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बच्चों के लिए सोशल मीडिया का कम यूज ही बेहतर, पैरेंट्स उनके अकाउंट को चेक करते रहें, उन्हें सही और गलत का फर्क बताना भी जरूरी

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आजकल बड़े ही नहीं बल्कि बच्चे भी स्मार्टफोन के एडिक्ट हो चुके हैं। सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा बन गया है जिसे अब हम इग्नोर नहीं कर सकते हैं। हालांकि, पैरेंट्स होने के नाते आपको यह पता होना चाहिए कि बच्चे के विकास पर सोशल मीडिया का क्या असर पड़ता है सोशल मीडिया पर आजकल बच्चों की मौजूदगी और इंवॉल्वमेंट काफी बढ़ गई है। इसका बच्चों पर सकारात्मचक और नकारात्मक असर पड़ता है। बच्‍चों का मन बहुत नाजुक और चंचल होता है और सोशल मीडिया आसानी से उनकी सोच और व्यवहार को बदल सकता है।

छोटी उम्र में बच्चे अच्छे और बुरे में फर्क नहीं कर पाते हैं और इसके चलते पैरेंट्स की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे उसे सोशल मीडिया का सही इस्तेसमाल करना सिखाएं। जो बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, उनके कम्युनिकेशन स्किल्स अच्छे होते हैं और इससे बच्चों को मोटिवेट होने में मदद मिलती है।

सोशल मीडिया के जरिए बच्चों की टेक्नोलॉजी के बारे में टेक्निकल और प्रैक्टिकल नॉलेज भी बढ़ती है। सोशल मीडिया के कुछ फायदे हैं लेकिन इसकी अति नुकसानदायक भी होती है। सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा समय बिताने का नकारात्मक असर बच्चों पर पड़ता है और अक्सर बच्चों को सोशल मीडिया की लत लग जाती है। सोशल मीडिया की लत के कई लक्षण होते हैं और इसका असर बच्चेी की सेहत पर भी पड़ सकता है।

पैरेंट्स इन बातों का ध्यान रखें

सोशल मीडिया पर समय बिताने के लिए बच्चों की समय सीमा को निर्धारित करें। अगर बच्चे का फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अकाउंट्स हैं, तो नियमित रूप से उन अकाउंट्स को चेक करते रहें। सोशल मीडिया पर सही और गलत दोनों तरह की चीजों का प्रसार होता है। ऐसे में इसके उपयोग से पहले बच्चों को बच्चों को बताएं कि सही और गलत में क्या अंतर है। दोस्तों से बात करने के लिए सोशल मीडिया की जगह बच्चों को प्रोत्साहित करें कि वह उनके पास जाएं और बातें करें।

बच्चों के लिए सोशल मीडिया के फायदे

  • इस प्लेटफॉर्म के जरिए उन्हें असीमित सूचना का भंडार प्राप्त होता है।
  • अगर किसी बच्चे को अपना होमवर्क करने में परेशानी हो रही है, तो वह सोशल मीडिया की मदद से उसे पूरा कर सकता है। बच्चे वीडियो कॉल के माध्यम से अपने शिक्षकों से संपर्क कर सकते हैं और छुटी हुई क्लास के बारे में पूछ सकते हैं। इसके अलावा, बच्चे मैसेज के माध्यम से भी शिक्षकों से अपने डाउट्स क्लियर कर सकते हैं। कोरोना काल में इसका एक अच्छा उदाहरण देखा जा सकता है।
  • सोशल मीडिया बच्चों के लिए एक मंच प्रदान करता है, जहां बच्चे अपनी रुचि के अनुसार नई-नई चीजों को सीख सकते हैं। जैसे – संगीत, कला, खेल आदि। इससे बच्चों का स्किल डेवलप हो सकता है।
  • सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल से बच्चों की कम्युनिकेशन स्किल्स बेहतर हो सकती हैं। यूट्यूब के वीडियो के माध्यम से बच्चे (हिंदी और इंग्लिश) बोलने का तरीका सीख सकते हैं। इससे बच्चे खुद को प्रेरित कर सकते हैं।
  • सोशल मीडिया एक खुला मंच है, जहां हर जानकारी मिल सकती है। इसके माध्यम से बच्चे देश-विदेश में होने वाली घटनाओं से भी रूबरू हो सकते हैं और उनका ज्ञान बढ़ सकता है।


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बच्चों की वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाले कारक

 
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बच्चों में वृद्धि और विकास कैसे होता है, यह उनके शरीर की अंदरूनी और बाहर के वातावरण, दोनों बातों पर निर्भर करता है, जिनमें से कुछ पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता है। वृद्धि और विकास के प्रत्येक चरण में बच्चों की आवश्यकता क्या है, इसकी जानकारी होने से हमें बच्चों का विकास बेहतर ढंग से करने में मदद मिलती है।

वृद्धि और विकास का मतलब क्या है?
यद्यपि वृद्धि और विकास सुनने में एक जैसे शब्द ही लगते हैं लेकिन बायलॉजिकली इनके मायने अलग होते हैं। वृद्धि का अर्थ है बच्चे के शारीरिक गुणों और अंगों का बढ़ना, जैसे लंबाई, वजन, आकार आदि, जबकि विकास यानि एक क्रमबद्ध और सार्थक तरीके से प्रगति करना जो बच्चे को समझदार बनाता है। वृद्धि और विकास एक दूसरे के पूरक हैं, इन्हें अलग नहीं किया जा सकता और ये एकसाथ ही काम करते हैं। उदाहरण के लिए, अधिकांश बच्चे जब 8 महीने के हो जाते हैं, तब तक उनका वजन लगभग 8 से 10 किलोग्राम तक हो जाता है और वे बैठने लगते हैं।

10 कारक जो बच्चे की वृद्धि और विकास को प्रभावित करते हैं
बच्चों की शारीरिक प्रकृति और उन्हें दिया जाने वाला पोषण, दोनों ही वृद्धि और विकास में काम आते हैं। यद्यपि प्रकृति द्वारा दिए गए गुण स्थिर होते हैं, लेकिन पोषण का प्रभाव भी बहुत गहरा होता है। यहाँ बच्चों की वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाले कुछ कारक दिए गए हैं।

1. अनुवांशिकता
जीन के माध्यम से, माता-पिता की शारीरिक विशेषताएं उनके बच्चों में पहुँचना आनुवंशिकता कहलाता है। यह बच्चों के सभी शारीरिक गुणों को प्रभावित करता है जैसे कि लंबाई, वजन, शरीर की बनावट, आँखों का रंग, बालों की बनावट और यहाँ तक कि बुद्धि और योग्यता भी। वहीं हृदय रोग, डायबिटीज, मोटापा आदि जैसी बीमारियां और समस्याएं भी जीन के माध्यम से बच्चे में जा सकती हैं, जिससे उसकी वृद्धि और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हालांकि, बाहरी कारक और बच्चे को दिया जाने वाला पोषण, जीन में पहले से मौजूद गुणों पर काम करके उन्हें बेहतर तरीके से विकसित कर सकते हैं।

2. पर्यावरण
पर्यावरण बच्चों के विकास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बचपन के शुरूआती दिनों में विकास को प्रभावित करने वाले कुछ पर्यावरणीय कारकों में, वह जगह जहाँ बच्चा रहता है वहाँ की भौतिक व भौगोलिक परिस्थितियां, उसका सामाजिक परिवेश और परिवार व आसपास लोग आदि शामिल हैं। यह समझना एकदम आसान है कि जिस बच्चे को उचित वातावरण मिलता है, उसका विकास किसी ऐसे बच्चे से बेहतर होगा जिसके पास इसका अभाव है; बच्चे जिस परिवेश में रहते हैं, उसका उनकी प्रगति पर असर पड़ता है। एक अच्छा स्कूल और प्रेमपूर्ण परिवार बच्चों में सामाजिक व पारस्परिक गुणों का विकास करते हैं, जो उन्हें आगे जाकर पढ़ाई और अन्य एक्सट्राकरिकुलर एक्टिविटीज जैसी बातों में बेहतरीन करने ऊँचाइयों पर पहुँचाने में मददगार होते हैं। जो बच्चे इसके उलट, तनावपूर्ण वातावरण में बढ़ते हैं, वे निश्चित रूप से अलग होते हैं।

3. लिंग
बच्चे का लिंग, बच्चे के शारीरिक वृद्धि और विकास को प्रभावित करने वाला एक अन्य प्रमुख कारक है। खासकर प्यूबर्टी (युवावस्था) के करीब, लड़के और लड़कियां अलग-अलग तरीके से बढ़ते हैं। लड़कियों की तुलना में लड़कों की लंबाई और ताकत ज्यादा होती है।जबकि लड़कियां किशोरावस्था में अपेक्षाकृत जल्दी परिपक्व होती हैं और लड़कों में ये विकास काफी देर से होता है। उनके शरीर की बनावट में भी अंतर होता है, जिसमें लड़के अधिक एथलेटिक और शारीरिक श्रम वाली गतिविधियां करने के लिए सक्षम होते हैं। उनका स्वभाव भी भिन्न होता है, जिससे वे अलग-अलग तरह की चीजों में रुचि दिखाते हैं।

4. एक्सरसाइज और हेल्थ
यहाँ एक्सरसाइज शब्द का अर्थ अनुशासनात्मक शारीरिक व्यायाम से नहीं है या यह सोचकर कि इससे उन्हें बढ़ने में मदद मिलेगी, बच्चों को जानबूझकर शारीरिक गतिविधियों में लगाना भी नहीं है। यहां एक्सरसाइज का अर्थ है, बच्चों के लिए सामान्य खेलने का समय और उनकी खेल से  जुड़ी ऐसी गतिविधियां हैं जो शरीर को मांसपेशियों की ताकत और हड्डी का विकास करने में मदद करती हैं। सही एक्सरसाइज बच्चों को अच्छी तरह से बढ़ने और सही समय पर या उससे पहले विकास के माइलस्टोन तक पहुँचने में मदद करती है। एक्सरसाइज उन्हें स्वस्थ भी रखती है और बीमारियों से लड़ने के लिए इम्युनिटी को मजबूत करती है, खासकर अगर बच्चे घर से बाहर जा कर खेलते हैं। इसकी वजह यह भी है कि बाहर खेलने से वे जर्म्स के संपर्क में आते हैं और उन्हें इम्युनिटी विकसित करने और इन्फेक्शन को रोकने में मदद मिलती है।

5. हार्मोन
हार्मोन एंडोक्राइन सिस्टम से संबंधित हैं और हमारे शरीर के विभिन्न कार्यों को प्रभावित करते हैं। शरीर के कुछ विशेष भागों में स्थित अलग-अलग ग्लैंड्स (ग्रंथियों) शरीर के कार्यों को नियंत्रित करने वाले हार्मोन को रिलीज करते हैं। बच्चों में सामान्य शारीरिक वृद्धि और विकास के लिए उनका नियत समय पर कार्य करना जरूरी है। हार्मोन रिलीज करने वाली ग्लैंड्स के कामकाज में असंतुलन से बच्चे विकास में दोष, मोटापा, व्यवहार संबंधी समस्याएं और अन्य बीमारियां भी हो सकती हैं। प्यूबर्टी के दौरान, गोनाड ग्लैंड, सेक्स हार्मोन बनाती है ,जो यौन अंगों का विकास तथा लड़कों और लड़कियों में यौन विशेषताओं की उपस्थिति को नियंत्रित करते हैं।

6. पोषण
पोषण यानि न्यूट्रिशन, वृद्धि का एक महत्वपूर्ण कारक है क्योंकि शरीर को विकास और मरम्मत की जरूरत होती है जो कि भोजन द्वारा ही होता है। कुपोषण से बच्चों में विकास संबंधी बीमारियां हो सकती हैं जो उनकी वृद्धि और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। दूसरी ओर, अधिक भोजन से मोटापा और लंबे समय तक सेहत से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं, जैसे कि डायबिटीज और हृदय रोग। एक संतुलित आहार जो विटामिन, खनिज, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और फैट से भरपूर हो, मस्तिष्क और शरीर के विकास के लिए आवश्यक है।

7. पारिवारिक प्रभाव
परिवार, बच्चों का पोषण करने और उसे मानसिक और सामाजिक रूप से विकसित करने में सबसे ज्यादा प्रभावशील होता है। वे अपने माता-पिता, दादा-दादी या जो कोई भी घर पर उनकी देखभाल करता है, की देखरेख में बड़े होते हैं, उन्हें एक अच्छे व्यक्ति के रूप में विकसित करने के लिए बुनियादी प्यार, देखभाल और शिष्टाचार की आवश्यकता होती है। सबसे सकारात्मक वृद्धि तब देखी जाती है जब परिवार विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चे के विकास में समय, ऊर्जा और प्यार का निवेश करते हैं, जैसे कि उन्हें पढ़ाना, उनके साथ खेलना और गहरी सार्थक बातचीत करना। वे परिवार, जो बच्चों के साथ दुर्व्यवहार या उनकी उपेक्षा करते हैं, वहाँ बच्चों का सकारात्मक विकास प्रभावित होता है। ये बच्चे ऐसे वयस्कों के रूप में विकसित हो सकते हैं जिनका सामाजिक कौशल अपर्याप्त होता है और जिन्हें अन्य लोगों के साथ संबंध जोड़ने में कठिनाई होती है। ‘हेलिकॉप्टर पेरेंटिंग’ से भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, क्योंकि ऐसे बच्चे माता-पिता पर निर्भर रहते हैं और स्वयं जीवन की कठिनाइयों से निपटने में असमर्थ होते हैं।

8. भौगोलिक प्रभाव
आप जहाँ रहते हैं, इस बात का भी आपके बच्चों के विकास पर बहुत प्रभाव पड़ता है। वे कौन से स्कूल में पढ़ते हैं, किस मोहल्ले में रहते हैं, समुदाय द्वारा उन्हें कौन से अवसर पेश किए जाते हैं और उनकी संगति किस प्रकार की है आदि बच्चे के विकास को प्रभावित करने वाले कुछ सामाजिक कारक हैं। एक विकसित समुदाय में रहना जिसमें खेलने के लिए पार्क, लाइब्रेरी और कम्युनिटी सेंटर मौजूद हैं, ये सभी सुविधाएं किसी बच्चे के कौशल, प्रतिभा और व्यवहार को विकसित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वहीं नीरस समुदाय, कुछ बच्चों को अक्सर बाहर जाने के बजाय घर पर रहकर वीडियो गेम खेलने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। यहाँ तक ​​कि किसी जगह का मौसम भी बच्चों को दूसरी जगह एडजस्ट होने, एलर्जी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं जैसी बातों को प्रभावित करता है।

9. सामाजिक आर्थिक स्थिति
एक परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी किसी बच्चे को मिलने वाले अवसर की क्वालिटी को निर्धारित करती है। बेहतर स्कूलों में पढ़ाई करना जो निश्चित रूप से अधिक महंगे होते हैं, लंबे समय तक लाभकारी होता है। संपन्न परिवार अपने बच्चों के लिए बेहतर सीखने के संसाधन भी प्रदान कर सकते हैं और अगर बच्चों को किसी विशेष सहायता की आवश्यकता होती हैं तो वे उसका खर्च उठा लेते हैं। गरीब परिवारों के बच्चों के पास अपने अंदर की पूरी क्षमता को हासिल करने के लिए, शैक्षिक संसाधनों और अच्छे पोषण तक पहुँच नहीं होती है। उनके माता-पिता दोनों काम पर जाने वाले भी हो सकते हैं जो कई घंटे तक काम करते हैं और वे अपने बच्चों के विकास के लिए पर्याप्त क्वालिटी टाइम नहीं दे पाते हैं।

10. सीखना और निपुण होना
स्कूली शिक्षा की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है सीखना। यह मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से बच्चे के निर्माण से भी संबंधित है, जिससे वे समाज में एक स्वस्थ और प्रवीण वयस्क के रूप में काम करते हैं। यहाँ पर बच्चे के दिमाग का विकास होता है और बच्चा कुछ परिपक्वता हासिल कर सकता है। सुदृढीकरण सीखने की पूरी प्रक्रिया का एक घटक है जहाँ एक गतिविधि या व्यायाम को दोहराया जाता है और सीखी गई चीज में कुशल बनाया जाता है। उदाहरण के तौर पर जब एक बच्चा कोई इंस्ट्रूमेंट बजाता रहता है; तो वह इसे बजाने में बेहतर हो जाता है क्योंकि वह इंस्ट्रूमेंट बजाने का अभ्यास करता रहता है। इसलिए, जो कुछ भी सिखाया जाता है, उसे सही परिणाम प्राप्त होने तक दोहराया जाना चाहिए।

यद्यपि प्रकृति, बच्चों की वृद्धि और विकास में योगदान देती है, लेकिन पोषण बहुत अधिक योगदान देता है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, इनमें से कुछ कारकों पर हमारा नियंत्रण नहीं हो सकता है, और आपके पास जो उपलब्ध है, उसके साथ ही काम करना होगा। लेकिन कुछ चीजें हैं, जिन्हें आप अपने बच्चे के लिए सुनिश्चित कर सकते हैं। इसमें यह ध्यान देना शामिल है कि आपके बच्चे को हर दिन पर्याप्त आराम मिले, क्योंकि उसका विकास बहुत अधिक नींद की मात्रा पर निर्भर करता है। अपने बच्चे के पोषण और एक्टिविटी के स्तर पर पूरा ध्यान दें, क्योंकि ये भी आपके बच्चे के सही समय पर स्वस्थ विकास और वृद्धि को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।




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बच्चों के लिए महाभारत से प्रेरित कहानियां

 
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महाभारत एक साहित्यिक महाकाव्य है और इसमें हिन्दू पौराणिक व दार्शनिक कथाओं का वर्णन है। माना जाता है कि यह सिर्फ बड़ों के लिए है पर यह एक महाकाव्य होने के अलावा भी बहुत कुछ है। इसमें मौजूद अलग-अलग कहानियां और पात्र बच्चों के लिए भी एक अच्छी सीख का उदाहरण बन सकते हैं। वास्तव में यह एक ज्ञान का भंडार है जो कई पीढ़ियों से चला आ रहा है। इसमें बहुत सारी कहानियां हैं जो नैतिकता और आचरण की सीख देती हैं। यह महाकाव्य हमारी संस्कृति का एक भाग है और बच्चों को भी इससे अवगत कराना चाहिए। 

महाभारत क्या है?
हिन्दू धर्म में संस्कृत भाषा के दो महाकाव्य हैं, रामायण और महाभारत। जिनमें से महाभारत एक ऐसी महागाथा है जिसमें दो भाइयों पाण्डु व धृतराष्ट्र के पुत्रों पांडवों व कौरवों के बीच 18 दिनों तक चलने वाले कुरुक्षेत्र के महायुद्ध का वर्णन किया गया है। कई सारे पात्र और कई सारी कहानियां इस महागाथा से जुड़ी हुई हैं जो दार्शनिक व दैविक दोनों हैं। महाभारत में भगवान कृष्ण द्वारा भगवद गीता का भी वर्णन किया गया है और इसी वजह से सभी रचनाओं में यह सबसे ज्यादा पूजनीय है। महाभारत को सिर्फ टाइम पास के लिए नहीं पढ़ा जाता है। यदि आप इसे पढ़ते हैं तो पहले इसकी गंभीरता व इसकी गहराइयां जानें और इससे जुड़े हर एक पात्र के कर्मों व प्रतिक्रियाओं को समझें। महाभारत से जुड़ी कहानियां पढ़ने के बाद आप खुद को इतनी सारी भूमिकाएं निभाते हुए पाएंगे जैसी इन कहानियों में वर्णित हैं। 

महाभारत की लघु कथा 
यह कहानी कुरु वंश में हस्तिनापुर के राजा शांतनु से शुरू होती है जिन्होंने गंगा नदी से शादी की थी और इनके पुत्र भीष्म महाभारत के सबसे मुख्य पात्र हैं। गंगा नदी के बाद राजा शांतनु से सत्यवती से भी विवाह किया जिनसे उन्हें दो पुत्र हुए। जिनमें से एक का नाम विचित्रवीर्य था और राजा शांतनु के बाद वे ही राज्य के महाराज बने। अब राजा विचित्रवीर्य के 3 पुत्र हुए जिनमें से सबसे बड़े धृतराष्ट्र, उनसे छोटे पाण्डु और सबसे छोटे विदुर थे। धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे थे इसलिए भीष्म हमेशा से पाण्डु को महाराज बनाना चाहते थे। 

धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हुआ जिनके 100 पुत्र हुए और इन्हें हम कौरव के नाम से जानते हैं। पाण्डु का विवाह कुंती और माद्री से हुआ, जिन्हें ईश्वर के आशीर्वाद के रूप में 5 पुत्र हुए। पहले से ही कुंती का एक और पुत्र था जिसका नाम कर्ण था और यह बात कोई भी नहीं जानता था। 

एक ऋषि को अनजाने में मारने के बाद उनके श्राप के कारण पाण्डु राजमहल छोड़कर वन में रहने चले गए और राज्य में शांति और खुशी के लिए धृतराष्ट को राज्य का कार्यकारी राजा बना दिया गया। जब पाण्डु व माद्री की मृत्यु के बाद कुंती अपने पांच बेटों के साथ राजमहल में वापस आईं तो कौरवों ने कभी भी पांडवों को अपना भाई नहीं माना और वे कभी एक नहीं हुए। कौरवों ने पांडवों को कई बार मारने की कोशिश की पर वे कभी भी सफल नहीं हो पाए और षड्यंत्रों के चलते पांडवों को अपनी माँ के साथ छिपकर वन में रहना पड़ा। समय के चलते अर्जुन ने द्रौपदी का स्वयंवर जीता और कुंती की आज्ञा से वह पाँचों भाइयों की पत्नी बनी और इसके बाद फिर से वे पाँचों भाई अपनी माँ और द्रौपदी के साथ हस्तिनापुर में वापस आए। धृतराष्ट्र की आज्ञा से पांडवों को अलग राज्य दे दिया गया पर इस बार उनके लिए फिर से षड्यंत्र रचा गया था जिसमें कौरवों ने अपने मामा शकुनि के साथ मिलकर उन्हें चौसर के खेल में धोके से हरा दिया। इस खेल के बदले में युधिष्ठिर सब कुछ हार गए व उन्हें अपने चारों भाई व पत्नी के साथ फिर से 12 साल का वनवास और 1 साल का अज्ञातवास स्वीकार करना पड़ा। पांडवों के लौटने के बाद जब दुर्योधन ने पांडवों का राज्य देने से इंकार कर दिया तो इस बार युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई जिसमें श्रीकृष्ण ने शांति लाने का कई बार प्रयास किया। पर यह महायुद्ध होना ही था। कौरवों व पांडवों के बीच यह धर्म युद्ध लगभग 18 दिनों तक चला जिसमें जीत पांडवों की हुई और तब युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने। 
बच्चों के लिए महाभारत से प्रेरित कहानियां 

इस महागाथा में बच्चों के लिए भी कई सारी कहानियां हैं और यहाँ कुछ प्रसिद्ध एवं विशेष कहानियां दी गई हैं, आइए जानें;

1. अर्जुन और चिड़िया की आँख
बचपन में शिक्षा देते करते समय गुरु द्रोण ने पांडवों व कौरवों की परीक्षा ली जिसमें उन्हें पेड़ की डाल पर बैठी लकड़ी से बनी हुई चिड़िया की आँख पर निशाना लगाना था। गुरु ने अपने छात्रों से पूछा कि उन्हें निशाना लगाते समय क्या दिख रहा है, किसी ने पत्ते बोला, किसी ने पेड़ तो किसी ने चिड़िया बोला, सबके अलग-अलग जवाब थे। गुरु द्रोण के 105 छात्रों में से सिर्फ अर्जुन ही एक थे जिनका उत्तर चिड़िया की आँख था। तब गुरु द्रोण ने सिर्फ अर्जुन को चिड़िया की आँख पर निशाना लगाने के लिए कहा और वह बिलकुल सही लगा। केवल अर्जुन इस परीक्षा में सफल हुए। 

2. अभिमन्यु की वीरता 
अभिमन्यु जब अपनी माँ सुभद्रा के गर्भ में था तो उन्होंने अपने पिता अर्जुन द्वारा युद्ध में बनाए हुई चक्रव्यूह को तोड़ने का तरीका सीख लिया था, हालांकि सुभद्रा को नींद आ जाने की वजह से अभिमन्यु चक्रव्यूह से बाहर निकलने का तरीका सीखने से वंचित रह गया। युद्ध के तेरहवें दिन मात्र 16 साल का योद्धा अभिमन्यु द्रोणाचार्य द्वारा रचे गए कठिन चक्रव्यूह को तोड़कर अपने से कहीं बड़े योद्धाओं के साथ वीरता से युद्ध करता रहा और चक्रव्यूह के बीचो-बीच वहाँ जा पहुँचा जहाँ पर दुर्योधन था। कौरवों ने दुर्योधन को बचाने के लिए अभिमन्यु पर एक साथ आक्रमण कर किया। दुर्भाग्य से अभिमन्यु को चक्रव्यूह से निकलना नहीं आता था। उसने पूरे शौर्य से शत्रु का सामना किया पर अंत में वीरगति को प्राप्त हुआ। 

3. एकलव्य की अनोखी गुरु दक्षिणा 
एकलव्य नामक एक आदिवासी लड़का था जो गुरु द्रोणाचार्य से धनुष-बाण की शिक्षा लेने के लिए उनके पास गया पर गुरु ने एकलव्य को शिक्षा देने के लिए मना कर दिया क्योंकि उनकी प्रतिज्ञा थी कि वे सिर्फ क्षत्रियों व ब्राह्मणों को ही शिक्षा प्रदान करेंगे। एकलव्य बहुत दुखी हुआ, उसने द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उस मूर्ति के सामने वह रोजाना धनुष-बाण चलाने का अभ्यास करने लगा और एक श्रेष्ठ धनुर्धर बना। एक दिन एक कुत्ता भौंक-भौंक कर सभी को परेशान कर रहा था तब एकलव्य ने बाण चलाकर बिना चोट पहुँचाए उस कुत्ते का मुँह बंद कर दिया। जब अर्जुन को यह बात पता लगी तो उन्हें बहुत दुःख हुआ और वे सोचने लगे कि इस धरती पर उनसे बेहतर धनुर्धर भी कोई है। द्रोणाचार्य नहीं चाहते थे कि अर्जुन से अधिक बड़ा धनुर्धर कोई बने और वो यह भी जानते थे कि एकलव्य ने गुरु के रूप में उनकी मूर्ति बनाई है। इसलिए उन्होंने एकलव्य से गुरु दक्षिणा मांगी जो हर एक शिष्य अपने गुरु को देता है। गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य से उसके सीधे हाथ का अंगूठा मांगा। यद्यपि बिना अंगूठे के वो धनुष बाण नहीं चला सकता था पर फिर भी एकलव्य ने अपने सीधे हाथ का अंगूठा काटा और अपने गुरु के चरणों में रख दिया। ऐसा करने के बाद तब से ही एकलव्य को एक आदर्श शिष्य के रूप में जाना जाता है। 

4. राजा शिवि की कहानी 
यूं तो राजा शिवि पांडवों और कौरवों के समकालीन नहीं थे पर उनकी कथा का उल्लेख महाभारत में मिलता है। राजा शिवि अपने वचन पर बने रहने और सत्य की रक्षा के लिए जाने जाते थे। एक बार अग्नि देव और इंद्र देव ने राजा शिवि की परीक्षा लेने का निर्णय लिया और इसलिए एक देवता ने सफेद कबूतर व दूसरे देव ने बाज का रूप लिया और दोनों आसमान में उड़ने लगे। कबूतर उड़ते हुए राजा शिवि के पास सुरक्षा की याचना लेकर पहुँचा और राजा ने कबूतर को उसकी सुरक्षा करने का वचन भी दे दिया। इतने में कबूतर का पीछा करते हुए बाज भी वहाँ आ पहुँचा और अपनी भूख को मिटाने के लिए कबूतर पर वार करने लगा। इस पर राजा ने बाज की भूख को मिटाने के लिए उसे अपने शरीर से मांस काटकर दे दिया। उस बाज ने कहा कि मुझे उतना ही मांस चाहिए जितना उस सफेद कबूतर का वजन है तो राजा शिवि ने अपने शरीर का अधिक मांस काटकर उस बाज को दे दिया। यह देखकर दोनों देव अपने असली रूप में आ गए और राजा शिवि को वरदान दिया। इस घटना के साक्षी सभी देवों ने उनपर फूलों की वर्षा की। 

बच्चों के लिए महाभारत से जुड़ी नैतिक शिक्षा 
  • यदि आपका ध्यान आपके लक्ष्य पर केंद्रित है तो आप जरूर सफल होंगे। 
  • एक शिक्षक आपको प्रेरणा दे सकता है और सिखा सकता है पर अभ्यास आपको निपुण बनाता है। 
  • हमेशा अच्छे लोगों के साथ ही रहना चाहिए। गलत राह पर चलने वाले दोस्त विनाश का कारण बनते हैं। 
  • महिलाओं का आदर करें। स्त्रियों का आदर न करनेवाले लोगों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। 
  • बुरी आदतें न रखें, जैसे गैंबलिंग। ऐसी आदतों से आपकी हर तरफ से हार हो सकती है। 
  • बहुत जल्दी हार न मानें और हमेशा उन चीजों के लिए लड़ें, जिनपर आपका हक है। अंत में सिर्फ सच्चाई की ही जीत होती है। 
  • आप ऐसे किसी भी काम को न करें जिसमें आपको पूरी जानकारी न हो। इससे आपकी ही हार होगी। 
  • कभी भी अपने दोस्तों और रिश्तेदारों की गलत आदतों का साथ न दें। इससे आपको ही परेशानियां हो सकती हैं। 
  • कभी किसी को भी किसी से बदला लेने की भावना नहीं रखनी चाहिए क्योंकि बदले की भावना से नुकसान आपका ही होता है। 
  • युद्ध जरूरी नहीं है आप अपने मसले बातों से भी सुलझा सकते हैं। 
अन्य महाकाव्यों की तरह ही महाभारत भी बुराई पर अच्छाई की जीत का उदाहरण देती है। महाभारत हमारे जीवन की दिनचर्या से भी जुड़ा हुआ है और इसके पात्र व उनसे जुड़ी सभी कहानियां मनुष्य जीवन को अद्वितीय ज्ञान प्रदान करती हैं। महाभारत की नैतिक कहानियां सच्चाई और धर्म का पाठ पढ़ाती हैं तो इनसे बच्चों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है। 



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बच्चों की पर्सनालिटी डेवलपमेंट के लिए उपयोगी 10 टिप्स

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हर बच्चे की एक यूनिक पर्सनालिटी होती है जिसके साथ वो जन्म लेता है, लेकिन जिस परिवेश में बच्चा बड़ा होता है, वो उसकी पर्सनालिटी को आकार देने में अहम भूमिका निभाता है। बच्चे की पॉजिटिव पर्सनालिटी  विकसित करने में उसके माता-पिता, शिक्षक और परिवारजनों की एक बड़ी भूमिका होती है। यहाँ आपको ऐसी 10 टिप्स बताई गई हैं जिसे आप बच्चे की कम उम्र से ही फॉलो करना शुरू कर सकती हैं, ताकि बड़े होकर बच्चे की पर्सनालिटी स्ट्रोंग और कांफिडेंट हो।

बच्चों में पर्सनालिटी डेवलपमेंट क्या है?
एक बच्चे की पर्सनालिटी के कई पहलू होते हैं, जो उसमें आत्मविश्वास, साहस और आत्म-सम्मान के साथ शुरू होता है और इसके आधार पर ही यह तय होता है कि वो दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है और उनका सम्मान करता है। तीन से छह साल की उम्र के बीच आप अपने बच्चे की पर्सनालिटी डेवलप होते हुए देखेंगी। यह बिलकुल सही समय है जब आप उन्हें पॉजिटिव तरीके से अपनी वैल्यूज सिखा सकती हैं। बच्चा अपने माता-पिता के व्यवहार से बहुत कुछ सीखते हैं और यह उसकी पर्सनालिटी को सबसे ज्यादा प्रभावित भी करता है।

बच्चे की पर्सनालिटी डेवलप करने के तरीके
कई माता-पिता यह सोचते हैं कि बच्चों को समय समय पर यह बताने से कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं, वो बच्चे की पर्सनालिटी को बेहतर तरीके से प्रभावित कर सकते हैं। बच्चे केवल समझाए जाने से वैल्यूज नहीं सीखते हैं, बल्कि आपके व्यवहार से बहुत कुछ सीखते हैं। इसलिए, बेहतर तरीका यही है कि आप उसे एक अच्छा परवरिश दें ताकि बच्चे की एक पॉजिटिव पर्सनालिटी निखर कर सामने आए, जो दिन भर में वो आपकी छोटी-छोटी चीजों से सीखता है। यहाँ कुछ तरीके दिए गए हैं जिससे आप अपने बच्ची की पर्सनालिटी डेवलप करने में उसकी सहायता कर सकती हैं।

1. अपने बच्चे को कोई टैग न दें 
शब्द की अहम भूमिका होती है। जब माता-पिता के रूप में आप किसी व्यवहार के लिए उसे कोई कैटेगरी दे देते हैं, जैसे मेरा बच्चा शर्मीला है, कुछ नहीं बोलता है आदि। ऐसा करने से आप जाने अनजाने में बच्चे को यह विश्वास दिला रहे होते हैं कि वह वास्तव में वो ऐसा ही है या वह ये नहीं कर सकता। बच्चे को कोई टैग देने से आप उनमें सुधार करने की संभावना को वही खत्म कर देते हैं। इससे बच्चे का आत्मसम्मान कम होने लगता है और यहाँ तक ​​कि वो अपने आसपास के बाकि लोगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार कर सकता है। इसलिए जब आप अपने बच्चे की गलतियों के बारे में उन्हें बता रहे हों तो अपने शब्दों पर बहुत ध्यान दें।

2. अपने बच्चे को सुनें
बच्चे को हर समय आपकी अटेंशन चाहिए होती है। जैसे-जैसे बच्चे बड़ा होने लगता है, वो खुद को स्वतंत्र महसूस करने लगता है। प्री-स्कूलर्स और टॉडलर्स बातों के जरिए खुद को ज्यादा अभिव्यक्त करते हैं, खासकर उस समय के दौरान जब बच्चे की लैंग्वेज स्किल्स विकसित हो रही होती है। माता-पिता के रूप में, आपको सब्र के साथ उनकी बातों को सुनना चाहिए ताकि उन्हें आपके साथ रहने में सुरक्षित और कॉन्फिडेंस महसूस हो। इससे आपका बच्चा भी एक अच्छा श्रोता बनेगा और उसके अंदर आत्मविश्वास विकसित होगा।

3. बच्चे की कमी पर नम्रता से पेश आएं  
बहुत सारे माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा हर चीज में बेहतरीन प्रदर्शन करे। जब बच्चे आपकी अपेक्षा के अनुसार खरा नहीं उतरते हैं, तो आप उस पर कई तरीकों से अपनी निराशा व्यक्त करने लगते हैं। हर बच्चे में एक यूनिक कैपबिलिटी होती है और माता-पिता के रूप में आपको इसकी पहचान करनी चाहिए और बच्चे को हमेशा प्रोत्साहित करना चाहिए। आप बच्चे का आत्मविश्वास कम किए बगैर उनकी कमियों को दूर करने का प्रयास करें।

4. अपने बच्चे की तुलना किसी और बच्चे से न करें 
अपने बच्चे की तुलना उसके दूसरे मित्रों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ करने से आपके बच्चे की पर्सनालिटी पर इसका बहुत ज्यादा बुरा प्रभाव पड़ सकता है। लगातार बच्चे की तुलना किसी और से करने पर बच्चे को यह संदेश जाता है कि वह अच्छा नहीं है। इस प्रकार बच्चे अपनी पहचान को लेकर भ्रमित हो जाते हैं और दूसरों की नकल करना शुरू कर देते हैं। यह बहुत जरूरी है कि आप सबसे पहले बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाएं और आप उसके अंदर की क्षमता की बाहर लाने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्रयास करें।

5. बच्चे के सामने सही व्यवहार करें 
सुनने के बजाय बच्चे जो देखते हैं, उससे ज्यादा सीखते हैं। इसलिए, व्यावहारिक रूप से उन चीजों को लागू करें जिससे आपके बच्चे पर अच्छा असर हो। छोटी-छोटी चीजों से शुरू करें, जैसे किताबों को पढ़ने के बाद उन्हें शेल्फ में वापस रख दें, बच्चा वही करेगा जो आपको करते देखेगा। यदि आपकी आदतें और व्यव्हार सही नहीं होगा तो बच्चे भी वही सीखेंगे। इसलिए, आप जो बच्चे को करने के लिए कह रहे हैं पहले उस पर खुद अमल करें।

6. बच्चे को खेलने दें 
कई कारणों से आज के बच्चे उतनी आजादी के साथ नहीं खेल पाते हैं। स्पोर्ट्स के जरिए बच्चे को केयरिंग, शेयरिंग और टीम स्प्रिट जैसी वैल्यूज सिखाना काफी आसान हो जाता है। स्पोर्ट्स और गेम्स बच्चे की पर्सनालिटी डेवलपमेंट के लिए बहुत जरूरी एक्टिविटीज में से एक है। कई माता-पिता अपने बच्चे को फील्ड में जाकर खेल से रोकते हैं और उन्हें किसी प्रकार के स्पोर्ट्स में भाग नहीं लेने देते हैं। लेकिन बच्चे की मेंटल और फिजिकल ग्रोथ के लिए आपको उन्हें स्पोर्ट्स एक्टिविटी में शामिल करना चाहिए। इससे बच्चे का स्ट्रेस कम होता है और वो अच्छा महसूस करते है।

7. घर में सबके लिए स्क्रीन टाइम सीमित करें
गैजेट्स आज के समय की आम समस्या है जिससे कई माता-पिता को संघर्ष करना पढ़ रहा है। स्टडी से पता चला है कि स्क्रीन पर बहुत ज्यादा समय बिताने से बच्चे के बौद्धिक और सामाजिक विकास पर बुरा असर पढ़ता है। बच्चों को गैजेट पर गेम खेलने की लत लग जाती है जिससे वो सामाजिक संपर्क में आना कम पसंद करते हैं। इसलिए, अपने बच्चे के साथ गेम खेलने और ट्रेवलिंग में ज्यादा से ज्यादा समय बिताने की कोशिश करें, बच्चे का ध्यान गैजेट से हटाने के लिए आपको उन्हें रियल लाइफ से परिचित कराएं। उन्हें वर्चुअल चीजों के बजाय अपने आसपास के लोगों महत्व देना सिखाएं।

8. घर का एक नियम बनाएं 
घर के बारे में बच्चे को अच्छी तरह से समझाने के लिए उन्हें उनकी जिम्मेदारियों के बारे में बताना आवश्यक है। कभी-कभी माता-पिता बच्चे को यह नहीं समझा पाते हैं कि वो बच्चे से क्या अपेक्षा करते हैं और फिर बच्चे के दुर्व्यवहार करने पर उन्हें डांट लगाते हैं। जब आप बच्चे को ठीक से नियम समझाएंगे, तो बच्चा धीरे-धीरे आपकी बातों को समझने लगेगा और उस पर अमल करने लगेगा। बच्चों को नियमों के अनुसार खुद को ढालने में थोड़ा समय लग सकता है, लेकिन लगातार नियमों का पालन करने से बच्चे की आदत पड़ने लगती हैं।

9. बच्चे को इंडिपेंडेंट बनाएं
बच्चे के माता-पिता आमतौर उसके सभी कामों में उसकी मदद करते हैं जिससे बच्चे की आजादी छिन जाती है साथ ही वो हर काम के लिए आप पर निर्भर होने लगते हैं। हालांकि, बच्चे की देखभाल और उनका खयाल रखना आपका फर्ज है, लेकिन उन्हें आपकी जिम्मेदारियों को कैसे मैनेज करना है ये भी बताना बहुत जरूरी है। जैसे अपना स्कूल बैग खुद पैक करना, अपने दाँत ब्रश करना या अपना होमवर्क खुद करना आदि कामों के लिए आप बच्चे को प्रोत्साहित कर सकते हैं। यह न केवल उनकी लाइफ स्किल को बेहतर करता है, बल्कि उनके अंदर जिम्मेदारी की भावना पैदा करता है।

10. जेंटल पेरेंटिंग का अभ्यास करें
अपने बच्चे को शारीरिक रूप से सजा देना या उनकी गलतियों के लिए उन पर चिल्लाना आपके और बच्चे दोनों के और भी मुश्किल पैदा कर सकता है। कई बार, बच्चे पर चिल्लाने से वो आपकी बातें दिल पर ले लेते हैं और अपनी को सुधारने का प्रयास भी नहीं करते हैं, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही होती है। आराम से और धैर्यपूर्वक बच्चे को उसी गलती का अहसास दिलाएं कि गलत काम करने से क्या हो सकता है, इस प्रकार वो अपनी गलती को सुधारने का प्रयास करेंगे। जब आप अपने बच्चे पर बार बार चिल्लाते हैं, तो उसके अंदर से आपका डर निकल जाता है और वो नहीं समझते कि उनके किसी भी एक्शन से क्या परिणामों हो सकता है। आप उन्हें समझाएं या फिर कभी कभी छोड़ दें ताकि वो खुद अपनी गलती का अहसास कर सकें।

बच्चों की पर्सनालिटी डेवलपमेंट से जुड़े मिथ
‘पर्सनालिटी’ शब्द का लोग अक्सर गलत मतलब समझते हैं। यह एक मिथ है कि बच्चे की पर्सनालिटी केवल रूप-रंग तक सीमित है। जिसकी वजह से माता-पिता बच्चे के कपड़े, सौंदर्य और उसके स्वास्थ्य पर ज्यादा जोर देते हैं, लेकिन आपको बता दें यह चीजें ‘पर्सनालिटी का एक पहलू हैं। इसके अलावा भी कई चीजें हैं जो बच्चे की पर्सनालिटी को बेहतर बनाने में सहयोग करती हैं जैसे नॉलेज, सोशल स्किल, इंटरपर्सनल स्किल आदि बच्चे की पर्सनालिटी को बैलेंस करती हैं।

याद रखें कि बच्चे का एक अच्छा पर्सनालिटी डेवलप करना एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें आपको कुछ परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। लेकिन जब आप बच्चे को लगातार पॉजिटिव वैल्यूज के बारे में सिखाती हैं, तो आगे चल कर बच्चे का बेहवियर और ऐटिटूड एक अच्छी दिशा में विकसित होता है।


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20 गुड मैनर्स जो बच्चों को जरूर सिखाना चाहिए

 
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यदि आपका बच्चा छोटा है तो इसका यह मतलब नहीं है कि अभी अच्छी बातें या शिष्टाचार सिखाने की उसकी उम्र नहीं है। छोटी आयु से ही बच्चे नई-नई चीजें बहुत जल्दी सीख जाते हैं। बच्चों को हमेशा याद रहता है कि उन्हें क्या सिखाया गया है और वे बड़ी आयु की तुलना में बचपन में चीजों को बहुत तेजी से सीखते हैं। 

बच्चों में शिष्टाचार और संस्कार ही दर्शाते हैं कि उनकी परवरिश कितनी अच्छी तरह से की गई है। बच्चों को अच्छी बातें सीखाना थोड़ा कठिन हो सकता है पर ध्यान रखें इस दौरान आपके लिए धैर्य रखना जरूरी है। आखिर धैर्य रखना भी एक अच्छी आदत है और बच्चे अपने बड़ों से ही सीखते हैं कि उन्हें एक अच्छा व्यक्ति कैसे बनना चाहिए। इसलिए माता-पिता या बड़े होने के नाते यह जरूरी है कि बच्चों के सामने अच्छा व्यवहार करें ताकि वे भी आपको देखकर सीखें। 

बच्चों को अच्छी बातें सिखाने से वह पूर्ण रूप से एक अच्छा, दयालु, सभ्य और महत्वकांक्षी व्यक्ति बनता है। इस लेख में हमने उन 20 अच्छी बातों के बारे में विस्तार से चर्चा की है जो हर बच्चे में होनी चाहिए। 

बच्चों को मैनर्स सिखाना क्यों जरूरी है 
एक बच्चे के अच्छे मैनर्स हमेशा दूसरों को प्रेरित करते हैं, फिर चाहे वो स्कूल में हों या समाज में लोगों के बीच। यहाँ बताया गया है कि बच्चों में शिष्टाचार होना क्यों जरूरी है, आइए जानते हैं;

1. बच्चे का सेल्फ-कॉन्फिडेंस बढ़ता है 
इस रियल वर्ल्ड में बच्चों को उनके अच्छे बिहेवियर और मैनर्स पर तारीफ मिलने से उनमें सेल्फ-कॉन्फिडेंस आती की है। किसी के इंसान को रेस्पेक्ट मिलने पर उसका कॉन्फिडेंस बढ़ता है।  

2. उसकी सोशल लाइफ अच्छी होती है
जो बच्चे रूड और गुस्सैल होते हैं, वे गलत संगत को आकर्षित करते हैं। वहीं दूसरी ओर जो बच्चे अपने बड़ों और दोस्तों को रेस्पेक्ट करते हैं और उनकी हमेशा मदद करते हैं वे पॉपुलर होते हैं और हमेशा अच्छी संगत व अपने जैसे लोगों को ही आकर्षित करते हैं। हमेशा अच्छे मैनर्स के साथ ही स्ट्रांग और पॉजिटिव रिश्ते बनते है।  

3. बेटर ओपोर्चुनिटीज मिलते हैं 
अच्छे मैनर्स वाले बच्चे हमेशा ही भीड़ से अलग दिखाई देते हैं और एकेडेमिक जीवन व करियर में उन्हें अच्छे ओपोर्चुनिटीज मिलते हैं। सभ्य लोग अक्सर जल्दी एम्प्लॉइड होते हैं और अपने करियर में बहुत तेजी से आगे बढ़ते हैं।

4. ढेरों खुशियां आती हैं 
कुछ अच्छा करने या किसी से अच्छा रेस्पॉन्स मिलने से अक्सर लोगों को खुशी व संतुष्टि मिलती है, और वे इन अच्छी आदतों को अडॉप्ट करते हैं और अपनी बिहेवियर में शामिल कर लेते हैं।  गुड मैनर्स व्यवहार बच्चों की जिंदगी में खुशियां लेकर आती हैं। 

20 गुड मैनर्स जो बच्चों को सिखानी चाहिए 
1. बच्चों को ‘प्लीज’ और ‘थैंक यू’ कहना सिखाएं 

यह एक आम शिष्टाचार है जो बच्चों को सबसे पहले सिखाना चाहिए। बच्चों को उनके बचपन से ही ‘प्लीज’ और ‘थैंक यू’ कहने का महत्व बताएं। उन्हें बताएं कि जब हम किसी से कुछ पूछते या विनती करते हैं, उस वक्त प्लीज कहना चाहिए और किसी की मदद लेने पर या कोई भी चीज लेते समय थैंक यू कहना चाहिए। इससे बच्चों में यह आदत बन जाएगी। 

2. कुछ भी लेने से पहले बच्चों को पूछना सिखाएं
बच्चों को सिखाएं कि वे हमेशा किसी की कोई भी चीज लेने से पहले उनसे पूछ लें क्योंकि वह किसी और की चीज है। चाहे वह चीज उसके दोस्त, रिश्तेदार या माता-पिता का ही क्यों न हो, लेने से पहले पूछना जरूरी है। अपने बच्चे को यह भी सिखाएं कि उसने जो चीज ली है, उसे ‘थैंक यू’ कहते हुए वापस करे। 

3. बच्चों को माफी मांगना सिखाएं या सॉरी बोलना सिखाएं 
प्लीज और थैंक यू के साथ बच्चे को सिखाएं कि यदि वह कोई गलती करता है तो उसे सॉरी कहना यानी माफी मांगना भी जरूरी है। बच्चे में गलती करने पर माफी मांगने की आदत होनी चाहिए। बच्चे को सिखाएं कि उसे कब व कहाँ माफी मांगनी चाहिए और हर बार ऐसे ही सॉरी नहीं बोलना चाहिए। माफी मांगना एक स्किल है जिसे अपने बिहेवियर में ढालना आना चाहिए। 

4. अंदर जाने से पहले बच्चों को दरवाजा खटखटाना सिखाएं 
बच्चों को विशेषकर घर में प्राइवेसी के मायने सीखना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि किसी के कमरे में जाने से पहले सम्मान से दरवाजा खटखटाकर अंदर आने के लिए पूछना जरूरी है। यदि आपका बच्चा यह सब चीजें आपके सामने करेगा तो उसे अच्छी आदतें बनाने में मदद मिल सकती है।

5. खांसते या छींकते समय बच्चों को मुंह ढकना सिखाएं 
बच्चों को सिखाएं कि उन्हें जब भी खांसी या छींक आती है तो उन्हें अपना मुंह ढकना चाहिए। साथ ही उन्हें बताएं कि कई लोगों के सामने नाक में उंगली डालना बैड बिहेवियर होता है। यह सिर्फ अच्छी आदतें ही नहीं हैं बल्कि यह स्वच्छता का भी एक भाग है। 

6. बच्चों को ‘एक्सक्यूज मी’ कहना सिखाएं 
यह एक और अच्छी आदत है जो बच्चों में होनी चाहिए। बच्चों में धैर्य की कमी होती ही है इसलिए उन्हें यह सिखाना जरूरी है कि उन्हें बाद करने से पहले ‘एक्सक्यूज मी’ बोलना आना चाहिए। आप अपने बच्चे को यह भी सिखा सकते हैं कि किसी को बात को बिना काटे अपनी बात कैसे रखनी चाहिए। 

7. लोगों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए 
यह बच्चों को शुरू से ही सिखाना चाहिए, यदि एक बच्चे को नहीं पता है तो उसके लिए किसी का मजाक उड़ाना एक आम बात है। आप अपने बच्चे को सीखा सकते हैं कि लोगों के सामने या अकेले में भी किसी का मजाक उड़ाकर उसकी भावनाओं को चोट पहुँचाना अच्छी बात नहीं होती है। 

8. फोन मैनर्स सिखाएं 
आपके बच्चे को पता होना चाहिए कि फोन पर बात कैसे की जाती है और जब कोई बात करता है तो चुप रह कर उसकी बात सुनना भी जरूरी है। इससे बच्चों को लोगों पर अपना अच्छा प्रभाव डालने में मदद मिलती है।

9. बड़ों की रेस्पेक्ट करना सिखाएं 
बहुत पहले से यह ट्रेडिशन चली आ रही है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए बच्चों को अपने से बड़ों की रेस्पेक्ट करना चाहिए। अपने बच्चे को सिखाएं कि वह अपने माता-पिता, दादा-दादी, टीचर्स और अन्य बड़ों की रेस्पेक्ट करनी चाहिए। बड़ों का आदर करने का एक यह भी तरीका है कि बच्चों से पहले घर के बड़ों को खाना परोसें या पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बड़ों या बुजुर्गों को बैठने के लिए अपनी सीट दें और यदि बच्चा आपको ऐसा करते हुए देखता है तो वह भी इस आचरण को अपना लेगा। उन्हें इसके महत्व का ज्ञान भी होगा। 

10. बच्चों को लोगों का नाम याद रखना सिखाएं 
किसी का नाम पुकारना या याद रखना यह दर्शाता है कि आपने उनके नाम को याद रखने का प्रयास किया है । अपने बच्चे को सिखाएं कि उसे अपने दोस्त या परिवार के किसी सदस्य का नाम बार-बार पुकारने से उसे याद हो जाएगा। किसी का नाम याद रखना भी शिष्टाचार का ही अंश है। 

11. बच्चों को लोगों की तरफ उंगली से इशारा करना या घूरना न सिखाएं 
बच्चों को लोगों की भावनाओं को समझाने के लिए आप उदाहरण के तौर पर यह कह सकते हैं कि जब हम किसी की तरफ एक उंगली करते हैं तो बाकी तीनों उंगलियां हमारी तरफ ही होती हैं। बच्चे से पूछें कि उसे कैसा लगेगा यदि कोई इस प्रकार से उसकी तरफ उंगली करके इशारा करेगा या उसे घूरेगा। इससे बच्चे को समझ में आ सकता है कि किसी को घूरना या उसकी तरफ उंगली दिखाना गलत बात होती है। 

12. बच्चों को विकलांग लोगों के लिए दयालु बनना सिखाएं  
बच्चे हर चीज के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक होते हैं इसलिए यदि वे किसी विकलांग व्यक्ति को देखते हैं तो उसकी तरफ इशारा करते हैं, जोर से सवाल पूछ सकते हैं या डर भी सकते हैं। बच्चों को यह सिखाना चाहिए कि विकलांग व्यक्ति भी अन्य लोगों की तरह ही होते हैं और उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा अन्य लोगों के साथ किया जाता है। 

13. बच्चों को अच्छा गेस्ट बनना सिखाएं 
किसी के घर जाते समय बच्चे को काइंड और पोलाइट बनना सिखाएं। बच्चों को यह बताएं कि किसी के घर जाने के बाद वहाँ कैसा व्यवहार करना चाहिए, जिद व शैतानी नहीं करनी चाहिए और अपनी बात को स्पष्ट रूप  से सम्मान के साथ कहना चाहिए। आप अपने बच्चे को यह भी सिखा सकती हैं कि जब कोई मेहमान घर आते हैं तो उनके साथ भी कैसा व्यवहार करना चाहिए। 

14. बच्चों को अच्छी तरह से बात करना सिखाएं 
बच्चों को यह सीखना चाहिए कि चिल्लाना, गुस्सा करना और शोर मचाना किसी से बात करने का सही तरीका नहीं है। वह जितना भी गुस्से में हो उसे प्यार से बात करना सिखाएं और अपनी बात को आराम से कहना सिखाएं। आप अपने बच्चे के सामने ऐसा ही व्यवहार करके उसे भी अच्छी तरह बोलना सिखा सकते हैं। बच्चे को सिखाएं कि जब कोई दूसरा व्यक्ति बात कर रहा हो तो उसकी बात पूरी होने तक का इंतजार करें फिर अपनी बात को रखें। इस आदत से आपका बच्चा आपको भी सुनना शुरू कर देगा।

15. बच्चों को काइंड बनना और लोगों की मदद करना सिखाएं 
आप अपने बच्चे में दूसरों के प्रति दया का भाव रखने और किसी की मदद करने की आदत भी डाल सकती हैं। इससे आपके बच्चे को खुद में अच्छा महसूस होगा और वह लोकप्रिय होगा। आप बच्चे को कुछ चीजें सीखा सकते हैं, जैसे यदि किसी के हाथ में बहुत सारा सामान है तो उसके लिए दरवाजे को खोलना और पकड़े रखना या किसी काम में अपने माता-पिता व शिक्षक की मदद करना। 

16. बच्चों को शेयर करना सिखाएं 
जब बच्चे अन्य बच्चों के साथ खेलना शुरू कर देता है तो उसमें यह आदत होना बहुत जरूरी है। अपने बच्चे को सिखाएं कि शेयर करना ही किसी की केयर करना होता है  और वे भी अपने टॉयज या भोजन किसी से शेयर कर सकते हैं। आप खेल-खेल में भी अपने बच्चे को शेयर करना सिखा सकते हैं। 

17. बच्चों को अपना काम खुद करना सिखाएं 
बच्चे खाते समय गंदगी कर सकते हैं या अपने कपड़ों को इधर-उधर डाल सकते हैं या उपयोग के बाद अपने टॉयज को ठीक से नहीं रखते हैं। बच्चे में साफ-सफाई रखने की आदत डालने के लिए उसे खाने के बाद सिंक पर अपनी प्लेट धोना सिखाएं या उससे कहें कि वह घर के काम करने में मदद करे। बच्चा समय रहते अपने आप ही साफ सफाई रखना सीख जाएगा। 

18. बच्चों के साथ ईमानदार रहें 
बच्चों को छोटी उम्र से ही ईमानदार रहना सिखाएं और उन्हें बताएं कि उन्हें झूट नहीं बोलना चाहिए। यह महत्वपूर्ण वैल्यूज हैं जो बच्चों के लिए जरूरी हैं। सुनिश्चित करें कि वह हमेशा उन बातों पर दृढ़ रहे जो वह कहता है। यदि बच्चा खोकले वाडे करता है तो उसके साथ बैठें और उसे सच बोलने का महत्व बताएं। दृढ़ रहें और उन्हें बताएं कि ईमानदारी ही एक सबसे अच्छी नीति है। बच्चों का नैतिक विकास शुरू से होना बहुत जरूरी है।

19. बच्चों को अन्य लोगों से आई कांटेक्ट के साथ बात करना सिखाएं 
किसी से बात करते समय आई कांटेक्ट बनाए रखने से आत्मविश्वास और लोगों में सम्मान भी बढ़ता है। बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम बिताते समय उसे इस बात का भी महत्व समझाएं और उसके साथ बात करते समय आई कांटेक्ट रखें। यदि वह इस आदत को अपना लेता है तो वह बहुत आगे जाएगा और अन्य लोगों से उसके संबंध भी अच्छे होंगे। 

20. बच्चों के सामने गलत भाषा का उपयोग न करें 
गलत भाषा बहुत ज्यादा अपमानजनक और असभ्य होती है। आप अपने बच्चे को सिखाएं कि उसे किसी से भी गलत भाषा में बात नहीं करनी चाहिए। फिर चाहे उसने यह सब टीवी पर किसी शो में सुना हो या कहीं और। इस आदत को सीखना बहुत जरूरी है। आप चाहें तो अपने बच्चे के साथ आराम से बैठें और उसे समझाएं कि ऐसी भाषा का उपयोग करना क्यों गलत होता है। 

बच्चों को शिष्टाचार कैसे सिखाएं 
एक माता-पिता होने के नाते आपकी भी जिम्मेदारी है कि आप अपने बच्चे में अच्छी आदतों का महत्व समझें और यह सुनिश्चित करें कि वह उन्हीं आदतों के साथ बड़ा हो रहा है। आप अपने बच्चे में अच्छी आदतें बनाने के लिए निम्नलिखित टिप्स का उपयोग कर सकते हैं, वे कौन से हैं आइए जानें;
  • सबसे पहले वे सभी आदतें आपको खुद में डालनी होंगी। बच्चे अपने माता-पिता को अपना रोल मॉडल मानते हैं। यदि आप चाहते हैं कि आपके बच्चे में अच्छी आदतें हों तो सुनिश्चित करें आप उनके सामने अच्छा व्यवहार व अच्छी बातें करें। यहाँ तक कि यदि आपको गुस्सा भी आता है तब भी आप अपने बच्चों के सामने अपने संस्कारों को न भूलें। 
  • घर में आप बच्चे को अपने सामने अच्छा व्यवहार तब तक करने के लिए कह सकती हैं जब तक उसे इन सबकी आदत न पड़ जाए। बच्चों का व्यवहार, जैसे सभ्य रहना, पूछ कर अंदर आना, खाना खाते समय शिष्टाचार का पालन करना, बड़ों का आदर करना और इत्यादि घर में भी ऐसा ही होना चाहिए। 
  • यदि आपका बच्चा कुछ अच्छा करता है या उसकी कोई अच्छी आदत सामने आती है तो सुनिश्चित करें कि आप पॉजिटिव शब्दों से उसको प्रेरित करें। बच्चों को तारीफें पसंद होती हैं और हर समय उन्हें प्रेरित करने से उनमें और अच्छा बनने में मदद मिलती है। अपने बच्चे की अच्छी आदतें नजरअंदाज करने से उसमें उल्टा असर भी पड़ सकता है और वह आपकी अटेंशन के लिए कोई गलत काम भी कर सकता है। 
  • यदि आपका बच्चा कुछ गलत करता है तो उसे वहीं उसी समय सुधारने का प्रयास करें। यदि आप किसी से बात कर रहे हैं और बच्चा आपको बीच में आ रहा है तो उसे प्यार से समझाएं। हालांकि यदि आपका बच्चा बहुत सेंसिटिव है तो उससे अकेले में बात करें। 
  • बच्चे अपनी शैतानियों से कई बार आपको तंग कर सकते हैं पर आपको धैर्य बनाए रखना है। बच्चों पर गुस्सा न करना और उन्हें न डांटना बहुत जरूरी है। यदि आप शांत हैं और अपने बच्चे से प्यार से बात करते हैं तो आपका बच्चा भी बिलकुल वैसे ही आपसे व्यवहार करेगा।  
  • यदि आप अपने बच्चे को सिखाते हैं कि अन्य धर्म, ग्रुप, जेंडर और नेशनलिटिज के लोगों का हमेशा सम्मान करना चाहिए तो सुनिश्चित करें कि आप भी वैसा ही करते हैं। अपने बच्चे को सिखाएं कि वह लोगों को उनके चरित्र से ही आंके, बाकी किसी और चीज से नहीं। 
  • बच्चों के सामने सभ्य भाषा का उपयोग करें। बच्चों को शिष्टाचार सिखाते समय उन्हें इसके कुछ पहले शब्द, जैसे ‘थैंक यू कहना’, ‘सॉरी कहना’, ‘एक्सक्यूज मी’ कहना और ‘किसी की चीज पूछ कर उपयोग करना’ सिखाना बहुत जरूरी है। बच्चों के सामने इन बातों का बार-बार उपयोग करें और उससे भी अपने लिए भी ऐसा ही व्यवहार करने को कहें। इसे अपने घर का एक नियम बना लें और इससे आपका बच्चा अपने आप ही अच्छी बातें सीखने का अभ्यास करने लगेगा। 
मैनर्स बहुत जरुरी चीज है जिससे बच्चों में समझ बढ़ती है और बड़े होकर उन्हें एक अच्छा इंसान बनाती है। इसकी मदद से बच्चों को लोगों का साथ अच्छा लगेगा, वे स्कूल और ऑफिस में सफलता प्राप्त कर सकते हैं और उनमें दूसरों से एक अच्छा संबंध बनाने की समझ होगी। एक पोलाइट और थॉटफुल बच्चा ही अन्य लोगों पर अपना अच्छा प्रभाव डाल सकता है। इसलिए बच्चों को छोटी आयु से ही ऊपर दिए हुए मैनर्स सिखाएं।


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10 मोरल वैल्यूज जो आपको अपने बच्चों को सिखाने चाहिए

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बच्चों का पालन-पोषण करना केवल उनके शारीरक विकास तक सीमित नहीं है – बल्कि यह मानसिक विकास को बढ़ाने से भी जुड़ा हुआ है। माता-पिता, यकीनन अपने बच्चों के करैक्टर को बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं और सबसे ज्यादा प्रभाव इस बात पर पड़ता है कि आपका बच्चा जब बड़ा होता है तो अपने जीवन में कैसे आगे बढ़ता है।

कुछ लोगों का कहना है कि बच्चे अपने आप मोरल वैल्यूज सीखते हैं या सीखने के लिए प्रीस्कूल भेजना जल्दबाजी करने जैसा है। हालांकि, यह गलत है; बच्चों को छोटी उम्र से ही मोरल वैल्यूज सिखाना सबसे अच्छा होता है, ताकि बड़े होने के साथ ही यह वैल्यूज उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाए।

आइए, कुछ मोरल वैल्यूज पर एक नजर डालें जो हर माता-पिता को अपने बच्चों को सिखाना चाहिए।

अपने बच्चों में मोरल वैल्यूज विकसित करने के तरीके
1. जैसा कहें वैसा ही करें
बच्चे अपने आस-पास के लोगों से सीखते हैं, इसलिए अपने बच्चों को अच्छे संस्कार सिखाने के लिए, आपको उनके जीवन में एक आइडियल की तरह बनना चाहिए। आप उन्हें बातों बातों में मोरल वैल्यूज सीखा सकते हैं, लेकिन आपका बच्चा केवल उन चीजों को मन में बिठाएगा जिन्हें आप अपने व्यवहार के माध्यम से उन्हें दिखाते हैं या करते हैं।

2. अपने व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में बात करें
व्यक्तिगत अनुभव कहानियों की तरह होते हैं और सभी बच्चों को कहानियां सुनना पसंद होता है। इसलिए आप आपने जीवन में जो अनुभव किया उन्हें अपने बच्चे के साथ शेयर करें, उन्हें बताएं कि कैसे आपने जीवन में यह मोरल वैल्यूज काम आई, इस प्रकार आपका बच्चा चीजों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ सकेगा।

3. अच्छे व्यवहार के लिए इनाम दें
जब आपका बच्चा मोरल वैल्यूज का पालन करें आप उन्हें इस अच्छे काम लिए शाबाशी दें और इसके लिए उन्हें इनाम भी दें ताकि उन्हें अच्छे काम करते रहने की प्रेणा मिलती रहे। बच्चों की प्रशंसा करना और पुरस्कार देना उनके ऊपर पॉजिटिव असर डालता है, जो बच्चों के विकास में अच्छा कार्य करता है।

4. प्रभावशाली ढंग से बच्चों के साथ कम्यूनिकेट करें
अपने बच्चे को बताएं की यह मोरल वैल्यूज उनके जीवन में हर रोज कैसे काम आतें हैं। उदाहरण के लिए, आप अखबार के एक लेख पर चर्चा कर सकते हैं और अपने बच्चे से पूछ सकते हैं कि वह उसी स्थिति में क्या करेंगे।

5. टेलीविजन और इंटरनेट के उपयोग पर नजर रखें
आज के समय में टेलीविजन और इंटरनेट से बच पाना मुश्किल है, लेकिन आप निश्चित रूप से बच्चे पर निगरानी रख सकते हैं कि आपका बच्चा क्या देख रहा है। इस बात का खयाल रखें की आपका बच्चा जो भी चीज देखे वो उसे अच्छी बातें सिखाती हो, उन्हें मोरल वैल्यूज पर अमल करना सिखाती हो और उन्हें उनकी उम्र के मुताबिक चीजें देखने की अनुमति दें।

10 मोरल वैल्यूज बच्चों के जीवनभर के लिए
1. आदर करना सिखाएं
कई माता-पिता अपने बच्चों को सिर्फ बड़ों के सम्मान करना सिखाते हैं, लेकिन यह गलत है। हर व्यक्ति सम्मान का हकदार होता है, चाहे वह किसी भी उम्र का हो या किसी भी समाज से हो। दूसरों का सम्मान करना मोरल वैल्यूज का एक अहम हिस्सा है जिसे आपके बच्चे को कम उम्र में जानना चाहिए, क्योंकि इससे उन्हें यह समझ में आती है कि अजनबियों और अपने बड़ों से कैसे व्यवहार करना है। वे बच्चे जो अपने दोस्तों और बड़ों का छोटी उम्र से सम्मान करना सीखते हैं, उन्हें भविष्य में इसका फायदा मिलता है। यहाँ तक कि यदि भविष्य में उसके सामने कोई मुश्किल समय आ जाए, तब भी आपका बच्चा दूसरों के प्रति सम्मान बनाए रखेगा।

2. परिवार का महत्व बताएं
परिवार बच्चों के जीवन का अभिन्न अंग है। यह उनके बड़े होने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए, अपने बच्चों को यह समझाना बहुत जरूरी होता है कि एक परिवार किसी इंसान के लिए कितना जरूरी होता है, ताकि वो इसका महत्व समझ सके। इस प्रकार आपका बच्चा अपने परिवार के सुख-दुःख में साथ रहेगा।

3. एडजस्ट और कोम्प्रोमाईज करना सिखाएं
बच्चे को यह बताना बहुत जरूरी है कि हर चीज उनके अनुसार नहीं हो सकती हैं या उनके हिसाब से काम नहीं करेगा। उन्हें कम उम्र से यह सिखाएं कि जब कोई चीज उनके अनुसार न हो तो उन्हें चीजों से एडजस्ट और कोम्प्रोमाईज करना पड़ता है। एक ओर जहाँ बच्चे को एडजस्ट करना सिखाना मोरल वैल्यूज का हिस्सा है वहीं हद से ज्यादा एडजस्ट करना उन के लिए बुरा भी हो सकता है। इसलिए उन्हें कब एडजस्ट करना चाहिए और कब नहीं यह बात अच्छे से बताए, यदि बच्चे को किसी कोम्प्रोमाईज से नुकसान हो सकता है, तो यह न केवल उनके व्यक्तित्व पर बुरा असर डाल सकता है, बल्कि उसकी पहचान पर भी अंकुश लगा सकता है।

4. दूसरों की सहायता करना सिखाएं
अपने बच्चे को छोटी उम्र से ही दूसरों की मदद करना सिखाया जाना चाहिए, भले ही कोई अजनबी ही क्यों हो। आपको अपने बच्चे को यह सिखाना होगा कि दूसरों की मदद करना जरूरी क्यों है और जब आप किसी की मदद करते हैं तो आपको बाद में किस तरह से यह मदद वापस मिलती है। समाज का एक हिस्सा होने की वजह यह बहुत जरूरी है कि आपका बच्चा दूसरों की जरूरतों को समझे।

5. सभी धर्म का सम्मान करना बताएं
आपके बच्चे का ऐसे पालन-पोषण किया जाना चाहिए, जहाँ न केवल उसे अपने धर्म का सम्मान करना आना चाहिए, बल्कि उसे यह भी बताना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म चुनने का अधिकार है। छोटी उम्र से ही अपने बच्चों को सिखाएं कि सभी मनुष्य एक समान हैं, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो या वे कोई भी त्योहार मनाएं।

6. सही और गलत में फर्क करना सिखाएं
बच्चे को सही और गलत में फर्क बताना मोरल वैल्यूज का बहुत ही अहम हिस्सा है, न्याय क्यों जरूरी है और उसके साथ हमेशा खड़े रहना चाहिए, इसका महत्व बच्चे को बताएं। यह बातें आपको बच्चे में कम उम्र से ही डालना शुरू कर देनी चाहिए। अपनी और दूसरों की भलाई के लिए, बच्चों को हमेशा गलत चीजों के खिलाफ बोलने के लिए प्रोत्साहित करें।

7. ईमानदारी सिखाएं
छोटी उम्र से, बच्चों के लिए ईमानदारी को सबसे महत्वपूर्ण मोरल वैल्यूज में से एक बताना चाहिए। ईमानदारी बेहद अनमोल है और आपके बच्चे को ऑनेस्ट रहने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करें, भले ही उसने कोई भी गलती की हों।

8. कभी भी किसी को ठेस न पहुँचाएं
अपने बच्चे को समझाएं कि किसी को चोट पहुँचाने का मतलब सिर्फ यह नहीं कि हम किसी को केवल शारीरिक रूप से ही चोट पहुँचा सकते हैं, कभी कभी हमारे व्यवहार से दूसरों को साइकोलॉजिकल या इमोशनल रूप से ठेस पहुँच सकती है। उन्हें बताएं कि अगर उन्होंने किसी का दिल दुखाया है या कोई गलती की है तो उन्हें समाने वाले से माफी मांगनी चाहिए और तुरंत अपनी गलती की माफी मांगनी चाहिए।

9. चोरी करना बुरी बात है
चोरी करना गलत है, इसके पीछे भले कोई भी कारण हो, यह मोरल वैल्यू भी बाकि की तरह बच्चों को सिखाना जरूरी है। अपने बच्चे को सिखाएं कि चोरी एक गलत चीज है, न केवल कानूनी रूप से, बल्कि नैतिक रूप से भी, जैसा कि आपका बच्चा किसी और की चीज बिना उनसे पूछे लेता है तो यह गलत है, किसी की भी चीज लेने से पहले हमेशा पूछना चाहिए।

10. शिक्षा के प्रति लगाव पैदा करें
बच्चों के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है और यह उनके जीवन में बहुत अहम भूमिका निभाती हैं यह इस बात पर निर्भर करती है कि आपका बच्चा अपने जीवन में आगे क्या करेगा या कैसा बनेगा। बच्चों में शिक्षा के प्रति रुझान पैदा करना बहुत जरूरी होता है, इसकी शुरुआत आपको प्रीस्कूल से ही कर देनी चाहिए और उन्हें पढ़ाई का महत्व बताना भी बहुत जरूरी है।

आप बच्चों में शुरुआत से ही मोरल वैल्यूज डालना शुरू कर दें, इसके लिए उम्र कम है या ज्यादा यह बात मायने 
नहीं रखती है। यह बच्चे के व्यक्तित्व को बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है और बच्चा अपने जीवन को कैसे 
आकार देता है, इसमें उनकी बड़ी भूमिका होती है।


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जिद्दी बच्चों के साथ कैसे डील करें?

 
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क्या आपका बच्चा बहुत जिद्दी है? बच्चों में हठ करने की आदत बचपन से ही हो सकती है। लेकिन यह जानकार आपको राहत मिल सकती है कि आपके अलावा बहुत से माता-पिता इस परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। जिस तरह से आप अपने बच्चे की परवरिश करते हैं, इससे यह तय होता है कि वह बड़ा होकर कैसा बनेगा। बच्चों को संभालने और उन्हें अच्छी बातें सिखाने के लिए बचपन व किशोरावस्था अधिक महत्वपूर्ण व साथ ही कठिन समय होता है।

यह समझना जरूरी है कि जिद्द करना कुछ बच्चों के व्यक्तित्व का एक हिस्सा होता है जबकि अन्य बच्चों में यह आदत दूसरों पर दबाव डालने और अपनी मांग पूरी करने तक ही सीमित रहती है। इस लेख के माध्यम से हम आपको विस्तार में यह सुझाव देते हैं कि कैसे आप अपने बच्चे को विभिन्न तरीकों से तनाव-मुक्त रहना और अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सिखा सकते हैं। 

जिद्दी बच्चों के आम लक्षण
यदि आपका बच्चा अपनी बात मनवाने के लिए आपसे जिद्द करता है तो इसका यह मतलब नहीं है कि उसका स्वाभाव हठी या जिद्दी है। ढृंढ निश्चय करने और जिद्द करने में बहुत थोड़ा सा ही अंतर होता है, इस अंतर को समझने के लिए आप जिद्दी व्यवहार के निम्नलिखित लक्षणों पर ध्यान दें; 
यदि बच्चा अत्यधिक बुद्धिमान और रचनात्मक है। 
  • हर चीज पर सवाल उठाना, जिससे बच्चे को विद्रोही समझा जा सकता है
  • जिद्दी बच्चा हमेशा चाहता है कि उसे सुना जाए और लोग उसकी तरफ आकर्षित हो। 
  • अगर वह बेहद स्वतंत्र स्वाभाव का है। 
  • वह बच्चा जो अपने कार्य के प्रति प्रतिबद्ध रहता है । 
  • यदि बच्चा बार-बार गुस्सा करता है। 
  • यदि बच्चा नेतृत्व का लक्षण प्रदर्शित करता है और अपनी चलाने वाला भी हो सकता है। 
  • यदि बच्चा सब कुछ अपनी गति से करता है। 
  • जिस बच्चे का स्वाभाव जिद्दी होता है वे अपने पहले से तय की हुई चीजों को पाने में संकोच नहीं करता है, भले ही उसमें कितना भी खतरा हो या उन्हें इसे पाने के लिए नियम ही क्यों न तोड़ने पड़ें।
  • जिद्दी बच्चों का मनोविज्ञान 
  • यदि आपका बच्चा बहुत जिद्दी है तो उसे अपने अनुसार संभालने के लिए पहले समझें कि वह ऐसा क्यों है और ऐसी कौन सी चीज है जो उसे इतना जिद्दी बना रही है। बच्चे का दृढ़ निश्चयी होना एक अलग बात है और उसका जिद्द करना अलग है। 
दृढ़ संकल्प को ‘मजबूत उद्देश्य’ के रूप में परिभाषित किया गया है जबकि जिद्दी होना ‘विचार को बदलने से इंकार, व्यवहार और बाहरी दबाव’ है। बच्चों में हठ आनुवंशिक हो सकता है या वे यह व्यवहार दूसरों को देखकर सीख सकते हैं। आपके बच्चे में इस व्यवहार को उपयुक्त बनाने के लिए इसे रूपांतरित किया जा सकता है जिससे भविष्य में आपके बच्चे का व्यक्तित्व बहुमुखी बने। 

जिद्दी बच्चों को कैसे संभालें?
जिद्दी व्यवहार बचपन, बालावस्था या किशोरावस्था – किसी भी आयु में हो सकता है और यह व्यवहार एक व्यस्क की अवस्था तक रह सकता है। माता-पिता के रूप में आपके लिए यह महत्वपूर्ण है कि आप अपने बच्चों को कुछ ऐसे तरीकों से संभालें जो आप दोनों पर अधिक दबाव न डाले और उसके जिद्दी व्यवहार को बदलने में भी मदद करे। जिद्दी बच्चों को संभालने के कुछ तरीके निम्नलिखित हैं, आइए जानें;

1. ध्यान भटकाएं
ऐसी कुछ स्थितियां हो सकती हैं जिसमें आप और आपका बच्चा एक दूसरे से सहमत न हों, उदाहरण के लिए कार की सीट। यदि बाहर जाने के निर्णय से आपकी और आपके बच्चे की इच्छाओं के प्रति तालमेल नहीं बैठता है तो यह बताकर उसका ध्यान भटकाएं कि आप कहाँ जा रहे हैं बजाय इसके कि आप कैसे जा रहे हैं। यदि इसका परिणाम गुस्सा या नाराजगी होती है तो इसमें भी खेल खेलने का प्रयास करें, इसका समय निर्धारित करके या अन्य भाई-बहनों को भी इसमें शामिल करके।

2. बहस न करें
जिद्दी बच्चे हमेशा तर्क-वितर्क के लिए तैयार रहते हैं इसलिए उन्हें इसका अवसर न दें। हमेशा अपने बच्चे को आराम से सुनें और इसे तर्क के बजाय बातचीत में बदल दें। जब आप अपने बच्चे को यह दिखाते हैं कि आप उसके पक्ष की बात सुनने को तैयार हैं तो इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि वह आपकी बात भी सुनने को तैयार रहेगा।

3. एक अच्छा कनेक्शन बनाएं
बच्चे को वह कार्य करने के लिए मजबूर न करें जो वह नहीं करना चाहता है। इससे बच्चा आपकी बातों का विद्रोह कर सकता है और वह जो नहीं करना चाहिए उन कार्यों को भी करने की जिद्द कर सकता है। यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा टीवी देखने के बजाय अपना होमवर्क करने बैठ जाए तो थोड़ी देर के लिए बच्चे के साथ टीवी देखने का प्रयास करें। इससे आप दोनों के संबंध में मित्रता का भाव आएगा और थोड़ी देर के बाद आप उससे पूछ सकते हैं कि क्या अब वह अपना होमवर्क करेगा और आप उसके पास एक किताब लेकर पढ़ना शुरू  करें या कुछ और काम करें। वह आपको देखकर पढ़ना शुरू करेगा। 

4. बच्चे को विकल्प दें
बच्चे से यह पूछना कि वह क्या करना चाहता है, इससे उसकी जिद्द को बढ़ावा मिल सकता है। ऐसा करने के बजाय आप उसे दो विकल्प देकर चुनाव करने की आजादी दें। इससे आपका बच्चा अपने जीवन पर खुद का अधिकार समझेगा और आजादी से मनचाहे फैसले ले सकता है। यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा भ्रमित न हो तो आप अपने विकल्पों को सीमित रखें और उसे सिर्फ दो या तीन विकल्पों में से कोई एक चुनने को कहें। उदाहरण के लिए; यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा अपना कमरा खुद साफ करे तो उससे यह पूछने के बजाय कि ‘कहाँ से शुरुआत करना चाहते हो?’, अपने बच्चे से यह पूछे के वह कमरे में पहले बिस्तर साफ करेगा या अलमारी। 

5. बच्चे की जगह पर खुद को रखकर देखें
किसी भी समस्या को बच्चे के दृष्टिकोण से भी देखें और समझने का प्रयास करें कि वह ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है। यदि आपने उससे वादा किया है कि आप उसे पार्क में घुमाने ले जाएंगे किंतु शायद मौसम खराब होने के वजह से आपने ऐसा नहीं किया है तो आपको उसे यह समझाने का प्रयास करना होगा कि वादा पूरा करना संभव क्यों नहीं है। आपके बच्चे को सिर्फ यह दिखेगा कि आपने उससे किया हुआ वादा तोड़ा है किंतु यदि आप उसे समझाएंगे कि आप बाहर क्यों नहीं जा सकते हैं और बाहर जाने का कोई और दिन निर्धारित करेंगे तो आप स्थिति को सरलता से संभाल सकते हैं। 

6. घर में शांति बनाए रखें
सुनिश्चित करें कि आपका घर एक ऐसी जगह है, जहाँ आपका बच्चा हर समय खुश, आरामदायक और सुरक्षित महसूस करता है। घर में हर किसी से विनम्र रहें, विशेष रूप से अपने पति या पत्नी से क्योंकि बच्चे आपको देखकर ही सीखते हैं। वे जो देखते हैं उसी की नकल करते हैं इसलिए यह आवश्यक है कि आप शांति बनाए रखें एवं बच्चे के सामने तर्क-वितर्क व अपमानजनक शब्दों का उपयोग न करें। 

7. अपने बातचीत करने के तरीके को प्रभावी बनाएं
जिद्दी बच्चे यदि कुछ मांगते हैं तो उनके लिए ‘ना’ सुनना कठिन होता है। इसलिए कठोर होने के बजाय उन्हें प्यार से समझाने का प्रयास करें। उदाहरण के लिए, यदि आपका बच्चा सोने के समय दो कहानियां सुनने की जिद्द करता है, तो उसे समझाते हुए विकल्प दें कि एक कहानी वह आज सुन सकता है और एक कहानी वह कल सुन सकता है। 

8. सकारात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करें
अपने व्यवहार से उदाहरण प्रस्तुत करें और हर समय एक सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदर्शित करें। यदि आप अधिकतर ‘नहीं’, ‘नहीं हो सकता’, या ‘नहीं होगा’ जैसे शब्दों का उपयोग करते हैं, तो आपके बच्चे द्वारा भी ऐसा करने की संभावना रहती है। अपने बच्चे के जिद्दी स्वभाव को देखते हुए नकारात्मक होने और बिना सोचे-समझे बोलने के बजाय उसके व्यवाहर को सुधारने के दृष्टिकोण से देखें। आप बच्चे से सवालों का खेल खेल सकते हैं जिसमें वह जवाब में हाँ या नहीं कहकर जवाब दे सके। अपने प्रश्नों को इस तरह से बनाएं कि उनका जवाब ज्यादातर ‘हाँ’ में रहे। इससे यह संदेश मिलता है कि बच्चे ने आपकी बात सुनी और स्वीकारा भी है। 

9. दिनचर्या बनाएं
दैनिक के साथ एक साप्ताहिक दिनचर्या पर नियमित रहने से आपके बच्चे के व्यवहार के साथ-साथ स्कूल में प्रदर्शन में सुधार हो सकता है। बच्चे के सोने के समय पर ध्यान दें और यह ऐसा होना चाहिए कि आपके बच्चे को भरपूर आराम मिले। 3 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों में थकान और नींद न पूरी होने के कारण व्यवहार संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। 

10. नियम, दंड और पुरस्कार तय करें
जिद्दी बच्चों के लिए नियम-कायदों की जरूरत होती है इसलिए सीमाओं को निर्धारित करें और पारिवारिक बैठक में अपनी उम्मीदों को स्पष्ट रूप से कहें। अपने बच्चे से इसका नतीजा और साथ ही प्रत्येक पर उसका दृष्टिकोण पूछें। निरंतरता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें कठोरता बिलकुल भी नहीं होनी चाहिए । कई बार नरम व उदार होना भी महत्वपूर्ण है खासकर जब आप छुट्टी पर होते हैं या ऐसे अवसरों पर जब आपका बच्चा अनुकरणीय व्यवहार प्रदर्शित करता है। इससे उन्हें पता चलता है कि नियम पालन करने पर पुरस्कृत किया जा सकता है और इसका उद्देश्य कठोरता तो बिलकुल भी नहीं है।

जिद्दी बच्चों के साथ समस्याएं
जिद्दी बच्चों को संभालना आसान कार्य नहीं है, ऐसी स्थिति में यदि आपको कोई समाधान जल्दी नहीं मिलता है तो हर दिन कोई छोटी सी बात भी बड़ा संघर्ष बन सकती है। जिद्दी बच्चे के व्यवहार को कैसे नियंत्रित किया जाए, इस बारे में आपको काफी जानकारी मिली होगी, लेकिन हर दिन एक नई चुनौती है। सभी मामलों में जिद्दी बच्चे को अनुशासित करना सबसे अच्छा समाधान नहीं हो सकता है, इसके लिए वैकल्पिक हल ढूंढना अधिक प्रभावी हो सकता है।

1. खाने को लेकर नखरे करना
जब भोजन और खाने की बात आती है, खासकर अगर बच्चे जिद्दी हैं तो अधिकांश बच्चे उधम मचा सकते हैं। इस समय थोड़ा खुशामद करना मददगार साबित हो सकता है, बच्चे को कम मात्रा में अलग-अलग भोजन परोसें और उसे चुनने दें कि वह कौन सा भोजन अधिक खाना चाहता है। आप पौष्टिक खाद्य पदार्थ से विभिन्न प्रकार के रचनात्मक व्यंजन पका सकते हैं। इसके अलावा बच्चे को भोजन के समय के कामों में शामिल करने का प्रयास करें, जैसे टेबल सेट करना। बच्चे के भोजन खत्म करने के बाद उसे उसकी पसंदीदा मिठाई के रूप में कोई इनाम देना उसके व्यवहार में बदलाव लाने का एक प्रयास सिद्ध हो सकता है। 

2. होमवर्क करने में परेशानी
देखें कि क्या आपके बच्चे को निर्धारित होमवर्क पूरा करने में कठिनाई होती है या वह लिखे या सिखाए जाने वाली चीजों से घबराया हुआ है। यदि आपको ऐसा लगता है तो इसे अलग-अलग भाग में विभाजित करके सरल बनाने का प्रयास कर सकते हैं। एक बार में बैठकर पूरा करने की तुलना में उसका होमवर्क बीच-बीच में छोटे-छोटे ब्रेक लेने से जल्दी पूरा हो सकता है। इसका अन्य विकल्प यह है कि आप अपने बच्चे के होमवर्क को एक और गतिविधि के साथ जोड़ दें, उदाहरण के लिए स्पेलिंग सीखना बगीचे में पौधों को पानी देते हुए हो सकता है।

3. कपड़ों को लेकर लड़ाई
यह झगड़े या नाराजगी का एक प्रसिद्ध कारण है जो हर बार होता है। जब आपका बच्चा कुछ ऐसा पहनना चाहता है जो उस अवसर या मौसम के लिए उपयुक्त नहीं है। तो इसका यह तरीका यह है कि आप अपने बच्चे के अलमारी में कम कपड़ें सजाएं और फिर कुछ दो सप्ताह में अन्य कपड़ों के साथ उन्हें बदल दें। इसके अलावा ऐसे कपड़ों को भी हटा दें जो मौसम के अनुकूल न हों ताकि बच्चे की जिद्द का एक कारण कम हो जाए। जब कभी आप चाहें कि आपका बच्चा अपने कपड़े बदले तो उन्हें दो या तीन अलग-अलग कपड़ों के ऑप्शन दें और उसे चुनने के लिए कहें। इस प्रकार आपका बच्चा अपने निर्णय लेकर खुश रहेगा और आप भी इसे सरलता से सुलझा पाएंगे। 

4. सोने के समय समस्या
सोने के समय आपका बच्चा इधर-उधर भागता है जिससे एड्रेनालाईन नामक हॉर्मोन उत्तेजित होता है और इसलिए वह आसानी से सो नहीं पाता है। लाइट बंद करने से पलगभग 30 मिनट पहले एक शांत व सुखदायक संगीत चलाएं और कमरे में रोशनी कम कर दें। टीवी बंद कर दें और नाईट ड्रेस पहनने को कहें। इस समय बच्चे को नाईट ड्रेस के चुनाव का विकल्प देकर कपड़े पहनाने पर लड़ाइयों से बचें। बच्चे के सोने से थोड़े समय पहले उसके साथ थोड़ा समय बिताएं और पूछें कि क्या कोई ऐसी बात है जो उसे आपको बतानी है या आप उससे बस एक सरल सवाल पूछ सकते हैं कि उसका आज का दिन कैसा था। 

बच्चे का जिद्दी स्वाभाव कोई भी बुरी बात नहीं है। वास्तव में, यह देखा गया है कि जिन बच्चों में यह विशेषताएं होती हैं, वे अक्सर शिक्षा के साथ-साथ अपने जीवन में कई उपलब्धियां हासिल करते हैं। ऐसे बच्चे अपने दोस्तों के दबाव में किसी भी गलत चीज से प्रभावित नहीं होते हैं जो उसके दोस्त कर रहे हों। अच्छे अनुशासन की आदत डालना और अपने बच्चे को समझने का प्रयास करना उन्हें आगे एक जिम्मेदार और दृढ़ निश्चय धारण करने वाला व्यक्ति बना सकता है ।

डिस्क्लेमर: यह जानकारी सिर्फ एक मार्गदर्शिका है और किसी योग्य पेशेवर चिकित्सक की सलाह का विकल्प
 नहीं है।



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बच्चों पर विज्ञापन का प्रभाव

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हाल के दिनों में एक ही चीज के ढेर सारे विकल्प उपलब्ध होने के कारण लोग किसी भी तरह के चुनाव में बेहद विरोधाभास का सामना करने लगे हैं, जबकि दूसरी ओर विभिन वस्तुओं और सेवाओं के निर्माता अपने उत्पाद को असाधारण और आकर्षक बनाने के लिए काफी कुछ किए जा रहे हैं। यह विज्ञापनों और मार्केटिंग पर होने वाले खर्च में वृद्धि करता है, और एडवर्टाइजमेंट एजेंसीज ऐसे अद्भुत विज्ञापन बनाती हैं जिन्हें अनदेखा करना मुश्किल होता है। हालांकि ये विज्ञापन सूचनात्मक हो सकते हैं, और आपको सही चीज की जानकारी दे सकते हैं, लेकिन बच्चों पर इनका कुछ अलग प्रभाव पड़ सकता है और कई मामलों में यह उनके निर्णयों और यहाँ तक कि उनके व्यक्तित्व को भी प्रभावित कर सकता है।

बच्चों पर विज्ञापन के क्या प्रभाव होते हैं
विज्ञापन की विषय वस्तु, गुणवत्ता और प्रस्तुति के आधार पर, बच्चों पर इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव हो सकते हैं।

1. सकारात्मक प्रभाव
बच्चों पर विज्ञापन के कुछ सकारात्मक प्रभाव हैं:

वे जानकारी का एक स्रोत हो सकते हैं। कुछ विज्ञापन, विशेष रूप से पब्लिक सर्विस से जुड़ी घोषणाएं, इनोवेशन और तकनीकी विकास के बारे में बताते हैं जो बच्चे को अच्छा सीखने का अवसर प्रदान करते हैं। इसके अलावा, विज्ञापन बाजार में आए नए उत्पादों के बारे में बच्चे को शिक्षित करते हैं।
  • स्वास्थ्यप्रद खाद्य पदार्थों के बारे में दिखाए गए विज्ञापन बच्चों को अधिक संतुलित आहार चुनने के लिए भी प्रेरित कर सकते हैं।
  • कुछ विज्ञापन जो स्वच्छता उत्पादों के लिए होते हैं उनसे बच्चों में अच्छी आदतों को विकसित करने में मदद मिल सकती है।
  • विज्ञापनों में प्रेरक विषय वस्तु भी हो सकती है जो बच्चों को एक पेशे का चयन करने या किसी विशिष्ट सपने का अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। वे उन्हें उसी के लिए बचपन से ही जुनून विकसित करने में मदद कर सकते हैं और कम उम्र से ही बच्चे उसके लिए प्रयत्न करना शुरू कर सकते हैं।
  • विज्ञापन जो समान उम्र के अन्य बच्चों को घर में मदद करने या बचत करने जैसी गतिविधियों में संलग्न दिखाते हैं, आपके बच्चों को भी ऐसा करने के लिए प्रभावित कर सकते हैं।
  • कुछ विज्ञापन जो सामाजिक परिवर्तन के बारे में होते हैं, बच्चों में सहानुभूति और समुदाय के प्रति कर्तव्य की भावना को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।
  • पर्यावरण संरक्षण के विज्ञापन भी समस्या की ओर बच्चों का ध्यान आकर्षित करते हैं और उन्हें समाधान का हिस्सा बनने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
शराब और धूम्रपान के परिणामों को प्रकट करने वाले चेतावनी देने वाले विज्ञापन बच्चों को उनसे जुड़े जोखिमों को समझने में मदद कर सकते हैं, और उनसे ऐसे उत्पादों से दूर रहने की हिदायत देने में मदद कर सकते हैं।

2. नकारात्मक प्रभाव
यद्यपि विज्ञापनों के कुछ सकारात्मक प्रभाव होते हैं, लेकिन वास्तव में वे नकारात्मक प्रभावों से बहुत ही कम हैं। बच्चों पर विज्ञापन के कारण होने वाले प्रतिकूल प्रभाव इस प्रकार हैं:
  • बच्चे द्वारा किसी उत्पाद को खरीदने के लिए जिद करना वास्तविक समस्या हो सकती है। क्योंकि विज्ञापनदाता बच्चों के प्रति अपनी मार्केटिंग रणनीतियों को निर्देशित करते हैं और इस तरह बच्चे माता-पिता से जिद करके किसी उत्पाद की मांग कर सकते हैं।
  • विज्ञापन के संदेश की गलत तरीके से व्याख्या की जा सकती है और बच्चे सकारात्मकता के बजाय मुख्य रूप से नकारात्मक पहलू पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
  • कुछ विज्ञापन ऐसे स्टंट किए जाते हुए दिखाते हैं जो बहुत खतरनाक हो सकते हैं। हालांकि वे एक वैधानिक चेतावनी के साथ आते हैं, लेकिन अक्सर इसे अनदेखा किया जा सकता है, और बच्चे इन स्टंट की नकल करने का प्रयास कर सकते हैं।
  • हर निर्माता अपना बिजनेस लगातार बढ़ाना चाहता है, जो उन्हें आकर्षक विज्ञापन बनाने के लिए प्रेरित करता है। परिणामस्वरुप बच्चों में बिना सोचे समझे चीजें खरीदने की आदत बन जाती है।
  • झूठी इमेजिंग विज्ञापनों के साथ एक और मुद्दा है जो चीजों या घटनाओं को अवास्तविक तरीके से पेश करती है और बच्चे इसके बहकावे में आ जाते हैं।
  • विज्ञापन बच्चों में दुनिया के एक भौतिकवादी विचार को भी विकसित कर सकते हैं। जब उनका भोला दिमाग नियमित रूप से ऐसे विषय वस्तु के संपर्क में आ रहा हो जो यह दर्शाते हैं कि आरामदायक जीवन के लिए आपके पास सबसे अच्छी चीजें होना आवश्यक है, तो यह बच्चों को ये सोचने पर मजबूर कर सकता है कि पैसा सबसे जरूरी है।
  • किसी विशेष ब्रांड के प्रति ललक और महंगी ब्रांडेड वस्तुओं के प्रति आत्मीयता विकसित हो सकती है। इससे वो उसी तरह का काम करने वाली अपेक्षाकृत सस्ती चीजों को नजरअंदाज करने लगते हैं।
  • जिन विज्ञापनों में खाद्य पदार्थों का प्रचार-प्रसार होता है उनमें एक बड़ा हिस्सा जंक फूड आधारित आहार का है और ये विज्ञापन देखने में बहुत ही लुभावने बनाए जाते हैं। ये बच्चे की खाने की आदतों को प्रभावित कर सकते हैं और अस्वास्थ्यकर जीवनशैली की ओर आकर्षित कर सकते हैं।
  • किसी बच्चे के खिलौने, कपड़े या विलासिता की पसंद को प्रभावित करने के लिए भी विज्ञापन एक प्रमुख कारक हो सकते हैं।
  • बच्चे आत्मविश्वास खो सकते हैं यदि वे स्वयं को हीन मानने लगें, इसलिए क्योंकि उनके पास विज्ञापन में दिखाई गई कोई विशेष वस्तु नहीं हो और खासकर अगर उनके दोस्तों के पास वही वस्तु हो।
  • कुछ विज्ञापनों में महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया जाता है जो चिंता का कारण है, ऐसे में बच्चे बड़े होकर सोच सकते हैं कि यही सही है।
  • जैसा कि कई विज्ञापनों ने वास्तविक और रील जीवन के बीच की रेखा को धुंधला करने में कामयाबी हासिल की है, बच्चों को दिखावे पर ही विश्वास होता है और वे वास्तविकता से दूर हो जाते हैं।
  • कुछ विज्ञापनों को तुलनात्मक दृश्यों का उपयोग करने के लिए जाना जाता है, जो अपने उत्पाद के अतिरिक्त किसी दूसरे उत्पाद का उपयोग करने वाले व्यक्ति का मजाक उड़ाते हैं। इससे बच्चों में हीन और श्रेष्ठ की अवधारणा पैदा हो सकती है क्योंकि वे दूसरों से अपनी तुलना करना शुरू कर देते हैं।
विज्ञापनों में कुछ अनुचित कार्यों जैसे झूठ बोलने या धोखा देने का चित्रण बच्चे को विश्वास दिला सकता है, कि यह व्यवहार सही और स्वीकार्य है।

माता-पिता के लिए सुझाव
कुछ साल पहले के विपरीत, आजकल बच्चों के उत्पादों या यहाँ तक कि वयस्कों द्वारा इस्तेमाल होने वाले कुछ उत्पादों की मार्केटिंग को सीधे बच्चों पर केंद्रित किया जाता है। इसलिए माता-पिता के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे बच्चों को विज्ञापनों के बारे में निर्णायक होने में मदद करें और उन्हें जीवन में गैर-भौतिकवादी सुख-सुविधाओं का महत्व सिखाएं।
  • छोटे बच्चों पर विज्ञापनों के नकारात्मक प्रभाव को कम करने के लिए आप कुछ प्रयास कर सकते हैं।
  • स्क्रीन के समय में कटौती। अपने बच्चों को टीवी देखने या कंप्यूटर का उपयोग करने की अनुमति देना सीमित करें। यह भी सलाह दी जाती है कि आप बच्चे क्या देख रहे हैं, इस बात की निगरानी करें।
  • जब आपका बच्चा कोई विशिष्ट उत्पाद मांगता है, तो उसके साथ बातचीत करें कि वह ऐसा क्यों चाहता है। इससे आपको यह समझाने का मौका मिलेगा कि विज्ञापन कैसे काम करता है।
  • यदि आपको लगता है कि उत्पाद बच्चे के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है, तो बच्चे कि मांग पूरी न करें।
  • उन विज्ञापनों की खामियों को दिखाएं, जिन्हें देखने से आप अपने बच्चे को बचा नहीं सकते हैं और अपने बच्चे को यथार्थवादी तस्वीर देखने में मदद करें। यह बच्चे में एक समीक्षात्मक निर्णायक क्षमता विकसित करने में मदद कर सकता है।
  • अपने बच्चे के साथ विज्ञापन देखने से बचने के लिए टेलीविजन कार्यक्रम को डाउनलोड करने का प्रयास करें।
  • अपने बच्चे को ‘जरूरतों’ और ‘इच्छा’ के बीच अंतर जानने में सहायता करें और उन्हें सिखाएं कि वे केवल वही मांगें जिसकी उन्हें आवश्यकता हो।
इनोवेटिव विज्ञापनों की दुनिया में, जो हर जगह दिखाई देते हैं, उनमें से ज्यादातर को आपके बच्चे के सामने आने से बचाना मुश्किल होगा। विज्ञापन एजेंसियों ने उत्पादों के विज्ञापन के लिए टीवी से लेकर प्रिंट माध्यम तक और हवाई अड्डे में बिलबोर्ड से लेकर लगेज टैग तक हर माध्यम को पकड़ने की कोशिश की है। आपका बच्चा अनिवार्य रूप से इन विज्ञापनों को देखेगा। इसलिए, इन विज्ञापनों के कारण होने वाली नकारात्मकता को रोकने का सबसे
 अच्छा तरीका है कि आप अपने बच्चे को मार्केटिंग की दुनिया की बारीक अवधारणाओं के बारे में शिक्षित करें।



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बच्चों को स्वावलंबी बनाने के लिए 10 टिप्स

 
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छोटे बच्चे किसी काम को समय पर करने और उसके लिए जिम्मेदार होने की अवधारणा को बहुत कम समझते हैं। कई बार ऐसा होता है कि सुबह स्कूल की बस आने का समय हो रहा होता है और बच्चा बिस्तर से भी उठने को तैयार नहीं होता। माता-पिता हर छोटी चीज के लिए उनके आगे-पीछे भागते रहते हैं और उनका हर काम करते हैं। ऐसे में वे अक्सर परेशान हो जाते हैं कि बच्चों को सजा दिए बिना उन्हें सही तरीके से स्वावलंबी कैसे बनाया जाए। यह बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चे में स्वावलंबी बनने की प्रवृत्ति को विकसित करने में कुछ समय लगता है क्योंकि यह इच्छा उसे अंदर से जागृत करनी होती है । एक अभिभावक के तौर पर आप कुछ युक्तियों से अपने बच्चे को सही दिशा में प्रेरित कर सकते हैं ताकि वह स्वयं ही आत्मनिर्भर होने का प्रयास करे ।

बच्चों को स्वावलंबी होना क्यों सीखना चाहिए
आज भले ही आपका बच्चा छोटा सा हो लेकिन कल उसे बड़ा होना है। वयस्क होकर जीवन की जरूरतों का सामना करने के लिए उसे अच्छी तरह से तैयार होने की आवश्यकता है। इसके लिए अभी से उसे योग्य और कुशल बनाने की शुरुआत करनी होगी।

बच्चे अपने लिए क्या सही है यह समझने और चुनने के निर्णय में समय लेते हैं । शुरुआत से ही उनके सामने विकल्पों को प्रस्तुत करने से बच्चे स्वयं के बारे में बेहतर जानना शुरू कर सकते हैं और समझ सकते हैं कि वास्तव में उन्हें किस बात में आनंद मिलता है ।

जीवन में हमेशा सब कुछ अच्छा और आनंददायक नहीं होता है । ऐसे क्षण भी आएंगे जब आपका बच्चा वह करने में असफल होगा जिसकी उससे उम्मीद की गई थी।हालांकि अगर वह स्वावलंबी है तो वह अपनी गलतियों को पहचानेगा, सहयोग और संबल के लिए आपके पास आएगा, और बेहतर प्रदर्शन करने के लिए मार्गदर्शन को स्वीकारेगा।

एक व्यक्ति के भीतर आत्म-सम्मान की भावना बहुत कम उम्र में विकसित हो जाती है। यह तब और मजबूत हो सकती है जब बच्चा खुद पर और खुद के फैसलों पर विश्वास करने लगे। आत्मनिर्भरता इस संबंध में मदद करती है।

पुस्तकों में जानकारी होती है लेकिन ज्ञान केवल क्रिया के द्वारा प्रदर्शित होता है। अपने बच्चे को एक खतरे की चेतावनी देने और उसके द्वारा इसका वास्तव में सामना करने के बीच का अंतर बहुत बड़ा है। स्वतंत्र होने के कारण आपका बच्चा खुद से चीजें सीखना शुरू कर देता है और एक व्यक्ति के तौर पर बेहतर तरीके से जानकार बनता है।

बच्चों को आत्मनिर्भर होना कैसे सिखाएं
बचपन का भरपूर आनंद लेते हुए भी आपके बच्चे को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रशिक्षित करने के कई तरीके हैं।

1. उसे ऐसी जिम्मेदारियां दें जिन्हें वह संभाल सकता है
स्वावलंबी बनाने का अर्थ बच्चे को घर के पैसों को संभालने और बड़े निर्णय लेने के लिए कहना नहीं है । इसकी शुरुआत खुद से करने की आवश्यकता होती है और यही वह चीज है जहाँ आप अपने बच्चे की मदद कर सकते हैं। यदि आप पिकनिक की योजना बना रहे हैं तो छोटी-छोटी बातों में उसे मदद करने के लिए कहें। जैसे, उन वस्तुओं की एक सूची बनाना जिनकी आपको जरूरत पड़ सकती है या उसे स्वयं का बैग पैक करने के लिए कहना ।

2. अपने बच्चे की हर बात में सहायता करने से बचें
कई माता-पिता मार्गदर्शन को सहायता करना समझ लेते हैं। जिसे यदि वह कुछ काम या खेल में थोड़ा गलत कर रहा है या जरूरत से ज्यादा समय ले रहा है तो वे बच्चे के कार्यों में लगातार हस्तक्षेप करते हैं। शुरुआती उम्र में अपने बच्चे को कुछ निर्देशों या खुले विचारों वाले सुझावों से मार्गदर्शित करना अच्छा होता है जो उसे इस संभावना से अवगत कराता है कि कार्य को आसान तरीके से पूरा किया जा सकता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, बेवजह हस्तक्षेप करने के बजाय आवश्यकता पड़ने पर उसे स्वयं आपके पास आने दें।

3. सीमित विकल्पों वाले चुनाव की पेशकश करें
किसी रेस्तरां में जाकर बच्चे को पूछना कि वह क्या खाना चाहता है, उसके लिए काफी भारी प्रश्न हो सकता है क्योंकि रेस्तरां मेनू काफी विस्तृत होता है। इसके बजाय, मेनू के विकल्पों का एक समूह चुनें और उसे उसमें से चुनने के लिए कहें। सीमित विकल्पों के साथ शुरू करने से उसे आसानी से चुनाव करने और नए चुनाव के लिए तैयार करने में मदद मिल सकती है।

4. समय पर उसे अपने निर्णय लेने दें
हो सकता है कि आपको अपने बच्चे के बाहर खेलने जाने से पहले उसका होमवर्क पूरा कर लेना पसंद हो, जबकि उसे पहले खेलना पसंद हो सकता है और फिर अपना होमवर्क पूरा करना। बच्चे को छोटी-छोटी बातों में कुछ हद तक आजादी दें, जैसे कि क्या पहनना है या शाम को नाश्ते में क्या खाना है। और जब तक वह अपने किए वादे पूरा करता है, आपको कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

5. उसके प्रति सहानुभूति रखें
आपका बच्चा अभी आत्मनिर्भर होना सीख रहा है और यह उसके लिए भी आसान नहीं है। उसे डांटने या उसे नीचा दिखाने से बचें, भले ही वह कुछ ऐसा करने में विफल हो जो काफी आसान है। उसके बारे में कोई राय बनाए बिना सहारा देने और मदद करने के लिए उसके साथ मौजूद रहें।

6. असफलता को बड़ा मुद्दा न बनाएं
बच्चे असफल होंगे। वे गलतियां करेंगे और आपकी चेतावनियों के बावजूद भी वे उन्हें फिर कर सकते हैं। उनकी असफलता पर ध्यान केंद्रित करने से बचें। अपने बच्चे को बताएं कि वह क्या बेहतर कर सकता था, लेकिन उसके साथ विफलता को न जोड़ें। इससे उसके आत्मसम्मान में भारी बाधा आ सकती है।

7. उसे स्वतंत्र रूप से समस्याओं को हल करना सिखाएं
चाहे वह स्कूल से संबंधित समस्याएं हों अथवा भाई-बहन या दोस्तों के साथ की कोई समस्या, अपने बच्चे को बताएं कि कुछ बातों का समाधान स्वयं उसके द्वारा ही किया जाना है और आप इसमें उसकी मदद नहीं कर सकते। अगर जरूरत हो तो उसे स्थिति का एक अलग दृष्टिकोण प्रदान करके उसका मार्गदर्शन करें।

8. एक उचित दिनचर्या बनाएं
यदि वे क्रमवार नहीं सोचते हैं तो बच्चों को खुद के लिए निर्णय लेने में परेशानी हो सकती है। यह स्थिति उनके लिए एक निश्चित दिनचर्या स्थापित करके आसानी से संभाली जा सकती है। एक बार जब आपका बच्चा जान जाएगा कि किसी खास दिन और खास समय पर क्या करना है, तो वह यह सब खुद से करना शुरू कर देगा।

9. बातचीत करना सिखाएं
अनेक बच्चे दुनिया को जीत और हार की अवधारणा के तौर पर देखना शुरू कर देते हैं। अपने बच्चे को सुलह और समझौते से परिचित कराएं ताकि उसे अपने सामने आई परिस्थिति में से सबसे अच्छा निष्कर्ष निकालने की समझ शुरू होगी।

10. प्रोत्साहित करना ना भूलें
जब आपका बच्चा कही हुई बात को ठीक तरीके से और स्वयं से करता है, तो उसे यह बताने में संकोच न करें कि आपको उस पर कितना गर्व है। आपके बच्चे के व्यक्तित्व को सही तरीके से आकार देने में सकारात्मक प्रतिक्रिया बेहद जरूरी है और माता-पिता द्वारा प्रोत्साहन इस मामले में बहुत मायने रखता है।

एक नन्हे बच्चे को स्वावलंबी बनाने और बच्चों को खुद से कुछ क्रियाकलाप करना सिखाने के बीच काफी अंतर है। हालांकि जब एक बार आपका बच्चा स्कूल जाने के साथ वहाँ के माहौल का अभ्यस्त होने लगता है, तो आप प्यार से उसे खुद से कुछ सरल गतिविधियां करने के लिए कहना शुरू कर सकते हैं। ये आदतें धीरे-धीरे उसके भीतर आत्मनिर्भरता के बीज बो सकती हैं।





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