श्रीमती जी ने, "सात जन्मों के बन्धन" के वैदिक विधान पर व्यंग किया, तो उनको इस सात जन्मों के बन्धन का वैदिक तथा #वैज्ञानिक तात्पर्य समझाया।
" पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नहीं होता " अर्थात वीवाहोपरांत कन्या अपने पति के गोत्र को स्वीकारती है, इस विषय को क्रमशः समझा जाए, तो हमे " गोत्र विज्ञान " को भली प्रकार समझना पड़ेगा।
ध्यान दीजिए, स्त्री में "xx गुणसूत्र " होते है, और पुरुष में " xy " होते है।
अब इनकी सन्तति जो उत्पन्न होगी वो,.... मान लीजए की पुत्र हुआ, अर्थात xy गुणसूत्र उत्पन्न हुआ, तो इस पुत्र में, y गुणसूत्र पिता से आया, और x गुणसूत्र माता से। अब, यदि पुत्री हुई होती तो ( xx गुणसूत्र ) होते तो यह गुणसूत्र पुत्री में माता व् पिता दोनों से आते।
जैसे :-- xx गुणसूत्र
xx गुणसूत्र अर्थात पुत्री !
( इस xx गुणसूत्र के जोड़े में, एक x गुणसूत्र पिता से आया तथा दूसरा x गुणसूत्र माता से आया है। ) इन दोनों गुणसूत्रों का संयोग एक गांठ सी रचना बना लेता है जिसे Crossover कहा जाता है।
अब xy गुणसूत्र अर्थात पुत्र !
पुत्र में y गुणसूत्र केवल पिता से ही आना संभव है क्यूँकी माता में y गुणसूत्र है ही नही, और दोनों गुणसूत्र अ-समान होने के कारन पूर्ण Crossover नही होता, केवल 5 % तक ही होता है, और 95 % y गुणसूत्र ज्यों का त्यों (intact) ही रहता है।
तो, महत्त्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ !
जो कि पिता से ही आता है। चूँकि y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत है, कि यह " पुत्र " में केवल पिता से ही आया है। बस , इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य है,.... जो, हजारों.. लाखों ... वर्षों पूर्व हमारे ऋषियों ने जान लिया था।
वैदिक गोत्र प्रणाली, गुणसूत्र पर आधारित है,। या "y" गुणसूत्र को ट्रेस करने का एक माध्यम है।
उदहारण के लिए यदि किसी व्यक्ति का गोत्र कश्यप है, तो उस व्यक्ति में विधमान y गुणसूत्र कश्यप ऋषि से आया है! या कश्यप ऋषि उस y गुणसूत्र के मूल है!
चूँकि y गुणसूत्र स्त्रियों में नही होता यही कारण है की विवाह के पश्चात स्त्रियों को उसके पति के गोत्र से जोड़ दिया जाता है। वैदिक - हिन्दू संस्कृति में एक ही गोत्र में विवाह वर्जित होने का मुख्य कारण भी यही है !!
एक ही गोत्र से होने के कारण वह पुरुष व् स्त्री भाई बहन माने जाते हैं,
अर्थात "सगोत्री" स्त्री पुरुष भाई बहन ही होंगे !! "इसका एक मुख्य कारण एक ही गोत्र होने के कारन गुणसूत्रों में समानता का है"
आज की आनुवंशिक विज्ञान के अनुसार, यदि सामान गुणसूत्रों वाले दो व्यक्तियों में विवाह हो, तो उनकी सन्तति आनुवंशिक विकारों के साथ उत्पन्न होगी !! ऐसे दंपत्तियों की संतान में किसी ना किसी प्रकार का अनुवांशिक दोष रहेगा।
विज्ञान द्वारा भी इस संबंध में यही बात कही गई है, कि सगौत्र शादी करने पर अधिकांश ऐसे दंपत्ति की संतानों में अनुवांशिक दोष, जैसे , मानसिक_विकलांगता, #अपंगता, जैसे और भी कई गंभीर रोग, जन्मजात ही पाए जाते हैं !
शास्त्रों के अनुसार, इन्हीं कारणों से सगौत्र विवाह पर प्रतिबंध लगाया गया था। गोत्र का संवहन यानी उत्तराधिकार, पुत्री को एक पिता प्रेषित न कर सके, इसलिये , विवाह से पहले #कन्यादान कराया जाता है , और " गोत्र मुक्त " कन्या का " पाणिग्रहण" कर के भावी वर, उसे अपने कुल गोत्र में, स्थान देता है। अब इनसे उत्पन्न संतति, यदि पुत्र है, तो, 95% पिता और 5% माता का सम्मिलन है ! यदि पुत्री है, तो 50% पिता, और 50% माता, का सम्मिलन है ! अब फिर, यदि पुत्री की पुत्री हुई, तो वह डीएनए 50% का 50% रह जायेगा, फिर यदि उसके भी पुत्री हुई तो उस 25% का 50% DNA रह जायेगा, इस तरह से सातवीं पीढ़ी में पुत्री जन्म में यह %, घटकर 1% रह जायेगा। अर्थात, एक पति-पत्नी का ही DNA सातवीं पीढ़ी तक पुनः पुनः जन्म लेता रहता है, पुत्री के रूप में, और यही " सात जन्मों का साथ " है।
प्रश्न : जब पुत्र होता है तब ?
तो पुत्र का गुणसूत्र, पिता के गुणसूत्रों का, 95% गुणों को अनुवांशिकी में ग्रहण करता है, और माता का 5% (जो कि कई परिस्थितियों में "१%" से कम भी हो सकता है) DNA ग्रहण करता है, और यही क्रम अनवरत चलता रहता है, जिस कारण पति और पत्नी के गुणों युक्त, DNA बारम्बार जन्म लेता रहता हैं, अर्थात यह
" जन्म जन्मांतर का साथ हो जाता" है।
( " कन्यादान" का अर्थ किसी वस्तु का भौतिक रूप से दान करना नहीं वरन् , इस दान का विधान इस निमित किया गया है , कि दूसरे कुल की कुलवधू बनने के लिये, और उस कुल की "कुल धात्री" बनने के लिये, उसे गोत्र मुक्त किया गया है।
DNA मुक्त नहीं ! क्योंकि भौतिक शरीर में, वे DNA तो रहेंगे ही, इसलिये "मायका" अर्थात माता का रिश्ता बना रहता है, गोत्र यानी "पिता" के गोत्र का त्याग किया जाता है।) तभी वह भावी वर को यह वचन देती है कि उसके कुल की मर्यादा का पालन करेगी, यानी उसके गोत्र और DNA को करप्ट नहीं होने देगी ! क्योंकि कन्या, विवाह के बाद पति के कुल वंश को रजदान करती है, यह "रजदान" भी कन्यादान के समकक्ष दान माना गया है जो पति को किया जाता है।


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