भारतीय उपमहाद्वीप के प्रागितिहास में, एक "लौह युग" को स्वर्गीय हड़प्पा (कब्रिस्तान एच) संस्कृति के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी गई है। वर्तमान उत्तरी भारत की मुख्य लौह युग की पुरातात्विक संस्कृतियां पेंटेड ग्रे वेयर कल्चर (१३०० से ३०० ईसा पूर्व) और उत्तरी ब्लैक पॉलिश्ड वेयर (७०० से २०० ईसा पूर्व) हैं। यह वैदिक काल के जनपदों या रियासतों के सोलह महाजनपदों या प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के क्षेत्र-राज्यों के संक्रमण से मेल खाता है, जो इस अवधि के अंत में मौर्य साम्राज्य के उद्भव में परिणत होता है।
लोहे के गलाने का सबसे पहला प्रमाण लौह युग के उद्भव से पहले कई शताब्दियों तक उचित है
पुरातत्वविदों की एक टीम ने 2015 में तेलंगाना में छोटे चाकू सहित कई लोहे की कलाकृतियों की खोज की, जो 1,800 ईसा पूर्व से 2,400 ईसा पूर्व की हैं। इन लौह कलाकृतियों का परीक्षण राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई) में किया गया था।
आर. तिवारी (२००३) उत्तर प्रदेश में रेडियोकार्बन दिनांकित लोहे की कलाकृतियाँ, जिनमें भट्टियाँ, ट्यूयर और सी के बीच स्लैग शामिल हैं। 1800 और 1000 ईसा पूर्व। मध्य गंगा के मैदान और पूर्वी विंध्य में दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व से लोहे का उपयोग और लोहे का काम प्रचलित था। लोहे के उपयोग की शुरुआत पारंपरिक रूप से बाद के वैदिक लोगों के पूर्व की ओर प्रवास से जुड़ी हुई है, जिन्हें एक एजेंसी के रूप में भी माना जाता है जिसने विशेष रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में भौतिक संस्कृति में क्रांति ला दी। विद्वान राकेश तिवारी कहते हैं कि नई खोज और उनकी तिथियां एक नई समीक्षा की आवश्यकता का सुझाव देती हैं। उनके अनुसार, साक्ष्य देश के अन्य क्षेत्रों में लोहे के शुरुआती उपयोग की पुष्टि करते हैं, और इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत वास्तव में लोहे के कामकाज के विकास के लिए एक स्वतंत्र केंद्र था।
दक्षिण भारत में सबसे पहले लौह युग के स्थल हल्लूर, कर्नाटक और आदिचनल्लूर, तमिलनाडु लगभग 1000 ईसा पूर्व में हैं। नागपुर के पास महूरझारी एक बड़ा मनका निर्माण स्थल था।
लौह युग उस काल -
जिसमें मनुष्य ने लोहे का उपयोग किया। इतिहास में यह युग 'पाषाण युग' तथा 'कांस्य युग' के बाद का काल है। लौहा सिर्फ कार, पुल या अन्य चीजों में ही इस्तेमाल नहीं किया जाता है, ये हमारे अस्तित्व के लिए महत्वपूर्ण है। ये हमारे हीमोग्लोबिन का एक महत्वपूर्ण घटक है जो रक्त को लाल रंग प्रदान करता है। सिर्फ हमें ही नहीं इसकी जरूरत पौधों को भी होती है। 18वीं शताब्दी की शुरुआत में फ्रांसीसी रसायनज्ञ और चिकित्सक निकोलस लेमरी ने जली हुई घास की राख में लोहे की खोज की। बाद में यह पाया गया कि यह तत्व सभी पौधों की संरचना का महत्वपूर्ण घटक है क्योंकि यह क्लोरोफिल के गठन के लिए आवश्यक है और ये श्वसन एंजाइमों (anzyms) में मौजूद होता है तथा पौधों की श्वसन दर पर काफी प्रभाव डालता है।
सदियों और सहस्राब्दी से मनुष्य, लोहे का उपायोग करते आ रहे है। प्राचीन काल में तो लोग सोने से अधिक लोहे का भण्डार करते थे। उस समय में केवल सबसे कुलीन वर्ग ही लोहे से बनी चीजें पहन सकते थे जो अक्सर सोने में गुटे हुए होते थे। प्राचीन रोम में भी शादी के छल्ले लोहे के बने होते थे। समय के साथ, जैसे जैसे धातु विज्ञान विकसित हुआ, लोहा सस्ता और अधिक उपलब्ध होता गया। माना जाता है कि लौहे के रूप में मनुष्य ने जिस धातु का उपयोग किया था वो पृथ्वी से उत्पन्न लौहा नहीं था दरअसल वो पृथ्वी से टकराने वाले उल्कापिंडों से प्राप्त लोहा था। उल्कापिंड संबंधी लोहे से काम करना तुलनात्मक रूप से आसान था, और लोगों ने इससे आदिम उपकरण बनाना सीखा।
पहले के समय में 90% लोहे से युक्त हजारों टन उल्का पदार्थ हर साल पृथ्वी की सतह से टकराते थे। सबसे भारी लोहे के उल्कापिंड में से एक "होबा" उल्कापिंड है जो प्राचीन काल में गिर गया था, इसका वजन लगभग 60 टन था। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिकियों ने उल्कापिंड में सबसे अधिक रुचि दिखाई, क्योंकि एक ऐसी अफवाहें फैली हुई थीं कि उल्का पिंडों में प्लैटिनम भी पाया जाता है। यहां तक की उस समय उल्का के औद्योगिक दोहन को व्यवस्थित करने के लिए एक शेयरधारक कंपनी की भी स्थापना की गई थी। परंतु उल्कापिंड से लाभान्वित होना मुश्किल साबित हुआ क्योंकि उल्कापिंड की कठोरता के कारण हीरे की ड्रिल टूट गई और इसके नमूनों में प्लैटिनम भी नहीं पाया गया।
समय के साथ साथ लोहे की जरूरत बढ़ रही थी और उल्कापिंड हमेशा तो गिरते नहीं थे जिससे की लोहे की कमी को पूरा किया जा सके। इसी कमी को पूरा करने के लिये लौहे को अयस्कों से निकालने का प्रयास किया गया और आखिरकार वह समय आ गया जब कांस्य युग ने लौह युग को जन्म दिया। लौहा पृथ्वी पर सबसे व्यापक रूप से वितरित तत्वों में से एक है, यह पृथ्वी की भू-पर्पटी में लगभग 5% या 755,000,000,000,000,000 टन हैं। मुख्य लौह अयस्क खनिज मैग्नेटाइट, लौह स्टोन, भूरा हेमाटाइट और सिडेराईट हैं। मैग्नेटाइट में 72% तक लोहा होता है। लाल हेमाटाइट में लगभग 70% लोहा होता है और इसका नाम ग्रीक "हेमा" से लिया गया है जिसका अर्थ "रक्त" है। शुरूआत में अयस्क से लौह निकालने की तकनीक ज्यादा विकसित नहीं थी परंतु वक्त के साथ इसमें कई सुधार होते गये। धीरे- धीरे लौहे की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी बढ़ने लगी और उस समय यूराल का लोहा बहुत मूल्यवान था।
समय के साथ लोहे की मांग को पूरा करने के लिये कई अयस्क भंडारों की खोज की गई। 19वीं शताब्दी के अंत तक प्रौद्योगिकी में लोहे का उपयोग अत्याधिक देखा गया, 1778 में पहला लोहे का पुल बनाया गया था, 1788 में पहली लोहे की पाइप लाइनें बिछाई गईं, 1818 में पहला लोहे का जहाज लॉन्च किया गया था, और पहला लौहे का रेलमार्ग 1825 में ब्रिटैन में चालू किया गया था। इस प्रकार ना जाने कितने उपकरण तैयार किये गये थे। परंतु बाद में देखा गया की लोहे पर जंग लगने से लोहा खराब होने लगा है। कई टन लौहा जंग की वजह से खराब भी हो गया था। तब शोधकर्ता इससे बचने के उपाय खोजने गये और इस बारे में भी जानने की कोशिश की प्राचीन काल में जंग की समस्या से कैसे लोग बचते थे।
लोहे के लेखों पर जंग लगने से बचाने के लिए टिन की कोटिंग का उल्लेख यूनानी इतिहासकार हेरोडोटस (5वीं शताब्दी ईसा पूर्व) के कार्यों में मिलता है। भारत में भी जंग का मुकाबला करने के 1600 वर्षों से कई उपाय अपनाये जाते आ रहे है। शुरुआती दिनों में भी भारतीय कारीगरों को पता था कि जंग से कैसे निपटना है। इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण है भारत की राजधानी में गुप्त वंश के राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय द्वारा बनवाया गया एक लौह स्तम्भ जो 1600 वर्ष से अधिक पुराना है, ये जंगरोधी स्तम्भ है इस पर आज तक जंग नहीं लगी है।
यदि भारत में लौह युग की बात की जाये तो भारतीय उपमहाद्वीप की प्रागितिहास में, लौह युग की शुरूआत अंतिम हड़प्पा संस्कृति के काल से हुई थी। वर्तमान में यहां उत्तरी भारत के मुख्य लौह युग की पुरातात्विक संस्कृतियां: गेरूए रंग के बर्तनों की संस्कृति (1200 से 600 ईसा पूर्व) और उत्तरी काले रंग के तराशे बर्तन की संस्कृति (700 से 200 ईसा पूर्व) में देखी जा सकती हैं। लोहे के गलाने का सबसे पहला प्रमाण कई सदियों से लौह युग के उद्भव को दर्शाता है। पुराने समय में भारत दुनिया भर में अपने स्टील के सामान के लिए प्रसिद्ध था। रेडियो कार्बन तिथियों के आधार पर उत्तर भारत में लोहे का प्रारम्भ 1800 और 1000 ईसा पूर्व तथा दक्षिण भारत में 1000 ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है।
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