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टमाटर की उन्नत खेती कैसे करें ?

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टमाटर एक लोकप्रिय सब्जी है । इस फसल को सम्पूर्ण भारतवर्ष में सफलतापूर्वक उगाया जाता है । टमाटर में कार्बोहाइड्रेट, बिटामिन, कैल्शियम, आयरन तथा अन्य खनिज लवण प्रचुर मात्रा में उपस्थित रहते है । इसके फल में लाइकोपीन नामक वर्णक (पिगमेंट) पाया जाता है । जिसे विश्व का सबसे महत्वपूर्ण एंटीऑक्सीडेंट बताया गया है । इन सबके अलावा कैरोटिनायडस एवं विटामिन सी भी टमाटर में बहुतायत मात्रा में पाए जाते है । ताजे फल के अतिरिक्त टमाटर को परिरक्षित करके चटनी, जूस, अचार, सास, केचप, प्यूरी इत्यादि के रूप में उपयोग में लाया जाता है । इसके पके फलों की डिब्बाबन्दी भी की जाती है। भारतवर्ष से टमाटर का निर्यात मुख्या रूप से पाकिस्तान, संयुक्त राज्य अमीरात, बांग्लादेश, नेपाल, सउदी अरब, ओमान, मालद्विप, बहरीन एवं मलावी को किया जाता है ।

टमाटर उगाने के लि‍ए जलवायु-

टमाटर की अच्छी उपज में तापमान का बहुत बड़ा योगदान होता है । फसल के लिए आदर्श तापमान २० - २५0 सेन्टीग्रेट होता है । तापमान अधिक होने पर फूल एवं अपरिपक्व फल टूटकर गिरने लगते है । जब तापक्रम १३0 से कम एवं ३५0 से ज्यादा होता है, तब परागकण का अंकुरण बहुत कम हो जाता है

अपरिपक्व हरे फल को १२.५० सेन्टीग्रेट तापमान पर ३० दिनों तक जबकि परिपक्व फल को ४ - ५० सेन्टीग्रेट तापमान पर १० दिनों तक रखा जा सकता है । उपरोक्त भण्डारण के समय सापेक्षिक आर्द्रता लगभग ८५ - ९० प्रतिशत होनी चाहिए ।

टमाटर के खेत की तैयारी-

समुचित जल निकास वाली जीवाष्म युक्त बलुई दोमट या दोमट मिट्टी, जिसका pH मान ६.० - ७.० बीच हो, ऐसे खेत में टमाटर की खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है । तैयार पौध की रोपाई से पहले, खेत की पहली गहरी जुताई मिट्टी पलट हल से करें, तपश्चात ३ से ४ आड़ी-तिरछी जुताई कल्टीवेटर से करके मिट्टी को भुरभुरी व समतल बना लेना चाहिए ।

टमाटर  के उन्नत किस्मे -

  • स्वर्णा नवीन: इस प्रभेद की बुवाई जुलाई से सितम्बर एवं अप्रैल से मई माह में की जा सकती है, जिसकी उपज क्षमता ६०० - ६५० कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह प्रभेद जीवाणु जनिक उकठा रोग के प्रति सहनशील है ।
  • स्वर्णा लालीमा: इस प्रभेद की बुवाई जुलाई से सितम्बर एवं फरवरी से अप्रैल माह में की जा सकती है, जिसकी उपज क्षमता ६०० - ७०० कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह प्रभेद जीवाणु जनिक उकठा रोग के प्रति सहनशील है  ।
  • काशी अमन: इस प्रभेद की उपज क्षमता ५००  - ६०० कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह प्रभेद विषाणु जनिक पर्ण कुंचन रोग के प्रति सहनशील है ।
  • काशी विशेष: इस प्रभेद की उपज क्षमता ४५०  - ६०० कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह प्रभेद विषाणु जनिक पर्ण कुंचन रोग के प्रति सहनशील है ।

संकर किस्मे -
  • स्वर्णा वैभव (F1): इस प्रभेद की बुवाई सितम्बर से अक्टूबर माह में की जा सकती है, जिसकी उपज क्षमता ९००  - १००० कुन्तल प्रति हेक्टेयर है ।
  • स्वर्णा सम्पदा (F1): इस प्रभेद की बुवाई अगस्त से सितम्बर एवं फरवरी से मई माह में की जा सकती है, जिसकी उपज क्षमता १०००  - १५०० कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह प्रभेद जीवाणु जनिक उकठा रोग के प्रति सहनशील है ।
  • काशी अभिमान: यह दूरस्थ विपणन के लिए उपयुक्त संकर प्रभेद है। इसकी उपज क्षमता ७५०  - ८०० कुन्तल प्रति हेक्टेयर है। यह प्रभेद विषाणु जनिक पर्ण कुंचन रोग के प्रति सहनशील है ।

खाद एवं उर्वरक-
खाद एवं उर्वरक की मात्र का निर्धारण हमेशा मिट्टी जांच के आधार पर करना हितकर होता है । सामान्य तौर पर २०० - २५० कुन्तल सडी हुई गोबर या कम्पोस्ट खाद के साथ १०० - १५० कि. ग्रा. नत्रजन, ६० - ८०कि. ग्रा. स्फुर एवं ५० - ६० कि. ग्रा. पोटाश का व्यवहार करना चाहिए । नत्रजन की एक तिहाई तथा स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पूर्व व्यवहार करें। नत्रजन की शेष मात्रा को दो बराबर भागों में बांट कर २५ - ३० दिनों एवं ४५ - ५० दिनों बाद खड़ी फसल में टाप ड्रेसिंग के रूप में व्यवहार करें ।

टमाटर बोने के लि‍ए बीज की मात्रा-
एक हेक्टेयर खेत की रोपाई के संकुल एवं संकर किस्मो की क्रमशः ३५० - ४०० ग्राम एवं २०० - २५० ग्राम स्वस्थ बीज की आवश्यकता पड़ती है ।

टमाटर बीज की बुआई का समय-
वैसे तो टमाटर की खेती पूरे वर्ष भर की जा सकती है । शरदकालीन फसल के लिए जुलाई से सितम्बर, बसंत या ग्रीष्मकालीन फसल के लिए नवम्बर से दिसम्बर तथा पहाड़ी क्षेत्रों में मार्च से अप्रैल महीनों में बीज की बुआई फायदेमंद होता है ।

टमाटर पौध की तैयारी-
पौध की तैयारी के लिए जीवांशयुक्त  बलुवर दोमट मिट्टी की जरुरत होती है । स्वस्थ एवं मजबूत पौध तैयार करने के लिए १० ग्राम डाईअमोनियमफास्फेट और १.५ - २.० कि.ग्रा. सड़ी हुयी गोबर की खाद प्रति वर्ग मीटर की दर से व्यवहार करना चाहिए। क्यारियों की लंबाई लगभग ३.० मीटर, चौडाई लगभग १.० तथा भूमि की सतह से उचाई कम से कम २५ - ३० सें.मी.  रखना उचित होता होता है ।

इसप्रकार की ऊची क्यारियों में बीज की बुआई पंक्तियों में करना चाहिए, जिनकी आपसी दूरी ५.० - ६.० से.मी. रखना चाहिए, जबकि पौध से पौध की दूरी २.० - ३.० से.मी.  रखना चाहिए । बुआई के बाद क्यारियों को सड़ी हुई गोबर की खाद या कम्पोस्ट से ढक दें ।

इसके बाद फुहारे से हल्की सिचाई करें । अब इन क्यारियों को घास-फूस या सरकंडे के आवरण से डाक दें । आवश्यकतानुसार हल्की सिचाई करते रहें । बुआई के २० - २५ दिनों बाद पौध रोपाई योग्य तैयार हो जाती है।

टमाटर पौध की रोपाई-
जब पौध में ४ - ६ पत्तियां आ जाये तथा ऊचाई लगभग २० - २५ से.मी. हो जाये तब पौध रोपाई के लिए तैयार समझना चाहिए । रोपाई के ३ - ४ दिनों पूर्व पौधशाला की सिचाई बन्द कर देनी चाहिए । जाड़ें के मौसम पौध को पाला से बचने के लिए क्यारियों को पालीथीन चादर की टनेल बनाकर ऊपर से ढक देना चाहिए ।

पंक्ति से पंक्ति एवं पौध से पौध की दूरी फसल की किस्म, भूमि की उर्वरता, रोपाई के मौसम एवं क्षेत्र विशेष को ध्यान में रख कर करना हितकर होता है, जिसका विवरण इस प्रकार है:

क्षेत्र/मौसम
बुआई का समय
रोपाई का समय
दूरी (पंक्ति X पौध)
सीमित बढवार
असीमित बढवार
मैदानी/शरदकालीन
जुलाई से सितम्बर
अगस्त से अक्टूबर
६० से.मी. X ६० से.मी.)
६० से.मी. X ६० से.मी.)
वसंत एवं ग्रीष्मकालीन
जुलाई से सितम्बर
अगस्त से अक्टूबर
६० से.मी. X ६० से.मी.)
६० से.मी. X ६० से.मी.)
पहाड़ी
जुलाई से सितम्बर
अगस्त से अक्टूबर
६० से.मी. X ६० से.मी.)
६० से.मी. X ६० से.मी.)

सिचाई-
पौध रोपण के तुरंत बाद एवं प्रारम्भ के ३ - ४ दिनों तक पौधों को हजारे से पानी देना चाहिए, तत्पश्चात क्यारी या नाली जो भी हो उसमे पानी देना चाहिए । अच्छा होता है यदि मेड एवं नाली बना कर पौध लगाया जाय । क्योंकि इस विधी में सिचाई जल एवं स्थान का भरपूर उपयोग होता है ।

शरदकालीन फसलों में १० - १५ दिनों के अंतराल पर जबकि ग्रीष्मकालीन फसलों को ६ - ८ दिनों के अंतराल पर आवश्यकतानुसार सिचाई करना चाहिए । फसल में अधिक पानी लगाने से पौधों में उकठा एवं विषाणु जनित पत्ती सिकुडन रोग की संभावना बढ जाती है ।

टमाटर में खरपतवार प्रबंधन-
खेतों में उगने वाले खरपतवारों को समय रहते खुर्पी  या कुदाल से गुडाई करके निकाल लेना हितकर होता है । अन्यथा खरपतवारों की तेज वृद्धी से फसल के अधिकतम नुकसान की संभावना बनी रहती है । जिन क्षेत्रों में दीमक की समस्या नही हो ।

ऐसे क्षेत्रों में सूखे घास – फूस की पलवार (मल्च) पौधों के नीचे बिछाने से भी खरपतवार कम उगते है । वैसे पलवार के लिए हम ३० माइक्रोन मोटी कण घनत्व वाली पालीथिन (LDPE) की चादर का भी उपयोग करके खरपतवार के जमाव को कम कर सकते है ।

टमाटर में अंत: सस्य क्रियायें-
फसल से अच्छी पैदावार लें के लिए पौधों के आस - पास हल्की निकाई – गुडाई करें एवं पौधों के जड़ के पास मिट्टी अवस्य चढा दें, जिससे पौधों के बढवार पर अनुकूल प्रभाव पड़ेगा । असीमित बढवार वाली प्रभेदो के पौधों को लकड़ी गाढ कर सहारा देने से भी उपज पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है, साथ ही फल का मिट्टी से संपर्क न होने से विभिन्न रोगों का प्रभाव स्वत: कम हो जाता है ।

टमाटर में समेकित नाशीजीव प्रबंधन-
टमाटर की फसल में खरपतवारों के अतिरिक्त ढेर सारे नाशीजीवों जैसे: कवक, जीवाणु, विषाणु, सूत्रकृमी एवं विभिन्न प्रकार हानिकारक कीटों का प्रकोप देखने को मिलता है । सभी हानिकारक नाशीजीव फसल प्रभेदों के उत्पादन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है । अत: फसल अवस्था अनुरूप इनका प्रबंधन इसप्रकार है :   

टमाटर बुवाई से पहले-
अधिक जल जमाव एवं खराब जल निकास व्यवश्था वाली खेतों का चुनाव टमाटर की खेती के लिए नही करें ।
  • खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें । साथ ही १५ से.मी. ऊँचा बेड बनाना सुनिश्चित करें ।
  • खेत में १०० किलोग्राम प्रतिएकड़ की दर से नीम की खली का व्यवहार करें ।
  • बेड को ०.४५ मि.मी. मोटी पॉलीथिन की चादर से ढककर तीन सप्ताह के लिए छोड़ दें ।

पर्यावर्णीय अभियंत्रण के अंतर्गत खेत के चारो तरफ एवं प्रत्येक १० लाइन मुख्य फसल के बाद एक लाइन गेंदा की रोपाई करे, ध्यान रखे कि मुख्य फसल की रोपाई के कम से कम १५ दिनों पहले गेंदा की रोपाई सुनिश्चित कर लें । जिससे फल छेदक कीट की मादा मुख्य फसल को छोड़कर गेंदा के पौधों पर अपना अंडा रखेगी । फलस्वरूप टमाटर में होने वाली क्षति कम होगी ।

टमाटर बुवाई के समय-
  • प्रतिरोधक एवं सहनशील प्रभेदों का चुनाव करे ।
  • वीज का चुनाव करते समय ध्यान रखें कि जिन पौधों से वीज लिया गया हो वह पौधा रोग ग्रसित न हो ।
  • ट्राईकोडर्मा ९.० ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के दर से टमाटर के वीज को उपचारित करें ।
  • फसक चक्र जैसे: लोविया-मक्का-पत्तागोभी, भिन्डी-लोविया-मक्का, मक्का-लोविया-बैगन इत्यादि अपनाना चाहिए।
  • फसल चक्र में गेहूँ, सरसों, सूर्यमुखी, अलसी इत्यादि फसलों का भी समावेश किया जा सकता है ।

अन्तःवर्ती फसल के रूप में प्याज, मक्का, लोविया, धनिया, उरद या मूंग, कद्दू वर्गीय, धान्य, गोभीवर्गीय फसले अधिक लाभकारी होती है ।

वानस्पतिक वृद्धि-
खेत को खरपतवार से मुक्त रखें, जिसके लिए रोपाई के क्रमश: १५ एवं ३० दिनों बाद एक-एक निकाई एवं गुडाई अवश्य सुनिश्चित करें ।
  • अवश्यकतानुसार हल्की सिचाई करें । ध्यान इस बात का रखे कि जल जमाव की स्थिति न बने ।
  • खेतों की निगरानी निश्चित अंतराल पर करते रहे तथा रोग ग्रसित पौधों को उखाड कर मिट्टी में दबा दें । यदि कोई असमान्य पौधा दिखे तो विशेषज्ञ (जिला के कृषि विज्ञान केन्द्र, जिला एवं प्रखंड स्तरीय कृषि पदाधिकारी या इनके प्रतिनिधि) से परामर्श अवश्य ले ।
  • सफेद मक्खी के प्रकोप को कम करने के पीला चिपचिपा ट्रैप या कार्ड @ १० प्रति एकड़ की दर से लगाना चाहिए ।
  • ५ प्रतिशत नीम के वीज का सत (NSKE) का छिडकाव करें, जिससे पौधों के सतह रहने वाले कीटो एवं रोग कारको की क्रियाशीलता में कमी आयेगी ।
  • अगेती एवं पछेती झुलसा व्याधि के प्रबंधन के लिए ग्रसित पौधों को उखाडकर नष्ट कर दें साथ ही साथ मेन्कोजेब ७५ डब्लू.पी. @ ६०० - ८०० ग्रा. या फमोक्साडोन १६.६ एस.सी/ + सायमोक्सानिल २२.१ एस.सी. @ २०० ग्रा. या कापरओक्सीक्लोराइड ५० डब्लू.पी. @ १००० ग्रा. को १५० - २०० लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए ।
  • टमाटर के पत्ती कुंचन (पत्ती सिकुडन) रोग के प्रबंधन के लिए सर्वप्रथम रोग ग्रसित पौधों को जड़ से उखाडकर मिट्टी में दबा दे । तत्पश्चात डाइमेंथोएट ३० इ.सी. @ ४०० मि.ली. या इमिडाक्लोप्रीड १७.८ एस.एल. @ ६० - ७० मि.ली. या थियामेंथोक्जाम २५ डब्लू.जी. @ ८० ग्रा. को १५० - २०० लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव सुनिश्चित करें ।
  • कीटो की निगरानी के लिए ४ - ५ प्रति एकड़ की दर से फेरोमोन ट्रैप लगा सकते है । ध्यान इस बात का देना है कि प्रत्येक २ से ३ सप्ताह बाद फेरोमोन ट्रैप का ल्योर बदलना होता है ।
  • फसलीय पर्यावरण में नाशीजीवों के प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या बढ़ाने के उद्धेश्य से बर्ड पर्चर @ २० प्रति एकड़ की दर से लगाया जा सकता है । साथ ही साथ अंडपरजीवी ट्राईकोग्रामा स्पेसीज @ २०,००० अंडा प्रति एकड़ प्रति सप्ताह की दर से कम से कम ४ बार खेत में छोड़ना चाहिए ।

यदि फसल की निगरानी के समय, यह अनुभव हो कि अमूक कीट या रोग कारक जीव अपने आर्थिक क्षति पर पहुँचाने वाला है साथ ही इनके प्राकृतिक शत्रुओं की क्रियाशीलता सामान्य से कम हो, तो विशेषज्ञ (जिला के कृषि विज्ञान केन्द्र, जिला एवं प्रखंड स्तरीय कृषि पदाधिकारी या इनके प्रतिनिधि) से परामर्श लेकर इन नाशीजीवों की संख्या कम करने के लिए रसायनों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जा सकता है ।

पुष्पन एवं फलन-
फसल की इस अवश्था में शेष बचे हुए खरपतवारों को हाथ से निकोनी करके निकाल लेना चाहिए क्योंकि इस समय के बचे हुए खरपतवार से उत्पन्न वीज आने वाली फसल के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है ।

फल को मिट्टी के सम्पर्क में आने से बचने के लिए, पौधों को चारो तरफ से सहारा देने की आवश्यकता होती है, जिससे फल सडन की समस्या कम होती है ।

फली छेदक कीट के प्रबंधन के लिए एच.ए. एन.पी.वी. ०.४३ ए.एस. @ ६०० मि.ली. या बैसिलस थुरिनजिएन्सिस @ ४०० - ५०० ग्रा. की दर १५० - २०० लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव किया जा सकता है ।

फल छेदक कीट कीट की संख्या यदि आर्थिक क्षति स्तर पर पहुँचाने की संभावना हो तो इनडोक्साकार्ब १४.५ एस.सी. @ १६० - २०० मि.ली. या फ्लूवेन्डामाइड २० डब्लू.जी. @ ४० ग्रा. या नुवाल्यूरोन १० ई.सी. @ ३०० मि.ली. या क्लोरेनट्रानिलिप्रोले १८.५ एस.सी. @ ६० मि.ली. को १५० से २०० लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से छिडकाव करें ।

फलों की तुड़ाई-
टमाटर के फलों की तुडाई उसके उपयोग पर निर्भर करती है । यदि आस-पास के बाजार में बेचना हो तो फल पकने के बाद तुडाई करें । यदि दूर के बाजार में भेजना हो तो जैसे ही फल के रंग में परिवर्तन होना शुरू हो तुडाई कर लेना चाहिए ।

उपज एवं  भण्डारण-
फसल की उपज, प्रभेद, बुवाई की विधि एवं समय, खाद एवं उर्वरक की मात्रा, मौसम, फसल प्रबन्धन आदि पर निर्भर करती है । टमाटर की औसत उपज ३०० - ३५० कुन्तल प्रति हेक्टेयर होती है । अच्छी उत्पादन तकनीकी एवं उन्नत प्रभेद अपनाने से ८०० - १००० कुन्तल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त कर सकते है ।

बाजार में माग कम होने पर टमाटर को कुछ दिनों तक भण्डारित भी किया जा सकता है जैसे: अपरिपक्व हरे फल को १२.५० सेन्टीग्रेट तापमान पर ३० दिनों तक जबकि परिपक्व फल को ४ - ५० सेन्टीग्रेट तापमान पर १० दिनों तक रखा जा सकता है । उपरोक्त भण्डारण के समय सापेक्षिक आर्द्रता लगभग ८५ - ९० प्रतिशत होनी चाहिए ।

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प्याज की नर्सरी तैयार करने की तरीका

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हमारे देश में प्याज की खेती मुख्य रुप से रबी की फसल के रुप में की जाती है। अनेक राज्यों प्याज की खेती खरीफ में भी की जाती है। प्याज एक महत्वपूर्ण व्यापारिक फसल है जिसमें विटामिन सी, फास्फोरस आदि पौष्टिक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। प्याज का उपयोग प्रतिदिन सब्जी व मसाले के रुप में किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह सलाद, चटनी एवं अचार आदि के रुप में भी प्रयोग किया जाता है। गर्मी में लू लग जाने तथा गुर्दे की बीमारी में भी प्याज लाभदायक रहता है।

प्‍याज की खेती के लि‍ए जलवायु एवं भूमि

प्याज की फसल के लिए समशीतोष्ण जलवायु की अवश्यकता होती है। अच्छे कन्द बनने के लिए बड़े दिन तथा कुछ अधिक तापमान होना अच्छा रहता है। कन्द बनने से पहले 12.8-230 सेल्सियस तापमान तथा कन्दों के विकास के लिए 15.5-210 सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है।

आमतौर पर सभी किस्म की भूमि में इसकी खेती की जाती है, लेकिन उपजाऊ दोमट मिट्टी, जिसमे जीवांश खाद प्रचुर मात्रा में हो व जल निकास की उत्तम व्यवस्था हो, सर्वोत्तम रहती है।

भूमि अधिक क्षारीय व अधिक अम्लीय नहीं होनी चाहिए अन्यथा कन्दों की वृद्धि अच्छी नहीं हो पाती है। अगर भूमि में गंधक की कमी हो तो 400 किलो जिप्सम प्रति हेक्टर की दर से खेत की अन्तिम तैयारी के समय कम से कम 15 दिन पूर्व मिलायें।

प्‍याज की उन्नत किस्में

   लाल रंग की किस्में पीले रंग की किस्में सफेद रंग की किस्में
रबी में बुवाई हेतु  पूसा रेड, पूसा रतनार, पूसा माधवी, अर्का   निकेतन,  अर्का बिंदू, अर्का कीर्तिमान, अर्का   लालिमा, एग्रीफाउंड लाइट रेड, उदयपुर-101,   उदयपुर-103 अर्का पिताम्बार, फुले स्वर्णा, अर्ली ग्रेनो, ब्राउन  स्पेनिच पूसा व्हाइट राउंड, पूसा व्हाइट फ्लैट, उदयपुर-102, एग्रीफाउंड व्हाइट, एन-257-9-1
खरीफ में बुवाई हेतु  एन-53, एग्रीफाउंड डार्क रेड, पूसा रिधि, अर्का     कल्याण, एग्रीफाउंड डार्क रेड, एग्रीफाउंड रोज,     बसवंत-780 - भीमा सुभ्रा

प्‍याज के बीज बोने का समय

रबी फसल के नर्सरी में बीज की बुवाई अक्टूबर से मध्य नवम्बर तक करना अच्छा रहता है। खरीफ प्याज उत्पादन के लिए बीज की बुवाई का 15 जून से 30 जून तक करनी चाहिए। खरीफ प्याज की फसल को बोने मे किसी कारण देर होती हैa तो किसी भी हालात में जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बो देना चाहिए।

बीज की मात्रा
वर्षा ऋतु 10-12 किग्रा/ हेक्टर
ग्रीष्म ऋतु 8-10 किग्रा/ हेक्टर

प्‍याज नर्सरी में पौध तैयार करना
पौध के लिये क्यारी ऐसे स्थान पर बनानी चाहिए जहाँ पर सिंचाई और पानी के निकास का अच्छा प्रबंध हो। भूमि समतल तथा उपजाऊ होनी चाहिए। आसपास छाया वाले वृक्ष नहीं होने चाहिए। पौध तैयार करने के लिए 3 मीटर लम्बी तथा 1 मीटर चौड़ी क्यारी भूमि से लगभग 15-20 सेमी ऊँची बना लेनी चाहिए। उपरोक्त आकार की 50 क्यारियाँ एक हेक्टर में रोपण के लिए पर्याप्त होती हैं।

बीज बोने से पहले क्यारी की भलीभांति गुड़ाई करनी चाहिए। प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र में 4-5 ग्राम कैप्टान या थायरम मिलना चाहिए। प्रत्येक क्यारी में 15-20 किग्रा अच्छी तरह सड़ा हुआ गोबर का खाद तथा 10-15 ग्राम दानेदार फ्यूराडान मिला देना चाहिए। क्यारी को समतल करने के बाद 8-10 सेमी की दूरी पर 1.2 सेमी गहरी नालियाँ बनाकर क्यारी तैयार कर लेना चाहिए।

क्यारी तैयार होने के बाद बीज को फफूंदनाशक दवा जैसे– कैप्टान या थायरम (2.0-2.5 ग्राम प्रति किग्रा बीज) से अवश्य उपचारित कर लेना चाहिए ताकि प्रारम्भ में लगने वाली बीमारियों के प्रकोप से पौधे बच सकें। इस प्रकार उपचारित बीज को तैयार क्यारियों में बो देना चाहिए।

बुवाई के बाद बीज को मिट्टी तथा सड़े गले गोबर के खाद के मिश्रण से ढ़ककर उसके ऊपर कांस अथवा पुआल आदि की एक पतली परत बिछा देना चाहिए जिससे तेज धूप तथा वर्षा से बीज की रक्षा हो सके। यह परत भूमि में नमी बनाये रखने में भी सहायक होती है। बीज बोने के तुरंत बाद क्यारी में फव्वारे या हजारे से हल्की सिंचाई करना चाहिए तथा इसके बाद एक दिन के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए।

जब बीज का जमाव (अंकुरण) हो जाये तो कांस अथवा पुआल की परत को हटा देना चाहिए ताकि पौधों को धूप व हवा लगे। नर्सरी में आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई और निराई करते रहने से 6-7 सप्ताह बाद पौध रोपाई के लायक हो जाती है।

अंकुरण के बाद कैप्टान या थायरम या डायथेन एम-45 (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) का घोल पौधों की जड़ों के पास मृदा में डालने (ड्रेंनचिंग) से जड़ गलन तथा अन्य बीमारियों का भय नहीं रहता है। आवश्यक हो तो 10-15 दिन बाद फिर ड्रेंनचिंग करना चाहिए।

नर्सरी में बुवाई क्यारी को कांस से ढकना रोपण के लिए तैयार पौध
प्‍याज के कीट एवं व्याधि नियंत्रण

पर्ण जीवी (थ्रिप्स):
ये कीट छोटे आकार के होते हैं जो पत्तियों का रस चूसते हैं। यह कीट कई विषाणु जनित बीमारियों का वाहक भी होता है। रस चूसने से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं तथा आक्रमण के स्थान पर सफेद चकते पड़ जाते हैं। इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल (0.3-0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए तथा आवश्यकता हो तो 15 दिन बाद दोहराना चाहिए।

आद्र गलन (डेम्पिंग ऑफ):
यह विभिन्न प्रकार की कवक प्रजातियों द्वारा होने वाला रोग है। रोग दो तरह से पौध को नुकसान पहुंचाता है, पौध अंकुरण से पूर्व तथा पश्चात। अंकुरण के पूर्व पौधे के बीज का अंकुरण ही नही हो पाता है, बीज सड़कर नष्ट हो जाते हैं जबकि अंकुरण के पश्चात रोग के आक्रमण के लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

इस स्थिति मे पौधे के तने जमीन की सतह पर जिसे कॉलर रीजन कहते हैं पर विगलन हो जाता है व तना पौधे का भार सहने योग्य नही होता है जिससे नव अंकुरित पौध गिरकर मर जाती है।  

रोग की रोकथाम हेतु कर्षण क्रियाओं में बदलाव लाना चाहिए जैसे पौध को दूरी पर लगना, नर्सरी हेतु हल्की मिट्टी का चुनाव व बार बार सिंचाई करना चाहिए। मृदा का उपचार करने के लिए कवकनाशी कैप्टान या थायरम का 0.2 से 0.5 प्रतिशत सांद्रता का घोल मृदा में सींचना चाहिए जिसे ड्रेंनचिंग कहते हैं।

बीजों की बुवाई से पूर्व कैप्टान या थायरम नामक दवा से 2.0-2.5 ग्राम प्रति किग्रा बीज के हिसाब से उपचारित करना भी रोग से बचाव करता है।

जीवाणु धब्बा:
वर्षा ऋतु के मौसम में पौध पर जीवाणु धब्बा बीमारी बहुत लगती है। पत्तियों पर काले धब्बे बन जाते हैं। इस अवस्था मे स्ट्रेप्टोसाइक्लीन दवा का 250 पी.पी.एम. घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।  

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प्‍याज की उन्नत खेती कैसे करें ?

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प्‍याज की खेती  भारत के सभी भागों मे सफलता पूर्वक की जाती है। प्याज एक नकदी फसल है जिसमें विटामिन सी, फास्फोरस आदि पौष्टिक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसका प्याज का उपयोग सलाद, सब्जी, अचार एवं मसाले के रूप में किया जाता है। गर्मी में लू लग जाने तथा गुर्दे की बीमारी में भी प्याज लाभदायक रहता है। भारत में रबी तथा खरीफ दोनो ऋतूओं मे प्‍याज उगाया जा सकता है।

जलवायु एवं भूमि-

प्याज की फसल के लिए ऐसी जलवायु की अवश्यकता होती है जो ना बहुत गर्म हो और ना ही ठण्डी। अच्छे कन्द बनने के लिए बड़े दिन तथा कुछ अधिक तापमान होना अच्छा रहता है। आमतौर पर सभी किस्म की भूमि में इसकी खेती की जाती है, लेकिन उपजाऊ दोमट मिट्टी, जिसमे जीवांश खाद प्रचुर मात्रा में हो व जल निकास की उत्तम व्यवस्था हो, सर्वोत्तम रहती है। भूमि अधिक क्षारीय व अधिक अम्लीय नहीं होनी चाहिए अन्यथा कन्दों की वृद्धि अच्छी नहीं हो पाती है। अगर भूमि में गंधक की कमी हो तो 400 किलो जिप्सम प्रति हेक्टर की दर से खेत की अन्तिम तैयारी के समय कम से कम 15 दिन पूर्व मिलायें।

प्याज की उन्नत किस्में-


खरीफ में बुवाई हेतु
                  रबी में बुवाई हेतु
एन-53, एग्रीफाउंड डार्क रेड
                      पूसा रेड, पूसा रतनार, एग्रीफाउंड लाइट रेड, एग्रीफाउंड रोज, पूसा व्हाइट                           राउंड, पूसा व्हाइट फ्लैट

खाद एवं उवर्रक:

प्याज के लिए अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 400 क्विंटल प्रति हेक्टर खेत की तैयारी के समय भूमि में मिलावें। इसके अलावा 100 किलो नत्रजन, 50 किलो फास्फोरस एवं 100 किलो पोटाश प्रति हेक्टर की दर से आवश्यकता होती है। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पूर्व खेत की तैयारी के समय देवें। नत्रजन की शेष मात्रा रोपाई के एक से डेढ़ माह बाद खड़ी फसल में देवें।खाद एवं उवर्रक:

प्याज की बुवाई-
प्याज की बुवाई खरीफ मौसम में, यदि बीज द्वारा पौधा बनाकर फसल लेनी हो तो, मई के अन्तिम सप्ताह से लेकर जून के मध्य तक करते हैं और यदि छोटे कन्दों द्वारा खरीफ में अगेती या हरी प्याज लेनी हो तो कन्दों को अगस्त माह में बोयें। प्याज की खेती के लिए छोटे कन्द बनाने के लिए बीज को जनवरी के अन्तिम सप्ताह में या फरवरी के प्रथम सप्ताह में बोयें। रबी फसल हेतु नर्सरी में बीज की बुवाई नवम्बर-दिसम्बर में करनी चाहिए।

एक हेक्टर में फसल लगाने के लिए 8-10 किग्रा बीज पर्याप्त होता है। पौधे एवं कन्द तैयार करने के लिए बीज को क्यारियों में बोयें, जो 3x1 मीटर आकर की हो। वर्षाकाल में उचित जल निकास हेतु क्यारियों की ऊँचाई 10-15 सेंटीमीटर रखनी चाहिए।

नर्सरी में अच्छी तरह खरपतवार निकालने तथा दवा डालने के लिए बीजों को 5-7 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारों में 2-3 सेंटीमीटर गहराई पर बोना अच्छा रहता है। क्यारियों की मिट्टी को बुवाई से पहले अच्छी तरह भुरभुरी कर लेनी चाहिए।

पौधों के आद्र गलन बीमारी से बचाने के लिए बीज को ट्राइकोडर्मा विरिडी (4 ग्राम प्रति किग्रा बीज) या थिरम (2 ग्राम प्रति किग्रा बीज) से उपचारित करके बोना चाहिए। बोने के बाद बीजों को बारीक खाद एवं भुरभुरी मिट्टी व घास से ढक देवें। उसके बाद झारे से पानी देवें, फिर अंकुरण के बाद घास फूस को हटा देवें।

पौधों की रोपाई-
पौध लगभग 7-8 सप्ताह में रोपाई योग्य हो जाती है। खरीफ फसल के लिए रोपाई का उपयुक्त समय जुलाई के अन्तिम सप्ताह से लेकर अगस्त तक है। रोपाई करते समय कतारों के बीच की दूरी 15 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखते हैं।

प्याज कन्दों से बुवाई-
कन्दों की बुवाई 45 सेंटीमीटर की दूरी पर बनी मेड़ों पर 10 सेंटीमीटर की दूरी पर दोनों तरफ करते हैं। 5 सेंटीमीटर से 2 सेंटीमीटर व्यास वाले आकर के कन्द ही चुनना चाहिए। एक हेक्टर के लिए 10 क्विंटल कन्द पर्याप्त होते हैं।

सिंचाई-
बुवाई या रोपाई के साथ एवं उसके तीन-चार दिन बाद हल्की सिंचाई अवश्य करें ताकि मिट्टी नम रहें। बाद में भी हर 8-12 दिन में सिंचाई अवश्य करतें रहें। फसल तैयार होने पर पौधे के शीर्ष पीले पड़कर गिरने लगते हैं तो सिंचाई बन्द कर देनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण-
अंकुरण से पूर्व प्रति हेक्टर 1.5-2 किग्रा एलाक्लोर छिडकें अथवा बुवाई से पूर्व 1.5-2.0 किग्रा फ्लूक्लोरेलिन  छिड़ककर भूमि में मिलायें, तत्पश्चात एक गुड़ाई 45 दिन की फसल में करें।

प्याज के प्रमुख कीट एवं व्याधियां-
पर्ण जीवी (थ्रिप्स): ये कीट छोटे आकार के होते हैं तथा इनका आक्रमण तापमान में वृद्धि के साथ तीव्रता से बढ़ता है और मार्च में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। इन कीटों द्वारा रस चूसने से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं तथा आक्रमण के स्थान पर सफेद चकते पड़ जाते हैं। इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस एल (0.3-0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें। आवश्यक हो तो 15 दिन बाद दोहरावें।                                 

तुलासिता: पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रूई जैसी फफूंद की वृद्धि दिखाई देती है। मेन्कोजेब या जाईनेब का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए।

अंगमारी: पत्तियों की सतह पर सफेद धब्बे बन जाते हैं जो बाद मे बीच से बैंगनी रंग के हो जाते हैं। मेन्कोजेब या जाईनेब का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। इसके साथ तरल (स्प्रेडर) साबुन का घोल अवश्य मिलाना चाहिए। 

गुलाबी जड़ सडन: इस रोग में जड़े हल्की गुलाबी होकर गलने लगती हैं। कार्बेण्डाजिम का 1 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करके बुवाई करें। पौध रोपण के समय पौधों को कार्बेण्डाजिम के 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल में डुबोकर रोपाई करें।

प्‍याज की खुदाई-
कन्दों से लगाई प्याज की फसल 60 से 100 दिन में तथा बीजों से तैयार की गई फसल 140 से 150 दिन में तैयार होती है। रबी फसल की खुदाई पत्तियों के पीली होकर जमीन पर गिरने पर शुरू करनी चाहिए। खरीफ मौसम में पत्तियां नहीं गिरती है अत: दिसम्बर-जनवरी में जब गाठों का आकर 6 से 8 सेन्टीमीटर व्यास वाला हो जाये तो पत्तियों को पैरों से जमीन पर गिरा देना चाहिए, जिससे पौधों की वृद्धी रूक जाये एवं गाठें ठोस हो जायें। इसके लगभग 15 दिन बाद गांठों की खुदाई करनी चाहिए।

प्‍याज कंद सुखाना-
खुदी हुई गांठों को पत्तियों के साथ एक सप्ताह तक सुखायें। यदि धूप तेज हो तो छाया में लाकर रख देवें तथा एक सप्ताह बाद पत्तों को गांठ के 2.0 से 2.5 सेंटीमीटर ऊपर से काट देवें तथा एक सप्ताह तक सुखायें।

प्‍याज की उपज-
इस प्रकार उन्नत तकनीकें अपनाकर प्याज से प्रति हेक्टर लगभग 200 से 350 क्विंटल तक पैदावार ली जा सकती है।

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कटहल की उन्नत खेती कैसे करें ?

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कटहल भारत का एक महत्वपूर्ण फल है। इसकी उत्पत्ति भारत में हुई हैं। यह विश्व के अन्य देशों में भी उगाया जाता हैं। भारत वर्ष में इसकी खेती पूर्वी एवं पश्चिमी घाट के मैदानों, उत्तर-पूर्व के पर्वतीय क्षेत्रों, संथाल परगना एवं छोटा नागपुर के पठारी क्षेत्रों, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बंगाल के मैदानी भागों में मुख्य रूप से की जाती है।

इसे दक्षिण भारत में प्रमुखता से उगाया जाता हैं। जगदलपुर व बस्तर कटहल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। कटहल का पौधा एक दीर्घजीवी, सदाबहार, 8-15 मी. ऊँचा बढ़ने वाला, फैलावदार एवं घने क्षेत्रकयुक्त बहुशाखीय वृक्ष होता है।

कटहल के छोटे एवं नवजात मुलायम फल सब्जी के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। जैसे-जैसे फल बड़े होते जाते है इनमें गुणवत्ता का विकास होता जाता है एवं परिपक्व होने पर इसके  फलों में शर्करा, पेक्टिन, खनिज पदार्थ एवं विटामिन ‘ए’ का विकास होता है। कटहल में कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन, कैल्शियम, फ़ॉस्फोरस, लौह तत्व विटामिन ‘ए’ एवं थायमिन प्रचुर मात्रा में मिलता है।

कठहल के लि‍ए भूमि

कटहल के पौधे लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में उगाऐ जा सकतेे है परन्तु अच्छी जल निकास वाली गहरी दोमट मिट्टी इसकी बढ़वार एवं पैदावार के लिए उपयुक्त होती है क्योंकि इनकी जड़े भूमि में अधिक पानी के जमाव को सहन नहीं कर सकती जिसके फलस्वरूप जल स्तर ऊपर उठने पर पौधे सूखने लगते हैं।

कठहल के लि‍ए जलवायु

कटहल एक उष्ण कटिबन्धीय फल है। इसे शुष्क तथा नम दोनों प्रकार की जलवायु में उगाया जा सकता है। इसकी खेती मैदानी भागों से लेकर समुद्र तल से लगभग 1000 मी. ऊँचाई तक पहाड़ों पर की जा सकती है।

कठहल की किस्में
बागवानी एवं कृषि-वानिकी शोध कार्यक्रम, राँची से विकसित प्रजातियाँ खजवा, स्वर्ण मनोहर, स्वर्ण पूर्ति (सब्जी के लिए) एन.जे.-1, एन.जे.-2, एन.जे.-15 एवं एन.जे.-3 है।

खजवा
इस किस्म के फल जल्दी पक जाते हैं। यह सफेद कोये वाली फसल हैं। फल भार 25-30 की.ग्रा. होता हैं। यह ताजे पके फल खाने वाली किस्मों में यह सर्वोत्तम किस्म हैं।

स्वर्ण मनोहर
मध्यम घने क्षत्रक वाले इस किस्म में फरवरी के प्रथम सप्ताह में फल लग जाते हैं जिनको छोटी अवस्था में बेचकर अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है।

फल लगने के 20-25 दिन बाद इसके एक पेड़ से 45-50 कि.ग्रा. फल सब्जी के लिए प्राप्त किया जा सकता है। इसकी प्रति वृक्ष औसत उपज 350-500 कि.ग्रा. (पकने के बाद) है।

स्वर्ण पूर्ति
किस्म के फल देर से पकने के कारण लंबे समय तक सब्जी के रूप में उपयोग किये जा सकते हैं। इस किस्म के वृक्ष छोटे तथा मध्यम फैलावदार होते हैं फलों का आकार गोल एवं कोये की मात्रा अधिक होती है।

इसका फल छोटा (3-4 कि.ग्रा.), रंग गहरा हरा, रेशा कम, बीज छोटा एवं पतले आवरण वाला तथा बीच का भाग मुलायम होता है। 80-90 फल प्रति वृक्ष प्रति वर्ष लगते हैं।

रुद्रासी
फल छोटे तथा काटे वाले होते हैं। इनका भार 4-5 की.ग्रा. तक होता हैं। फल गुच्छो में आते हैं।

सिंगापुर
फल आकार में बडे होते है और अधिक समय तक लगे रहते है।

कठहल के पेड प्रसारण

कटहल का प्रसारण अधिकतर बीज द्वारा किया जाता है। एक समान पेड़ तैयार करने के लिए वानस्पतिक विधि द्वारा पौधा तैयार करना चाहिए। इसके लिए इनाचिंग और गूटी द्वारा सफल पाया गया है। बड़े आकार एवं उत्तम किस्म के कटहल से बीज का चुनाव करना चाहिए।

बीज को पके फल से निकलने के बाद ताजा ही बोना चाहिए। पौध तैयार करने के लिए मूल वृंत की आवश्यकता होती है जिसके लिए कटहल के बीजू पौधों का प्रयोग किया जाता है। मूल वृंत को तैयार करने के लिए ताजे पके कटहल से बीज निकाल कर 400 गेज की 25 x 12 x 12 सें.मी. आकार वाली काली पॉलीथीन को थैलियों में बुआई करना चाहिए।

थैलियों को बालू, चिकनी मिट्टी या बागीचे की मिट्टी तथा गोबर की सड़ी खाद को बराबर मात्रा में मिलाकर बुवाई से पहले ही भर देना चाहिए। चूँकि कटहल का बीज जल्दी ही सूख जाता है अतः उसे फल से निकालने के तुरन्त बाद थैलियों में 4-5 सें.मी. गहराई पर बुआई कर देना चाहिए।

उचित देख-रेख करने से मूलवृंत लगभग 8-10 माह में बंडिंग / ग्रैफ्टिंग योग्य तैयार हो जाते है।

कटहल के पौधे को पैच बडिंग या क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग विधि द्वारा तैयार किया जा सकता है। पैच बडिंग के लिए मातृ वृक्ष से सांकुर डाली काटकर ले आते हैं जिससे 2-3 सें.मी. लम्बी कली निकाल कर मूलवृंत पर उचित ऊँचाई पर उसी आकार की छाल हटाकर बडिंग कर देते हैं।

बडिंग के बाद कली को सफेद पालीथीन की पट्टी (100 गेज) से अच्छी तरह बांध देते हैं तथा मूलवृंत का ऊपरी भाग काट देते हैं। ग्रैफ्टिंग विधि से पौधा तैयार करने के लिए मातृ वृक्ष पर ही सांकुर डाली की पत्तियों को लगभग एक सप्ताह पहले पर्णवृंत छोड़कर काट देते हैं।

जब पत्ती का पर्णवृंत गिरने लगे तब सांकुर डाली को काटकर ले आते है। मूलवृंत को उचित ऊँचाई पर काट देते हैं तथा उसके बीचो-बीच 3-4 सें.मी. लम्बा चीरा लगा देते हैं।

सांकुर डाली के निचले भाग को दोनों तरफ से 3-4 सें.मी. लगा कलम बनाते हैं जिसे मूलवृंत के चीरे में घुसाकर 100 गेज मोटाई की सफेद पालीथीन की पट्टी से बांध देते है।

छोटानागपुर क्षेत्र में बडिंग के लिए फरवरी-मार्च तथा ग्राफ्टिंग के लिए अक्टूबर-नवम्बर का महीना उचित पाया गया है।

पौधा रोपण
रोपाई के लिए उपयुक्त समय जुलाई से सितम्बर है।मई-जून के महीने में भूमि की अच्छी तरह से जुताई करने के बाद पाटा चलाकर भूमि को समतल बना लेना चाहिए।

कटहल का पौधा आकार में बड़ा तथा अधिक फैलावदार होता है अतः इसे 10 x 10 मी. की दूरी पर लगाया जाता है। अतः 10 से 12 मीटर की दूरी पर 1 x 1 x 1 मीटर आकार के गड्ढे तैयार करना चाहिए।

इन  गड्ढों को 15 दिन खुला रखने के बाद ऊपरी मिट्टी दूसरी तरफ रख देते हैं। 15 दिन खुला के बाद इन गड्ढों में 20 से 25 किग्रा. गोबर की सड़ी खाद अथवा कम्पोस्ट, 250 ग्राम सिंगल सुपर फ़ॉस्फेट, 500 म्युरियेट ऑफ़ पोटाश, 1 किलो नीम की खल्ली तथा 10 ग्राम थाइमेट को मिट्टी में अच्छी प्रकार मिलाकर भर देना चाहिए।

जब गड्ढे की मिट्टी अच्छी तरह दब जाये तब उसके बीचो-बीच में पौधे के पिण्डी के आकार का गड्ढा बनाकर पौधा लगा दें। पौधा लगाने के बाद चारों तरफ से अच्छी तरह दबा दें और उसेक चारों तरफ थाला बनाकर पानी दें।

कठहल फसल की देख-रेख
पौधा लगाने के बाद से एक वर्ष तक पौधों की अच्छी देख-रेख करनी चाहिए। नवीन रोपित पौधों को धुप व पाले से सुरक्षा करना आवश्यक हैं। प्रतिवर्ष वर्षा ऋतू के पश्चात बोर्डो पेस्ट लगा देना चाहिए।

कठहल फसल में सिंचाई
नवजात पौधों को कुछ दिन तक बराबर पानी देते रहें। पौधा लगाने के बाद प्रारंभिक वर्ष में पौधों की गर्मियों में प्रति सप्ताह और जाड़े में 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए।

बड़े पेड़ों की गर्मी में 15 दिन और जाड़े में एक महीने के अंतर से सिंचाई करनी चाहिए। नवम्बर-दिसम्बर माह में फूल आते हैं। इसलिए इस अवधि में सिंचाई नहीं करना चाहिए।

कठहल के पेडों की काट-छांट
नये पौधों में 3 वर्ष तक उचित ढांचा देने के लिए काट-छांट करना चाहिए ढांचा देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि तने पर 1.5-2.0 मी. ऊँचाई तक किसी भी शाखा को नहीं निकलने दें। उसके ऊपर 3-4 अच्छी शाखाओं को चारों तरफ बढ़ाने देना चाहिए जो पौधों का मुख्य ढांचा बनाती हैं। कटहल के पौधों के मुख्य तनों एवं शाखाओं से निकलने वाले उसी वर्ष के कल्लों पर फल लगता है। अतः इसके पौधों में किसी विशेष काट-छांट की आवश्यकता नहीं होती है। फल तोड़ाई के बाद फल से जुड़े पुष्पवृंत टहनी को काट दें जिससे अगले वर्ष अच्छी फलत हो सके। पुराने पेड़ों पर पनपने वाले परजीवी जैसे बांदा (लोरेन्थस), सूखी एवं रोगग्रस्त शाखाओं को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक 
प्रत्येक पौधे को 25-30 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद, 125 ग्रा. यूरिया, 250 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 125 ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वर्ष की दर से जुलाई माह में देना चाहिए।

तत्पश्चात पौधे की बढ़वार के साथ खाद की मात्रा में वृद्धि करते रहना चाहिए। जब पौधे 10 वर्ष के हो जाये तब उसमें 80-100 कि.ग्रा. गोबर की खाद, 1.25 कि.ग्रा. यूरिया, 2.5 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 1.25 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वर्ष देते रहना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक देने के लिए पौधे के क्षत्रक के नीचे मुख्य तने से लगभग 1-2 मी. दूरी पर गोलाई में 25-30 सें.मी. गहरी खाई में खाद के मिश्रण को डालकर मिट्टी से ढक देना चाहिए।

निंदाई-गुड़ाई
पौधों के थालों में समय-समय पर खरपतवार निकाल कर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। निंदाई-गुड़ाई करके पौधे के थाले साफ़ रखने चाहिए। बड़े पेड़ों के बागों की वर्ष में दो बार जुताई करनी चाहिए। कटहल के बाग़ में बरसात आदि में पानी बिल्कुल नहीं जमना चाहिए।

कठहल मे अन्तः शस्य
शुरू के कुछ वर्षों तक पौधों के बीच काफी जगह खाली पड़ी रहती है। इसलिए 3 से 6 वर्ष तक अन्तः शस्य के रूप में सब्जिया, पपीता आदि लगाया जा सकता हैं बड़े पेड़ हो जाने पर भी इनके बीच अदरख और हल्दी की खेती अंतरफसल के रूप में की जा सकती है।                    

कठहल मे फलन 
फूल मुख्य तने एवं मोटी डालियों पर जनवरी-फरवरी में आते है। फल जनवरी-फरवरी से जून-जुलाई तक विकसित होते रहते हैं। इसी समय में फल के अंदर बीज, कोया इत्यादि का विकास होता है और अंततः जून-जुलाई में फल पकने लगते हैं।

कठहल की उपज
कटहल के बीजू पौधे में 7-8 वर्ष में फलन प्रारम्भ होता है जबकि कलमी पौधों में 4-5 वर्ष में ही फल मिलने लगते है। पेड़ का 12 वर्ष की उम्र तक फलन कम होता है।

इसके बाद प्रति पेड़ 100-250 तक फल प्राप्त होते है। कटहल के फलों को विकास के साथ कई प्रकार से उपयोग में लाया जाता है । अति नवजात एवं मध्यम उम्र के फल, जिसे सब्जी के लिए प्रयोग किया जाता है, को उस समय तोड़ना चाहिए जब उसके डंठल का रंग गहरा हरा, गूदा कठोर और कोर मलायम हो।

साधारणतः फल लगने के 100-120 दिनों बाद तोड़ने लायक हो जाते हैं। तोड़ते समय फलों के सीधा जमीन पर गिरने से फल फट जाते है इसलिए फल के वृंत को रस्सी से बांध कर धीरे-धीरे नीचे सावधानीपूर्वक उतार कर किसी छायादार स्थान पर रखना चाहिए।

कठहल के रोग-

फल गलन 
यह रोग राइजोपस आर्टोकारपाई नामक कवक के कारण होता है। इसका प्रकोप फल की छोटी अवस्था में होता है। इसके कारण कटहल के फल सड़कर गिरने लगते हैं।

इस बीमारी की रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 के 2 ग्राम प्रति लीटर में घोलकर 15 दिनों के अंतराल पर 2-3 छिड़काव करना चाहिए या फल लगने के बाद लक्षण स्पष्ट होते ही ब्लू कॉपर के 0.3 घोल का दो छिड़काव 15-20 दिनों के अंतराल पर करें।                                                          

गुलाबी धब्बा
इस रोग में पत्तियों को निचली सतह पर गुलाबी रंग का धब्बा बन जाता है। इसके नियंत्रण के लिए कॉपर जनित फफूंद नाशी जैसे कॉपर आक्सीक्लोराइड या ब्लू कॉपर के 0.3 घोल का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए।

कठहल के कीट-

मिली बग
ये नये फूल-फल एवं डंठलों का रस चूसते हैं फलस्वरूप फूल एवं फल गिर जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए मई-जून में बगीचे की जुताई कर देनी चाहिए। इसके उपचार के लिए 3 मिली. इंडोसल्फान प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

तना छेदक
इस कीट के नवजात पिल्लू कटहल के मोटे तने एवं डालियों में छेद बनाकर नुकसान पहुँचाते हैं। इसका आक्रमण अधिक होने पर पेड़ की डालियाँ एवं तना सूख जाते हैं इसके नियंत्रण के लिए छिद्र को किसी पतले तार से साफ़ करके नुवाक्रान का घोल (10 मि.ली./ली.) अथवा पेट्रोल या किरोसिन तेल के चार-पाँच बूंद रुई में डालकर गीली चिकनी मिट्टी से बंद कर दें।


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शिमला मिर्च की उन्नत खेती कैसे करें ?

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यह एक महत्वपूर्ण सब्जी की फसल है जिसको ग्रीन हाउस या शेड नेट हाउस में उगाया जाता है. इसे “स्वीट पेप्पर” और “बैल पेप्पर” के नाम से भी जाना जाता है. शिमला मिर्च में खनिज पदार्थ और विटामिन ऐ, सी की उच्च मात्रा पाई जाती  है. यह एक सदाबाहार जड़ी-बूटी है जो सोलनेसी परिवार से संबंध रखती है. यह 75 सैं.मी. ऊंचाई तक पहुंच जाती है. इसके फूल छोटे और फल निकलने पर सफेद-जामुनी रंग के होते है.| खुले खेत में इसकी औसतन पैदावार 83-165 क्विंटल प्रति एकड़ और ग्रीन हॉउस में इसकी औसतन पैदावार 415-500 क्विंटल प्रति एकड़ होती है. पंजाब, बैंगलोर, पुणे, और कर्नाटक ग्रीन हाउस में शिमला मिर्च उगाने के मुख्य राज्य है| केरला, महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, आंध्र प्रदेश और पश्चिमी बंगाल राज्य है जो छोटे स्तर पर शिमला मिर्च का उत्पादन करते हैं.

शिमला मिर्च का इस्तेमाल सब्जी में सबसे ज्यादा किया जाता है. शिमला मिर्च में विटामिन ए, सी और बीटा कैरोटीन सबसे ज्यादा मात्रा में पाया जाता है. जो मानव शरीर के लिए बहुत फ़ायदेमंद होते है. शिमला मिर्च का इस्तेमाल वजन को स्थिर बनाए रखने के लिए किया जाता है. इसके अलावा शिमला मिर्च का इस्तेमाल औषधियों के रूप में भी किया जाता है.

शिमला मिर्च की खेती करने में ज्यादा मेहनत और मजदूरी की जरूरत नही होती. जिस कारण इसकी खेती करने वाले किसानों की अच्छी खासी कमाई हो जाती है. शिमला मिर्च ज्यादातर लाल हरा, पीला, और गुलाबी रंगों में पाई जाती है. शिमला मिर्च की खेती भारत में बहुत कम जगहों पर ही की जा रही हैं.

शिमला मिर्च को आद्र जलवायु वाली जगहों पर आसानी से उगाया जा सकता हैं. इसके लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती है. शिमला मिर्च की खेती पूरे साल की जा सकती है. लेकिन सर्दियों के मौसम में पाला पड़ने की वजह से इसकी पैदावार पर फर्क देखने को मिलता है. अगर आप इसकी खेती करना चाह रहे है तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.

उपयुक्त मिट्टी

शिमला मिर्च की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली चिकनी दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है. लेकिन इसे और भी कई तरह की मिट्टी में उगा सकते हैं. जिसके लिए मिट्टी का पी.एच. मान 6 से आसपास होना चाहिए. अलग तरह की मिट्टी में इसको उगने के लिए देशी गोबर के खाद की ज्यादा मात्रा का उपयोग करना अच्छा होता है.

जलवायु और तापमान

शिमला मिर्च की खेती के लिए नर्म और आद्र जलवायु की जरूरत होती है. इसकी खेती के लिए ज्यादा सर्दी और गर्मी दोनों ही नुकसानदायक होती है. ज्यादा सर्दी और गर्मी होने पर इसकी पैदावार कम होती है.

शिमला मिर्च की खेती के लिए 10 से 40 डिग्री तापमान की जरूरत होती है. जबकि सामान्य तापमान पर इसकी पैदावार ज्यादा होती है. जहाँ सर्दियों में तापमान 10 डिग्री से नीचे और गर्मियों में 40 डिग्री के ऊपर नही जाता वहां इसकी खेती पूरे साल की जा सकती है. लेकिन इससे कम या ज्यादा तापमान होने की स्थिति में इसके फूल और फल दोनों ही झड़ने लगते हैं.

शिमला मिर्च की उन्नत किस्में

शिमला मिर्च की कई तरह की किस्में मौजूद हैं. जिनमें से कुछ किस्में हैं जो व्यापारिक महत्व से ज्यादा उगाई जाती है. आज हम आपको उन्ही किस्मों के बारें में बताने वाले हैं.

कैलिफोर्निया वन्डर
शिमला मिर्च की ये किस्म एक विदेशी किस्म है. इसका पौधा सामान्य ऊचाई वाला होता है. इसके फल का रंग हरा चमकीला होता है. इस किस्म के पौधों पर फल 75 दिन बाद ही लगने शुरू हो जाते हैं. एक हेक्टेयर में इसकी पैदावार 125 से 150 क्विंटल तक हो जाती है.

येलो वन्डर
इस किस्म का पौधा भी सामान्य ऊचाई वाला होता है. जबकि इसकी पत्तियां ज्यादा बड़ी होती हैं. इस पर लगने वाले फल का रंग गहरा हरा होता है. एक हेक्टेयर में इसकी पैदावार 150 क्विंटल तक हो जाती है. और इसका फल 60 दिन में ही पककर तैयार हो जाता है.

सोलन हाइब्रिड -1 और 2
ये दोनों ही शिमला मिर्च की संकर किस्म है. इन दोनों किस्म पर फल सड़न और जीवाणु से लगने वाले रोग नही लगते. इसके पौधे प्राय बड़े होते हैं. इन दोनों किस्मों के पौधों पर  लगने वाले फल का आकार आयताकार होता है. जो 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाते हैं. एक हेक्टेयर में इनकी पैदावार 325 से 375 क्विंटल तक हो जाती है.

सोलन भरपूर
इस किस्म पर फल सड़न और जीवाणु जनित रोग नही लगता. इसके पौधे सामान्य आकर से बड़े होते हैं. इसकी पैदावार 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक आसानी से हो जाती है. इस किस्म का पौधे के खेत में लगाने के 70 दिन बाद फल देना शुरू कर देता है.

पूसा दीप्ति
शिमला मिर्च की इस किस्म की पैदावार 300 से 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. इसका पौधा 70 दिन बाद फल देना शुरू कर देता है. इसके पौधे का आकार झाड़ीनुमा होता है. इस पर लगने वाले फल शुरुआत में हरे रंग के होते हैं. लेकिन पकने के बाद इनका रंग लाल हो जाता है.

पौध तैयार करना
शिमला मिर्च के बीज को खेतों में सीधा नही लगाया जाता. इसको लगाने से पहले इसकी पौध तैयार की जाती है. जिन्हें नर्सरी या खेतों में तैयार किया जाता है. इसके लिए शुरुआत में खेत में 4 5 क्यारी बनाएं, जो समतल भाग से कुछ उठी हुई हों. इन सभी क्यारियों में पुरानी गोबर की खाद डालकर उसे अच्छे से मिला दें. जिसके बाद मिट्टी को उपचारित करने के लिए उसमें बाविस्टिन की उचित मात्रा डाल दें.

बीज को क्यारियों में डालने से पहले उसे थाइरम या कैप्टन से उपचारित कर लें. बीज को क्यारियों में डालने के बाद उसे अच्छे से मिट्टी में मिला दें. एक हेक्टेयर में साधारण किस्म की पौध लगाने के लिए 750 से 900 ग्राम बीज की जरूरत होती है. जबकि संकर किस्म की पौध बनाने के लिए 250 ग्राम बीज काफी होता है.

बीज को क्यारियों में मिलाने के बाद उसमें पानी दे. पानी देने के बाद मिट्टी को कुछ दिन के लिए पुलाव से ढक दें. ऐसा करने से खरपतवार जन्म नही ले पाती हैं. जब मिर्च की पौध अंकुरित होने लगे तब पुलाव को हटा लें. जिसके बाद पौधों को उचित मात्रा में पानी देते रहे. पौध बनने में 30 से 40 दिन का वक्त लगता है. जिसके बाद जब पौध पूरी तरह से तैयार हो जाती है तो इन्हें खेत में लगा देना चाहिए.

खेत की जुताई
शिमला मिर्च की खेती करने के लिए खेत की अच्छे से जुताई कर उसमें पुरानी गोबर की खाद डाल दें. उसके बाद फिर से खेत की जुताई कर उसे मिट्टी में अच्छे से मिला दें. खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी छोड़ दें. पानी छोड़ने के बाद जब खेत में खरपतवार निकल आये तब खेत की फिर अच्छे से जुताई कर दें. और खेत में पाटा लगाकर जमीन को समतल बना दे. खेत को समतल बना देने के बाद उसमें 2 से 3 फिट की दूरी पर मेढ़ बना दे. जिनसे बाद में उसमें क्यारियां बना दें.

पौध को खेत में लगाने का टाइम और तरीका
शिमला मिर्च की खेती के बारें में हमने पहले बताया कि इसकी खेती पूरे साल भर की जा सकती है. इस कारण खेतों में इसका रोपण तीन बार में हो सकता है. इसकी पहली फसल का रोपण जुलाई माह में कर देना चाहिए. जबकि इसका दूसरा रोपण सितम्बर माह के बाद करना चाहिए. और इसके तीसरे रोपण के लिए जनवरी का माह उपयुक्त होता है. शिमला मिर्च का पौधा बिना पॉलीहाउस के 6 महीने तक पैदावार दे सकता है. जिसके लिए पौधे की देखभाल अच्छे से की जानी चाहिए. पौधे के खेत में लगाने के लगभग दो महीने बाद ही फल लगने शुरू हो जाते हैं.

पौधों को खेत में लगाने के दौरान उन्हें मेढ़ों पर लगाए. दो मेढ़ों के बीच की दूरी लगभग तीन फिट होनी चाहिए. जबकि मेढ़ों पर पौधे को लगभग एक फिट की दूरी पर लगाए. पौधे के रोपण से पहले पौध तैयार की गई क्यारियों में पानी छोड़ दें ताकि उन्हें निकलने पर ज्यादा पौध खराब ना हों.

शिमला मिर्च की सिंचाई
पौध को खेत में लगाने के तुरंत बाद ही पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. शिलमा मिर्च की सिंचाई ड्राप विधि से करनी चाहिए. क्योंकि इसकी फसल के लिए कम और ज्यादा पानी दोनों ही नुकसानदायक होते हैं. इस कारण ड्राप विधि से इसकी सिंचाई करना अच्छा होता है. ड्राप विधि से इसकी सिंचाई करने पर पौधों को पानी उचित मात्रा में मिलता है. इस विधि से पौधे को रोज़ 20 मिनट तक पानी देना चाहिए. जिससे पौधा अच्छे से विकास करता है. बारिश के टाइम पानी खेत में भर जाए तो उसे तुरंत निकाल दें. अगर पानी ज्यादा दिनों तक भरा रहता है तो पौधे में कई तरह के रोग लग जाते हैं.

उर्वरक की मात्रा
शिमला मिर्च की रुपाई करने से पहले खेत में 15 से 20 गाड़ी गोबर की खाद प्रति एकड़ के हिसाब से डालकर अच्छे से मिला दें. गोबर की खाद के अलावा कम्पोस्ट खाद भी उपयोग में ले सकते हैं. इसके अलावा एन.पी.के. की उचित मात्रा आखिरी जुताई के टाइम खेत में डालें. और अगर मिट्टी में सल्फर की कमी हो तो लगभग 60 किलो सल्फर प्रति एकड़ के हिसाब से खेत में डालें.

मिर्च को खेत में लगाने से पहले खेत की मिट्टी की जांच ज़रुर करा लें. क्योंकि अगर मिट्टी में मूलभूत तत्व नही होंगे तो फसल का उत्पादन कम हो जाता है. जिससे किसान भाइयों को नुक्सान भी उठाना पड़ सकता है.

नीलाई गुड़ाई
शिमला मिर्च की नीलाई गुड़ाई अतिआवश्यक हैं. क्योंकि खरपतवार के जन्म लेने के बाद उनमें पनपने वाले कीटों से इसकी फसल को ज्यादा नुक्सान पहुँचता है. इसके लिए खेत में खरपतवार ना रहने दें. इसके खेत में लगाये जाने के 10 या 15 दिन बाद उसकी नीलाई गुड़ाई कर देनी चाहिए. शिमला मिर्च की फसल 6 महीने तक हो सकती है इस कारण अच्छी फसल लेने के लिए शिमला मिर्च की 5 से 6 गुड़ाई करनी जरूरी होती है.

पौधे को लगने वाले रोग
शिमला मिर्च के पौधे पर किट, कवक और फफूंदी का सबसे ज्यादा प्रभाव रहता है. इसके रोकथाम के लिए पौधे की अच्छे से देखभाल करने की जरूरत होती है.

कीटों द्वारा रोग
कीटों के द्वारा पौधे को थ्रिप्स, सफ़ेद मक्खी और माहो जैसे रोग हो जाते हैं. ये सभी रोग पौधे की पत्तियों को सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाते है. जिससे पौधे का अच्छे से विकास नही हो पाता है. अगर ज्यादा टाइम तक इन कीटों से पौधे की देखभाल नही करते हैं तो पौधा जल्द ही खराब होकर नष्ट हो जाता है. इसकी रोकथाम के लिए डायमेथोएट, मिथाइल डेमेटान, मेलाथियान का छिडकाव पौधों पर करना चाहिए.

पाउडर मिलोडी
पाउडर मिलोडी रोग की वजह से पौधे की पत्तियों पर छिद्र बनने लग जाते हैं. कुछ दिनों बाद पूरी पत्तियां जलकर खत्म हो जाती है. पौधों पर इस रोग के लक्षण पत्तियों के नीचे दिखाई देता है. पत्तियों के नीचे कुछ पाउडर जैसा पदार्थ दिखाई देता है. इसके रोकथाम के लिए एक लीटर पानी में 2 ग्राम सल्फर मिलकर छिडकाव करने से पौधे को फायदा मिलता है.

आद्र गलन रोग
पौधे पर ये रोग शुरूआती अवस्था में देखने को मिलता है. पौधे में ये रोग ज्यादा पानी की वजह से भी लग जाता है. इसके लग जाने पर पौधा काला पड़ने लग जाता है और जल्द ही जलकर नष्ट हो जाता है. इसकी रोकथाम के लिए बीज को खेत में लगाने से पहले उसे थाइरम या कैप्टन से उपचारित कर लेना चाहिए. अगर पौधे को खेत में लगाने के बाद इसके लक्षण दिखाई दें तो पौधों पर कॉपर आक्सीक्लोराइड या बोडों मिश्रण का छिडकाव करना चाहिए.

उकठा रोग
यह रोग ज्यादातर सब्जियों और औषधीय पौधों में लगता है. उकठा रोग पौधों की जड़ों पर लगता है. इसके लगने से पौधों की जड़ें गलकर नष्ट हो जाती है. यह रोग अक्सर बारिश के मौसम में ज्यादा देखने को मिलता है. इसके लगने पर पौधा मुरझाने लगता है. और कुछ दिनों बाद सुखकर नष्ट हो जाता है. इसकी रोकथाम के लिए शुरुआत में गहरी जुताई कर खेत को खुला छोड़ दें. ताकि मिट्टी में सूर्य की तेज़ धुप किरणें अंदर तक जा सके. जिससे इसके जीवाणु नष्ट हो जाते है. इसके अलावा पौधे को खेत में लगाने से पहले खेत की मिट्टी को ब्लीचिंग पाउडर से उपचारित कर लें.

मोजेक रोग
मोजेक रोग विषाणु के द्वारा पौधों में फैलता है. इसके लगाने पर पौधे की पत्तियां विकृत रूप लेने लगती है. नई आ रही पत्तियां भी सिकुड़कर छोटी होने लगती है. धीरे धीरे ये सभी पत्तियां कठोर होकर गोल आकर लेने लगती हैं. जिसके बाद पीली पड़कर नष्ट हो जाती है. इसके बचाव के लिए पौधे को खेत में लगाने से पहले कार्बोफ्यूरान 3 जी से मिट्टी को उपचारित कर लें. पौधे को लगाने के बाद इसके लक्षण दिखाई दें तो इमिडाक्लोप्रिड या डाइमिथोएट 30 ई सी की उचित मात्रा को पानी में मिलकर पौधों पर छिडकाव करें.

फल सडन रोग
फल सडन रोग मिट्टी में उर्वरकता की कमी की वजह से होता है. इसके अलावा पौधों में ये रोग अधिक आद्रता होने की वजह से भी होता है. इसके होने पर पत्तियों पर हलके हलके छिद्र बनने लगते हैं. और फल पर काले धब्बे दिखाई देने लगते हैं. पौधों में ये रोग नीचे से ऊपर की तरफ फैलता है. इस रोग के लगने पर पौधों पर कैल्शियम, मैग्नीशियम और बोरान का छिडकाव करना चाहिए. इसके अलावा ब्लाइटॉक्स, डायफोल्टान का भी छिडकाव पौधों पर कर सकते हैं.

फसल की तुड़ाई
शिमला मिर्च के पौधे तुड़ाई के लिए 60 70 दिन का टाइम लेते हैं. जिसके बाद जब फल पूरी तरह से पक जाए तब इसकी तुड़ाई कर लेनी चाहिए. फल की तुड़ाई करने के बाद उसे किसी ठंडी जगह पर रख दें. शिमला मिर्च की तुड़ाई कई बार में होती है. इसलिए हर बार सिर्फ पके हुए फल ही तोड़ें.

पैदावार और लाभ
शिमला मिर्च की पैदावार पौधे की किस्म और देखभाल के अनुसार होती है. अलग अलग किस्मों के अनुसार इसकी उपज 150 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है. जिससे किसान भाई एक बार में 5 से 7 लाख तक कमाई कर पाते हैं.

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गाजर की उन्नत खेती कैसे करें ?

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गाजर की खेती भारत के ज्यादातर हिस्सों में की जाती है. गाजर का जड़ वाला भाग मनुष्य के खाने योग्य होता है. जबकि जमीन के बहार वाला भाग पशुओं के खाने के लिए उपयोग में लिया जाता है. गाजर की हरी पत्तियां मुर्गियों के खाने के रूप में भी इस्तेमाल की जाती हैं. इसके अलावा ग्रामीण परिवेश में इसकी कच्ची पत्तियों का उपयोग देशी सब्जियां बनाने में किया जाता है.

गाज़र का उपयोग भारत में ज्यादातर सब्जी के रूप में किया जाता है. सब्जी में गाजर का इस्तेमाल कच्चा (सलाद) और पकाकर दोनों तरीकों से किया जाता है. सब्जी के अलावा गाजर का उपयोग आचार, मुरब्बा, जूस और हलवा बनाने में किया जाता है. गाजर का हलवा लोगों द्वारा काफी ज्यादा पसंद किया जाने वाला व्यंजन बन चुका है.

गाजर का रंग अधिकांश लाल ही पाया जाता हैं. लेकिन आज लाल रंग के अलावा पीले और हलके काले रंग में भी पाई जाती हैं. गाजर के अंदर कई तरह की विटामिन पाई जाती हैं. जिनमें विटामिन ए, बी, सी, डी, ई, जी और के शामिल हैं. लेकिन विटामिन ए इसमें सबसे ज्यादा पाई जाती है. गाजर का उपयोग दवाइयों में भी किया जाता है. गाजर के अंदर बिटा-केरोटिन नामक तत्व पाया जाता है, जो कैंसर रोग के नियंत्रण के काम आता है. गाजर के इस्तेमाल से आँखों की रोशनी और पाचन संबंधित रोगों से भी छुटकारा मिलता है.

गाजर की खेती काफी कम समय में ही तैयार हो जाती हैं. जिससे किसान भाई अपने खेत से तीन फसल एक साल में ले सकते हैं. गाजर की की फसल को बेचने में भी ज्यादा परेशानी नही आती जिस कारण अब किसान भाई इसकी खेती बड़ी मात्रा में करने लगे हैं.

उपयुक्त मिटटी

गाजर की खेती के लिए दोमट मिट्टी को सबसे उपयुक्त माना जाता है. दोमट मिट्टी के अलावा और भी कई तरह की मिट्टी में इसे बोया जा सकता हैं. इसके लिए मिट्टी की पी. एच. का मान भी 6.5 के आसपास ही होना चाहिए. साथ ही मिट्टी का भुरभुरा होना जरुरी होता है. क्योंकि इससे गाजर लम्बी और मजबूत बनती है. मिट्टी को भुरभुरा करने के लिए हर जुताई के बाद उस पर पाटा लगाना चाहिए.

जलवायु और तापमान

गाजर की खेती के लिए ज्यादा तापमान की जरूरत नही होती. इसे ठण्ड के मौसम में ही बोया जाता है. जिसके लिए तापमान 25 डिग्री तक होना चाहिए. इस तापमान में गाजर का रंग और आकार काफी बढ़िया बनता है. जबकि इसकी बुवाई के टाइम तापमान 10 डिग्री तक सही माना जाता है. इस तापमान की जरूरत पौधे को उसकी जड़ बनने तक होती है. अगर शुरुआत में जड़ें लम्बी बनती है तो पैदावार के साथ साथ फसल के अच्छे दाम भी मिल जाते हैं. क्योंकि लम्बी जड़ें बनने के बाद गाजर का आकर काफी अच्छा बन जाता है.

गाजर की उत्तम किस्में

गाजर की कई तरह की किस्में पाई जाती हैं. लेकिन कुछ किस्में ऐसी हैं जिनको बोने से किसान भाइयों को अच्छी पैदावार मिल जाती है. अगर आप गाजर की खेती करना चाह रहे हैं तो आज हम आपको इन्ही उत्तम किस्मों के बारें में बताने वाले हैं.

पूसा केसर
इस किस्म को लाल रंग की गजरों के लिए सबसे उत्तम किस्म माना जाता हैं. इस किस्म की गाजर की पत्तियां छोटी और गहरे हरे रंग की होती हैं. जबकि इनकी जड़ें काफी लम्बी पाई जाती हैं. इसकी फसल को तैयार होने में 90 से 110 दिन का टाइम लगता है. एक हेक्टेयर में इसकी पैदावार 300 से 350 क्विंटल तक हो जाती है.

पूसा (मेघाली)
यह किस्म छोटी टॉप वाली संकर किस्म है, जिसमें कैरोटिन की मात्रा सबसे ज्यादा पाई जाती है. गाजर की इस किस्म के गूदे का रंग नारंगी होता है. इस किस्म की बुवाई अगेती (टाइम से पहले) फसल के रूप में की जाती है. जिस कारण इसकी बुवाई अगस्त और सितम्बर माह के शुरुआत तक कर देनी चाहिए. इस फसल को तैयार होने में 100 से 110 दिन का टाइम लग सकता है. एक हेक्टेयर में इसकी पैदावार 300 क्विंटल तक होती है.

पूसा यमदागिनी
इस किस्म की गजरों का रंग संतरे के जैसा होता है. इस किस्म को आई. ए. आर. आई. के केन्द्र कटराइन द्वारा विकसित किया गया था. इस किस्म की बुवाई भी सितम्बर माह तक कर देनी चाहिए. इस किस्म की पैदावार क्षमता 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है.

पूसा आसिता
इस किस्म की पैदावार ज्यादातर मैदानी क्षेत्रों में की जाती है. इस किस्म की गाजरों का रंग काला दिखाई देता हैं. इसकी बुवाई सितम्बर माह के लास्ट में करनी चाहिए. आज बाज़ारों में इसकी मांग काफी ज्यादा बढ़ गई है. एक हेक्टेयर में इसकी पैदावार 200 क्विंटल से भी ज्यादा हो जाती है.

नैन्टस
इस किस्म की गाजर का रंग भी नारंगी होता है. इस किस्म की गाजर का आकार बेलनाकार होती हैं. इनके अंदर का तना भी मुलायम और मीठा होता है. इस किस्म की बुवाई सितम्बर माह में कर देनी चाहिए. इसको पूरी तरह से तैयार होने के लिए 110 दिन से भी ज्यादा का समय लगता है. इस किस्म की पैदावार बाकी किस्मों से कम होती है. एक हेक्टेयर में इसकी पैदावार 100 से 125 क्विंटल तक ही हो पाती है.

इनके अलावा और भी कई किस्में हैं जिन्हें अलग अलग जगहों के हिसाब से उगाया जाता हैं. जिनमें पूसा नयन ज्योति, पूसा वृष्टि, चैन्टने, गाजर नं- 29, हिसार गेरिक, हिसार रसीली और हिसार मधुर जैसी कई किस्में शामिल हैं.

खेत की जुताई
गाजर की खेती के लिए खेत की जुताई काफी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं. गाजर की फसल के लिए शुरुआत में खेत की तीन से चार बार अच्छे से जुताई करें. हर जुताई के टाइम पाटा लगाये ताकि मिट्टी के ढेले फुट जाए. जिसके बाद उसमें गोबर की खाद डालकर उसकी अच्छे से जुताई करें. फिर उसमें पानी देकर खेत में नमी बनाए. जिसके बाद फिर से उसकी जुताई करें. खेत की जुताई तब तक करें जब तक जमीन भुरभुरी ना हो जाए.

गाजर की बुवाई का टाइम और तरीका
गाजर की बुवाई के लिए खेत को समतल कर दें. जिसके बाद समतल जमीन में बीज का छिडकाव कर उसे हलकी जोत के साथ मिट्टी में मिला दें. ध्यान रखे की बीज मिट्टी में एक से आधा इंच नीचे तक ही जा पायें. इसके बाद 30 से 40 सेंटीमीटर की दूरी वाले बड़े हल से उसमें मेंड बना दें. हल के द्वारा बनाई गई इन मेंड को क्यारियाँ का रूप दे दें जिसे फसल को पानी देने में आसानी होगी.

गाजर की फसल की बुवाई उसकी किस्मों के आधार पर की जाती हैं. एशियाई क़िस्मों की बुवाई अगस्त माह से अक्टूबर माह के शुरुआत तक कर देनी चाहिए. जबकि यूरोपियन क़िस्मों की बुवाई के लिए अक्टूबर और नवम्बर का महिना सबसे उपयुक्त रहता है. गाजर की बुवाई के लिए एक हेक्टेयर में 6 से 8 किलो बीज की जरूरत होती है.

सिचाई का तरीका
गाजर की फसल को पहला पानी बुवाई के तुरंत बाद दे देना चाहिए. जिसके बाद शुरुआती सप्ताह में दो बार पानी दे. जब बीज जमीन से बाहर निकल आये तब उसे सप्ताह में एक बार पानी दें. जब तक पौधे की जड़ें नही बन जाती तब तक उसे सप्ताह में एक बार ही पानी दें. लेकिन अगर ज्यादा गर्मी हो तो खेत में आवश्यकता के अनुसार पानी देते रहे. जिससे खेत में नमी लगातार बनी रहे.

जब पौधे की जड़ें एक महीने बाद लम्बी बढ़ने लगे तो पानी की मात्रा कम कर देनी चाहिए. जिसे जड़ें लम्बी बनती है. जब जड़ें पूरी लम्बाई तक बढ़ जाए तो पानी की मात्रा बढ़ा दें. इस दौरान पौधों को 3 दिन के अंतराल में पानी दें. इससे पौधे की जड़ें मोटी होने लगती हैं. और ज्यादा पानी देने पर गाजर में मिठास भी बढता है.

खरपतवार नियंत्रण
गाजर की फसल में खरपतवार नही होनी चाहिए. क्योंकि खरपतवार के होने पर फसल की वृद्धी पर प्रभाव पड़ता है. इस कारण खेत की जुताई के टाइम ही खेत को खरपतवार नियंत्रक दवाइयों से उपचारित कर लें. उसके बाद उसमें बुवाई करें. उसके बाद फसल के साथ उगने वाली खरपतवार को निकाल दें. इसमें खरपतवार के अलावा ज्यादा नीलाई गुड़ाई की आवश्यकता नही होती है. लेकिन पौधों की जड़ें दिखाई दे तो उन पर मिट्टी चढ़ा दें.

गाजर की खेती के लिए उर्वरक की मात्रा
किसी भी फसल के लिया उर्वरक की उचित मात्रा सबसे जरुरी होती है. उर्वरक के सही इस्तेमाल से पैदावर में भी फर्क पड़ता हैं. गाजर की खेती के लिए जुताई के टाइम एक हेकटेयर में 30 गाड़ी तक सड़ी हुई गोबर की खाद डालें. जिसके बाद जब खेत में पानी देकर (पलेव करने के बाद) बुवाई के लिए तैयार किये हुए खेत में, बुवाई से पहले लास्ट जुताई करते टाइम 30 किलोग्राम नाइट्रोजन और 30 किलोग्राम पौटाश प्रति हेक्टेअर के हिसाब से डालें. बुवाई करने के लगभग 6 सप्ताह बाद फिर से खेत में 30 किलोग्राम नाइट्रोजन टॉप ड्रेसिंग के रूप में दे. इससे पैदावार में इजाफा होता है.

गाजर के पौधे को लगने वाले रोग
गाजर में वैसे तो काफी कम ही रोग देखने को मिलते हैं. लेकिन कुछ रोग हैं जो इसके पौधे में लग जाते हैं. जिनके रोकथाम के लिए उचित टाइम पर उन्हें दवाइयाँ देकर हटा दें.

आद्र विगलन
गाजर के पौधे में ये रोग फसल की बुवाई के शुरुआत में ही लग जाता है. फसल को ये रोग पिथियम अफनिड़रमैटम की वजह से होता है. इसके लगने पर कभी कभी तो पौधा अंकुरित ही नही हो पाता है. और अगर अंकुरित पौधे पर ये रोग लगता है तो पौधा उसी अवस्था में सड़कर गल जाता है. इसकी रोकथाम के लिए बीज को गोमूत्र से उपचारित कर लेना चाहिए.

सक्लेरोटीनिया विगलन
इस रोग की शुरुआत में पौधे की पत्तियां पीली दिखाई देने लगती हैं और जल्द झड़ने लग जाती हैं. फल पर इस रोग का लक्ष्ण सूखे दाग के रूप में दिखाई देने लगता है. जिससे पौधा जल्द ही खराब हो जाता है. इसकी रोकथाम के लिए फसल उगने से पहले ही खेत को थायरम 30 की एक किलो मात्रा को एक हेक्टेयर में छिडकें या फिर कार्ब्रेन्डाजिम 50 की एक किलो मात्रा को एक हज़ार लिटर पानी में मिलाकर छिडकाव करें.

कैरट वीविल
यह एक किट के द्वारा लगने वाला रोग है. इस रोग के लगने के लक्ष्ण पौधे के फलों पर दिखाई देता हैं. जमीन से बहार दिखाई देने वाले गाजर के उपरी हिस्सों पर ये किट आक्रमण करते हैं. जिससे गज़र के उपरी हिस्से पर सुरंग की तरह छिद्र दिखाई देते हैं. इसकी रोकथाम के लिए इनिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. की 1 मि.लि.मात्रा को 3 लिटर पानी में मिलकर पौधे पर छिडकाव करें.

रस्ट फ्लाई
ये भी कीटों के द्वारा लगने वाला एक रोग हैं जो पौधे की जड़ों पर शुरुआत में ही लगता हैं. इस रोग में किट पौधे के शुरुआत में ही उसकी जड़ों में सुरंग बना देते हैं जिससे पौधा जल्द ही नष्ट हो जाता है. इसकी रोकथाम के लिए क्लोरपयरीफॉस 20 ई.सी. की 2.5 लिटर मात्रा का एक हेकटेयर के हिसाब से छिडकाव करें.

गाज़र की खुदाई
गाजर की खेती तीन से चार महीनों की होती है. जिस कारण किसान भाई अपनी भूमि में एक साल में तीन फसलों का लाभ भी ले पाते हैं. जिसे उनकी आर्थिक स्थति अच्छी होती है. गाजर की फसल की खुदाई उस टाइम करें जब फसल पूरी तरह तैयार हो जाये.

गाजर की खुदाई करने से पहले खेत में पानी देकर नमी बना दें. जिससे गाजर को आसानी से जमीन से निकाला जा सके. गाजरों को निकालने के बाद उसे पानी से अच्छे से साफ़ कर उसे तुरंत मार्केट में बेच देना चाहिए. क्योंकि इसका ज्यादा दिनों तक भंडारण करना काफी मुश्किल होता है.

पैदावार और लाभ
गाजर की पैदावार उसकी किस्म पर निर्भर करती हैं. कई किस्में ऐसी हैं जिनसे किसान भाइयों को एक हेक्टेयर से 300 से 350 क्विंटल तक पैदावर मिल जाती है. जबकि कुछ किस्में ऐसी होती हैं जिसने 100 क्विंटल के आसपास ही पैदावार मिल पाती हैं.

जल्द तैयार की हुई फ़सलों से किसान भाइयों की अच्छी खासी कमाई हो जाती हैं. क्योकि शुरुआत में इनका भाव काफी ज्यादा होता है. जिससे किसान भाइयों का मुनाफा काफी ज्यादा हो जाता है. लेकिन कभी कभी मंडी में कम दाम मिल पाने की वजह से भी किसानों को नुक्सान उठाना पड़ जाता है. अच्छी पैदावार और अच्छा दाम मिलने पर किसान भाई एक हेक्टेयर से 3 लाख तक कमाई कर सकते हैं.

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टिंडा की उन्नत खेती कैसे करें ?

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टिंडे को भी कहा जाता है| यह उत्तरी भारत की सबसे महत्तवपूर्ण गर्मियों की सब्जी है। टिंडे का मूल स्थान भारत है। यह कुकरबिटेसी प्रजाति से संबंधित है। इसके कच्चे फल सब्जी बनाने के लिए प्रयोग किए जाते हैं। 100 ग्राम अन-पके फलों में 1.4% प्रोटीन, वसा 0.4%, कार्बोहाइड्रेट 3.4%, कैरोटीन 13 मि.ग्रा. और 18 मि.ग्रा. विटामिन होते हैं। इसके फल की औषधीय विशेषताएं भी हैं, सूखी खांसी और रक्त संचार सुधारने के लिए इसका उपयोग किया जाता है। 

यह उत्तर भारत में ख़रीफ़ व गरमी के मौसम में उगायी जाती है । जी हाँ आज हम बात कर रहे हैं स्वाद और गुणों से भरपूर के बारे में । सिट्रुलस वुलगेरियस वनस्पतिक नाम से टिंडा वांस्पतिक दुनिया में जाना जाता है । इसके गुणसूत्रों की संख्या 22 जोड़ा पायी जाती है। कुकरबिटेसी  कुल परिवार की यह सब्ज़ी बड़ी गुणकारी होती है। उत्तर प्रदेश सहित हरियाणा,पंजाब,राजस्थान महाराष्ट्र में उगाया जाता है । अभी हाल ही में अपनी बढ़ती लोकप्रियता के चलते यह दक्षिण भारत में भी उगाया जाने लगा है।

अगर हम के पोषक मूल्यों की बात करें इसमें रेशा,प्रोटीन,कार्बोहाइड्रेट, लोहा, आदि के साथ-साथ सूक्ष्म खनिज पदार्थ जैसे मैग्नीशियम,फ़ोस्फोरस, पोटेशियम, आदि पाए जाते हैं । विटामिन a, विटामिन c से भरपूर टिंडा सूखी खाँसी व रक्त संचार के रोगों से पीड़ित रोगियों के लिए रामबाण औषधि है।

उन्नत प्रजातियां–

किसान भाइयों किसी भी फ़सल की अधिकतम पैदावार के लिए भूमि,उचित ताप,बुवाई का समय,पानी व उचित देखभाल के साथ-साथ उन्नत प्रजातियों का बहुत महत्व होता है।

टिंडा 48: इसकी बेल 75 से 100 सैं.मी. लम्बी होती है। इसके पत्ते हल्के हरे रंग और फल सामान्य आकार के होते है। इसके फल गोल चमकीले हल्के हरे रंग के होते है। इसकी औसतन पैदावार 25 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

टिंडा लुधियाना : इसके फल हल्के हरे रंग, सामान्य और समतल गोल आकार में होते है। हरेक बेल पर 8-10 फल लगते है। इसका गुद्दा नर्म और सफेद रंग का होता है। कम बीजों वाले फलों को पकाने की गुणवत्ता बढ़िया होती है। बिजाई के बाद यह 60 दिनों में कटाई के लिए तैयार होती है| इसकी औसतन पैदावार 18-24 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

पैटी पान: यह किस्म 75-80 दिनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। इसके फल सफेद रंग के होते हैं। इसकी औसतन पैदावार 22 टन प्रति एकड़ होती है।

प्रारंभिक पीला प्रोलिफिलिक: यह अगेती किस्म है। इसके फल मध्यम आकार के होते हैं और पकने पर इस किस्म का रंग पीले रंग में बदल जाता है।

ऑस्ट्रेलियाई ग्रीन: यह अगेती और झाड़ीदार किस्म है। इसके फल हरे सफेद रंग के होते हैं। यह किस्म पिछेती बिजाई के लिए उपयुक्त है। इसकी औसतन पैदावार 60 क्विंटल प्रति एकड़ होती है।

पूसा अलंकार: यह बहुत जल्दी और अधिक उपज देने वाली किस्म है। इसके फल गहरे हरे रंग के होते हैं। इसका गुद्दा नर्म और अच्छे स्वाद वाला होता है।

अर्का टिंडा,टिंडा एस0 48, बीकनेरी ग्रीन, हिसार सेलेक्शन -1, सेलेक्शन – 22,

जलवायु –
टिंडा की खेती के लिए गर्म व शुष्क जलवायु अच्छी मानी जाती है किंतु गर्म व मृदु जलवायु में भी इसकी खेती आसानी से की जा सकती है। इससे निम्न जलवायु पर इसके बीजों का अंकुरण नही होता है। अंकुरण के लिए 27 से 30 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान उपयुक्त होता है।

ज़मीन की तैयारी-

मिट्टी के भुरभुरा होने तक ज़मीन की जोताई करें। गाय का गला हुआ गोबर 8-10 टन प्रतिकिलो खेत की तैयारी के समय प्रति एकड़ में डालें। खेती के लिए बैड तैयार करें। बीजों को गड्ढों या खालियों में बोया जा सकता है। 

बुवाई का समय –
टिंडा की खेती  से अधितम लाभ लेने के लिए समय से बुवाई करना बहुत आवश्यक है। देश के उत्तरी मैदानी भागों में टिंडे की खेती साल में दो बार की जाती है। टिंडे की पहली बुवाई फ़रवरी से अप्रैल माह में करें तथा दूसरी खेती के लिए जून – जुलाई में बुवाई करें।

बीज की मात्रा –

टिंडा की खेती के लिए उच्च गुणवत्ता वाला, सुडौल, स्वस्थ अच्छी प्रजाति के 4-5 किलो ग्राम बीज की मात्रा पर्याप्त होती है।

बुवाई की विधि –
टिंडे की बुवाई थालों में की जानी चाहिए। लाइन से लाइन की दूरी 2 से 2.5 मीटर व थालों से थालों की आपस की दूरी 1 से 1.5 मीटर रखते हैं। हर थाले में 4-5 बीज की बुवाई करनी चाहिए। बीजों के अंकुरण के बाद,  केवल दो स्वस्थ पौधों को छोड़कर बाक़ी के पौधे उखाड़ देने चाहिए। पर्याप्त सघनता होने पर पौधों की बढ़वार अच्छी होती है।

खाद व उर्वरक –
टिंडा की खेती से अधिक पैदावार लेने के लिए रासायनिक उर्वरकों के साथ – साथ कार्बनिक व जैविक रसायनों के उपयोग की आवश्यकता होती है। कार्बनिक उर्वरक के रूप में गोबर की खाद 20-25 टन प्रति हेक्टेयर व 100 किलो ग्राम नाइट्रोजन, 100 किलो ग्राम फ़ोस्फोरस व 50 किलो ग्राम पोटाश की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

खाद व उर्वकों के प्रयोग की विधि –
सबसे पहले गोबर की खाद की पूरी मात्रा को भूमि की तैयारी से पूर्व खेत में मिला दें। इसके बाद नाइट्रोजन की आधी व फ़ोस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा भूमि में डालकर जुताई कर दें। बची हुई नाइट्रोजन की आधी मात्रा को खड़ी फ़सल में टॉप ड्रेसिंग करें।

सिंचाई-
इसे लगातार सिंचाई की जरूरत होती है क्योंकि यह कम समय की फसल है। बीजों को सिंचाई से पहले खालियों में बोया जाये, तो पहली सिंचाई बिजाई के बाद दूसरे या तीसरे दिन करें। गर्मियों के मौसम में, 4-5 दिन के फासले पर जलवायु, मिट्टी की किस्म, के अनुसार सिंचाई करें। बारिश के मौसम में बारिश की आवृति के आधार पर सिंचाई करें। टिंडे की फसल को ड्रिप सिंचाई देने पर अच्छा परिणाम मिलता  है और 28% पैदावार बढ़ाता है।

खरपतवार नियंत्रण-
काले पॉलीथीन मल्च का प्रयोग करने से नदीनों की रोकथाम होगी और मिट्टी में भी नमी बनी रहेगी। खेत को नदीनों से मुक्त करने के लिए, हाथों से गोडाई करें और नदीनों की जांच करते रहें। बिजाई के बाद 15-20 दिनों के बाद हाथों से गोडाई करें। नदीनों की तीव्रता के आधार पर बाकी की गोडाई करें।

पौधे की देखभाल-
हानिकारक कीट और रोकथाम
चेपा और थ्रिप्स: यह पत्तों का रस चूसते हैं, जिससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं और मुरझा जाते हैं। तेले के कारण पत्ते मुड़ जाते हैं, जिससे पत्तों का आकार मुड़ कर कप की तरह हो जाता है|  अगर खेत में इसका हमला दिखाई दें तो, थाइमैथोक्सम 5 ग्राम को 15 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

बीमारियां और रोकथाम-
पत्तों पर सफेद धब्बे: 
इस रोग से पत्तों के ऊपरी सतह पर सफेद रंग के पाउडर के धब्बे पड़ जाते हैं, इससे पौधे का तना भी प्रभावित होता है। ये पत्तों को खाद्य स्त्रोत के रूप में प्रयोग करते हैं। इसके हमले के कारण पत्ते और फल पकने से पहले ही गिर जाते है| इसका हमला दिखाई दें तो, पानी में घुलनशील सलफर 20 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर 10 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार स्प्रे करें।

एंथ्राक्नोस: -
एंथ्राक्नोस से प्रभावित पत्ते झुलसे हुए दिखाई देते हैं। इसकी रोकथाम के लिए, कार्बेनडाज़िम 2 ग्राम से प्रति किलो बीजों का उपचार करें। अगर इसका हमला खेत में दिखाई दें तो, मैनकोजेब 2 ग्राम या कार्बेनडाज़िम 0.5 ग्राम को प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।

तोड़ाई का समय –
टिंड़े के फल बनने के  एक सप्ताह के अंदर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते है। पौधे छोटे व कोमल हों तुड़ाई कर लेनी चाहिए। अन्यथा कड़े फल हो जाने पर फल सब्ज़ी बनाने लायक नही रहते हैं। बाज़ार में उसका उचित मूल्य नही मिलता। इसलिए पहली तुड़ाई के 4 -5 दिन के अंतराल पर तुड़ाई करते रहना चाहिए।

उपज व पैदावार –
टिंडा की खेती से प्राप्त पर कई बातें निर्भर करती हैं । जैसे बीजों की गुणवत्ता, बुवाई का समय, भूमि की क़िस्म, जलवायु व ताप आदि । आमतौर पर उन्नतशील टिंडे की खेती से 80-120 कुन्तल प्रति हेक्टेयर की पैदावार मिल जाती है।

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शलजम की उन्नत खेती कैसे करें ?

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शलजम "बरासीकेसी" परिवार से संबंध रखती है। यह ठंडे मौसम की फसल है। शलजम की खेती इसकी जड़ों और हरे पत्तों के लिए की जाती है। इसकी जड़ें विटामिन सी का उच्च स्त्रोत होती हैं जबकि इसके पत्ते विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन के, फोलिएट और कैलशियम का उच्च स्त्रोत होते हैं। इसे भारत के समशीतोष्ण, उष्ण कटिबंधीय और उप उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। आमतौर पर शलजम सफेद रंग की होती है। बिहार, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और तामिलनाडू आदि भारत के मुख्य शलजम उत्पादक राज्य हैं।

शलजम की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु 

शलजम की फसल को लगभग सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है । लेकिन सफल-उत्पादन प्राप्त करने के लिए हल्की चिकनी दोमट या बलुई दोमट भूमि अति उत्तम सिद्ध हुई है । भूमि में जल-निकास ठीक होना चाहिए व भूमि उपजाऊ होनी चाहिए । शलजम शरद-ऋतु की फसल है । इसलिये ठण्डी जलवायु की आवश्यकता पड़ती है । यह अधिक ठन्ड व पाले को सहन कर लेती है । अच्छी वृद्धि के लिये ठन्ड व आर्द्रता वाली जलवायु सर्वोत्तम रहती है । पहाड़ी क्षेत्र में पैदावार अधिक मिलती है ।

शलजम की खेती के लिए खेत की तैयारी 

खेत जुताई में मूली की फसल की तरह करनी चाहिए तथा अन्य क्रियाएं, जैसे घास व ठूंठ आदि को बाहर निकाल कर जला दें तथा भूमि को बिल्कुल भुरभुरा करें तथा छोटी-छोटी क्यारियां बना ले

शलजम की उन्नतशील किस्में 

लाल-4 व सफेद-4- ये किस्म शीघ्र तैयार होने वाली है । लाल किस्म को अधिकतर शरद ऋतु में लगाते हैं । जड़ें गोल, लाल तथा मध्यम आकार की होती हैं जो 60 दिन में तैयार हो जाती है ।

सफेद-4 को अधिकतर वर्षा ऋतु में लगाते हैं । यह शीघ्र तैयार होती है तथा इसकी जड़ों का रंग बर्फ जैसा सफेद होता है । गूदा चरपराहट वाला होता है । ये  50-55 दिन में तैयार हो जाती है । उपज 200 कु. प्रति हैक्टर मिलती है ।

परपल-टोप - जड़ें बड़े आकार की, ऊपरी भाग बैंगनी, गूदा सफेद तथा कुरकुरा होता है । यह अधिक उपज देती है । इसका गूदा ठोस तथा ऊपर का भाग चिकना होता है ।

पूसा-स्वर्णिमा - इस किस्म की जड़ें गोल, मध्य आकार वाली, चिकनी तथा हल्के पीले रंग की होती हैं । गूदा भी पीलापन लिये होता है । यह 65-70 दिन में तैयार हो जाती है । सब्जी के लिये उत्तम है ।

पूसा-चन्द्रिमा - यह किस्म 55-60 दिन में तैयार हो जाती है । इसकी जड़ें गोलाई लिये हुए होती है । यह अधिक उपज देती हैं । उपज 200-250 कु. प्रति हैक्टर देती है । जाड़ों के लिए उत्तम है ।

पूसा-कंचन - यह किस्म रेड एसीयाटिक किस्म तथा गोल्डन-वाल के द्वारा तैयार की गयी है । छिलका ऊपर से लाल, पीले रंग का गूदा होता है । यह अगेती किस्म है जो शीघ्र तैयार होती है । जड़ें मीठी व सुगन्धित होती हैं ।

पूसा-स्वेती - यह किस्म भी अगेती है । बुवाई अगस्त-सितम्बर में की जाती है । जड़ें काफी समय तक खेत में छोड़ सकते हैं । जड़ें चमकदार व सफेद होती हैं । 40-45 दिन में खाने लायक होती है ।

स्नोवाल - अगेती किस्मों में से है । इसकी जड़ें मध्यम आकार की, चिकनी, सफेद एवं गोलाकार होती हैं । गूदा नरम, मीठा होता है ।

बीज की मात्रा एवं बुवाई का समय 
शलजम का बीज समय व किस्म 4 किलो बीज प्रति हैक्टर बोना चाहिए जिसमें अंकुरण की 90-95% क्षमता है ।

बुवाई का समय जुलाई-नवम्बर तक होता है । अगेती, मध्य तथा पिछेती किस्मों को आवश्यकतानुसार बोना चाहिए । बुवाई कतारों में 30 सेमी. की दूरी पर करें तथा पौधा 10-15 सेमी. पर रखें | बुवाई छिडक कर भी कर सकते हैं ।

बगीचों के लिए बीज की मात्रा 8-10 ग्राम 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र के लिये पर्याप्त होता है जिसे उपरोक्त समय के अनुसार बोयें तथा गर्भ में 4-5 बीज बोयें ।

खाद एंव उर्वरकों का प्रयोग 
शलजम की फसल के लिए 20-25 ट्रैक्टर- ट्रौली सड़ी गोबर की खाद मिटटी में मिलायें तथा उर्वरक- 80 किलो नाइट्रोजन, 50 किलो फास्फोरस तथा 50 किलो पोटाश प्रति हैक्टर प्रयोग करना चाहिए | 325 किलो यूरिया में से 160 किलो यूरिया व 310 किलो सिंगल सुपर फास्फेट तथा 82 किलो म्यूरेट आफ पोटाश प्रति हैक्टर बुवाई से 15 दिन पहलें मिट्टी में भली-भांति मिलायें तथा शेष मात्रा को दो भागों में करके बुवाई से 15-20 दिन बाद पानी लगाने के 4-5 दिन बाद तथा दूसरी मात्रा को बोने से 35-40 दिन के बाद खड़ी फसल में छिड़क दें | इस प्रकार से फसल की वृद्धि अधिक होती है ।

शलजम के पौधों की सिंचाई 
बोते समय खेत में नमी अवश्य होनी चाहिए । यदि खेत सूखा हो तो हल्की पलेवा कर के बोयें । बोने से 15-18 दिन बाद प्रथम पानी दें । पलेवा ना करें तो 10-12 दिन के बाद हल्का पानी दें । अन्य सिंचाई नमी के अनुसार 1 2-15 दिन के बाद करते रहें । पहली सिंचाई के बाद थीनिंग का भी ध्यान रखें जिससे वृद्धि ठीक हो सके ।

खरपतवार नियन्त्रण 
शलजम की फसल में जाड़े वाले खरपतवार हो जाते हैं । इनके लिए निकाई-गुड़ाई करना जरूरी है । जड़ों के बढ़ने से पहले हल्की-हल्की मिट्‌टी चढ़ाये जिससे जड़ों का ठीक विकास हो सके तथा यूरिया की दूसरी मात्रा मिट्‌टी चढ़ने के बाद डालें ।

फसल-सुरक्षा - शलजम की फसल पर अधिक कीट व रोग नहीं लगते । लेकिन पिछेती फसल में कीट व रोग लग जाते हैं ।

कीट - जैसे- एफिडस व पत्ती काटने वाला कीड़ा । इन दोनों के लिए मेटासिस्टमस या मेलाथियान 2 मिली. दवा एक लीटर पानी में घोलकर छिड़कने से आक्रमण नहीं होता । दवा के 10-12 दिन बाद पत्ती व जड़ों को धोकर प्रयोग करें ।

रोगों से शलजम के पौधों की सुरक्षा कैसे करें 
अधिकतर पाउडरी-मिल्डयू लगता है । यह भी पत्तियों को प्रभावित करता है । पत्तियां सफेद-सी हो जाती हैं । नियन्त्रण के लिए फंजीसाइड बेवस्टिन या डाईथेन एम-45 के 0.2% के घोल का प्रयोग करें । जड़ों को धोकर खाने में प्रयोग करें ।

खुदाई 
खुदाई या कटाई आवश्यकतानुसार समय-समय पर करते हैं । खुदाई करने की अलग-अलग अवस्थाएं हैं । 20-25 दिन की फसल की पत्तियों के लिए उखाड़ लेते हैं तथा जड़ों के लिये आकार बढ़ने पर खोदते हैं । जड़ों को समय से ही खोद लें जिससे स्वाद ना बदलें । खुदाई खुरपी या फावड़े से करें तथा जड़ें कट न पायें । जड़ों को धोकर तथा साफ करके बाजार ले जाना चाहिए ।

उपज 
शलजम की पत्तियों के अतिरिक्त जड़ें-कृषि-क्रियाएं समय से करने पर 500-600 क्विंटल प्रति हैक्टर आसानी से पैदा की जा सकती हैं । बगीचों में 15-20 किलो 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र में जड़ें पैदा की जाती हैं तथा समय-समय पर खोद कर सब्जी में प्रयोग की जाती

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