैलाश पर्वत की ऊंचाई 6638 M फिर भी आज तक कोई भी पर्वतारोही कैलाश पर्वत की शिखर पर एक बार भी नहीं चढ़ पाया, जबकि माउंट एवरेस्ट पर कितनी ही बार चढ़ाई कर ली गयी है।

सवाल ये उठता है की दुनिया जाने में कितने सारे पर्वत और चोटियां है जिन सवी पर चढ़ाई कर ली गयी है पर कैलाश पर्वत में ऐसा क्या है कि आधुनिक उपकरणों के होने के बाबजूद अब तक कोई भी पर्वतारोही या कहे तो कोई भी इन्शान अब तक इस पर्वत की शिखर तह चढाई नहीं कर पाया।

2. कैलाश पर्वत की चोटियों के बीच दो झील स्थित है :-
पहला मान सरोवर झील जो कि पूरी दुनिया में सबसे ऊची मीठे पानी की झील है , ये झील 320 वर्ग फिट में फैली है,इसका पानी काफी मीठा है , इस झील का पानी काफी शांत रहता है और उसमे कभी उफान नहीं आता है, यहाँ काफी शांति और सुन्दर वातावरण रहता है।

दूसरा राकसताल झील ये पूरी दुनिया में सबसे ऊंची और खारे पानी की झील है, ये झील 225 वर्ग फिट में फैली है, इस झील का पानी काफी खारा है, इस झील में हमेशा उफान आता रहता है और यहाँ का वातावरण काफी डरावना प्रतीत होता है, इस झील के आस पास कोई भी पेड़ पौधे नहीं है और नहीं कोई पशु पछि यहाँ आस पास भी आती है।

सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है की ये दोनों झील एक ही जगह पर कुछ ही फीट की दुरी पर स्थित है।



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महर्षि पतंजलि का जीवन परिचय एवं उनकी रचनाएं

 
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पतंजलि काशी में ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में विद्यमान थे। अयोध्या से महज 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कोडर गांव में महर्षि पतंजलि का आश्रम है. ये गांव गोंडा जिले में आता  है।  पर ये काशी में नागकूप पर बस गये थे। ये व्याकरणाचार्य पाणिनी के शिष्य थे। पतंजलि ने पाणिनि की अष्टाध्यायी और कात्यायन के प्रतीकों का आश्रय लेते हुए अष्टाध्यायी पर महाभाष्य नाम की सर्वागीण व्याख्या की है। महाभाष्य व्याकरण का ग्रंथ होने के साथ-साथ तत्कालीन समाज का विश्वकोश भी है। भाषा की सरलता विषमता स्वाधीनता और और विषय प्रतिपादन की उत्कृष्ट शैली के कारण महाभाष्य सारे संस्कृत वाडमय में आदर्श ग्रंथ है। इसमें भाषा शास्त्र के तत्कालीन ऐतिहासिक, सामाजिक, भौगोलिक, धार्मिक, संस्कृति आदि तत्वों पर विशद चिंतन हुआ है। पतंजलि पुष्यमित्र के समय में हुए थे इनका समय 150 ईसा पूर्व के लगभग है। पतंजलि एक महान चिकित्सक थे और इन्हें ही कुछ विद्वान 'चरक संहिता' का प्रणेता भी मानते हैं।

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पतंजलि प्राचीन भारत के एक मुनि थे जिन्हे संस्कृत के अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों का रचयिता माना जाता है। इनमें से योगसूत्र उनकी महानतम रचना है जो योगदर्शन का मूलग्रन्थ है। भारतीय साहित्य में पतंजलि द्वारा रचित ३ मुख्य ग्रन्थ मिलते हैं। योगसूत्र, अष्टाध्यायी पर भाष्य और आयुर्वेद पर ग्रन्थ। कुछ विद्वानों का मत है कि ये तीनों ग्रन्थ एक ही व्यक्ति ने लिखे, अन्य की धारणा है कि ये विभिन्न व्यक्तियों की कृतियाँ हैं। पतंजलि ने पाणिनि के अष्टाध्यायी पर अपनी टीका लिखी जिसे महाभाष्य का नाम दिया (महा +भाष्य (समीक्षा, टिप्पणी, विवेचना, आलोचना))। इनका काल कोई २०० ई पू माना जाता है।


जीवन
पतंजलि शुंग वंश के शासनकाल में थे। डॉ. भंडारकर ने पतंजलि का समय 158 ई. पू. द बोथलिक ने पतंजलि का समय 200 ईसा पूर्व एवं कीथ ने उनका समय 140 से 150 ईसा पूर्व माना है। उन्होंने पुष्यमित्र शुंग का अश्वमेघ यज्ञ भी सम्पन्न कराया था। इनका जन्म गोनार्ध (गोंडा,उ०प्र०) में हुआ था, बाद में वे काशी में बस गए। ये व्याकरणाचार्य पाणिनी के शिष्य थे। काशीवासी आज भी श्रावण कृष्ण ५, नागपंचमी को छोटे गुरु का, बड़े गुरु का नाग लो भाई नाग लो कहकर नाग के चित्र बाँटते हैं क्योंकि पतंजलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है।

योगदान
पतंजलि महान चिकित्सक थे और इन्हें ही 'चरक संहिता' का प्रणेता माना जाता है। 'योगसूत्र' पतंजलि का महान अवदान है। पतंजलि रसायन विद्या के विशिष्ट आचार्य थे अभ्रक विंदास, अनेक धातुयोग और लौहशास्त्र इनकी देन है। पतंजलि संभवत पुष्यमित्र शुंग (१९५-१४२ ई.पू.) के शासनकाल में थे। राजा भोज ने इन्हें तन के साथ मन का भी चिकित्सक कहा है।[4]

योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥

(अर्थात् चित्त-शुद्धि के लिए योग (योगसूत्र), वाणी-शुद्धि के लिए व्याकरण (महाभाष्य) और शरीर-शुद्धि के लिए वैद्यकशास्त्र (चरकसंहिता) देनेवाले मुनिश्रेष्ठ पतञ्जलि को प्रणाम।)

ई.पू. द्वितीय शताब्दी में 'महाभाष्य' के रचयिता पतंजलि काशी-मण्डल के ही निवासी थे। मुनित्रय की परम्परा में वे अंतिम मुनि थे। पाणिनी के पश्चात् पतंजलि सर्वश्रेष्ठ स्थान के अधिकारी पुरुष हैं। उन्होंने पाणिनी व्याकरण के महाभाष्य की रचना कर उसे स्थिरता प्रदान की। वे अलौकिक प्रतिभा के धनी थे। व्याकरण के अतिरिक्त अन्य शास्त्रों पर भी इनका समान रूप से अधिकार था। व्याकरण शास्त्र में उनकी बात को अंतिम प्रमाण समझा जाता है। उन्होंने अपने समय के जनजीवन का पर्याप्त निरीक्षण किया था। अत: महाभाष्य व्याकरण का ग्रंथ होने के साथ-साथ तत्कालीन समाज का विश्वकोश भी है। यह तो सभी जानते हैं कि पतंजलि शेषनाग के अवतार थे। द्रविड़ देश के सुकवि रामचन्द्र दीक्षित ने अपने 'पतंजलि चरित' नामक काव्य ग्रंथ में उनके चरित्र के संबंध में कुछ नये तथ्यों की संभावनाओं को व्यक्त किया है। उनके अनुसार आदि शंकराचार्य के दादागुरु आचार्य गौड़पाद पतंजलि के शिष्य थे किंतु तथ्यों से यह बात पुष्ट नहीं होती है।

प्राचीन विद्यारण्य स्वामी ने अपने ग्रंथ 'शंकर दिग्विजय' में आदि शंकराचार्य में गुरु गोविंद पादाचार्य को पतंजलि का रुपांतर माना है। इस प्रकार उनका संबंध अद्वैत वेदांत के साथ जुड़ गया।

काल निर्धारण
पतंजलि के समय निर्धारण के संबंध में पुष्यमित्र कण्व वंश के संस्थापक ब्राह्मण राजा के अश्वमेध यज्ञों की घटना को लिया जा सकता है। यह घटना ई.पू. द्वितीय शताब्दी की है। इसके अनुसार महाभाष्य की रचना का काल ई.पू. द्वितीय शताब्दी का मध्यकाल अथवा १५० ई.पूर्व माना जा सकता है। पतंजलि की एकमात्र रचना महाभाष्य है जो उनकी कीर्ति को अमर बनाने के लिये पर्याप्त है। दर्शन शास्त्र में शंकराचार्य को जो स्थान 'शारीरिक भाष्य' के कारण प्राप्त है, वही स्थान पतंजलि को महाभाष्य के कारण व्याकरण शास्त्र में प्राप्त है। पतंजलि ने इस ग्रंथ की रचना कर पाणिनि के व्याकरण की प्रामाणिकता पर अंतिम मुहर लगा दी है।

योग दर्शन-
योगदर्शन छः आस्तिक दर्शनों (षड्दर्शन) में से एक है। इसके प्रणेता पतञ्जलि मुनि हैं। यह दर्शन सांख्य दर्शन के 'पूरक दर्शन' के नाम से प्रसिद्ध है। इस दर्शन का प्रमुख लक्ष्य मनुष्य को वह मार्ग दिखाना है जिस पर चलकर वह जीवन के परम लक्ष्य (मोक्ष) की प्राप्ति कर सके। अन्य दर्शनों की भांति योगदर्शन तत्त्वमीमांसा के प्रश्नों (जगत क्या है, जीव क्या है?, आदि) में न उलझकर मुख्यतः मोक्षप्राप्ति के उपाय बताने वाले दर्शन की प्रस्तुति करता है। किन्तु मोक्ष पर चर्चा करने वाले प्रत्येक दर्शन की कोई न कोई तात्विक पृष्टभूमि होनी आवश्यक है। अतः इस हेतु योगदर्शन, सांख्यदर्शन का सहारा लेता है और उसके द्वारा प्रतिपादित तत्त्वमीमांसा को स्वीकार कर लेता है। इसलिये प्रारम्भ से ही योगदर्शन, सांख्यदर्शन से जुड़ा हुआ है। [1]

प्रकृति, पुरुष के स्वरूप के साथ ईश्वर के अस्तित्व को मिलाकर मनुष्य जीवन की आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक उन्नति के लिये दर्शन का एक बड़ा व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक रूप योगदर्शन में प्रस्तुत किया गया है। इसका प्रारम्भ पतञ्जलि मुनि के योगसूत्रों से होता है। योगसूत्रों की सर्वोत्तम व्याख्या व्यास मुनि द्वारा लिखित व्यासभाष्य में प्राप्त होती है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य अपने मन (चित) की वृत्तियों पर नियन्त्रण रखकर जीवन में सफल हो सकता है और अपने अन्तिम लक्ष्य निर्वाण को प्राप्त कर सकता है।

योगदर्शन, सांख्य की तरह द्वैतवादी है। सांख्य के तत्त्वमीमांसा को पूर्ण रूप से स्वीकारते हुए उसमें केवल 'ईश्वर' को जोड़ देता है। इसलिये योगदर्शन को 'सेश्वर सांख्य' (स + ईश्वर सांख्य) कहते हैं और सांख्य को 'निरीश्वर सांख्य' कहा जाता है।

परिचय
योगदर्शन में पुरूष तत्व केन्द्रीय विषय के रूप में प्रस्तुत हुआ है। यद्यपि पुरूष और प्रकृति दोनों की स्वतन्त्र सत्ता मानी गयी है परन्तु तात्विक रूप में पुरूष की सत्ता ही सर्वोच्च है। पुरूष के दो भेद कहे गये हैं । पुरूष को चैतन्य एवं अपरिणामी कहा गया है, किन्तु अविद्या के कारण पुरूष जड़ एवं परिणाम चित्त में स्वयं को आरोपित कर लेता है। पुरूष और चित्त के संयुक्त हो जाने पर विवेक जाता रहता है और पुरूष स्वयं को चित्त रूप में अनुभव करने लगता है। यह अज्ञान ही पुरूष के समस्त दुःखों, क्लेशों का कारण हैं। योग दर्शन का उद्देश्य पुरूष को इस दुःख से, अज्ञान से, मुक्त कराना है। इसी तथ्य को सैद्धान्तिक रूप से योग दर्शन में हेय, हेय-हेतु, हान और हानोपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन चार क्रमों में पुरूष दुःखों से मुक्ति पाता है, इसलिये योग में इसे 'चतुर्व्यूहवाद' कहा गया है एवं इस चतुर्व्यूह से मुक्त होना ही योग का परम उद्देश्य है। चतुर्व्यूहवाद की विवेचना में ही योग दर्शन में पुरूष, पुरूषार्थ और पुरूषार्थशून्यता का दर्शन प्रकट होता है। पुरूष अविद्याग्रस्त होने पर संसार-चक्र में पड़ता है और पुरूषार्थशून्यता की अवस्था को प्राप्त करता है। पुरूष का परम लक्ष्य कैवल्य की प्राप्ति है। योग में पुरूष को आत्मा का पर्याय माना गया है। अतः आत्मा, जो कि संख्या में असंख्य है, उसकी कैवल्य प्राप्ति तभी हो सकती है जब चतुर्व्यूह का पुरूषार्थ साधन कर दुःख के त्रिविध रूपों का सामाधान कर लिया जाय। दुःख के तीन रूप है - आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक। पुरूषार्थशून्यता इन त्रितापों से ऊपर की अवस्था है। पुरूषार्थशून्यता के पश्चात् ही पुरूष की अपने स्वरूप की स्थिति होती है। योगदर्शन में इसे ही कैवल्य अथवा मोक्ष कहा गया है।

पतंजलि को कपिल द्वारा बताया गया सांख्यदर्शन ही अभिमत है। थोड़े में, इस दर्शन के अनुसार इस जगत्‌ में असंख्य पुरुष हैं और एक प्रधान या मूल प्रकृति। पुरुष चित्‌ है, प्रधान अचित्‌। पुरुष नित्य है और अपरिवर्तनशील, प्रधान भी नित्य है परन्तु परिवर्तनशील। दोनों एक दूसरे से सदा पृथक हैं, परन्तु एक प्रकार से एक का दूसरे पर प्रभाव पड़ता है। पुरुष के सान्निध्य से प्रकृति में परिवर्तन होने लगते हैं। वह क्षुब्ध हो उठती है। पहले उसमें महत्‌ या बुद्धि की उत्पत्ति होती है, फिर अहंकार की, फिर मन की। अहंकार से ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों तथा पाँच तन्मात्राओं अर्थात्‌ शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध की, अन्त में इन पाँचों से आकाश, वायु, तेज, अप और क्षिति नाम के महाभूतों की। इन सबके संयोग वियोग से इस विश्व का खेल हो रहा है। संक्षेप में, यही सृष्टि का क्रम है। प्रकृति में परिवर्तन भले ही हो परन्तु पुरुष ज्यों का त्यों रहता है। फिर भी एक बात होती है। जैसे श्वेत स्फटिक के सामने रंग बिरंगे फूलों को लाने से उसपर उनका रंगीन प्रतिबिम्ब पड़ता है, इसी प्रकार पुरुष पर प्राकृतिक विकृतियों के प्रतिबिम्ब पड़ते हैं। क्रमश: वह बुद्धि से लेकर क्षिति तक से रंजित प्रतीत होता है, अपने को प्रकृति के इन विकारों से संबद्ध मानने लगता है। आज अपने को धनी, निर्धन, बलवान्‌ दुर्बल, कुटुंबी, सुखी, दु:खी, आदि मान रहा है। अपने शुद्ध रूप से दूर जा पड़ा है। यह उसका भ्रम, अविद्या है। प्रधान से बने हुए इन पदार्थो ने उसके रूप को ढँक रखा है, उसके ऊपर कई तह खोल पड़ गई है। यदि वह इन खोलों, इन आवरणों को दूर फेंक दे तो उसका छुटकारा हो जायगा। जिस क्रम से बँधा है, उसके उलटे क्रम से बन्धन टूटेंगे। पहले महाभूतों से ऊपर उठना होगा। अन्त में प्रधान की ओर से मुँह फेरना होगा। यह बन्धन वास्तविक नहीं है, परन्तु बहुत ही दृढ़ प्रतीत होते हैं। जिस उपयोग से बंधनों को तोड़कर पुरुष अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो सके उस उपाय का नाम योग है। सांख्य के आचार्यो का कहना है: यद्वा तद्वा तदुच्छिति: परमपुरुषार्थः - जैसे भी हो सके पुरुष और प्रधान के इस कृत्रिम संयोग का उच्छेद करना परम पुरुषार्थ हैं।

योग का यही दार्शनिक धरातल है: अविद्या के दूर होने पर जो अवस्था होती है उसका वर्णन विभिन्न आचार्यों और विचारकों के विभिन्न ढँग से किया है। अपने-अपने विचार के अनुसार उन्होंने उसको पृथक नाम भी दिए हैं। कोई उसे कैवल्य कहता है, कोई मोक्ष, कोई निर्वाण। ऊपर पहुँचकर जिसको जैसा अनुभव हो वह उसे उस प्रकार कहे। वस्तुत: वह अवस्था ऐसी है, यतो वाचो निवर्तते अप्राप्य मनसा सह - जहाँ मन ओर वाणी की पहुँच नहीं है। थोड़े से शब्दों में एक और बात का भी चर्चा कर देना आवश्यक है। असंख्य पुरुषों के साथ पतंजलि ने 'पुरुष विशेष' नाम से ईश्वर की सत्ता को भी माना है। सांख्य के आचार्य ऐसा नहीं मानते। वस्तुत: मानने की आवश्यकता भी नहीं है। यदि योगदर्शन में से वह थोड़े से सूत्र निकाल भी लें तो कोई अंतर नहीं पड़ता। योग की साधना की दृष्टि से ईश्वर को मानने, न मानने का विशेष महत्व नहीं है। ईश्वर की सत्ता को मानने वाले और न मानने वाले, दोनों योग में समान रूप से अधिकार रखते हैं।

यम-नियम
विद्या और अविद्या, बन्धन और उससे छुटकारा, सुख और दु:ख सब चित्त में हैं। अत: जो कोई अपने स्वरूप में स्थिति पाने का इच्छुक है उसको अपने चित्त को उन वस्तुओं से हटाने का प्रयत्न करना होगा, जो हठात्‌ प्रधान और उसके विकारों की ओर खींचती हैं और सुख दु:ख की अनुभूति उत्पन्न करती हैं। इस तरह चित्त को हटाने तथा चित्त के ऐसी वस्तुओं से हट जाने का नाम वैराग्य है। यह योग की पहली सीढ़ी है। पूर्ण वैराग्य एकदम नहीं हुआ करता। ज्यों ज्यों व्यक्ति योग की साधना में प्रवृत्त होता है त्यों त्यों वैराग्य भी बढ़ता है और ज्यों ज्यों वेराग्य बढ़ता है त्यों त्यों साधना में प्रवृत्ति बढ़ती है। जेसा पतंजलि ने कहा है: दृष्ट और अनुश्रविक दोनों प्रकार के विषयों में विरक्ति, गांधी जी के शब्दों में अनासक्ति, होनी चाहिए। स्वर्ग आदि, जिनका ज्ञान हमको अनुश्रुति अर्थात्‌ महात्माओं के वचनों और धर्मग्रन्थों से होता है, अनुश्रविक कहलाते हैं। योग की साधना को अभ्यास कहते हैं। इधर कई सौ वर्षो से साधुओं में इस आरम्भ में भजन शब्द भी चल पड़ा है।

चित्त जब तक इन्द्रियों के विषयों की ओर बढ़ता रहेगा, चंचल रहेगा। इन्द्रियाँ उसका एक के बाद दूसरी भोग्य वस्तु से सम्पर्क कराती रहेंगी। कितनों से वियोग भी कराती रहेंगी। काम, क्रोध, लोभ, आदि के उद्दीप्त होने के सैकड़ों अवसर आते रहेंगे। सुख दु:ख की निरन्तर अनुभूति होती रहेगी। इस प्रकार प्रधान ओर उसके विकारों के साथ जो बंधन अनेक जन्मों से चले आ रहे हैं वे दृढ़ से दृढ़तर होते चले जाएँगे। अत: चित्त को इन्द्रियों के विषयों से खींचकर अन्तर्मुखी करना होगा। इसके अनेक उपाय बताए गए हैं जिनके ब्योरे में जाने की आवश्यकता नहीं है। साधारण मनुष्य के चित्त की अवस्था क्षिप्त कहलाती है। वह एक विषय से दूसरे विषय की ओर फेंका फिरता है। जब उसको प्रयत्न करके किसी एक विषय पर लाया जाता है तब भी वह जल्दी से विषयंतर की ओर चला जाता है। इस अवस्था को विक्षिप्त कहते हैं। दीर्ध प्रयत्न के बाद साधक उसे किसी एक विषय पर देर तक रख सकता है। इस अवस्था का नाम एकाग्र है। चित्त को वशीभूत करना बहुत कठिन काम है। श्रीकृष्ण ने इसे प्रमाथि बलवत्‌-मस्त हाथी के समान बलवान्‌-बताया है।

आसन
चित्त को वश में करने में एक चीज से सहायता मिलती है। यह साधारण अनुभव की बात है कि जब तक शरीर चंचल रहता है, चित्त चंचल रहता है और चित्त की चंचलता शरीर को चंचल बनाए रहती है। शरीर की चंचलता नाड़ीसंस्थान की चंचलता पर निर्भर करती है। जब तक नाड़ीसंस्थान संक्षुब्ध रहेगा, शरीर पर इंद्रिय ग्राह्य विषयों के आधात होते रहेंगे। उन आधातों का प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ेगा जिसके फलस्वरूप चित्त और शरीर दोनों में ही चंचलता बनी रहेगी। चित्त को निश्चल बनाने के लिये योगी वैसा ही उपाय करता है जैसा कभी-कभी युद्ध में करना पड़ता है। किसी प्रबल शत्रु से लड़ने में यदि उसके मित्रों को परास्त किया जा सके तो सफलता की संभावना बढ़ जाती है। योगी चित्त पर अधिकार पाने के लिए शरीर और उसमें भी मुख्यत: नाड़ीसंस्थान, को वश में करने का प्रयत्न करता है। शरीर भौतिक है, नाड़ियाँ भी भौतिक हैं। इसलिये इनसे निपटना सहज है। जिस प्रक्रिया से यह बात सिद्ध होती है उसके दो अंग हैं: आसन और प्राणायाम। आसन से शरीर निश्चल बनता है। बहुत से आसनों का अभ्यास तो स्वास्थ्य की दृष्टि से किया जाता है। पतंजलि ने इतना ही कहा है: स्थिर सुखमासनम्‌ : जिसपर देर तक बिना कष्ट के बैठा जा सके वही आसन श्रेष्ठ है। यही सही है कि आसनसिद्धि के लिये स्वास्थ्य संबंधी कुछ नियमों का पालन आवश्यक है। जैसा श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-

युक्ताहार बिहारस्य, युक्त चेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य, योगो भवति दुःखहा॥

खाने, पीने, सोने, जागने सभी का नियन्त्रण करना होता है।

प्राणायाम
प्राणायाम शब्द के संबंध में बहुत भ्रम फैला हुआ है। इस भ्रम का कारण यह है कि आज लोग प्राण शब्द के अर्थ को प्राय: भूल गए हैं। बहुत से ऐसे लोग भी, जो अपने को योगी कहते हैं, इस शब्द के सम्बन्ध में भूल करते हैं। योगी को इस बात का प्रयत्न करना होता है कि वह अपने प्राण को सुषुम्ना में ले जाय। सुषुम्ना वह नाड़ी है जो मेरुदण्ड की नली में स्थित है और मस्त्तिष्क के नीचे तक पहुँचती है। यह कोई गुप्त चीज नहीं है। आँखों से देखी जा सकती है। करीब-करीब कनष्ठाि उँगली के बराबर मोटी होती है, ठोस है, इसमें कोई छेद नहीं है। प्राण का और साँस या हवा करनेवालों को इस बात का पता नहीं है कि इस नाड़ी में हवा के घुसने के लिये और ऊपर चढ़ने के लिये कोई मार्ग नहीं है। प्राण को हवा का समानार्थक मानकर ही ऐसी बातें कही जाती हैं कि अमुक महात्मा ने अपनी साँस को ब्रह्मांड में चढ़ा लिया। साँस पर नियंत्रण रखने से नाड़ीसंस्थान को स्थिर करने में निश्चय ही सहायता मिलती है, परंतु योगी का मुख्य उद्देश्य प्राण का नियंत्रण है, साँस का नहीं। प्राण वह शक्ति है जो नाड़ीसंस्थान में संचार करती है। शरीर के सभी अवयवों को और सभी धातुओं को प्राण से ही जीवन और सक्रियता मिलती है। जब शरीर के स्थिर होने से ओर प्राणायाम की क्रिया से, प्राण सुषुम्ना की ओर प्रवृत्त होता है तो उसका प्रवाह नीचे की नाड़ियों में से खिंच जाता है। अत: ये नाड़ियाँ बाहर के आधातों की ओर से एक प्रकार से शून्यवत्‌ हो जाती हैं।

प्रत्याहार
प्राणायाम का अभ्यास करना और प्राणायाम में सफलता पा जाना दो अलग अलग बातें हैं। परंतु वैराग्य और तीव्र संवेग के बल से सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। ज्यों-ज्यों अभ्यास दृढ़ होता है, त्यों-त्यों साधक के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। एक और बात होती है। वह जितना ही अपने चित्त को इंद्रियों और उनके विषयों से दूर खींचता है उतना ही उसकी ऐंद्रिय शक्ति भी बढ़ती है अर्थात्‌ इंद्रियों की विषयों के भोग की शक्ति भी बढ़ती है। इसीलिये प्राणायाम के बाद प्रत्याहार का नाम लिया जाता है। प्रत्याहार का अर्थ है इंद्रियों को उनके विषयों से खींचना। वैराग्य के प्रसंग में यह उपदेश दिया जा चुका है परंतु प्राणायम तक पहँचकर इसकों विशेष रूप से दुहराने की आवश्यकता है। आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार के ही समुच्चय का नाम हठयोग है।

धारणा, ध्यान, समाधि
खेद की बात है कि कुछ अभ्यासी यहीं रुक जाते हैं। जो लोग आगे बढ़ते हैं उनके मार्ग को तीन विभागों में बाँटा जाता है: धारणा, ध्यान और समाधि। इन तीनों को एक दूसरे से बिल्कुल पृथक करना असंभव है। धारण पुष्ट होकर ध्यान का रूप धारण करती है और उन्नत ध्यान ही समाधि कहलाता है। पतंजलि ने तीनों को सम्मिलित रूप से संयम कहा है। धारणा वह उपाय है जिससे चित्त को एकाग्र करने में सहायता मिलती है। यहाँ उपाय शब्द का एकवचन में प्रयोग हुआ है परंतु वस्तुत: इस काम के अनेक उपाय हैं। इनमें से कुछ का चर्चा उपनिषदों में आया है। वैदिक वाड्मय में विद्या शब्द का प्रयोग किया गया है। किसी मंत्र के जप, किसी देव, देवी या महात्मा के विग्रह या सूर्य, अग्नि, दीपशिखा आदि को शरीर के किसी स्थानविशेष जेसे हृदय, मूर्घा, तिल अर्थात दोनों आँखों के बीच के बिंदु, इनमें से किसी जगह कल्पना में स्थिर करना, इस प्रकार के जो भी उपाय किए जायँ वे सभी धारणा के अंतर्गत हैं। जैसा कि कुछ उपायों को बतलाने के बाद पतंजलि ने यह लिख दिया है - यथाभिमत ध्यानाद्वा-जो वस्तु अपने को अच्छी लगे उसपर ही चित्त को एकाग्र करने से काम चल सकता है। किसी पुराण में ऐसी कथा आई है कि अपने गुरु की आज्ञा से किसी अशिक्षित व्यक्ति ने अपनी भैंस के माध्यम से चित्त को एकाग्र करके समाधि प्राप्त की थी।

धारणा की सबसे उत्तम पद्धति वह है जिसे पुराने शब्दों में नादानुसंधान कहते हैं। कबीर और उनके परवर्ती संतों ने इसे सुरत शब्द योग की संज्ञा दी है। जिस प्रकार चंचल मृग वीणा के स्वरों से मुग्ध होकर चौकड़ी भरना भूल जाता है, उसी प्रकार साधक का चित्त नाद के प्रभाव से चंचलता छोड़कर स्थिर हो जाता है। वह नाद कौन सा है जिसमें चित्त की वृत्तियों को लय करने का प्रयास किया जाता है और यह प्रयास कैसे किया जाता है, ये बातें तो गुरुमुख से ही जानी जाती हैं। अंतर्नाद के सूक्ष्मत्तम रूप को प्रवल, ओंकार, कहते हैं। प्रणव वस्तुत: अनुच्चार्य्य है। उसका अनुभव किया जा सकता है, वाणी में व्यंजना नहीं, नादविंदूपनिषद् के शब्दों में:

ब्रह्म प्रणव संयानं, नादो ज्योतिर्मय: शिव:।
स्वयमाविर्भवेदात्मा मेयापायेऽशुमानिव॥

प्रणव के अनुसंधान से, ज्योतिर्मय और कल्याणकारी नाद उदित होता है। फिर आत्मा स्वयं उसी प्रकार प्रकट होता है, जेसे कि बादल के हटने पर चंद्रमा प्रकट होता है। आदि शब्द आंकार को परमात्मा का प्रतीक कहा जाता है। योगियों में सर्वत्र ही इसकी महिमा गाई गई है। बाइबिल के उस खंड में, जिसे सेंट जान्स गास्पेल कहते हैं, पहला ही वाक्य इस प्रकार हैं, आरंभ में शब्द था। वह शब्द परमात्मा के साथ था। वह शब्द परमात्मा था। सूफी संत कहते हैं हैफ़ दर बंदे जिस्म दरमानी, न शुनवी सौते पाके रहमानी दु:ख की बात है कि तू शरीर के बंधन में पड़ा रहता है और पवित्र दिव्य नाद को नहीं सुनता।

चित्त की एकाग्रता ज्यों ज्यों बढ़ती है त्यों त्यों साधकर को अनेक प्रकार के अनुभव होते हैं। मनुष्य अपनी इंद्रियों की शक्ति से परिचित नहीं है। उनसे न तो काम लेता है और न लेना चाहता है। यह बात सुनने में आश्चर्य की प्रतीत होती है, पर सच है। मान लीजिए, हमारी चक्षु या श्रोत्र इंद्रिया की शक्ति कल आज से कई गुना बढ़ जाय। तब न जाने ऐसी कितनी वस्तुएँ दृष्टिगोचर होने लगेंगी जिनको देखकर हम काँप उठेंगे। एक दूसरे के भीतर की रासायनिक क्रिया यदि एक बार देख पड़ जाय तो अपने प्रिय से प्रिय व्यक्ति की ओर से घृणा हो जायगी। हमारे परम मित्र पास की कोठरी में बैठे हमारे संबंध में क्या कहते हैं, यदि यह बात सुनने में आ जाय तो जीना दूभर हो जाय। हम कुछ वासनाओं के पुतले हैं। अपनी इंद्रयों से वहीं तक काम लेते हैं जहाँ तक वासनाओं की तृप्ति हो। इसलिये इंद्रियों की शक्ति प्रसुप्त रहती है परंतु जब योगाभ्यास के द्वारा वासनाओं का न्यूनाधिक शमन होता है तब इंद्रियाँ निर्बाध रूप से काम कर सकती हैं और हमको जगत्‌ के स्वरूप के वास्तविक रूप का कुछ परिचय दिलाती हैं। इस विश्व में स्पर्श, रूप, रस और गंध का अपार भंडार भरा पड़ा है जिसकी सत्ता का हमको अनुभव नहीं हैं। अंर्तर्मुख होने पर बिना हमारे प्रयास के ही इंद्रियाँ इस भंडार का द्वार हमारे सामने खोल देती हैं। सुषुम्ना में नाड़ियों की कई ग्रंथियाँ हैं, जिनमें कई जगहों से आई हुई नाड़ियाँ मिलती हैं। इन स्थानों को चक्र कहते हैं। इनमें से विशेष रूप से छह चक्रों का चर्चा योग के ग्रंथों में आता है। सबसे नीचे मुलाधार है जो प्राय: उस जगह पर है जहाँ सुषुम्ना का आरंभ होता है। और सबसे ऊपर आज्ञा चक्र है जो तिल के स्थान पर है। इसे तृतीय नेत्र भी कहते हैं। थोड़ा और ऊपर चलकर सुषुम्ना मस्तिष्क के नाड़िसंस्थान से मिल जाती है। मस्तिष्क के उस सबसे ऊपर के स्थान पर जिसे शरीर विज्ञान में सेरेब्रम कहते हैं, सहस्रारचक्र है। जैसा कि एक महात्मा ने कहा है:

मूलमंत्र करबंद विचारी सात चक्र नव शोधै नारी।।

योगी के प्रारंभिक अनुभवों में से कुछ की ओर ऊपर संकेत किया गया है। ऐसे कुछ अनुभवों का उल्लेख श्वेताश्वर उपनिषद् में भी किया गया है। वहाँ उन्होंने कहा है कि अनल, अनिल, सूर्य, चंद्र, खद्योत, धूम, स्फुलिंग, तारे अभिव्यक्तिकरानि योगे हैंश् यह सब योग में अभिव्यक्त करानेवाले चिह्न हैं अर्थात्‌ इनके द्वारा योगी को यह विश्वास हो सकता है कि मैं ठीक मार्ग पर चल रहा हूँ। इसके ऊपर समाधि तक पहुँचते पहुँचते योगी को जो अनुभव होते हैं उनका वर्णन करना असंभव है। कारण यह है कि उनका वर्णन करने के लिये साधारण मनुष्य को साधारण भाषा में कोई प्रतीक या शब्द नहीं मिलता। अच्छे योगियों ने उनके वर्णन के संबंध में कहा है कि यह काम वैसा ही है जैसे गूँगा गुड़ खाय। पूर्णांग मनुष्य भी किसी वस्तु के स्वाद का शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता, फिर गूँगा बेचारा तो असमर्थ है ही। गुड़ के स्वाद का कुछ परिचय फलों के स्वाद से या किसी अन्य मीठी चीज़ के सादृश्य के आधार पर दिया भी जा सकता है, पर जैसा अनुभव हमको साधारणत: होता ही नहीं, वह तो सचमुच वाणी के परे हैं।

समाधि की सर्वोच्च भूमिका के कुछ नीचे तक अस्मिता रह जाती है। अपनी पृथक सत्ता अहम्‌ अस्मि (मैं हूँ) यह प्रतीति रहती है। अहम्‌ अस्मि = मैं हूँ की संतान अर्थात निरंतर इस भावना के कारण वहाँ तक काल की सत्ता है। इसके बाद झीनी अविद्या मात्र रह जाती है। उसके शय होने की अवस्था का नाम असंप्रज्ञात समाधि है जिसमें अविद्या का भी क्षय हो जाता है और प्रधान से कल्पित संबंध का विच्छेद हो जाता है। यह योग की पराकाष्ठा है। इसके आगे फिर शास्त्रार्थ का द्वार खुल जाता है। सांख्य के आचार्य कहते हैं कि जो योगी पुरुष यहाँ तक पहुँचा, उसके लिये फिर तो प्रकृति का खेल बंद हो जाता है। दूसरे लोगों के लिये जारी रहता है। वह इस बात को यों समझाते हैं। किसी जगह नृत्य हो रहा है। कई व्यक्ति उसे देख रहे हैं। एक व्यक्ति उनमें ऐसा भी है जिसको उस नृत्य में कोई अभिरुचि नहीं है। वह नर्तकी की ओर से आँख फेर लेता है। उसके लिये नृत्य नहीं के बराबर है। दूसरे के लिये वह रोचक है। उन्होंने कहा है कि उस अजा के साथ अर्थात नित्या के साथ अज एकोऽनुशेते = एक अज शयन करता है और जहात्येनाम्‌ भुक्तभोगाम्‌ तथान्य:-उसके भोग से तृप्त होकर दूसरा त्याग देता है।

अद्वैत वेदान्त के आचार्य सांख्यसंमत पुरुषों की अनेकता को स्वीकार नहीं करते। उनके अतिरिक्त और भी कई दार्श्निक संप्रदाय हैं जिनके अपने अलग अलग सिद्धांत हैं। पहले कहा जा चुका हैं कि इस शास्त्रार्थ में यहां पड़ने की आवश्यकता नहीं हैं। जहां तक योग के व्यवहारिक रूप की बात है उसमें किसी को विरोध नहीं है। वेदांत के आचार्य भी निर्दिध्यासन की उपयोगिता को स्वीकार करते हैं और वेदांत दर्शन में व्यास ने भी असकृदभ्यासात्‌ ओर आसीन: संभवात्‌ जैसे सूत्रों में इसका समर्थन किया है। इतना ही हमारे लिये पर्याप्त है।

साधारणत: योग को अष्टांग कहा जाता है परंतु यहाँ अब तक आसन से लेकर समाधि तक छह अंगों का ही उल्लेख किया गया है। शेष दो अंगों को इसलिये नहीं छोड़ा कि वे अनावश्यक हैं वरन्‌ इसलिए कि वह योगी ही नहीं प्रत्युत मनुष्य मात्र के लिए परम उपयोगी हैं। उनमें प्रथम स्थान यम का है। इनके संबंध में कहा गया है कि यह देश काल, समय से अनवच्छिन्न ओर सार्वभौम महाब्रत हैं अर्थात्‌ प्रत्येक मनुष्य को प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक समय और प्रत्येक अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति के साथ इनका पालन करना चाहिए। दूसरा अंग नियम कहलाता है। जो लोग ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते उनके लिये ईश्वर पर निष्ठा रखने का कोई और नहीं है। परंतु वह लोग भी प्राय: किसी न किसी ऐसे व्यक्ति पर श्रद्धा रखते हैं जो उनके लिये ईश्वर तुल्य है। बौद्ध को बुद्धदेव के प्रति जो निष्ठा है वह उससे कम नहीं है जो किसी भी ईश्वरवादी को ईश्वर पर होती होगी। एक और बात है। किसी को ईश्वर पर श्रद्धा हो या न हो, योग मार्ग के उपदेष्टा गुरु पर तो अनन्य श्रद्धा होनी ही चाहिए। योगाभ्यासी के लिये गुरु का स्थान किसी भी दृष्टि से ईश्वर से कम नहीं। ईश्वर हो या न हो परंतु गुरु के होने पर तो कोई संदेह हो ही नहीं सकता। एक साधक चरणादास जी की शिष्या सहजोबाई ने कहा है:

अद्वैत वेदान्त के आचार्य सांख्यसंमत पुरुषों की अनेकता को स्वीकार नहीं करते। उनके अतिरिक्त और भी कई दार्श्निक संप्रदाय हैं जिनके अपने अलग अलग सिद्धांत हैं। पहले कहा जा चुका हैं कि इस शास्त्रार्थ में यहां पड़ने की आवश्यकता नहीं हैं। जहां तक योग के व्यवहारिक रूप की बात है उसमें किसी को विरोध नहीं है। वेदांत के आचार्य भी निर्दिध्यासन की उपयोगिता को स्वीकार करते हैं और वेदांत दर्शन में व्यास ने भी असकृदभ्यासात्‌ ओर आसीन: संभवात्‌ जैसे सूत्रों में इसका समर्थन किया है। इतना ही हमारे लिये पर्याप्त है।

साधारणत: योग को अष्टांग कहा जाता है परंतु यहाँ अब तक आसन से लेकर समाधि तक छह अंगों का ही उल्लेख किया गया है। शेष दो अंगों को इसलिये नहीं छोड़ा कि वे अनावश्यक हैं वरन्‌ इसलिए कि वह योगी ही नहीं प्रत्युत मनुष्य मात्र के लिए परम उपयोगी हैं। उनमें प्रथम स्थान यम का है। इनके संबंध में कहा गया है कि यह देश काल, समय से अनवच्छिन्न ओर सार्वभौम महाब्रत हैं अर्थात्‌ प्रत्येक मनुष्य को प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक समय और प्रत्येक अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति के साथ इनका पालन करना चाहिए। दूसरा अंग नियम कहलाता है। जो लोग ईश्वर की सत्ता को स्वीकार नहीं करते उनके लिये ईश्वर पर निष्ठा रखने का कोई और नहीं है। परंतु वह लोग भी प्राय: किसी न किसी ऐसे व्यक्ति पर श्रद्धा रखते हैं जो उनके लिये ईश्वर तुल्य है। बौद्ध को बुद्धदेव के प्रति जो निष्ठा है वह उससे कम नहीं है जो किसी भी ईश्वरवादी को ईश्वर पर होती होगी। एक और बात है। किसी को ईश्वर पर श्रद्धा हो या न हो, योग मार्ग के उपदेष्टा गुरु पर तो अनन्य श्रद्धा होनी ही चाहिए। योगाभ्यासी के लिये गुरु का स्थान किसी भी दृष्टि से ईश्वर से कम नहीं। ईश्वर हो या न हो परंतु गुरु के होने पर तो कोई संदेह हो ही नहीं सकता। एक साधक चरणादास जी की शिष्या सहजोबाई ने कहा है:

गुरुचरनन पर तन-मन वारूँ, गुरु न तजूँ हरि को तज डारूँ।

आज कल यह बात सुनने में आती है कि परम पुरुषार्थ प्राप्त करने के लिये ज्ञान पर्याप्त है। योग की आवश्यकता नहीं है। जो लोग ऐसा कहते हैं, वह ज्ञान शब्द के अर्थ पर गंभीरता से विचार नहीं करते। ज्ञान दो प्रकार का होता है-तज्ज्ञान और तद्विषयक ज्ञान। दोनों में अंतर है। कोई व्यक्ति अपना सारा जीवन रसायन आदि शास्त्रों के अध्ययन में बिताकर शक्कर के संबंध में जानकारी प्राप्त कर सकता है। शक्कर के अणु में किन किन रासायनिक तत्वों के कितने कितने परमाणु होते हैं? शक्कर कैसे बनाई जाती है? उसपर कौन कौन सी रासानिक क्रिया और प्रतिक्रियाएँ होती हैं? इत्यादि। यह सब शक्कर विषयक ज्ञान है। यह भी उपयोगी हो सकता है परंतु शक्कर का वास्तविक ज्ञान तो उसी समय होता है जब एक चुटकी शक्कर मुँह में रखी जाती है। यह शक्कर का तत्वज्ञान है। शास्त्रों के अध्ययन से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान है और उसके प्रकाश में तद्विषयक ज्ञान भी पूरी तरह समझ में आ सकता हैं। इसीलिये उपनिषद् के अनुसार जब यम ने नचिकेता को अध्यात्म ज्ञान का उपदेश दिया तो उसके साथ में योगविधि च कृत्स्नम्‌ की भी दीक्षा दी, नहीं तो नचिकेता का बोध अधूरा ही रह जाता। जो लोग भक्ति आदि की साधना रूप से प्रशंसा करते हैं उनकोश् भी यह ध्यान में रखना चाहिए कि यदि उनके मार्ग में वित्त को एकाग्र करने का कोई उपाय है तो वह वस्तुत: योग की धारणा अंग के अंतर्गत है। यह उनकी मर्जी है कि सनातन योग शब्द को छोड़कर नये शब्दों का व्यवहार करते हैं।

योग के अभ्यास से उस प्रकार की शक्तियों का उदय होता है जिनको विभूति या सिद्धि कहते हैं। यदि पर्याप्त समय तक अभ्यास करने के बाद भी किसी मनुष्य में ऐसी असाधारण शक्तियों का आगम नहीं हुआ तो यह मानना चाहिए कि वह ठीक मार्ग पर नहीं चल रहा है। परन्तु सिद्धियों में कोई जादू की बात नहीं है। इंद्रियों की शक्ति बहुत अधिक है परंतु साधारणत: हमको उसका ज्ञान नहीं होता और न हम उससे काम लेते हैं। अभयासी को उस शक्ति का परिचय मिलता है, उसको जगत्‌ के स्वरूप के संबंध में ऐसे अनुभव होते हैं जो दूसरों को प्राप्त नहीं हैं। दूर की या छिपी हुई वस्तु को देख लेना, व्यवहृत बातों को सुन लेना इत्यादि इंद्रियों की सहज शक्ति की सीमा के भीतर की बाते हैं परंतु साधारण मनुष्य के लिये यह आश्चर्यश् का विषय हैं, इनकों सिद्धि कहा जायगा। इसी प्रकार मनुष्य में और भी बहुत सी शक्तियाँ हें जो साधारण अवस्था में प्रसुप्त रहती हैं। योग के अभ्यास से जाग उठती हैं। यदि हम किसी सड़क पर कहीं जा रहे हो तो अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए भी अनायास ही दाहिने बाएँ उपस्थित विषयों को देख लेंगे। सच तो यह है कि जो कोई इन विषयों को देखने के लिये रुकेगा वह गन्तव्य स्थान तक पहुँचेगा ही नहीं ओर बीच में ही रह जायगा। इसीलिये कहा गया है कि जो कोई सिद्धियों के लिये प्रयत्न करता है वह अपने को समाधि से वंचित करता है। पतंजलि ने कहा है:

ते समाधावुपसर्गाव्युत्थाने सिद्धयः ।

अर्थात्‌ ये विभूतियाँ समाधि में बाधक हैं परंतु समाधि से उठने की अवस्था में सिद्धि कहलाती हैं।

इनकी प्रमुख रचनाएं हैं : महाभाष्य, चरक-संहिता, योग-दर्शन।

भाषा शास्त्र में योगदान :

  • व्याकरण के दार्शनिक पक्ष की स्थापना।
  • स्फोट और ध्वनि सिद्धांतों की स्थापना।
  • शब्द और अर्थ के स्वरूप का निर्णय।
  • शब्द की नित्यता और अनित्यता का विशद विवेचन।
  • भाषाशास्त्र में विभाषाओं का सोदाहरण महत्व प्रस्तुत करना।
  • भाषा के विभिन्न रूप विभाषा, अपभ्रंश आदि का उल्लेख करना।
  • ध्वनिविज्ञान, निर्वाचन, व्याकरण और दर्शनशास्त्र का एकत्र समन्वय प्रस्तुत करना।
  • ध्वनिविज्ञान, पदविज्ञान और अर्थविज्ञान के सिद्धांतों का स्पष्टीकरण।
  • संस्कृत को विश्व भाषा के रूप में प्रस्तुत करना।
  • विश्व की विभिन्न भाषाओं में स्थानीय अर्थ-भेद का उल्लेख करना।
महर्षि पतंजलि को योग दर्शन अर्थात् पातंजल योगसूत्र के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है योग की विभिन्न धाराओं को मिलाकर महर्षि ने योग को एक महानदी का रूप दिया जिसके अन्दर योग की सभी पद्धतियों का समावेश हो जाता है। ऋषियों के नामों के अन्तर्गत महर्षि पतंजलि का नाम बहुत अधिक सम्मान के साथ लिया जाता है। व्याकरण के ग्रंथों के अनुसार महर्षि पतंजलि अपने पिता की अंजलि में अर्ध्य दान करते समय दिव्य रूप से ऊर्ध्वलोक से आकर गिरे। इसी कारण इनका नाम पतंजलि पड़ा। यह इनके योग के प्रभाव का ही मूर्त रूप था। महर्षि पतंजलि की कृतियां यद्यपि अनेक हैं परन्तु योग दर्शन सबसे मुख्य ग्रन्थ है।

अधिकतर विद्वानों की मान्यता है कि महर्षि पतंजलि ने मनुष्य मात्र के कल्याण को ध्यान में रखते हुए तीन महाग्रंथों की रचना की जो व्यक्ति का इहलौकिक व पारलौकिक दोनों प्रकार का विकास करने में सक्षम हैं। योग वार्तिक में कहा गया है-

योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतंजलिं प्रांजलिरानतोऽस्मि॥

अर्थात् महर्षि पतंजलि ने मनुष्य के चित्त की शुद्धि के लिये पतंजलि के नाम 'योगसूत्र', वाणी की शुद्धि के लिये पाणिनी के नाम से व्याकरण के ग्रंथ 'अष्टाध्यायी' तथा शरीर की शुद्धि के लिए चरक के नाम से 'चरक संहिता' इन तीन महाग्रंथों की रचना की। इनमें व्याकरण महाभाष्य सबसे बड़ा ग्रंथ है। ये ग्रंथ ऐसे ग्रंथ हैं जो अपने क्षेत्र में अद्वितीय हैं। इनके पश्चात् इन क्षेत्रों में जो भी कार्य हुआ वह सब इन्हीं को आधार मानकर किया गया है। इन सब से यह तथ्य सिद्ध होता है की महर्षि पतंजलि एक सिद्ध योगी थे, जिन्होंने सभी पदार्थों का वास्तविक रूप से साक्षात्कार किया और प्राणिमात्र के कल्याण की कामना करते हुए उसको अपनी रचना में स्थान प्रदान किया।

योगदर्शन पर प्राप्त भाष्य एवं टीकाएँ

योगदर्शन पर स्वयं भगवान श्री वेदव्यास जी का भाष्य प्राप्त होता है, जो की "सांख्य प्रवचन भाष्य" के नाम से जाना जाता है। योगदर्शन पर प्रवर्ती टीकाएं अनेक हैं- जिनमें वाचस्पति मिश्र की "तत्ववैशारदी", विज्ञान भिक्षु का "योग वार्तिक", शंकर का "भाष्य विवरण", हरिअर्जुन का "भाष्य टीका", भिक्षु का "योग सुधाकर" आदि प्रसिद्ध ग्रंथ है। इन सभी में महर्षि पतंजलि का योग सूत्र इतना महत्वपूर्ण ग्रंथ है कि जब वेदव्यास जी को इसके भाष्य से संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने पुराणों में इस योग का समावेश किया। लिंगादि पुराणों में योगदर्शन का पदबद्ध (पदमय) अनुवाद प्राप्त होता है। इससे इनकी योगाचार्यता और आदि प्रवर्तक के रूप में प्रतिष्ठापित होना प्राचीन काल से ही सर्वमान्य है।

महर्षि पतंजलि का योगदर्शन अत्यन्त प्राचीन दर्शन है और इससे सभी प्रकार के आधिदैविक, आधिभौतिक एवं आध्यात्मिक दु:ख समाप्त होकर सिद्धियों के लाभ प्राप्त होते हैं। साधक सरलता से देवताओं का सान्निध्य प्राप्त कर उनसे पूरा लाभ उठा सकता है। महर्षि कहते हैं कि स्वाध्याय के द्वारा साधक इष्टदेव के दर्शन प्राप्त उनसे लाभ प्राप्त कर सकता है। साधक थोडी तन्मयता से भी अपने पूर्व जन्मों तथा आगे आने वाले अवस्था में मुक्ति का ज्ञान प्राप्त कर लेता है और विधिपूर्वक साधना से देवताओं के बीच विचरने तथा आकाशगमन की सिद्धियों की प्राप्ति करता है। यदि शांत मन व विवेक के द्वारा उन स्वप्नों की गुत्थियों को सुलझा सके अथवा स्वप्न के दिखे हुए देवता, पितृ, मुनि, सन्तों, देवियों की श्रद्धापूर्वक ध्यान आराधना करें, तो वे उसे अपार सहायता पहँचाते हैं और उससे सभी प्रकार का दिव्य ज्ञान व मुक्ति की प्राप्ति हो जाती है।

संक्षेप में महर्षि पतंजलि ने साधक को स्वरूप में स्थित होने की युक्ति बतलायी है। उनके ग्रंथों के प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि वे अजर, अमर व सभी सिद्धियों से समायुक्त थे। केवल लोकोपकार के लिए ही उन्होंने ग्रंथों का पुर्ननमन किया। जिससे 'व्यास' 'शुकदेव' 'गौडपादाचार्य' शंकराचार्य अन्य उच्च कोटि के आचार्य भी प्रभावित हुए। आचार्य व्यास ने तो उनके योगसूत्र पर भाष्य और पुराणों में उनकी योग शिक्षा की चर्चा के अतिरिक्त भी ब्रह्मसूत्र के चौथे अध्याय में योग पाद का सन्निवेश किया है। जो योग दर्शन पर ही आधारित है। जैसे 'स्थिर सुखमासनम्' के स्थान पर आसीनः सम्भवान्' आदि सूत्र ठीक उसी प्रक्रिया में सभी साधनों को निर्दिष्ट करते हुए मोक्ष तक ले जाते हैं। जिस पर आदि शंकराचार्य के विलक्षण भाष्य हैं।

महर्षि पतंजलि द्वारा निर्देशित यम-नियम आदि में से कोई एक भी साधन ठीक ढंग से आरंभ करने पर भगवत कृपा से साधक में स्वयं योग की प्रवृत्तियों के प्रथम लक्षण में भगवान पतंजलि ने स्वयं ज्योतिष्मती. गंधवती, स्पर्शवती, रूपवती, एवं रसवती इन पांच योग वृत्तियों में से किसी एक लक्षण के प्रकट हो जाने पर योग शक्ति में उसके प्रवेश का लक्षण बताया है। इनसे साधक के अन्दर सभी देवी-देवता, दिव्य पदार्थ. शास्त्र आदि वचनों में परलोक में पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास हो जाता है, जिसके फलस्वरूप उसका शीघ्र कल्याण होता है। इसलिये इस योगचर्या में थोड़ी दूर चलना भी महान् कल्याणकारी होता है।

इस योग विद्या का प्रचार आज भारत ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में है, जिसका मूलतः श्रेय महर्षि पतंजलि को ही है। उनके योग दर्शन में कोई हानिकारक या अनिष्ट, अनुचित वस्तु है ही नहीं। अहिंसा सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य त्याग की वृत्ति, पवित्रता, स्वाध्याय या ईश्वर प्रेम की बात में सभी बातें ऐसी हैं, जिनको सभी धर्मों – सम्प्रदायों ने समान रूप से स्वीकार किया है। पतंजलि का योग किसी धर्म या सम्प्रदाय से जुड़ा हुआ नहीं है न ही उसमें किसी का निरोध किया गया है। जिससे यह योग विद्या सभी को मान्य है। इसलिये योग मार्ग के पथिकों का पुनीत कर्त्तव्य है कि महर्षि पतंजलि के बताये योग मार्ग का आश्रय लेकर अखण्ड शान्ति एवं परम आनन्द प्राप्ति की ओर अग्रसर हो। इसी में मनुष्य जन्म की सच्ची सार्थकता है।
महर्षि पतंजलि द्वारा वर्णित साधनाएं 
महर्षि पतंजलि ने संसार सागर से पार होने के लिए अपने योग सूत्र में तीन प्रकार की साधनाओं का मुख्य रूप से वर्णन किया है। चित्तवृत्ति निरोध के लिए महर्षि पतंजलि कहते हैं-

'अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः।'

अर्थात् अभ्यास और वैराग्य के द्वारा चित्त की वृत्तियों का निरोध होता है। इस अभ्यास और वैराग्य की साधना का वर्णन उन्होंने उत्तम कोटि के साधकों को लिए बताया है। इन साधकों के लिए एक-दूसरे साधन का वर्णन करते हुए पतंजलि कहते हैं-

'ईश्वर प्राणिधानाद्वा।'

अर्थात् जो उत्तम कोटि के साधक हैं उन्हें केवल ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से योग सिद्धि हो जाती है। 'मध्यम कोटि' के साधकों के लिए महर्षि पतंजलि क्रियायोग की साधना का वर्णन हैं। क्रियायोग का वर्णन करते हुए महर्षि पतंजलि' कहते हैं-

'तपः स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधानानि क्रियायोगः।'

अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान ये तीन साधन "क्रियायोग" के अंतर्गत आते हैं। इसके अभ्यास से भी चित्त वृत्तियों का निरोध संभव है। तीसरी साधना जो सामान्य पुरुषों और विद्वानों के लिए समान उसका वर्णन करते हुए महर्षि पतंजलि ने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इस अष्टांगयोग का मार्ग बताया है। उनकी यही साधना पद्धति सर्वशुलभ एवं लोकप्रिय है।

महर्षि पतंजलि की रचनाएं
महर्षि पतंजलि योगसूत्र के रचनाकार है, एवं पतंजलि योगदर्शन एक बड़ा ही महत्वपूर्ण शास्त्र है इसमें योग के 195 सूत्र है।

1. समाधिपाद
इस ग्रन्थ के पहले पाद में योग के लक्षण, स्वरूप और उसकी प्राप्ति के उपायों का वर्णन करते हुए चित्त की वृत्तियां े के पांच भेद और उनके लक्षण बतलाये गये हैं इस पाद में प्रधानता से समाधि के स्वरूप का वर्णन है, इस कारण इसे समाधिपाद कहते हैं। 

2. साधनपाद
इस पाद में प्रधानता से समाधि के साधनों का वर्णन है इस कारण उसे साधनपाद कहते हैं। निर्बीज समाधि वही साधक प्राप्त कर सकता है जिसका अन्त:करण स्वभाव से ही शुद्ध हो गया है। अन्त:करण की शुद्धिपूर्वक निर्बीज-समाधि प्राप्त करने का उपाय साधनापाद में बताये गये हैं।

3. विभूतिपाद
विभूतिपाद के पहले सूत्र में ‘धारणा’, दूसरे में ‘ध्यान’ तथा तीसरे में ‘समाधि’ के बारे में बताते हुऐ ऋषि ने 7वें सूत्र में उक्त तीनों को अन्तरंग साधन बताया है। 12वें सूत्र में चित्त की वृत्तियां, सूत्र 16 में भूत भविष्य की घटनाओं का ज्ञान होने, सूत्र 22 में साधक को मृत्यु का पूर्व ज्ञान होने एवं सूत्र 23 से 32 तक साधक को प्राप्त होने वाली विभिé सिद्धिया का ज्ञान हो जाने के बारे में विस्तार से बताया है।

4. कैवल्यपाद
कैवल्यपाद के 2 और 3वें सूत्र में ऋषि ने जात्यान्तरण की बात कही है जिसमें मनुष्य की वृत्ति बदल जाती है। तमोगुण से सतोगुण वृत्ति हो जाती है। उपरोक्त तीनों पादों में समाधि का वास्तविक फल (कैवल्य) का वर्णन प्रसंगानुसार हुआ है किन्तु विवेचनापूर्ण नहीं हुआ, अत: उसका अच्छी तरह वर्णन इस पाद में किया गया है इसलिये इसका नाम ‘‘कैवल्यपाद’’ रखा गया है।

आखिर क्यों उपेक्षित है योग प्रणेता, महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली-
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योग का बोलबाला हर तरफ दिखेगा लेकिन साथ ही एक कड़वा सच ये भी है कि दुनिया को योग का ज्ञान देने वाले महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली गुमनामी के अंधेरे में है.

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर गुरुवार, 21 जून को पूरा विश्व योग के लिए तैयार है. थल, जल और नभ तक योग के लिए तरह-तरह के आयोजन होंगे. योग का बोलबाला हर तरफ दिखेगा लेकिन साथ ही एक कड़वा सच ये भी है कि दुनिया को योग का ज्ञान देने वाले महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली गुमनामी के अंधेरे में है. अयोध्या से महज 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कोडर गांव में महर्षि पतंजलि का आश्रम है. ये गांव गोंडा जिले में आता है.   

योग सूत्र और महाभाष्य की रचना करने वाले महर्षि पतंजलि का गांव विकास से खुद ही अछूता है. यहां महर्षि पतंजलि के जन्मस्थल की पहचान इतनी है कि उनके नाम पर एक चबूतरा बना ही नजर आता है. ये चबूतरा भी श्री पतंजलि जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष डॉ भगवदाचार्य के प्रयास से ही बन सका. पास ही बहने वाली कोडर झील नौ किलोमीटर के क्षेत्र में फैली है लेकिन ये भी अपने उद्धार का इतंजार कर रही है.

कोडर गांव की आबादी करीब पांच हजार है. यहां सिर्फ प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक स्कूल ही हैं. ना यहां कोई इंटर कॉलेज है और ना ही अस्पताल. यहां मूलभूत सुविधाओं के अभाव के साथ ना ही कोई ऐसा प्रबंध है कि आने वाले लोगों को महर्षि पतंजलि के बारे में जानकारी दी जा सके. कोडर को जाने वाला रास्ता भी बदहाल है.

महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली कोडर गांव की उपेक्षा से व्यथित डॉ भगवदाचार्य कहते हैं कि योग दिवस पर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कोडर गांव आएं तो इससे महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली की ओर पूरी दुनिया का ध्यान जाएगा. उनके मुताबिक यहां अंतरराष्ट्रीय योग विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग फाइलों में कैद होकर ही रह गई है. वे कहते हैं कि कोडर को पर्यटक स्थली के तौर पर विकसित किया जाए, जिससे क्षेत्र के लोगों को भी विकास का लाभ मिल सके.

गुरुवार को कोडर गांव में कुछ उत्साही युवक योग करने के सात महर्षि पतंजलि की तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर उन्हें याद करेंगे.

कोडर गांव के नागरिक भी महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली की उपेक्षा से नाखुश हैं. उनका कहना है कि एक तरफ दुनिया में, देश में मंत्री से लेकर संतरी तक योग करेंगे वहीं महर्षि पतंजलि के जन्मस्थल पर ही उन्हें मुट्ठी भर लोगों के अलावा याद करने वाला और कोई नहीं होगा.    
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कोडर गांव के रहने वाले विश्वनाथ कहते हैं कि महर्षि पतंजलि की जन्मस्थली होने के बावजूद किसी सरकार का यहां ध्यान नहीं गया. इसी तरह स्थानीय नागरिक विपिन सिंह का कहना है कि 177 देशों में योग दिवस मनाया जा रहा है लेकिन दुख की बात है कि जिन्होंने दुनिया को योग का ज्ञान दिया, उन्हीं की जन्मस्थली उपेक्षित है. इसी तरह शिवानी सिंह और धर्मा देवी का कहना है कि महर्षि पतंजलि के नाम पर क्षेत्र में डिग्री कॉलेज खोला जाना चाहिए. उन्होंने अस्पताल की जरूरत जताने के साथ सड़क को दुरुस्त किए जाने की भी मांग की.


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महार्षि च्यवन मुनि आश्रम तपोस्थली

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मान्यता है इसी सरोवर मे देव बैद्यों मे अमृत डाल कर महार्षि को स्नान कराया था जिससे उन्हे युवा अवस्था इसमे स्नान करने से मिली  । 

गोण्डा। जनपद मुख्यालय से लगभग 5 किमी दूर गोन्डा बलरामपुर मार्ग पर स्थित सुभागपुर के पास है महर्षि च्यवनमुनि_आश्रम और कुंड । आश्रम के सामने सरोवर से चमनई ( च्यवन) नदी निकली है जो मनवर मे मिल जाती है।  महार्षि च्यवन मुनि का तपोस्थलि पर हर बर्ष की तरह भव्य  मेला लगा। जहाँ हजारो भक्तो ने श्रद्धा भाव से स्नान दान किया।  स्थल ऐतिहासिक दृष्टि गत है इस पावन स्थल की गाथायें बेद ग्रन्थो मे भी बर्णित है।  कहते है यहा सच्चे मन से स्नान करने से  अनेको प्रकार के रोग कष्ट बाधाये दूर हो जाती है। 

महान ऋषि भृगु के पुत्र थे च्यवन ऋषि, इनकी माता का नाम पुलोमा था. ऋषि च्यवन को महान ऋषियों की श्रेणी में रखा जाता है इनके विचारों एवं सिद्धांतों द्वारा ज्योतिष में अनेक महत्वपूर्ण बातों आगमन हुआ इस कारण यह ज्योतिष गुरू रुप में भी प्रसिद्ध हुए तथा इनके द्वारा रचित ग्रंथों से ज्योतिष तथा जीवन के सही मार्गदर्शन का बोध हुआ.

च्यवन ऋषि जन्म कथा-

ऋषि भृगु की पत्नी का नाम पुलोमा था एक बार जब भृगु ऋषि अपनी पत्नी के पास नहीं होते हैं तब राक्षस पुलोमन, उनकी पत्नी पुलोमा जबरन अपने साथ ले जाने के लिए आता है वह पुलोमन को बलपूर्वक ले जाने लगता है उस समय पुलोमा गर्भवती होती हैं और इस कारण इस संघर्ष में शिशु गर्भ से बाहर गिर जाते है और बालक के तेज से राक्षस पुलोमन भस्म हो जाता है,  तथा पुलोमा पुन: अपने निवास स्थान भृगु ऋषि के पास आ जाती हैं .गर्भ से गिर जाने के कारण इनका नाम च्यवन पड़ा.

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महर्षी च्यवन एक ऋषि थे जिन्होने जड़ी-बुटियों से 'च्यवनप्राश' नामक एक औषधि बनाकर उसका सेवन किया तथा अपनी वृद्धावस्था से पुनः युवा बन ब गए थे। महाभारत के अनुसार, उनमें इतनी शक्ति थी कि वे इन्द्र के वज्र को भी पीछे धकेल सकते थे। वे अत्यन्त तपस्वी थे।

उसका वर्णन पुजारी प्रेम प्रकाश तिवारी ने बताया-

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च्यवन ऋषि से संबंधित मुख्य घटनाएँ,ऋषि च्यवन और सुकन्या -

च्यवन मुनि यही पर तप किया। राज पुत्री राजा शर्याति की पुत्री शुकन्या यहा  घूमने आयी मुनि घोर तपस्या मे लीन जिससे उनके शरीर पर घासे, व दींमको का अड्डा बन गया। जिससे देख कौतूहल बस राज कन्या वहा गयी। जहा सिर्फ आंखे चमक रही थी। उत्सुकता बश किसी से कुदेरना शुरु किया। जिससे मुनि की  चेतना जागी और दोनों आंख से अन्धे हो गये। गलती की क्षमा मांगते राज पुत्री शुकन्या ने मुनि से विवाह कर लिया और तब परीक्षा लेने देव बैद्य अश्विनी और कुमारं ने शुकन्या से मिले देवताओं ने उसे देखा। साक्षात देवराज इन्द्र की पुत्री समान दर्शनीय अंगो वाली उस राजकन्या को देखकर। अश्विनीकुमारों ने उसके पास जा यह बात कही।  तुम किसकी पुत्री और किसकी पत्नी हो इस वन में क्या करती हो ! मद्रे! हम तुम्हारा परिचय प्राप्त करना चाहते हैं। तुम बातें ठीक ठीक बताओं तब सुकन्या ने लज्जित होकर उन दोनों श्रेष्ठ देवताओं से कहा- ‘देवेश्वरो  आपको विदीत होना चाहिए कि में राजा शर्याति की पुत्री और महर्षि च्यवन की पत्नी हूँ। ‘मेरा नाम इस जगत में सुकन्या प्रसिद्ध है। मैं सम्पूर्ण हृदय से सदा अपने पतिदेव के प्रति निष्ठा रखती हूँ। ‘ यह सुनकर अश्विनीकुमारों ने पुनः हंसते हुए कहा- ‘कल्याणि! तुम्हारे पिताने इस अत्यन्त बूढ़े पुरुष के साथ तुम्हार ा विवाह कैसे कर दिया भीरू ! इस वन में तुम विद्युत की भाँति प्रकाशित हो रही हो। भामिने! देवताओं के यहाँ भी तुम जैसी सुन्दरी को हम नहीं देख पाते हैं।  तुम्हारे अंगो पर आभूषण नहीं है। तुम उत्तम वस्त्रों से भी वंचित हो और तुमने कोई श्रृंगार भी नहीं धारण किया है तों भी इस वन की अधिकाधिक शोभा बढ़ा रही हो।
                  
कहां आप और कहां अंन्धा बुढा जपल्ला  सुन्दरी! यदि तुम समस्त भूषणों से भूषित हो जाओ और अच्छे-अच्छे वस्त्र पहन लो, तो उस समय तुम्हारी जो शोभा होगी, वैसी इस मल और पकं से युक्त मलिन वेश में नहीं हो रही हैा। ’कल्याणि ! तुम ऐसी अनुपत सुन्दरी होकर काम भोग से शून्य इस जरा जर्जर बूढ़े पति की उपासना कैसे करती हो। ‘पवित्र मुस्कान वाली देवी! वह बूढ़ा तो तुम्हारी रक्षा और पालन पोषण में भी समर्थ नहीं है। अतरू तुम च्यवन को छोड़कर हम दोनों मे किसी एक को अपना पति चुन लो। ‘देवकन्या के समान सुन्दरी राजकुमारी! बूढ़े पति के लिये अपनी इस जवानी को व्यर्थ न गंवाओं। ‘उनके ऐसा कहने पर सुकन्या ने उन दोनों देवताओं से कहा- देवेश्वरो! मैं अपने पतिदेव च्यवन मुनि में ही पूर्ण अनुराग रखती हूं, अतः आप मेरे विषय में इस प्रकार की अनुचित आंशका न करें। ‘ तब उन दोनो ने पुनः सुकन्या से कहा- हम देवताओं के श्रेष्ठ वैद्य है। तुम्होर पति को तरुण युवा और मनोहर रूप में सम्पन्न बना देगें। 
                          
तब तुम इस तीनों मे से किसी एक को अपना पति बना लेना। इस शर्त के साथ तुम चाहो तो अपने पति को यहाँ बुला लो’। राजन! उन दोनो की यह बात सुनकर सुकन्या च्यवन मुनि के पास गयी और अश्विनीकुमारों ने जो कहा था, वह सब उन्हें कह सुनाया। यह सुनकर च्यवन ने अपनी पत्नी से कहा- ‘प्रिय! देववैद्यो ने जैसा कहा है, वैसा करो’।

च्यवन सुंदर रूप की प्राप्ति

पति की आज्ञा पाकर सुकन्या अश्विनीकुमारों से कहा- ‘आप मेरे पति को रूप और यौवन से सम्पन्न बना दें। ‘उसका यह कथन सुनकर अश्विनीकुमारों ने राजकुमारी सुकन्या से कहा- ‘तुम्हारे पति देव इस जल में प्रवेश करें। ‘तब च्यवन मुनि ने सुन्दर रूप की अभीलाषा लेकर शीघ्रता पूर्वक उस सरोवर के जल में प्रवेश किया। साथ ही दोनो अश्विनी और कुमार भी उस सरोवर में प्रवेश कर गये तदनन्तर दो घड़ी के पश्चात वे उन सबकी युवावस्था थी। उन्होंने कानों मे चमकिले कुण्डल धारण कर रक्खे थे। वेभभूषा भी उनकी एक सी ही थी और वे सभी मन की प्रीती बढ़ाने वाले थे। सरोवर से बाहर आकर उन सब ने एक साथ कहा- ‘शुभे! भद्रे! वरवर्णिनि! हममें से किसी एक को, जो तुम्हारी रुचि के अनुकूल हो, अपना पति बना लो।  जिसको भी तुम मन से चाहती हो। उसी को पति बनाओ। ‘देवी सुकन्या ने उस सबको एक जैसा रूप धारण किये खड़े देख मन और बुद्धि से निश्चय कर के अपने पति को ही स्वीकार किया। महातेजस्वी च्यवन मुनि ने अनुकूल पत्नी, तरुण अवस्था और मनोवांछित रूप पाकर बढ़े हर्ष का अनुभव किया और दोनों अश्विनीकुमारों से कहा- ‘आप दोनो ने मुझ बूढ़े को रूपवान और तरुण बना दिया, साथ ही मुझे यह भार्या भी मिल गयी इसलिये मै प्रसन्न होकर आप दोनों को यज्ञ में देवराज इन्द्र के सामने ही सोमपान का अधिकारी बना दूंगा।

यह मैं आप लोगों से सत्य कहता हूँ। यह सुनकर दोनों अश्विनीकुमार प्रसन्नचित हो देवलोक को लौट गये । च्यवन मुनि तथा सुकन्या देवदम्पति की भाँति रहने  लगे । मान्यता है इसी सरोवर मे देव बैद्यों मे अमृत डाल कर महार्षि को स्नान कराया था जिससे उन्हे युवा अवस्था इसमे स्नान करने से मिली  । अनेको प्रकार की घातक बीमारी रोगो से मुक्ति मिलती है। आज हजारो महिला पुरुष बच्चो श्रद्धालुओ ने इस कुड मे स्नान कर बैतरणी पार उतरने के लिए गौ पूजन किया। वा यथाशक्ति दान दक्षिणा दिया मेले मे लैय्या चूरा, गट्टा, तथा मिट्टी के करवा की जम कर खरीदारी हुयी बच्चो ने झूले का लुफ्त उठाया।  

ऋषि च्यवन और अश्चिनीकुमार-

सुकन्या बहुत पतिव्रता थी वह च्यवन ऋषि की सेवा दिन रात लगी रहती. एक दिन च्यवन ऋषि के आश्रम में , देवों के वैद्य अश्‍वनीकुमारआ आते हैं. सुकन्या उचित प्रकार से उनका आदर-सत्कार एवं पूजन करती है. उसके इस आदर भाव व पतिव्रत से से प्रसन्न अश्‍वनीकुमार उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं वह च्यवन ऋषि को उनका यौवन व आंखों की ज्योती प्रदान करते हैं आँखों की ज्योती और नव यौवन पाकर च्यवन मुनि बहुत प्रसन्न होते हैं वह अश्चिनीकुमारों को सौमपान का अधिकार दिलवाने का वचन देते हैं.

यह सुनकर अश्विनी कुमार प्रसन्न होकर और उन दोनों को आशीर्वाद देकर वहाँ से चले जाते हैं. शर्याति जब च्यवन ऋषि के युवा हो जाने के बारे में सुनते हैं तो बहुत प्रसन्न होते हैं व उनसे मिलने जाते हैं. ऋषि च्यवन,  राजा से कहकर एक यज्ञ का आयोजन कराते हैं. जहां वह यज्ञ का कुछ भाग अश्विनी कुमारों को प्रदान करते हैं. तब देवराज इन्द्र आपत्ति जताते हैं और अश्‍वनीकुमारों को यज्ञ का भाग देने से मना करते हैं

परंतु च्यवन ऋषि, इन्द्र की बातों को अनसुना कर देते हैं इससे क्रोधित होकर इन्द्र ने उन पर वज्र का प्रहार करने लगते हैं किंतु  ऋषि च्यवन अपने तपोबल से वज्र को रोककर एक भयानक राक्षस उत्पन्न करते हैं. वह राक्षस इन्द्र को मारने के लिए दौडता है इन्द्र ने भयभीत होकर अश्‍वनीकुमारों को यज्ञ का भाग देना स्वीकार कर लेते हें और च्यवन ऋषि से क्षमा मांगते हैं च्यवन ऋषि का क्रोध शांत होता है और वह उस राक्षस को भस्म करके इन्द्र को कष्ट से मुक्ति प्रदान करते हैं.

ऋषि च्यवन द्वारा रचित ग्रंथ -
च्यवन मुनी द्वारा अनेक ग्रंथों की रचना हुई. उनके द्वारा रचित च्यवन स्मृति में उन्होंने विभिन्न तथ्यों के महत्व को दर्शाया. इसमें उन्होंने गोदान के महत्व के विषय में लिखा इसके साथ ही बुरे कार्यों से बचने का मार्ग एवं प्रायश्चि का विधान भी बताया. भास्कर संहिता में इन्होंने सूर्य उपासना और दिव्य चिकित्सा से युक्त "जीवदान तंत्र" भी रचा है जो एक महत्वपूर्ण मंत्र है. अनेक महान राजाओं ने इनके निर्णयों को अपने धर्म कर्म में शामिल किया.

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हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार माता के 51 शक्ति पीठ

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हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। ये शक्ति पीठ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। हालांकि देवी भागवत में जहां 108 और देवी गीता में 72 शक्तिपीठों का ज़िक्र मिलता है, वहीं तन्त्रचूडामणि में 52 शक्तिपीठ बताए गए हैं। देवी पुराण में ज़रूर 51 शक्तिपीठों की ही चर्चा की गई है। इन 51 शक्तिपीठों में से कुछ विदेश में भी हैं।  वर्तमान में भारत में 42, पाकिस्तान में 1, बांग्लादेश में 4, श्रीलंका में 1, तिब्बत में 1 तथा नेपाल में 2 शक्ति पीठ  है।

कैसे बने शक्तिपीठ (कथा) :
माता के इन 51 शक्तिपीठों के बनने के सन्दर्भ में जो कथा है, वह यह है कि राजा प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में माता जगदम्बिका ने सती के रूप में जन्म लिया था और भगवान शिव से विवाह किया। एक बार मुनियों का एक समूह यज्ञ करवा रहा था। यज्ञ में सभी देवताओं को बुलाया गया था। जब राजा दक्ष आए तो सभी लोग खड़े हो गए लेकिन भगवान शिव खड़े नहीं हुए। भगवान शिव दक्ष के दामाद थे। यह देख कर राजा दक्ष बेहद क्रोधित हुए। दक्ष अपने दामाद शिव को हमेशा निरादर भाव से देखते थे। सती के पिता राजा प्रजापति दक्ष ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व / ब्रिहासनी’ नामक यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता और सती के पति भगवान शिव को इस यज्ञ में शामिल होने के लिए निमन्त्रण नहीं भेजा था। जिससे भगवान शिव इस यज्ञ में शामिल नहीं हुए। नारद जी से सती को पता चला कि उनके पिता के यहां यज्ञ हो रहा है लेकिन उन्हें निमंत्रित नहीं किया गया है। इसे जानकर वे क्रोधित हो उठीं। नारद ने उन्हें सलाह दी कि पिता के यहां जाने के लिए बुलावे की ज़रूरत नहीं होती है। जब सती अपने पिता के घर जाने लगीं तब भगवान शिव ने मना कर दिया। लेकिन सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी जिद्द कर यज्ञ में शामिल होने चली गई। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष ने भगवान शंकर के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें करने लगे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती को यह सब बर्दाश्त नहीं हुआ और वहीं यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। सर्वत्र प्रलय-सा हाहाकार मच गया। भगवान शंकर के आदेश पर वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया और अन्य देवताओं को शिव निंदा सुनने की भी सज़ा दी और उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता और ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। तब भगवान शिव ने सती के वियोग में यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए सम्पूर्ण भूमण्डल पर भ्रमण करने लगे। भगवती सती ने अन्तरिक्ष में शिव को दर्शन दिया और उनसे कहा कि जिस-जिस स्थान पर उनके शरीर के खण्ड विभक्त होकर गिरेंगे, वहाँ महाशक्तिपीठ का उदय होगा। सती का शव लेकर शिव पृथ्वी पर विचरण करते हुए तांडव नृत्य भी करने लगे, जिससे पृथ्वी पर प्रलय की स्थिति उत्पन्न होने लगी। पृथ्वी समेत तीनों लोकों को व्याकुल देखकर और देवों के अनुनय-विनय पर भगवान विष्णु सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड कर धरती पर गिराते गए। जब-जब शिव नृत्य मुद्रा में पैर पटकते, विष्णु अपने चक्र से शरीर का कोई अंग काटकर उसके टुकड़े पृथ्वी पर गिरा देते। ‘तंत्र-चूड़ामणि’ के अनुसार इस प्रकार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आया। इस तरह कुल 51 स्थानों में माता की शक्तिपीठों का निर्माण हुआ। अगले जन्म में सती ने हिमवान राजा के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया और घोर तपस्या कर शिव को पुन: पति रूप में प्राप्त किया।

51 शक्ति पीठो का विवरण 
1. किरीट शक्तिपीठ 
किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है।  यहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं।
(शक्ति का मतलब माता का वह रूप जिसकी पूजा की जाती है तथा भैरव का मतलब शिवजी का वह अवतार जो माता के इस रूप के स्वांगी है )

2. कात्यायनी शक्तिपीठ 
वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं तथा भैरव भूतेश है।

3. करवीर शक्तिपीठ 
महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है।

4. श्री पर्वत शक्तिपीठ  
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं।

5. विशालाक्षी शक्तिपीठ  
उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं।

6. गोदावरी तट शक्तिपीठ  
आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं।

7. शुचीन्द्रम शक्तिपीठ  
तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिासागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के उफध्र्वदन्त (मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं।

8. पंच सागर शक्तिपीठ 
इस शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दान्त गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं।

9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ
हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं।

10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ
इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतदभेद है। कुछ  गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उफध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं।

11. अट्टहास शक्तिपीठ 
अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति पफुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।

12. जनस्थान शक्तिपीठ
महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है जनस्थान शक्तिपीठ जहां माता का ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष हैं।

13. कश्मीर शक्तिपीठ या अमरनाथ शक्तिपीठ 
जम्मू-कश्मीर के अमरनाथ में स्थित है यह शक्तिपीठ जहां माता का कण्ठ गिरा था। यहां की शक्ति महामाया तथा भैरव त्रिसंध्येश्वर हैं।

14. नन्दीपुर शक्तिपीठ 
पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है यह पीठ, जहां देवी की देह का कण्ठहार गिरा था। यहां कि शक्ति निन्दनी और भैरव निन्दकेश्वर हैं।

15. श्री शैल शक्तिपीठ  
आंध्रप्रदेश  के कुर्नूल के पास है श्री शैल का शक्तिपीठ, जहां माता का ग्रीवा गिरा था। यहां की शक्ति महालक्ष्मी तथा भैरव संवरानन्द अथव ईश्वरानन्द हैं।

16. नलहटी  शक्तिपीठ 
पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है नलहटी शक्तिपीठ, जहां माता का उदरनली गिरी थी। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं।

17. मिथिला शक्तिपीठ 
इसका निश्चित स्थान अज्ञात है। स्थान को लेकर मन्तारतर है तीन स्थानों पर मिथिला शक्तिपीठ को माना जाता है, वह है नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा, जहां माता का वाम स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति उमा या महादेवी तथा भैरव महोदर हैं।

18. रत्नावली शक्तिपीठ 
इसका निश्चित स्थान अज्ञात है, बंगाज पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के चेन्नई में कहीं स्थित है रत्नावली शक्तिपीठ जहां माता का दक्षिण स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं।

19. अम्बाजी शक्तिपीठ 
गुजरात गूना गढ़ के गिरनार पर्वत के  शिखर पर देवी अम्बिका  का भव्य विशाल मन्दिर है, जहां माता का उदर गिरा था। यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुण्ड है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उध्र्वोष्ठ गिरा था, जहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है।

20. जालंध्र शक्तिपीठ 
पंजाब के जालंध्र में स्थित है माता का जालंध्र शक्तिपीठ जहां माता का वामस्तन गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुरमालिनी तथा भैरव भीषण हैं।.

21. रामागरि शक्तिपीठ 
इस शक्ति पीठ की स्थिति को लेकर भी विद्वानों में मतान्तर है। कुछ उत्तर प्रदेश के चित्राकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था। यहा की शक्ति शिवानी तथा भैरव चण्ड हैं।

22. वैद्यनाथ शक्तिपीठ
झारखण्ड के गिरिडीह, देवघर स्थित है वैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ, जहां माता का हृदय गिरा था। यहां की शक्ति जयदुर्गा तथा भैरव वैद्यनाथ है। एक मान्यतानुसार यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था।

23. वक्त्रोश्वर शक्तिपीठ
माता का यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है जहां माता का मन गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव वक्त्रानाथ हैं।

24. कण्यकाश्रम कन्याकुमारी शक्तिपीठ 
तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ीद्ध के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता का पीठ मतान्तर से उध्र्वदन्त गिरा था। यहां की शक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमषि या स्थाणु हैं।

25. बहुला शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता का वाम बाहु गिरा था। यहां की शक्ति बहुला तथा भैरव भीरुक हैं।

26. उज्जयिनी शक्तिपीठ 
मध्य प्रदेश के उज्जैन के पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी शक्तिपीठ। जहां माता का कुहनी गिरा था। यहां की शक्ति मंगल चण्डिका तथा भैरव मांगल्य कपिलांबर हैं।

27. मणिवेदिका शक्तिपीठ 
राजस्थान के पुष्कर में स्थित है मणिदेविका शक्तिपीठ, जिसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है यहीं माता की कलाइयां गिरी थीं। यहां की शक्ति गायत्री तथा भैरव शर्वानन्द हैं।

28. प्रयाग शक्तिपीठ 
उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। यहां माता की हाथ की अंगुलियां गिरी थी। लेकिन, स्थानों को लेकर मतभेद इसे यहां अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों गिरा माना जाता है। तीनों शक्तिपीठ की शक्ति ललिता हैं तथा भैरव भव है।

29. विरजाक्षेत्रा, उत्कल शक्तिपीठ 
उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है जहां माता की नाभि गिरा था। यहां की शक्ति  विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं।

30. कांची शक्तिपीठ 
तमिलनाडु के कांचीवरम् में स्थित है माता का कांची शक्तिपीठ, जहां माता का कंकाल गिरा था। यहां की शक्ति देवगर्भा तथा भैरव रुरु हैं।

31. कालमाध्व शक्तिपीठ 
इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु, यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं।

32. शोण शक्तिपीठ
मध्य प्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मन्दिर शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था। एक दूसरी मान्यता यह है कि  बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है। यहां सती का दायां नेत्रा गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं।

33. कामाख्या शक्तिपीठ 
कामगिरि असम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का योनि गिरा था। यहां की शक्ति कामाख्या तथा भैरव उमानन्द हैं।

34. जयन्ती शक्तिपीठ 
जयन्ती शक्तिपीठ मेघालय के जयन्तिया पहाडी पर स्थित है, जहां माता का वाम जंघा गिरा था। यहां की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वर हैं।

35. मगध् शक्तिपीठ 
बिहार की राजधनी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है जहां माता का दाहिना जंघा गिरा था। यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं।

36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ 
पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है त्रिस्तोता शक्तिपीठ, जहां माता का वामपाद गिरा था। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव ईश्वर हैं।

37. त्रिपुरी सुन्दरी शक्तित्रिपुरी पीठ 
त्रिपुरा के राध किशोर ग्राम में स्थित है त्रिपुरे सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पाद गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुर सुन्दरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं।

38 . विभाष शक्तिपीठ
पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्राम में स्थित है विभाष शक्तिपीठ, जहां माता का वाम टखना गिरा था। यहां की शक्ति कापालिनी, भीमरूपा तथा भैरव सर्वानन्द हैं।

39. देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ  
हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ, जिसे श्रीदेवीकूप भद्रकाली पीठ के नाम से भी जाना जाता है।  यहां माता के  दहिने चरण (गुल्पफद्ध) गिरे थे। यहां की शक्ति सावित्री तथा भैरव स्थाणु हैं।

40. युगाद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम शक्तिपीठ 
पश्चिम बंगाल के बर्दमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित है युगाद्या शक्तिपीठ, यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था। यहां की शक्ति जुगाड़या और भैरव क्षीर खंडक है।

41. विराट का अम्बिका शक्तिपीठ 
राजस्थान के गुलाबी नगरी जयपुर के वैराटग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहाँ सती के ‘दायें पाँव की उँगलियाँ’ गिरी थीं।। यहां की शक्ति अंबिका तथा भैरव अमृत हैं।

42. कालीघाट शक्तिपीठ 
पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में कालीमन्दिर के नाम से प्रसिध यह शक्तिपीठ, जहां माता के दाएं पांव की अंगूठा छोड़ 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव नकुलेश हैं।

43. मानस शक्तिपीठ 
तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति की दाक्षायणी तथा भैरव अमर हैं।

44. लंका शक्तिपीठ 
श्रीलंका में स्थित है लंका शक्तिपीठ, जहां माता का नूपुर गिरा था। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। लेकिन, उस स्थान ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे।

45. गण्डकी शक्तिपीठ 
नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है गण्डकी शक्तिपीठ, जहां सती के दक्षिणगण्ड(कपोल) गिरा था। यहां शक्ति `गण्डकी´ तथा भैरव `चक्रपाणि´ हैं।

46. गुह्येश्वरी शक्तिपीठ 
नेपाल के काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुह्येश्वरी शक्तिपीठ है, जहां माता सती के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे। यहां की शक्ति `महामाया´ और भैरव `कपाल´ हैं।

47. हिंगलाज शक्तिपीठ 
पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में स्थित है माता हिंगलाज शक्तिपीठ, जहां माता का ब्रह्मरन्ध्र (सर का ऊपरी भाग) गिरा था। यहां की शक्ति कोट्टरी और भैरव भीमलोचन है।

48. सुगंध शक्तिपीठ 
बांग्लादेश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है उग्रतारा देवी का शक्तिपीठ, जहां माता का नासिका गिरा था। यहां की देवी सुनन्दा है तथा भैरव त्रयम्बक हैं।

49. करतोयाघाट शक्तिपीठ 
बंग्लादेश भवानीपुर के बेगड़ा में  करतोया नदी के तट पर स्थित है करतोयाघाट शक्तिपीठ, जहां माता का वाम तल्प गिरा था। यहां देवी अपर्णा रूप में तथा शिव वामन भैरव रूप में वास करते हैं।

50. चट्टल शक्तिपीठ 
बंग्लादेश के चटगांव  में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना बाहु यानी भुजा गिरा था। यहां की शक्ति भवानी  तथा भेरव चन्द्रशेखर हैं।

51. यशोर शक्तिपीठ 
बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है माता का  यशोरेश्वरी शक्तिपीठ, जहां माता का बायीं हथेली गिरा था। यहां शक्ति यशोरेश्वरी तथा भैरव चन्द्र हैं।


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महर्षि यमदग्नि का पावन आश्रम

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जमदग्नि ऋषि एक ऋषि थे, जो भृगुवंशी ऋचीक के पुत्र थे तथा जिनकी गणना सप्तऋषियों में होती है। पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी रेणुका थीं, व इनका आश्रम सरयू नदी के तट पर था। वैशाख शुक्ल तृतीया इनके पांचवें प्रसिद्ध पुत्र प्रदोषकाल में जन्मे थे जिन्हें परशुराम के नाम से जाना जाता है। 

सरयू नदी (अन्य नाम घाघरा, सरजू, शारदा) हिमालय से निकलकर उत्तरी भारत के गंगा मैदान में बहने वाली नदी है जो बलिया और छपरा के बीच में गंगा में मिल जाती है। अपने ऊपरी भाग में, जहाँ इसे काली नदी के नाम से जाना जाता है, यह काफ़ी दूरी तक भारत (उत्तराखण्ड राज्य) और नेपाल के बीच सीमा बनाती है। सरयू नदी की प्रमुख सहायक नदी राप्ती है जो इसमें उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के बरहज नामक स्थान पर मिलती है। इस क्षेत्र का प्रमुख नगर गोरखपुर इसी राप्ती नदी के तट पर स्थित है और राप्ती तंत्र की अन्य नदियाँ आमी, जाह्नवी इत्यादि हैं जिनका जल अंततः सरयू में जाता है। बहराइच, सीतापुर, गोंडा, फैजाबाद, अयोध्या, टान्डा, राजेसुल्तानपुर, दोहरीघाट, बलिया आदि शहर इस नदी के तट पर स्थित हैं। 

सरयू नदी को इसके ऊपरी हिस्से में काली नदी के नाम से जाना जाता है, जब यह उत्तराखंड में बहती है। मैदान में उतरने के पश्चात् इसमें करनाली या घाघरा नदी आकर मिलती है और इसका नाम सरयू हो जाता है। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्रों में इसे शारदा भी कहा जाता है।

ज्यादातर ब्रिटिश मानचित्रकार इसे पूरे मार्ग पर्यंत घाघरा या गोगरा के नाम से प्रदर्शित करते रहे हैं किन्तु परम्परा में और स्थानीय लोगों द्वारा इसे सरयू (या सरजू) कहा जाता है। इसके अन्य नाम देविका, रामप्रिया इत्यादि हैं। यह नदी बिहार के आरा और छपरा के पास गंगा में मिल जाती है।

धार्मिक मान्यतायें का उल्लेख-

यह एक वैदिक कालीन नदी है जिसका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इस संदर्भ में यह वितर्क किया जाता है कई ऋग्वेद में इंद्र द्वारा दो आर्यों के वध की कथा (RV.4.13.18) में जिस नदी के तट पर इस घटना के होने का वर्णन है वह यही नदी है। इसकी सहायक राप्ती नदी के भी अरिकावती नाम से उल्लेख का वर्णन मिलता है।

रामायण की कथा में सरयू अयोध्या से होकर बहती है जिसे दशरथ की राजधानी और राम की जन्भूमि माना जाता है। वाल्मीकि रामायण के कई प्रसंगों में इस नदी का उल्लेख आया है। उदाहरण के लिये, विश्वामित्र ऋषि के साथ शिक्षा के लिये जाते हुए श्रीराम द्वारा इसी नदी द्वारा अयोध्या से इसके गंगा के संगम तक नाव से यात्रा करते हुए जाने का वर्णन रामायण के बाल काण्ड में मिलता है। कालिदास के महाकाव्य रघुवंशम् में भी इस नदी का उल्लेख है। बाद के काल में रामचरित मानस में तुलसीदास ने इस नदी का गुणगान किया है।

बौद्ध ग्रंथों में इसे सरभ के नाम से पुकारा गया है। कनिंघम ने अपने एक मानचित्र पर इसे मेगस्थनीज द्वारा वर्णित सोलोमत्तिस नदी (Solomattis River) के रूप में चिन्हित किया है और ज्यादातर विद्वान टालेमी इसे द्वारा वर्णित सरोबेस (Sarobes) नदी के रूप में मानते हैं।

संगम-

संगम का अर्थ है मिलन, सम्मिलन। भूगोल में संगम उस जगह को कहते हैं जहाँ पानी की दो या दो से अधिक धाराएँ मिल रही होती हैं। जैसे इलाहाबाद में गंगा, यमुना (और, लोककथाओं के अनुसार, सरस्वती) के मिलन स्थल को त्रिवेणी संगम कहते हैं।

त्रिमोहिनी संगम कटिहार

भारत की सबसे बड़ी उत्तरायण गंगा बिहार के भागलपुर से होते हुए कटिहार ज़िले में प्रवेस करती है।भारत की सबसे बड़ी उत्तरायण गंगा का संगम त्रिमोहिनी संगम है।जिसमें गंगा,कोशी और एक कलबलिया कि छोटी धार आ कर सबसे उत्तरायण गंगा से संगम करती है।ये संगम बिहार के कटिहार ज़िले अंतर्गत कटरिया गांव के निकट स्थित है।

त्रिवेणी संगम इलाहाबाद

इलाहाबाद का संगम हिन्दुओं के लिए पवित्र है। प्रयाग (इलाहाबाद) में गंगा- यमुना और सरस्वती नदी का संगम है। धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक कुम्भ मेला प्रत्येक 12 वर्षों में यही लगता है। वर्ष 1948 में महात्मा गांधी समेत कई राष्ट्रीय नेताओं की राख का विसर्जन यही किया गया थी।

गंगा और यमुना के संगम का यह विवरण ऋग्वेद के नवीनतम खंडों में उल्लेख किया गया है जिसके अनुसार,"जो लोग उस जगह पर स्नान करते हैं जहां दो नदियां एक साथ बहती हैं,उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं"। पुराणों के अनुसार, एक तीसरी नदी भी है जिसे सरस्वती कहा जाता है।

ऋग्वेद में सन्दर्भ-

ऋग्वेद की चौथे पुस्तक (मंडल ?) को छोड़कर सरस्वती नदी का सभी (मंडलों) पुस्तकों (?) में कई बार उल्लेख किया गया है। केवल यही ऐसी नदी है जिसके लिए ऋग्वेद की ऋचा ६.६१,७.९५ और ७.९६ में पूरी तरह से समर्पित स्तवन दिये गये हैं।

प्रशस्ति और स्तुति:
वैदिक काल में सरस्वती की बड़ी महिमा थी और इसे 'परम पवित्र' नदी माना जाता था, क्यों कि इसके तट के पास रह कर तथा इसी नदी के पानी का सेवन करते हुए ऋषियों ने वेद रचे औ‍र वैदिक ज्ञान का विस्तार किया। इसी कारण सरस्वती को विद्या और ज्ञान की देवी के रूप में भी पूजा जाने लगा। ऋग्वेद के 'नदी सूक्त' में सरस्वती का इस प्रकार उल्लेख है कि 'इमं में गंगे यमुने सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परूष्ण्या असिक्न्या मरूद्वधे वितस्तयार्जीकीये श्रृणुह्या सुषोमया' सरस्वती, ऋग्वेद में केवल 'नदी देवी' के रूप में वर्णित है (इसकी वंदना तीन सम्पूर्ण तथा अनेक प्रकीर्ण मन्त्रों में की गई है), किंतु ब्राह्मण ग्रथों में इसे वाणी की देवी या वाच् के रूप में देखा गया, क्योंकि तब तक यह लुप्त हो चुकी थी परन्तु इसकी महिमा लुप्त नहीं हुई और उत्तर वैदिक काल में सरस्वती को मुख्यत:, वाणी के अतिरिक्त बुद्धि या विद्या की अधिष्ठात्री देवी भी माना गया। ब्रह्मा की पत्नी के रूप में इसकी वंदना के गीत गाये गए हैं **ऋग्वेद में सरस्वती को नदीतमा की उपाधि दी गयी है। उसकी एक शाखा २.४१.१६ में इसे "सर्वश्रेष्ठ माँ, सर्वश्रेष्ठ नदी, सर्वश्रेष्ठ देवी" कह कर सम्बोधित किया गया है। यही प्रशंसा ऋग्वेद के अन्य छंदों ६.६१,८.८१,७.९६ और १०.१७ में भी की गयी है।

ऋग्वेद के मंत्र ७.९.५२ तथा अन्य जैसे ८.२१.१८ में सरस्वती नदी को "दूध और घी" से परिपूर्ण बताया गया है। ऋग्वेद के श्लोक ३.३३.१ में इसे 'गाय की तरह पालन करने वाली' बताया गया है

ऋग्वेद के श्लोक ७.३६.६ में सरस्वती को सप्तसिंधु नदियों की जननी बताया गया है।

सरयू नदी के उत्तरी कछार में महर्षि जमदग्नि आश्रम जो आज भी उपेक्षित है -
गोण्डा उत्तर प्रदेश के देवीपाटन मंडल मुख्यालय व अयोध्या से 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित महर्षि यमदग्नि आश्रम उपेक्षित है। यहां के पवित्र कुंड में जलकुंभी उग आई हैं। संत निवास जर्जर अवस्था में पहुंच गया है। भाजपा सरकार में पर्यटन विभाग ने सुंदरीकरण के लिए सवा करोड़ रुपए की कार्य योजना बनवाई जो आज तक धूल चाट रही है। सरयू नदी के उत्तरी कछार के तरबगंज तहसील की ग्राम पंचायत जमथा में महर्षि जमदग्नि आश्रम स्थित है। यहां के बारे में कहा जाता है कि आश्रम ऋषि यमदग्नि का पावन ये स्थान। हरत पाप अज्ञान को शिव का बचन प्रमान। यमदग्नि कुंड के तट पर प्राचीन शिवालय स्थित है। इसका जीर्णोद्धार 1865 में हुआ है। इसके बगल महर्षि यमदग्नि का मंदिर है। पास में पुराना खपरैल संत निवास है। जो जर्जर अवस्था में पहुंच चुका है। 

बताया जाता है कि 1880 में ऋषिकेष के पितामह शिवपाल पाण्डेय जो अग्रेजी सरकार में शिमला में कार्यरत थे। उन्होंने एक रात स्वप्न में यमदग्नि कुंड की स्थिति देखी। जिसमें कमल पुष्प खिले थे। भौंरे इंतजार कर रहे थे। सोपान कुंड के ऊपरी तट पर शिवालय देखा जिसमें भगवान शंकर विराजमान हैं। इसके बाद एक समिति गठित हुई जिसे शिवालय के जीर्णोद्धार के लिए जिम्मेदारी दी गई। वर्ष 1904 से शिव पार्वती विवाह का आयोजन हो रहा है। 

यह स्थान 84 कोसी परिक्रमा में शामिल है। इसी क्षेत्र में ऋषि पराशर व अष्टावक्र मुनि का आश्रम है। भगवान शंकर के अनुज भग ऋुषि के वंशज यमदग्नि ऋषि का आश्रम आध्यात्म ज्ञान, ज्योतिष व शिक्षा विद्या का केन्द्र रहा है। आज भी यहां पर पढ़े लिखे लोगों की तादाद अधिक है। लगभग 60 अधिवक्ता यहां के रहने वाले हैं। यहां पर परिक्रमा करने वाले परशुराम जयंती के दिन आते हैं और भण्डारा कर पूजन स्नान करते हैं। 

ऐतिहासिक व पौराणिक स्थल का विकास ठप है। तत्कालीन भाजपा सरकार में यह स्थान पर्यटन के नक्शे में शामिल किया गया और क्षेत्रीय मंत्री रमापति शास्त्री के प्रयास से सवा करोड़ की कार्य योजना तैयार की गई। शासन से हरी झण्डी मिली लेकिन सरकार बदल गई। तभी से यह कार्य योजना धूल चाट रही है। यहां के बुजुर्ग राम अभिलाख पाण्डेय का कहना है कि यहां पर आदिकाल से संत समागम होता रहा है और भगवान परशुराम के ऐतिहासिक युद्ध का चित्रण किया गया है। 

राजा सहस्त्रबाहु के आतंक से भगवान परशुराम ने लोगों को छुटकारा दिलाया। वे राजतंत्र के खिलाफ पहले क्रांतिकारी थे। यहां के लोगों में दर्द है कि यह ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा का शिकार है। पवित्र कुंड जहां लोग स्नान करते थे वहां आज जलकुंभी उग आई है। आसपास में अतिक्रमण हो रहा है। नया संत निवास निर्माणाधीन पड़ा है। सवा हेक्टयर में फैला यह आश्रम अब उपेक्षा का शिकार है। देखरेख न होने से आश्रम के कई हिस्सों पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है। 



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