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गोण्डा-विकास की कीमत या विस्थापन की त्रासदी? मसकनवां ओवरब्रिज ने उजाड़ दिए दशकों के सपने

 


गोण्डा । मसकनवां बाजार में प्रस्तावित रेलवे ओवरब्रिज (आरओबी) निर्माण को प्रशासन जहां विकास की बड़ी उपलब्धि बता रहा है, वहीं दूसरी ओर यह परियोजना सैकड़ों परिवारों के लिए जीवनभर की कमाई और दशकों पुराने आशियाने के उजड़ने की कहानी बन गई है। जिस परियोजना का उद्देश्य जाम से मुक्ति और बेहतर आवागमन बताया जा रहा है, उसी के कारण आज अनेक व्यापारी अपने ही हाथों से अपनी दुकानों और मकानों पर हथौड़े चलाने को विवश हैं।

         कभी ग्राहकों की चहल-पहल से गुलजार रहने वाला मसकनवां बाजार अब मलबे के ढेर में तब्दील होता दिखाई दे रहा है। जिन मकानों और प्रतिष्ठानों को लोगों ने वर्षों की मेहनत, संघर्ष और उम्मीदों से खड़ा किया था, वे अब विकास की कीमत बनते नजर आ रहे हैं। प्रभावित परिवारों का सवाल है कि यदि विकास किसी पूरे बाजार के अस्तित्व को ही मिटा दे, तो आखिर उसे किस दृष्टि से विकास कहा जाए?

          स्थानीय लोगों का दावा है कि ओवरब्रिज का वैकल्पिक डिजाइन तैयार कर या उसे कस्बे के बाहरी हिस्से से गोंडा-बभनान मुख्य मार्ग तक जोड़ते हुए बाईपास के माध्यम से मसकनवां-गौरा चौकी मार्ग से जोड़ा जा सकता था। उनका कहना है कि ऐसा होने पर जाम की समस्या का समाधान भी हो जाता और दशकों पुरानी बाजार तथा सैकड़ों परिवारों का आशियाना भी सुरक्षित रहता।

        प्रभावित व्यापारियों ने अपनी पीड़ा लेकर सांसद एवं केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह 'राजा भैया' से भी मुलाकात की। व्यापारियों के अनुसार उन्हें जवाब मिला कि यह केंद्र सरकार से जुड़ा विषय है और इस मामले में वे कुछ नहीं कर सकते। वहीं क्षेत्रीय विधायक से मिलने पर उन्हें मुख्यमंत्री से वार्ता का आश्वासन मिला। हालांकि अब तक प्रभावित परिवारों को कोई ठोस राहत या समाधान नहीं मिल सका है।

        स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि लाखों लोगों की सुविधा के लिए सैकड़ों परिवारों का विस्थापन अपरिहार्य माना जा रहा है, तो कम से कम उन्हें सम्मानजनक पुनर्वास और उचित मुआवजा मिलना चाहिए। उनका आरोप है कि बिना पर्याप्त राहत दिए लोगों को अपने ही घर और दुकानें तोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

          सबसे बड़ा विवाद लोक निर्माण विभाग द्वारा कई दशक पुराने मकानों और दुकानों को अतिक्रमण की श्रेणी में मानते हुए नोटिस जारी करने को लेकर है। प्रभावित लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब वर्षों तक इन्हीं भवनों के सामने से सड़क संचालित होती रही, तब वे वैध थे, लेकिन अब सड़क का मानक बदलते ही वही मकान अचानक अतिक्रमण कैसे हो गए।

          मसकनवां के लोगों का दर्द केवल ईंट-पत्थरों के टूटने का नहीं, बल्कि पीढ़ियों की मेहनत, पहचान और आजीविका के बिखरने का है। उनका मानना है कि यह विस्थापन आने वाले वर्षों तक उनकी स्मृतियों में जिंदा रहेगा। अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या विकास और जनहित के बीच ऐसा संतुलन नहीं बनाया जा सकता था, जिससे आवागमन भी सुगम होता और दशकों पुरानी बाजार का अस्तित्व भी सुरक्षित रहता।

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