प्रत्येक वर्ग के लोगों को मिला जुला सम समाज है। मनुष्य समाज की एक इकाई है। मनुष्य से ही समाज निर्मित होता है। प्रत्येक मानव का अपना एक समाज और संस्कृति का तानाबाना होता है। मनुष्य जन्म से तो स्वतंत्र है किन्तु हर क्षेत्र में वो बँधा है। विभिन्न दृष्टिकोण से मनुष्य जन्म से स्वतन्त्र नहीं प्रतीत होता, क्यूँकि वह आनुवंशिकता और परिवेश के बंधनो के अन्तर्गत जन्म लेता हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस समाज में जन्म लेता है उसके रीति रिवाज आचरण भाषा और संगीत को अपनाता है।
संगीत का समाज से घनिष्ठ और अटूट संबंध होता है। संगीत समाज का प्रतिनिधित्व करता है। संगीत हमारे समाज का अभिन्न अंग है परन्तु फिर भी संगीत के प्रति हमारी आधुनिक क्षीण दृष्टिकोण को हम नहीं देख पा रहे हैं। इस दृष्टिकोण में संगीत केवल मनोरंजन करने वाला एक तत्व रह गया है और कुछ नहीं।
मेरे इस लेख का मुख्य उद्देश्य, आज के समाज में संगीत के अस्तित्व को प्रकट करना है।
इसने कोई विवाद नहीं है कि समाज में संगीत मनोरंजन से लोगों को प्रभावित करता है। लोगों को प्रभावित करने के कुछ तरीके सकारात्मक हैं, लेकिन अन्य हानिकारक हैं। हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ हमेशा हानिकारक तरीके सकारात्मक को पछाड़ते हैं। यदि हम नकारात्मक से थोड़ा अधिक बार मनोरंजन के सकारात्मक रूपों की ओर बढ़ते हैं, तो हमारे समाज को कम समस्याएं होंगी। लोकप्रिय संगीत का समाज पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और रचनात्मकता में कमी आती है। आज का सबसे लोकप्रिय संगीत हिंसा और विलासिता से प्रेरित है। संगीतकार उन एल्बमों को निर्मित कर रहे है जो हिंसा का महिमामंडन करते हैं और विलासिता को बढ़ावा देते हैं। जब एल्बम का निर्माण किया जाता है, तो कलाकार की यही सोच होती है कि यह व्यापारी को कैसे प्रभावित करेगा, आज आने वाले अधिकत्तर संगीत के बारे में आम तौर पर एक ही तथ्य सामने आता है की इसमें रचनात्मकता की कमी है क्योंकि कलाकार सिर्फ पैसा कमाने के लिए संगीत की रचना कर रहे हैं, न कि संगीत से प्यार के लिए।
यदि हम नागरिक समाज से निकलकर कुछ समय के लिये ग्रामीण समाज में रहे और उस अंचल की लोक संस्कृति का अध्ययन करे तो हम यह अनुभव करने लगेंगे की संगीत मात्र मनोरंजन का साधन नहीं , बल्कि उसकी हमारी सोच से भी अधिक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका है। गाँव का विशिष्ट जीवन संगीत से परिपूर्ण है एसा देखा जाता है कि अधिकांश समारोहों और उत्सवों पर तथा बीज बोने, धन कटाई, धन एकत्रीकरण आदि कई समारोहों पर विशिष्ट लोकगीत और लोकनृत्य पेश किए जाते हैं गानो की धुनो और लोकनृत्य प्रकारों से ग्रामीण समझ जाते है कि यह संगीत किस उपलक्ष्य में हो रहा हैं यदि हम इन धूनो और प्रकारों का संग्रह और विश्लेषण करे तो हम इस संगीत की तकनीक को समझ जाएँगे और जिससे भारतीय संस्कृति के विकास में सहायता मिल सकती हैं।
संगीत एक बहुत शक्तिशाली माध्यम है, जो शब्दों से परे होती है, और उसमें अपने सामर्थ्य को साझा करने में सक्षम होती है, जिससे व्यक्तिगत, समूह, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान के विकास और रखरखाव को बढ़ावा मिलता है।संगीत व्यक्तिगत स्तर पर शक्तिशाली है क्योंकि वह कई प्रतिक्रियाओं – शारीरिक, आंदोलन, मनोदशा, भावनात्मक, संज्ञानात्मक और व्यवहार को प्रेरित कर सकता हैं।
संगीत की चिकित्सीय रूप से कार्य करने की शक्ति को लंबे समय से मान्यता प्राप्त है। संगीत थेरेपी में संगीत सुनना या सक्रिय रूप से संगीत बनाना शामिल है। इस थेरेपी के उपयोगों से रोगियों, बुजुर्गों, मस्तिष्क क्षति वाले विशेष समूहों और लगातार दर्द वाले लोगों को बड़े पैमाने पर सहायता मिली है इसका उपयोग लोगों के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए भी किया गया है जिन्हें चिकित्स द्वारा मदद नहीं मिल सकी है।
संक्षेप में, संगीत में सांस्कृति , भावनात्मक और चिकित्सा द्वारा हमारे समाज को प्रभावित करने की शक्ति है, हम अपने संगीत के माध्यम से जितनी ध्वनियाँ, संदेश, और मूड बनाते हैं और रिलीज़ करते हैं, हम उतने ही अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं, जो हमारे जीवन में गहरे सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
संगीत हमारे समाज में एक अपरिवर्तनीय क्षमता में मौजूद है। यह हर संस्कृति, हर देश और यहां तक कि अंतरिक्ष के अंधेरे शून्य तक गहरी पहुंच के माध्यम से व्याप्त है। मानव जाति के लिए ज्ञात हर धर्म में संगीत भी मौजूद है, लेकिन क्या संगीत का हमारे समाज में वास्तविक अस्तित्व स्थापित हैं। आज लोगों के जीवन में रेडियो, टेलीविजन, इंटरनेट, और मनोरंजन के अन्य साधनो को छोड़कर संगीत कम ही सम्मुखीन हो रहा हैं, यह दुखद है कि इस दृष्टिकोण से समाज में संगीत के अस्तित्व की उपेक्षा हो रही हैं । जिसपर समाज के प्रत्येक व्यक्ति को विचार करना अति आवश्यक हैं।

