ये ठोस वाद्य होते हैं। ध्वनि उत्पन्न करने के लिए कंपन करते हैं जैसे कि घंटी, गोंग या खड़खड़ जिन पर आघात किया जाता है, हिलाया जाता है या इन पर खुर्चा जाता है। इडियोफ़ोनिक वाद्य या स्वयं-कम्पित्र, अर्थात ठोस पदार्थ के वाद्य, जिनकी अपनी लोचदार प्रकृति के कारण उनकी स्वयं की एक गूँज होती है, जो इन पर आघात किए जाने, खींचे जाने, या घर्षण या वायु से उत्तेजित किए जाने पर तरंगों में उत्सर्जित होती है।
इस समूह के वाद्य आमतौर पर प्रहारक या हथौड़े से बजाए जाते हैं। ये वाद्य स्पष्ट स्वरमान उत्पन्न करने में सक्षम नहीं हैं जो एक राग बनाने के लिए आवश्यक होता है। यही कारण है कि इनका उपयोग शास्त्रीय संगीत में सीमित है।
25-पैजनी
पैजनी धातु का बना हुआ ठोस वाद्य यंत्र है। यह उत्तर प्रदेश में पाया जाता है, यह घुंघरुओं के आलंकारिक उपयोग को दर्शाता एक उदाहरण है।
आमतौर पर लोहे की गोलियों (एक या अधिक) से युक्त घंटा धातु से बना होता है। झटके द्वारा खोखली गुहा के भीतर गोलियों को गति प्रदान की जाती है, जिससे तेज ध्वनि उत्पन्न होती है । यह गोल आकार का होता है मगर निचले हिस्से में एक एकल या दोहरे आड़े चीर में खुला होता है। भारतीय संगीत और नृत्य के लिए, बजने वाली घंटियों (विभिन्न भारतीय भाषाओं और बोलियों में कई नामों से जानी जाती हैं) का अत्यधिक महत्व है। इसके उपयोग उतने ही भिन्न हैं जितनी भिन्न इसकी आकृतियाँ और आकार होते हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में, इसके फैलाव और इसके प्रचुर उपयोग में, मानव और पशु दोनों दुनिया में समान हिस्सेदारी है। एकल लोहे की गोली वाली बड़ी बजने वाली घंटियों के शीर्ष पर मुड़े हुए छल्ले होते हैं और पालतू जानवरों की गर्दन के चारों ओर एक सूती धागे में पिरोई जाती हैं। जानवरों के अनुरूप रहने के लिए ये आकार और आकृति में भिन्न होती हैं और आमतौर पर अकेले पहनी जाती हैं। कभी-कभी उनमें से कई घंटियों को बैलगाड़ियों और घोड़ों के साज-सज्जा वाले चमड़े के पट्टे पर भी सजाया जाता है। इन घंटियों का उपयोग, जानवरों के लिए उपयोगितावादी और सजावटी दोनों तरह से होता है। इसका मुख्य उपयोग नृत्य प्रदर्शन में होता है। घंटियों का एक गुच्छा लंबी डोरी में या चमड़े के पट्टे से बाँध दिया जाता है। टखने के चारों ओर पहना जाता है, जिससे पैरों की हरक़त या नृत्य कदम को एक 'संगीतमय ध्वनि' मिलती है और ये स्वयं लयबद्ध अभिव्यक्ति प्रदान करता है। घुंघरू और भारतीय नृत्य अविभाज्य हैं। पैजनी घुंघरुओं के आलंकारिक उपयोग को दर्शाता एक उदाहरण है।
26-टोक्का
टोक्का बाँस से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र असम में पाया जाता है। यह मूल रूप से ताल या लय प्रदान करने वाला वाद्य यंत्र है।
"बाँस को इस तरह से काटा जाता है कि दोनों सिरों पर गाँठें सुरक्षित रहें। एक छोर को अखंडित रखते हुए एक पक्ष को आधे में विभाजित किया जाता है। इस प्रकार एक लचकदार क्रिया विभाजित सिरे पर प्रारंभ की जाती है। बजाते वक़्त बाँस की दोनों भुजाओं को एक दूसरे से टकराया जाता है। यह मूल रूप से ताल या लय प्रदान करने वाला वाद्य यंत्र है।"
27-डांडिया
डांडिया एक ठोस वाद्य यंत्र है जो लाख और लकड़ी से बना होता है। रंग-बिरंगे रंगों से रंगी हुई ये लकड़ी की डंडियाँ गुजरात में पाई जाती हैं। यह गुजरात के रास नृत्य में प्रमुख भूमिका निभाता है।
यह खराद से तैयार की हुई, लाख से रंगी हुई लड़की की रंगीन डंडियों का जोड़ा है। इसे गुजरात के रास नृत्य में हाथों में लेकर ताल पर एक साथ मार के बजाया जाता है।
28-टुडुम
टुडुम मिट्टी के बर्तन और गाय के चमड़े से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। एक लोक वाद्य यंत्र, इसे मुख्य रूप से तब सुना जा सकता है जब गाँव में किसी की मृत्यु हो जाती है और जब मृतकों के लिए प्रार्थना सेवाएँ आयोजित की जाती हैं।
"टुडुम इस राज्य की संगीत परंपरा का एक और दिलचस्प लोक वाद्य यंत्र है, जोकि गाय के चमड़े से ढका एक मिट्टी का बर्तन है। इन्हें स्वयं कलाकारों द्वारा उनकी पारिवारिक परंपरा के रूप में बनाया जाता है। टुडुम को मुख्य रूप से तब सुना जा सकता है जब गाँव में किसी की मृत्यु हो जाती है और जब मृतकों के लिए प्रार्थना सेवाएँ आयोजित की जाती हैं। टुडुम को अन्य अवसरों पर भी बजाया जाता है।"
29-ढन कोइला
ढन कोइला लकड़ी, धातु और मिट्टी के बर्तन से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र उड़ीसा में पाया जाता है। यह मुख्य रूप से उड़ीसा के गंजम जिले में पारंपरिक कथात्मक शैलियों के साथ बजाया जाता है।
इस वाद्य यंत्र में चार अलग-अलग भाग होते हैं, लोक रूपांकनों के साथ चित्रित किया गया मिट्टी का एक गोल बर्तन, एक सूप, एक गज, और दोनों सिरों पर बजने वाली घंटियों से युक्त एक लकड़ी की डंडी। यह एक समग्र वाद्य यंत्र है, जो सरल ड्रोन और लयबद्ध तेज प्रभाव उत्पन्न करने में सक्षम है। बर्तन का बड़ा मुँह एक उल्टे थाल से ढका जाता है। गज का एक सिरा थाल से मजबूती से जुड़ा होता है, जबकि दूसरा सिरा वादक के दाहिने हाथ या पैर के नीचे दबाया जाता है। तार को दाहिने हाथ से खींचा जाता है। कभी-कभी छड़ को गज के मेहराब के दांतों पर रगड़ा जाता है। मिट्टी का बर्तन एक अनुनादक के रूप में कार्य करता है। उड़ीसा के गंजम जिले में पारंपरिक कथात्मक शैलियों में इसे बजाया जाता है।
30-ताल
“ताल काँसे और कपास से बना ठोस वाद्य यंत्र है। यह धार्मिक वाद्य यंत्र महाराष्ट्र में पाया जाता है। यह महाराष्ट्र के ‘वारकरी’ समुदाय द्वारा उनके धार्मिक गीतों के लिए एक महत्वपूर्ण संगत के रूप में मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।“
“काँसे की बनी झांझ की एक जोड़ी। ये भारी और मोटी शंकाकार पत्तलें (प्लेटें) कपास की रस्सी से जुड़ी होती हैं और इनका मुँह एक दूसरे के सामने रखकर ताली देकर बजाया जाता है। महाराष्ट्र के 'वारकरी' समुदाय द्वारा उनके भक्ति गीतों के लिए एक महत्वपूर्ण संगत के रूप में उपयोग किया जाता है।”
31-तालम
तालम धातु से निर्मित एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह केरल में पाया जाता है, इसकी लंबाई लगभग 6 सेंटीमीटर होती है।
इसे दक्षिण भारत में हर जगह विस्तृत रूप से लयबद्ध संगत के लिए उपयोग किया जाता है। तालम केंद्र में अवदाब वाली छोटी गोलाकार चकतियों की एक जोड़ी होती है जिसे प्रत्येक छोर पर फंदों के माध्यम से पकड़ा जाता है। इस वाद्य यंत्र को मुख्य रूप से किनारों पर मारा जाता है और यह अत्यधिक जटिल लयों को प्रस्तुत करने में सक्षम होता है। वाद्य यंत्र की लंबाई लगभग 6 सेंटीमीटर होती है।
32-थाली
"थाली लकड़ी और धातु से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह लोक वाद्य यंत्र गुजरात में पाया जाता है। लोक और पारंपरिक संगीत में मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।"
"उठे हुए किनारों के साथ घंटा-धातु की एक पतली गोलाकार। जुडी हुई डोरी द्वारा एक हाथ में लटकाकर और एक लकड़ी की छड़ी से बजाया जाता है। लोक और पारंपरिक संगीत में उपयोग किया जाता है।"
33-थिस्की-
"थिस्की लकड़ी से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह जनजातीय वाद्य यंत्र मध्य प्रदेश में पाया जाता है। मध्य प्रदेश की दक्षिण पूर्वीय जनजातियों द्वारा उपयोग किया जाने वाला यह एक खटक (क्लैपर) है।"
"लकड़ी के दो सिल जो तिरछे रूप से 'यू' आकार के मोटे तार से जुड़े हैं। बजाते वक़्त इसे तार से पकड़ा जाता है और ऊपर नीचे लयबद्ध क्रिया में चलाया जाता है। लकड़ी के दो सिलों को एक साथ करताल बजाया जाता है। यह खटक (क्लैपर) मध्य प्रदेश की दक्षिण पूर्वीय जनजातियों द्वारा उपयोग किया जाता है।"
34-दस काठी
दस-काठी लकड़ी का बना हुआ एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह एक लोक वाद्य यंत्र है जो उड़ीसा में पाया जाता है। उड़ीसा की 'दस-कठिया' नामक लोक शैली में इस वाद्य यंत्र का प्रयोग होता है।
दाहिने हाथ में सख्त लकड़ी के इन दोनों टुकड़ों को लेकर सिद्धहस्त शैली से आपस में रगड़ कर बजाया जाता है। उड़ीसा की 'दस-कठिया' नामक लोक शैली में इस वाद्य यंत्र का प्रयोग होता है।
35-नूट
नूट चिकनी मिट्टी, लाख और धातु से निर्मित एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह धार्मिक वाद्य यंत्र कश्मीर में पाया जाता है। सूफ़ियाना कलाम और कश्मीर के अन्य भक्ति और पारंपरिक संगीत शैलियों में रबाब और सैतार के साथ लयबद्ध संगत के लिए मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।
“पकी हुई चिकनी मिट्टी से बना हुआ मटका। इसका ऊपरी अर्ध भाग में लाख से बने लोक रूपांकनों होते हैं। इसे बजाते समय, गोद में या ज़मीन पर एक छल्ले पर रखकर, दोनों हाथों की उँगलियों से बजाया जाता है। इस वाद्य यंत्र को सूफ़ियाना कलाम और कश्मीर के अन्य भक्ति और पारंपरिक संगीत शैलियों में रबाब और सैतार के साथ लयबद्ध संगत के लिए उपयोग किया जाता है।"
36-पंचई बाजा और नौमती बाजा
पंचई बाजा और नौमती बाजा धार्मिक समारोहों के दौरान राज्य के नेपाली समुदाय द्वारा बजाए जाने वाले शुभ बैंड हैं। अन्य स्वदेशी वाद्य यंत्र जैसे त्याक्को, तुरही, दहिनु दमाऊ, भेरी, रास, इत्यादि, भी ऑर्केस्ट्रा का हिस्सा हो सकते हैं।
"पंचई बाजा और नौमाती बाजा धार्मिक समारोहों के दौरान राज्य के नेपाली समुदाय द्वारा बजाए जाने वाले शुभ बैंड हैं। पंचई बाजा जिसमें पाँच वाद्ययंत्र हैं, पंच तत्व या जीवन के पाँच मूल तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और व्योम) और पंच धातु (सोना, चाँदी, तांबा, सीसा और टिन) का प्रतीक है। पाँच वाद्य यंत्र टीप सहनाई, ढोलकी, झुरुम्मा, डोमाहा और तिआमको, पाँच देवताओं, गणेश, विष्णु, देवी, सूर्य और शिव का प्रतिनिधित्व करते हैं। नौमाती बाजा, जो कि पंचई बाजा का अधिक विस्तृत रूप है, में चार अतिरिक्त संगीत वाद्य यंत्र - नरसिंह, करनाल, ढोडरे सहनाई और बिकुल - होते हैं। अन्य देशी वाद्य यंत्र जैसे त्याक्को, तुरही, दहिनु दमाऊ, भेरी, रास, इत्यादि भी ऑर्केस्ट्रा का हिस्सा हो सकते हैं।“
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