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गोण्डा-पीडी बांध व उसके बगल पीडब्ल्यूडी की वेशकीमती सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा बरकरार,जिम्मेदार मौन

 


-अफसरों की 'नोटिस वाली खानापूर्ति' से अवैध कब्जेदारों के हौंसले बुलंद

-उच्चस्तरीय जांच में मिलीभगत उजागर होने के बाद भी सिंचाई विभाग व पीब्ल्यूडी के जिम्मेदारों के विरूद्ध नहीं हुई कार्रवाई

गोण्डा। जिले के कर्नलगंज तहसील क्षेत्र को बाढ़ से बचाने वाला परसपुर- धौरहरा बांध दबंगों और रसूखदारों के निशाने पर है। आलम यह है कि जर्जर हो चुके इस बांध का अस्तित्व खत्म करने की साजिश चल रही है और जिम्मेदार विभाग कार्रवाई के नाम पर महज नोटिस जारी कर खानापूर्ति कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सिंचाई विभाग और लोकनिर्माण विभाग का अवैध कब्जेदारों को संरक्षण प्राप्त है,जिससे अभी तक अवैध कब्जा नहीं हट सका है।

बांध व उसके किनारे की भूमि पर ही बन गये अनेकों मकान-दुकान, हरे भरे पेड़ों को भी काटकर बिक्री

कर्नलगंज-परसपुर मार्ग पर पीडब्ल्यूडी व सिंचाई विभाग की करोड़ों की संयुक्त सरकारी जमीन तो कब्जाई ही गई, अब सरकारी बांध और उसके बगल की पीडब्ल्यूडी विभाग की सरकारी भूमि को भी नहीं बख्शा जा रहा। कर्नलगंज बस स्टॉप चौराहे से बाबागंज तक बांध व उसके बगल की वेशकीमती भूमि पर 100 से अधिक लोगों ने जबरिया कब्जा कर मकान और दुकानें बना ली हैं। कई जगह तो बांध को नष्ट कर ही उसका नामोनिशान मिटा दिया गया है। इसी के साथ ही उक्त बाँध पर लगे अनेकों हरे भरे पेड़ों को भी काटकर बिक्री कर लिया गया है और सरकार की लाखों रूपयों की सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाई गई है।

उच्चस्तरीय जांच में मिलीभगत, फिर भी कार्रवाई 'शून्य'

इस मुद्दे को कई बार उठाया गया। उच्चाधिकारियों के आदेश पर जांच भी हुई। जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि पीडब्ल्यूडी व सिंचाई विभाग बाढ़ कार्य खंड की मिलीभगत व अनदेखी से ही करोड़ों की सरकारी भूमि व बांध पर अवैध कब्जा हुआ है। रिपोर्ट शासन को भेजी जा चुकी है।

नोटिस की 'रस्म अदायगी', निर्माण जारी

सबसे गंभीर बात यह है कि जिम्मेदार विभागों ने अवैध कब्जेदारों को कार्रवाई व कब्जा हटाने के नाम पर कई बार नोटिस जारी कर मोहलत तो दी, लेकिन जमीन पर कार्रवाई शून्य रही। नोटिस की यह 'रस्म अदायगी' देख कब्जेदारों के हौसले और बुलंद हैं और अवैध निर्माण का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

अफसरों पर संरक्षण का सीधा आरोप

मामले में सिंचाई विभाग के बाढ़ कार्य खंड और पीडब्ल्यूडी के जिम्मेदार अधिकारियों पर अवैध कब्जेदारों को संरक्षण देने का सीधा आरोप लग रहा है। आरोप है कि अफसर जानबूझकर हीलाहवाली कर रहे हैं और सरकारी भूमि से कब्जा हटवाने के बजाय उसे बढ़ावा दे रहे हैं।

अगर अफसरों का यही रवैया रहा तो वह दिन दूर नहीं जब जर्जर धौरहरा बांध का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। ऐसे में गंभीर सवाल उठ रहे हैं कि जांच में मिलीभगत और कब्जा साबित होने के बाद भी ध्वस्तीकरण आदेश क्यों नहीं हुआ? नोटिस की अवधि खत्म होने के महीनों बाद भी जेसीबी क्यों नहीं चली? अवैध कब्जे पर कार्रवाई न करने वाले अफसरों की जिम्मेदारी कब तय होगी? वहीं करोड़ों की वेशकीमती सरकारी भूमि से अवैध कब्जा कब हटाया जायेगा?

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