संगीत में वाद्य का स्थान अतुलनीय है। वाद्य का निर्माण संगीत की ध्वनि निकालने के प्रयोजन के लिये हुआ था। वाद्य द्वारा लय बद्ध तरीक़े से निर्मित संगीतमय ध्वनि को उत्पन्न करने का कार्य किया जाता था। वाद्य का इतिहास, मानव संस्कृति की शुरुआत से प्रारम्भ हुआ था।
ऐसी मान्यताए है कि हिन्दू देवी देवता भी संगीत के वाद्य यंत्र बजाते थे – श्री कृष्ण वाँसुरी बजाते थे एवं वे सदा ही अपने साथ बासुरी रखते थे। माँ सरस्वती हमेशा वीणा अपने साथ रखती हैं। शिव जी का डमरु उनके त्रिशूल की शोभा बढाता है। पोराणिक मान्यताओ को माने तो त्रिदेव भगवान – ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने ढोल का निर्माण किया था।
वाद्य में संगीत को किसी अन्य सहायक कला के बिना भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने का साम्र्ध्य प्राप्त है। वाद्य से निकलने वाली संगीतमय ध्वनि ही वाद्य को आकर्षक बना देती है। इस लिए संगीत जगत में वाद्य का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है।
भिन्न भिन्न प्रकार के वाद्य जैस वाँसुरी , वीणा , ढोल , हारमोनियम , गितार , सरंगी , तबला इत्यादि ना जाने कितने ही वाद्यों के बारे में हम जानते है। लेकिन क्या आपको पता है कि संगीत को रोचक बनाने वाले इन वाद्यों को किस प्रकार वर्गीकृत किया गया था? संगीत जगत के प्रमुख ग्रन्थकार “भरतमुनि, दत्तिल, पीड़ित शारंगदेव“ इत्यादि ने अपने ग्रन्थों में विभिन्न प्रकार की ध्वनि के उत्पादन एवं गुण की भिन्नता के आधार पर वाद्यों को चार वर्गों मे बाटा है –
तत् वाद्य यंत्र -
धातु के तार या पशु स्नायु से बने ताँत से युक्त होते है, जिन्हें तारो पर नख, मिज़रव या कोण के आधत से ध्वनि उत्पन्न करके बजाया जाता है। प्राचीन समय में तत् वाद्य के अन्तर्गत – प्राचीन मटकोकिल , एकतंत्री , विपची , किनारे, वीणा इत्यादि आते थे और वर्तमान समय में सितार , सरोद , सरंगी , वायलन इत्यादि आते है।
सुषिर वाद्य यंत्र -
छेदों वाले वाद्य होते है जिनमे फूँककर या वायु के दबाव से ध्वनि उत्पन्न की जाती है। प्राचीन समय में सुषिर वाद्य के अन्तर्गत – बाँसुरी, वेणु , नफ़ीरी इत्यादि आते थे,और वर्तमान समय में बाँसुरी, शहनाई, बीन और हारमोनियम आते है।
घन वाद्य यंत्र -
किसी धातु के ठोस टुकडो को परस्पर टकराकर या किसी अन्य ठोस पदार्थ से प्रहार करके या हिला डुला कर ध्वनि उत्पन्न करके बजाया जाता है ।
प्राचीन समय में घन वाद्य के अन्तर्गत – थाल, झाँझ, करताल इत्यादि आते थे और वर्तमान समय में मंजीरा घंटा इत्यादि आते है।
अवनद्ध वाद्य- यंत्र -
वह वाद्य होते है जो भीतर से पोल होते है और जिनके मुख पर चमड़ा मढ़ा होता है। उनकी स्वरोत्पति उँगलियों, छड़ी या अन्य किसी वस्तु के आधात से उत्पन्न करके बजाया जाता है । प्राचीन समय मे अवनद्ध वाद्य के अन्तर्गत – त्रिपुष्कर, मृदंग, पटह, ढोल, नगाड़ा इत्यादि आते थे। और वर्तमान समय में पखावज , ढोलक, ड्रम, तबला इत्यादि आते है।
वाद्य का क्षेत्र अत्य्न्न्त व्यापक है। संगीत जगत में कुछ एसे वाद्य भी है जिनका प्रयोग स्वतन्त्र रूप के साथ साथ, किसी अन्य वाद्य की संगति के लिये भी किया जाता है। संगीत की अन्य कलायें जैसे गायन, वादन, नृत्य के साथ साथ नाटक और धार्मिक कार्य मे भी इन वाद्यों का महत्वपूर्ण स्थान है । इन अद्धभूद वाद्यों का महत्व केवल उनका वादन मात्र ही नहीं है अपितु ये वाद्य समृद्ध सांस्कृति का भी प्रतिबिम्ब हैं। इन वाद्यों के बारे में जानकर, उनका विकास करना न सिर्फ हमारा दायित्व भी है अपितु हमारा कर्तव्य भी है। क्योंकि हमारे जीवन में वाद्यों का महत्वपूर्ण अस्तित्व है ।

