जब प्राचीन समय में सृष्टि का आरंभ हुआ तब ना तो कोई भाषा का आविष्कार हुआ था और ना तो लिपि का। जानते है तब इन्सान अपने विचार और अपनी भावना को दूसरों से कैसे व्यक्त करता था? “ध्वनि के उतार चढ़ाव और अपने हाव भाव से”। ध्वनि का उतार चढ़ाव और अंगित मुद्रा का यही प्रदर्शन दरासल संगीत के आविष्कार का प्रथम चरण था।
जैसा की आप सभी जानते हैं कि संगीत के सात स्वर सा रे गा म प ध नी और पाश्चात्य संगीत के सात स्वर डो रे मी फ सो ला सी है। संगीत के यें सात स्वरों द्वारा भाव रस एव भावना को अभिव्यक्त किया जा सकता हैं। इन स्वर समूहों से निर्मित गीत भिन्न भिन्न भावना को प्रस्तुत करते हैं । उस समय जब दूरसंचार और आधुनिक मशीन का आविष्कार नहीं हुआ था तब सन्देश के लिये अलग अलग प्रकार की ध्वनि का वादन एव नृत्य के माध्यम से आपत्ति विपत्ति की सूचना देने का कार्य किया जाता था। आधुनिक समय मे भरतनाट्यम नामक एक नृत्य इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण हैं जिसमें नर्तक नृत्य के माध्यम से भगवान कृष्ण की कहानी का चित्रण करता है ।
गीत (राग), वाध (वादन) एव मुद्रा ( नृत्य) तीनो संगीत है। एक शोध से यह स्पष्ट हुआ है की संगीत में इंसान की भावनाओ और मनोदशाओं को परिवर्तित करने की छमता है।
दुखी इंसान को शृंगारिक राग सुनाकर उसकी मानसिक दशा मे सहज परिवर्तन किया जा सकता है। इसी प्रकार दुनिया भर में कईमनोचिकित्सक अपने मरीज़ के लिये संगीत का उपयोग करते है। संगीत से कई मानसिक बीमारियों का इलाज किया जा सकता है।
आजकल लोग फल और सब्ज़ी की खेती के दौरान संगीत का उपयोग करते है और जानवरो में भी नियमित संगीत सुनाकर उनकी दूध देने की छमता को बढ़ाया जा रहा है। संगीत से बोलचाल की भाषा भी ना समझने वाला शिशु भी अपनी माँ की मधुर सुर में लोरी सुन कर अपना रुदन भूल जाता है। संगीत एक मात्र साधन है जिसके द्वारा इंसान अपनी थकान ,द्वन्द , उलझनऔर पीढ़ा से ना केवल मुक्ति पा सकता है अपितु उन पर विजय प्राप्त करकेआगे भी बढ़ सकता है।
संगीत सीखने का अर्थ यह नहीं है की आप उसे अपना व्यवसाय बनाये , कैरियर के रूप मे आप कोई भी व्यवसाय चुने परन्तु अपने कोमल एव सुकुमारभावो की अभिव्यक्ति हेतु संगीत ही चुने। सुन्दर संगीत आत्मा का विकास करता है और चरित्र का निर्माण करता है। इसलिये संगीत हमारे जीवन में अत्यन्त महत्व रखता है।

