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वैज्ञानिक अन्धविश्वास बनाम धार्मिक अन्धविश्वास

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अक्सर किसी तथ्य को लेकर विज्ञान और आध्यात्म आमने सामने होते हैं लेकिन ऐसी किसी परिस्थिति में  विज्ञान को ही पूर्ण सत्य मानना भी एक प्रकार का अन्ध विश्वास है । विज्ञान सामयिक विश्लेषण है अंतिम सत्य नहीं ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार अन्ध विश्वास एक सामयिक भ्रम हो सकता है पर निश्चित रूप से असत्य नहीं । “टालेमी” के सिद्धान्त किसी समय खगोल विद्या के अंतिम सत्य माने थे पर आज के ब्रह्माण्ड वैज्ञानिकों एवं अत्याधुनिक वेधशालाओं ने उसे झूठा साबित कर दिया है । आज तो स्थिति ये है कि जहाँ कहीं विज्ञान की पुस्तकों में “डाल्टन की एटामिक थ्योरी” पढ़ाते समय बेचारे विज्ञान के लेक्चरार भी अनुभव करते हैं कि हम विद्यार्थियों को एक खण्डित हो गया सिद्धान्त केवल इसी लिये पढ़ाते हैं कि वह इस पाठ्यक्रम में शामिल है । परमाणु अब सबसे छोटा ज्ञात कण नहीं रह गया बल्कि यह सिद्धान्त अब उससे कहीं आगे निकल चुका है ।पदार्थ विज्ञान अब पार्टिकल एंड एण्टी पार्टिकल के सिद्धान्त तक जा पहुँचा है । जेनेवा की लार्ज हेड्रोंन कोलाईडर (Large Hadron Collider) नित नयी संभावनाएं प्रस्तुत कर रही है ।फिर भी अगर वही पुरानी पढ़ाई विज्ञान के पाठ्यक्रम में पढाई जाए तो उसे वैज्ञानिक अंधविश्वास नहीं कहा जायेगा तो क्या कहा जायेगा ।

जीव विकास शास्त्री मनुष्य को एक कोशीय जीव से विकसित जन्तु मानते हैं । “दि ओल्ड राइडिल एण्ड दि न्यूएस्ट एन्सर” पुस्तक के पेज 64 में डॉ॰ जे हक्सले ने कुछ अस्थिपंजरों द्वारा सिद्ध किया है कि यह घोड़े के जातियों वाले मनुष्य के पूर्वज है । उसकी यह प्रतिस्थपना ही मनुष्य के विकास का सिद्धांत बन गया । और उसके बाद सर डासन ने एक पुस्तक लिखी “मार्डन आइडिया आफ इवोलेशन” नामक इस पुस्तक के पेज नंबर 116 में उन्होंने प्रमाण देकर हक्सले के सिद्धांत को गलत सिद्ध कर दिया । उसे मुख्य धारा के वैज्ञानिकों ने माना भी लेकिन हक्सले का सिद्धान्त अभी भी अपने स्थान पर टिका हुआ है । इससे पता चलता है कि आज का विज्ञान वस्तुतः अन्ध विश्वास से भरा हुआ है और इस कम्युनिस्ट मान्यता पर टिका हुआ है कि सच्चाई कुछ भी हो लेकिन प्रचार इतना अधिक करो कि झूठ भी सच साबित हो जाये । वस्तुतः यही आज हमें चारो तरफ देखने को मिल रहा है ।

विख्यात वैज्ञानिक और महान् लेखक डॉ॰ विलियम ली हावर्ड ने एक “रोगमुक्त करने की क्षमता” पर पुस्तक लिखी जिसमे उन्होंने ऐलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान को-अन्धा-बहरा-लूला और लंगड़ा बनाने वाला लिखा । उन्होंने जोर दे कर इस तथ्य को लिखा कि ये औषधियां सन्देशवाहक तंत्रिकाओं तथा उनके प्रमुख स्टेशनों को नष्ट कर डालती है । प्रमाण स्वरुप उन्होंने उसके सैकड़ों उदाहरण देकर इस दावे को सिद्ध भी किया । “एनसाइक्लोपीडिया अमेरिकाना” कि लेखक डॉ॰ ओस्लर ने भी एलोपैथी के सिद्धांतों का खंडन करते हुये लिखा है कि रोग को औषधियां नहीं उपवास, व्यायाम, स्नान मालिश आदि विजातीय द्रव्य हटाने वाले साधन ही ठीक करते हैं फिर भी इसे आज का बुद्धिवादी अन्ध विश्वास ही कहना चाहिये कि दिनों दिन उसी हानिकारक चिकित्सा पद्धति पर लोगों का विश्वास बढ़ता चला जा रहा है ।

आज के इस अन्ध विश्वास को, जिसने सभ्यता का रूप ले लिया उस पर हँसी आती है, उधर प्राचीन अंधविश्वासों के पीछे खड़ा सत्य व्यक्त होने के लिये रो रहा है । इस धमा चौकड़ी में अंतिम विजय किसकी होगी यह निश्चित करना आज के युग के विद्वानों पर है वही इस समस्या का कुछ समाधान प्रस्तुत करेंगे अन्यथा वैज्ञानिक अन्ध विश्वास, धार्मिक अन्ध विश्वास से कही अधिक पतन और संकट का कारण हो सकता है ।




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क्या पृथ्वी के ध्रुवों पर प्रकट होने वाली ध्रुव प्रभा ही दूसरे लोकों में जाने का रास्ता है

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वर्तमान समय में वैज्ञानिकों ने लगभग यह मान लिया है कि पृथ्वी स्वयं एक प्रकार की चुम्बक है । पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव, उसका उत्तरी सिरा और उसका दक्षिणी ध्रुव, दक्षिणी सिरा दोनों उसके दो शक्तिशाली केन्द्रित स्थान है । वैज्ञानिकों के लिए यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं कि पृथ्वी ही नहीं बल्कि सूर्य भी एक चुम्बक की तरह व्यवहार करता है, और यदि यहाँ पर यह कहा जाये कि मनुष्य या उसकी जीवन-शक्ति भी एक प्रकार का विद्युत चुम्बकीय शक्ति ही है तो शायद कुछ गलत नहीं होगा । सूर्य के 11 वर्षीय चक्र में जब सूर्य कलंकों (Sun Spots) की तीव्रता अत्यधिक होती है और पृथ्वी पर चुम्बकीय आँधियाँ आने लगती हैं तो मनुष्य जीवन उससे बुरी तरह प्रभावित होता है ।

डॉ. क्रिट्ज आदि वैज्ञानिकों ने अनेक परीक्षणों से यह सिद्ध किया है कि विद्युत-चुम्बकीय आँधियों के समय जन्तु-जगत अपना सारा मानसिक सन्तुलन खो देता है जो इस बात का द्योतक है कि सूर्य के, जीवन या विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र में हलचल के साथ पृथ्वी के जीवन या विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र में हलचल शुरू हो जाती है । अगर हम बात करें कुण्डलिनी शक्ति के विज्ञान की तो इसके अंतर्गत पूरी सुषुम्ना नाड़ी को अत्यधिक प्रचण्ड क्षमता वाला चुम्बक माना गया है जिसका उत्तरी सिरा मस्तिष्क के ऊपरी भाग में स्थित “सहस्रार चक्र” है और दक्षिणी सिरा गुदा द्वार पर स्थित मूलाधार चक्र है

नाभि को सूर्य-चक्र का स्थान माना जाता है | मूलाधार चक्र पृथ्वी का प्रत्निधित्व करता है, जो स्थिति ब्रह्मांड में सूर्य के साथ पृथ्वी की, अर्थात् 23 डिग्री झुकी हुई, है वही स्थिति नाभि के साथ मूलाधार चक्र की है । जिस प्रकार से सूर्य में हीलियम, और हाइड्रोजन के संलयन से अपार ऊर्जा उत्पन्न होती है उसी प्रकार से मूलाधार चक्र स्थित त्रिकोण तत्व ही नाभि (सूर्य-चक्र) से प्राप्त ऊर्जा को विद्युत चुम्बकीय रूप “प्रेरणा” या जीवन शक्ति के रूप में बदलता रहता है ।

जब तक मूलाधार स्थित प्रचंड शक्ति सोई रहती है, वहां स्थित ‘जनरेटर’ से काम या सांसारिक इच्छाओं और भोगों की पूर्ती का ही क्रिया-व्यापार चलता रहता है और मनुष्य अधोगामी स्थिति में बना रहता है | लेकिन यदि वहां स्थित उस प्रचंड शक्ति को विभिन्न योग साधनाओं द्वारा कम्पित करके ऊर्ध्वमुखी कर लिया जाता है तो सुषुम्ना प्रवाह के अन्दर के दिव्य तन्तु उत्तेजित और क्रियाशील हो उठते हैं, जिससे कुण्डलिनी के सहस्रार में मिलन की क्रिया सम्पन्न होती है । यह अवस्था दिव्य ईश्वरीय शक्तियों से संपर्क एवं अनुभूति की होती है, साथ ही साथ ऊर्ध्वमुखी लोकों के प्राप्ति का साधन भी । मानवीय प्राण-शक्ति जो कि एक प्रकार की विद्युत-चुम्बकीय शक्ति होती है उसे यदि यौगिक क्रियाओं जैसे प्राणायाम और ध्यान साधनाओं द्वारा नियन्त्रित कर लिया जाये तो सूर्य की उत्तरायण अवस्था में, जबकि पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव सक्रिय होता है, वहाँ से निसृत होने वाली एक प्रचंड विद्युतचुम्बकीय रेखा द्वारा ब्रह्माण्ड के ऊर्ध्व लोकों में गमन किया जा सकता है ।


पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से अन्तरिक्ष के कुछ विशेष ग्रह या नक्षत्रों का सम्बन्ध होता है, इस बात को अब विज्ञान भी मानता है । यह तथ्य जिन वैज्ञानिक धारणाओं पर आधारित है उनका वर्णन, अमेरिका के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक ‘दी ग्रोलिएर’ (The Grolier) द्वारा प्रकाशित पुस्तक श्रृंखला ‘दि बुक ऑफ पापुलर साइंस’ (The Book of Popular Science) के सातवें भाग में किया गया है । ये सारी पुस्तकें Internet पर उपलब्ध हैं | एक बार इन्हें जरूर पढ़ना चाहिए | इस पुस्तक में पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र और सूर्य की प्रचंड ऊर्जा के कारणों द्वारा, पृथ्वी के दोनों ध्रुवों में एक ‘ध्रुव-प्रभा’ के निर्माण का रोमाँचकारी वर्णन दिया हुआ है । इन ध्रुव प्रभाओं (अरोरल-लाइट) के बारे में आज का आधुनिक विज्ञान जितना जान सका है वहां तक वो सनातन धर्म के ग्रन्थ कौषीतकी ब्राह्मणोपनिषद् के महान् ज्ञान की पुष्टि ही करता है ।

इस पुस्तक में बताया गया है कि किस प्रकार से पृथ्वी के दोनों ध्रुवों पर प्रचण्ड चुम्बकीय विक्षोभ होने के कारण पृथ्वी के उस क्षेत्र में न केवल आकस्मिक परिवर्तन उत्पन्न होते रहते हैं बल्कि आविष्ट कारणों की उपस्थिति में वहां चित्र-विचित्र प्रकार की रश्मियों को उत्पन्न करने वाले प्रकाश भी पैदा होते रहते हैं । इस प्रकाश प्रभा को उत्तर में “अरोरा बोरीयेलिस” तथा दक्षिण में “अरोरा आस्ट्रेलिया” कहते हैं । इसका उद्गम बिलकुल ध्रुवीय प्रदेश में ही होता है और इनकी उत्पत्ति का स्रोत भी, सूर्य व चन्द्रमा को माना गया है । मन को भारतीय दर्शन में चन्द्रमा से और प्राण को सूर्य से संबोधित किया गया है इससे प्रतीत होता है कि मनुष्य की जीवन शक्ति और ध्रुव-प्रभा की रासायनिक बनावट में कोई बड़ा अन्तर नहीं है ।

ध्रुव प्रभा, आकृति और चमक में एक दूसरे से नितांत अलग अलग देखी गई है । अचानक ही वे स्वर्ग में, सुदूर अन्तरिक्ष में चमकदार प्रकाश फैला देती है और अचानक अपने आप को समेट लेती हैं । इनकी गति आश्चर्यजनक और शीघ्र चलित होती हैं जिससे उनकी आकृति और सघनता में अद्भुत परिवर्तन देखे गये हैं । यदि इस प्राण प्रवाह में बहते हुए किसी मनुष्य को कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में वर्णित विराट् आकाश गंगाओं के नदी रूप में, निहारिका के बादल रूप में तथा अनेक ग्रह-नक्षत्रों के दृश्य विलक्षण रूप से दिखाई दिये हों तो इसमें आश्चर्य ही क्या ? उत्तरायण मार्ग को स्वर्गारोहण (या ऊर्ध्व लोकों में गमन) और दक्षिणायन को अधो लोकों में ले जाने वाला कहा गया है । इन बातों की पुष्टि इस बात से भी हो जाती है कि दक्षिणी ध्रुव की प्रभायें कुछ ही दूर जाकर अन्धकार मय हो गई देखी गई है । जबकि उत्तरी-ध्रुव की प्रभायें जितनी ऊपर बढ़ती है उतनी और भी दिव्य होती चली जाती हैं ।

गहन अध्ययन और शोध कार्यों ने यह सिद्ध कर दिया है कि ध्रुव प्रभा की उत्पत्ति का कारण सूर्य पर घटित होने वाली हलचल ही हैं । हाँलाकि यह ध्रुव प्रभायें कभी-कभी दिखाई देती हैं । स्पेन में एक वर्ष में एक बार, फ्राँस के उत्तरी भाग में एक वर्ष में 5 बार, लन्दन में एक वर्ष में 6 बार, उत्तरी आयरलैण्ड में एक वर्ष में तीन बार और उत्तरी संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, कैनेडा तथा फेरो आइलैंड (Faroe Island) में क्रमशः 6, 8 और 12 बार दिखाई देती है । यह ध्रुव प्रभाएँ वह होती है जो खुली आँख से देखी जा सकती हैं । लेकिन बाद में डॉ. बी.एम. स्लीफर ने लावेल वेधशाला में लगे स्पेक्ट्रम परीक्षण द्वारा यह सिद्ध कर दिया कि ध्रुव प्रभायें मन्द रूप में हमेशा, सतत् अविच्छिन्न रूप से पाई जाती है । साँप की तरह से लहराती हुई चलने वाली इन प्रकाश लहरियों के बारे में विज्ञान जितना ही खोज करता जा रहा है, उतने ही आश्चर्य जनक परिणाम सामने आते जा रहें हैं ।

अगर इन शोध कार्यों में भारतीय तत्व दर्शन को भी सम्मिलित कर लिया जाता तो न केवल आध्यात्मिक मान्यताओं को बल मिलता बल्कि अन्तरिक्ष और ब्रह्माण्ड के अनेक अप्रकट रहस्यों का भी पता लगाना सम्भव हो जाता । यद्यपि मन्द प्रकाश पुंज विस्तार में कम होते हैं लेकिन ठीक ध्रुव पर उनमें स्थायित्व के साथ-साथ चमक और चौंध भी बहुत तीव्र होती है । उसकी शक्ति और ऊर्जा के आगे सामान्य यन्त्र भी काम नहीं कर पाते । एक बार उस क्षेत्र में एक जहाज जा रहा था ।  आश्चर्यजनक रूप से वहां की चुम्बकीय शक्ति की प्रचण्डता के कारण जहाज में लगी लोहे की कीलें और छड़ें निकल-निकल कर भागी और जहाज वहीं चूर-चूर हो गया तब से उधर जाने वाले जहाजों में एक विशेष प्रकार की धातुओं का प्रयोग किया जाता है ।

इसी प्रकार इस विद्युत चुम्बकीय शक्ति में “प्राण-तत्व” को प्रवाहित कर जीवात्मा को ऊर्ध्वगामी बनाने एवं स्वर्ग पहुँचाने की बात सत्य हो सकती है । उसी के लिए तो पितामह भीष्म को भी शर-शैय्या पर लेटे रहना पड़ा था । बाणों में लेटने का अर्थ उनकी इस निष्ठा से था कि कहीं सूर्य की गति उत्तरायण होने से पहले ही उनका मन सांसारिक इच्छाओं में भ्रमित न हो जायें ।

इच्छायें जीवनी-शक्ति का विक्षोभ होती हैं इसलिये जब तक मन निष्काम न हो वह प्राणों के संकल्प को किसी विशेष दिशा में नहीं ले जा सकता इसलिए मृत्यु के समय प्राणों को शुद्ध करने की क्रियायें पहले से ही निर्धारित कर दी गई हैं गीता में उनका उल्लेख भी है । अक्सर ध्रुव-प्रभा श्वेत दूधिया रंग की होती है । वहाँ दृश्य ऐसा होता है कि बादलों में और इनमें अंतर पता करना कठिन हो जाता है । कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में भी इन्हें बादल ही कहा गया है । ध्रुव-प्रभा, जो कि विद्युतचुम्बकीय विकिरण है, फैलती और सिकुड़ती रहती है । प्रकाश इसमें विभिन्न खण्डों में बहता है। इसमें तीव्र गतिमान परिवर्तन भी वैज्ञानिकों ने नोट किये हैं । शेट लैण्ड आइलैंड (Shetland Island) के वैज्ञानिक इन्हें मेरी डासरस कहते हैं और कैनेडा (Canada) वाले इन्हें मेरीयोनेट कहते हैं । उनका विश्वास है कि इन प्रकाश-पुंजों के प्रवाह में अद्भुत ईश्वरीय नियम उपस्थित हो सकते हैं । इनमें श्वेत, पीले और गुलाबी रंग की प्रभाओं की तरंगो के अतिरिक्त यहाँ “शब्दों” के कम्पन भी अंकित किये गये हैं । 

यहाँ की रंगीन किरणें कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् में वर्णित विभिन्न प्रकार के दृश्य और श्रव्य की अनुभूतियों की समानार्थी उपलब्धियाँ हैं । हाइड्रोजन कणों की उपस्थिति से अनिवार्य सूर्य-हस्तक्षेप का पता चलता है । समाधिवस्था में ब्रह्मरन्ध्र में स्थित इन्ही विभिन्न ध्वनियों के विभिन्न लोक-लोकान्तरों की अनुभूतियाँ होती है । यह ठीक आधुनिक क्वांटम विज्ञान के समान ही है । कालान्तर में वैज्ञानिक इन्हीं तथ्यों पर आने वाले हैं और अगर इस ब्रह्माण्ड में मनुष्य जाति के विकास तथा उत्पत्ति सम्बन्धी जानकारियों में इसका वैज्ञानिक प्रयोग करेंगे तो यह निश्चित हैं कि विज्ञान के कई क्षेत्रों की प्राप्त उपलब्धियों में उन्हें बड़े परिवर्तन करने पड़ सकते हैं । 










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सूर्योदय के समय उसकी तरफ पीठ करके बैठने के फायदे

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अभी बहुत समय नहीं बीता है, हमारे देश के वाराणसी जिले में एक प्रसिद्ध तपस्वी हुआ करते थे जिनका नाम था स्वामी विशुद्धानंद जी। ऐसा कहा जाता है कि अपने कई वर्षों के तप और परिश्रम के बल पर उन्होंने एक ऐसा सूर्य यंत्र बनाया लिया था कि जिसके सामने यदि किसी मरणासन्न व्यक्ति के शरीर को लेटा दिया जाता था तो कुछ ही समय में उस सूर्य यंत्र से निकलने वाली किरणें, उस व्यक्ति को नया जीवन दे देतीं थीं।

कहने का अर्थ यह है कि जिस किसी ने भी सूर्य की अदभुत शक्ति को पहचाना, उसने लंबे समय तक निरोगी रहकर इस धरती पर अपना जीवन व्यतीत किया। आपको हम यह बताएंगे कि यदि आप नित्य उगते हुये सूर्य की ओर पीठ करके केवल 5 मिनट बैठ जायें तो इसके आपको कौन-कौन से लाभ प्राप्त होंगे ?

आपको जानना चाहिए कि ज्योतिष शास्त्र सूर्य के प्रकाश को सकारात्मक ऊर्जा पाने का प्रमुख स्रोत मानता है। सकारात्मक ऊर्जा वह ऊर्जा है़ जो हमारे तन- मन में स्फूर्ति का संचार कर देती है़। जो हमें पूरे दिन ऊर्जावान बनाये रखती है़।इस लेख में हम इस बात की चर्चा करेंगे कि आप कब और किस प्रकार सूर्य का प्रकाश ग्रहण करें ताकि उसकी किरणों की सकारात्मक ऊर्जा का लाभ आपको प्राप्त हो सकें।

यह तो हम सभी जानते हैं कि जहां सूर्य का प्रकाश है वहीं जीवन है। सूर्य प्रकाश के अभाव में जीवन की कल्पना करना भी व्यर्थ है। आज हम मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में रह रहें हैं। यह कहना च होगा कि हम फ्लैट लाइफ युग में जिंदगी जी रहे हैं। ऐसे में सूर्य के प्रकाश के महत्व की चर्चा करना और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि हमारी जिंदगी कमरों में सिमट कर रह गई है़? हम अपने घर के कमरे से निकलकर ऑफिस के कमरे में पहुंच जाते हैं और हमारे बच्चे भी घरों से निकलकर स्कूल की क्लास में पहुंच जाते हैं, जिसके कारण उन्हें सूर्य की रोशनी में समय बिताने का समय नहीं मिल पाता है।

सूर्योदय के समय सूर्य की तरफ पीठ करके बैठने से होते हैं ढेरों लाभ

कभी भी  का नायाब तरीका। आप उगते हुए सूर्य के समय पश्चिम की तरफ मुंह करके बैठ जाएं। तो ऐसी दशा में सूर्य की सूर्य की रौशनी सामने से नही लेनी चाहिए। नहीं तो फायदे की जगह नुकसान हो सकता है़। यह तो हम सभी जानते ही हैं कि सूर्य की अदभुत रौशनी विटामिन डी का प्रमुख स्रोत है। आइये जानते हैं सूर्य की रौशनी का लाभ लेनेरौशनी हमारी पीठ पर पड़ेगी।

ऐसा केवल 5 मिनट करने मात्र से आपके पूरे शरीर में ऊर्जा का पर्याप्त भंडार भर जाता है, साथ ही ऐसा करने से हमारे शरीर से सारे विषैले तत्व बाहर निकल जाते हैं, जिसके कारण हम सारे दिन ऊर्जा से भरे हुए हुए रहते हैं। सूर्य की रोशनी में केवल 5 मिनट बैठने से हमारी शारीरिक व मानसिक दशा में भी सुधार होता है।

दरअसल सूर्य की ऊष्मा ऐसे मरीजों को ठीक करने में भी सहायक होती है जो टीबी या कैंसर आदि रोगों से ग्रस्त हैं। ऐसे रोगी जो डिप्रेशन के शिकार है उन्हें भी यह अचूक उपाय अवश्य करना चाहिए। क्योंकि सूर्य की रोशनी मन की निराशा को समाप्त कर देती है। उसकी जगह पर सकारात्मक सोच को उत्पन्न करने का काम करती है। इसके कारण हमारे जीवन से नकारात्मकता समाप्त हो जाती है।

जिस घर में सूर्य की रोशनी आती है वहाँ लोग अधिक प्रसन्न रहते हैं

ज्योतिष विज्ञान यह कहता है कि जिन घरों के अंदर सूर्य का पर्याप्त प्रकाश रहता है वहाँ के लोगों का जीवन अधिक खुशहाल रहता है। इसलिए हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए कि हमारे घरों में सूर्य का पर्याप्त प्रकाश हो। सूरज के प्रकाश के अभाव में घर में नकारात्मक ऊर्जा जन्म लेने लगती है। जिसके कारण घर में रहने वाले लोगों में निगेटिव थिंकिंग देखने को मिलती है।

जो उनकी उन्नति में बाधक बनती है। इसलिए हमारे घरों में खिड़कियां- दरवाजे पर्याप्त न हो , जिसके कारण यदि सूर्य के प्रकाश की व्यवस्था कम लग रही हो तो उनमें सुधार करना चाहिए। ताकि घर के हर कमरे तक सूर्य का प्रकाश अंदर तक पहुंच सके। जिससे घर के पूरे वातावरण में खुशहाली भर उठे।

सूर्य की किरणों से गर्म किए जल से स्नान करने से लाभ

यदि आप सुबह की रौशनी में एक बाल्टी पानी भरकर प्रकाश में रख दे और उसे ऐसी स्थिति में 1 घंटे तक बने रहने दे, तो यह जल आपके लिए अमृत के समान बन जाता है़। सूर्य की ऊष्मा से होने वाले गुनगुने जल से स्नान करने पर आपके तन -मन में ताजगी भर जायेगी। साथ ही यह आपके समस्त त्वचा संबंधी रोगों का नाश कर देगा। यह जल आपके ग्रह दोषों को भी समाप्त करता है़ और समाज में यश दिलाता है़।

सूर्य की रौशनी में पूजा-पाठ करने से मिलती है़ दैवीय कृपा
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि आप सूर्य की रौशनी में बैठकर हनुमान चालीसा, गायत्री मंत्री अथवा आदित्य हृदय स्रोत आदि का पाठ करते हैं तो ऐसी दशा में आपको देवी -देवताओं से शीघ्र कृपा मिलने का लाभ प्राप्त होने लगता है। जिसके कारण आपको अपने हर काम में सफलता मिलने लगती है। साथ ही आपका स्वास्थ्य अच्छा से अच्छा होता जाता है। इसलिए सुबह जल्दी उठकर शौच- स्नानादि करने से निवृत होकर साफ-सुथरे कपड़े पहनकर, सूर्य के प्रकाश में सच्चे मन से प्रभु का स्मरण करना चाहिए।

रसोई घर में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति भोजन को अमृत के समान बनाती है़
यदि आपके रसोई घर में सूर्य के प्रकाश का पूरा इंतजाम है तो निश्चित रूप से ऐसी स्थिति में में रसोई में बनने वाला भोजन घर के सदस्यों के लिए अमृत तुल्य होता है। इसलिए आप अपने घर के किचेन के लिए ऐसे स्थान का प्लान करें जहां पर दिन में लाइट न जलाना पड़े।

दिन में लाइट जलाना देती है अनेकों परेशानियां
यदि आपके घर में सूर्य का प्रकाश नहीं आता है तो निश्चित रूप से आपको रौशनी के लिए विद्युत बल्ब का सहारा लेना होता है जो वैज्ञानिक, ज्योतिष एवं वास्तु किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है। क्योंकि यह प्रकाश आपके घर में नकारात्मक ऊर्जा भर देता है। जिसके कारण आपको समय पर मिलने वाली सफलता मिलने में देर होती है।

विद्युत बल्ब की रोशनी में पढ़ने के कारण बच्चों की आंखों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जिसके कारण उन्हें शीघ्र चश्मा लग जाता है। साथ ही कृतिम प्रकाश में पढ़ने से बच्चों के आत्मविकास में कमी आती है़। विज्ञान इस बात को स्पष्ट करता है कि पौधे तक सूर्य के प्रकाश में अपना भोजन बनाते हैं। इसलिए हम सभी को भी सूर्य के प्रकाश की महत्ता को समझना चाहिए। प्रकाश के देवता सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए हर सुबह ओम सूर्याय नमः का जाप करके उन्हें जल अर्पित करना चाहिए, जो हमारे जीवन को उज्जवल बनाने में सहायक होगा। जो हमारे जीवन में नया उजाला भर देगा।



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जानें समुद्र के ऊपर बने रेल पुल के बारे में रोचक तथ्य

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अगर आप को समुद्र पर बने हुए रेलवे पुल के पास एक विशाल जहाज तेज़ी से आता दिखाई दे और लगे कि वो पुल से टकराने जा रहा है तो आप क्या करेंगे? शायद रूस, जापान, जर्मनी जैसे विकसित देशों में या ऑस्ट्रेलिया के सिडनी हार्बर पर बने प्रसिद्ध पुल के सामने होते तो आपको पता होता कि वह पुल दोनों तरफ से उठ जायेगा और जहाज को जाने कि जगह दे देगा पर भारत में अब तक ऐसा एक भी पुल नहीं है।

जी हाँ, आपको यह जानकर गर्व होगा कि अपने भारत में भी अब एक ऐसा ही पुल ऐसा बनने जा रहा है जिसे वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज कहते हैं, जो जहाज के आने पर अपनी जगह से हट जायेगा और जहाज के चले जाने पर वापस अपनी जगह आ कर फिट हो जायेगा। है ना आश्चर्य की बात, तो चलिए आपको बताते हैं कि ये कमाल का समुद्री रेलवे पुल भारत में कहाँ पर बनने जा रहा है!

कहाँ बन रहा है भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज?

हम बात कर रहे हैं भारत में बंगाल की खाड़ी के किनारे बसे रामेश्वरम धाम को मण्डपम शहर और पम्बन द्वीप से जोड़ने वाले पम्बन रेलवे पुल की जो लगभग 250 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा है। पम्बन द्वीप के समुद्री रास्ते पर पुराने पुल के बेहद आकर्षक नज़ारों का आनंद तो आपने शाहरूख़ ख़ान की हिंदी फिल्म ‘चेन्नई एक्सप्रैस‘ में लिया ही होगा, परंतु वह पुल अब 108 साल पुराना और बहुत जर्जर हो चुका है जिस पर ट्रेनें 10 किलोमीटर प्रति घंटा की धीमी रफ़्तार से रेंगते हुए चलती है।

कैसे काम करते हैं ये वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज?

इस 2 किलोमीटर लंबे पुल पर जैसे ही कोई जहाज पास आएगा, बिल्कुल ट्रैफिक कंट्रोलर की तरह ऑपरेटर उस पुल को लिफ्ट प्रणाली से दोनों तरफ से उठा कर के जहाज को जाने की जगह दे देगा। सोचिए कितना रोमांचक लगेगा ट्रेन में बैठ कर एक पुल को इस तरह दोनों तरफ से उठते हुए देखना और फिर जहाज का उसके अंदर से निकल जाना! जहाज के आते ही पटरियाँ अपने आप ही लिफ्ट की तरह ऊपर चली जायेंगी और जहाज के जाते ही वापस अपनी जगह पर इंटरलॉक हो जायेंगी, जिससे उसके ऊपर से ट्रेन निकल सके। इस पुल को उठाए जाने के बाद एक बार में 2 विशालकाय जहाज़ों को निकालने की जगह होगी और इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ 10 मिनट का ही समय लगेगा।

यह नया पंबन ब्रिज शेजर रोलिंग लिफ्ट तकनीक से बनेगा जो 100 किलोमीटर से भी अधिक तेज़ समुद्री हवाओं को झेलने की क्षमता रखने के साथ ही तेज़ समुद्री तूफानों का भी सामना करने में सक्षम होगा। इस पुल में नयी तकनीक से बने हुए स्टेनलेस स्टील, कम्पोज़िट स्लीपर और एक लंबे समय तक टिकने वाले पेंट की  प्रणाली जैसी इंजीनियरिंग की नई तकनीकें शामिल होंगी।

यह पुल जब बन कर तैयार होगा तो इस में 143 खम्भे लगे होंगे और इसमें दो-पतरों से बना हुआ और इंटरलॉकिंग से जुड़ा एक बैस्क्यूल खंड बना हुआ होगा। इन दोनों खंडों में शेजर रोलिंग लिफ्ट स्पैन होते हैं, जिन्हें जहाजों के आने-जाने के लिए उठाया जा सकता है।

इस तरह की नयी तकनीक वाली सुविधायें किसी भी देश की प्रगति की पहचान और देश का गौरव होतीं हैं। अब तक इस तरह के बेहतरीन नज़ारे सिर्फ विदेशों में ही देखने को मिलते थे, पर अब आप गर्व से मुस्कुरा सकते हैं क्योंकि अब नयी तकनीक का कमाल का ये पुल अब आपके अपने देश में भी है। अब इससे पर्यटकों के लिए और विशेष तौर पर श्रद्धालुओं के लिए रामेश्वरम जाना सुविधाजनक हो जाएगा।

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टेफलोन कोटिंग/नॉन स्टिक बर्तन कैसे घातक हैं हमारे स्वास्थ्य के लिए ?

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 टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों का इतना प्रचार या दुष्प्रचार हुआ कि आजकल हर घर में ये काली कोटिंग वाले बर्तन होना शान की बात समझी जाती है। न जाने कितने ही ये टेफलोन कोटिंग वाले बर्तन हमारे घर में आ गये हैं, जैसे कि नॉन स्टिक तपेली (पतीली), तवा, फ्राई पेन आदि....  अब इजी टू कुक, इजी टू क्लीन वाली छवि वाले ये बर्तन हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गए है।  मुझे आज भी दादी नानी वाला ज़माना याद आ जाता है, जब चमकते हुए बर्तन किसी भी घर के स्टेंडर्ड की निशानी माने जाते थे, लेकिन आजकल उनकी जगह इन काले बर्तनों ने ले ली है। हम सब इन बर्तनों को अपने घर में बहुतायत से उपयोग में ले रहे हैं और शायद कोई बहुत बेहतर विकल्प नहीं मिल जाने तक आगे भी उपयोग करते रहेंगे। किन्तु इनका उपयोग करते समय हम ये बात भूल जाते हैं कि ये काले बर्तन हमारे शरीर को भी काला करके नुकसान पहुंचा रहे हैं। हम में से कई लोग यह बात जानते भी नहीं हैं कि वास्तव में ये बर्तन हमारी बीमारियाँ बढ़ा रहे हैं और इनका प्रयोग करके हम हमारे अपनों को ही तकलीफ दे रहे हैं। टेफलोन को 20 वी शताब्दी की सबसे बेहतरीन केमिकल खोज में से एक माना गया है, जिसका प्रयोग इंजीनियरिंग के क्षेत्र जैसे कि स्पेस सुइट और पाइप में उर्जा रोधी के रूप में किया जा रहा है, किन्तु यह भी एक बड़ा सच है की ये टेफलोन कोटिंग का काला जहर स्वास्थ्य के लिए बना ही नहीं है और अत्यंत खतरनाक है।

इसके प्रयोग से श्वास की बीमारी, कैंसर, ह्रदय रोग आदि कई गंभीर बिमारियां भी होती देखी जा रही हैं। यह भी सच है की जब टेफलोन कोटेड बर्तन को अधिक गर्म किया जाता है, तो आसपास के क्षेत्र में रह रहे पालतू पक्षियों की जान जाने का खतरा तुरंत ही काफी बढ़ जाता है। 
एक न्यूज के अनुसार कुछ समय पहले एक घर के आसपास के 14 पालतू पक्षी तब मारे गए, जब टेफलोन के बर्तन को पहले से गरम किया गया और तेज आंच पर खाना बनाया गया ये पूरी घटना होने में सिर्फ 15 मिनिट लगे....टेफलोन कोटेड बर्तनों में सिर्फ 5 मिनिट में 700 डिग्री टेम्प्रेचर तक गर्म हो जाने की प्रवृति होती है और इसी दौरान 6 तरह की खतरनाक गैस वातावरण में फैल जाती हैं इनमे से 2 गैस ऐसी होती हैं जो केंसर को भी जन्म देती हैं। अध्ययन बताते हैं कि टेफलोन को अधिक गर्म करने से पक्षियों के लिए हानिकारक टेफलोन टोक्सिकोसिस बनती है और इंसानों के लिए खतरनाक पोलिमर फ्यूम फीवर की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है टेफलोन कोटिंग से उत्पन्न होने वाले केमिकल के शरीर में जाने से होने वाली बीमारियाँ इस तरह की होती हैं....
1- पुरुष इनफर्टिलिटी - हाल ही में हुए एक सर्वे में ये बात सामने आई है कि लम्बे समय तक टेफलोन केमिकल के शरीर में जाने से पुरुष इनफर्टिलिटी का खतरा बढ़ जाता है और इससे सम्बंधित कई बीमारियाँ पुरुषों में देखी जा सकती हैं।
थायराइड - हाल ही में एक अमेरिकन एजेंसी द्वारा किया गए अध्ययन में यह बात सामने आई है कि टेफलोन की मात्र लगातार शरीर में जाने से थायराइड ग्रंथि सम्बन्धी समस्याएं हो सकती है।
2- बच्चे को जन्म देने में समस्या - केलिफोर्निया में हुई एक स्टडी में ये पाया गया है कि जिन महिलाओं के शरीर में जल, भोजन या हवा के माध्यम से पी ऍफ़ ओ (टेफलोन) की मात्रा सामान्य से अधिक पाई गई थी, उन्हें बच्चो को जन्म देते समय अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ा. इसी के साथ उनमे बच्चो को जन्म देने की क्षमता भी अपेक्षाकृत कम हो गई, जिससे सीजेरियन ऑपरेशन करना पड़ा।
3- शारीरिक समस्याएं व अन्य बीमारियाँ - पी ऍफ़ ओ की अधिक मात्रा शरीर में पाई जाने वाली महिलाओं के बच्चो पर भी इसका असर जन्मजात शारीरिक विकार या समस्याओं के रूप में देखा गया है ।
4- लीवर केंसर का बढ़ा खतरा - एक अध्ययन में यह भी सामने आया है कि पी ऍफ़ ओ की अधिक मात्रा होने पर लीवर केंसर का खतरा बढ़ जाता है ।
5-केंसर या ब्रेन ट्यूमर का खतरा - एक प्रयोग के दौरान जब चूहों को पी ऍफ़ ओ के इंजेक्शन लगाए गए तो उनमे ब्रेन ट्यूमर विकसित हो गया. साथ ही केंसर के लक्षण भी दिखाई देने लगे। 
6- जहरीला पी ऍफ़ ओ 4 साल तक शरीर में बना रहता है - पी ऍफ़ ओ जब एक बार शरीर के अन्दर चला जाता है तो लगभग 4 साल तक शरीर में बना रहता है जो एक बड़ा खतरा हो जाता है।

■ टेफलोन के दुष्प्रभाव से बचने के उपाय...
1- टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों को कभी भी गैस पर बिना कोई सामान डाले अकेले गर्म करने के लिए न छोड़े।
2- इन बर्तनों को कभी भी 450 डिग्री से अधिक टेम्प्रेचर पर गर्म न करे सामान्यतया इन्हें 350 से 450 डिग्री तक गर्म करना बेहतर होता है।
3- लेकिन हमारे देश में महिलाओं को पता ही नहीं रहता है कि गेस के बर्नर पर रखे बर्तन का टेम्प्रेचर कितना हुआ है, तो वे कंट्रोल कैसे करेंगी???
4-  टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों में पक रहा खाना बनाने के लिए कभी भी मेटल की चम्मचो का इस्तेमाल ना करे इनसे कोटिंग हटने का खतरा बढ़ जाता है।
5- टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों को कभी भी लोहे के औजार या कूंचे ब्रश से साफ़ ना करे, हाथ या स्पंज से ही इन्हें साफ़ करे।
6- इन बर्तनों को कभी भी एक दूसरे के ऊपर जमाकर ना रखे।
7- घर में अगर पालतू पक्षी हैं, तो इन्हें अपने किचन से दूर रखें।
8- अगर गलती से घर में ऐसा कोई बर्तन ज्यादा टेम्प्रेचर पर गर्म हो गया है, तो कुछ देर के लिए घर से बाहर चले जाए और सारे खिड़की दरवाजे खोल दे।
9-  ये गलती बार-बार ना दोहराएं, क्यूंकि चारो ओर के वातावरण के लिए भी ये गैस हानिकारक होती हैं और लाखों सूक्ष्म जीवों को भी मार देती हैं।
10- टूटे या जगह-जगह से घिसे हुए टेफलोन कोटिंग वाले बर्तनों का उपयोग बंद कर दे. क्यूंकि ये धीरे धीरे आपके भोजन में ज़हर घोल सकते हैं।
11- अगर आपके बर्तन नहीं भी घिसे हैं, तो भी इन्हें हर दो साल में अवश्य ही बदल दें।
12- जहाँ तक हो सके इन बर्तनों कम ही प्रयोग करिए।
13- इन छोटी छोटी बातों का ध्यान रखकर आप अपने और अपने परिवार के स्वास्थ को बेहतर बना सकते हैं...टेफलोन कोटिंग के काले जहर से अपने परिवार को बचाएं।

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समयसूचक AM और PM का उदगम का वास्तविक इतिहास

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भारत ही था। पर हमें बचपन से यह रटवाया गया, विश्वास दिलवाया गया कि इन दो शब्दों AM और PM का मतलब होता है :

AM : एंटी मेरिडियन (ante meridian)

PM : पोस्ट मेरिडियन (post meridian)

एंटी यानि पहले, लेकिन किसके? 

पोस्ट यानि बाद में, लेकिन किसके?

यह कभी साफ नहीं किया गया, क्योंकि यह चुराये गये शब्द का लघुतम रूप था।

अध्ययन करने से ज्ञात हुआ और हमारी प्राचीन संस्कृत भाषा ने इस संशय को अपनी आंधियों में उड़ा दिया और अब, सब कुछ साफ-साफ दृष्टिगत है।

कैसे? 

देखिये...

AM = आरोहनम् मार्तण्डस्य Aarohanam Martandasya

PM = पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasya

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सूर्य, जो कि हर आकाशीय गणना का मूल है, उसीको गौण कर दिया। अंग्रेजी के ये शब्द संस्कृत के उस 'मतलब' को नहीं इंगित करते जो कि वास्तव में है। 

आरोहणम् मार्तण्डस्य Arohanam Martandasaya यानि सूर्य का आरोहण (चढ़ाव)।

पतनम् मार्तण्डस्य Patanam Martandasaya यानि सूर्य का ढलाव।

दिन के बारह बजे के पहले सूर्य चढ़ता रहता है - 'आरोहनम मार्तण्डस्य' (AM)।

बारह के बाद सूर्य का अवसान/ ढलाव होता है - 'पतनम मार्तण्डस्य' (PM)।

पश्चिम के प्रभाव में रमे हुए और पश्चिमी शिक्षा पाए कुछ लोगों को भ्रम हुआ कि समस्त वैज्ञानिकता पश्चिम जगत की देन है।


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Google पर क्या चीजे नहीं दिखाई जाती है ?

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इंटरनेट पर मौजूद 10% सर्फेस वेब को ही गूगल दिखाता है इसके अलावा बाकी 90% डीप वेब और डार्क वेब तक गूगल नहीं पहुंचाता । इसके अलावा गूगल क्या नहीं दिखाता-

1- डीप वेब पर लोगों के बैंकिंग डिटेल को गूगल एक्सेस नहीं करता।

2- मेडिकल रिसर्च, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, कानूनी मुकदमों के डिटेल जो कि डीप वेब पर सुरक्षित रहते हैं उन्हें गूगल नहीं दिखाता।

3- किसी कंपनी के अंदरूनी जानकारी या जिस वेब पर उनका प्रतिदिन का कामकाज होता है वहां गूगल नहीं ले जाता।

4- इसके अलावा गूगल अलग अलग देशों के कानून के अनुसार सर्च रिजल्ट पेश करता है , जैसे चाइल्ड पोर्नोग्राफी दुनिया के सभी देशों में प्रतिबंधित है ।

5- मानव तस्करी, ड्रग्स और हथियारों की खरीद फरोख्त, कांट्रेक्ट किलर , जासूसी आदि गलत काम इंटरनेट की काली दुनिया में खुले आम होता है । ऐसी बहुत सी वेबसाइट हैं जिनपर जाकर आसानी से ड्रग्स खरीदें जा सकते हैं इन सब को गूगल एक्सेस नहीं कर सकता ‌‌।

अगर आप भी डार्क वेब की सैर करना चाहते हैं तो टार ब्राउज़र के माध्यम से जा सकते हैं। वहां डक डक गो सर्च इंजन रहता है जो आपको ख़तरनाक वेबसाइटों तक ले जाएगा।

नोट— इन साइटों को सर्च करना खतरनाक है आप हैकर्स के शिकंजे में फंस सकते हैं।

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इस धरती पर मच्छरों का अस्तित्व कब से है, क्या रामायण व महाभारत काल में भी मच्छर थे

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मूल रूप से, मच्छरों का अस्तित्व है क्योंकि वे बाहर पोंछना असंभव के बगल में हैं। प्रजातियाँ एक निर्वात में मौजूद नहीं होती हैं; जब तक वे भोजन पा सकते हैं और उनके खिलाफ पर्यावरणीय दबाव नहीं है, वे जारी रखेंगे। मच्छर एक प्रजाति के रूप में लाखों साल पुराने हैं। पारिस्थितिक तंत्र में, वे अन्य प्रजातियों (पक्षियों, मेंढक, और मछली) के लिए भोजन और परागणकों के रूप में सेवा करते हैं। लार्वा पानी को साफ करने में मदद करता है, इसे साफ करने में मदद करता है। मच्छरों की 3,000 से अधिक प्रजातियां हैं, लेकिन केवल लगभग 200 काटने वाले मनुष्य हैं। यह हम सभी जानते है कि  मच्छर इंसान के जीवन में आने वाला शायद एकमात्र ऐसा जीव है जो उसके जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत उसके आसपास बना रहता है। यह तो हम सभी जानते हैं कि मच्छर गंदगी से पैदा होते हैं। परन्तु यहाँ प्रश्न यह है कि पृथ्वी पर मच्छरों का अस्तित्व कब से है। क्या रामायण काल या महाभारत काल में  भी मच्छर हुआ करते थे। 

क्या रामायण व महाभारत काल में भी मच्छर का अस्तित्वा था ? 

इस घटना के बारे में त्रेता युग में महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा के प्रथम महाकाव्य रामायण में इसका उल्लेख विस्तार से किया है। और तुलसी दास  रामचरित मानस  के पाचवें कांड (सुंदरकांड) के भाग 1  चतुर्थ पद में इसका वर्णन किया है - ("माता सीता की खोज मे हनुमान का लंका प्रस्थान" मे मसक (मच्छर) का जिक्र किया गया है। महर्षि वाल्मीकि व रामचरित के रचियता तुलसीदास ने लिखा है कि :-

चौपाई
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।

पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

दोहा/सोरठा
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

भावार्थ— हनुमान्‌ जी मच्छर के समान (छोटा सा) रूप धारण कर नर रूप से लीला करने वाले भगवान्‌ श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके लंका को चले (लंका के द्वार पर) लंकिनी नाम की एक राक्षसी रहती थी। वह बोली- मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है ?॥1॥

हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना जहाँ तक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्‌जी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खून की उलटी करती हुई पृथ्वी पर ल़ुढक पड़ी ॥2॥

वह लंकिनी फिर अपने को संभालकर उठी और डर के मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। (वह बोली-) रावण को जब ब्रह्माजी ने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसों के विनाश की यह पहचान बता दी थी कि ॥3॥

जब तू बंदर के मारने से व्याकुल हो जाए, तब तू राक्षसों का संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं श्री रामचंद्रजी के दूत (आप) को नेत्रों से देख पाई ॥4॥

हे तात! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पलड़े में रखा जाए, तो भी वे सब मिलकर (दूसरे पलड़े पर रखे हुए) उस सुख के बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण) मात्र के सत्संग से होता है॥4॥

पृथ्वी पर मच्छरों का अस्तित्व कब से है 

जैसा कि हम ऊपर पढ़ चुके हैं कि त्रेता युग में महर्षि वाल्मीकि ने संस्कृत के महाकाव्य रामायण में मच्छर का उल्लेख किया है। और तुलसीदास ने भी रामचरित मानस के पाचवें कांड (सुंदरकांड) के भाग 1  चतुर्थ पद में इसका वर्णन किया है - ("माता सीता की खोज मे हनुमान का लंका प्रस्थान" मे मसक (मच्छर) का जिक्र किया गया है। इसका अर्थ यह हुआ कि त्रेता युग में भी मच्छरों का अस्तित्व था। उसके बाद भगवान श्री कृष्ण अवतार का द्वापर युग आया और अब इस समय कलयुग चल रहा है। यदि हिंदू धर्म शास्त्रों में की गई गणना के अनुसार देखे तो त्रेता युग में 1296000 सौर वर्ष थे और द्वापर युग में 864000 सौर वर्ष थे। यदि कलयुग के वर्ष को शामिल न किया जाए तब भी यह करीब-करीब 21 लाख 4 वर्षों से मच्छरो का अस्तित्वा इस पृथ्वी पर है।   

मच्छरों के बारे में 16 दिलचस्प तथ्य

मच्छरों , जो कीड़े सार्वभौमिक रूप से दुनिया से नफरत करते हैं। इन pesky, रोग ले जाने वाले कीटों में से कुछ भी, जो हमारे सहित चलता है, के बारे में खून चूसकर जीवन बनाते हैं। लेकिन मच्छर के दृष्टिकोण से चीजों को देखने के लिए एक क्षण ले लो। मच्छर वास्तव में दिलचस्प प्राणी हैं।

मच्छर पृथ्वी पर सबसे घातक जानवर हैं

उस सप्ताह ले लो, शार्क सप्ताह! ग्रह पर किसी भी अन्य जानवर की तुलना में अधिक मौतें मच्छरों से जुड़ी हैं। मच्छरों से मलेरिया, डेंगू बुखार, पीला बुखार, जीका और इंसेफेलाइटिस सहित कई जानलेवा बीमारियां हो सकती हैं । मच्छर हार्टवॉर्म भी करते हैं, जो आपके कुत्ते के लिए घातक हो सकता है।

मच्छर कब तक जीते हैं?

एक वयस्क मच्छर 5 से 6 महीने तक जीवित रह सकता है। कुछ शायद यह है कि लंबे समय तक, हमारी प्रवृत्ति को देखते हुए उन्हें चुपचाप थप्पड़ मारा जब वे हम पर उतरते हैं। लेकिन सही परिस्थितियों में, एक वयस्क मच्छर में काफी लंबी जीवन प्रत्याशा होती है, जैसे कि कीड़े जाते हैं। अधिकांश वयस्क मादा दो से तीन सप्ताह तक जीवित रहती हैं। अपने गैरेज में उन सर्दियों के लिए, हालांकि - बाहर देखो। अंडे आठ महीने तक सूख सकते हैं और फिर भी हैच हो सकते हैं।

मादाएं मनुष्य को काटती हैं जबकि नर अमृत पर भोजन करते हैं

मच्छरों का मतलब व्यक्तिगत कुछ भी नहीं है जब वे आपका खून लेते हैं। मादा मच्छरों को अपने अंडों के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है और प्रजनन के लिए उन्हें रक्त का भोजन लेना चाहिए। क्योंकि पुरुष युवा पैदा करने का भार नहीं उठाते हैं, वे आपसे पूरी तरह से बचेंगे और फूलों के बदले सिर लेंगे। जब अंडे का उत्पादन करने की कोशिश नहीं की जाती है, तो महिलाएं अमृत से चिपककर खुश होती हैं।

कुछ मच्छर इंसानों को काटने से बचते हैं

मच्छरों की सभी प्रजातियाँ लोगों पर नहीं होती हैं। कुछ मच्छर अन्य जानवरों पर विशेषज्ञ होते हैं और हमें बिल्कुल भी परेशान नहीं करते हैं। उदाहरण के लिए, कुलीसेटा मेलानुरा पक्षियों को लगभग विशेष रूप से और शायद ही कभी मनुष्यों को काटता है। एक और मच्छर प्रजाति,  यूरेनोटेनिया सैफिरिना , सरीसृप और उभयचरों को खिलाने के लिए जाना जाता है।

मच्छर धीरे-धीरे उड़ते हैं
मच्छरों की औसत उड़ान 1 से 1.5 मील प्रति घंटा होती है। यदि सभी उड़ने वाले कीड़ों के बीच एक दौड़ आयोजित की जाती, तो लगभग हर दूसरा प्रतियोगी पोके मच्छर को हरा देता। तितलियों, टिड्डियों, और मधुमक्खियों के छत्ते के आगे सब ठीक हो जाएगा।

एक मच्छर की पंख प्रति सेकंड 300-600 बार हराया
यह समझाता है कि चिड़चिड़ाहट भरी ध्वनि आप पर और मच्छरों के काटने से ठीक पहले सुनाई देती है।

मच्छर उनकी विंग बीट्स को सिंक्रोनाइज़ करते हैं
वैज्ञानिकों ने एक बार सोचा था कि केवल पुरुष मच्छर ही अपने संभावित साथियों की पंखों की धड़कन सुन सकते हैं, लेकिन एडीज एजिप्टी मच्छरों पर किए गए हालिया शोध ने साबित किया कि महिलाएं प्रेमियों के लिए भी सुनती हैं। जब नर और मादा मिलते हैं, तो उनके भिनभिनाने की गति समान होती है।

नमक मार्श मच्छरों को दूर कर सकते हैं 100 मील दूर
अधिकांश मच्छर अपने पानी के प्रजनन के मैदान से निकलते हैं और घर के बहुत करीब रहते हैं। लेकिन कुछ, नमक मार्श मच्छरों की तरह, रहने के लिए उपयुक्त स्थान खोजने के लिए लंबी दूरी की उड़ान भरेंगे, वे सभी अमृत और रक्त के साथ जो वे पीना चाहते थे।

सभी मच्छरों को नस्ल के लिए पानी चाहिए - लेकिन ज्यादा नहीं
बस कुछ इंच पानी एक मादा को अपने अंडे जमा करने में लगता है। टाइनी मच्छर का लार्वा बर्डबैथ, रूफ गटर, और पुराने टायरों में खाली जगह में जल्दी विकसित होता है। कुछ प्रजातियाँ बारिश के मौसम के बाद बचे हुए पोखरों में प्रजनन कर सकती हैं। यदि आप अपने घर के आसपास मच्छरों को नियंत्रण में रखना चाहते हैं, तो आपको हर कुछ दिनों में किसी भी खड़े पानी को डंप करने के बारे में सतर्क रहने की आवश्यकता है ।

अधिकांश मच्छर केवल 2-3 मील की यात्रा कर सकते हैं
आपके मच्छर मूल रूप से आपकी (और आपके पड़ोसियों की) समस्या हैं। एशियाई टाइगर मच्छर जैसी कुछ किस्में केवल 100 गज की दूरी पर उड़ सकती हैं।

मच्छर CO2 75 फीट दूर का पता लगाते हैं
कार्बन डाइऑक्साइड, जो मनुष्य और अन्य जानवर पैदा करते हैं, मच्छरों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है कि एक संभावित रक्त भोजन निकट है। उन्होंने हवा में CO2 के प्रति गहरी संवेदनशीलता विकसित की है । एक बार जब एक महिला आसपास के क्षेत्र में सीओ 2 को होश में लेती है, तो वह सीओ 2 प्लम के माध्यम से आगे और पीछे उड़ती है जब तक कि वह अपने शिकार का पता नहीं लगाती है ।

बग जैपर मच्छरों को आकर्षित नहीं करते हैं
बग जैपर प्रकाश को छोड़ देते हैं जो गनट्स, बीटल्स, पतंगे और इस तरह आकर्षित करते हैं, लेकिन क्योंकि मच्छरों को CO2 द्वारा आकर्षित किया जाता है, वे मच्छरों को मारने में प्रभावी नहीं हैं । वे संभवतः अधिक लाभकारी कीटों को मारते हैं और जो मच्छरों की तुलना में गीतकारों द्वारा खाया जाता है। यहां तक ​​कि वे परजीवी ततैया भी निकालते हैं, जो अन्य प्रजातियों को नियंत्रित करती हैं।

आप मच्छरों को कैसे मारते हैं?
फोगर मशीनें जो सीओ 2 के साथ मच्छरों को आकर्षित करती हैं और फिर उन्हें फँसाने का काम करती हैं, लेकिन आपके यार्ड और स्वयं के लिए repellants जाने का सबसे आसान और सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है।

मच्छर क्यों होते हैं?
मूल रूप से, मच्छरों का अस्तित्व है क्योंकि वे बाहर पोंछना असंभव के बगल में हैं। प्रजातियाँ एक निर्वात में मौजूद नहीं होती हैं; जब तक वे भोजन पा सकते हैं और उनके खिलाफ पर्यावरणीय दबाव नहीं है, वे जारी रखेंगे। मच्छर एक प्रजाति के रूप में लाखों साल पुराने हैं। पारिस्थितिक तंत्र में, वे अन्य प्रजातियों (पक्षियों, मेंढक, और मछली) के लिए भोजन और परागणकों के रूप में सेवा करते हैं। लार्वा पानी को साफ करने में मदद करता है, इसे साफ करने में मदद करता है। मच्छरों की 3,000 से अधिक प्रजातियां हैं, लेकिन केवल लगभग 200 काटने वाले मनुष्य हैं।

मच्छर की लार से एलर्जी हर किसी को नहीं होती है
मच्छर की लार, जो त्वचा में ग्लाइड करने के लिए सूंड को चिकनाई देती है, आपकी त्वचा पर खुजली और टक्कर के लिए जिम्मेदार है, लेकिन हर किसी को मच्छर की लार से एलर्जी नहीं होती है। कुछ लोग काटे जाने से भी बचते हैं और रिपेलेंट विकसित करने के लिए उनके पसीने का अध्ययन किया जाता है।

मच्छरों ने विज्ञान को फायदा पहुंचाया है
उनके सूंड के डिज़ाइन ने वैज्ञानिकों को कम दर्दनाक हाइपोडर्मिक सुइयों को डिजाइन करने, सुई सम्मिलन को आसान बनाने के लिए रणनीतियों की जांच करने, और मस्तिष्क में छोटे इलेक्ट्रोडों को बेहतर जगह देने के लिए सम्मिलन मार्गदर्शिका बनाने के लिए प्रेरित किया है।



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भारतीय भाषाओं की वर्णमाला विज्ञान से भरी है,क्या आपको है

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हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी- हिंदी भाषा और साहित्य के ज्ञान के लिए हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी होना आवश्यक है। हिंदी वर्णमाला क्या है ? varnmala में कितने अक्षर (syllable) होते हैं ? hindi varnmala में स्वर-व्यंजन क्या हैं और इनकी संख्या कितनी है?

इस लेख में हिंदी वर्णमाला से संबंधित सभी प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न किया गया है। यह लेख हिन्दी भाषा ज्ञान के इच्छुक लोगों के अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए भी समान रूप से उपयोगी है।

हिंदी वर्णमाला क्या है?
किसी भी भाषा की अभिव्यक्ति ध्वनियों के माध्यम से होती है। हम जो बोलते हैं, वे ध्वनियां हैं। इन्ही के माध्यम से हम अपने विचारों और भावनाओं को सामने उपस्थित व्यक्ति तक पहुंचाते हैं।

लेकिन अगर हम विचार या भावनाएं लिखना चाहते हैं तो इन ध्वनियों को लिखने के लिए हमें उनको चिन्ह (symbol) के रूप में प्रस्तुत करना होगा।

ध्वनियों के इन्हीं चिन्हों को वर्ण (letter) कहते हैं। इस प्रकार भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि या वर्ण है। वर्णों के समूह को अक्षर कहते हैं। “न क्षरति सः अक्षरः” अर्थात जिसका नाश नहीं होता वही अक्षर (syllable) है।

सभी वर्णों या अक्षरों को मिलाकर वर्णमाला  बनती है। अतः वर्णों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं। इस लेख में हम आपको हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी देंगें.

हिंदी वर्णमाला (hindi varnmala) में कितने वर्ण या अक्षर होते हैं?
मूलतः हिंदी वर्णमाला में उच्चारण के आधार पर 45 वर्ण हैं। जिनमें से 10 स्वर और 35 व्यंजन हैं। परंतु लेखन के आधार पर 52 वर्ण हैं। जिनमें 13 स्वर, 35 व्यंजन और 4 संयुक्त व्यंजन हैं। वस्तुतः वर्णों की संख्या के संबंध में कई मत हैं।

कुछ वैयाकरण हिंदी वर्णमाला  में वर्णों की कुल संख्या 47 बताते हैं। जिनमें 10 स्वर और 35 व्यंजन तथा 2 दूसरी भाषा के आगत व्यंजन ज़ और फ़ को शामिल करते हैं।

इसके अतिरिक्त एक अन्य मत के अनुसार वर्णमाला में कुल 55 वर्ण माने गए हैं। जिनमें लेखन और मुद्रण में प्रयोग होने वाले सभी पूर्ण वर्णों को शामिल किया गया है। तथापि हिंदी की वर्णमाला में 52 वर्णों का मत ही अधिक प्रचिलित और ठीक प्रतीत होता है।

वर्णों के प्रकार
वर्णमाला  में वर्ण दो प्रकार से परिभाषित किये गए हैं-
(1) स्वर (2) व्यंजन

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स्वर (Vowel)
जिन वर्णों को स्वतंत्र रूप से बोला जाता है। वे स्वर कहलाते हैं। अर्थात जिन वर्णों के उच्चारण के लिये किसी दूसरे वर्ण की सहायता की आवश्यकता नहीं होती।

स्वरों की संख्या को लेकर भी मत भिन्न हैं। परंपरागत रूप से इनकी संख्या 13 मानी गयी है। परंतु उच्चारण की दृष्टि से इनकी संख्या 10 है। यथा-
अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ

स्वरों का वर्गीकरण
हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी के अंतर्गत स्वरों का वर्गीकरण तीन आधार पर किया जा सकता है-
(1) उच्चारण के आधार पर
(2) जीभ के प्रयोग के आधार पर
(3) हवा के नाक या मुँह से निकलने के आधार पर
(4) मुँह खुलने के आधार पर

(1) उच्चारण के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण
ह्रस्व स्वर

जिनके उच्चारण में एक मात्रा का समय अर्थात कम समय लगता है। उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं। जैसे- अ इ उ

दीर्घ स्वर- हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी
जिनके उच्चारण में दो मात्रा अर्थात ह्रस्व से दूना समय लगता है। इस कारण उन्हें द्विमात्रिक या दीर्घ स्वर कहते हैं। जैसे- आ ई ऊ ए ऐ ओ औ

प्लुत स्वर
जिन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा से तीन गुना ज्यादा समय लगता है। उन्हें प्लुत या त्रिमात्रिक स्वर कहा जाता है। इनके लिए s निशान का प्रयोग किया जाता है। इनका प्रयोग चिल्लाने, पुकारने, रोने, गाने आदि में होता है। जिन्हें पुराने समय की पुस्तकों में देखा जा सकता है। जैसे– राsssम।

(2) जीभ के प्रयोग के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण
स्वरों के उच्चारण के समय जीभ का जिस प्रकार प्रयोग होता है। उसके आधार पर हम स्वरों को निम्न तीन भागों में बांट सकते हैं-

(I) अग्र स्वर
जिन स्वरों का उच्चारण जीभ के अग्र भाग से किया जाता है। ये हैं- इ, ई, ए, ऐ।

(II) मध्य स्वर
इन स्वरों का उच्चारण जीभ के मध्य भाग से किया जाता है। ये हैं- अ

(III) पश्च स्वर
इनका उच्चारण जीभ के पिछले भाग से होता है। आ, उ, ऊ, ओ, औ।

(3) हवा के नाक या मुँह से निकलने के आधार पर
निरनुनासिक या मौखिक स्वर
ऐसे स्वर जिनके उच्चारण में हवा केवल मुख से निकलती है। अ, आ, इ आदि।

अनुनासिक स्वर- हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी
जिन स्वरों के उच्चारण में हवा मुँह के साथ साथ नाक से भी निकलती है। उन्हें अनुनासिक स्वर कहते हैं। अँ, आँ, इँ आदि।

व्यंजन (consonent) किसे कहते हैं?
जिन वर्णों के उच्चारण स्वरों के बिना नहीं हो सकता। वे व्यंजन कहलाते हैं। प्रत्येक व्यंजन में अ वर्ण मिला होता है। जैसे– क+अ =क, च+अ =च आदि।

हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी के अंतर्गत पारंपरिक रूप से व्यंजनों की सँख्या 33 मानी गयी है। द्विगुण व्यंजन ढ़ और ड़ को जोड़ देने पर इनकी संख्या 35 हो जाती है। व्यंजनों को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है–

(1) स्पर्श व्यंजन
जब व्यंजनों का वर्गीकरण ध्वनि निकलने के स्थान के आधार पर किया जाय। ये निम्न प्रकार हैं-
आज के छात्रों को भी नहीं पता होगा कि भारतीय भाषाओं की वर्णमाला विज्ञान से भरी है। वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर तार्किक है और सटीक गणना के साथ क्रमिक रूप से रखा गया है। इस तरह का वैज्ञानिक दृष्टिकोण अन्य विदेशी भाषाओं की वर्णमाला में शामिल नहीं है। जैसे देखें

(i) कंठय व्यंजन
इनकी ध्वनि कंठ या गले से निकलती है। क, ख, ग, घ, ङ।

(ii) तालव्य व्यंजन
इनकी ध्वनि तालु से निकलती है। च, छ, ज, झ, ञ।

(iii) मूर्धन्य व्यंजन
मूर्धा यानी मुंह के अंदर की छत का अगला भाग जहां से इन वर्णों की ध्वनि निकलती है।
ट, ठ, ड, ढ, ण।

(iv) दन्त्य व्यंजन
इन वर्णों की आवाज दांत के पास से निकलती है। त, थ, द, ध, न।

(v) ओष्ठ्य व्यंजन
इनकी ध्वनि ओठों से निकलती है। प, फ, ब, भ, म।

(2) घोषत्व के आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण
घोष का अर्थ है उच्चारण में स्वरतांत्रिकाओं में कंपन के आधार पर निम्न प्रकार से व्यंजनों का वर्गीकरण किया जा सकता है-

अघोष व्यंजन
जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतांत्रिकाओं में कंपन न हो। क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ।

सघोष व्यंजन- हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी
जिनके उच्चारण में स्वरतांत्रिकाओं में कंपन हो। ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म।

(3) प्राणत्व के आधार पर वर्गीकरण
हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी के अंतर्गत यहां पर प्राण का अर्थ हवा से है। अर्थात किस वर्ण के उच्चारण में कितनी हवा बाहर निकलती है। इसके आधार पर व्यंजनों का वर्गीकरण निम्न प्रकार किया जाता है-

अल्पप्राण व्यंजन
जिन व्यंजनों के उच्चारण में मुंह से कम मात्रा में हवा बाहर निकलती है।

क, ग, ङ, च, ज, ञ, ट, ड, ण, त, द, न, प, ब, म।

महाप्राण व्यंजन
जिनके उच्चारण में मुंह से अधिक हवा बाहर निकले।

ख, घ, छ, झ, ठ, ढ, थ, ध, फ, भ।

(4) अन्तस्थ व्यंजन
जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों और व्यंजनों के बीच स्थित हो। वे अन्तस्थ व्यंजन कहलाते हैं।
य- इसका उच्चारण स्थान तालु है।
र- इसका उच्चारण स्थान दन्तमूल या मसूड़ा है।
ल- इसका उच्चारण स्थान दन्तमूल या मसूड़ा है।
व- इसका उच्चारण स्थान दांत और निचला ओंठ है।

(5) ऊष्म या संघर्षी व्यंजन- हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी
जिनका उच्चारण करते समय वायु किसी स्थान विशेष पर घर्षण करते हुए ऊष्मा पैदा करे। यथा-

श- तालु
ष- मूर्धा
स- दन्तमूल
ह- स्वरयंत्र या कौव्वा

(6) उत्क्षिप्त व्यंजन
ऐसे वर्ण जिनके उच्चारण में जीभ मूर्धा का स्पर्श करके तेजी से नीचे आती है। वे उत्क्षिप्त व्यंजन कहलाते हैं। जैसे- ढ़, ड़

(7) संयुक्त व्यंजन
क्ष, त्र, ज्ञ और श्र ये संयुक्त व्यंजन हैं। क्योंकि ये दो वर्णों के योग से बनते हैं। यथा-
क+ष = क्ष
त+र = त्र
ज+ञ= ज्ञ
श+र = श्र

(8) अयोगवाह वर्ण
अनुस्वार (•) और विसर्ग (:) को स्वरों के साथ (अं, अः) लिखा जाता है। किंतु ये स्वर नहीं हैं। क्योंकि इनका उच्चारण व्यंजनों की तरह ही स्वर की सहायता से होता है। ये व्यंजन भी नहीं हैं। क्योंकि इनकी गणना स्वरों के साथ कि जाती है।

स्वरों की तरह ही इनको लिखने के लिए मात्राओं का प्रयोग किया जाता है। स्वर और व्यंजन दोनों के साथ इनका अयोग है। फिर भी अर्थ का वहन करने के कारण इनको अयोगवाह वर्ण कहा जाता है।

हिंदी वर्णमाला की पूरी जानकारी के इस लेख में आपको वर्णमाला hindi varnamala के विषय में पूर्ण जानकारी देने का प्रयत्न किया गया है। आशा है की यह लेख आपके लिए लाभदायक सिद्ध होगा।


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प्रकृति सहस्यों से भरी पड़ी, मांसाहारी पौधों का अद्भुत संसार

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प्रकृति सहस्यों से भरी पड़ी है। प्रकृति की विचित्रताओं पर जब विचार किया जाता है तो सृजनहार की अद्भुत कारीगरी को देख हम चौंकने के सिवाय कुछ नहीं कह सकते। वनस्पतियों के इस विचित्र संसार में अनेक आश्चर्यजनक अजूबे भरे पड़े हैं। उन्हीं में से एक अजूबा है मांसाहारी पौधों का अद्भुत संसार।

प्रकृति में सन्तुलन बनाए रखने के लिये पेड़-पौधों का अत्यधिक योगदान है इसमें कोई दो राय नहीं है। पेड़-पौधे ताजी हवा, फल-फूल देकर हमेशा मानव का कल्याण करते हैं। लेकिन आपने कभी यह सुना है कि पौधे भी मांसाहारी होते हैं? यह प्रश्न अपने आप में आश्चर्य को लिये है क्योंकि अधिकांश पेड़-पौधे सूर्य के प्रकाश तथा पानी से अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। लेकिन यह भी सत्य है कि कुछ पौधे मांसाहारी (Insectivorous) भी होते हैं और कीड़े-मकोड़े को अपना शिकार बनाते हैं व उनसे अपना भोजन प्राप्त करते हैं।

मांसाहारी पौधों की खोज सर्वप्रथम 1875 में हुई। चार्ल्स डार्विन ने इन पौधों के बारे में लिखा है ‘कुछ पौधों में न केवल छोटे जीवों को पकड़ने की क्षमता है, बल्कि उन्हें पचाकर उनमें मौजूद पोषक तत्वों को अवशोषित करने की क्षमता भी है’ यह बात उन्होंने सौ साल से ज्यादा समय पहले कही थी, परन्तु आज भी हम मांसाहारी पौधों को देखकर अचम्भा हुए बिना नहीं रहते।

आमतौर पर मांसाहारी पौधे ऐसी मिट्टी में उगते हैं। जिसकी प्रकृति अम्लीय अथवा दलदली होती है। इस तरह की मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत कम होती है और इस कमी को पूरा करने के लिये ये पौधे कीटों को पकड़कर उनके शरीर से नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।

मांसाहारी पौधों की लगभग 975 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। जिनमें से लगभग तीस प्रजातियाँ भारत में ही पाई जाती हैं। इन पौधों ने कीटों को पकड़ने के लिये अनेक तरीके विकसित किये हैं। विस्मय की बात यह है कि कीटों को पकड़ने और पचाने वाले अवयव सौन्दर्य से परिपूर्ण होते हैं और इसी सौन्दर्य के कारण कीट इन पौधों की ओर आकर्षित होते हैं। कुछ ऐसे मांसाहारी पौधे निम्न हैं।

घटपर्णी (Pitcher)-
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इस पौधे का वानस्पतिक नाम नेपन्थिस खासियाना (nepenthes khasiana) है। यह पौधा मुख्यतः असम के खासी पहाड़ियों में पाया जाता है। इस पौधे की पत्ती घट या कलश के रूप में विकसित हो जाती है, जिसके मुँह पर पत्ती का ही एक ढक्कन होता है।

इस कलश से एक प्रकार का मकरंद (मीठा तरल पदार्थ) निकलता है, जिससे कीट इसकी ओर आकर्षित होते हैं। इसे खाने के लालच में कीट घट के अन्दर उतरते हैं। कलश की तली में पाचक द्रव होता है कीट कलश में प्रवेश करते ही फिसलकर उस द्रव में डूबकर मर जाते हैं। उसके बाद इनका विघटन होता है और पोषक पदार्थ निकलकर द्रव में आ जाते हैं। इसके बाद पत्ती इन्हें सोख लेती है।

सन ड्यू (Sundew)-
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इस पौधे का वानस्पतिक नाम ड्रोसेरा (drosera) है। यह हमारे देश के अनेक भागों में पाया जाता है। इसके पत्तों पर अनेक रेशे निकले रहते हैं, जो एक चिपचिपा रस पैदा करते हैं। जो सूरज की रोशनी में ओस के कणों के समान चमकता है। इन चमकती बूँदों की ओर कीट आकर्षित होते हैं और स्पर्श करते ही चिपक जाते हैं। इसके पश्चात कीटों के छटपटाने से लम्बे रेशे सक्रिय हो जाते हैं और वे चारों तरफ से कीट को जकड़कर बंदी बना लेते हैं। इन रेशोें से एक प्रकार का पाचक द्रव भी निकलता है, जो कीटों के पोषक तत्वों को अवशोषित कर लेते हैं। पाचन पूर्ण होने पर पुनः सीधे हो जाते हैं और अगले शिकार की प्रतीक्षा करने लगते हैं।

ब्लैडरवर्ट (Bladderwort)-
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इस पौधे का वानस्पतिक नाम यूट्रीकुलेरिया (utricularia) है। यह मांसाहारी पौधा भारत के अधिकांश जलाशयों में मिलता है पूरा पौधा पानी के नीचे रहता है और इसी पत्तियाँ बहुत अधिक खंडित होती हैं, इनकी नोक पर थैली जैसी संरचना होती है। इसमें वे सूक्ष्म प्राणी पकड़ लिये जाते हैं जो जलधारा के साथ आते हैं। थैली का खुलना तथा बन्द होना एक वाल्व के द्वारा संचालित होता है। शिकार के पच जाने के बाद वाल्व खुल जाता है और अगले शिकार को पकड़ने के लिये तैयार हो जाता है।

वीनस फ्लाईट्रैप (Venus fly trap)-
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इस पौधे का वानस्पतिक नाम डायोनिया मसीपुला (dionaea muscipula) है। यह पौधा मुख्य रूप से अमरीका के कैरोलिना क्षेत्रों में पाया जाता है। इसके पत्ते दो भागों में बँटे होते हैं और दोनों के मध्य एक उभार होता है, वह दरवाजे के कब्जे की तरह कार्य करता है। पत्ते के दोनों भागों की सतह पर संवेदनशील बाल जैसे रेशे होते हैं। इनमें से किसी को कोई छू ले तो पत्ते के दोनों भाग तुरन्त बन्द हो जाते हैं और कीट को अपने भीतर कैद कर लेते हैं। कीट को पूरा पचाने के पश्चात पत्ते कै दोनों भाग पुनः खुल जाते हैं और अन्य शिकार की प्रतीक्षा करने लगते हैं।

सारासीनिया (Sarracenia)-
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नेपन्थिस की तरह सारासीनिया भी घटपर्णी पादप हैं। ये मुख्यतः अमरीका एवं कनाडा के कई क्षेत्रों में पाये जाते हैं। सारासीनिया के घट कीटों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। एक बार कीट इसके अन्दर चला जाता है तो वह घट के अन्दर स्थित द्रव में फँस जाता है और उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं होती है। पाचक द्रव उस कीट के पोषक पदार्थ ग्रहण कर लेतेे हैं।

बटरवर्ट्स (Butterworts)-
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इस पौधे का वानस्पतिक नाम पिंगुइकुला (Pinguicula) है। इस पौधे के फूल अत्यधिक सुन्दर एवं आकर्षक होते हैं। इस पौधे की पत्तियाँ चिपचपी एवं ओस के समान द्रव स्रावित करती हैं जिससे कीट इनकी ओर खिंचे चले आत हैं और जैसे ही कीट इन पर बैठता है तो वह चिपक जाता है और किसी भी तरह दोबारा उड़ नहीं सकता है। चिपके हुए कीट का पाचन द्रव कर लेते हैं और उनसे पोषक तत्व मुख्यतः नाइट्रोजन ग्रहण कर ली जाती है।

सुंदरी का पिंजड़ा (वीनस फ्लैटराप)-
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इस पौधे का वानस्पतिक नाम डायोनिया मसीपुला (Dionaea Muscipula) है। ये पौधा मुख्य रूप से अमेरिका के कैरोलिना क्षेत्र में पाया जाता है। इसके पत्ते दो भागों में बंटे होते हैं और दोनों के मध्य एक उभार होता है, वो दरवाज़े के कब्ज़े (Hinge) की तरह होता है। पत्ते के दोनों भागों की सतह पर संवेदनशील बाल जैसे रेशे होते हैं। इनको अगर कोई कीड़ा छू ले, तो ये तुरंत बंद हो जाते हैं और कीड़े को खा जाते हैं। वीनस फ्लाईट्रैप एक मांसाहारी पौधा है जो कीड़ों को फँसाकर अपना पोषण प्राप्त करता है!यह बीच में जुड़ा होता है और किनारों के चारों ओर "दाँत" जैसी विशेष पत्तियाँ होती हैं। जब कीट लाल पत्ते पर बैठते है, तो यह कीट को अंदर फँसाकर, उसे बंद कर देता है। वे इसे लगभग 10 दिनों में पचाते हैं, जिसके बाद वे अपने अगले शिकार के लिए पत्ते खोलते हैं।

ड्रोसैरा -
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इसे सनड्यूज़ भी कहते हैं। यह एक बहुत सुंदर कीटभक्षी पौधा है जो शिमला, मसूरी और नैनीताल में पाया जाता है। ड्रोसेरा को मक्खाजाली भी कहा जाता है। इसकी गोल-गोल पत्तियों के किनारे लाल रंग की घुण्‍डी वाले आलपिन सरीखे बाल होते हैं जिनसे एक चिपचिपा रस निकलता रहता है। ड्रोसैरा पौधे से निकला यह रस धूप की रोशनी में ओस की तरह चमकता है। छोटे कीट पतंगों को यही रस चिपका लेता है और फिर घुण्डियां मुड़कर चारों ओर से उसे घेर लेती हैं।

कोबरा लिली (Cobra lily)-
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इस पौधे का वानस्पतिक नाम डार्लिंगटोनिया कैलीफोर्निका (Darlingtonia californica) है। यह पादप मुख्यतः उत्तर कैलिफोर्निया एवं ओरिगोन में पाया जाता है। कोबरा लिली इस पौधे का नाम इसलिये पड़ा चूँकि इसकी ट्यूबूलर पत्तियाँ कोबरे के फन के आकार की होती है। पत्ती का ऊपरी भाग फूले हुए गुब्बारे के समान होता है। इसी फूले हुए गुब्बारे के नीचे एक छोटा रास्ता होता है जहाँ पर कीट आकर बैठते हैं तो फँस जाते हैं। इस पौधे की एक और विशेषता है कि यह पादप पाचक एंजाइम्स नहीं पैदा करता जबकि उसके स्थान पर बैक्टीरिया एवं प्रोटोजोआ कैद कीट के पोषक तत्वों को ग्रहण करने में सहायता करते हैं।

इस प्रकार मांसाहारी पौधों का यह अद्भुत संसार अत्यन्त रोचक एवं अनोखा है। ये पौधे इस बात के भी द्योतक हैं कि चाहे कोई भी विषम परिस्थिति हो जीव जीवित रहने के लिये मार्ग ढूँढ ही लेते हैं। परिस्थितियों के अनुकूल स्वयं को कैसे ढालना है और क्या-क्या परिवर्तन लाने हैं, यह सीखा जा सकता है इन पौधों के व्यवहार से। संक्षेप में कहें तो मांसाहारी पौधे जीवों की अद्भुत जिजीविषा का परिचय देते हैं।

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