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सन 1856 वीं क्रांति के प्रथम अग्रदूत शहीद फजल अली का 12 फरवरी को होगा शहीद दिवस

सन 1856 वीं क्रांति के प्रथम अग्रदूत शहीद फजल अली का 12 फरवरी को होगा शहीद दिवस
मोतीगंज गोंडा।। कहां गए वह लोग जो देश की आजादी के लिए अंग्रेजों का छक्का छुड़ाते हुए, हुए थे शहीद।आपको बताते चलें कि उत्तर प्रदेश के जनपद गोंडा के थाना मोतीगंज क्षेत्र के राजगढ़ मिर्जापुरवा निवासी फजल अली जो गोंडा नरेश महाराजा देवी बक्श सिंह के सिपहसालार (सेनापति) रहे और राजा देवी बक्श सिंह के सेनापति होते हुए 1897 के आजादी के क्रांति के प्रथम अग्रदूत फजल अली के लिए जैसे महान क्रांतिकारी पर यह बात सटीक बैठती है। कि सच्चे देशभक्त विचारक एवं चिंतक की तरह सोचे तो यह मानना पड़ेगा कि कहीं न कहीं किसी भी रूप में इतिहास लेखन में अक्षम त्रुटी हुई है जिसे नकारा नहीं जा सकता है।यह बात मोतीगंज क्षेत्र के ग्राम पंचायत गढ़ी मोतीगंज निवासी समाजसेवी एवं चित्रकार व लेखक जगदंबा प्रसाद गुप्ता वीर क्रांतिकारी शहीद फजल अली के घर राजगढ़ मिर्जापुरवा वहां के लोगों वास्तविक जानकारी हासिल की तो पता चला कि अभी उनके वंशज गांव में है चित्रकार जगदंबा प्रसाद गुप्त ने उनके वंशज से मुलाकात की तो उन्होंने फजल अली के बारे में विस्तार से बताया और जानकारी दिया। उस जानकारी के अनुसार चित्रकार ने उनका एक फोटो फ्रेम किया और उनके फोटो से फोटो दिखाकर जानकारी की तो बताया गया कि आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के छक्का छुड़ाते हुए 12 फरवरी अट्ठारह सौ सत्तावन को शहीद हुए हमारे परदादा फजल अली से चित्र बिल्कुल मिलती है! उनके वंशज ने कहा कि हमारे पूर्वज पर दादा ने अंग्रेजों का छक्का छुड़ाते हुए शहीद हुए थे हम उन्हीं परिवार में से हैं लेकिन शासन-प्रशासन की उपेक्षा के कारण आज तक मिर्जा पुरवा में न शहीद स्मारक बनाया गया न शासन प्रशासन द्वारा गांव तक आने जाने के लिए पक्के मार्ग या जनउपयोगी सुविधाएं भी नहीं मुहैया कराई गई। ऐसा लगता है कि हमारे परदादा का नाम इतिहास के पन्नों से गायब है जो देश की आजादी के लिए अंग्रेजों की लड़ाई में अंग्रेजों की छक्का छुड़ाते हुए शहीद हो गए थे। शताब्दी बीत गई यदि फजल अली के विषय में खोज की गई होती तो यह बताने की जरूरत नहीं थी कि यह महानायक कौन था श्री गुप्ता ने कहा कि प्रथम बार जब मैंने इसके विषय में सुना तो यह जिज्ञासा हुई और हमें बहुत खुशी भी हुई कि यह महानायक फजल अली हमारे जनपद वह हमारे ही क्षेत्र के निवासी थे जो बाजार के उत्तर दिशा पावनी मनोरमा नदी के किनारे मिर्जापुरवा गांव के हैं बगल में ही उद्दालक ऋषि की तपोभूमि प्राचीन बाजार राजगढ़ भी है तथा इसके कुछ ही दूरी पर जिगना कोर्ट महान क्रांतिकारी महाराजा देवी बक्श सिंह का किला भी है। उन्ही महाराजा देवी बक्श सिंह के फजल अली परम मित्र तथा विश्वास तथा सिपहसालार थे जो अट्ठारह सौ सत्तावन की क्रांति में अद्भुत योगदान दिया सन 18 सो 57 में अंग्रेजो के खिलाफ बगावत की आग पूरे देश में फैल चुकी है जिससे अवध प्रांत भी अछूता नहीं रहा क्रांत गतिविधियों में गोंडा तथा आसपास के जनपदों में अंग्रेजों की गीत दृष्टि लग चुकी थी जो गोंडा के महाराजा राजा देवी बक्श सिंह बहराइच जिले के चहलारी के राजा देवी बक्श सिंह तुलसीपुर जो इस समय बलरामपुर जिला देवीपाटन मंडल के अंतर्गत आता है मे तुलसीपुर राजा की दूसरी पत्नी रानी ईश्वरी देवी तथा अशरफपुर (मनकापुर) के राजा अशरफ बक्स यह सब लोग अंग्रेजो के खिलाफ एक हो गए थे और एकजुट होकर अंग्रेजों से लड़ाई लड़ रहे थे उस वक्त कर्नल ब्यालू गोंडा का कलेक्टर बना तथा कर्नल विंगफील्ड कमिश्नर बना जो जो क्रांतिकारी की सारी गतिविधियों पर पैनी निगाह रख रहा था लेकिन क्रांतिकारी अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोहियों की गतिविधिया पढ़ रही थी जिसे कुचलने के लिए कर्नल विंगफील्ड अपने सेना के साथ लखनऊ से प्रस्थान कर गोंडा के लिए चल दिया लेकिन इसकी भनक लगते ही तुलसीपुर जनपद बलरामपुर के राजा दान बहादुर सिंह ने अपनी सेना के साथ घाघरा घाट के इस पार मोर्चा लगा दिया बड़ी बड़ी नाव द्वारा घाघरा पार करके इस पार उतर कर अंग्रेजों से लड़ाई शुरू कर दी जब राजा तुलसीपुर लड़ाई में कमजोर पड़ने लगे जो अपने ही साथियों के गद्दारों द्वारा राजा दान बहादुर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए लेकिन इस शोक की लहर में उनकी पत्नी रानी ईश्वरी देवी जो दूसरी लक्ष्मीबाई भी कहीं गई लेकिन रानी ने बुद्धि से काम लिया और अपने विश्वासपात्र सिपाही को राजा देवी बक्श सिंह के पास भेजा और उनसे सहायता मांगी राजा देवी बक्श सिंह बिना देर किए ही अपने वीर योद्धाओं के साथ रानी की सहायता के लिए चल दिए। इधर फजल अली स्थित की नाजुकता को समझते हुए अपने भतीजे मीर कासिम के अलावा छह सैनिकों के साथ सकरौरा करनैलगंज सरयू नदी के तट पर पहुंच गए जहां पर अंग्रेजों की छावनी थी जगह-जगह अंग्रेजों के सैनिकों के तंबू लगे हुए थे मौका देख कर रात में फजल अली ने अंग्रेजों के तंबू में आग लगा दी और चारों तरफ आग ही आग फैल गई अंग्रेजों के सैनी निकलकर भागने लगे किधर फजल अली अपना काम करके सैनिकों को राप्ती नदी पार करके नदी के तट पर मोर्चा लगा दिया और सैनिकों के साथ लड़ाई के लिए डट गए विंगफील्ड जल्दी से जल्दी तुलसीपुर पहुंचकर अपना तुलसीपुर की राज पर कब्जा करना चाहता था लेकिन फजल अली के युद्ध नीत ने अंग्रेजों के सैनिकों को चैन से नहीं बैठने दिया महारानी तुलसीपुर के लिए इतना समय उनके लिए उस समय काफी था उस समय तुलसीपुर राज गोरखपुर के किनारे तक था रानी ईश्वरी देवी ने अपने आकूत संपत को घुंघट करके कोयला बादशाह होते हुए अपने सैनिकों के साथ नेपाल के तराई में चली गई अब फजल अली बिना विलंब किए अपने सैनिकों तथा भतीजे के साथ नेपाल की सीमा पर लगे बेहतनिया बाघ में एक विशाल पीपल के नीचे अपने सैनिकों के साथ विश्राम करने लगे तब तक गुप्तचर द्वारा पता लगाते हुए कमिश्नर विंगफील्ड वहां पहुंच गए और फजल अली को ललकारा फिर दोनों तरफ से गोली चल गई जिसमें कर्नल को गोली लगी और वही धराशाई हो गया ऐसा अचूक निशाना था फजल अली का फिर सैकड़ों अंग्रेज के सैनिकों को फजल अली के सैनिकों ने पकड़ लिया और अंग्रेजों के सैनिकों का सिर काटकर वहीं पर पीपल के पेड़ पर लटका दिया ब्रिटिश राज में यह समाचार पूरे देश तथा इंग्लैंड में तहलका मचाने लगा लोग सन्नाटे में आ गए यह अंग्रेजी सरकार के लिए शर्मनाक घटना थी बौखलाई अंग्रेजी सरकार ने फजल अली जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए ऐलान कर दिया गया अंततः 12 फरवरी अट्ठारह सौ सत्तावन को विशेष गुप्त चर के सहयोग से फजल अली को पकड़ लिया गया सजा-ए-मौत में तोप के मुंह के सामने बांधकर फजल अली उड़ा दिया गया फजल अली के शरीर के टुकड़े टुकड़े हो गए जब इसका सूचना परिजनों में पहुंचा परिजनों ने वहां पहुंचकर फजल अली के शरीर के टुकड़े को इकट्ठा कर जनपद गोंडा के मोतीगंज थाना क्षेत्र के मिर्जापुर गांव के कब्रिस्तान में दफन किया गया महान क्रांतिकारी दीवाना अमर हो गया ऐसे थे हमारे योद्धा फजल अली जिनका 12 फरवरी 2023 को बलिदान दिवस है फजल अली ने 10 फरवरी अट्ठारह सौ सत्तावन को कमिश्नर विंगफील्ड को गोली मारकर हत्या कर दी थी समाजसेवी धर्मवीर आर्य तथा कई स्थानीय नेताओं द्वारा कर्नलगंज का नाम बदलकर फजलगंज किए जाने की मांग कर रहे हैं जो क्रांतिवीर फजल अली के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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