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आलसी गधा- ईसप की कहानी

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पुराने समय की बात है। एक नगर में नमक का एक व्यापारी रहा करता था। व्यापारी ने अपने व्यापार से जुड़े काम के लिए एक गधा पाल रखा था। वह रोज सुबह अपने गधे पर नमक की बोरियां व अन्य सामान लादकर पास के कस्बे में बेचने जाया करता था।
उसके घर और कस्बे के बीच एक छोटी सी नदी पड़ती थी। दोनों रोज उस नदी को हेल कर कस्बे में जाया करते थे।

एक दिन नदी पार करते समय गधा अचानक फिसलकर पानी में गिर पड़ा। इससे गधे की पीठ पर लदा हुआ ढेर सारा नमक पानी में घुल कर बह गया। व्यापारी ने गधे को जैसे-तैसे बाहर निकाला। पानी में गिरने के वजह से गधे को तो कुछ नहीं हुआ पर ढेर सारे नमक के पानी में बह जाने की वजह से उसका बोझ जरूर हल्का हो गया था। बोझ हलका होते ही गधा बहुत खुश हुआ।
अब तो गधे ने सोचा कि रोज ऐसे ही किया करूंगा।

दूसरे दिन व्यापारी फिर गधे पर नमक की बोरियां लादकर बेचने निकला। उस दिन फिर नदी पार करते समय गधा जानबूझकर पानी में गिर पड़ा। ऐसा करने से गधे को तो आराम मिल रहा था पर व्यापारी को रोज रोज नुकसान उठाना पड़ रहा था।

तीसरे दिन फिर गधे ने फिर वैसा ही किया। पर इस बार व्यापारी ने साफ-साफ देखा था कि गधा जान-बूझकर पानी में गिरा था। उसे गधे पर बहुत गुस्सा आया। इधर गधा अपनी चालाकी पर बहुत खुश था।

व्यापारी ने सोचा की ऐसा रोज रोज तो नहीं चलेगा। उसने एक तरकीब लगाई। अगले दिन उसने गधे की पीठ पर नमक की जगह रूई के गट्ठर लाद दिए। यह देख गधा बहुत खुश हुआ। उसने सोचा कि आज तो पहले ही कम बोझ है। जब मैं पानी में गिरने का नाटक करूंगा तो बोझ कुछ और हल्का हो जाएगा। यही सोचकर वह खुशी-खुशी चल दिया।

नदी आते ही वह पानी में गिर गया। और पहले की तरह व्यापारी ने उसे जल्दी से बाहर नहीं निकाला। फलस्वरूप रूई के गट्टों ने खूब पानी सोखा और बोझ पहले से कई गुना बढ़ गया। पानी से बाहर आने में गधे को बहुत परिश्रम करना पड़ा। अब उससे चला भी न जा रहा था। व्यापारी तो पहले ही जला बैठा था क्योंकि उसने उसका काफी नमक पानी में बहा दिया था। जब गधे से न चला गया तो उसने डंडे से उसकी खूब पिटाई की।
गधे को अपनी करनी का फल मिल गया था। उस दिन के बाद से उसने पानी में गिरने की गलती फिर कभी नहीं की।

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अंगूर खट्टे हैं- ईसप की कहानी

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एक लोमड़ी थी, जो अंगूर खाने की बहुत शौकीन थी। एक बार वह अंगूरों के बाग से गुजर रही थी। चारों ओर स्वादिष्ट अंगूरों के गुच्छे लटक रहे थे। मगर वे सभी लोमड़ी की पहुंच से बाहर थे। अंगूरों को देखकर लोमड़ी के मुंह में बार-बार पानी भर आता था।
वह सोचने लगी-‘वाह ! कितने सुंदर और मीठे अंगूर हैं। काश मैं इन्हें खा सकती।’ यह सोचकर लोमड़ी उछल-उछल कर अंगूरों के गुच्छों तक पहुंचने की कोशिश करने लगी। परंतु वह हर बार नाकाम रह जाती। बस, अंगूर के गुच्छे उसकी उछाल से कुछ ही दूर रह जाते थे।
अंत में बेचारी लोमड़ी उछल-उछल कर थक गई और अपने घर की ओर चल दी। जाते-जाते उसने सोचा—‘ये अंगूर खट्टे हैं। इन्हें पाने के लिए अपना समय नष्ट करना ठीक नहीं !’

निष्कर्ष: जब कोई मूर्ख किसी वस्तु को प्राप्त नहीं कर पाता तो वह उसे तुच्छ दृष्टि से देखने लगता है।


(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)

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उत्तरी हवा और सूरज - ईसप की कहानी

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एक समय की बात है, सूर्य और उत्तरी हवा में यह बहस छिड़ गई कि उन दोनों में कौन अधिक शक्तिशाली है। उत्तरी हवा ने सूर्य से कहा, "मैं तुमसे अधिक शक्तिशाली हूं।"
"नहीं तुम मुझसे अधिक शक्तिशाली नहीं हो।" सूर्य ने कहा।
इस प्रकार वे दोनों एक दूसरे से लगभग छः हफतों तक बहस करते रहे। मगर मामला था कि उलझता ही जा रहा था।
अंत में उत्तरी हवा ने कहा- "चलो, देखते हैं कि हम दोनों में कौन सबसे अधिक शक्तिशाली है।"
"ठीक है, मैं भी राजी हूं।" सूर्य ने कहा।
तभी अचानक उन्होनें देखा कि सामने से एक यात्री आ रहा था। उसे देखकर हवा को अपनी शक्ति का प्रर्दशन करने की एक युक्ति सूझ गई।

उसने सूर्य से कहा- "देखो, वह यात्री आ रहा है, हम दोनों में से जो भी उसे अपना कोट उतारने पर विवश कर देगा, वहीं शक्तिशाली समझा जाएगा। सबसे पहले मैं प्रयत्न करूंगी। तक तक तुम बादलों की ओट में छिप जाओ।"
सूर्य के बादलों में छिपते ही हवा बहुत जोर से चलने लगी।
मगर हवा में जितनी अधिक तेजी आती, यात्री उतनी ही मजबूती से अपना कोट अपने शरीर के इर्द-गिर्द लपेट लेता, ताकि वह ठंड से बचा रहे।
हवा बहुत देर तक बहुत तेजी से चलती रही और अंत में थक कर शांत हो गई। वह उस यात्री का कोट उतारने में किसी भी प्रकार सफल न हो सकी।
उसे हार-थककर शांत होते सूर्य ने कहा- "अब मेरी बारी है।"

तब हवा एकदम बंद हो गई और सूर्य बादलों से बाहर निकलकर तेजी से चमकने लगा।
‘ओह! कितनी गरमी हो गई है।’ यात्री ने कहा- ‘कोट उतारना ही पड़ेगा।’

यात्री ने इस प्रकार गरमी से परेशान होकर कोट उतरा फेंका। यह देख कर हवा ने खामोशी से अपनी पराजय स्वीकार कर ली और सूर्य को नमस्कार करके आगे बढ़ गई।

शिक्षा – अपनी ताकत और योग्यता पर कभी घमंड न करो।


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खरगोश और कछुआ- ईसप की कहानी

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दो मित्र थे—खरगोश और कछुआ। खरगोश अपनी तेज तथा कछुआ अपनी धीमी चाल के लिए प्रसिद्ध था।
एक बार दोनों आपस में बातें कर रहे थे।
खरगोश कछुए की धीमी गति का मजाक उड़ाने लगा। कछुआ खरगोश की बातें सुनकर चिढ़ गया, मगर फिर भी बोला—‘‘मैं धीमी गति से चलता हूं तो क्या हुआ, यदि हमारी आपसी दौड़ हो जाए तो मैं तुम्हें पराजित कर दूंगा।’’
कछुए की बातें सुनकर खरगोश आश्चर्य करने लगा, बोला—‘‘मजाक मत करो।’’
‘‘मजाक नहीं, मैं गंभीर हूं।’’ कछुआ बोला—‘‘मैं निश्चित रूप से तुम्हें पराजित कर दूंगा।’’
‘‘अच्छा ! खरगोश कछुए की बातें सुनकर हंसता हुआ बोला—‘‘तो फिर दौड़ हो जाए। हम एक रेफरी रख लेंगे और दौड़ का मैदान निश्चित कर लेंगे।’’
कछुआ खरगोश की बात पर राजी हो गया।
दूसरे दिन चूहे को रेफरी नियुक्त किया गया। नदी के किनारे पड़ने वाले एक मैदान को दौड़ के लिए चुना गया।
वहां से एक मील दूर स्थित बरगद के पेड़ को वह स्थान माना गया जहां दौड़ समाप्त होगी।
दौड़ आरम्भ होने से पहले रेफरी चूहा आया। उसने दोनों को नियत स्थान पर खड़ा किया—‘‘हाँ ! सावधान हो जाओ...और दौड़ो।’’ चूहा बोला।
दौड़ आरम्भ हो गई।
खरगोश तो पलक झपकते ही बिजली की गति से दौड़ा और बहुत दूर निकल गया। कछुए की चाल देखते ही बनती थी। वह बहुत धीमी गति से चल रहा था। खरगोश तेजी से दौड़ रहा था।
लगभग आधा मील पहुंचकर वह रुका और पीछे मुड़कर देखा कि आखिर कछुआ गया कहां। उसे कछुआ कहीं नजर नहीं आया।

वह सोचने लगा—‘अभी तो उसका दूर-दूर तक पता नहीं है। क्यों न तब तक मैं थोड़ी-सी घास खा लूं और आराम कर लूं। जब कछुआ नजर आएगा तो मैं उठकर दोबारा तेजी से दौड़ लूंगा।’ खरगोश ने तब थोड़ी हरी घास खाई। पानी पिया और एक पेड़ के नीचे लेटकर आराम करने लगा।
खरगोश लेटकर सोना तो नहीं चाहता था, परंतु नदी किनारे से आती ठंडी हवा ने उसे गहरी नींद सुला दिया। खरगोश खर्राटे लेकर सोता रहा।
दूसरी ओर कछुआ धीमी गति से मगर लगातार बिना रुके अपनी मंजिल की ओर बढ़ता जा रहा था।

खरगोश बहुत देर तक सोता रहा। जब वहा जागा तो उसे कछुआ कहीं नजर नहीं आया। चूंकि वह खूब सो चुका था, इसलिए उठते ही बहुत फुर्ती और तेजी से बरगद के पेड़ की ओर दौड़ने लगा। मगर पेड़ के पास पहुँचते ही मानो उस पर बिजली-सी गिरी। वह यह देखकर दंग रहा गया कि कछुआ तो वहां पहले से ही उपस्थित था। खरगोश दौड़ में हार चुका था। उसने भी अपनी पराजय स्वीकार कर ली।
उसने दोबारा कभी कछुए का मजाक उड़ाने का प्रयत्न नहीं किया।

निष्कर्ष : सफलता की राह में आलस सबसे बड़ी बाधा है।

(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)

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छिपा हुआ धन- ईसप की कहानी

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एक किसान ने जीवन भर घोर परिश्रम किया तथा अपार धन कमाया।
उसके चार पुत्र थे, चारों ही निकम्मे और कामचोर। किसान चाहता था कि उसके पुत्र भी उसके परिश्रमी जीवन का अनुसरण करें। मगर किसान के समझाने का उन पर कोई असर नहीं होता था। इस कारण वह किसान बेहद दुखी रहता था। जब वह बहुत बूढ़ा हो गया और उसे लगने लगा कि अब वह कुछ दिनों का मेहमान है, तो एक दिन उसने अपने चारों बेटों को बुलाया और कहा—

‘‘सुनो मेरे बेटो ! मेरी जीवन लीला जल्दी समाप्त होने वाली है। मगर मरने से पहले मैं तुम्हें एक रहस्य की बात बताना चाहता हूं। हमारे खेतों में अपार धन गड़ा हुआ है। तुम सब मेरी मृत्यु के बाद उस खेत को खूब गहरा खोदना, तब तुम्हें वहां से बहुत-सा धन प्राप्त होगा।’’

यह सुनकर किसान के बेटे बेहद प्रसन्न हुए कि बाप के मरने के बाद भी कुछ नहीं करना होगा और बाकी की जिंदगी मजे से काटेंगे।

कुछ दिनों बाद किसान की मृत्यु हो गई। पिता के मरते ही उसके बेटों ने तुरत-फुरत उसका अंतिम संस्कार किया और दूसरे दिन ही कुदाल और फावड़े लेकर खेत खोदने में जुट गए। परंतु कई दिनों तक परिश्रम करने के बाद भी उन्हें गड़ा हुआ धन प्राप्त नहीं हुआ। अब चारों ने जी-भर कर उसे कोसा, मगर अब क्या किया जाए ? अब चारों ने सलाह की कि जब खेत खुद ही गया है तो क्यों न इसमें अंगूर बो दिए जाएं। खेत की गहरी खुदाई हुई थी, इसलिए फसल बहुत अच्छी हुई तथा किसान के बेटों को आशा से अधिक जन प्राप्त हुआ। अब किसान के पुत्रों को इस बात का एहसास हुआ कि उनके पिता के कहने का क्या अर्थ था।
उसी दिन चारों भाइयों ने परिश्रम करने का संकल्प लिया, क्योंकि परिश्रम से जो धन उन्हें प्राप्त हुआ था, उससे उन्हें अपार खुशी हो रही थी।

निष्कर्ष: आलस्य व्यक्ति को निकम्मा बना देता है।


(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)


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नांद में कुत्ता- ईसप की कहानी

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किसी गाँव में एक कुत्ता रहता था। वह झगड़ालू स्वभाव का था। एक दिन की घटना है कि वह एक अस्तबल में घुस गया और चारे की एक नांद पर चढ़ कर बैठ गया। उसे वह स्थान इतना पसन्द आया कि वह दिन भर वहीं लेटा रहा। उधर, जब घोड़ों को भूख लगी तो वे चारा खाने के लिए नांद की ओर आए। मगर वह कुत्ता किसी घोड़े को नांद के पास फटकने ही नहीं देता था। वह हरेक घोड़े पर भौंकता हुआ दौड़ता। बेचारे घोड़े अपना भोजन नहीं कर पा रहे थे। चूंकि चारा कुत्ते का भोजन नहीं था, इसलिए हुआ यह कि कुत्ता न तो खुद भोजन खा रहा था और न ही किसी घोड़े को खाने दे रहा था।
नतीजा यह हुआ कि स्वयं वह तथा घोड़े भूखे ही रह गए।

निष्कर्ष : किसी के हक पर जबरदस्ती कब्जा न करो।

(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)

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प्यासा कौआ- ईसप की कहानी

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एक बार बड़ी ही भयानक गरमी पड़ रही थी। एक कौआ बहुत देर से आकाश में उड़ रहा था। तेज गरमी और लगातार उड़ते रहने से उसे बहुत तेज प्यास लगने लगी। प्यास बुझाने के लिए वह नीचे उतरा और इधर-उधर पानी की तलाश करने लगा। परंतु आसपास कहीं भी उसे पानी दिखाई नहीं दिया।
‘ओह ! अगर मुझे जल्दी ही पानी नहीं मिला तो मेरी तो जान ही निकल जाएगी।’ कौए ने सोचा।
तभी अचानक कौए को दूर एक पानी का घड़ा नजर आया। वह तुरंत उड़ता हुआ वहां पहुंचा और घड़े में झांकने लगा। घडे़ में पानी तो था, मगर इतना नीचे था कि कौआ वहां तक अपनी चोंच डालकर पानी नहीं पी सकता था।
कौआ परेशान होकर सोचने लगा—‘अब क्या करूं ? कैसे अपनी चोंच पानी तक पहुंचाऊं ?’ तभी उसे एक तरकीब सूझी।
घड़े के पास ही कुछ कंकड़-पत्थर पड़े थे। कौआ अपनी चोंच से कंकड़ लेकर घड़े के पास पहुंचा और कंकड़ घड़े में डाल दिया। इस तरह उसने कई कंकड़ घड़े में डाले।

वह यह देखकर प्रसन्न हो गया कि घड़े में पानी का स्तर धीरे-धीरे ऊंचा उठने लगा है। कौए को आशा बंधी कि अब वह पानी पी सकेगा। अपनी इस तरकीब की सफलता से खुश होकर वह दुगने उत्साह से घड़े में कंकड़ डालने में जुट गया।
अंत में उसकी कड़ी मेहनत रंग लाई। पानी का स्तर ऊपर उठकर घड़े के मुंह तक पहुंच गया। अब कौआ बहुत आसानी से पानी पी सकता था। कौए ने छक कर पानी पिया और संतुष्ट होकर दोबारा आकाश में उड़ गया।

निष्कर्ष : यदि व्यक्ति ठान ले तो असंभव कुछ भी नहीं।

(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)

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बिल्ली के गले में घंटी- ईसप की कहानी

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एक बहुत बड़े घर में सैकड़ों चूहे रहते थे। वे चारों ओर उछल-कूद करते हुए अपना पेट आराम से भर लेते थे और फिर जब उन्हें खतरा दिखाई देता तो बिल में जाकर छिप जाते थे। एक दिन उस घर में न जाने कहाँ से एक बिल्ली आ गई। बिल्ली की नज़र जैसे ही चूहों पर पड़ी तो उसके मुँह में पानी आ गया। बिल्ली ने उन चूहों को खाने के विचार से उसी घर में अपना डेरा डाल दिया। बिल्ली को जब कभी भूख लगती तो वह अँधेरे स्थान में छिप जाती और जैसे ही चूहा बिल से बाहर आता तो उसे मारकर खा जाती। अब तो बिल्ली रोज चूहों का भोजन करने लगी। इस प्रकार वह कुछ ही दिनों में मोटी-ताजी हो गई।

बिल्ली के आ जाने से चूहे दुःखी हो गए। धीरे-धीरे चूहों की संख्या कम होती देख वे भयभीत हो गए। चूहों के मन में बिल्ली का डर बैठ गया। बिल्ली से बचने का कोई उपाय खोजने के लिए सभी चूहों ने मिलकर एक सभा का आयोजन किया। सभा में सभी चूहों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए, लेकिन कोई भी प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास नहीं हो सका। सभी चूहों में निराशा फैल गई।

तब एक बूढ़ा चूहा अपने स्थान पर खड़ा होकर बोला―' भाइयो सुनो, मैं तुम्हें एक सुझाव देता हूँ, जिस पर अमल करके हमारी समस्या का हल निकल सकता है। यदि हमें कहीं से एक घंटी और धागा मिल जाए तो हम घंटी को बिल्ली के गले में बाँध देंगे। जब बिल्ली चलेगी तो उसके गले में बँधी हुई घंटी भी बजने लगेगी। घंटी की आवाज़ हमारे लिए खतरे का संकेत होगी। हम घंटी की आवाज़ सुनते ही सावधान हो जाएँगे और अपने-अपने बिल में जाकर छिप जाएंगे।'

बूढ़े चूहे का यह सुझाव सुनकर सभी चूहे ख़ुशी से झूम उठे और अपनी ख़ुशी प्रकट करने के लिए वे नाचने-गाने लगे। चूहों का विचार था कि अब उन्हें बिल्ली से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी और वे फिर से निडर होकर घूम सकेंगे।

तभी एक अनुभवी चूहे ने कहा―'चुप रहो, तुम सब मुर्ख हो। तुम इस तरह तरह खुशियाँ मना रहे हो, जैसे तुमने कोई युद्ध जीत लिया हो। क्या तुमने सोचा है कि बिल्ली के गले में जब तक घंटी नहीं बंधेगी तब तक हमें बिल्ली से मुक्ति नहीं मिल सकती।'

अनुभवी चूहे की बात सुनकर सारे चूहे मुँह लटकाकर बैठ गए। उनके पास अनुभवी चूहे के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था। तभी उन्हें बिल्ली के आने की आहट सुनाई दी और सारे चूहे डरकर अपने-अपने बिलों में घुस गए।

शिक्षा:- इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि योजनाएँ बनाने से किसी भी समस्या का हल नहीं होता। समस्या का समाधान करने के लिए उन योजनाओं पर अमल करना आवश्यक है।

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बूढ़ा शिकारी कुत्ता- ईसप की कहानी

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एक शिकारी ने कई शिकारी कुत्ते पाल रखे थे. शिकारी ने कुत्तों को शिकार पकड़ लाने की अच्छी खासी ट्रेनिंग दी थी. शिकारी के पास एक बूढ़ा कुत्ता भी था जो कई वर्षों तक अपने मास्टर के लिए शिकार पकड़ कर लाने का काम बखूबी करता रहा था.

बुढ़ापे की मार सबको पड़ती है. वह शिकारी कुत्ता भी बूढ़ा हो चला था. अब उसमें उतना दम नहीं रहा था. फिर भी वह अपने मास्टर के साथ शिकार पर जाता और शिकार पकडने के लिए अपना पूरा दम लगाता.

शिकारी एक दिन शिकार पर था. उसके कुत्ते हिरन के बच्चे को पकड़ने के लिए दौड़े. बाकी कुत्ते तो पिछड़ गए, परंतु बूढ़ा शिकारी कुत्ता जी जान से दौड़ा और जैसे तैसे उसने हिरण को पकड़ लिया और हिरण के पुट्ठे पर अपना दाँत धंसा दिया, मगर उसके बूढ़े, कमजोर दाँत टूट गए और हिरण उसके चंगुल से भाग निकला.
शिकारी ने देखा कि उस बूढ़े कुत्ते ने हिरण को छोड़ दिया है तो उसे उस बूढ़े कुत्ते पर बड़ा क्रोध आया. उसने उस बूढ़े कुत्ते को मारने के लिए अपना हंटर उठाया.

बूढ़े कुत्ते ने अपने मालिक की ओर कातर निगाहों से देखा. मालिक ठिठक गया. मालिक ने उसकी बात सुन ली. मानों वह बूढ़ा कुत्ता कह रहा हो – मुझ समर्पित, बूढ़े कुत्ते को मत मारो. मेरा मन और मेरी इच्छा शक्ति अभी भी मजबूत है, जवान है. मगर मेरा शरीर बूढ़ा और कमजोर हो चला है जिससे मैं शिकार पकड़ने में असफल हो गया. मेरे पुराने, जवानी के दिनों को याद करो – तब मैं क्या था... और अपने खुद के बुढ़ापे के बारे में तो जरा सोचो...
शिकारी ने कुत्ते को गले से लगा लिया, उसके सिर पर हाथ फेरा, थपथपाया और कहा – कोई बात नहीं शेरू...

शिक्षा –
किसी उम्रदराज व्यक्ति के साथ व्यवहार करने से पहले उसके साथ बिताए पुराने दिनों को याद कर लें और अपने आने वाले बुढ़ापे के बारे में भी थोड़ा सोच लें.

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भेड़िया आया- ईसप की कहानी

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किसी गांव में एक चरवाहा रहता था। उसे गांवभर की भेड़ें चराने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वह भेड़ों को प्रतिदिन पहाड़ी पर स्थित चरागाह में ले जाता और उन्हें चरने के लिए छोड़ देता।

चरवाहा बालक अपने कार्य को भली प्रकार करता था। मगर एक ही जगह उन सभी जानी-पहचानी भेड़ों को प्रतिदिन ले जाकर चराते-चराते बेचारा ऊब-सा गया था। इसलिए उसने सोचा कि क्यों न दिल बहलाने के लिए कुछ हंसी-मजाक किया जाए। बस, लगा जोर-जोर से डरी आवाज में चिल्लाने—‘‘भेड़िया आया ! भेड़िया आया !...बचाओ ! भेड़िया भेड़ों को खा रहा है।’’
वह थोड़ी देर ठहरा और फिर जोर से चिल्लाया, ‘‘गांववालो, सोच क्या रहे हो, जल्दी आओ...मुझे और भेड़ों को बचाओ।’’

गांव वाले खेतों में काम कर रहे थे। उन्होंने चरवाहे की डरी हुई आवाजें सुनीं तो जो भी उनके हाथ में आया, वह लेकर भेड़िये को मारने के लिए पहाड़ी की ओर दौड़ पड़े।
परंतु वहां पहुंचकर उन्होंने देखा कि भेड़ें तो आराम से चर रही हैं और चरवाहा बालक हंस रहा था।
‘‘कहां है भेड़िया ?’’ गांव वाले क्रोध में बोले। मगर चरवाहा हंसता ही रहा।
फिर बोला, ‘‘कोई भेड़िया नहीं आया। मैं तो यूं ही मजाक कर रहा था, रोज एक-सा काम करते-करते ऊब गया हूं। आप लोग जाएं, अपना काम करें।’’

गांव वाले गुस्से में भुनभुनाते वहां से चले गए। लेकिन जाने से पहले उसे समझाना ना भूले, ‘‘तुम इसे मजाक कहते हो। यह मूर्खता के अलावा कुछ नहीं। भविष्य में ऐसा मजाक दोबारा मत करना वरना तुम्हें उसके दुष्परिणाम भोगने पड़ सकते हैं, अपने किए पर पछताना पड़ सकता है।’’

दूसरे दिन चरवाहा भेड़ों को चराने पहाड़ी वाले मैदान पर ले गया। मगर जब वह एक पेड़ के नीचे बैठा अपनी बांसुरी बजा रहा था, तभी उसे गुर्राने की सी आवाजें सुनाई दीं। उसने सिर उठाकर देखा तो कुछ दूर सचमुच एक बड़ा-सा भयानक भेड़िया गुर्राता हुआ भेड़ों की ओर बढ़ रहा था।
भेड़ों ने एक खूंखार भेड़िए को अपनी ओर बढ़ते देखा तो मिमियाकर इधर-उधर भागने लगीं।
चरवाहा बालक भयभीत हो गया। लगा जोर – जोर से चिल्लाने—‘‘भेड़िया आया ! भेड़िया आया !! बचाओ...बचाओ !’’

इस बार वह बहुत डरा हुआ था। चिल्ला-चिल्ला कर सहायता की पुकार कर रहा था। वहा कांप रहा था और खेतों की ओर आशा भरी नजरों से देख रहा था। मगर गांव वालों ने सोचा कि चरवाहा बालक मजाक कर रहा होगा, अतः वे नहीं आए।
भेड़िये ने भी चरवाहे बालक को भय से कांपते देखा तो समझ गया कि यहां कोई नहीं है, जो उसका मुकाबला कर सके। बस फिर क्या था, भेड़िये ने एक भेड़ की गरदन पकड़ी और देखते-ही-देखते उसे लेकर भाग गया। भेड़ें बुरी तरह मिमियाती और छटपटाती रहीं।
चरवाहा बालक रोता हुआ गांव वालों के पास आया और दर्दभरी कहानी सुनाई। वह अपने किए पर बुरी तरह पछता रहा था। चरवाहे बालक के माता-पिता तथा गांव वालों ने उसे खूब डांटा। बालक ने भी अपने मूर्खतापूर्ण कार्यों के लिए क्षमा मांगी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा मजाक नहीं करेगा।

निष्कर्ष : झूठे व्यक्ति की सच बात पर भी लोग विश्वास नहीं करते।

(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)

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भेड़िया और सिंह-ईसप की कहानी

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एक बार की बात है कि एक भेड़िया और एक सिंह शिकार की तलाश में साथ-साथ घूम रहे थे। एक प्रकार से भेड़िया शेर का मंत्री था।
भेड़िये की सलाह पर शेर गौर अवश्य करता था। घूमते समय अचानक भेड़िये को भेड़ों के मिमियाने की आवाज़ सुनाई पड़ी।
‘‘आपने भेड़ों के मिमियाने की आवाज सुनी महाराज ?’’ भेड़िये ने पूछा, फिर बोला—‘‘आप यहीं ठहरिए। मैं जाकर देखता हूं और यदि हो सका तो एक मोटी-ताजी भेड़ मारकर आपके भोजन का प्रबन्ध करता हूं।’’
‘‘ठीक है।’’ सिंह बोला—‘‘मगर अधिक समय मत लगाना। मैं भूखा हूं।’’
भेड़िया भेड़ की तलाश में निकल पड़ा।

कुछ सौ गज आगे जाकर वह भेड़बाड़े के पास जा पहुंचा। मगर यह देखकर भेड़िये का मुंह लटक गया कि भेड़बाड़े के सभी दरवाजे मजबूती से बंद थे तथा बड़े-बड़े खूंखार कुत्ते भी भेड़बाड़े की निगरानी कर रहे थे।
भेड़िया समझ गया कि उसकी दाल नहीं गलने वाली। अब क्या करे ?
उसने सोचा कि जान जोखिम में डालने से तो बेहतर है कि लौट कर सिंह से कोई बहाना बना दिया जाए।

यह सोच भेड़िया लौट आया और सिंह से बोला—‘‘उन भेड़ों का शिकार करना बेकार है। वे बहुत दुबली-पतली और बीमार सी लगती हैं। उनके शरीर में जरा भी मांस नहीं है। उन्हें तो उनके हाल पर ही छोड़ देना अच्छा है। जब उनके शरीर पर चर्बी चढ़ जाए, तभी उन्हें खाना ठीक रहेगा और वैसे भी मोटी-ताजी भेड़ों को खाकर ही हमारी भूख मिट सकती है।’’

निष्कर्ष: डरपोक व्यक्ति खतरे से बचने के लिए कोई न कोई बहाना ढूंढ़ ही लेता है।


(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)

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लालची कुत्ता- ईसप की कहानी

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एक कुत्ते ने कसाई की दुकान से मांस का एक टुकड़ा चुराया और इधर-उधर भाग कर कोई ऐसा स्थान खोजने लगा जहाँ शान्ति से बैठ कर वह उस मांस के टुकड़े का मजा ले सके। तभी उसे एक नदी के ऊपर बना हुआ पुल पार करना पड़ा। जब वह पुल पार कर रहा था तो उसकी नजर पानी में अपने प्रतिबिम्ब पर पड़ी। यह देखकर वह चौंक गया कि पानी में दिखाई देने वाले कुत्ते के मुंह में भी वैसा ही मांस का टुकड़ा था। वह सोचने लगा कि क्यों न दूसरे कुत्ते की बोटी भी झपट कर खा लूं।

मन में यह लालच आते ही वह दांत निकाल कर गुर्राया और पानी में छलांग लगा दी। परन्तु उस मूर्ख कुत्ते ने जैसे ही दूसरे कुत्ते के मुंह से मांस का टुकड़ा छीनना चाहा, उसके मुंह में दबा मांस का टुकड़ा भी पानी में गिर गया और साथ ही पानी में पड़ने वाला उसका प्रतिबिम्ब भी ओझल हो गया। उसके मुंह में दबा मांस पानी में गिरकर नदी के तल में चला गया। मूर्खता के कारण उसका अपना भोजन भी नदी में डूब गया और उसे उस दिन भूखा ही रहना पड़ा।
निष्कर्ष: जो कुछ अपने पास है, उसी में संतोष करना चाहिए। लालच करने से जो कुछ पास है, उससे भी हाथ धोना पड़ता है।


(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)

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शान्ति और सुरक्षा- ईसप की कहानी

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दो चूहे थे। एक गाँव में रहता था, दूसरा शहर में। दोनों में बहुत दोस्ती थी। गाँव के चूहे ने शहर के चूहे को अपने यहाँ निमन्त्रित किया।

शहर के चूहे ने उसका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। गाँव का चूहा स्वभाव से बहुत सादा, रूखा और मितव्ययी था। फिर भी उसने अपने मित्र के सम्मान में अपना दिल और भण्डार खोल दिया। उसने मटर, पनीर और दूसरी कई चीजें इकट्ठी कीं। फिर भी वह डर रहा था कि अपने मित्र के मन की चीजें जुटा पाएगा या नहीं? गाँव का चूहा छोटे-छोटे ग्रास खा रहा था, तभी शहर के चूहे ने उसका मजाक उड़ाते हुए घमण्ड से कहा,
‘‘मित्र, तुम कैसी आलसी और साधारण जिन्दगी जीते हो? तुम कूप-मण्डूक की तरह यहाँ रह रहे हो, न यहाँ गाड़ियाँ हैं, न आदमियों की भीड़। मेरे सम्मान में तुम व्यर्थ समय नष्ट कर रहे हो। तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें शहर की जिन्दगी दिखाऊँगा।’’

गाँव का चूहा उसके शानदार व्यवहार और सुन्दर शब्दों से बहुत प्रभावित हुआ। दोनों साथ-साथ शहर के लिए चल दिये। वे रात में शहर पहुँचे। वहाँ एक बहुत बड़ा मकान था। उसी में शहर का चूहा रहता था। वहाँ मखमली गद्दे थे। हाथी दाँत का सामान था और आराम की सारी चीजें थीं। शहर के चूहे ने अपने मित्र का शानदार स्वागत किया। उसे अच्छी-से-अच्छी चीजें खिलायीं और उसे सोने के लिए अच्छा बिस्तर दिया। गाँव का चूहा बहुत प्रभावित हुआ। उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने जिन्दगी का एक नया रास्ता दिखाया है। अचानक दरवाजा खुला। कमरे में घर के लोग आ गये। वे बाहर से मनोरंजन करके आये थे। चूहे डरकर भागे और एक कोने में छिप गये। कुछ देर बाद जैसे ही वे फिर बाहर निकले कि बहुत से कुत्ते भौंकने लगे। अब वे पहले से भी अधिक डर गये। जैसे-तैसे शान्ति हुई। गाँव का चूहा अपने छिपने के स्थान से बाहर निकला और शहर के चूहे से बोला,
‘‘अच्छा मित्र, नमस्ते। मैं यहाँ नहीं रह सकता। यह जगह उन्हीं के लिए अच्छी है, जो यहाँ के आदी हैं। इस भय और सावधानी के पकवानों से शान्ति और सुरक्षापूर्वक मिलने वाली सूखी रोटी ही अच्छी है।’’

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सियार और मेमना- ईसप की कहानी

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एक जंगल में एक बकरी और उसका प्यारा सा बच्चा मेमना रहते थे. एक दिन जब बकरी जंगल में घास चरने जा रही थी तो उसने अपने बच्चे को समझाते हुए कहा –
“बेटा, दरवाजा अच्छे से बंद रखना, और कोई भी आए, तो दरवाजा नहीं खोलना और जब तक मैं वापस न आ जाऊँ, बाहर नहीं निकलना.”

पास ही में एक सियार घात लगाए हुए बैठा था. उसने जब बकरी की यह बात सुनी, तो उसे एक विचार सूझा. जब बकरी चली गई तो वह थोड़ा और पास आया और बकरी की आवाज निकाल कर मेमना को आवाज दी. वह बकरी की आवाज निकाल कर मेमना को बुद्धू बनाकर उसका शिकार करना चाहता था.
मेमना को कुछ शक हुआ. उसे अपनी माँ की नसीहत याद आई. उसने खिड़की की झिर्री से सावधानी से झांका तो देखा कि एक सियार लार टपकाते हुए खड़ा है.
मेमना के दिमाग की बत्ती जली. उसने भी बकरी की आवाज निकाली और सियार को डांटा – भाग जा सियार, मैं सब समझती हूँ तुम्हारी चालाकी.
सियार को समझ नहीं आया कि अभी तो उसने बकरी को जंगल में जाते देखा था, वो भीतर कैसे चली आई. वह डर कर भाग गया.

शिक्षा -
बहुत सी मुसीबतें असावधानी और माता-पिता की बातों को न मानने से आती हैं. यदि सावधानी रखी जाए और माता-पिता की बातों को मानें तो समस्याओं को दूर रखा जा सकता है.

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हर चमकती चीज सोना नहीं होती-ईसप की कहानी

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एक बार एक बारहसिंगा तालाब के किनारे पानी पी रहा था। अभी वह दो-तीन घूंट पानी ही पी पाया था कि तभी उसे पानी में अपनी छाया दिखाई दी।
अपने सींगों को देखकर वह सोचने लगा—‘मेरे सींग कितने सुंदर हैं। किसी दूसरे जानवर के सींग इतने सुंदर नहीं हैं।’ इसके बाद उसकी नजर अपने पैरों पड़ी। अपने पतले और सूखे पैरों को देखकर उसे बेहद दुख हुआ। उसने सोचा—‘मेरे पैर कितने दुबले-पतले और भद्दे हैं।’

पानी पीकर वह कुछ कदम आगे बढ़ा था कि उसके कानों में बिगुल की आवाज सुनाई दी। वह समझ गया कि शिकारी उसकी ताक में हैं। जान बचाने की फिक्र में वह जितना तेज दौड़ सकता था, दौड़ा। उसके चपल वह फुरतीले पैर शीघ्र ही उसे शिकारियों की पहुंच से दूर ले गए।
वह तेजी से दौड़ता ही जा रहा था और अब घने जंगल में वहां पहुंच गया था जहां घने पेड़ व लम्बी-लम्बी झाड़ियां उगी हुई थीं।

तभी उसके सींग घनी झाड़ियों में उलझ गए और न चाहते हुए भी उसे रुकना पड़ा। सींग कुछ ऐसे उलझ गए थे कि वह हिल भी नहीं पा रहा था। शिकारी भी पास आते जा रहे थे और बारहसिंगा भी सींग छुड़ाने का असफल प्रयास कर रहा था। शिकारी उसके पास जा पहुंचे थे और सरलता से उसका शिकार कर सकते थे।
अब बारहसिंगा मौत के मुंह में खड़ा था, समझ गया था कि अंत अब निकट ही है।
उसने कातर दृष्टि से शिकारियों की ओर देखा, लेकिन वे उसे क्यों छोड़ने वाले थे।
तभी एक तीर आकर उसे लगा और वह जमीन पर गिर पड़ा।

वह सोच रहा था, ‘मैं अपने पैरों को देखकर खुश नहीं था, जबकि इन्होंने ही मेरी जान बचाने की कोशिश की; और मेरे यह सुन्दर सींग...इन्हीं की वजह से मुझे शिकारियों के हाथों मरना पड़ रहा है।’
यह सोचते-सोचते ही बारहसिंगे ने प्राण त्याग दिए।

निष्कर्ष: हर चमकती चीज जरूरी नहीं कि सोना ही हो।

(ईसप की कहानियाँ - अनिल कुमार)

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दो घड़े- ईसप की कहानी

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नदी किनारे एक छोटा सा गाँव बसा हुआ था। नदी गाँव के लोगों के लिए पानी का प्रमुख श्रोत थी। लेकिन जब बरसात का मौसम आया और गाँव में कई दिनों तक घनघोर बारिश हुई, तो नदी में बाढ़ गई। बाढ़ का पानी पूरे गाँव में भर गया। मकान पानी में डूब गए, लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भागना पड़ा।

बाढ़ के पानी में लोगों के घरों की कई चीज़ें बहने लगी। उनमें दो घड़े भी थे। एक पीतल का घड़ा था और एक मिट्टी का। दोनों ही घड़े पानी में ख़ुद को बचाने का प्रयत्न कर रहे थे। पीतल के कठोर और मजबूत घड़े ने जब मिट्टी के कमज़ोर घड़े को संघर्ष करते देखा, तो सोचने लगा कि मिट्टी का ये कमज़ोर घड़ा आखिर कब तक ख़ुद को डूबने से बचा पायेगा? मुझे इसकी सहायता करनी चाहिए।

उसने मिट्टी के घड़े से कहा, “मित्र सुनो, तुम मिट्टी के बने हुए हो और बहुत कमज़ोर हो। बाढ़ के इस पानी में तुम अधिक दूर तक नहीं जा पाओगे और डूब जाओगे। मेरी बात मानो और मेरे साथ रहो। मैं तुम्हें डूबने से बचा लूँगा।”

मिट्टी के घड़े ने पीतल के घड़े को देखा और उत्तर दिया, “मित्र! तुम्हारी सहायता के प्रस्ताव के लिए धन्यवाद। लेकिन मेरा तुम्हारे आस-पास रहना मेरी सलामती के लिए उचित नहीं है। तुम ठहरे पीतल के बने घड़े और मैं मिट्टी का घड़ा। तुम बहुत कठोर और मजबूत हो। अगर तुम मुझसे टकरा गए, तो मैं तो चकनाचूर हो जाऊंगा। इसलिए तुमसे दूर रहने में ही मेरी भलाई है। मैं स्वयं ही ख़ुद को बचाने का प्रयास करता हूँ। भगवान ने चाहा, तो किसी तरह किनारे तक पहुँच ही जाऊँगा।”

इतना कहने के बाद मिट्टी का घड़ा दूसरी दिशा में बहने का प्रयत्न करने लगा और धीरे-धीरे पानी के बहाव के साथ नदी किनारे पहुँच गया। वहीं दूसरी ओर पीतल का भारी घड़ा भी प्रयत्न करता रहा, लेकिन नदी के पानी के तेज बहाव में ख़ुद को संभाल नहीं पाया। उसमें पानी भर गया और वह डूब गया।

सीख - विपरीत गुणों की अपेक्षा एक समान गुण वाले अच्छी मित्रता कायम कर पाते हैं।



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लोमड़ी और कौआ- ईसप की कहानी

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किसी जंगल में एक कौआ रहता था। हर कोई उससे दूर ही रहता था, क्योंकि वह अपनी कर्कश आवाज में गाता रहता था और सभी जानवर उससे परेशान रहते थे।

एक दिन वह भोजन की तलाश में जंगल से दूर गांव की ओर निकल कर आ गया। किस्मत से उसे वहां एक रोटी मिल गई। रोटी लेकर वो वापस जंगल की ओर आ गया और आकर अपने पेड़ पर बैठ गया।
वहीं से एक लोमड़ी जा रही थी और उसे बहुत तेज भूख लगी हुई थी। उसने कौवे के पास रोटी देखी और रोटी को किसी भी तरह खाने का विचार करने लगी।

जैसे ही कौआ रोटी खाने को हुआ, नीचे से लोमड़ी की आवाज आई – “अरे कौआ महाराज, मैंने सुना है कि यहां पर बहुत सुरीली आवाज में कोई गाना गाता है, क्या वो आप हैं।”
लोमड़ी के मुंह से अपनी आवाज की तारीफ सुनकर कौआ मन ही मन बहुत खुश हुआ और अपना सिर हां में हिला दिया।

इस पर लोमड़ी बोली कि क्यों मजाक कर रहे हो महाराज। इतनी मधुर आवाज में आप गा रहे थे, मैं यह कैसे मान लूं? अगर आप गा कर बताएंगे, तो मुझे यकीन हो जाएगा।

कौआ लोमड़ी की बात सुनकर जैसे ही गाने को हुआ, उसके मुंह में दबी रोटी नीचे गिर गई। रोटी नीचे गिरते ही लोमड़ी ने रोटी पर झपट्टा मारा और रोटी खाकर वहां से चली गई। भूखा कौआ लोमड़ी को देखता रह गया और अपने किए पर बहुत पछताया।

सीख: हमें कभी भी किसी की बातों में नहीं आना चाहिए। साथ ही ऐसे लोगों से बचना चाहिए, जो आपकी झूठी प्रशंसा करते हैं। ऐसे लोग सिर्फ अपना काम निकलवाने के लिए ऐसा व्यवहार करते हैं।

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लोमड़ी और सारस- ईसप की कहानी

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एक बार की बात है, एक जंगल में चालाक लोमड़ी थी जो हर किसी जानवर को अपनी मीठी बातों में फंसा कर कुछ न कुछ ले लेती थी या खाना खा लेती थी।उसी जंगल में एक सारस पक्षी रहता था। लोमड़ी ने अपने चालाकी से उसे दोस्त बनाया और खाने पर घर बुलाया। सारस इस बात पर खुश हुआ और लोमड़ी के घर खाने बार जाने के लिए आमंत्रण स्वीकार कर लिया।

अगले दिन सारस, लोमड़ी के घर खाने पर पहुँचा। उसने देखा लोमड़ी उसके लिए और अपने लिए एक-एक प्लेट में सूप ले कर आई है। यह देख कर सारस मन ही मन बड़ा दुखी हुआ क्योंकि लंबी चोंच होने के कारण वह प्लेट में सूप नहीं पी सकता था। लोमड़ी ने चालाकी से सवाल पूछा,
“मित्र सूप कैसा लग रहा है”।
सारस ने उत्तर दिया, “यह बहुत अच्छा है पर मेरे पेट में दर्द है इसलिए में नहीं पी पाउँगा” और वह वहाँ से चला गया।

अगले दिन लोमड़ी बिना सारस के बुलाए ही उसके घर पहुँच गई। जब सारस ने देखा तो उसने उसका अच्छे से स्वागत किया। कुछ देर बाद सारस दो लंबे मँह वाली सुराही में सूप लेकर आया। सारस की लंबी चोंच आराम से उस सुराही में चली गई और वो सूप पीने लगा पर उस लोमड़ी का मुँह उस सुराही में घुसा ही नहीं। सूप पीने के बाद सारस ने लोमड़ी से प्रश्न पुछा,
“सूप कैसा लगा”।
यह सुन कर लोमड़ी को अपना समय याद आया और शर्म के मारे वहाँ से चली गई।

शिक्षा: जैसे को तैसा ।

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मेंढक और बैल: ईसप की कहानी

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एक मेंढक अपने तीन बच्चों के साथ जंगल में नदी किनारे रहता था। उन चारों की दुनिया जंगल और नदी तक ही सीमित थी। बाहरी दुनिया से उनका कोई वास्ता नहीं था।
खाते-पीते बड़े आराम और मज़े से उनका जीवन कट रहा था। मेंढक हृष्ट-पुष्ट था। उसके बच्चों के लिए वह दुनिया का सबसे विशालकाय जीव था। वह रोज़ उन्हें अपनी बहादुरी के किस्से सुनाता और उनकी प्रशंसा पाकर फूला नहीं समाता था।

एक दिन मेंढक के तीनों बच्चे घूमते-घूमते जंगल के पास स्थित एक गाँव में पहुँच गए। वहाँ उनकी दृष्टि एक खेत में चरते हुए बैल पर पड़ी। इतना विशालकाय जीव उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था। वे कुछ डरे, किंतु उसकी विशाल काया को देखते रहे। तभी बैल ने हुंकार भरी और मेंढक के तीनों बच्चे डर के मारे उल्टे पांव भागते हुए अपने घर आ गए।

बच्चों को डरा हुआ देखकर जब मेंढक ने कारण पूछा, तो उन्होंने विस्तारपूर्वक बैल के बारे में बता दिया, “इतना बड़ा जीव हमने आज से पहले कभी नहीं देखा। हमें लगता है दुनिया का सबसे विशालकाय जीव आप नहीं वह है । अपने बच्चों की बात सुनकर मेंढक को बुरा लगा। उसने पूछा, “वह जीव दिखने में कैसा था?“

“उसके चार बड़े-बड़े पैर थे। एक लंबी सी पूंछ थी। दो नुकीले सींग थे। शरीर तो इतना बड़ा कि आपका शरीर उसके सामने कुछ भी नहीं।” बच्चे बोले।

यह सुनकर मेंढक के अहंकार को जबरदस्त ठेस पहुँची। उसने जोर से सांस खींची और हवा भरकर अपना शरीर फुला लिया। फिर बच्चों से पूछा, “क्या वह इतना बड़ा था।”
“नहीं इससे बहुत बड़ा।” बच्चे बोले।
मेंढक ने थोड़ी और हवा भरकर अपना शरीर और फुलाया, “क्या इतना बड़ा?”
“नहीं नहीं और बड़ा।"

मेंढक ने जंगल के बाहर कभी कदम ही नहीं रखा था। उसे बैल के आकार का अनुमान ही नहीं था। किंतु उसने मानो ज़िद पकड़ ली थी कि अपने बच्चों के सामने स्वयं को नीचा नहीं दिखाना है।

वह जोर से सांस खींचकर ढेर सारी हवा अपने शरीर में भरने लगा। उसका छोटा सा शरीर गेंद के समान गोल हो गया। किंतु इतने पर भी वह नहीं रुका। उसका शरीर में हवा भरना जारी रहा। उसने इतनी सारी हवा अपने शरीर में भर ली कि उसका शरीर वह संभाल नहीं पाया और फट गया। अपने अहंकार में मेंढक के प्राण पखेरू उड़ गए।

सीख - अहंकार पतन का कारण है।

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सूअर और भेड़: ईसप की कहानी

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रोज़ की तरह एक चरवाहा अपनी भेड़ों को घास के मैदान में चरा रहा था। तभी कहीं से एक मोटा सूअर वहाँ आ गया। जब चरवाहे की नज़र सूअर पर पड़ी, तो उसने उसे पकड़ लिया।

जैसे ही चरवाहे ने सूअर को पकड़ा, वो तेज आवाज़ में चीखने लगा और ख़ुद को छुड़ाने का प्रयास करने लगा। लेकिन चरवाहे की पकड़ मजबूत थी। उसने सूअर के सामने और पीछे के दोनों पैर रस्सी से बांध दिए और उसे अपने कंधे पर लटकाकर कसाई के पास जाने लगा।

सूअर ज़ोर-ज़ोर से चीख रहा था और चरवाहा चला जा रहा था। मैदान में चर रही भेड़ें सूअर के इस व्यवहार पर बहुत चकित थीं। उनमें से एक भेड़ कुछ दूर तक चरवाहे के पीछे-पीछे गई और सूअर से बोली, “इस तरह चीखते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती? चरवाहा रोज़ हममें से एक भेड़ को पकड़कर ले जाता है, लेकिन हम तो यूं नहीं चीखते। तुम तो बेकार में इतना उत्पात मचा रहे हो। शर्म करो।"

भेड़ की बात पर सूअर को बहुत गुस्सा आया। वह और जोर से चीखते हुए बोला, “चुप रहो! चरवाहा जब तुम लोगों को पकड़कर ले जाता है, तो उसे बस तुम्हारा ऊन चाहिए होता है। लेकिन उसे मेरा मांस चाहिए। जब तुम्हारी जान पर बनेगी, तब बहादुरी दिखाना।"

सीख: जब ख़ुद की जान पर कोई ख़तरा नहीं होता, तब बड़ी-बड़ी बातें करना और बहादुरी दिखाना बहुत आसान होता है।


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