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श्रीदुर्गासप्तश्लोकी

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शिव उवाच
देवी त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी।
कलौ हि कार्यसिद्धयर्थमुपायं ब्रूहि यत्रतः।।
शिवजी कहते है — हे देवि! तुम भक्तों के लिये सुलभ हो और समस्त कर्मों का विधान करने वाली हो। कलियुग मे कामनाओं की सिद्धि-हेतु यदि कोई उपाय हो तो उसे अपनी वाणी द्वारा सम्यक-रुप से व्यक्त करो।

देव्युवाच
शृणु देव प्रवक्ष्यमि कलौ सर्वैष्टसाधनम्।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते।।
देवी ने कहा — हे देव! आपका मेरे ऊपर बहुत स्नेह है। कलियुग मे समस्त कामनाओं को सिद्ध करने वाला जो साधन है वह बतलाऊँगी, सुनो! उसका नाम है 'अम्बास्तुति'।

ॐ अस्य श्रीदुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमहामन्त्रस्य नारायण ऋषिः,
अनुष्टुपादीनि छन्दांसि श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः,
श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थे सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः।
ॐ इस दुर्गासप्तश्लोकी स्त्रोतमन्त्र के नारायण ॠषि हैं, अनुष्टुप छन्द है, श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता है, श्रीदुर्गा की प्रसन्नता के लिये सप्तश्लोकी दुर्गा पाठ मे इसका विनियोग किया जाता है।

ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवि भगवती हि सा।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति॥१॥
ॐ वे भगवती माहामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बल पुर्वक खींचकर मोह मे डाल देती है॥1॥

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्रयदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥२॥
माँ दुर्गे! आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती है और स्वस्थ पुरुषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हे परमकल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती है। दुःख, दरिद्रता और भय हरने वाली देवि! आपके सिवा दुसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिये सदा ही दयार्द्र रहता हो॥2॥

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥३॥
नारायणि! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो। तुम्हे नमस्कार है॥3॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥४॥
शरण मे आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा मे संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करने वाली नारायणि देवि! तुम्हें नमस्कार है॥4॥

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवी नमोऽस्तु ते॥५॥
सर्वरुपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरुपा दुर्गे देवि! सब भयों से हमारी रक्षा करो तुम्हें नमस्कार है॥5॥

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥६॥
देवि! तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण मे जा चुके है, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण मे गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते है॥6॥

सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरि विनाशनम्॥७॥
सर्वेश्वरी! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो॥7॥

॥ इति श्रीदुर्गासप्त श्लोकी सम्पूर्णा ॥

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श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम

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ईश्वर उवाच
शतनाम प्रवक्ष्यामि श्रृणुष्व कमलानने।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत सती॥1॥

ऊँ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥2॥

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपा:।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चिति:॥3॥

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागति:॥4॥

शंकरजी पार्वतीजी से कहते हैं – कमलानने ! अब मैं अष्टोत्तरशतनाम का वर्णन करता हूँ, सुनो ; जिसके प्रसाद ( पाठ या श्रवण ) मात्र से परम साध्वी भगवती दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं॥१॥
१. ॐ सती २. साध्वी ३. भवप्रीता ( भगवान् शिवपर प्रीति रखनेवाली) ४. भवानी ५. भवमोचनी (संसार बंधनों से मुक्त करनेवाली) ६. आर्या ७. दुर्गा ८. जया ९. आद्या १०. त्रिनेत्रा ११. शूलधारिणी १२. पिनाकधारिणी १३. चित्रा १४. चण्डघण्टा ( प्रचण्ड स्वर से घण्टानाद करनेवाली) १५. महातपा ( भारी तपस्या करनेवाली) १६. मन (मनन करनेवाली) १७. बुद्धि (बोधशक्ति) १८. अहंकारा ( अहंताका आश्रय ) १९. चित्तरूपा २०. चिता २१. चिति (चेतना) २२. सर्वमन्त्रमयी २३. सत्ता (सत् – स्वरूपा ) २४. सत्यानन्दस्वरूपिणी २५. अनन्ता (जिनके स्वरूप का कहीं अंत नहीं) २६. भाविनी ( सबको उत्पन्न करनेवाली ) २७. भाव्या (भावना एवं ध्यान करनेयोग्य) २८. भव्या ( कल्याणरूपा) २९. अभव्या ( जिससे बढ़कर भव्य कहीं है नहीं ) ३०. सदागति

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी॥5॥

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी॥6॥

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥7॥

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृ्ति:॥8॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना॥9॥

३१. शाम्भवी (शिवप्रिया) ३२. देवमाता ३३. चिन्ता ३४. रत्नप्रिया ३५. सर्वविद्या ३६. दक्षकन्या ३७. दक्षयज्ञविनाशिनी ३८. अपर्णा (तपस्या के समय पत्ते को भी न खानेवाली) ३९. अनेकवर्णा ( अनेक रंगोंवाली) ४०. पाटला ( लाल रंगवाली) ४१. पाटलावती (गुलाबके फूल या लाल फूल धारण करनेवाली ) ४२. पट्टाम्बरपरीधाना ( रेशमी वस्त्र पहननेवाली) ४३. कलमंजीररंजिनी ( मधुर ध्वनि करनेवाले मंजीर को धारण करके प्रसन्न रहनेवाली) ४४. अमेयविक्रमा ( असीम पराक्रमवाली ) ४५. क्रूरा ( दैत्यों के प्रति कठोर ) ४६. सुन्दरी ४७. सुरसुन्दरी ४८. वनदुर्गा ४९. मातंगी ५०. मतंगमुनिपूजिता ५१. ब्राह्मी ५२. माहेश्वरी ५३. ऐन्द्री ५४. कौमारी ५५. वैष्णवी ५६. चामुण्डा ५७. वाराही ५८. लक्ष्मी ५९. पुरुषाकृति ६०. विमला ६१. उत्कर्षिणी ६२. ज्ञाना ६३. क्रिया ६४. नित्या ६५. बुद्धिदा ६६. बहुला ६७. बहुलप्रेमा ६८. सर्ववाहनवाहना ६९. निशुम्भ-शुम्भहननी ७०. महिषासुरमर्दिनी ७१. मधुकैटभहन्त्री ७२. चण्डमुण्डविनाशिनी ७३. सर्वासुरविनाशा ७४. सर्वदानवघातिनी ७५. सर्वशास्त्रमयी ७६. सत्या ७७. सर्वशास्त्रधारिणी

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी॥10॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥11॥

अनेकशस्त्राहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यति:॥12॥

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्तकेशी घोररूपा महाबला॥13॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥14॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥15॥

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति॥16॥

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥17॥

७८. अनेकशस्त्रहस्ता ७९. अनेकास्त्रधारिणी ८०. कुमारी ८१. एककन्या ८२. कैशोरी ८३. युवती ८४. यति ८५. अप्रौढ़ा ८६. प्रौढ़ा ८७. वृद्धमाता ८८. बलप्रदा ८९. महोदरी ९०. मुक्तकेशी ९१. घोररूपा ९२. महाबला ९३. अग्निज्वाला ९४. रौद्रमुखी ९५. कालरात्रि ९६. तपस्विनी ९७. नारायणी ९८. भद्रकाली ९९. विष्णुमाया १००. जलोदरी १०१. शिवदूती १०२. कराली १०३. अनन्ता(विनाशरहित) १०४. परमेश्वरी १०५. कात्यायनी १०६. सावित्री १०७. प्रत्यक्षा १०८. ब्रह्मवादिनी

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।
पूजयेत परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥18॥

तस्य सिद्धिभवेद।द् देवि सर्वै: सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात॥19॥

गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत सदा धारयते पुरारि:॥20॥

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत स्तोत्रं स भवेत सम्पदां पदम्॥21॥

देवी पार्वती ! जो प्रतिदिन दुर्गाजी के इस अष्टोत्तरशतनामका पाठ करता है , उसके लिये तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं है ॥१६॥ वह धन , धान्य , पुत्र ,स्त्री ,घोड़ा , हाथी ,धर्म आदि चार पुरुषार्थ तथा अन्त में सनातन मुक्ति भी प्राप्त कर लेता है ॥१७।। कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्। पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥१८॥ तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वै: सुरवरैरपि। राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ॥१९॥ गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण । विलिख्यं यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारि:॥२०॥ भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते। विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥२१॥ ॥इति श्रीविश्वसारतन्त्रे दुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम्। कुमारी का पूजन और देवी सुरेश्वरी का ध्यान करके पराभक्ति के साथ उनका पूजन करे , फिर अष्टोत्तरशतनामका पाठ आरम्भ करे ॥१८॥ देवि ! जो ऐसा करता है , उसे सब श्रेष्ठ देवताओं से भी सिद्धि प्राप्त होती हैं । राजा उसके दास हो जाते हैं । वह राज्यलक्ष्मी को प्राप्त कर लेता है ॥१९॥ गोरोचन , लाक्षा , कुंकुम ,सिंदूर , कपूर , घी ( अथवा दूध ) , चीनी और मधु – इन वस्तुओं को एकत्र करके इनसे विधिपूर्वक यंत्र लिखकर जो विधिज्ञ पुरुष सदा उस यन्त्र को धारण करता , वह शिव तुल्य ( मोक्षरूप ) हो जाता है ॥२०॥ भौमवती अमावस्या की आधी रात में , जब चन्द्रमा शतभेषा नक्षत्रपर हों , उस समय इस स्तोत्र को लिखकर जो इसका पाठ करता है वह सम्पत्तिशाली होता है ॥२१॥


॥इति श्रीविश्वसारतन्त्रे श्रीदुर्गाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं॥


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श्रीदुर्गासप्तशती-पाठविधि

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साधक स्नान करके पवित्र हो आसन-शुद्धि की क्रिया सम्पन्न करके शुद्ध आसन पर बैठे; साथ मे शुद्ध जल, पूजन-साम्रग्री और साथ मे श्रीदुर्गा सप्तशती की पुस्तक रखे। पुस्तक को अपने सामने काष्ठ आदि से शुद्ध आसन पर विराजमान कर दे। ललाट पर अपनी रुचि के अनुसार भस्म, चन्दन अथवा रोली लगा ले, शिखा बाँध ले; फिर पूर्वाभिमुख होकर तत्व-शुद्धि के लिये चार बार आचमन करें। उस समय अग्रांकित चार मन्त्रों को क्रमशः पढे -

ॐ ऐं आत्मतत्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ह्रीं विद्यातत्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
ॐ क्लीं शिवतत्वं शोधयामि नमः स्वाहा।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥

तत्पश्चात प्राणायाम करके गणेश आदि देवताओं एवं गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर ‘पवित्रेस्थो वैष्णव्यौ’ इत्यादि मन्त्र से कुश की पवित्री धारण करके हाथ में लाल फूल, अक्षत और जल लेकर निम्नांकित रूप से संकल्प करें-

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः। ॐ नमः परमात्मने, श्रीपुराणपुरुषोत्तमस्य श्रीविष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्द्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरेऽष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गतब्रह्मावर्तैकदेशे पुण्यप्रदेशे बौद्धावतारे वर्तमाने यथानामसंवत्सरे अमुकायने महामाङ्गल्यप्रदे मासानाम्‌ उत्तमे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरान्वितायाम्‌ अमुकनक्षत्रे अमुकराशिस्थिते सूर्ये अमुकामुकराशिस्थितेषु चन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनिषु सत्सु शुभे योगे शुभकरणे एवंगुणविशेषणविशिष्टायां शुभ पुण्यतिथौ सकलशास्त्र श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्तिकामः अमुकगोत्रोत्पन्नः अमुक नाम अहं ममात्मनः सपुत्रस्त्रीबान्धवस्य श्रीनवदुर्गानुग्रहतो ग्रहकृतराजकृतसर्व-विधपीडानिवृत्तिपूर्वकं नैरुज्यदीर्घायुः पुष्टिधनधान्यसमृद्ध्‌यर्थं श्री नवदुर्गाप्रसादेन सर्वापन्निवृत्ति सर्वाभीष्टफलावाप्ति धर्मार्थकाममोक्षचतुर्विध पुरुषार्थ सिद्धि द्वारा श्रीमहाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती देवताप्रीत्यर्थं शापोद्धारपुरस्सरं कवचार्गलाकीलकपाठ वेदतन्त्रोक्तरात्रिसूक्तपाठ देव्यथर्वशीर्षपाठन्यास विधि सहित नवार्णजप सप्तशतीन्यास ध्यानसहितचरित्रसम्बन्धिविनियोगन्यासध्यानपूर्वकं च ‘मार्कण्डेय उवाच॥ सावर्णिः सूर्यतनयो यो मनुः कथ्यतेऽष्टमः।’ इत्याद्यारभ्य ‘सावर्णिर्भविता मनुः’ इत्यन्तं दुर्गासप्तशतीपाठं तदन्ते न्यासविधिसहितनवार्णमन्त्रजपं वेदतन्त्रोक्तदेवीसूक्तपाठं रहस्यत्रयपठनं शापोद्धारादिकं च करिष्ये।

इस प्रकार प्रतिज्ञा ( संकल्प ) करके देवीका ध्यान करते हुए पञ्चोपचारकी    विधिसे पुस्तककी पूजा करे , योनिमुद्राका प्रदर्शन करके भगवतीको प्रणाम करे , फिर मूल नवार्णमन्त्रसे पीठ आदिमें आधारशक्तिकी स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तकको विराजमान करे । इसके बाद शापोद्धार करना चाहिये । इसके अनेक प्रकार हैं । ' ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशानुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा ' - इस मन्त्रका आदि और अन्तमें सात बार जप करे । यह शापोद्धार मन्त्र कहलाता है । इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्रका जप किया जाता है । इसका जप आदि और अन्तमें

पुस्तक पूजा का मन्त्रः-
ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्।।

(वाराहीतन्त्र तथा चिदम्बरसंहिता)

योनिमुद्रा का प्रदर्शन करके भगवती को प्रणाम करें, फिर मूल नवार्ण मन्त्र से पीठ आदि में आधारशक्ति की स्थापना करके उसके ऊपर पुस्तक को विराजमान करें।

मन्त्र:-
ध्यात्वा देवीं पञ्चपूजां कृत्वा योन्या प्रणम्य च।
आधारं स्थाप्य मूलेन स्थापयेत्र पुस्तकम्॥


सप्तशती-सर्वस्व' के उपासना-क्रम मे पहले शापोद्धार करके बाद मे षडंग सहित पाठ करने का निर्णय किया गया है, अतः कवच आदि पाठ के पहले ही शापोद्धार कर लेना चाहिये। 'कात्यायनी-तन्त्र' मे शापोद्धार तथा उत्कीलन का और ही प्रकार बताया गया है-'अन्त्याद्यार्कद्विरुद्र्त्रिदिगंब्ध्यङ्केष्विभत्वः। अश्वोऽश्व इति सर्गाणां शापोद्धारे मनोः क्रमः॥' 'उत्कीलने चरित्राणां मध्याद्यन्तमिति क्रमः।' अर्थात सप्तशती के अध्यायों को तेरह-एक, बारह-दो, ग्यारह-तीन, दस-चार, नौ-पाँच तथा आठ-छः के क्रम से पाठ करके अंत मे सातवे अध्याय को दो बार पढें; यह शापोद्धार है और पहले मध्यम चरित्र का, फिर प्रथम चरित्र का तत्पश्चात उत्तर चरित्र का पाठ करना उत्कीलन है। कुछ लोगो के मत मे कीलक मे बताये अनुसार 'ददाति प्रतिगृह्णाति' के नियम से कृष्णपक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी तिथि मे देवी को सर्वस्व समर्पण करके उन्हीं का होकर उनके प्रसाद रुप से प्रत्येक वस्तु को उपयोग मे लाना ही शापोद्धार और उत्कीलन है। कोई कहते है- छः अंगो सहीत पाठ करना ही शापोद्धार है और अंगो का त्याग ही शाप है। तो, कुछ विद्वानो कि राय से शापोद्धार कर्म अनिवार्य नहीं है, क्योकि रहस्याध्याय मे यह स्पष्ट रुप से कहा है कि जिसे एक ही दिन मे पूरे पाठ का अवसर न मिले, वह एक दिन केवल मध्यम चरित्र का दूसरे दिन शेष दो चरित्रों का पाठ करे। इसके सिवा, जो प्रतिदिन नियम-पुर्वक पाठ करते है। उनके लिये एक दिन मे एक पाठ न हो सकने पर एक, दो, एक, चार, दो, एक और दो अध्यायों के क्रम से सात दिनों मे पाठ पूरा करने का आदेश दिया गया है। ऐसी दशा मे प्रतिदिन शापोद्धार और कीलक कैसे सम्भव है। अस्तु, जो हो, हमने यहाँ जिज्ञासुओं के लाभार्थ शापोद्धार और उत्कीलन दोनों के विधान दे दिये है।

इसके बाद शापोद्धार करना चाहिए। इसके अनेक प्रकार हैं।
मन्त्र:-
'ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं क्रां क्रीं चण्डिकादेव्यै शापनाशागुग्रहं कुरु कुरु स्वाहा'
इस मंत्र का आदि और अन्त में सात बार जप करें। यह शापोद्धार मंत्र कहलाता है। इसके अनन्तर उत्कीलन मन्त्र का जाप किया जाता है। इसका जप आदि और अन्त में इक्कीस-इक्कीस बार होता है।

यह मन्त्र इस प्रकार है-
'ॐ श्रीं क्लीं ह्रीं सप्तशती चण्डिके उत्कीलनं कुरु कुरु स्वाहा'
इसके जप के पश्चात्‌ आदि और अन्त में सात-सात बार मृतसंजीवनी विद्या का जाप करना चाहिए,

जो इस प्रकार है-
'ॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विद्ये मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा'

मारीचकल्प के अनुसार सप्तशती-शापविमोचन का मन्त्र यह है-
'ॐ श्रीं श्रीं क्लीं हूं ॐ ऐं क्षोभय मोहय उत्कीलय उत्कीलय उत्कीलय ठं ठं'
इस मन्त्र का आरंभ में ही एक सौ आठ बार जाप करना चाहिए, पाठ के अन्त में नहीं।
अथवा रुद्रयामल महातन्त्र के अंतर्गत दुर्गाकल्प में कहे हुए चण्डिका शाप विमोचन मन्त्र का आरंभ में ही पाठ करना चाहिए।

वे मन्त्र इस प्रकार हैं-
ॐ अस्य श्रीचण्डिकाया ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापविमोचनमन्त्रस्य वसिष्ठनारदसंवादसामवेदाधिपतिब्रह्माण ऋषयः सर्वैश्वर्यकारिणी श्रीदुर्गा देवता चरित्रत्रयं बीजं ह्री शक्तिः त्रिगुणात्मस्वरूपचण्डिकाशापविमुक्तौ मम संकल्पितकार्यसिद्ध्‌यर्थे जपे विनियोगः।

ॐ (ह्रीं) रीं रेतःस्वरूपिण्यै मधुकैटभमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥1॥

ॐ श्रीं बुद्धिस्वरूपिण्यै महिषासुरसैन्यनाशिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥2॥

ॐ रं रक्तस्वरूपिण्यै महिषासुरमर्दिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥3॥

ॐ क्षुं क्षुधास्वरूपिण्यै देववन्दितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥4॥

ॐ छां छायास्वरूपिण्यै दूतसंवादिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥5॥

ॐ शं शक्तिस्वरूपिण्यै धूम्रलोचनघातिन्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥6॥

ॐ तृं तृषास्वरूपिण्यै चण्डमुण्डवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥7॥

ॐ क्षां क्षान्तिस्वरूपिण्यै रक्तबीजवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥8॥

ॐ जां जातिस्वरूपिण्यै निशुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥9॥

ॐ लं लज्जास्वरूपिण्यै शुम्भवधकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥10॥

ॐ शां शान्तिस्वरूपिण्यै देवस्तुत्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥11॥

ॐ श्रं श्रद्धास्वरूपिण्यै सकलफलदात्र्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥12॥

ॐ कां कान्तिस्वरूपिण्यै राजवरप्रदायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥13॥

ॐ मां मातृस्वरूपिण्यै अनर्गलमहिमसहितायै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥14॥

ॐ ह्रीं श्रीं दुं दुर्गायै सं सर्वैश्वर्यकारिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥15॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं नमः शिवायै अभेद्यकवचस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥16॥

ॐ क्रीं काल्यै कालि ह्रीं फट् स्वाहायै ऋग्वेदस्वरूपिण्यै ब्रह्मवसिष्ठविश्वामित्रशापाद् विमुक्ता भव॥17॥

ॐ ऐं ह्री क्लीं महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीस्वरूपिण्यै त्रिगुणात्मिकायै दुर्गादेव्यै नमः॥18॥

इत्येवं हि महामन्त्रान्‌ पठित्वा परमेश्वर 
चण्डीपाठं दिवा रात्रौ कुर्यादेव न संशयः॥19॥

एवं मन्त्रं न जानाति चण्डीपाठं करोति यः 
आत्मानं चैव दातारं क्षीणं कुर्यान्न संशयः॥20॥
इस प्रकार शापोद्धार करने के अनन्तर अन्तर्मातृका, बहिर्मातृका आदि न्यास करें, फिर श्रीदुर्गादेवी का ध्यान करके रहस्य में बताए अनुसार नौ कोष्ठों वाले यन्त्र में महालक्ष्मी आदि का पूजन करें, इसके बाद छ: अंगों सहित दुर्गासप्तशती का पाठ आरंभ किया जाता है। कवच, अर्गला, कीलक और तीनों रहस्य- ये ही सप्तशती के छ: अंग माने गए हैं। इनके क्रम में भी मतभेद हैं। चिदम्बरसंहिता में पहले अर्गला, फिर कीलक तथा अन्त में कवच पढ़ने का विधान है।

अर्गलं कीलकं चादौ पठित्वा कवचं पठेत्।
जप्या सप्तशती पश्चात् सिद्धिकामेन मन्त्रिणा॥

किन्तु योगरत्नावली में पाठ का क्रम इससे भिन्न है। उसमें कवच को बीज, अर्गला को शक्ति तथा कीलक को कीलक संज्ञा दी गई है। जिस प्रकार सब मंत्रों में पहले बीज का, फिर शक्ति का तथा अन्त में कीलक का उच्चारण होता है, उसी प्रकार यहाँ भी पहले कवच रूप बीज का, फिर अर्गला रूपा शक्ति का तथा अन्त में कीलक रूप कीलक का क्रमशः पाठ होना चाहिए। यहाँ इसी क्रम का अनुसरण किया गया है।

कवचं बीजमादिष्टमर्गला शक्तिरुच्यते।
कीलकं कीलकं प्राहुः सप्तश्त्या महामनोः॥

यथा सर्वमन्त्रेशु बीजशक्तिकीलकानां प्रथममुच्चारणं तथा सप्तशतीपाठेऽपि कवचार्गलाकीलकानां प्रथमं पाठः स्यात्।
इस प्रकार अनेक तन्त्रों के अनुसार सप्तशती के पाठ का क्रम अनेक प्रकार का उपलब्ध होता है। ऐसी दशा मे अपने देश मे पाठ का जो क्रम पूर्व परम्परा से प्रचलित हो, उसी का अनुसरण करना अच्छा है।
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अथ देव्याः कवचम्‌

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ॐ अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप्‌ छन्दः, चामुण्डा देवता, अंगन्यासोक्तमातरो बीजम्‌, दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम्‌, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥
ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।

मार्कण्डेय उवाच
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्‌।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥१॥
मार्कण्डेय जी ने कहा – पितामह ! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करनेवाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये॥१॥

ब्रह्मोवाच
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्‌।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥२॥
ब्रह्माजी बोले – ब्रह्मन् ! ऐसा साधन तो एक देवीका कवच ही है , जो गोपनीयसे भी परम गोपनीय , पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करनेवाला है । महामुने ! उसे श्रवण करो ॥२॥

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्‌॥३॥
देवी की नौ मूर्तियाँ हैं, जिन्हें ‘ नवदुर्गा ’ कहते हैं। उनके पृथक् - पृथक् नाम बतलाये जाते हैं । प्रथम नाम ‘ शैलपुत्री ’ है । दूसरी मूर्तिका नाम ‘ ब्रह्मचारिणी ’ है। तीसरा स्वरूप ‘ चंद्रघण्टा ’ के नाम से प्रसिद्ध है। चौथी मूर्ति को ‘ कूष्माण्डा ’ कहते हैं। ॥३॥

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्‌॥४॥
पाँचवीं दुर्गा का नाम ‘ स्कन्दमाता’ है। देवी के छठे रूपको ‘ कात्यायनी ’ कहते है। सातवाँ ‘ कालरात्रि ’ और आठवाँ स्वरूप ‘ महागौरी ’ के नाम से प्रसिद्ध है । ॥४॥

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥५॥
नवीं दुर्गाका नाम ‘ सिद्धिदात्री ’ है । ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेद भगवान के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं ॥५॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥६॥
जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो , रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो , विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों , उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता।

न तेषा जायते किंचिदशुभं रणसंकटे।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥७॥
युद्ध के समय संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती । उन्हें शोक , दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती ॥६-७॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥८॥
जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण किया है , उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है । देवेश्वरि ! जो तुम्हारा चिंतन करते हैं , उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करती हो ॥८॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥९॥
चामुण्डादेवी प्रेतपर आरुढ़ होती हैं । वाराही भैंसे पर सवारी करती है । ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है । वैष्णवी देवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं ॥९॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥१०॥
माहेश्वरी वृषभपर आरूढ़ होती है । कौमारीका वाहन मयूर है । भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमल के आसनपर विराजमान हैं और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं ॥१०॥

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥११॥
वृषभपर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है । ब्राह्मीदेवी हंसपर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूषित हैं ॥११॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥१२॥
इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योग शक्तियों से समपन्न हैं । इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं , जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं ॥१२॥

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः।
शंख चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्‌॥१३॥
खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शांर्गमायुधमुत्तमम्‌॥१४॥
दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै ॥१५॥
ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं । ये शंख , चक्र , गदा , शक्ति , हल ,और मूसल , खेटक और तोमर , परशु तथा पाश , कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथों में धारण करती हैं । दैत्यों के शरीर का नाश करना , भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना – यही उनके शस्त्र –धारण का उद्देश्य है ॥१३ - १५॥

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥१६॥
[कवच आरम्भ करने के पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये - ] महान् रौद्ररूप , अत्यंत घोर पराक्रम , महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि ! तुम महान् भय का नाश करनेवाली हो , तुम्हें नमस्कार है ॥१६॥

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिन।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥१७॥
दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥१८॥
तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है । शत्रुओं का भय बढ़ानेवाली जगदम्बिके ! मेरी रक्षा करो।
पूर्व दिशा में ऐन्द्री ( इंद्रशक्ति) मेरी रक्षा करे । अग्निकोण में अग्निशक्ति , दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारी मेरी रक्षा करे । पश्चिम दिशा में वारूणी और वायव्यकोण में मृगपर सवारी करनेवाली देवी मेरी रक्षा करे ॥१७- १८॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ॥१९॥
उत्तर दिशा में कौमारी और ईशान - कोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे । ब्रह्माणि ! तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे ॥१९॥

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना।
जया में चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥२०॥
इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनानेवाली चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करे । जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे ॥२०॥

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥२१॥
वाम भाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे । उद्द्योतिनी शिखा की रक्षा करे । उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे ॥२१॥

मालाधारी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥२२॥
ललाट में मालाधारी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरे भौहों का संरक्षण करे । भौहों के मध्यभाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे ॥२२॥

शंखिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी।
कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी॥२३॥
दोनों नेत्रों के मध्य भाग में शंखिनी और कानों में द्वारवासिनी रक्षा करे । कालिका देवी कपोलों की तथा भगवती शांकरी मूलभाग की रक्षा करे ॥२३॥

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका।
अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥२४॥
नासिका में सुगंधा और ऊपर के ओठ में चर्चिका देवी रक्षा करे । नीचे के ओठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती देवी रक्षा करे ॥२४॥

दन्तान्‌ रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥२५॥
कौमारी दाँतों की और चण्डिका कंठप्रदेश की रक्षा करे । चित्रघण्टा गले की घाँटी की और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे ॥२५॥

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमंगला।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥२६॥
कामाक्षी ठोढ़ी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करे । भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश ( मेरुदण्ड ) - में रहकर रक्षा करे ॥२६॥

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू में व्रजधारिणी॥२७॥
कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे । दोनों कंधोंमें खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे ॥२७॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चांगुलीषु च।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥२८॥
दोनों हाथों में दंडिनी और अंगुलियों में अम्बिका रक्षा करे । शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे । कुलेश्वरी कुक्षि (पेट ) – में रहकर रक्षा करे ॥२८॥

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी।
हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥२९॥
महादेवी दोनों स्तनों की और शोक विनाशिनी देवी मन की रक्षा करे । ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे ॥२९॥

नाभौ च कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा।
पूतना कामिका मेढ्रं गुदे महिषवाहिनी॥३०॥
नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे । पूतना और कामिका लिंगकी और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे ॥३०॥

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी।
जंघे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥३१॥
भगवती कटिभाग में और विंध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे । सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे ॥३१॥

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी।
पादांगुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी॥३२॥
नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठ भाग की रक्षा करे । श्री देवी पैरों की अंगुलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे ॥३२॥

नखान्‌ दंष्ट्राकराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥३३॥
अपनी दाढ़ों के कारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे । रोमवालियों के छिद्रों में कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरीदेवी रक्षा करे ॥३३॥

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥३४॥
पार्वती देवी रक्त , मज्जा , वसा , मांस , हड्डी और मेदा की रक्षा करे । आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे ॥३४॥

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु॥३५॥
मूलाधार आदि कमल - कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूड़ामणिदेवी स्थित होकर रक्षा करे । नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे । जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता , वह अभेद्यादेवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करे ॥३५॥

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा।
अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥३६॥
ब्रह्माणि ! आप मेरे वीर्य की रक्षा करे । छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी - देवी मेरे अहंकार , मन और बुद्धिकी रक्षा करे ॥३६॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्‌।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥३७॥
हाथ में वज्र धारण करनेवाली वज्रहस्तादेवी मेरे प्राण , अपान , व्यान , उदान और समान वायु की रक्षा करे । कल्याण से शोभित होनेवाली भगवती कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे ॥३७॥

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥३८॥
रस , रूप , गंध , शब्द और स्पर्श – इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्वगुण , रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे ॥३८॥

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥३९॥
वाराही आयु की रक्षा करे । वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी ( चक्र धारण करनेवाली ) – देवी यश , कीर्ति , लक्ष्मी , धन तथा विद्या की रक्षा करे ॥३९॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके।
पुत्रान्‌ रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥४०॥
इन्द्राणि ! आप मेरे गोत्र की रक्षा करे । चण्डिके ! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो । महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्नी की रक्षा करे ॥४०॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा।
राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥४१॥
मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकारी रक्षा करे । राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहनेवाली विजयादेवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे ॥४१॥

रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु।
तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी॥४२॥
देवि ! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है , अतएव रक्षा से रहित है , वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो ; क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो ॥४२॥

पदमेकं न गच्छेतु यदीच्छेच्छुभमात्मनः।
कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति॥४३॥
तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः।
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्‌।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्‌॥४४॥
यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाय – कवच का पाठ करके ही यात्रा करे । कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ – जहाँ भी जाता है , वहाँ – वहाँ उसे धन – लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करनेवाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस - जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है , उस – उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है । वह पुरुष इस पृथ्वीपर तुलना रहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है ॥४३ - ४४॥

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्‌॥४५॥
कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है । युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है ॥४५॥

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्‌।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥४६॥
दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः।
जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥४७॥
देवी का यह कवच देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है , उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता । इतना हीं नहीं , वह अपमृत्यु से रहित हो सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है ॥४६ - ४७॥

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः।
स्थावरं जंगमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्‌॥४८॥
मकरी , चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं । कनेर , भाँग , अफीम , धतूरे आदि का स्थावर विष , साँप और बिच्छू अदि के काटने से चढ़ा हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेल के सन्योग आदि से बननेवाली कृत्रिम विष – ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं , उनका कोई असर नहीं होता ॥४८॥

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले।
भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥४९॥
सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः॥५०॥
ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥५१॥
नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते।
मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम्‌॥५२॥
इस पृथ्वी पर मारण – मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के जितने मंत्र- यंत्र होते हैं , वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेनेपर उस मनुष्यको देखते ही नष्ट हो जाते हैं । ये ही नहीं , पृथ्वीपर विचरनेवाले ग्रामदेवता , आकाशचारी देवविशेष , जल के सम्बन्ध से प्रकट होनेवाले गण , उपदेशमात्र से सिद्ध होनेवाले निम्नकोटि के देवता अपने जन्म के साथ प्रकट होनेवाले देवता , कुल देवता, माला ( कण्ठमाला आदि ) , डाकिनी , शाकिनी , अंतरिक्ष में विचरनेवाली अत्यंत बलवती भयानक डाकिनियाँ , ग्रह , भूत, पिशाच , यक्ष , गंधर्व , राक्षस , ब्रह्मराक्षस , बेताल , कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किये रहनेपर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान - वृद्धि प्राप्त होती है । यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करनेवाला और उत्तम है ॥४९ - ५२॥

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले।
जपेत्सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा॥५३॥
यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्‌।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी॥५४॥
कवच का पाठ करनेवाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश के साथ- साथ वृद्धि को प्राप्त होता है । जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है , उसकी जब तक वन ,पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टीकी रहती है , तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है ॥५३ - ५४॥

देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्‌।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥५५॥
लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ॥५६॥
॥ इति देव्याः कवचं संपूर्णम्‌ ॥
फिर देहका अंत होनेपर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से उस नित्य परमपद को प्राप्त होता है , जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है ॥५५॥ वह सुंदर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिव के साथ आनन्द का भागी होता है ॥५६॥

॥ देवी कवच पूरा हुआ ॥
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अथार्गलास्तोत्रम्‌

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ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः , अनुष्टुप्‌ छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ इस अर्गलास्तोत्र मंत्र के विष्णु ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है , श्री महालक्ष्मी देवता हैं , श्री जगदम्बाकी प्रसन्नता के लिये सप्तश्लोकी पाठ में इसका विनियोग किया जाता है।

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥
ॐ चण्डिकादेवीको नमस्कार है ।

मार्कण्डेय उवाच
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी .
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥१॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं – जयंती , मंगला , काली , भद्रकाली , कपालिनी , दुर्गा , क्षमा , शिवा , धात्री , स्वाहा और स्वधा – इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके ! तुम्हें नमस्कार हो ।

जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥२॥
देवि चामुण्डे ! तुम्हारी जय हो । सम्पूर्ण प्राणियों की पीड़ा हरनेवाली देवि ! तुम्हारी जय हो । सबमें व्याप्त रहनेवाली देवि ! तुम्हारी जय हो । कालरात्रि ! तुम्हें नमस्कार हो ॥१- २॥

मधुकैटभविद्रविविधातृवरदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥३॥
मधु और कैटभ को मारनेवाली तथा ब्रह्माजी को वरदान देनेवाली देवि ! तुम्हें नमस्कार है । तुम मुझे रूप ( आत्मस्वरूप का ज्ञान ) दो , जय (मोहपर विजय) दो , यश ( मोह- विजय तथा ज्ञान- प्राप्तिरूप यश ) दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥३॥

महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥४॥
महिषासुर का नाश करनेवाली तथा भक्तों को सुख देनेवाली देवि ! तुम्हें नमस्कार है । तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥४॥

रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥५॥
रक्तबीज का वध और चण्ड – मुण्ड का विनाश करनेवाली देवि ! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥५॥

शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥६॥
शुम्भ और निशुम्भ तथा धूम्रलोचन का मर्दन करनेवाली देवि ! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥६॥

वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥७॥
सबके द्वारा वन्दित युगल चरणोंवाली तथा सम्पूर्ण सौभाग्य प्रदान करनेवाली देवि ! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥७॥

अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥८॥
देवि ! तुम्हारे रूप और चरित्र अचिन्त्य हैं । तुम समस्त शत्रुओं का नाश करनेवाली हो । रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥८॥

नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥९॥
पापों को दूर करनेवाली चण्डिके ! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारे चरणों में सर्वदा मस्तक झुकाते है, उन्हें रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥९॥

स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१०॥
रोगों का नाश करनेवाली चण्डिके ! जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते हैं , उन्हें रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१०॥

चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तित: ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥११॥
चण्डिके ! इस संसार में जो भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करते हैं , उन्हें रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥११॥

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१२॥
मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो । परम सुख दो , रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१२॥

विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकै:।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१३॥
जो मुझसे द्वेष रखते हों , उनका नाश करो और मेरे बल की वृद्धि करो । रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१३॥

विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम् ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१४॥
देवि ! मेरा कल्याण करो । मुझे उत्तम सम्पत्तिप्रदान करो । रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१४॥

सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१५॥
अम्बिके ! देवता और असुर – दोनों ही अपने माथे के मुकुट की मणियों को तुम्हारे चरणों पर घिसते हैं । तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१५॥

विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१६॥
तुम अपने भक्तजन को विद्वान , यशस्वी और लक्ष्मीवान् बनाओ तथा रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१६॥

प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१७॥
प्रचण्डदैत्यों के दर्प का दलन करनेवाली चण्डिके ! मुझ शरणागत को रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१७॥

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंसुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१८॥
चतुर्मुख ब्रह्माजी के द्वारा प्रशंसित चार भुजाधारिणी परमेश्वरि ! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१८॥

कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥१९॥
देवि अम्बिके ! भगवान् विष्णु नित्य –निरन्तर भक्तिपूर्वक तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं । तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥१९॥

हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२०॥
हिमालय – कन्या पार्वती के पति महादेवजी के द्वारा प्रशंसित होनेवाली परमेश्वरि ! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥२०॥

इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२१॥
शचीपति इन्द्रके द्वारा सद्भाव से पूजित होनेवाली परमेश्वरि ! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥२१॥

देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२२॥
प्रचण्ड भुजदण्डोंवाले दैत्योंका घमंड चूर करनेवाली देवि ! तुम रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥२२॥

देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥२३॥
देवि अम्बिके ! तुम अपने भक्तजनों कि सदा असीम आनन्द प्रदान करती रहती हो । मुझे रूप दो , जय दो , यश दो और काम – क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ॥२३॥

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम् ।
तारिणि दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम् ॥२४॥
मन की इच्छा के अनुसार चलनेवाली मनोहर पत्नी प्रदान करो , जो दुर्गम संसारसागर से तारनेवाली तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न हुई हो ॥२४॥

इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः ।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम् ॥२५॥

॥ इति देव्या अर्गलास्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥
जो मनुष्य इस स्तोत्रका पाठ करके सप्तशतीरूपी महास्तोत्र का पाठ करता है , वह सप्तशती की जप- संख्या से मिलनेवाले श्रेष्ठ फल को प्राप्त होता है । साथ ही वह प्रचुर सम्पत्ति भी प्राप्त कर लेता है ॥२५॥॥
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अथ कीलकम्‌

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विनियोग

ॐ अस्य श्रीकीलकमन्त्रस्य शिव ऋषिः, अनुष्टुप्‌ छन्दः, श्री महासरस्वती देवता, श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठांगत्वेन जपे विनियोगः।
ॐ इस कील मन्त्र के शिव ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है , श्री महासरस्वती देवता हैं , श्री जगदम्बाकी प्रसन्नता के लिये सप्तश्लोकी पाठ में इसका विनियोग किया जाता है।

॥ ॐ नमश्चण्डिकायै॥
ॐ चण्डिका देवी को नमस्कार है।

मार्कण्डेय उवाच
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे ॥१॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं –विशुद्ध ज्ञान ही जिनका शरीर है , तीनों वेद ही जिनके तीन दिव्य नेत्र हैं , जो कल्याण – प्राप्ति हेतु हैं तथा अपने मस्तकपर अर्धचन्द्र का मुकुट धारण करते हैं , उन भगवान् शिव को नमस्कार है ॥१॥

सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः ॥२॥
मन्त्रों का जो अभिकीलक है अर्थात् मन्त्रोंकी सिद्धि में विघ्न उपस्थित करनेवाले शापरूपी कीलक का जो निवारण करनेवाला है , उस सप्तशतीस्तोत्रको सम्पूर्णरूप से जानना चाहिये ( और जानकर उसकी उपासना करनी चाहिये ) , यद्यपि सप्तशती के अतिरिक्त अन्य मन्त्रों के जप में भी जो निरन्तर लगा रहता है , वह भी कल्याण का भागी होता है ॥२॥

सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।
एतेन स्तुवतां देवीं स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति ॥३॥
उसके भी उच्चाटन आदि कर्म सिद्ध होते हैं तथा उसे भी समस्त दुर्लभ वस्तुओंकी प्राप्ति हो जाती है ; तथापि जो अन्य मन्त्रों का जप न करके केवल इस सप्तशती नामक स्तोत्र से ही देवीकी स्तुति करते हैं , उन्हें स्तुतिमात्र से ही सच्चिदानंदस्वरूपिणी देवी सिद्ध हो जाती हैं ॥३॥

न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते ।
विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम् ॥४॥
उन्हें अपने कार्य की सिद्धि के लिये मंत्र , औषधि तथा अन्य किसी साधन के उपयोग की आवश्यकता नहीं रहती । बिना जप के ही उनके उच्चाटन आदि समस्त आभिचारिक कर्म सिद्ध हो जाते हैं ॥४॥

समग्राण्यपि सिद्ध्यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः ।
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम् ॥५॥
इतना ही नहीं , उनकी सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुएँ भी सिद्ध होती हैं । लोगों के मन में यह शंका थी कि ‘ जब केवल सप्तशती की उपासना से अथवा सप्तशती को छोड़कर अन्य मन्त्रों की उपासना से भी समानरूप से सब कार्य सिद्ध होते हैं , तब इनमें श्रेष्ठ कौन – सा साधन है ? ’ लोगों की इस शंका को सामने रखकर भगवान् शंकर ने अपने पास आये हुए जिज्ञासुओं को समझाया कि यह सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्तोत्र ही सर्वश्रेष्ठ एवं कल्याणमय है ॥५॥

स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः ।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्निमन्त्रणाम् ॥६॥
तदन्तर भगवती चण्डिका के सप्तशती नामक स्तोत्रको महादेवजी ने गुप्त कर दिया । सप्तशती के पाठ से जो पुण्य प्राप्त होता है , उसकी कभी समाप्ति नहीं होती ; किंतु अन्य मन्त्रों के जप जन्य पुण्य की समाप्ति हो जाती है । अत: भगवान् शिव ने अन्य मन्त्रों की अपेक्षा जो सप्तशती की ही श्रेष्ठता का निर्णय किया , उसे यथार्थ ही जानना चाहिये ॥६॥

सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेव न संशयः ।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः ॥७॥
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति ।
इत्थंरूपेण कीलेन महादेवेन कीलितम् ॥८॥
अन्य मंत्रों का जप करनेवाला पुरुष भी यदि सप्तशती के स्तोत्र और जप का अनुष्ठान कर ले तो वह भी पूर्णरूप से ही कल्याण का भागी होता है , इनमें तनिक भी संदेह नहीं है । जो साधक कृष्णपक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी को एकाग्रचित होकर भगवती की सेवा में अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है और फिर उसे प्रसादरूप से ग्रहण करता है , उसी पर भगवती प्रसन्न होती है ; अन्यथा उनकी प्रसन्नता नहीं प्राप्त होती । इस प्रकार सिद्धि के प्रतिबन्धकरूप कील के द्वारा महादेवजी ने इस स्तोत्र को कीलित कर रखा है ॥७ - ८॥

यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम्।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नर: ॥९॥
जो पूर्वोक्त रीति से निष्कीलन करके इस सप्तशती स्तोत्र का प्रतिदिन स्पष्ट उच्चारण पूर्वक पाठ करता है , वह मनुष्य सिद्ध हो जाता है , वही देवी का पार्षद होता है और वही गंधर्व भी होता है ॥९॥

न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह न जायते ।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमाप्नुयात् ॥१०॥
सर्वत्र विचरते रहनेपर भी इस संसार में उसे कहीं भी भय नहीं होता । वह अपमृत्यु के वश में नहीं पड़ता तथा देह त्यागने के अनन्तर मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥१०॥

ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत न कुर्वाणो विनश्यति ।
ततो ज्ञात्वैव सम्पन्नमिदं प्रारभ्यते बुधैः ॥११॥
अत: कीलन को जानकर उसका परिहार करके ही सप्तशती का पाठ आरम्भ करे । जो ऐसा नहीं करता , उसका नाश हो जाता है । इसलिए कीलक और निष्कीलन का ज्ञान प्राप्त करनेपर ही यह स्तोत्र निर्दोष होता है और विद्वान पुरुष इस निर्दोष स्तोत्र का ही पाठ आरम्भ करते हैं ॥११॥

सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद् दृश्यते ललनाजने ।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम् ॥१२॥
स्त्रियों में जो कुछ भी सौभाग्य आदि दृष्टिगोचर होता है , वह सब देवी के प्रसाद का ही फल है । अत: इस कल्याणमय स्तोत्र का सदा जप करना चाहिये ॥१२॥

शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत् ॥१३॥
इस स्तोत्रका मन्दस्वर से पाठ करने पर स्वल्प फल की प्राप्ति होती है और उच्चस्वर से पाठ करनेपर पूर्ण फल की सिद्धि होती है ।अत: उच्चस्वर से ही इसका पाठ आरम्भ करना चाहिये ॥१३॥

ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पद: ।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः ॥१४॥

॥ इति देव्या: कीलकस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥
जिनके प्रसाद से ऐश्वर्य , सौभाग्य , आरोग्य , सम्पत्ति , शत्रुनाश तथा परम मोक्ष की भी सिद्धि होती है , उन कल्याणमयी जगदम्बा की स्तुति मनुष्य क्यों नहीं करते ? ॥१४॥

श्रीदुर्गासप्तशत्याम् . इसके अनन्तर रात्रिसूक्तका पाठ करना उचित है । पाठके आरम्भ और अन्तमें देवीसूक्तके पाठकी विधि है । मारीचकल्पका वचन है -

रात्रिसूक्तं पठेदादौ मध्ये सप्तशतीस्तवम् । 
प्रान्ते तु पठनीयं वै देवीसूक्तमिति क्रमः । ।

रात्रिसूक्तके बाद विनियोग , न्यास और ध्यानपूर्वक नवार्णमन्त्र का करके सप्तशतीका पाठ आरम्भ करना चाहिये । पाठ के अन्त में पुनः विधि नवार्णमन्त्र का जप करके देवीसूक्त का तथा तीनों रहस्योंका पाठ करना उचित । कोई - कोई नवार्णजप के बाद रात्रिसूक्तका पाठ बतलाते हैं तथा अन्त  में भी देवीसूक्त के बाद नवार्ण - जपका औचित्य प्रतिपादन करते हैं ; किंतु यह ठीक नहीं है । चिदम्बरसंहितामें कहा है - ' मध्ये नवार्णपुटितं कृत्वा स्तोत्रं सदाभ्यसेत् । अर्थात् सप्तशतीका पाठ बीचमें हो और आदि - अन्तमें नवार्णजपसे । उसे सम्पुटित कर दिया जाय । डामरतन्त्रमें यह बात अधिक स्पष्ट कर दी गयो है-

शतमादौ शतं चान्ते जपेन्मन्त्रं नवार्णकम् । 
चण्डी सप्तशती मध्ये सम्पुटोऽयमुदाहृतः ॥

अर्थात् आदि और अन्तमें सौ - सौ बार नवार्ण मन्त्रका जप को और मध्यम सप्तशती दुर्गाका पाठ करे , यह सम्पुट कहा गया है । यदि आदि - अन्तम गत्रिमुक्त और देवीसूक्तका पाठ हो और उसके पहले एवं अन्तम नवार्ण - अप हो , तब तो वह पाठ नवार्ण - सम्पटित नहीं कहला सकता , क्योंकि जिससे सम्पुट हो उसके मध्यमें अन्य प्रकारके मन्त्रका प्रवेश नहीं होना चाहिये । यदि बीचम रात्रिसूक्त और देवीसूक्त रहेंगे तो वह पाठ उन्हसि सम्पटित कहलायेगा ; ऐसी दशा डामरतन्त्र आदिके बचनास स्पष्ट ही विरोध होगा । अत : पहले रात्रिसूक्त , फिर नवार्ण - जप , फिर न्यासपूर्वक सप्तशती - पाठ , फिर विधिवत् नवार्ण - जप , फिर क्रमशः देवीसूक्त एवं रहस्यत्रयका पाठ - यही क्रम ठीक है । रात्रिसूक्त भी दो प्रकार है - वैदिक और तान्त्रिक । वैदिक रात्रिसूक्त ऋग्वेदकी आठ ऋचाएँ है और तान्त्रिक ती दुर्गासप्तशतीक प्रथमाध्यायमें ही है । यहाँ दोनों दिये जाते हैं । गनिदेवताके प्रतिपादक मुक्तको गत्रिसूक्त कहते हैं । यह रात्रिदेवी दो प्रकारकी है - एक जीववि और दूसरी ईश्वररात्रि । जीवरात्रि वही है , जिसमें प्रतिदिन जगतके साधारण जीवोंका व्यवहार लुप्त होता है । दूसरी ईश्वररात्रि वह है , जिसमें ईश्वरके जगद्रूप व्यवहारका लोप होता है ; उसीको कालरात्रि या महाप्रलयरात्रि कहते हैं । उस समय केवल ब्रह्म और उनकी मायाशक्ति , जिसे अव्यक्त प्रकृति कहते हैं , शेष रहती है । इसकी अधिष्ठात्री देवी भुवनेश्वरी ' हैं । * रात्रिसूक्तसे उन्हींका स्तवन होता है ।


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