भारत में तोप के उपयोग का सर्वप्रथम वर्णन बाबर द्वारा मिलता है, जिसे उसने पानीपत की लड़ाई में (सन् 1526 ई० में) इब्राहीम लोदी के विरुद्ध इस्तेमाल करके उसे युद्ध में हराया था।
बाबर से पूर्व तोपें यूरोप में सन् 1313 ई० में ढलने लगी थीं। इसका भी पक्का लिखित प्रकरण, युद्ध के इतिहास विवरणों में मिलता है। मिलने वाले विवरणों में यह बात भी सामने आती है कि पहले तो कांसे की बनती थीं और उनको ढाला जाता था। परन्तु ऐसी तोपें पर्याप्त पुष्ट नहीं होती थीं। उनमें अधिक बारूद डालने से वे फट जाती थीं।
इस दोष को दूर करने के लिए उनके ऊपर लोहे के छल्ले तप्त करके खूब कसकर चढ़ा दिए जाते थे। ठंडा होने पर ऐसे छल्ले सिकुड़कर बड़ी दृढ़ता से भीतरी नाल को दबाए रहते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे बैलगाड़ी के पहिए के ऊपर चढ़ी हाल पहिए को दबाए रहती है। अधिक पुष्टता के लिए छल्ले चढ़ाने के पहले नाल पर लंबाई के हिसाब से लोहे की छड़ें एक-दूसरी से सटाकर रख दी जाती थीं।
उस समय की एक प्रसिद्ध तोप मॉन्स मेग है, जो अब एडिनबरा के दुर्ग पर शोभा के लिए रखी है। इसके बाद लगभग 200 वर्षों तक तोप बनाने में कोई विशेष उन्नति नहीं हुई। इस युग में नालों का संछिद्र (बोर) चिकना होता था। परन्तु लगभग सन् 1520 ई० में जर्मनी के एक तोप बनाने वाले ने संछिद्र में सर्पिलाकार खांचे बनाना आरंभ किया। इस तोप में गोलाकार गोले के बदले लंबोतर गोले प्रयुक्त होते थे। संछिद्र में सर्पिलाकार खांचों के कारण प्रक्षिप्त पिंड वेग से नाचने लगता है। इस प्रकार नाचता (घूर्णन करता) पिंड वायु के प्रतिरोध से बहुत कम विचलित होता है और परिणामस्वरूप लक्ष्य पर अधिक सटीकता से पड़ता है।
सन् 1855 ई० में लार्ड आर्मस्ट्रांग ने पिटवां लोहे की तोप का निर्माण किया, जिसमें पहले की तोपों की तरह मुंह की ओर से बारूद आदि भरी जाने के बदले पीछे की ओर से ढक्कन हटाकर यह सब सामग्री भरी जाती थी। इसमें 40 पाउंड के बारूदी गोले भरे जाते थे।
साधारण तोपों में गोला बड़े वेग से निकलता है और तोप की नाल को बहुत ऊंची दिशा में नहीं लाया जा सकता है। दूसरी ओर छोटी नाल की तोपें हल्की बनती हैं और उनसे निकले गोले में बहुत वेग नहीं होता, परन्तु इनमें यह गुण होता है कि गोला बहुत ऊपर उठकर नीचे गिरता है और इसलिए इससे दीवार, पहाड़ी आदि के पीछे छिपे शत्रु को भी मार सकते हैं। इन्हें मार्टर कहते हैं। मझोली नाप की नालवाली तोप को हाउविट्ज़र कहते हैं। जैसे-जैसे तोपों के बनाने में उन्नति हुई वैसे-वैसे मोर्टरों और हाउविट्ज़रों के बनाने में भी उन्नति हुई।
प्रायः सभी देशों में एक ही प्रकार से तोपों के निर्माण में उन्नति हुई। जब कोई एक देश अधिक भारी, अधिक शक्तिशाली या अधिक फुर्ती से गोला दागनेवाली तोप बनाता तो बात बहुत दिनों तक छिपी न रहती और प्रतिद्वंदी देशों की चेष्टा होती कि उससे भी अच्छी तोप बनाई जाये।
सन् 1898 ई० में फ्रांसवालों ने एक ऐसी तोप बनाई जो उसके बाद बनने वाली तोपों की पथ प्रदर्शक हुई। उससे निकले गोले का वेग अधिक था; उसका आरोपण सराहनीय था; दागने पर पूर्णतया स्थिर रहता था, क्योंकि आरोपण में ऐसे डैने लगे थे जो भूमि में घंसकर तोप को किसी दिश में हिलने न देते थे। सभी तो दागने पर पीछे हटती हैं। इस धक्के (रि-कॉयल) के वेग को घटाने के लिए द्रवों का प्रयोग किया गया था। इसके गोले पतली दीवार के बनाए थे। इनमें से प्रत्येक की तोल लगभग 12 पाउंड थी और उसमें लगभग साढ़े तीन पाउंड उच्च विस्फोटी बारूद रहती थी। गोले में विशेष रसायनों से युक्त एक टोपी भी रहती थी, जिससे लक्ष्य पर पहुंचकर गोला फट जाता था और टुकड़े बड़े वेग से इधर-उधर शत्रु को दूर तक घायल करते थे। यह दीवार के पीछे छिपे सैनिकों को भी मार सकती है।
प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918) में जर्मनों ने बिग बर्था नामक तोप बनाई, जिससे उन्होंने पेरिस पर 75 मील की दूरी से गोले बरसाना आरंभ किया। इस तोप में कोई नया सिद्धान्त नहीं था। तोप केवल पर्याप्त बड़ी और पुष्ट थी। हवाई जहाजों तथा अन्य नवीन यंत्रों के आविष्कार से ऐसी तोपें अब लुप्तप्राय हो गई हैं।

