क्या है सनातन धर्म शास्त्र के अनुसार गर्भाधान संस्कार
गर्भधान शब्द दो शब्दो के योग से बना है- गर्भ + आधान - आधान का अर्थ होता है स्थापित करना या रखना। इस तरह गर्भधान का शाब्दिक अर्थ है पुरूषो द्वारा स्त्री के गर्भशाय में बीज रूप शुक्र को स्थापित करना। धर्म-शास्त्र में स्त्री को क्षेत्र कहा गया है और पुरूष को बींज जैसे बीजवन के लिए भूमि ( क्षेत्र,खेत ) की आवश्यकता होता है। ठीक वैसे ही पुस्ष रूपी बीज के स्त्री स्पी क्षेत्र में स्थापित होने की यथोचित क्रिया गर्भाधान है। किंतु इस सृष्टि प्रक्रिया को धार्मिक तथा यज्ञ रूप में बनाना अर्थात उसे सुस्कृत करना ही संस्कार का कार्य है।
वैसे तो समस्त जीवधारियो में स्त्री वर्ग तथा पुरूष वर्ग में सहज रूप में सहवास होता है जिसका परिणाम संन्तानोप्ति है। किंतु यह मैथुनिक क्रिया सृष्टि का पाशविक धरातल है। यद्यपि मानव अन्य जीवधारियो से भिन्न श्रेष्ठ एंव विवेक पूर्ण प्राणा माना गया है उसे इस पाशविक धरातल से ऊपर उठने के लिए निरंकुश पाशविक प्रवृत्तियो पर अंकुश लगाने के लिए दीर्घ दर्शी ऋषि -मर्हिषियो के द्वारा बताये गये गर्भाधानादि धार्मिक संस्कारो का विधान बनाया है। जिससे स्वेच्छाचार एंव कामाचार नियन्त्रित हो सके। जैसे अन्तः करण की शुद्धि के लिए भगवत् भक्ति,शाम-दमादि अनेक साधन है। ठीक वैसे ही बाह्य करणो की शुद्धि संस्कारों से होता है। यद्यपि गर्भाधान-संस्कार कृत्य बाह्य है। यानि बाहरी कृत्य है। किंतु इसका पूर्ण प्रभाव संन्तान के मन,बुद्धि,चित्त तथा ह्रदय पर विलक्षण रूप से पडता है।
गर्भाधान से पूर्व संकल्प व प्रार्थना करें-
विवाह के अनन्तर रजोदर्शन के बाद चतुर्थ दिन ऋतु स्नान करके स्त्री को प्रातःकाल आभूषण आदि से सुसज्जित होकर तथा नवीन वस्त्र आदि धारण कर मौनव्रत पूर्वक पति के साथ सूर्य के सम्मुख हाथ जोडकर सूर्य मन्त्र से सूर्यावलोकन तथा नमस्कार करे। इसके बाद प्रथम पूज्यनीय गणेश की पूजा विधान से करने के बाद अपने कुलदेवता व पूर्वजों का आशीर्वाद लेना चाहिए। ( गर्भाधान ) के समय गर्भाधान से पूर्व संकल्प व प्रार्थना करनी चाहिए एवं श्रेष्ठ आत्मा का आवाहन कर निमंत्रित करना चाहिए। ( गर्भाधान) के समय दंपति की भावदशा एवं वातावरण जितना परिशुद्ध होगा, श्रेष्ठ आत्मा के गर्भप्रवेश की संभावना उतनी ही बलवती होगी। संकल्प विधि से ईश्वर को साक्षी मानकर पूजा-पाठ करने के उपरान्त ही स्त्री और पुरूष साथ-साथ हो। हां यदि संम्भव हो सके तो किसी योग्य ब्राम्हण से गर्भाधान संस्कार का कर्मकाण्ड अवश्य सम्पन्न करावें। यदि कीन्ही कारण वश संम्भव न हो सके तो उपरोक्त बताये गये नियमो का अवश्य पालन करे।
गर्भाधान संस्कार अनुष्ठान कब करे-
गर्भाधान-संस्कार अनुष्ठान उस समय होता है,जब पति पत्नी दोनो संन्तानोत्पत्ति के योग्य और स्वस्थ्य हो। जब वे एक-दूसरे के ह्रदय को जानते व समझते हो और उनमें संन्तान उत्पन्न करने की आपस में प्रबल इच्छा उत्पन्न हो रहा हो। गर्भाधान संस्कार विष्यान्नद नही,वैषियिक सुख नही,अपितु उत्तम संन्तान प्राप्ति का यज्ञ कर्म है। गर्भाधान संस्कार के लिए अच्छे विचार,पावन एंव निश्च्छल मानसिक,तपःपूत चिन्तन एंव संयम-शक्ति अपरिहार्य तत्व है। गर्भाधान संस्कार विवाह संस्कार की पूर्णता को व्यक्त करता है। गर्भाधान संस्कार होने पर मातृ में आत्म रूप में जीव की प्रतिष्ठा हो जाने पर ही आगे के संस्कार संम्भव है। क्योकि गर्भ में जीव के आने पर ही आगे के पुंसवन,सीमान्तोन्नयन तथा प्रसव के अन्नतर के जातकर्म आदि संस्कार होते है। इस सृष्टि से गर्भाधान-संस्कार का सर्वोपरि महत्व है। यथा विधि संस्कार के सम्पन्न होने पर पंच तत्वो की पंच कोशों की तथा माता से उत्पन्न होने वाले त्वक् , मांस , शाणित एंव पिता से उत्पन्न होने वाले अस्थि,स्नायु एंव मज्जा आदि इन धातुओ की शुद्धि हो जाता है।
सहवास के अनन्तर कृत्य-
आचारादर्श में महर्षि पराशर के वचन से बताया गया है कि ऋतुकाल में गर्भ रहने की आशंका है,अतः गमन के अनन्तर पुरूष को अशिरक स्नान करके आचमन-प्रणायाम करके भगवान का स्मरण करना चाहिए। किंतु ऋतुकाल रहित समय में सहवास करता है,उसकी शुद्धि मूत्रपुरीषवत् होता है ।
ऋतौ तु गर्भशक्त्वित्स्नानं मैथुनिनः स्मृतम्।
अनृतौ तु यदा गच्छेच्छौचं मूत्रपुरीषवत्।।
यहां पर विशेष यह बताया गया है कि ऋतुकाल में मैथुन करने वाले को अशिरकस्नान तथा बिना ऋतुकाल में गमन करने वाले पर पादप्रक्षालन,अंप्रोक्षण आदि करना चाहिए। स्नान की आवश्यकता नही है,किन्तु दोनो अवस्थाओ में इन्द्रियों की मूत्रपुरीषवत् शुद्धि करनी चाहिए। रात्रि में स्नान निषिद्ध होने से मार्जन आदि करना चाहिए,ऐसा आर्दश में बताया गया है।
परन्तु स्त्रीयो के लिए स्नाना आदि की आवश्यकता नही है क्योकि उनमें अशुचित्व नही रहता। वृद्धशातातपका कहना है कि स्त्री-पुरूष शयनकाल में दोनो अशुचि रहते है। किंतु सहवास के अनन्तर शयन से उठ जाने पर स्त्री शुचि ही रहती है। किंतु पुरूष अशुचि हो जाता है। इस लिए उसे मार्जन-स्नानादि से पवित्र होना चाहिए।
गर्भाधान के लिए शुभाशुभ समय-
गर्भाधान के उपयुक्त काल के विषय में धर्म ग्रन्थो में बहुत विचार हुआ है। उन सभी बातो को मुहूर्तचिन्तामणि के निम्न श्लोको में बताया गया है।
गण्डान्तं त्रिविधं त्यजेन्निधनजन्मर्क्षे च मूलान्तकं,
दास्त्रं पौष्णमथोपरागदिवसं पातं तथा वैधृतिम्।
पित्रोः श्राद्धदिनं दिवा च परिघाद्यर्ध स्वपत्नीगमें,
भान्युत्पातहतानि मृत्युभवनं जन्मर्क्षतः पापभाम्।।
भद्राषष्ठीपर्वरिक्तश्च सन्ध्याभौमार्कार्कीनाद्यरात्रीश्चतस्तः।
गर्भाधनं त्र्युत्तरेन्द्वर्कमैत्रब्राम्हस्वातीविष्णुवस्वम्बुभे सत्।।
गर्भाधान के लिए निषेध काल
नक्षत्र, तिथि तथा लग्न गण्डान्त , निधन-तारा , जन्म-तारा , मूल नक्षत्र , भरणी नक्षत्र , अश्विनि नक्षत्र , रेवती नक्षत्र , ग्रहण के दिन व्यतीपात , वैधृति,माता-पिता के श्राद्ध के दिन , दिन के समय , परिधयोग के आदि का आधा भाग , उत्पात से दूषित नक्षत्र , जन्मराशि या जन्म नक्षत्र से आठवां लग्न ,पाप युक्त नक्षत्र या लग्न , भद्रा , षष्ठी , चतुदर्शी , अष्टमी , अमावस्या , पूर्णिमा , संक्रान्ति , संन्धया के दोनो समय , मंगलवार , रविवार और शनिवार रजोदर्शन से आरम्भ करके चार दिन-यह सब पत्नी से सहवास करना वर्जित है।
गर्भाधान के लिए शुभ समय
शेष तिथियां सोमवार , बृहस्पतिवार , शुक्रवार , बुधवार , तीनो उत्तरा नक्षत्र , मृगशिरा नक्षत्र , हस्त नक्षत्र , अनुराधा नक्षत्र , रोहिणी नक्षत्र , स्वाती नक्षत्र , श्रवण नक्षत्र , धनिष्ठा नक्षत्र और शततारका आदि यह सब गर्भाधान के लिए शुभा-शुभ समय है।
गर्भाधान काल-
एक प्रहर रात्रि बीतने तथा एक प्रहर रात्रि शेष रहने के मध्य के काल में आरोग्यमय द्वि-तन, अत्यन्त प्रसन्न मन, अतिप्रेममय सम्बन्ध, आह्लाद आभर पति-पत्नी स्थिर संयत शरीर, प्रसन्न वदन, आनन्द पूर्वक गर्भाधान करें। प्रक्षेपण एवं धारण क्रिया सहज सौम्य हो।
गर्भाधान काल के बाद-
यह ज्ञात होते ही गर्भाधान हो गया है तो पति-पत्नी दश मास गर्भ के स्वस्थन, परिस्वस्थन, परिपुष्टन, देव-व्यवस्था के उत्तमीकरण की भावना से सने वेद-मन्त्रों से अर्थ सहित ही यज्ञ करें। इसके पश्चात भोजन व्यवस्था में सम-क्षार, अम्ल, लवणनिग्ध, कमतीता (मिर्च), पुष्टिकारक भोजन आयोजन करे। भोजन ऋतुओं के अनुकूल ही हो।
गर्भधान के समय की भावना
देवताब्राम्हणपराः शौचाचारहिते रताः।
महागुणान! प्रसूयन्ते विपरीतास्तु निगुर्णान्।।
इस समय जिस भी भाव से स्त्री व पुरूष सहवास करते है। उसी भाव से युक्त सन्तान की उत्पत्ति होती है। इस लिए गर्भधान के समय मन में सुयोग्य उत्तम चरित्र सम्पन्न गुणवान तथा धर्मात्मा पुत्रोत्पति का भाव रखा चाहिए।
गर्भिणी स्त्री के आवश्यक पालनीय नियम
जब गर्भ में संन्तान होता है,तब माता जैसी सात्विक,राजस तामस भावना से भावित रहती है। जैसा अच्छा-बुरा देखती व सुनती,पडती,खाती-पीती है, उन सबका गर्भ में स्थित संन्तान के ऊपर प्रभाव पडता है। इस लिए गर्भवती स्त्री राजस-तामस भावो से बचकर सात्विक भावनांए करनी चाहिए। गन्दे एंव अश्लील दृश्यो को न देखकर सात्विक देवदर्शन , सन्त दर्शन आदि करना चाहिए। गन्दे गीत सुनना-गाना छोडकर सात्विक भजन-र्कीतन ही सुनना एंव गाना चाहिए। एक स्त्री के गर्भकालीन भावना का सन्तान पर प्रत्यक्ष प्रभाव पडता है। इस लिए एक स्त्री को चाहिए की जग वह गर्भवती हो वह सद्विचार,सदग्रन्थो का अध्ययन तथा शुभ दृश्यो को देखे।
दोहद ‘‘ गर्भकालीन इच्छा ’’
गर्भिणी की अभिलाषा को ही दोहद कहते है। ऐसी गर्भिणी स्त्री जो अन्नपानादि विशेष अभिलाषा करती है। दोहदवती कहलाती है। गर्भ के चार मास हो जाने पर गर्भ इन्द्रिय के विषयो में चाह इच्छा करने लगती है। अतः स्त्री को दो हृदय वाली होने से संन्तान में विकृति होती है,इसलिए गर्थिणी जिस-जिस वस्तुओ की इच्छा करे,वह उसको देनी चाहिए। गर्भवती इच्छा पूर्ण होने से संनमन वीर्यशाली और चिरायु होती है। गर्भ का हृदय माता के हृदय से उत्पन्न होता है। और गर्भ पोषण के लिए रसवाही धमनियो द्वारा माता के हृदय से बालक का हृदय सम्बद्ध रहता है। इस लिए उन रसवाहीनी धमनियो द्वारा बालक अपनी इच्छा को माता के हृदय द्वारा प्रकट करता है। इस लिए दो हृदय वाली स्त्री का अपमान नही करना चाहिए। अपमान करने से गर्भ का नाश गर्भ में विकृति उत्पन्न हो जाती है।
स्त्रियों का ऋतुकाल-
जीव की उत्पति के गर्भोत्पति कहा जाता हे। गर्भरूप जीव ऋतुस्नाता स्त्री के आश्रय में रहता है। ऋतु स्नान से पर्व स्त्री ( रजस्वला ) कहलाती है। प्रायः बारह वर्ष ही अवस्था से प्रारम्भ होकर पचास वर्ष पर्यन्त प्रतिमास -चन्द्रमास के अनुसार 27-28 दिन पर- स्त्री के गर्भाशय से स्वभाव ही आर्तव या रजका स्राव हुआ करता है। और आर्तवस्राव के प्रथम दिन से सोलह रात्रियों को ऋतुकाल माना जाता है। और इनमें निषिद्धेतर काल ही गर्भाधान योग्य माना जाता है। रजस्वला स्त्री के लिए शास्त्रो में विशिष्ट नियम प्रतिपादित है। उनकी अवहेलना से गर्भ में दोष-विकार आ जाते है। स्त्रियों के गर्भधारण की योग्यता काल ऋतुकाल कहलाता है।
रजोदर्शन के दिन से सोलह रात्रियां दिन-रात स्त्रियो का स्वभाविक ऋतुकाल है। उनमें रजोधर्म ( मासिक धर्म ) के चार दिन निन्दित दिन-रात काल भी सम्मिलत होता है। उन सोलह रात्रियों में प्रथम चार ,ग्यारहवी और तेरहवी रात्रियां अर्थात छ : रात्रियां स्त्री के साथ सहवास के लिए निन्दित है तथा शेष 10 रात्रियां श्रेष्ठ मानी गयी है।
पुत्रोत्पति काल-
जैसा कि ऊपर बताया गया है। उन दस श्रेष्ठ रात्रियों में से युग्म ( सम ) अर्थात ऋतुकाल के प्रारंम्भ होने के दिन से -छठी ,आठवी ,दसवी , बारहवी ,चौदहवी तथा सोलहवी रात्रियों में स्त्रीयों के साथ सहवास करने से पुत्रोत्पति होता है।
पुत्री ( लक्ष्मी ) उत्पति काल-
जैसा कि ऊपर बताया गया है। उन दस श्रेष्ठ रात्रियों में से विषम रात्रियों में अर्थात ऋतुकाल के प्रारम्भ होने के दिन से - पाचवीं ,सातवीं ,नवी पन्द्रहवी रात्रियां स्त्रीयो के साथ सहवास करने से कन्या की उत्पति होती है।
ऋतुस्नाता स्त्री के कर्तव्य-
शास्त्रो के अनुसार लिखा है जो कि वैज्ञानिक रीति से भी प्रमाणित है। ऋतु स्नान के अनन्तर स्त्री प्रथम जिसे देखती है। उसी का संस्कार उसके चित्त पर पड जाता है। ऋतुमती स्त्री का चित्त उन दिनो में ठीक फोटो लेने वाले कैमरे के सदृश हो जाता है। यही वह प्रमुख कारण है कि स्नान के अनन्तर सर्वप्रथम ऋतुस्नाता स्त्री के लिए पतिदर्शन ही आवश्यक है। गर्भ उत्पति के समय स्त्री का मन जिस किसी प्राणी के तरफ आकृष्ट होता है , ठीक उसी प्राणी के सदृश संनतान को स्त्री उत्पन्न करती है।
रजस्वला स्त्री के साथ सहवास निषेध-
काम वेग से अत्यन्त उद्विग्न होने पर भी रजस्वला स्त्री के साथ कदापि सहवास नही करना चाहिए। इतना ही नही उसके साथ एक आसन पर न तो बेठना चाहिए और न ही एक साथ शयन करना चाहिए। रजोधर्म वाली स्त्री के साथ सहवास करने से पुरूष की बुद्धि , तेज , बल , नेत्र और आयु क्षीण हो जाता है। तथा रजस्वला स्त्री के साथ सहवास करने से ब्रम्ह हत्या लगती है। और ऐसा व्यक्ति नरक का भागी होता है।
रजस्वला स्त्री के पालनीय नियम और उनके वैज्ञानिक रहस्य
रजस्वला नारी के लिए कतिपय धार्मिक पालन आवश्यक माना जाता है। क्योकि इनका सम्बन्ध प्रकृति नियमो के साथ जुडा हुआ होता है। रजस्वला के लिए विहित नियमो का परिपालन ऋतुमती स्त्री और उसकी सन्तति के शरीर,इन्द्रिय,मन और बुद्धि तथा स्वास्थ्य का प्रबल एंव प्रथम कारण होता है। रजस्वला अवस्था में ऋतुमति स्त्री के लिए विहित एकान्तवास ब्रम्हचर्य-पालन , अंजननिषेध , उसके साथ भाषण , सह-शयन , सह-आसन तथा उसके स्पर्श आदि के निषेध का रहस्य बताया गया है।
रजस्वला स्त्री के नियम
रजस्वला नारी को जिन-जिन नियमो का पालन अपनी संन्तति तथा अन्यों की स्वास्थ्य-रक्षा के लिए परम आवश्यक होता है।
स्त्रियों का ऋतुकाल-
जीव की उत्पति के गर्भोत्पति कहा जाता हे। गर्भरूप जीव ऋतुस्नाता स्त्री के आश्रय में रहता है। ऋतु स्नान से पर्व स्त्री ( रजस्वला ) कहलाती है। प्रायः बारह वर्ष ही अवस्था से प्रारम्भ होकर पचास वर्ष पर्यन्त प्रतिमास -चन्द्रमास के अनुसार 27-28 दिन पर- स्त्री के गर्भाशय से स्वभाव ही आर्तव या रजका स्राव हुआ करता है। और आर्तवस्राव के प्रथम दिन से सोलह रात्रियों को ऋतुकाल माना जाता है। और इनमें निषिद्धेतर काल ही गर्भाधान योग्य माना जाता है। रजस्वला स्त्री के लिए शास्त्रो में विशिष्ट नियम प्रतिपादित है। उनकी अवहेलना से गर्भ में दोष-विकार आ जाते है। स्त्रियों के गर्भधारण की योग्यता काल ऋतुकाल कहलाता है।
रजोदर्शन के दिन से सोलह रात्रियां दिन-रात स्त्रियो का स्वभाविक ऋतुकाल है। उनमें रजोधर्म ( मासिक धर्म ) के चार दिन निन्दित दिन-रात काल भी सम्मिलत होता है। उन सोलह रात्रियों में प्रथम चार ,ग्यारहवी और तेरहवी रात्रियां अर्थात छ : रात्रियां स्त्री के साथ सहवास के लिए निन्दित है तथा शेष 10 रात्रियां श्रेष्ठ मानी गयी है।
पुत्रोत्पति काल-
जैसा कि ऊपर बताया गया है। उन दस श्रेष्ठ रात्रियों में से युग्म ( सम ) अर्थात ऋतुकाल के प्रारंम्भ होने के दिन से -छठी ,आठवी ,दसवी , बारहवी ,चौदहवी तथा सोलहवी रात्रियों में स्त्रीयों के साथ सहवास करने से पुत्रोत्पति होता है।
पुत्री ( लक्ष्मी ) उत्पति काल-
जैसा कि ऊपर बताया गया है। उन दस श्रेष्ठ रात्रियों में से विषम रात्रियों में अर्थात ऋतुकाल के प्रारम्भ होने के दिन से - पाचवीं ,सातवीं ,नवी पन्द्रहवी रात्रियां स्त्रीयो के साथ सहवास करने से कन्या की उत्पति होती है।
ऋतुस्नाता स्त्री के कर्तव्य-
शास्त्रो के अनुसार लिखा है जो कि वैज्ञानिक रीति से भी प्रमाणित है। ऋतु स्नान के अनन्तर स्त्री प्रथम जिसे देखती है। उसी का संस्कार उसके चित्त पर पड जाता है। ऋतुमती स्त्री का चित्त उन दिनो में ठीक फोटो लेने वाले कैमरे के सदृश हो जाता है। यही वह प्रमुख कारण है कि स्नान के अनन्तर सर्वप्रथम ऋतुस्नाता स्त्री के लिए पतिदर्शन ही आवश्यक है। गर्भ उत्पति के समय स्त्री का मन जिस किसी प्राणी के तरफ आकृष्ट होता है , ठीक उसी प्राणी के सदृश संनतान को स्त्री उत्पन्न करती है।
रजस्वला स्त्री के साथ सहवास निषेध-
काम वेग से अत्यन्त उद्विग्न होने पर भी रजस्वला स्त्री के साथ कदापि सहवास नही करना चाहिए। इतना ही नही उसके साथ एक आसन पर न तो बेठना चाहिए और न ही एक साथ शयन करना चाहिए। रजोधर्म वाली स्त्री के साथ सहवास करने से पुरूष की बुद्धि , तेज , बल , नेत्र और आयु क्षीण हो जाता है। तथा रजस्वला स्त्री के साथ सहवास करने से ब्रम्ह हत्या लगती है। और ऐसा व्यक्ति नरक का भागी होता है।
रजस्वला स्त्री के पालनीय नियम और उनके वैज्ञानिक रहस्य
रजस्वला नारी के लिए कतिपय धार्मिक पालन आवश्यक माना जाता है। क्योकि इनका सम्बन्ध प्रकृति नियमो के साथ जुडा हुआ होता है। रजस्वला के लिए विहित नियमो का परिपालन ऋतुमती स्त्री और उसकी सन्तति के शरीर,इन्द्रिय,मन और बुद्धि तथा स्वास्थ्य का प्रबल एंव प्रथम कारण होता है। रजस्वला अवस्था में ऋतुमति स्त्री के लिए विहित एकान्तवास ब्रम्हचर्य-पालन , अंजननिषेध , उसके साथ भाषण , सह-शयन , सह-आसन तथा उसके स्पर्श आदि के निषेध का रहस्य बताया गया है।
रजस्वला स्त्री के नियम
रजस्वला नारी को जिन-जिन नियमो का पालन अपनी संन्तति तथा अन्यों की स्वास्थ्य-रक्षा के लिए परम आवश्यक होता है।
01-एकान्तवास , ब्रम्चर्यपालन , स्नान का त्याग , शरीर पर तैलाभ्यंगवर्जन , भूमि रेखा न खीचना , अंजन का त्याग , दन्तधावन-त्याग,नख न काटना , वस्तुओ के छेदन-भेदन का त्याग , रस्सी न गुथना , पर्णपात्र से जल न पीना , अन्य से भाषण न करना , छोटे से पात्र से जल न पीना , भूमि पर शयन , पुण्य श्लोको मानवो का स्मरण करना , अमंगल एंव बीभत्स पदार्थे का चिन्तन न करना , पुण्य ग्रन्थो में उल्लेखित दयावीर , दानवीर , क्षमावीर , धर्मवीर एंव सीता , सावित्री , अनुसूइया आदि महासति के चरित्रो का स्मरण करना चाहिए। अर्थ-जो रजस्वला नारी स्नान करती है उसकी सन्तान जलमग्न होकर मर जाती है। जो रजस्वला नारी तेल मर्दन करती है उसकी संन्तान चर्मविकार रोगो से ग्रस्त हो जाता है। जो रजस्वला नारी भूमि पर लेखन करती है उसकी सन्तान खलवाट गंजी होता है। जो रजस्वला नारी नेत्रो में अंजन लगाती है उसका पुत्र अथवा पुत्री काना या कानी होती है। जो रजस्वला नारी दन्तधावन करती है उसकी सन्तान काले दांतो वाले होते है। जो रजस्वला नारी जीवहिंसा करती है उसका पुत्र नपुसंक होता है। जो रजस्वला नारी रस्सी बाधती है उसका पुत्र दूसरो को फंसाने वाला उत्पन्न होता है। जो रजस्वला नारी पर्णमय पात्र से जल पीती है उसका पुत्र-पुत्री उन्मक्त पागल होता है। जो रजस्वला नारी छोटे पात्रो से जल पीती है उसका पुत्र-पुत्री छोटे कद काठी के होते हे। अतः तीन रात्रियां तक उक्त व्रतो का पालन सुलक्षण सन्तान उत्पन्न करने और उसकी रक्षा तथा सुसंस्कारो के लिए आवश्यक है।
गर्भावस्था में जीव की प्रतिज्ञा
गर्भावस्था में मातृ कुक्षि में पडा हुआ जीव अनेक कष्टो के भोगता है। किंतु उसे अपने पूर्व जन्मो की स्मृति याद रहती है तथा उसे अपने शुभा-शुभ कर्मो का संम्पूर्ण ज्ञान रहता है। गर्भवास के कष्टो को भोगता हुआ वह ईश्वर से बारम्बार प्रार्थना करता है कि हे प्रभो ! यदि मुझे यहां सं मुक्ति मिली तो मै आपके चरणो में शरण-ग्रहण करूगां। तदन्तर वह योनिद्वार को प्राप्त होकर यन्त्र में दबाया जाकर बडे कष्ट से जन्म को ग्रहण करता है। बाहर निकलते ही वह वैष्णवी वायु यानि की माया के स्पर्श से वह अपने पिछले जन्म और मृत्युओं को भूल जाता है और शुभा-शुभ कर्म भी उसके सामने से हट जाता है। प्रत्तेक जीव जैसा इस संसार में कर्म करता है अपितु उसे फल भी उसी किये गये कर्मो के अनुसार प्राप्त होते हे। प्रत्तेक जीव इस संसार में जन्म और मरण के चक्कर में फंसा होता है। इस जन्म-मरण के बन्धनो से मुक्ति को ही मोक्ष कहते है। यदि जीव चाहे तो वह ईश्वर से अगाध प्रेम कर इस जन्म मरण के बन्धनो से हमेशा के लिए मुक्त हो मोक्ष को प्राप्ति कर सकता है।
।। श्रीवास्तव सरिता ।।


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