ऋषिकेश के पास मणिकूट पर्वत पर नीलकंठ महादेव मंदिर (Neelkanth Mahadev Temple) स्थित है। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकला हलाहल विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया, इसलिए उन्हें नीलकंठ कहा गया।ऋषिकेश को हिमालय का प्रवेशद्वार कहा जाता है। नीलकंठ महादेव (Neelkanth Mahadev Temple) उत्तर भारत के मुख्य शिवमंदिरों में से एक है। मान्यता के अनुसार भगवान शिव ने जब विष ग्रहण किया था तो उसी समय पार्वती ने उनका गला दबाया, ताकि विष उनके पेट तक न पहुंच सके। इस तरह विष उनके गले में बना रहा।विषपान के बाद विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया था। गला नीला पड़ने के कारण ही भगवान शिव को नीलकंठ नाम से जाना गया। मंदिर के समीप पानी का झरना भी है, जहां श्रद्धालु मंदिर के दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।नीलकंठ महादेव मंदिर की नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर शिखर के तल पर समुद्र मंथन के दृश्य को चित्रित किया गया है। मंदिर के गर्भ गृह के प्रवेश-द्वार पर एक विशाल पेंटिंग में भगवान शिव को विष पीते हुए भी दिखलाया गया है।ऋषिकेश से स्वार्गाश्रम, लक्ष्मण झूला, नीलकंठ रोड, मौनी बाबा की गुफा से होकर आप नीलकंठ महादेव मंदिर पहुंच सकते हैं। अगर आप अपने वाहन से जाना चाहते हैं तो ऋषिकेश बैराज-लक्ष्मण झूला मार्ग से सीधे नीलकंठ जा सकते हैं। या फिर बदरीनाथ मार्ग पर ब्रह्मपुरी होते हुए नीलकंठ मार्ग पकड़ सकते हैं।
शिवरात्रि से जुड़ी मान्यता
हिंदु पुराणों में एक बेहद प्रचलित कथा के अनुसार सागर मंथन के दौरान जब अमृत के लिए देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध चल रहा था, तब अमृत से पहले सागर से कालकूट नाम का विष निकला। ये विष इतना खतरनाक था कि इससे पूरा ब्रह्मांड नष्ट किया जा सकता था। लेकिन इसे सिर्फ भगवान शिव ही नष्ट कर सकते थे। तब भगवान शिव ने कालकूट नामक विष को अपने कंठ में रख लिया था। इससे उनका कंठ (गला) नीला हो गया। इस घटना के बाद से भगवान शिव का नाम नीलकंठ पड़ा।लेकिन इस विष के प्रभाव से भगवान शिव का मस्तिष्क गर्म हो उठा और उनके कंठ में जलन होने लगी। उनके इस कष्ट को देख सभी देवता चिंतित हो गए। उनके कंठ की जलन को कम करने के लिए सभी देवताओं ने उन्हें बेल पत्र खिलाया, जिससे विष का प्रभाव कम हो गया। तभी से शिव जी की पूजा में बेल पत्र का विशेष महत्व है। इतना ही नहीं मान्यता यह भी है कि भगवान शिव द्वारा विष पीकर पूरे संसार को इससे बचाने की इस घटना के उपलक्ष में ही महाशिवरात्रि मनाई जाती है।

