आज पूरे संसार में चाय को पेय के रूप में सबसे अधिक प्रयोग किया जाता है। किसी से बातचीत का मन हो तो उसे 'चाय पर आमंत्रित किया जाता है। संक्षिप्त मुलाकात और बातचीत की यह विश्व प्रचलित प्रथा है-जो संसार के सभी देशों में एक समान प्रचलित है।
चाय की खोज के बारे में धारणा है कि ईसा से 2737 साल पहले एक दिन चीन के सम्राट शैन चुंग के सामने रखे गये पानी के प्याले में, कुछ सूखी पत्तियां आकर गिरी और पानी का रंग आकर्षक रूप से बदल गया। सम्राट शैन चुंग ने उत्सुकतावश आकर्षक रंग बदले उस गर्म पानी की चुस्की ली तो उसका स्वाद बेहद भाया। बस यहीं से चाय का सफर शुरू हो गया।
यह सदियों तक चीन में शाही घराने में ही चलन में रही। फिर बढ़ते-बढ़ते यह काबायली लोगों तक पहुंच गई। अधिकृत रूप से सन् 1815 में कुछ अंग्रेज पर्यटकों का ध्यान असम में उगने वाली चाय की झाड़ियों की ओर इस रूप में गया क्योंकि वहां के कबायली लोग उन झाड़ियों की पत्तियों को उबालकर पीते थे। पर्यटकों के उस दल ने भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड बैंटिक को उस स्वादयुक्त पत्ती व रंगयुक्त पानी की जानकारी दी।
लार्ड बैंटिक उसके स्वाद के कायल हो गये। काफी समय तक पर्यटकों से मंगाकर उस पत्ती की सम्भावना का निर्णय लिया। सन् 1835 ई० में असम में बाकायदा तौर पर चाय के बागान लगाकर चाय का उत्पादन किया और विश्व के बाजार में उसका विस्तार किया।
चीनी साहित्य में सन् 350 ई० से चाय पीने की परम्परा का उल्लेख मिलता है। कुछ यूरोपीय पर्यटकों ने यह भी दावा किया कि सन् 1610 ई० में डच व्यापारी चीन से चाय यूरोप ले गए थे-पर इसकी ठोस प्रमाणिकता नहीं। इसके प्रचार-प्रसार का श्रेय भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड बैंटिंक को ही प्रमाणिक रूप से दिया जाता है। इसमें दूध, चीनी का प्रयोग बाद में अधिक स्वादिष्ट बनाने के लिए होने लगा।

