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वैज्ञानिक अनिल काकोडकर की जीवनी

 
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अनिल काकोदकर (जन्म:11 नवम्बर 1943) एक भारतीय परमाणु भौतिक विज्ञानी एवं यांत्रिक अभियन्ता है। नवम्बर, २००९ तक वे भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष एवं भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव थे। इसके पूर्व वे सन् १९९६ से २००० तक भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के निदेशक थे। वे भारतीय रिज़र्व बैंक में भी निदेशक हैं।

डॉ. अनिल काकोडकर भारत के एक प्रसिद्ध (न्यूक्लियर) वैज्ञानिक हैं। फिलहाल वह भारतीय अणु ऊर्जा आयोग (एईसीआई) के चेयरमैन तथा भारत सरकार के अधीन अणु ऊर्जा विभाग के सचिव पद पर कार्यरत हैं। भारत के अग्रणीय परमाणु कार्यक्रम का नेतृत्व करने का अवसर मिलने से पूर्व 1996 से 2000 तक वह ट्राम्बे स्थित भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर के निदेशक भी रहे हैं। 

डॉ. काकोडकर का जन्म 11 नवंबर, 1943 को मध्यप्रदेश राज्य में स्थित बारावानी नामक गांव में हुआ। उनके पिता श्री पी. काकोडकर तथा माता श्रीमती कमला काकोडकर, दोनों ही गांधीजी के स्वतन्त्रता आंदोलन में सिपाही रहे हैं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा बारावानी और खरगौन में हुई। मैट्रिक के आगे की पढ़ाई करने के लिए वह बंबई चले गए, जहां उन्होंने रूपारेल कॉलेज में स्नातक शिक्षा पूरी की। 

मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने 1963 में बंबई विश्वविद्यालय में वीजेटीआई संस्थान में प्रवेश लिया। 1964 में उन्हें भाभा एटोमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (बार्क) में नियुक्ति मिल गई। कुछ समय बाद वह शोधपरक अध्ययन हेतु इंग्लैंड चले गए तथा 1969 में नॉटिंघम विश्वविद्यालय से प्रायोगिक गुरुत्व विश्लेषण (एक्सपेरिमेंटल स्ट्रेस एनालिसिस) में मास्टर डिग्री प्राप्त की। परमाणु वैज्ञानिक के तौर पर उनका अगला कदम बार्क के रिएक्टर इंजीनियरिंग डिवीजन में था। 

भारत ने 1974 और 1998 में शांतिपूर्ण तरीके से परमाणु विस्फोट परीक्षण कर स्वयं को परमाणु संपन्न देशों की पंक्ति में खड़ा कर दिया। इनका श्रेय अनिल काकोडकर को भी जाता है क्योंकि वह इस विस्फोट परीक्षण को निर्मित करने वाली प्रमुख टीम में एक सदस्य के तौर पर शामिल थे। 

उन्होंने 100 मेगावाट के हाई फ्लक्स रिएक्टर के ध्रुव रिएक्टर को डिजाइन करने और उसे निर्मित करने में प्रमुख भूमिका अदा की। यह पूरी तरह से मालिक कार्य था जिसने इस रिएक्टर को अपने किस्म की एक सर्वाधिक शक्तिशाला संरचना बनाया तथा इसमें पहली बार बड़े स्तर पर इलेक्ट्रॉन बीम वेलडिंग, रिएक्टिव मैटीरियल फैब्रीकेशन तथा असमान धातुओं के जोड़ों की भिन्नता को प्रयुक्त करने संबंधी कई नई प्रौद्योगिकी का पहली बार प्रयोग किया गया था।

डॉ. काकोडकर ने भारत के दाब अनुकूलित भारी जल संयंत्र की जटिल प्रणाली का बडे पैमाने पर स्वदेशीय विकास करने, सुरक्षा संबंधी अनुसंधान में योगदान देने तथा इस संयंत्र प्रणाली के लिए नए प्रकार की प्रौद्योगिकी का मार्ग प्रशस्त करने में कई वर्ष समर्पित किए व अग्रणीय प्रयास कर जो महत्त्वपूर्ण योगदान दिया उसने भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में भी मदद की। 

उन्होंने कलपक्कम-प्रथम और कलपक्कम द्वितीय तथा राजस्थान-प्रथम की इंजीनियरिंग संबंधी कठिनाइयों को दूर किया तथा उन्हें पुनः संशोधित कर स्थापित किया। इन कठिन कार्यों को करने में उनकी इंजीनियरिंग कौशल के बेहतरीन उदाहरण थे क्योंकि इन संयंत्रों को लगभग बंद करने का निर्णय कर लिया गया था, किंतु काकोडकर ने इन्हें नया जीवन प्रदान किया।

वह देश के परमाणु कार्यक्रम में थोरियम की उपयोगिता को बढ़ाने से संबंधित कार्यक्रमों में सक्रिय योगदान देते रहे और इसी क्रम में उन्होंने अति विकसित भारी जल संयंत्र (एडवांस हैवी वाटर रिएक्टर) के शोध में लगी टीम का नेतृत्व भी किया। उन्होंने कई वर्षों तक, रिएक्टर के इंजीनियरिंग संबंधी कार्यक्रमों के लिए विशेषज्ञ वैज्ञानिकों व इंजीनियरों के एक विशेष समूह का गठन किया। उन्होंने अपने शोध कार्यों व अनुसंधानों पर 250 से अधिक वैज्ञानिक शोधयंत्र व रिपोर्ट प्रस्तुत की, जो देश-विदेश की कई वैज्ञानिक शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं।

वर्ष 1996 में, वह होमी जहांगीर भामा के बाद बार्क के निदेशक पद पर नियुक्त होने वाले सबसे युवा वैज्ञानिक बने। फिलहाल वर्ष 2000 से वह भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग का नेतृत्व कर रहे हैं, साथ ही परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव पद के दायित्वों को भी पूरा कर रहे हैं। डॉ. अनिल काकोडकर भारत के परमाणु परीक्षण कार्यक्रमों में आत्मनिर्भरता प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। वास्तव में, वह परमाणु ऊर्जा में थोरियम का उपयोग करके भारत को आत्मनिर्भर बनाने की पुरजोर वकालत करने के लिए जाने जाते हैं। 

सम्मान-
अनिल काकोदकर को सन १९९८ में पद्मश्री, १९९९ में पद्म भूषण तथा २६ जनवरी २००९ पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। डॉ़ मोहन धारिया राष्ट्र निर्माण पुरस्कार-2019


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