गोण्डा। देश की आजादी के लिए अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाले 1857 के क्रांतिकारी राजा अशरफ बख्श की मजार आज उपेक्षा का दंश झेल रही है। नवाबगंज क्षेत्र के होलापुर गांव में स्थित उनकी मजार की हालत ऐसी है कि स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर भी यहां श्रद्धांजलि देने और पुष्प अर्पित करने वाला कोई नहीं पहुंचा। यह स्थिति उस वीर योद्धा की स्मृति के संरक्षण पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपना जीवन बलिदान कर दिया।
अवध के विलय के बाद भड़का था विद्रोह
इतिहास के अनुसार फरवरी 1856 में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध का विलय अपने शासन में कर लिया था। इसके बाद अवध के राजे-रजवाड़ों और तालुकेदारों में अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष बढ़ा। यही असंतोष 1857 के विद्रोह में बड़े आंदोलन के रूप में सामने आया। गोंडा क्षेत्र भी इस संघर्ष का महत्वपूर्ण केंद्र बना। ऐतिहासिक अभिलेखों में अशरफ बख्श को गोंडा के प्रमुख तालुकेदारों में शामिल बताया गया है, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोही पक्ष का साथ दिया था।
राजा देवी बख्श सिंह के साथ संभाला मोर्चा
स्थानीय इतिहास के अनुसार, बूढ़ापायर परगना के राजा अशरफ बख्श ने गोंडा के राजा देवी बख्श सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजी सेना का मुकाबला किया। दिसंबर 1857 में लोलपुर-लमती क्षेत्र में अंग्रेजों के खिलाफ हुए संघर्ष में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इस मोर्चे पर अवध की बेगम हजरत महल के समर्थन में कई स्थानीय रजवाड़ों और क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला था। ऐतिहासिक विवरणों में लमती में बड़ी संख्या में विद्रोही सैनिकों के एकत्र होने का भी उल्लेख मिलता है।
अंग्रेजी सेना के दबाव और लगातार सैन्य कार्रवाई के बाद क्रांतिकारियों को पीछे हटना पड़ा। राजा अशरफ बख्श ने नवाबगंज क्षेत्र के होलापुर गांव में शरण ली। स्थानीय इतिहास के अनुसार, मुखबिरी के बाद अंग्रेजी सैनिकों ने गांव को घेर लिया। जिस फूस के मकान में राजा अशरफ बख्श छिपे थे, उसे अंग्रेजों ने आग के हवाले कर दिया। इसी घटना में वह अपने घोड़े के साथ शहीद हो गए। उनकी स्मृति में होलापुर में मजार/समाधि स्थल बनाया गया।
अंग्रेजों ने जब्त कर ली थी संपत्ति
राजा अशरफ बख्श के संघर्ष का उल्लेख ब्रिटिशकालीन ऐतिहासिक विवरणों में भी मिलता है। उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी लगातार सक्रियता के कारण बूढ़ापायर की उनकी संपत्ति अंग्रेजी शासन ने जब्त कर ली थी और बाद में उसे दूसरे जमींदार को दे दिया गया। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि उनका अंग्रेजी सत्ता के प्रति विरोध केवल 1857 के विद्रोह तक सीमित नहीं था।
जन्मस्थली की कोठी भी खंडहर में तब्दील
राजा अशरफ बख्श की जन्मस्थली बताई जाने वाली बूढ़ापायर परगना के कस्बा खास में उनकी कोठी के अवशेष भी आज संरक्षण की बाट जोह रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, कभी जहां से क्षेत्र की गतिविधियां संचालित होती थीं, वहां अब ऐतिहासिक विरासत के नाम पर केवल खंडहर बचे हैं। इस अमर सेनानी के नाम पर उनकी जन्मस्थली और शहादत स्थल को संरक्षित करने की मांग लंबे समय से उठती रही है।
राष्ट्रीय पर्व पर भी उपेक्षा
स्वतंत्रता दिवस पर देशभर में स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन राजा अशरफ बख्श की मजार पर पसरा सन्नाटा चिंता पैदा करता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि आजादी के लिए बलिदान देने वाले ऐसे योद्धाओं की स्मृतियों को केवल इतिहास की किताबों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
ग्रामीणों ने प्रशासन से मजार की नियमित साफ-सफाई, जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण के साथ राजा अशरफ बख्श की जन्मस्थली और उनसे जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की मांग की है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गोंडा के इस अमर क्रांतिकारी के योगदान और बलिदान से परिचित हो सकें।
राजा अशरफ बख्श का इतिहास और शहादत
गोंडा से संबंध:
राजा अशरफ बख्श गोंडा के विद्रोही राजा देवी बख्श सिंह के बेहद करीबी और बूढ़ापायर क्षेत्र के प्रतापी मुखिया थे।
अंग्रेजों से मुकाबला:
उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बैरिया, डुमरियागंज और रुधौली की लड़ाइयों में ब्रिटिश सेना के खिलाफ जमकर लोहा लिया था।
जीवित जलकर बलिदान:
मुखबिरी के बाद अंग्रेजों ने उनके छिपे होने वाले घर को घेर लिया और आग लगा दी, जिसमें वे जिंदा जलकर शहीद हो गए और वहीं उनकी मजार बनाई गई।
वर्तमान स्थिति और बदहाली के मुख्य बिंदु
खंडहर में तब्दील स्थल:
जहां कभी राजा की अदालत (कोर्ट) लगती थी और उनका पैतृक घर था, वह पूरा परिसर अब खंडहर में बदल चुका है।
सरकारी उपेक्षा:
इतने वर्ष बीतने के बाद भी इस ऐतिहासिक स्थल को आधिकारिक तौर पर धरोहर या पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं किया गया है।
वंशजों की तंगहाली:
राजा अशरफ बख्श के परिवार और वंशज आज भी अत्यधिक आर्थिक तंगी और गरीबी में जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
घटती परंपराएं:
पहले उनकी शहादत के दिन राजकीय सम्मान व सलामी की परंपरा हुआ करती थी, जो अब समय के साथ बंद हो चुकी है और केवल स्थानीय लोग ही चिराग जलाकर उन्हें याद करते हैं।


