यह एक महत्तवपूर्ण औषधि है, जो कि आधुनिक दवाइयों और आयुर्वेदिक दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग की जाती है। इसकी जड़ें सुगन्धित होती हैं लेकिन स्वाद में कड़वी होती हैं। इसकी जड़ें विभिन्न प्रकार की दवाइयां बनाने के लिए प्रयोग की जाती हैं। सर्पगन्धा से तैयार दवाइयों को घाव, बुखार, पेट का दर्द, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, मिर्गी और पागल-पन के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है। यह एक झाड़ी वाला पौधा है, जिसकी औसतन ऊंचाई 0.3-1.6 मीटर है| इसके पत्ते लम्भाकार होते है, जिसकी लम्बाई 8-15 सैं.मी. होती हैं। इसके फूल सफेद या गुलाबी, फल जामुनी काले रंग के और जड़ें 0.5-3.6 सैं.मी. व्यास के होते हैं। सर्पगन्धा के मुख्य उत्पादक देश बर्मा, बंगलादेश, मलेशिया, श्री लंका, इंडोनेशिया और अंडेमान द्वीप आदि हैं। भारत में उत्तर प्रदेश सर्पगन्धा का मुख्य उत्पादक राज्य है।
सर्पगन्धा एक अत्यन्त उपयोगी पौधा है। यह 75 सेमी से 1 मीटर ऊचाई तक बढता है। इसकी जडे सिर्पिल तथा 0.5 से 2.5 सेमी व्यास तक होती हैं तथा 40 से 60 सेमी गहराई तक जमीन में जाती हैं। इसपर अप्रैल से नवम्बर तक लाल सफेद फूल गुच्छो मे लगते है। सर्पगंधा की जडों मे बहुत से एल्कलाईडस पाए जाते है जिनका प्रयोग रक्तचाप, अनिद्रा, उन्माद, हिस्टीरिया आदि रोगों के उपचार में होता है। इसका उपयोगी भाग जडें ही है। सर्पगंधा 18 माह की फसल है। इसे बलुई दोमट से लेकर काली मिट्टी मे उगाया जा सकता है।
सर्पगन्धा उगाने के लिए खेत की तैयारी:
जडों की अच्छी वृद्धि के लिए मई माह में खेत की गहरी जुताई करें तथा खेत को कुछ समय के लिए खाली छोड दें। पहली वर्षा के बाद खेत में 10-15 गाडी प्रति हैक्टेयर के हिसाब से गोबर की डालकर फिर से जुताई कर दें। पटेला से खेत एकसार करने के बाद उचित नाप की क्यारियॉ तथा पानी देने के लिए नालियां बना दें। सर्पगंधा को बीजों के द्वारा अथवा जड, स्टम्प या तने की कटिगं द्वारा उगाया जाता है। सामान्य पी एच वाली जमीन से अच्छी उपज प्राप्त होती है।
सर्पगन्धा की बीज द्वारा बुआई:
अच्छे जीवित बीजों को छिटक कर बाया जा सकता है। अच्छे बीजों के चुनाव के लिए उन्हें पानी में भिगो कर भरी बीज (जो पानी में बैठ जाऐं) तथा हल्के बीजों को अलग कर दिया जाता है। भारी बीजों को बोने के लिए 24 घंटे बाद प्रयोग करते हैं। सर्पगंधा के 30 से 40 प्रतिशत बीज ही उगते हैं इसलिए एक हैक्टेयर मे करीब 6-8 किलो बीज की आवश्यकता होती है। इसका बीज काफी महंगा होता है अत: पहले नर्सरी बनाकर पौध तैयार करना चाहिए। इसके लिए मई के पहले सप्ताह मे 10 गुणा 10 मीटर की क्यारीयों मे पकी गोबर की खाद डालकर छायादार स्थान पर पौध तैयार करनी चाहिए। बीजों को 2 से 3 सेमी जमीन के नीचे लगाकर पानी लगाते हैं। 20 स 40 दिन के अन्दर बीज उपजना शुरू हो जाते है। मध्य जुलाई मे पौधे खेतो में रोपण के लिए तैयार हो जाते हैं।
सर्पगन्धा की जडों द्वारा बुआई:
लगभग 5 सेमी जड कटिंग को फार्म खाद (FYM) मिट्टी व रेत मिलाकर बनाई गई क्यारियों में बसंत ऋतू में लगायी जाती हैं इसे उच्ति मात्रा में पानी लगा कर नम रखा जाता है। जीन स्म्ताह में जडों से किल्ल्े फूटने लगते हैं। इनको 45X30 सेमी दूरी पर रोपित किया जाता है। एक हैक्टेयर के लिए लगभग 100 किग्रा जड कटिंग की आवश्यकता होती है।
सर्पगन्धा की तने द्वारा बुआई:
तना कटिंग 15 से 22 सेमी को जून माह में नर्सरी में लगाते हैं। जब जडें व पत्तियां निकल आए तथा उनमें अच्छी वृद्धि होने लगे तो कटिंग को निकालकर खेतों में लगाया जा सकता है।
सर्पगन्धा में खाद तथा सिचाई:
करीब 20 से 25 टन कम्पोस्ट खाद प्रति हैक्टेयर से अच्छी उपज प्राप्त होती है। वर्षा के दिनों में कम पानी तथा गर्मियों में 20 से 30 दिन के अन्तर से पानी लगाना चाहिए।
खरपतवार नियंत्रण
खेत को नदीन मुक्त करने के लिए हर गोडाई के बाद निराई करें। शुरूआती समय, जैसे पहले वर्ष में दो निराई और दूसरे वर्ष में पौधे के विकास के समय गोडाई के बाद एक निराई करें। अगर शुरूआती समय में फूल निकलने शुरू हो जायें तो जड़ों के विकास के लिए फूलों को शिखर से काट दें|
हानिकारक कीट और रोकथाम
छोटे पंखों वाली सुंडी : यह ग्लाइफोड्ज़ वर्टमनैलज़ के कारण होती है। इससे पत्ते मुड़ जाते हैं और झड़ जाते हैं। यह हरे पत्तों को अपना भोजन बनाती है जिससे पत्तों का बहुत नुकसान होता है। इसकी रोकथाम के लिए रोगोर 0.2 % की स्प्रे करें।
सफेद सुंडी: यह एनोमला पोलीटा के कारण होती हैं। यह नए पौधों पर हमला करती हैं जिससे यह सूख जाते हैं।
इसकी रोकथाम के लिए खेत की तैयारी के समय फोरेट ग्रैनुलस को मिट्टी में अच्छी तरह मिलायें।
बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर धब्बा रोग: इस बीमारी से पत्तों की ऊपरी और निचली सतह पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। पत्ता पहले पीले रंग का हो जाता है फिर सूख कर गिर जाता है। इसकी रोकथाम के लिए डाइथेन एम-45 @400 ग्राम को 150 लीटर पानी में मिलाकर महीने के अंतराल पर नवंबर तक डालें|
जड़ गलन: यह कीट मैलोएडोगाइन इनकोगनीटा और मैलोएडोगाइन हाप्ला के कारण होते हैं। इससे विकास कम और पत्ते के आकार में कमी आती है। इसकी रोकथाम के लिए 3 जी कार्बोफिउरॉन 10 किलो या 10 जी फोरेट ग्रैनुलस 5 किलो प्रति एकड़ में डालें।
गहरे भूरे धब्बे: इससे पत्तों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए ब्लीटॉक्स 30 ग्राम को 10 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करें।
फसल प्रबन्धन:
सर्पगंधा की फसल 18 महीने में तैयार हो जाती है। जडों को सावधानी से खोदकर निकाला जाता है। बडी व मोटी जडों को अलग तथा पतली जडों को अलग करतें हैं तथा पानी से धोकर मिट्टी साफ करनी चाहिए। फिर 12 से 15 सेंमी के टुकडे काटकर सुखा दें। सूखी जडों को पॉलिथीन की थैलियों में सुरक्षित रखा जाता है।
सर्पगन्धा की उपज व आय:
अन्दाजन एक एकड से 7-9 क्विंटल शुष्क जडें प्राप्त हो जाती है। सूखी जडों का बाजार भाव लगभग 150 रूपये प्रति किलो है। चूकि यह जगलों से तेजी से विलुप्त हो रही है तथा इसका प्रयोग बढ रहा है अत: इसके बाजार भाव में लगातार तेजी की उम्मीद है।

