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पत्थरचूर की उन्नत खेती कैसे करें ?

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पत्थरचूर या पाषाणभेद (वानस्पतिक नाम : पेलेट्रांथस बार्बेटस तथा कोलियस फोरस्कोहली) एक औषधीय पादप है। कोलियस फोर्सकोली जिसे पाषाणभेद अथवा पत्थरचूर भी कहा जाता है, उन कुछ औषधीय पौधों में से है, वैज्ञानिक आधारों पर जिनकी औषधीय उपयोगिता हाल ही में स्थापित हुई है। भारतवर्ष के समस्त ऊष्ण कतिबन्धीय एवं उप-ऊष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों के साथ-साथ पाकिस्तान, श्रीलंका, पूर्वी अफ्रीका, ब्राजील, मिश्र, ईथोपिया तथा अरब देशों में पाए जाने वाले इस औषधीय पौधे को भविष्य के एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधे के रूप में देखा जा रहा है। वर्तमान में भारतवर्ष के विभिन्न भागों जैसे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा राजस्थान में इसकी विधिवत खेती भी प्रारंभ हो चुकी है जो काफी सफल रही है।

पत्थरचूर का पौधा लगभग दो फीट ऊँचा एक बहुवर्षीय पौधा होता है । इसके नीचे गाजर के जैसी (अपेक्षाकृत छोटी) जड़े विकसित होती हैं तथा जड़ों से अलग-अलग प्रकार की गंध होती है तथा जड़ों में से आने वाली गंध बहुधा अदरक की गंध से मिलती जुलती होती है । इसका काड प्रायः गोल तथा चिकना होता है तथा इसकी नोड्स पर हल्के बाल जैसे दिखाई देते है । 

पत्थरचूर  को हिन्दी में पत्ता अजवाइन कहा जाता है तथा मराठी एवं बंगाली में पत्थरचुर । यदि किसान इसकी खेती वैज्ञानिक तकनीक से करें, तो इसकी खेती से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है । इस लेख में पत्थरचूर की खेती का वैज्ञानिक तकनीक से कैसे करें का विस्तृत उल्लेख किया गया है ।

विभिन्न भाषाओं में पाषाणभेद के नाम-

  • हिन्दी : पाषाण भेद, अथवा पत्थरचूर
  • संस्कृत : मयनी, माकन्दी, गन्धमूलिका
  • कन्नड़ : मक्काड़ी बेरू, मक्काण्डी बेरू अथवा मंगना बेरू
  • गुजराती : गरमालू
  • मराठी : मैमनुल
  • वानस्पतिक नाम : कोलियस फोर्सकोली अथवा कोलियस बार्बेट्स बैन्थ
  • वानस्पतिक कुल : लैबिएटी/लैमिएसी
  • गुण: यह औषधि रूप मे बहुत ही गुणकारी है किडनी के सारे रोग इसे दुर होते हैं। यह एक सर्वश्रेष्ठ रक्त अवरोधक भी है। यह औषधि सदियों से भारतवर्ष में ऋषि मुनियों द्वारा प्रयोग मे लिया जाता रहा है ।

औषधीय उपयोग- 

औषधीय उपयोगिता की दृष्टि से पत्थरचूर एक अत्याधिक महत्वपूर्ण पादप के रूप में उभर रहा है । औषधीय उपयोग में मुख्यता इसकी जड़ें प्रयुक्त होती हैं जिनसे “फोर्सकोलिन” नामक तत्व निकाला जाता है । जिन प्रमुख औषधीय उपयोगों में इसें प्रयुक्त किया जा रहा है, वे निम्नानुसार हैं, जैसे- हृदय संबंधी रोगों के उपचार हेतु, वजन कम करने हेतु या मोटापा दूर करने हेतु और पाचन शक्ति बढ़ाने हेतु आदि प्रमुख है ।

उपयुक्त जलवायु

पत्थरचूर उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों की फसल है, तथा उन क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उपजाई जा सकती है, जो गर्म तथा आर्द्र हो इस प्रकार यह दक्षिणी भारत के विभिन्न राज्यों जैसे कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, केरल एवं तमिलनाडु के साथ-साथ मध्यभारत के विभिन्न राज्यों जैसे मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश तथा बिहार आदि राज्यों में सफलतापूर्वक उपजाई जा सकती है । सिंचाई की सुविधा वाले क्षेत्रों के साथ-साथ यह उन क्षेत्रों में भी उपजाई जा सकती है । जहां जून से सितम्बर माह के बीच पर्याप्त वर्षा होती हो तथा जहां वर्ष भर 100 से 160 सेंटीमीटर तक सुनिश्चित वर्षा होती है ।

भूमि का चुनाव

पत्थरचूर की खेती उन मृदाओं में सफलतापूर्वक की जा सकती है, जो नर्म तथा पोली हो । 5.5 से 7 पी एच मान वाली ऐसी भूमी जिनमें जल निकास की पर्याप्त व्यवस्था हो, इसकी खेती के लिए उपयुक्त पाई जाती है ।परीक्षणों में देखा गया है कि यूं तो कोलियस लगभग सभी प्रकार की मिट्टियों में सफलतापूर्वक उपजाया जा सकता है । परन्तु रेतीली दोमत, हल्की कपासिया तथा लाल मृदा जिनमें जीवाश्म की पर्याप्त मात्रा विद्यमान हो, इसकी खेती के लिए ज्यादा उपयुक्त पाई गई है ।

उन्नतशील प्रजातियां

कर्नाटक राज्य में पाई जाने वाली पत्थरचूर से चयनित आधार पर एक उन्नतशील प्रजाति जारी की गई है जिसे “के- 8 का नाम दिया गया है । यह प्रजाति अन्य प्रजातियों की तुलना में ज्यादा उत्पादन भी देती है तथा फोर्सकोलिन भी अधिक मात्रा में पाया जाता है ।

पत्थरचूर का प्रवर्धन
पत्थरचूर का प्रवर्घन बीजों से भी किया जा सकता है तथा कलमों से भी वैसे व्यवसायिक कृषिकरण की दृष्टि से इसका प्रवर्धन कलमों से किया जाना ज्यादा उपयुक्त होता है । इसके लिए कलमों को पहले नर्सरी बेड्स में भी तैयार किया जा सकता है तथा सीधे खेत में भी लगाया जा सकता है । नर्सरी में इसकी कलमों को तैयार करने की प्रक्रिया निम्नानुसार होती है, जैसे-

नर्सरी बनाने की प्रक्रिया- पत्थरचूर की नर्सरी बनाने की प्रक्रिया में सर्वप्रथम मई माह में इसके पुराने पौधों से इसकी 4 से 6 इंट लम्बी कलमें काट ली जाती है । ये कलमें ऐसी होनी चाहिए कि प्रत्येक में कम से कम 6 से 7 पत्ते तथा कम से कम 2 या 3 आंखे (नोड्स) अवश्य हों । यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कलमों को या तो नर्सरी बेड्स में तैयार किया जाता है अथवा पौलीथीन की थैलियों में रोपित करके भी तैयार किया जा सकता है । नर्सरी में यदि इन्हे लगाना हो तो पौध से पौध के बीच की दूरी कम से कम (3 से 3 इंच) रखी जानी चाहिए ।

पौलीथीन थेलियों में कलमें रोपित करने से पूर्व इन्हें कम्पोस्ट खाद, मिट्टी तथा रेत (प्रत्येक 33 प्रतिशत) डाल कर भरा जाता है । कलमों का जल्दी तथा सुनिश्चित उगाव हो इसके लिए किसी रूटिंग हार्मोन का उपयोग भी किया जा सकता है अथवा कम से कम गौमुत्र में तो इन्हें कुछ देर तक डुबोकर रखा जाना ही चाहिए । इसी बीच 2 से 3 दिनों मे नर्सरी में लगाई गई इन कलमों में पानी देते रहना चाहिए । नर्सरी में लगभग एक माह तक रखने पर इनमें पर्याप्त जड़े विकसित हो जाती है तथा तदुपरान्त इन्हें मुख्य खेत में स्थानान्तरित किया जा सकता है ।
खेत की तैयारी
जिस मुख्य खेत में पौधो का रोपण करना होता है, उसकी अच्छी प्रकार तैयारी करनी आवश्यक होती है । इसके लिए सर्वप्रथम मई से जून में खेत की गहरी जुताई कर दी जाती है । तदुपरान्त खेत में प्रति एकड़ 5 टन अच्छी प्रकार पकी हुई गोबर अथवा कम्पोस्ट अथवा 2.5 टन वर्मीकम्पोस्ट के साथ-साथ 120 किलोग्राम प्रॉम जैविक खाद खेत में मिला दी जानी चाहिए ।

मुख्य खेत में पौधों की रोपाई मानसून प्रारंभ होते ही नर्सरी में तैयार की गई पौध को खुरपी की सहायता से मुख्य खेत में प्रतिरोपित कर दिया जाता है । प्रतिरोपित करते समय पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर तथा कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर रखी जाती है । इस प्रकार एक एकड़ में लगभग 34000 पौधे रोपित किए जाते है ।

सिंचाई व्यवस्था
मानसून की फसल के रूप में लगाए जाने के कारण यदि नियमित अंतराल पर वारिश हो रही हो तो फसल को अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती परन्तु यदि नियमित वर्षा न हो रही हो तो सिंचाई करने की आवश्यकता होती है । इस दृष्टि से प्रथम सिंचाई प्रतिरोपण के तुरंत बाद कर दी जानी चाहिए तथा तदुपरान्त प्रारंभ में तीन दिन में एक बार तथा बाद में सप्ताह में एक बार सिंचाई की जानी चाहिए ।

निराई-गुड़ाई
नियमित सिंचाई देने के कारण तथा मानसून की फसल होने के कारण खेत में खरपतवार आना स्वाभाविक है ।इसके लिए हाथ से निंदाई-गुड़ाई की जाना बांछित होगी । हाथ से निंदाई-गुड़ाई करने से एक तरफ जहां खरपतवार साफ होंगे वही भूमि भी नर्म होती रहेगी । लाईनों के बीचों-बीच कुल्पा अथवा डोरा चलाकर भी खरपतवार से निजात पाई जा सकती है ।

खाद तथा भू-टॉनिक
यूं तो खेत तैयार करते समय 5 टन प्रति एकड़ की दर से कम्पोस्ट खाद खेत में मिलाने की संतुति की जाती है ।परन्तु यदि जैविक खाद का उपयोग किया जाना संभव न हो तो प्रति एकड़ 16 किलोग्राम नाइट्रोजन (8 किलोग्राम प्रतिरोपण के समय तथा शेष प्रतिरोपण के एक माह बाद) 24 किलोग्राम स्फर तथा 20 किलोग्राम पोटाश प्रति एकड़ डाले जाने की अनुशंसा की जाती है ।

कीट एवं रोग
पत्ती पलेटने वाले केटरपिलर्स, मीली बग तथा जड़ो को नुकसान पहुंचाने वाले नीमाटोड्स वे प्रमुख कीट हैं जो पत्थरचूर की फसल को नुकसान पहुचा सकते है । इनके नियंत्रण हेतु मिथाईल पैराथियान का 0.1 प्रतिशत घोल बनाकर पौधों पर छिड़काव किया जा सकता है अथवा पौधों की जड़ों की ट्रेंचिग की जा सकती है ।

इसी प्रकार कार्बोफ्युरॉन 8 किलोग्राम ग्रेनुअल्स का प्रति एकड़ की दर से उपयोग करके सूत्रकृमियों को नियन्त्रित किया जा सकता है । कभी-कभी फसल पर बैक्टीरियल बिल्ट का प्रकोप भी हो सकता है, जिसके दिखते ही केप्टान दवा के 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करके इस बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है ।यदि यह बीमारी नियंत्रित न हो तो एक सप्ताह के बाद पुनः इस दवा का छिड़काव किया जा सकता है । 

फूलों की कटाई
प्रतिरोपण के दो से ढाई माह के उपरान्त पत्थरचूर के पौधों पर हल्के नीले जामुनी रंग के फूल आने लगते है । इन फूलों को नाखुनों की सहायता से तोड़ या काट दिया जाना चाहिए अन्यथा जड़ों का विकास प्रभावित हो सकता है ।

फसल की कटाई
रोपण के लगभग 5 से 6 माह के अन्दर पत्थरचूर की फसल कटाई या उखाड़ने के लिए तैयार हो जाती है ।यद्यपि तब तक इसके पते हरे ही रहते है, परन्तु यह देखते रहना चाहिए कि जब जड़े अच्छी प्रकार विकसित हो जाऐं (यह स्थिति रोपण के लगभग 5 से 6 माह के बाद आती है) तो पौधो को उखाड़ लिया जाना चाहिए । उखाड़ लिया जाना चाहिए ।

उखाड़ने से पूर्व खेत की हल्की सिंचाई कर दी जानी चाहिए ताकि जमीन गीली हो जाए तथा जड़ें आसानी से उखाड़ी जा सकें । पौधे उखाड़ लेने के उपरान्त इनकी जड़ों को काट कर अलग कर लिया जाता है तथा इनके साथ जो मिट्टी अथवा रेत आदि लगा हो उसे झाड़ करके इन्हें साफ कर लिया जाता है ।

साफ कर लेने के उपरान्त इन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है अथवा बीच में चीरा लगा दिया जाता है ।इस प्रकार टुकड़ा में काट लिये जाने के उपरान्त इन्हें धुप में सुखा लिया जाता है| अच्छी प्रकार से सूख जाने पर इन्हें बोरियों में पैक करके बिक्री हेतु प्रस्तुत कर दिया जाता है| सूखने पर ये ट्युबर्स गीले ट्यूबर्स की तुलना में लगभग 12 प्रतिशित रह जाते है ।

उपज की प्राप्ति
एक एकड़ की खेती से औसतन 8 क्विंटल सूखे ट्यूबर्स की प्राप्ति होती है| जिनकी बिक्री दर यदि 3500 से 4000 रूपये प्रति क्विंटल मानी जाए तो इस फसल से लगभग 28000 से 32000 रूपये की प्राप्तिया होती है । इनके साथ-साथ प्लांटिग मेटेरियल की बिक्री से भी 6000 से 8000 रूपये की अतिरिक्त प्राप्तियां होगी । जबकि इसकी विभिन्न कृषि क्रियाओं पर लगभग 9500 से 11800 रूपये का खर्च आता है और केवल पांच से छ: माह की फसल है ।

निःसंदेह पत्थरचूर एक बहुउपयोगी औषधीय फसल है । न केवल इसके औषधीय उपयोग बहुमूल्य हैं बल्कि अपेक्षाकृत नई फसल होने के कारण इसका बाजार भी काफी समय तक बने रहने की संभावनाएं है । इस प्रकार से खासकर दक्षिणी भारत तथा मध्यभारत के किसानों के लिए व्यवसायिक दृष्टि से यह एक काफी लाभकारी सिद्ध हो सकती है ।

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गुग्गल की उन्नत खेती कैसे करें ?

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गुग्गल या गुगल का पौधा भारत में राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, आसाम, सिलहट, बंगाल, मैसूर आदि स्थानों पर जंगलो में प्राकतिक रूप में पाया जाता ह. गुग्गल का पौधा जंगल में झाडियों के रूप में पाया जाता है.इसकी शाखाएं छोटी व टेढ़ी-मेढी होती है. ये शाखाएं कांटेदार व विभिन्न रंगो वाली होती है. इसकी शाखाओं से हमेशा भूरे रंग का पतला छिलका उतरता दिखाई देता है.

सर्दियों में इसके सभी पत्ते झड जाते है. इसके फल मांसल, लबें गोल, छोटे बेर के समान होते हैं, इसके तने व शाखाओं से जो गोंद निकलता है, वही गुग्गुल (गुगल) कहलाता है. असली गुग्गल का रंग नवीन हालत में पीला और पुराना पड़ने पर काला हो जाता है. पानी में गलने पर हरे रंग की झाई सी देता है. असली गुग्गल अग्नि पर रखने पर एकदम से नहीं जलता हैं.

गुगल एक छोटा पेड है जिसके पत्‍ते छोटे और एकान्‍तर सरल होते हैं. यह सिर्फ वर्षा ऋतु में ही वृद्धि करता है तथा इसी समय इस पर पत्‍ते दिखाई देते हैं. शेष समय यानि सर्दी तथा गर्मी के मौसम में इसकी वृद्धि अवरूद्ध हो जाती है तथा पर्णहीन हो जाता है. सामान्‍यत: गुग्‍गल का पेड 3-4 मीटर ऊंचा होता है. इसके तने से सफेद रंग का दूध निकलता है जो इसका का उपयोगी भाग है. प्राकृतिक रूप से गुग्‍गल भारत के कर्नाटक,राजस्‍थान,गुजरात तथा मघ्‍यप्रदेश राज्‍यों में उगता है. भारत में गुग्‍गल विलुप्‍तावस्‍था के कगार पर आ गया है, अत: बडे क्षेत्रों मे इसकी खेती करने की जरूरत है. हमारे देश में गुग्‍गल की मांग अधिक तथा उत्‍पादन कम होने के कारण अफगानिस्‍तान व पाकिस्‍तान से इसका आयात किया जाता है. 

औषधीय उपयोग- 

गुग्गुल एक दिव्य औषधि है. यह कृमिनाशक, गण्डमाला हार, कफ निस्सारक, मूत्रल, रसायन, वल्य, शीत प्रशमन, वर्ण्य, नाडीबल्य, वग्रशोधक व जन्तुघ्न होता है. इसका उपयोग वातरक्त, आमवत, वग्रशोध, नाडीवग्र, भगन्दर, कुवठ, प्रमेह, मूत्रकृच्छ, श्लीपद, गण्डमाला, उपदेश, नेत्ररोग, शिरारोग, हृदय रोग, अम्लपित्त, स्त्रीरोग, पाण्डुरोग, उदररोग आदि में प्रभावी रूप से किया जा सकता है.

गुग्गल के धूम को अथर्ववेद में यक्ष्मा के कीटाणुओं को नष्ट करने वाला कहा गया है. नाडी संस्थान पर गुग्गुल का प्रभाव लाभकारी रहता है. गुग्गल त्रिदोष हर, शोथहन, कृमिघ्न, व वेदना स्थापन होने के कारण केन्सर में भी लाभप्रद है. यह वसा व पित्त के चपापन्वय के कारण उत्पन्न होने वाला व हृदय रोगों को दूर करने में सहायक है. इसें औषधि प्रयोग में सदैव शुद्ध करके काम में लेना चाहिए.

उपयुक्त जलवायु

गुग्गल एक उष्ण कटिबंधीय पौधा है. गर्म तथा शुष्क जलवायु इसके लिए उत्तम पायी गयी है. सर्दियों के मौसम में जब तापमान कम हो जाता है, तो पौधा सुषुप्तावस्था में पहुंच जाता है और वानस्पतिक वृद्धि कम हो जाती है. प्राकृतिक रूप में यह पहाड़ी एवं ढालू भूमि में उगता है. उन क्षेत्रों में जहां वार्षिक वर्षा 10 से 90 सेंटीमीटर तक होती है तथा पानी का जमाव नहीं होता है, इसकी बढ़वार अच्छी पायी गयी है. इसमें 40 से 45 डिग्री सेल्सियस की गर्मी से 3 डिग्री सेल्सियस तक की ठंड सहन करने की क्षमता होती है.

भूमि का चयन

यह समस्याग्रस्त भूमि जैसे लवणीय एवं सूखी रहने वाली भूमि में सुगमता से उगाया जा सकता है. दोमट व बलूई दोमट भूमि जिसका पी एच मान- 7.5 से 9.0 के बीच हो, इसकी खेती के लिए उपयुक्त पायी गयी है. इसे समुचित जल निकास वाली काली मिट्टियों में भी सुगमतापूर्वक उगाया जा सकता है. भूमि में पानी का निकास काफी अच्छा होना चाहिए. वैसे पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी खेती के लिए अधिक धूप वाली ढलान भूमि का चुना करना चाहिए. क्षारीय जल, जिसका पी एच मान- 8.5 तक होता है, के प्रयोग से भी पौधे की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता.

प्रजातियां

इसमे प्रजातियों के विकास पर ज्यादा कार्य नहीं हुआ है, लेकिन हाल ही में “मरूसुधा’ नामक किस्म को केन्द्रीय औषधीय एवं सगंधीय संस्थान, लखनउ ने विकसित किया है, जो गुग्गल गोंद की अधिक पैदावार देती है.

प्रवर्धक तकनीक

गुग्गल का प्रवर्धन बीजों द्वारा अथवा कलम लगाकर किया जा सकता है, जैसे-

बीजों द्वारा- प्रकति में गुग्गल का मुख्य प्रवर्धन बीजों के द्वारा होता है. शुष्क क्षेत्रों में सर्दियो को छोडकर बीज लगातार बनते रहते है. अप्रैल से मई में प्राप्त होने वाले बीजों की तुलना में जुलाई से सितंबर में प्राप्त होने वाले बीजो की अंकुरण क्षमता ज्यादा होती है. मानसून में इसके बीजों के अंकुरण के लिए उपयुक्त वातावरण रहता है. परिपक्व बीजों को पहले मिट्टी के साथ रगडकर धोते है.

कलम द्वारा- गुग्गुल के पौधे कलम द्वारा सफलतापूर्वक तैयार किये जा सकते है. इसकी 25 से 30 सेंटीमीटर लम्बी एवं 3 से 4 सेंटीमीटर व्यास वाली कलमों को 15 जनवरी से 15 फरवरी तक रेत वाली क्यारियों में 15 सेंटीमीटर की गहराई पर रोपना चाहिए. पॉलीथीन की थैलियों का उपयोग भी किया जा सकता है.

कलम की मोटाई तर्जनी अंगुली से पतली तथा हाथ के अंगुठे से मोटी नहीं होनी चाहिए . सुदृढ जड विकसित होने के लिए पादप हार्मोन इन्डौल ब्यूटायरिक अम्ल (आई बी ए) के 250 पी पी एम के घोल से उपचारित करना चाहिए. इस प्रकार पौधों को लगभग 6 माह तक नर्सरी में रखने के बाद बरसात के मौसम में खेत में रोपित कर देना चाहिए.

खेत में रोपण
जुलाई से सितम्बर तक का समय इन पौधों (कलमों) को खेत में लगाने का होता है.  इस कार्य हेतु सर्वप्रथम 60 x 60 x 60 सेंटीमीटर के गड्ढे पौधे लगाने के लिए खोदे जाते है. जिस थैली में पौध लगाई गई हो, उस पॉलीथीन की थैली को चाकू से काटकर अलग कर ले व उस पौधे को मिट्टी की पिण्ड सहित तैयार किये गये गडढे में रोप दें.

पौधों को खेत में लगाते समय कतार से कतार व पौधे से पौधे के मध्य 2 मीटर की दुरी रखी जाती है. इस प्रकार प्रति हैक्टेयर 2500 पौधे लगाये जाते है. पौधा लगाने के बाद उसके चारों तरफ की मिट्टी को अच्छी तरह दबा देना चाहिए एवं हल्की सिंचाई कर देंनी चाहिए.

सिंचाई प्रबंधन
गुग्गल के पौधे को एक बार खेत में अच्छी प्रकार से स्थापित होने के बाद बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है. वर्षा नही होने पर पांच वर्ष की उम्र तक इसके पौधों को शरद ऋतु में एक सिंचाई की आवश्यकता होती है..आठ वर्ष की उम्र के बाद जब पौधे पूर्ण विकसित हो जाये तब गर्मियों में 2 से 3 सिंचाई करनी चाहिए.

निराई-गुडाई
वर्षा के मौसम में, खेत में खरपतवार काफी मात्रा में हो जाते है. खरपतवारों की अधिक मात्रा होने पर पौधों को पोषक तत्वों एवं पानी की उपलब्धता कम हो जाती है, इसलिए सितबंर एवं दिसबंर में निराई-गुडाई करना उपयोगी होता है.

गुग्गल निकालने की विधि
गुग्गल का पौधा लगभग 8 वर्ष में पूर्ण परिपक्व होकर गोंद सग्रंह योग्य हो जाता है. इन परिपक्व पौधों से दिसबंर से फरवरी में गोंद सग्रंह किया जाता है. जब पौधे का व्यास 7.5 सेंटीमीटर का हो जायें, तब गोंद प्राप्त करने हेतु मुख्य तने एवं शाखाओं पर 1.5 सेंटीमीटर गहरा वृत्ताकार चीरा 30 सेंटीमीटर एवं 60 डिग्री कोण पर सामान अन्तराल पर लगाया जाता है. चीरा वाले स्थानों से सफेद पीला सुगंधित गोंद स्त्रावित होता है जो कि धीरे-धीरे ठोस होने लगता है.

जिसे चाकू की सहायता से एकत्रित कर लिया जाता है.10 से 15 दिन के अंतराल पर यह प्रक्रिया दोहराते रहते है. केम्बियम परत पर चीरे नजदीक एवं गहरे लगााने पर गोंद की उपज अधिक प्राप्त की जा सकती है. गोद सग्रंह में रसायनों का उपयोग भी लाभकारी सिद्ध हुआ है. तीन साल में एक बार इथेफान (2 क्लोरो-इथॉयल फास्फोरिक एसिड) 400 मिलीलीटर प्रति पौधा छिडकनें से गोंद का स्त्राव काफी बढ जाता है. इस विधि से प्रत्येक पौधे से 500 ग्राम से 1500 ग्राम तक गुग्गुल प्राप्त हो जाता है.

गुग्गल निकालने की एक नई विधि सेन्ट्रल एरिड जोन रिसर्च इन्स्टीट्यूट (काजरी), जोधपुर द्वारा ईजाद की गई है. इस विधि के अनुसार गुग्गुल के पौधे 2 वर्ष के हो जाने पर इनकें मुख्य तने तथा शाखाओं को छोंडकर हाथ के अंगुठे से कम पतली वाली शाखाएं कटर के द्वारा काट ली जाती है इसे छंटाई कहते है.

इस प्रकार छंटाई की शाखाओं को इकट्ठा करके कुट्टी करने वाली मशीन से आधा इंच से एक इंच तक काट लेते है, जिसे कुट्टी या कुतर करना कहते है. तदुपरान्त इसे धूप में सुखाते है| छंटाई करने का सर्वाधिक उपयुक्त समय 14 जनवरी से 15 फरवरी के मध्य का है, इस समय पौधे में रेजिन की मात्रा सर्वाधिक होती है.

श्रेणीकरण
अच्छी श्रेणी का गुग्गुल पौधों की मोटी शाखाओं से प्राप्त होता है. ये गोंद के ढेले अर्द्धपारदर्शक होते है. दूसरी श्रेणी के गुग्गुल में छाल, मिट्टी मिली होती है एवं हल्के रंग का होता है. तीसरी श्रेणी का गुग्गुल प्रायः भूमि की सतह से इकट्ठा किया जाता है. जिसमें मिट्टी, पत्थर के टुकडे एवं अन्य पदार्थ मिले होते है. हल्की श्रेणी के गुगल के ढेर पर अरण्डी के तेल का छिडकाव करके सुधारा जा सकता है, जिससे इसमें चमक आ जाती है.

पौध सरंक्षण
दीमक- गर्मियों के मौसम में प्रायः गुग्गल के पौधों पर दीमक का प्रकोप होता है. दीमक पौधों को भारी क्षति पंहुचाती है. संक्रमित पौधों की पत्तियां पीली पड़ने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप बाद में पौधा मर भी सकता है. दीमक के नियंत्रण के लिए निम्नलिखित उपाय भी सुझाये गये है.

जैसे- पौधारोपण करते समय प्रत्येक गड्ढे में दो किलोग्राम नीम की खली का चूर्ण डालें अथवा दो किलो नीम के पत्ते, दो किलो धतूरे के पत्ते तथा दो किलो आक के पत्ते बारीक पीसकर 100 लीटर पानी में घोलकर तैयार कर लें.यह तैयार किया गया घोल प्रत्येक पौधे में दो-दो लीटर डालें. हर 15 दिन में यह प्रकिया दो वर्ष तक दोहरानें से पौधों में दीमक नहीं लगती है.

जड़ गलन- बरसात के मौसम में गुग्गल में जड गलन की बीमारी हो जाती है जिसके कारण पौधों की पत्तियां पीली हो जाती है एवं पौधा सूख जाता है. इस बीमारी की रोकथाम के लिए पौधारोपण के समय कलम के नीचे वाले सिरे का टेफसॉन नामक कवकनाशी से उपचारित करना चाहिए.

अन्य- इसके अलावा बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट एवं सफेद मक्खी भी गुग्गल के पौधों को नुकसान पॅहुचाते है. इन सब के नियंत्रण के लिए अनुमोदित कीटनाशी का उपयोग करें.

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जैतून की उन्नत खेती कैसे करें ?

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ज़ैतून अँग्रेजी नाम ओलिव (olive), वानस्पतिक नाम 'ओलेआ एउरोपैआ', (Olea europaea); प्रजाति ओलिया, जाति थूरोपिया; कुल ओलियेसी; एक वृक्ष है, जिसका उत्पत्तिस्थान पश्चिम एशिया है। यह प्रसिद्ध है कि यूनान के ऐटिका (एथेंस) प्रांत की पहाड़ियों में, चूनेदार चट्टानों द्वारा बनी हुई मिट्टी में, ज़ैतून के वृक्ष सर्वप्रथम पैदा किए गए। ये अब भूमध्य सागर के आस-पास के देशों, जैसे स्पेन, पुर्तगाल, ट्यूनीशिया और टर्की आदि में भली भाँति पैदा किए जाते हैं। यूनान के पर्वतीय प्रांतों में ज़ैतून की खेती व्यापारिक अभिप्राय से की जाती है। अफ्रीका के केप उपनिवेश, चीन तथा न्यूज़ीलैंड में भी इसकी खेती सफलता पूर्वक की जाती है। अमरीका के कैलिफोर्निया प्रांत में ज़ैतून के बाग लगाए गए हैं।

यूरोप में ज़ैतून के दो प्रकार के वृक्ष पाए जाते हैं। एक जंगली काँटेदार और दूसरा बिना काँटे का होता है। जंगली वृक्ष छोटा या झाड़ी की भाँति होता है और उसकी डालियों पर काँटे होते हैं। पत्तियाँ विपरीत, दीर्घवत्‌ और नुकीली होती हैं। इसके पुष्प सफेद होते हैं तथा प्रत्येक पुष्प में चार विदरित बाह्यदलपुंज (calyx) तथा दलपुंज (corolla), दो पुंकेसर तथा द्विशाख वर्तिंकाग्र (stigma) होते हैं। बागों में लगाए गए वृक्ष ऊँचे, सुगठित और बिना काँटे के होते हैं। इनकी कई किस्में हैं। इस वृक्ष के फल से व्यापारिक महत्व का तेल प्राप्त किया जाता है। इसके फल में सूखे पदार्थ के आधार पर 50 से 60 प्रति शत तक तेल रहता है। इसे भली भाँति कुचल कर, दबाकर या दाबक से तेल निकालते हैं। फल का अचार बनाया जाता है। ये तिक्त होते हैं। नमक के पानी मे फल का रखने स तिक्तता दूर हो जाती है।

ज़ैतून के नए पौधे कलम द्वारा प्राप्त किए जाते हैं। प्रौढ़ डालियों के 6 इंच के टुकड़े काट कर अक्टूबर या रवरी में कर्तन (Cutting) लगाते हैं। जब जड़ें निकल आती हैं तब उन्हें रोपण क्यारी में लगा देते हैं। दो वर्ष बाद स्थायी स्थान में 30-40 फुट की दूरी पर लगा कर बाग तैयार करते हैं। 5 वर्ष बाद वृक्ष फल देने लगते हैं। सर्वाधिक फल 15-20 वर्ष की अवस्था होने पर ही प्राप्त होते हैं। प्रति वर्ष वृक्षों की डालियों की कटाई-छँटाई की जाती है। नाइट्रोजन की खाद इसके लिय सबसे उपयोगी है।

दुनिया भर में जैतून तेल की बढ़ती मांग से इसकी खेती करना फायदे मंद साबित हो सकता है। प्रीमियर खाद्य तेलों कि श्रेणी में इसके तेल का स्थान सबसे ऊँचा होता है। जैतून तेल का उपयोग खाने के साथ ,सौन्दर्य प्रसाधन व दवाइयों में हो रहा है, वहीँ जैतून के फल से दुनिया भर के सभी नामी होटल में कई तरह के व्यंजन बनाए जाते है। अलग-अलग वातावरण में भी जैतून कि खेती के लिए किए गए प्रयोग सफल रहे है, यह देखते हुए जैतून कि खेती करके किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते है। 

हमारे देश के राजस्थान राज्य में राजस्थान में जैतून कि खेती को बढ़ावा देने के काम में जुटे विशेषज्ञों क कहना है कि विदेशों और देश के बड़े होटलों में जैतून के तेल को खाद तेल के रूप में भोजन बनाने में इस्तेमाल किया जाता है, इसलिए जैतून कि तेल कि निर्यात मांग के अलावा घरेलु मांग भी बढ़ रही है, वहीँ जैतून के तेल का उपयोग मसाज और कई कामो में होता है। राजस्थान में जैतून कि खेती के लिए सरकार के स्तर पर भी प्रोजेक्ट चलाए गए है। इनकी सफलता को देखते हुए अब किसानों को इसकी खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है| राजस्थान के अलावा दुसरे प्रांतों में भी जैतून कि खेती कि काफी संभावनाएं है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जैतून के तेल में एओलिक एसिड, एंटी आक्सीडेंट, विटामिन व फिनोल प्रचुर मात्रा होता है, इसके कारण इसका उपयोग पेट व कैंसर सम्बन्धी रोगों के इलाज में काम आने वाली औषधियां व सौन्दर्य प्रसाधनों में किया जाता है।जैतून का तेल कोलेस्ट्रोल पर भी नियंत्रण करता है इसलिए दिल सम्बन्धी बीमारियों के इलाज में भी इसको रामबाण माना जाता है। इस लेख के माध्यम से जैतून की खेती कैसे करें, इसके लिए उपयुक्त जलवायु, भूमि, किस्में, देखभाल, पैदावार आदि के बारें में किसान भाइयों को जानकारी देंगे। जिससे वे इस खेती से उत्तम पैदावार प्राप्त कर सकें।

उपयुक्त जलवायु

जैतून एक सदाबहार पौधा है, परन्तु इसके सफल फल उत्पादन के लिए इसे भी अन्य पतझड़ वाले पौधों की तरह 400 से 2000 शीत घण्टों की जरूरत होती है। इसका पौधा कम से कम 12.2 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान सहन कर सकता है। समुद्र तल से 650 मीटर से 2300 मीटर तक की ऊँचाई तक इसे उगाया जा सकता है।

जैतून की खेती को 15 से 20 डिग्री सेंटीग्रेट औसत तापमान की आवश्यकता होती है, इससे नीचे तापमान गिरने पर पौधे को घाव हो सकते हैं। इसे साल भर में औसतन 100 से 120 सैंटीमीटर वर्षा की जरूरत होती है। जहां आवश्यकतानुसार औसतन वर्षा न हो वहां फल विकास के समय विशेषकर खाने के उपयोग में लाई जाने वाली किस्मों में सिंचाई अवश्य करें। जैतून के लिए सर्दियों से पहले तथा बसन्त ऋतु से पहले पड़ने वाला पाला हानिकारक होता है।

भूमि का चयन

जैतून की खेती के लिए मिट्टी में अच्छी जल निकासी होनी आवश्यक है। इसके पौधे को अलग-अलग प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है। मिट्टी की ऊपरी सतह सख्त न हो, गहरी और उपजाऊ मिट्टी में जैतून के पौधे पर अधिक वानस्पतिक वृद्धि होती है और मध्यम उपज, अधिक बोरोन और कैल्शियम वाली (क्षारीय) मिट्टी में भी यद्यपि यह पौधा उगाया जा सकता है। परन्तु पौधे की बढ़ौतरी बहुत ही कम होती है| जैतून के लिए मिट्टी का पी एच मान 6.5 से 8.0 तक होना वांछनीय है।

उन्नत किस्में

जैतून की खेती के लिए आपको अनेक किस्में मिल जाएंगी, लेकिन व्यवसायिक तौर पर कुछ ही किस्मों को उपयोग में लाया जाता है, जो इस प्रकार है, जैसे-

किस्में तेल के लिए- फ्रंटियो (पछेती), लैक्सिनो (पछेती), एस्कोटिराना, पैंडोलीनो,

किस्में आचार के लिए- एस्कोलानो (अगेती), कोराटीना

फ्रटियो- जैतून की देर से पकने वाली किस्म, फल मध्यम आकार का, चंद धब्बों के लम्बूतरा, शीर्ष गोलाकर और नीचे का गड्ढा मध्यम गहरा, पकने पर बैंगनी रंग का, आगे से गोल, गूदा हरा, पैदावार प्रति पौधा 15 से 20 किलोग्राम, तेल की मात्रा 26 प्रतिशत होती है।

कोराटीना- फल का भार और आकार मध्यम से छोटा जो फसल के अधिक और कम होने पर निर्भर, फल लम्बूतरा, पूरा पकने पर बैंगनी रंग, गूदा हरा, शीर्ष गोलाकार, नीचे का गड्ढा कम गहरा और अनियमित, पैदावार 10 से 16 किलोग्राम प्रति पौधा, तेल की मात्रा 22 से 24 प्रतिशत, पौधा मध्यम ओजस्वी परन्तु फैलावदार होता है।

लैक्सिनो- जैतून की देर से पकने वाली किस्म, फल मध्यम आकार तथा भार का, फल अण्डाकार, पूरा पकने पर रंग बैंगनी, शीर्ष शंकु रूप का परन्तु नीचे का गड्ढा गहरा और कुछ अनियमित, पैदावार 10 से 15 किलोग्राम प्रति पौधा, सावधानीपूर्वक काट-छांट करने पर पौधे की प्रवृति फैलावदार होती है।

एस्कोटिराना- इसका फल मध्यम आकार और भार का, लम्बूतरा, पकने पर बैंगनी रंग का, गूदा हरा, शीर्ष गोल, नीचे का गड्ढा कम गहरा और कुछ अनियमित, पैदावार 20 से 25 किलोग्राम प्रति पौधा, पौधा मध्यम बढ़ौतरी वाला व फैलावदार होता है।

एस्कोलानो- इसका फल बड़े आकार तथा अधिक भार वाला, लम्बूतरा, पूरा पकने पर बैंगनी काले रंग का, शीर्ष गोलाकार, नीचे का गड्ढा मध्यम, गहरा और अनियमित, पैदावार 7 से 10 किलोग्राम प्रति पौधा, तेल की मात्रा 10 से 17 प्रतिशत, पौधा फलावदार, अगेती से मध्य समय में पकने वाली किस्म है।

पैंडोलीनो- इसके पौधे की शाखाएं झुकी हुई, पौधे का आकार और तने की मोटाई मध्यम, पौधा मध्यम ओजस्वी, फल मध्यम आकार का, लम्बूतरा, छिलका चंद बिंदुओं सहित बैंगनी रंग का, गूरा हरा, शीर्ष गोलाकार, फल के नीचे का गड्ढा गहरा और अनियमित, डण्डी छोटी, गुठली वजन और आकार में मध्यम, लम्बी, गुठली का आधार गोलाई लिए हुए और शीर्ष नुकीला, गुठली की सतह कुछ खुरदरी संतरी रंग की, देर से पकने वाली किस्म, तेल 20 प्रतिशत, जल की मात्रा अधिक 65 प्रतिशत होती है।

अन्य किस्में- बरेनिया, अरबिकुना, फिशोलिना, पिकवाल और कोरनियकी आदि प्रमुख है।

परागण
जैतून की अधिक उपज लेने हेतु परागण की आवश्यकता होती है। इसके लिए 11 प्रतिशत परागण किस्में होनी चाहिए। फ्रंटियो, कोराटिना, एस्कोटिराना, एस्कोलानो अच्छी परागण प्रजातियां है।

पौध रोपण
जैतून के पौधों को 8 x 8 मीटर की दूरी पर लगायें परन्तु वर्षा पर निर्भर स्थानों में जहां मिट्टी कम उपजाऊ हो वहां यह फासला 6 x 6 मीटर रखें| दूसरे फलों के समान पौधे को जड़ों में मिट्टी के साथ रोपित करें। सामान्य रूप से पौधों का रोपण जुलाई से अगस्त में करते हैं, परन्तु जहां सिंचाई की सुविधा हो दिसम्बर से जनवरी में भी पौधे लगा सकते हैं। पौधे लगाने के बाद हल्की सिंचाई अवश्य करें।

नोट- वर्तमान में अलग अलग किस्मों के पौधे को इस्रायल से मंगाकर नर्सरी में तैयार किया जाता है। 

खाद और उर्वरक
जैतून की खेती के लिए खाद और उर्वरक की अनुमोदित मात्रा निम्नलिखित है, जैसे-
पौधे की आयु (वर्ष में)गोबर की खाद (किलोग्राम)नाइट्रोजन (ग्राम)फास्फोरस (ग्राम)पोटाश (ग्राम)
110755050
215150100100
320225150150
425300200200
530375250250
635450300300
740525350350
845600400400
950675450450
10 और आगे के वर्षों में60750500500
  • गली सड़ी गोबर की खाद, पोटाश और फास्फोरस उर्वरक दिसम्बर से जनवरी माह में डालें।
  • नाईट्रोजन की आधी मात्रा मार्च में और बाकी आधी मात्रा जुलाई में बरसात आने पर डालें।
  • जैतून के फल देने वाले पौधों में सुपर फास्फेट 500 ग्राम प्रति पौधा तीन साल के अन्तराल पर डालें, हर साल डालने की जरूरत नहीं है।
  • हर दूसरे साल बोरेक्स 200 ग्राम प्रति पौधा की दर से प्रयोग करें।
  • कम वर्षा या असिंचित अवस्था में फलों का आकार तथा कुल उपज काफी कम हो जाती है, इसलिए गर्मियों में प्रायः 10 से 15 दिन के अन्तर पर या आवश्यकतानुसार सिंचाई अवश्य करते रहना चहिए।

सधाई और काट-छांट
जैतून की खेती में सिधाई मौडिफाइड सैन्ट्रल लीडर विधि से की जाती है| फल देने वाले पौधों में काट-छांट बहुत कम करनी चाहिए। सिर्फ बरसात में निकलने वाले प्ररोह, उलझने वाली शाखायें और सूखी व रोगग्रस्त शाखायें ही काटें। पौधे की उचित वानस्पतिक वृद्धि तथा ओजस्वीपन को बनाये रखने के लिए कमजोर तथा पुरानी टहनियों को समय-समय पर निकालते रहें।

रोग व कीट रोकथाम
एन्थ्रेक्नोज (कालैटोट्राइकम गलियोस्पोरायडस)- पत्तों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे आते हैं। फलों पर गोल भूरे रंग के गड्ढे बनते हैं। जो बड़े काले धब्बों में बदल जाते हैं। इनसे नमी होने पर गुलाबी स्पोर निकलते हैं।

रोकथाम- बोर्डो मिक्सचर (कॉपर सल्फेट 1600 ग्राम + चूना 1600 ग्राम + 200 लिटर पानी) का पहला छिड़काव जून के तीसरे सप्ताह में और फिर तीन सप्ताह के अन्तर पर कुल 5 छिड़काव करें।

फलों की तुड़ाई
जैतून के सारे फल एक साथ नहीं पकते इसलिए तुड़ाई 4 से 5 बार में करनी चाहिए।फल या तो हाथ से तोड़े या डण्डे से शाखाओं को हिला कर तोड़े। पेड़ों के नीचे कपडे या पॉलीथीन की चादर बिछाकर फलों को इक्ट्ठा कर लें।

पैदावार
जैतून कि खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 475 पेड़ लगाए जा सकते है, वहीँ एक हेक्टेयर में लगे पेड़ों से औसतन 20 से 27 क्विंटल तेल का उत्पादन होता है, जो अन्य फसलों कि खेती से होने वाली कमाई से कहीं ज्यादा है।

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बच की उन्नत खेती कैसे करें ?

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बच (वानस्पतिक नाम:एकोरस कैलमस एक बारहमासी पौधा है जिसकी शाखायें बहुत विस्तृत होती है। पत्तियाँ रेखाकार, लंबी मोटी व मध्य शिरा युक्त होती है और 0.7 से 1.7 से.मी. चौड़ी होती है। इसके प्रकंद सुगंधित होते है। फूल 3 से 8 से.मी. लंबे आकार में बेलनाकार हरे-भूरे रंग के और चारों से वाली से ढ़के हुये होते है। फल छोटे और बेर की तरह गोल आकार के होते है। यह पौधा 45 से 60 से.मी. उँचाई का होता है। इसका स्वाद कड़वा होता है। बच की उत्पत्ति भारत एवं मध्यएशिया है परन्तु अब यह दुनिया भर में पाया जाता है। भारत में कश्मीर, मणिपुर, कर्नाटक और उत्तर–पूर्व हिमालय क्षेत्र में पाया जाता है। मध्यप्रदेश में यह दलदली जगहों में पाया जाता है। बच एक लोकप्रिय औषधीय पौधा है जिसका उपयोग भारत में अनेक आयुर्वेदिक औषधियों में किया जाता है। इसकी पत्तियों से नींबू की तरह सुगंध आती है और जड़ों से मधुर मीठी गंध आती है। इसके बढ़ते औषधीय उपयोग के कारण यह जंगलो से तेजी से निकाला जा रहा है। वर्तमान में यह लुप्त प्रजातियों की सूची में है।

यह एक बहुत प्रसिद्ध चिकित्सिक पौधा है, जो कि भारत में बहुत सारी आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है । यह मध्य- जलीय पौधा है और इसकी खेती सिल्ले और दलदली क्षेत्रों में की जाती है । यह हॉलैंड, उत्तरी अमरीका, यूरोप के बहुत सारे देशों, केन्द्री एशिया, भारत और बर्मा आदि  में पाया जाता है । भारत में यह मणिपुर, हिमालय, नागा हिल्स, झीलों और नदियों के किनारों पर पाया जाता है । इसके पत्तों का आकार तलवार जैसा और रंग पीला-हरा होता है । इस पौधे का कद 2 मीटर होता है । इसके फूल बेलनाकार आकार के और हरे-भूरे रंग के होते है । इस पौधे की गांठों का प्रयोग अनिद्रा, पेट की बिमारियों, सुगंध, कीटों, झुलस रोग, बुखार, पाचन क्रिया और कई सारी बिमारियों के इलाज के लिए किया जाता है ।

बच एक महत्वपूर्ण औषधीय व संगधीय पौधा है अंग्रेजी में इसे स्वीट फ्लैग कहते हैं । स्थानीय भाषा में सफेद बच उग्रगंधा या घोड़ा बच के नाम से जानते हैं । इसकी उत्पत्ति दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र है, परन्तु यह संपूर्ण विश्व में, जिनमें यूरोपीय देश भी शामिल हैं, प्राकृतिक रूप से पाई जाती है । हमारे देश में यह कश्मीर, मणीपुर, कर्नाटक, उत्तर पूर्व हिमाचल क्षेत्र के साथ – साथ लगभग सभी स्थानों में बहुतायत से उगता है । मध्यप्रदेश में यह पठारी क्षेत्र नदी नाले के किनारे की दलदली भूमि में पाया जाता है । बच की पत्तियों एवं आकंद ( राइजोम ) का औषधीय महत्व है, जो कि विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं ।

वानस्पतिक वर्णन

बच का वानस्पतिक नाम एकोरस केलेमस है और यह ऐरसी कुल का शाकीय पौधा है जो कि 45 से 60 से.मी. ऊँचा होता है, इसकी पत्तियाँ हल्के हरे रंग की चपटी, रेखाकार, लंबी मोटी व मध्य शिरा युक्त होती है इसके पुष्प हल्के पीले रंग के स्पेडिंक्स पुष्पक्रम में लगे होते हैं, फल लाल रंग के व गोल आकार के होते हैं, राइजोम भूमिगत, लंबा, सफेद रंग का तीव्रगंध युक्त होता है ।

औषधीय महत्व व उपयोग

बच के बहुशाखीय सुगंधित आकंद विभिन्न प्रकार की औषधियों के निर्माण में प्रयुक्त होते हैं आकंदों में पाया जाने वाला सुगंधित तेल एकोरिन से बनने वाली दवायें वायुविकार केन्द्रिय तंत्रिका, तंत्र उत्तेजक, शरीरिक शक्ति वृद्धि वर्धक, बात विकारों, कफ, अतिसार, मूत्र व गर्भरोग आदि में लाभदायक है । यह तेल पेय व भोज पदार्थों को सुवासित करने, कीटनाशक व गंधद्रव्य आदि कार्यों में उपयोगी है । आकंद को सुखाकर बनाया गया चूर्ण कीड़ों को नष्ट करने के साथ ही मिर्गी, बुखार कफ व दमा आदि रोगों के उपचार में काम में लिया जाता है ।

रासायनिक संगठन

बच के आकंद या राइजोम व पत्तियों से सुगंधित तेल प्राप्त होता है इसकी पत्तियों व सूखा बिना छिल्का उतरे राइजोम से वाष्पीय आसवन द्वारा उड़नशील तेल निकाला जाता है इसकी प्रतिशत मात्रा 0.85 से 2.50 प्रतिशत तक होती है बच का उड़नशील तेल पीला या भूरा पीला रंग का चिपचिपा सा द्रव्य जिसमें जले मसाले व कपूर जैसी गंधयुक्त होता है । बच का तेल या केलामस आइल में केलामोल, ऐसोराॅन, यूजेनोल, पाईन केम्फीन, एकोरोन केम्फर, केलेमेनाँल, एकेरोन व फ्लेवोन आदि रासायनिक पदार्थ पाये जाते हैं ।

जलवायु
बच की कृषि के लिए आर्द्र व नमींयुक्त जलवायु श्रेष्ठ है यह 10 से 40 सेन्टीग्रेट तापमान एवं 70 से 250 से.मी. वार्षिक वर्षा वाले स्थानों पर सुगमतापूर्वक उगाया जा सकता है ।

भूमि एवं भूमि की तैयारी
इसे विभिन्न प्रकार की भूमि में उगाया जाता है पर बलुई मिट्टी इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त भूमि है, वर्षा के पूर्व 2 – 3 बार गहरी जुताई करके भूमि को तैयार करें व उसे अत्यधिक नमीं युक्त बनायें ।

खाद व उर्वरक
बच के आकंदों की रोपाई के पूर्व खेत में 10 – 20 टन/हेक्टेयर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद भूमि में समान रूप से मिलवा देना चाहिए । अगर रासायनिक उर्वरक देना चाहें तो 60 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस एवं 60 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से दी जा सकती है । नाइट्रोजन की कुल मात्रा को तीन समान भागों में रोपाई के समय, दो माह बाद एवं 4 माह के बाद दी जाना चाहिए ।

रोपाई का समय व विधि
इसकी रोपाई, पौधे की तैयारी, पुराने राइजोम को नमींयुक्त स्थान पर रेत में संग्रहित कर तथा अंकुरण होने पर छोटे – छोटे गांठयुक्त टुकड़ों में काट कर रोपाई कर, खरीफ मौसम में जुलाई से अगस्त तक ही करें । बच की बोआई रोपणी लगाकर करते हैं । कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. व आकंदों का अंतराल भी 30 से.मी. रखना चाहिए । जिससे हमें प्रति हेक्टेयर 1.11 लाख पौध सघनता प्राप्त हो सके ।

सिंचाई, निंदाई एवं गुड़ाई
रोपाई के एकदम बाद हल्की सिंचाई करें व वर्षाकाल की समाप्ति के बाद 7 दिनों के अंतराल से सिंचाई करें । खेत में पौधों की रोपाई हो जाने के बाद जब भी नींदा अधिक दिखे तब निंदाई तथा फिर 3 – 3 माह के अंतर से करते रहें ।

बच के रोग व कीट
बच की फसल पर कीटों व रोगों का आक्रमण कम ही होता है । अगर कभी मिलीबग कीटों का प्रकोप हो जावे तो 1 मि.ली. मिथाईल पेराथियान, 1.5 मि.ली. आक्सीडेमेटान मिथाईल या 2 मि.ली. क्विनालफास प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव कर नियंत्रण किया जाता है ।

हानिकारक कीट और रोकथाम
घोंगा: यह सुंडी पौधे के पत्तों पर नुकसान करती है । यह पत्तों का गुद्दा खाती है| इसकी रोकथाम के लिए मैटाएलडीहाईड या आयरन फासफेट डालें ।

मिली बग: यह लेपिडोस्फेल्स या सिउडोकोकस के कारण होती है । इससे पत्ते पीले पड़ने और सिकुड़ने शुरू हो जाते हैं । इसकी रोकथाम के लिए मिथाइल पैराथियाल 10 मि.ली. या कुइनलफोस 20 मि.ली. को 10 लीटर पानी में मिला कर जड़ों और टहनियों पर डालें ।

बीमारीयां और रोकथाम
पत्तों पर धब्बे पड़ना: इस बीमारी के साथ पत्तों पर बिरंगे फंगस के धब्बे बन जाते है । इसकी रोकथाम के लिए कप्तान 10 ग्राम और क्लोरपाइरीफोस 20 मि.ली. प्रति 10 लीटर डालें ।

कटाई, संसाधन व उत्पादन
बच की फसल 6 से 8 माह में तैयार हो जाती है । इसके आकंदों को जब पत्तियाँ पीली पड़ जाये तब खोदकर निकाल लें तथा साफ करके छायादार स्थानों पर सुखा लें तथा शुष्क भंडार गृहों में संग्रह कर रखें । इसकी उपज लगभग 42 क्विंटल/हेक्टेयर होती है । शुष्क आकंदों का मूल्य 20 से 30 रूपये प्रति किलो तथा कृषि लागत लगभग 50 हजार रूपये आती है आकंद का औसत विक्रय मूल्य 2000 रूपये प्रति क्ंविटल होता है जिससे शुद्ध लाभ 34,000 रूपये के करीब प्राप्त किया जा सकता है ।

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स्टीविया की उन्नत खेती कैसे करें ?

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स्टीविया को हनी प्लांट के नाम से जाना जाता है क्योंकि यह स्वाद में मीठा होता है। यह एक प्राकृतिक स्वीटनर होता है जो कि शूगर के मरीजों को उनके शरीर में इंसुलन की मात्रा को संतुलित रखता है। इसके पत्ते कई तरह की दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग किये जाते हैं।  स्टीविया से तैयार दवाइयों का प्रयोग मधुमेह, दांतों की कैविटी, टॉनिक और भोजन में से कैलोरी कम करना आदि इलाज के लिए किया जाता है। यह एक सदाबहार जड़ी बूटी है, जिसकी ऊंचाई 60-70 सैं.मी. होती है। इसके पत्ते विपरीत रूप से व्यवस्थित होते हैं और हरे रंग के होते हैं।  इसके फूल छोटे और सफेद होते हैं। भारत में मुख्य पंजाब, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्रा प्रदेश आदि स्टीविया उत्पादक राज्य हैं।

आजकल मधुमेह व मोटापे की समस्या के कारण न्युन कैलोरी स्वीटनर्स हमारे भोजन के आवश्यक अंग बन चुके है। बाजार मे उपलब्‍ध कृत्रि‍म उत्पाद सेहत के लि‍ए पुर्णतया सुरक्षित न होने के कारण, मधु तुलसी या स्‍टीवि‍या (Stevia) के पौधे को न्‍यून क्‍ैलोरी मि‍ठास का उत्‍तम प्राकृतिक स्त्रोत माना जाता है।

यह शक्कर से लगभग 25 से 30 गुना अधिक मीठा , केलोरी रहित है व मधुमेह व उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए शक्कर के रूप मे पुर्णतया सुरक्षित है ।

इसके पत्तों मे पाये जाने वाले प्रमूख घटक स्टीवियोसाइड, रीबाडदिसाइड व  अन्य योगिकों में इन्सुलिन को बैलेन्स करने के गुण पाये जाते है। जिसके कारण इसे मधुमेह के लिए उपयोगी माना गया है। यह एन्टी वायरल  व एंटी बैक्टीरियल भी है तथा दांतो तथा मसूड़ो की बीमारियों से भी मूकित दिलाता है।

इसमे एन्टी एजिंग, एन्टी डैन्ड्रफ जैसे गुण पाये जाते है तथा यह नॉन फर्मेंटेबल होता है। 15 आवश्यक खनिजो (मिनरल्स) तथा विटामिन से युक्त यह पौधा अत्‍यंत उपयोगी औषधीय पौधा है।

स्टीविया (स्टीविया रेबव्दिअना) की खेती के लि‍ए जलवायु तथा भूमि‍-

स्टीविया की खेती भारतवर्ष में पूरे साल भर में कभी भी करायी जा सकती है इसके लिये अर्धआद्र एवं अर्ध उष्ण किस्म की जलवायु काफी उपयुक्त पायीजाती है।

ऐसे क्षेत्र जहाँ पर न्यूनतम तापमान शून्य से नीचे चला जाता है वहाँ पर इसकी खेती नही करायी जा सकती । 11 डि‍ग्री सेन्टीग्रेड तक के तापमान में इसकी खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है।

स्टीविया की सफल खेती के लिये उचित जल निकास वाली रेतीली दोमट भूमि जिसका पी०एच० मान 6 से 7 के मध्य हो, उपयुक्त पायी गयी है

जल भराव वाली याक्षारीय जमीन में स्टीविया की खेती नही की जा सकती है।

स्‍टीवि‍या की रोपाई-

स्टीविया वर्ष भर में कभी लगाई जा सकती है लेकिन उचित समय फरवरी - मार्च का महीना है तापमान एवं लम्बे दिनों का फसल के उत्पादन पर अधिक प्रभाव पङता होता है

स्टीविया के पौधों का रोपाई मेङो पर किया जाता है। इसके लिये 15  सेमी० ऊचाई के 2 फीट चौङे मेंड बना लिये जाते है तथा उन पर कतार से कतार की दूरी 40 सेमी० एवं पौधों में पौधें की दूरी 20-25 सेमी० रखते है।

दो बेङो के बीच 1.5 फीट की जगह नाली या रास्ते के रूप में छोङ देते है।

स्‍टीवि‍या फसल में खाद एवं उर्वरक

क्योकि स्टीविया की पत्तियों का मनुष्य द्वारा सीधे उपभोग किया जाता है इस कारण इसकी खेती में किसी भी प्रकार की रसायनिक खाद या कीटनाशी का प्रयोग नहीं करते है।

एक एकङ में इसकी फसल को तत्व के रूप में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की मात्रा क्रमश: 110 : 45: 45 कि० ग्रा० की आवश्यकता होती है इसकी पूर्ति के लिये 70-80 कु० वर्मी कम्पोस्ट या 200 कु० सङी गोबर की खाद पर्याप्त रहती।

स्‍टीवि‍या की फसल मे सिंचाई-
स्टीविया की फसल सूखा सहन नहीं कर पाती है और इसको लगातार पानी की आवश्यकता होती है। सर्दी के मौसम में 10 दिन के अन्तराल पर तथा गर्मियों में प्रति सप्ताह सिंचाई करनी चाहिये । वैसे स्टीविया भी फसल में सिंचाई करने का सबसे उपयुक्त साधन स्प्रिंकलरर्स या ड्रिप है।

खरपतवार नियंत्रण
सिंचाई के पश्चात खेत की निराई - गुङाई करनी चाहिये जिससे भूमि भुरभुरी तथा खरपतवार रहित हो जाती है जो कि पौधों में वृद्धि के लिये लाभदायक होता है।

रोग एवं कीट नियंत्रण-
सामान्यत: स्टीविया की फसल में किसी भी प्रकार का रोग या कीङा नहीं लगता है। कभी-कभी पत्तियों पर धब्बे पङ जाते है जो कि बोरान तत्व की कमी के लक्षण है इसके नियंत्रण के लिये 6 प्रतिशत बोरेक्स का छिङकाव किया जा सकता है। कीङो की रोकथाम के लिये नीम के तेल को पानी में घोलकर स्प्रे किया जा सकता है।

हानिकारक कीट  और रोकथाम
चेपा: यह नज़दीक से पारदर्शी, मुलायम त्वचा वाले रस चूसने वाले कीट हैं। यह पर्याप्त मात्रा में होने के पर इनके लक्षण पत्ते पीले पड़ जाते है और पकने से पहले मर जाते है| चेपे की रोकथाम के लिए, कराइसोपरला पराडेटरज़ 4-6 हज़ार प्रति एकड़ या 50 ग्राम नीम के घोल को प्रति एकड़ में डालें।

बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर काले धब्बे और सूखना: इस बीमारी से पत्तों पर क्लोरोसिस के द्वारा सलेटी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं।

सफेद फंगस: इस बीमारी से पौधे के तने के ऊपर भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं और बाद में पूरा पौधा सूख जाता है और बाद में मर जाता है।

दक्षिणी झुलस रोग: यह मिट्टी से पैदा होने वाली फंगस सक्लेरोशियम रोलफसी के कारण होती है। सूर्य की किरणें इस बीमारी को मारने का सबसे अच्छा तरीका है।

फूलों को तोङना-
क्योंकि स्टीविया की पत्तियों में ही स्टीवियोसाइड पाये जाते है इसलिये पत्तों की मात्रा बढायी जानी चाहिये तथा समय-समय पर फूलों को तोङ देना चाहिये। अगर पौधे पर दो दिन फूल लगे रहें तथा उनको न तोङा जाये तो पत्तियों में स्टीवियोसाइड की मात्रा में 50 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है ।

फूलों की तुङाई, पौधों को खेत के रोपाई के 30, 45, 60,75 एवं 90 दिन के पश्चात एवं प्रथम कटाई के समय की जानी चाहिये। फसल की पहली कटाई के पश्चात 40, 60 एवं 80 दिनों पर फूलों को तोङने की आवश्यकता होती है

फसल की कटाई-
स्टीविया की पहली कटाई पौधें रोपने के लगभग ४ महीने पश्चात की जाती है तथा शेष कटाईयां 90-90 दिन के अन्तराल पर की जाती है इस प्रकार वर्ष भर में 3-4 कटाई की जाती है।

कटाई तीन वर्ष तक ही ली जाती है, इसके बाद पत्तियों के स्टीवियोसाइड की मात्रा घट जाती है कटाई में सम्पूर्ण पौधे को जमीन से 6-7 सेमी० ऊपर से काट लिया जाता है तथा इसके पश्चात पत्तियों को टहंनियों से तोङकर धूप में अथवा ड्रायर द्वारा सूखा लेते है

तत्पश्चात सूखी पत्तियों को ठङे स्थान में शीशे के जार या एयरटाईट पोलीथीन पैक में भर देते है।

स्टीविया की उपज-
वर्ष भर में स्टीविया की 3-4 कटाईयों में लगभग 70 कु० से 100 कु० सूखे पत्ते प्रति‍ एकड प्राप्त होते है।

स्टीविया की लाभ-
वैसे तो स्टीविया की पत्तियों का अन्तर्राष्ट्रीय बाजार भाव लगभग रू० 300-400 प्रति कि०ग्रा० है लेकिन अगर स्टीविया की बिकी दर रू० 100/प्रति कि०ग्रा० मानी जाये तो प्रथम वर्ष में एक एकङ भूमि से 5-6 लाख की आमदनी होती है, तथा आगामी सालों में यह लाभ अधिक होता है  

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सर्पगन्‍धा की उन्नत खेती कैसे करें ?

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यह एक महत्तवपूर्ण औषधि है,  जो कि आधुनिक दवाइयों और आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग की जाती है। इसकी जड़ें सुगन्धित होती हैं लेकिन स्वाद में कड़वी होती हैं। इसकी जड़ें विभिन्न प्रकार की दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग की जाती हैं। सर्पगन्धा से तैयार दवाइयों को घाव, बुखार, पेट का दर्द, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, मिर्गी और पागल-पन के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है। यह एक झाड़ी वाला पौधा है, जिसकी औसतन ऊंचाई 0.3-1.6 मीटर है| इसके पत्ते लम्भाकार होते है, जिसकी लम्बाई  8-15 सैं.मी. होती हैं। इसके फूल सफेद या गुलाबी, फल जामुनी काले रंग के और जड़ें 0.5-3.6 सैं.मी. व्यास के होते हैं। सर्पगन्धा के मुख्य उत्पादक देश बर्मा, बंगलादेश, मलेशिया, श्री लंका, इंडोनेशिया और अंडेमान द्वीप आदि हैं। भारत में उत्तर प्रदेश सर्पगन्धा का मुख्य उत्पादक राज्य है।

सर्पगन्‍धा एक अत्‍यन्‍त उपयोगी पौधा है। यह 75 सेमी से 1 मीटर ऊचाई तक बढता है। इसकी जडे स‍िर्पिल तथा 0.5 से 2.5 सेमी व्‍यास तक होती हैं तथा 40 से 60 सेमी गहराई तक जमीन में जाती हैं। इसपर अप्रैल से नवम्‍बर तक लाल सफेद फूल गुच्‍छो मे लगते है। सर्पगंधा की जडों मे बहुत से एल्‍कलाईडस पाए जाते है जिनका प्रयोग रक्‍तचाप, अनिद्रा, उन्‍माद, हिस्‍टीरिया आदि रोगों के उपचार में होता है। इसका उपयोगी भाग जडें ही है। सर्पगंधा 18 माह की फसल है। इसे बलुई दोमट से लेकर काली मिट्टी मे उगाया जा सकता है।

सर्पगन्‍धा उगाने के लिए खेत की तैयारी:

जडों की अच्‍छी वृद्धि के लिए मई माह में खेत की गहरी जुताई करें तथा खेत को कुछ समय के लिए खाली छोड दें। पहली वर्षा के बाद खेत में 10-15 गाडी प्रति हैक्‍टेयर के हिसाब से गोबर की डालकर फिर से जुताई कर दें। पटेला से खेत एकसार करने के बाद उचित नाप की क्‍यारियॉ तथा पानी देने के लिए नालियां बना दें। सर्पगंधा को बीजों के द्वारा अथवा जड, स्‍टम्‍प या तने की कटिगं द्वारा उगाया जाता है। सामान्‍य पी एच वाली जमीन से अच्‍छी उपज प्राप्‍त होती है।

सर्पगन्‍धा की बीज द्वारा बुआई:

अच्‍छे जीवित बीजों को छिटक कर बाया जा सकता है। अच्‍छे बीजों के चुनाव के लिए उन्‍हें पानी में भिगो कर भरी बीज (जो पानी में बैठ जाऐं) तथा हल्‍के बीजों को अलग कर दिया जाता है। भारी बीजों को बोने के लिए 24 घंटे बाद प्रयोग करते हैं। सर्पगंधा के 30 से 40 प्रतिशत बीज ही उगते हैं इसलिए एक हैक्‍टेयर मे करीब 6-8 किलो बीज की आवश्‍यकता होती है। इसका बीज काफी महंगा होता है अत: पहले नर्सरी बनाकर पौध तैयार करना चाहिए। इसके लिए मई के पहले सप्‍ताह मे 10 गुणा 10 मीटर की क्‍यारीयों मे पकी गोबर की खाद डालकर छायादार स्‍थान पर पौध तैयार करनी चाहिए। बीजों को 2 से 3 सेमी जमीन के नीचे लगाकर पानी लगाते हैं। 20 स 40 दिन के अन्‍दर बीज उपजना शुरू हो जाते है। मध्‍य जुलाई मे पौधे खेतो में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं। 

सर्पगन्‍धा की जडों द्वारा बुआई:

लगभग 5 सेमी जड कटिंग को फार्म खाद (FYM) मिट्टी व रेत मिलाकर बनाई गई क्‍यारियों में बसंत ऋतू में लगायी जाती हैं इसे उच्ति मात्रा में पानी लगा कर नम रखा जाता है। जीन स्‍म्‍ताह में जडों से किल्‍ल्‍े फूटने लगते हैं। इनको 45X30 सेमी दूरी पर रोपित किया जाता है। एक हैक्‍टेयर के लिए लगभग 100 किग्रा जड कटिंग की आवश्‍यकता होती है। 

सर्पगन्‍धा की तने द्वारा बुआई:
तना कटिंग 15 से 22 सेमी को जून माह में नर्सरी में लगाते हैं। जब जडें व पत्तियां निकल आए तथा उनमें अच्‍छी वृद्धि होने लगे तो कटिंग को निकालकर खेतों में लगाया जा सकता है। 

सर्पगन्‍धा में खाद तथा सिचाई:
करीब 20 से 25 टन कम्‍पोस्‍ट खाद प्रति हैक्‍टेयर से अच्‍छी उपज प्राप्‍त होती है। वर्षा के दिनों में कम पानी तथा गर्मियों में 20 से 30 दिन के अन्‍तर से पानी लगाना चाहिए। 

खरपतवार नियंत्रण
खेत को नदीन मुक्त करने के लिए हर गोडाई के बाद निराई करें। शुरूआती समय, जैसे पहले वर्ष में दो निराई और दूसरे वर्ष में पौधे के विकास के समय गोडाई के बाद एक निराई करें। अगर शुरूआती समय में फूल निकलने शुरू हो जायें तो जड़ों के विकास के लिए फूलों को शिखर से काट दें|

हानिकारक कीट और रोकथाम
छोटे पंखों वाली सुंडी : यह ग्लाइफोड्ज़ वर्टमनैलज़ के कारण होती है। इससे पत्ते मुड़ जाते हैं और झड़ जाते हैं। यह हरे पत्तों को अपना भोजन बनाती है जिससे पत्तों का बहुत नुकसान होता है। इसकी रोकथाम के लिए रोगोर 0.2 % की स्प्रे करें।

सफेद सुंडी: यह एनोमला पोलीटा के कारण होती हैं। यह नए पौधों पर हमला करती हैं जिससे यह सूख जाते हैं।
इसकी रोकथाम के लिए खेत की तैयारी के समय फोरेट ग्रैनुलस को मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें।

बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर धब्बा रोग: इस बीमारी से पत्तों की ऊपरी और निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। पत्ता पहले पीले रंग का हो जाता है फिर सूख कर गिर जाता है। इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 @400 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर महीने के अंतराल पर नवंबर तक डालें|

जड़ गलन: यह कीट मैलोएडोगाइन इनकोगनीटा और मैलोएडोगाइन हाप्ला के कारण होते हैं। इससे विकास कम और पत्ते के आकार में कमी आती है। इसकी रोकथाम के लिए 3 जी कार्बोफिउरॉन 10 किलो या 10 जी फोरेट ग्रैनुलस 5 किलो प्रति एकड़ में डालें।

गहरे भूरे धब्बे: इससे पत्तों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए ब्लीटॉक्स 30 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

फसल प्रबन्‍धन:
सर्पगंधा की फसल 18 महीने में तैयार हो जाती है। जडों को सावधानी से खोदकर निकाला जाता है। बडी व मोटी जडों को अलग तथा पतली जडों को अलग करतें हैं तथा पानी से धोकर मिट्टी साफ करनी चाहिए। फिर 12 से 15 सेंमी के टुकडे काटकर सुखा दें। सूखी जडों को पॉलिथीन की थैलियों में सुरक्षित रखा जाता है। 

सर्पगन्‍धा की उपज व आय:
अन्‍दाजन एक एकड से 7-9 क्विंटल शुष्‍क जडें प्राप्‍त हो जाती है। सूखी जडों का बाजार भाव लगभग 150 रूपये प्रति किलो है। चूकि यह जगलों से तेजी से विलुप्‍त हो रही है तथा इसका प्रयोग बढ रहा है अत: इसके बाजार भाव में लगातार तेजी की उम्‍मीद है।

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सफेद मूसली की उन्नत खेती कैसे करें ?

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सफेद मूसली का वानस्पतिक नाम क्लोरोफाइटम बोरिविलेनम है। इसकी जड़ें कई तरह की दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग की जाती है। यह एक वार्षिक जड़ी-बूटी है, जिसकी औसतन ऊंचाई 1-1.5 फुट होती है| इसके पत्तें सितारे के आकार, 2  सैं.मी. तिरछे और पीले-हरे रंग के होते है। इसके फल हरे से रंग के और मुख्य रूप से जुलाई-दिसंबर में लगते है। इसकी जड़ें गुच्छे में और काले बीजों वाली होती है। भारत में उष्ण और उप-उष्ण अफ्रीका, असाम, महाराष्ट्र, आंध्र-प्रदेश और कर्नाटक सफेद मूसली उगाने वाले क्षेत्र है।

सफेद मूसली  की खेती सम्पूर्ण भारतवर्ष में (ज्यादा ठंडे क्षेत्रों को छोडकर) सफलता पूर्वक की जा सकती है। सफेद मूसली  को सफेदी या धोली मूसली के नाम से जाना जाता है जो लिलिएसी कुल का पौधा है। यह एक ऐसी “दिव्य औषधि“ है जिसमें किसी भी कारण से मानव मात्र में आई कमजोरी को दूर करने की क्षमता होती है। सफेद मूसली फसल लाभदायक खेती है

सफेद मुसली एक महत्वपूर्ण रसायन तथा एक प्रभाव वाजीकारक औषधीय पौधा है। इसका उपयोग खांसी, अस्थमा, बवासीर, चर्मरोगों, पीलिया, पेशाब संबंधी रोगों, ल्यूकोरिया आदि के उपचार हेतु भी किया जाता है। हालांकि जिस प्रमुख उपयोग हेतु इसे सर्वाधिक प्रचारित किया जाता है। वह है-नपुुंसकता दूर करने तथा यौनशक्ति एवं बलवर्धन। मधुमेह के उपचार में भी यह काफी प्रभावी सिद्ध हुआ है।

सफेद मूसली उगाने के लिए जलवायु -

सफेद मूसली मूलतः गर्म तथा आर्द्र प्रदेशांे का पौधा है। उंत्तरांचल, हिमालय प्रदेश तथा जम्मू-कश्मीर के ऊपर क्षेत्रों में यह सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है।

सफेद मूसली के खेत की तैयारी -

सफेद मूसली 8-9 महीनें की फसल है जिसे मानसून में लगाकर फरवरी-मार्च में खोद लिया जाता है। अच्छी खेती के लिए यह आवश्यक हे कि खेतों की गर्मी में गहरी जुताई की जाय, अगर सम्भव हो तो हरी खाद के लिए ढ़ैचा, सनइ, ग्वारफली बो दें।

जब पौधो में फूल आने लगे तो काटकर खेत में डालकर मिला दें। गोबर की सड़ी खाद 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से अन्तिम जुताई के समय खेत में मिला दें। खेतों में बेड्स एक मीटर चैड़ा तथा एक फीट ऊँचा बनाकर 30 सेमी. की दूरी पर कतार बनाये, जिसमें 15 से.मी. की दूरी पर पौधे को लगाते हैं।

बेड्स बनाने के पूर्व 300-350 किलो प्रति हेक्टिेयर की दर से नीम या करंज की खल्ली मिला दें।

बीज उपचार एवं रोपण –

400 से 500 किलोग्राम बीज या 40000 ट्यूबर्स प्रति हैकटैर की दर से बीज की अवश्यकता पड़ती है। बुवाई के पहले बीज का उपचार रासायनिक एवं जैविक विधि से करते हैं । रासायनिक विधि में वेविस्टीन के 0.1 प्रतिशत घोल में ट्यूबर्स को उपचारित किया जाता है।

जैविक विधि से गोमूत्र एवं पानी (1ः10) में 1 से 2 घंटे तक ट्यूबर्स को डुबोकर रखा जाता है। बुआई के लिये गड्ढे बना दिये जाते हैं। गड्ढे की गहराई उतनी होनी चाहिए जितनी बीजों की लम्बाई हो, बीजों का रोपण इन गड्ढों में कर हल्की मिट्टी डालकर भर दें ।

सफेद मुसली की  सिंचाई एवं निकाई-गुड़ाई:
रोपाई के बाद ड्रिप द्वार सिंचाई करें। बुआई के 7 से 10 दिन के अन्दर यह उगना प्रारम्भ हो जाता हैं। उगने के 75 से 80 दिन तक अच्छी प्रकार बढ़ने के बाद सितम्बर के अंत में पत्ते पीले होकर सुखने लगते हैं तथा 100 दिन के उपरान्त पत्ते गिर जाते हैं। फिर जनवरी फरवरी में जड़ें उखाड़ी जाती हैं।

सफेद मुसली की किस्में -
सफेद मुसली की कई किस्में देश में पायी जाती हैं। उत्पादन एवं गुणवत्ता की दृष्टि से एम डी बी 13 एवं एम डी बी 14  किस्म अच्छी है। इस किस्म का छिलका उतारना आसान होता है। बस किस्म में उपर से नीचे तक जड़ो या टयूबर्स की मोटाई एक समान होती है। एक साथ कई ट्यूबर्स (2-50) गुच्छे के रूप में पाये जाते हैं।

Jawahar Safed Musli 405 and Rajvijay Safed Musli 414: यह किस्म राजमाता विज्याराजे स्किनदिया कृषि विश्व-विद्द्यालय मंडसौर, मध्य प्रदेश द्वारा तैयार की गई है|

मूसली बरसात में लगायी जाती है। नियमित वर्षा से सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती है। अनियमित मानसून में 10-12 दिन में एक सिंचाई दें। अक्टूबर के बाद 20-21 दिनों पर हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए। मूसली उखाडने के पूर्व तक खेती में नमी बनाए रखें।

जल भराव अथवा आवश्यकता से अधिक सिंचाई के कारण जड़ांे के गलन का रोग हो सकता है । इसकी रोकथाम के लिए आगे सिंचाई देना बंद करके तथा रूके हुए पानी को बाहर निकाल करके इस रोग पर काबू पाया जा सकता है।

फंगस के रूप में पौधों पर ‘फ्यूजेरिम‘ का प्रकोप हो सकता हैं। जिसके उपचार हेतु टाªयकाडर्मा बिरडी का उपयोग किया जा सकता है। दीमक से सुरक्षा हेतु नीम की खली का उपयोग सर्वश्रेष्ठ पाया गया है। एक सुरक्षा के उपाय के रूप में कम से कम 15 दिन में एक बार फसल पर ग©मूत्र के घोल का छिड़काव अवश्य कर दिया जाना चाहिए।

हानिकारक कीट और रोकथाम
सफेद सुंडी: यह सुंडीयांजड़ों को खाकर नुकसान पहुंचाती है| इसकी रोकथाम के लिए एल्ड्रिन 10 किलो प्रति एकड़ डालें|

पत्ते खाने वाली सुंडी: यह सुंडियां ताज़े और सेहतमंद पत्तों को खाती है| इसकी रोकथाम के लिए मैटासिड 0.2% डालें|

बीमारीयां और रोकथाम
लाल धब्बे: इस बीमारी से पत्तों पर लाल, संतरी और पीले धब्बे पड़ जाते है| इसकी रोकथाम के लिए बविस्टिन का घोल 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर 25 दिनों के फासले पर डालें|

पत्तों का मुरझाना: यह एक पैथोजैनिक बीमारी है, जिससे पत्ते पीले पड़ने लगते है, फिर सूखने शुरू हो जाते है और अंत में पूरी तरह से नष्ट हो जाती है| इसकी रोकथाम के लिए बविस्टिन का घोल 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिला कर 25 दिनों के फासले पर डालें|
मूसली खोदने (हारवेस्टिंग) :-
मूसली को जमीन  से खोदने का सर्वाधिक उपयुक्त समय नवम्बर के बाद का होता है। जब तक मूसली का छिलका कठोर न हो जाए तथा इसका सफेद रंग बदलकर गहरा भूरा न हो तब तक जमीन से नहीं निकालें। मूसली को उखाडने का समय फरवरी के अंत तक है।

खोदने के उपरांत इसे दो कार्यों हेतु प्रयुक्त किया जाता है:
  •     बीज हेतु रखना या  बेचना
  •     इसे छीलकर सुखा कर बेचना

बीज के रूप में रखने के लिये खोदने के 1-2 दिन तक कंदो का छाया में रहने दें ताकि अतरिक्त नमी कम हो जाए फिर कवकरोधी दवा से उपचारित कर रेत के गड्ढों, कोल्ड एयर, कोल्ड चेम्बर में रखे।

सुखाकर बेचने के लिये फिंर्गस को अलग-अलग कर चाकू अथवा पीलर की सहायता से छिलका उतार कर धूप में 3-4 दिन रखा जाता है। अच्छी प्रकार सूख जाने पर बैग में पैक कर बाजार भेज देते है।

बीज या प्लान्टिंग मेटेरियल हेतु मूसली का संग्रहण:
यदि मूसली का उपयोग प्लांटिगं मेटेरियल के रूप में करना हो तो इसे मार्च माह में ही खोदना चाहिए। इस समय  मूसली को जमीन से खोदने के उपरान्त इसका कुछ भाग तो प्रक्रियाकृत (छीलकर सुखाना) कर लिया जाता है। जबकि कुछ भाग अगले सीजन मेंबीज (प्लांटिग मेंटेरियल) के रूप मेंप्रयुक्त करने हेतु अथवा बेचने हेतु रख लिया जाता है।

मूसली की खेती से उपज की प्राप्ति: यदि 4 क्विंटल बीज प्रति प्रति एकड़ प्रयुक्त किया जाए तो लगभग 20 से 24 क्ंिवटल के करीब गीली मूसली प्राप्त होगी। किसान का प्रति एकड़ औसतन 15-16 क्विंटल गीली जड़ के उत्पादन की अपेक्षा करनी चाहिए।

मूसली की श्रेणीकरण
“अ“ श्रेणी:  यह देखने में लंबी. मोटी, कड़क तथा सफेद होती है। दातांे से दबाने पर दातों पर यह चिपक जाती है। बाजार में प्रायः इसका भाव 1000-1500 रू. प्रति तक मिल सकता है।

“ब“ श्रेणी: इस श्रेणी की मूसली “स“ श्रेणी की मूसली से कुछ अच्छी तथा “अ“ श्रेणी से हल्की होती है। प्रायः “स“ श्रेणी में से चुनी हुई अथवा “अ“ श्रेणी में से रिजेक्ट की हुई होती है बाजार में इसका भाव 700-800 रू. प्रति कि.ग्रा. तक (औसतन 500 रू. प्रति कि.ग्रा.) मिल सकता है।

“स“श्रेणी: प्रायः इस श्रेणी की मूसली साइज में काफी छोटी तथा पतली एवं भूरे-काले रंग की होती हैं। बाजार में इस श्रेणी की मूसली की औसतन दर 200 से 300 रू. प्रति कि.गा्र. तक होती है।

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लेमन ग्रास की उन्नत खेती कैसे करें ?

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लैमन घास को चीन घास के रूप में भी जाना जाता है। लैमन घास में चिकित्सीय और रोगाणुरोधी मूल्य की विस्तृत संख्या है। इसकी पत्तियों का उपयोग मुख्य रूप से दवाइयां बनाने के लिए किया जाता है। लैमन घास से तैयार दवाइयां का उपयोग सिर दर्द, दांत दर्द और बुखार जैसे विभिन्न समस्याओं का इलाज करने के लिए किया जाता है। यह एक सुगन्धित पौधा है जिसकी औसतन ऊंचाई 1-3 मीटर लंबा होता है। पत्ते 125 सैं.मी. लंबे और 1.7 सैं.मी. चौड़े होते हैं। इसे भारत, अफ्रीका, अमरीका और एशिया के उष्ण कटिबंधीय और उपउष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। भारत में इसे मुख्यत पंजाब, केरला, आसाम, महांराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में उगाया जाता है।

नींबू घास की खेती के लिए आवश्यक जलवायु –

लेमनग्रास की खेती  के लिए हमे  एक गर्म आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है जहा वर्ष भर में 200 से 250 सेमी तक वर्षा होती  हो  । लैमन ग्रास का पौधा हमे  साल भर में 2 से 3 बार उपज देता है.  जो की हर कटाई करने के बाद इसकी सिंचाई करने से उत्पादन और आधिक बढ़ता है।

मिट्टी
इसे मिट्टी की कई किस्मों जैसे चिकनी से रेतली, जलोढ़ मिट्टी और अच्छे जल निकास वाली दोमट मिट्टी में उगाया जाता है। यदि इसे रेतली दोमट मिट्टी जो जैविक तत्वों से भरपूर हो, में उगाया जाये तो अच्छे परिणाम देती है। इसे हल्की मिट्टी में भी उगाया जा सकता है। घटिया जल निकास वाली और अधिक जल जमाव वाली मिट्टी में इसकी खेती करने से परहेज़ करें। इस फसल की वृद्धि के लिए पी एच 5.0 - 8.5 होनी चाहिए।

प्रसिद्ध किस्में और पैदावार

OD-19 (Sugandhi): यह किस्म AMPRS, Odakkali, KAU, Kerala द्वारा जारी की गई है। इस किस्म के पौधे की ऊंचाई 1-1.75 मीटर होती है। इसमें 0.3-0.4 % तेल की मात्रा होती है। इसके तेल की उपज 40-50 किलो प्रति एकड़ होती है और खट्टेपन की मात्रा 84-86 % होती है। इसे जलवायु और मिट्टी की काफी मात्रा में उगाया जा सकता है।

Pragathi: इसे CIMAP, Lucknow, U.P. द्वारा जारी किया गया है। इस किस्म के पौधे का कद छोटा और पत्ते गहरे हरे रंग के चौड़े होते हैं। इसके तेल की उपज 0.63 % और खट्टेपन की मात्रा 85-90 % होता है। इसे उप उष्णकटिबंधीय और उष्णकटिबंधीय या उत्तरी मैदानों में उगाया जाता है।

Nima: इसे सी आई एम ऐ पी, लखनऊ, उत्तर- प्रदेश द्वारा जारी किया गया है। इस किस्म का पौधा लंबा और सिट्रल किस्म का होता है। इसके बायोमास की उपज 9-11 मिलियन टन प्रति एकड़ और तेल की उपज 95-105 किलो प्रति एकड़ होती है। इसे भारत के मैदानों में उगाया जाता है।

Cauvery: सी आई एम ऐ पी, लखनऊ, उत्तर- प्रदेश द्वारा जारी किया गया है। इस किस्म के पौधे लम्बे, और तने सफेद रंग के होते है| इसे नमी की स्थितियों में या नदी घाटी के निकट स्थित भारतीय मैदानों में उगाया जाता है।

Krishna: इसे सी आई एम ऐ पी सब सैंटर, बंगलौर द्वारा जारी किया गया है। इसका पौधा मध्यम ऊंचाई का होता है। इसमें बायोमास की मात्रा 8-11 मीटर प्रति एकड़ होती है और तेल की उपज 90-100 किलोग्राम प्रति एकड़ होती है। इसे भारतीय मैदानों में उगाया जाता है।

NLG 84: यह किस्म 1994 में AINRP  on  M & AP , NDUAT,  Faizabad , Uttar Pradesh द्वारा जारी की गई है। यह किस्म लंबी होती है, इसके पत्ते 100-110 सैं.मी. लंबे होते हैं, जिसकी गहरी जामुनी रंग की परत होती है। इसमें तेल की मात्रा 0.4 % और सिट्रल की मात्रा 84 % होती है। यह उत्तर प्रदेश में उगाई जाती है।

OD 410: यह किस्म ऐ एम पी आर एस उड़कली, के ऐ यू, केरला द्वारा जारी की गई है। इसकी ओलियोरेसिन की उपज 1050 किलोग्राम प्रति एकड़ और ओलियोरेसिन की मात्रा 18.6 % होती है। मैथानोल की निकासी के लिए यह एक अच्छा विलायक है।

ज़मीन की तैयारी

लैमन घास की रोपाई के लिए उपजाऊ और सिंचित ज़मीन की आवश्यकता होती है। बार बार जोताई और हैरो की मदद से जोताई करें। खेत की तैयारी के दौरान दीमक के हमले से फसल को बचाने के लिए लिनडेन पाउडर 10 किलोग्राम प्रति एकड़ में मिलायें। लैमन घास की रोपाई बैडों पर की जानी चाहिए।

बिजाई
बिजाई का समय
मार्च-अप्रैल के महीने में नर्सरी बैड तैयार करें।

फासला
फासला नए पौधों की वृद्धि के अनुसार 60.X 60 सैं.मी. रखें और ढाल बनाने के लिए फासला 90X60 सैं.मी. रखें।

बीज की गहराई
2-3  सैं.मी. की गहराई में बोयें।

बिजाई का ढंग
खेत में रोपाई के लिए दो महीने पुराने पौधों का  प्रयोग किए जाते हैं।

बीज
बीज की मात्रा
बीज 1.6-2 किलोग्राम प्रति एकड़ में प्रयोग करें।

बीज का उपचार
फसल को कांगियारी से बचाने के लिए बिजाई से पहले  बीजों को सीरेसन 0.2 % या एमीसान 1 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। रासायनिक उपचार के बाद बिजाई के लिए बीजों का प्रयोग करें।

पनीरी की देख-रेख और रोपण
लैमन घास के बीजों को आवश्यक लंबाई और 1 -1.5 मीटर की चौड़ाई वाले तैयार बैडों पर बोयें। बीजने के बाद बैडों को कट घास सामग्री से ढक दें|

फिर इसे मिट्टी की पतली परत के साथ ढक दें। नए पौधे रोपाई के लिए 2 महीने में तैयार हो जाते हैं, जब पौधा 12-15 सैं.मी. ऊंचाई पर पहुंच जाता है। रोपाई से पहले खेत अच्छी तरह से तैयार होना चाहिए। रोपाई 15x19 सैं.मी. के फासले पर की जानी चाहिए। नए पौधों को मिट्टी में ज्यादा गहरा ना बोयें इससे बारिश के दिनों में जड़ गलन का खतरा बढ़ जाता है।

खाद
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
UREASSPMURIATE OF POTASH
52
12523
तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
NITROGENPHOSPHORUSPOTASH
242014
उत्तर पूर्वी क्षेत्रों में नाइट्रोजन 24 किलो (यूरिया 52 किलो), फासफोरस 20 किलो (एस एस पी 125 किलो), पोटाश्यिम 14 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 23 किलो) प्रति एकड़ में डालें। अन्य हालातों में नाइट्रोजन 40 किलो प्रति एकड़ में डालें। यह एरोमैटिक प्लांट रिसर्च स्टेशन, ओडाकली (केरला) द्वारा जारी की गई है।

खरपतवार नियंत्रण
खेत को नदीनों से मुक्त करने के लिए हाथों से गोडाई करें। मिट्टी के तापमान को कम करने और नदीनों की रोकथाम के लिए मलचिंग भी एक अच्छा तरीका है। जैविक मलच 1200 किलोग्राम प्रति एकड़ में डालें। एक वर्ष में 2-3 निराई आवश्य करें। जैविक रोकथाम के लिए अल्ट्रा वाइल्ट रेडीएशन या फ्लेम विडिंग  का भी प्रयोग किया जा सकता है।

सिंचाई
गर्मियों के मौसम में फरवरी से जून के महीने  तक 5-7  अंतराल पर सिंचाइयां करें| जब वर्षा नियमित रूप से नहीं होती तो पहले महीने में 3 दिनों के अंतराल पर सिंचाई दें और फिर 7-10 दिनों के अंतराल पर दें। गर्मियों के मौसम के दौरान 4-6 सिंचाइयां देनी आवश्यक होती हैं।

हानिकारक कीट और रोकथाम
तना छेदक सुंडी: यह सुंडी तने के नीचे छेद बना देती है और पौधे को अपना भोजन बनाती है। पत्ते का केंन्द्रीय भाग से सूखना इसका पहला लक्षण होता है। इसकी रोकथाम के लिए फोलीडोल E 605 या पैराथियोन की स्प्रे करें।

नीमाटोड: ये कीट पूरे घास को संक्रमित करते हैं। इन कीटों से फसल को बचाने के लिए फेनामिफोस 4.5 किलोग्राम प्रति एकड़ में डालें।

बीमारियां और रोकथाम
कांगियारी: फूल क्रीम रंग में बदलना शुरू हो जाता है। बीमारी शिखर से फूल को संक्रमित करना शुरू कर देती है और फिर धीरे धीरे पूरे फूल पर पहुंच जाती है। कांगियारी से बचाव के लिए फूल बनने से पहले डाइथेन Z-78 @2% की स्प्रे करें या बिजाई से पहले बीजों को सीरीसन 0.2 %  या एमीसन-6 1 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें।

पत्तों पर लाल धब्बे: इस बीमारी के कारण पत्तों के निचले भाग में भूरे रंग के गोल आकार में धब्बे बन जाते हैं। बाद में ये धब्बे बड़े हो जाते हैं और पूरा पत्ता सूख जाता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए बाविस्टिन 0.1 % की स्प्रे 20 दिनों के अंतराल पर और डाइथेन एम-45 0.2 % की 3 स्प्रे 10-12 दिनों के अंतराल पर करें।

पत्ते का झुलस रोग: इस बीमारी के कारण पत्ते के शिखर और किनारों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इस बीमारी से पकने से पहले ही पत्ते मर जाते हैं। इस बीमारी से बचाव के लिए 10-12 दिनों के अंतराल पर डाइथेन Z-78 @0.2% की स्प्रे करें या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.3 % की स्प्रे करें।

कुंगी: इस बीमारी के कारण पत्ते की निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे अच्छे से दिखाई देते हैं जिसके बीच में पीले रंग के धब्बे होते हैं। इस बीमारी को रोकने के लिए डाइथेन 0.2 % या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.3 % या प्लांटवैक्स 0.1 % की 10-12 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें।

पत्तों का छोटापन : इसके कारण पौधे की ऊंचाई छोटी रह जाती है और पत्ते भी छोटे आकार के होते हैं।इस बीमारी के खतरे को कम करने के लिए डाइथेन Z-78  की फूल आने से पहले 10-12 दिनों के अंतराल पर स्प्रे करें।

फसल की कटाई
रोपाई के 4-6 महीने बाद पौधा उपज देना शुरू कर देता है। कटाई 60-70 दिनों के अंतराल पर करें। कटाई के लिए दराती का प्रयोग करें। कटाई मई के शुरू में और जनवरी के आखिर में करें। कटाई के लिए दराती की सहायता से ज़मीन की सतह से 10-15 सैं.मी. घास की कटाई करें।

कटाई के बाद
कटाई के बाद तेल निकालने की प्रक्रिया की जाती है। तेल निकालने से पहले लैमन घास को सोडियम क्लोराइड के घोल में 24 घंटे के लिए रखें इससे फसल में खट्टेपन की मात्रा बढ़ती है। उसके बाद घास को छांव में रखे और बैग में पैक करके स्थानीय बाजारों में भेज दें। पकी हुई लैमन घास से कई तरह के उत्पाद जैसे लैमन घास तेल और लैमन घास लोशन बनाए जाते हैं।

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