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घन वाद्य यंत्र लिस्ट संख्या-चार

 ये ठोस वाद्य होते हैं। ध्वनि उत्पन्न करने के लिए कंपन करते हैं जैसे कि घंटी, गोंग या खड़खड़ जिन पर आघात किया जाता है, हिलाया जाता है या इन पर खुर्चा जाता है।  इडियोफ़ोनिक वाद्य या स्वयं-कम्पित्र, अर्थात ठोस पदार्थ के वाद्य, जिनकी अपनी लोचदार प्रकृति के कारण उनकी स्वयं की एक गूँज होती है, जो इन पर आघात किए जाने, खींचे जाने, या घर्षण या वायु से उत्तेजित किए जाने पर तरंगों में उत्सर्जित होती है।

इस समूह के वाद्य आमतौर पर प्रहारक या हथौड़े से बजाए जाते हैं। ये वाद्य स्पष्ट स्वरमान उत्पन्न करने में सक्षम नहीं हैं जो एक राग बनाने के लिए आवश्यक होता है। यही कारण है कि इनका उपयोग शास्त्रीय संगीत में सीमित है।

37-भजन चक्कलू

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भजन चक्कलू लकड़ी और पीतल से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। एक धार्मिक वाद्य, यह वाद्य यंत्र आंध्र प्रदेश में पाया जाता है। लकड़ी के खटक (क्लैपर्स) की जोड़ी, भक्ति गीतों में उपयोग किया जाता है।

लकड़ी के खटक (क्लैपर्स) की जोड़ी, चौकोर छोर के साथ और जिसमें खुली हुई चीरें होती हैं, जिनमें पतली पीतल की प्लेटें लगी होती हैं। एक हाथ में साथ में बजाए जाते हैं। भक्ति गीतों के साथ लयबद्ध संगत के लिए प्रयोग किया जाता है।

38-पोपटिक

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पोपटिक बाँस से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। एक लंबे खटक (क्लैपर) सरूप, यह वाद्य यंत्र सिक्किम में पाया जाता है। सिक्किम के समूह नृत्यों में मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है।

बाँस की नली से बना एक फ़ीट लंबा खटक (क्लैपर)। दूसरे छोर को अक्षुण्ण रखते हुए केंद्र से बाँस को लंबवत काट दिया जाता है। बजाते समय, एक हाथ में पकड़कर और दूसरे हाथ से दो कटे हुए टुकड़े लयबद्ध ढंग से टकराए जाते हैं। सिक्किम के समूह नृत्यों में उपयोग किया जाता है।

39-बोरतल

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बोरतल काँसे से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह असम में पाया जाने वाला एक पारंपरिक वाद्य यंत्र है। झांझ के सरूप, यह वाद्य यंत्र मुख्य रूप से असम की विभिन्न लोक पारंपरिक शैलियों में उपयोग किया जाता है।

बड़े आकार का एक जोड़ी झांझ, परिष्कृत काँसा धातु से बना। केंद्र में एक बड़े गेंद के आकार का गड्ढा होता है। दोनों खण्डों को अलग-अलग पकड़कर बजाया जाता है। असम के विभिन्न लोक पारंपरिक शैलियों में इसका उपयोग किया जाता है।

40-ब्लिंगथॉप
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ब्लिंगथॉप बाँस, नरम लकड़ी और लोहे से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह वाद्य यंत्र लंबी, अंडाकार, चपटी प्लेट जैसा होता है। इसका उपयोग प्रायः सिक्किम के समूह नृत्यों में किया जाता है।

लंबी, अंडाकार, नरम लकड़ी की चपटी प्लेट और एक पतली बाँस की नली। दोनों को लोहे के पाश से बाँधा जाता है, जो बाएं हाथ से वाद्य यंत्र को पकड़ने में काम आता है। बजाते समय बाँस की छड़ी से इस प्लेट पर लयबद्ध रूप से आघात किया जाता है। इसका उपयोग सिक्किम के समूह नृत्य में किया जाता है।

41-भुआंज
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भुआंज बाँस, तूमड़ी और कपास से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। उड़ीसा में पाया जाने वाला एक जनजातीय वाद्य यंत्र है। अंडाकार लंबा वाद्य यंत्र, जिसका उपयोग प्रायः कथात्मक शैलियों में किया जाता है।

एक लंबी, अंडाकार तूमड़ी, बाँस से ढीली बंधी हुई। पेड़ की एक झुकी शाखा बाँस के एक सिरे से बाँधी जाती है। मोटी कपास की डोरी का एक छोर शाखा से बाँधा जाता है और दूसरा छोर खूँटी से बाँधा जाता है, जो बाँस में दूसरे छोर पर डाला जाता है। जनजातीय वाद्य यंत्र संभवतः कथात्मक शैलियों में उपयोग किया जाता है।

42-मंजीरा
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मंजीरा लकड़ी और लोहे से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह धार्मिक वाद्य यंत्र गुजरात में पाया जाता है। मुख्यतः भक्ति गायन में प्रयुक्त होता है। उत्तर भारत मे इसे करताल और खरताल के नाम से भी जाना जाता है।

लकड़ी से बना खटक (क्लैपर्स) का एक जोड़ा। लोहे की कीलों द्वारा बजने वाले वाली प्लेटों को ढीलाई से वाद्य यंत्र के ढांचे से जोड़ा जाता है। पक्षी के रूपांकनों के साथ ढाँचे को खूबसूरती से उकेरा जाता है। एक हाथ में पकड़कर, खटक को अंगूठे और चार उँगलियों के बीच में रखकर बजाया जाता। भक्ति गायन में प्रयुक्त होता है। उत्तर भारत में करतल या खरताल भी कहा जाता है।

43-मंदिरा
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मंदिरा, धातु से निर्मित एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह धार्मिक वाद्य यंत्र उड़ीसा में पाया जाता है। मुख्य रूप से संगीत की भक्ति विधा में उपयोग किया जाता है।

केंद्र में गहरी नुकीली उभार वाली धातु की छोटी कटोरियों की एक जोड़ी। इस वाद्य यंत्र को सामने से या किनारों से टकराकर बजाया जाता है। इसे संगीत की भक्ति विधा में उपयोग किया जाता है।

मंदिरा बंगाल की लोक परंपराओं का एक अभिन्न अंग है। मंदिरा छोटी घंटी के आकार के झांझ की एक जोड़ी है, जिसका उपयोग बाउलों द्वारा किया जाता था, साथ ही कीर्तन गायन के लिए भी एक संगत है। बंगाल के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रणेता बाउल, अपने देश के गांवों की मैली गलियों से गुजरते वक़्त गीत गाया करते थे। वे अपने गीतों में एक लयबद्ध तत्व जोड़ने के लिए मंदिरा को ले आए। बंगाल में लोक संगीत की अन्य विधाओं के गायकों ने भी अपनी अदायगी के लिए, मंदिरा को एक अनिवार्य हिस्सा बना दिया है।

44-मटकी
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मटकी चिकनी मिट्टी से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। राजस्थान में पाया जाता है, यह दक्षिण भारत के घटम के समान है।

पकी हुई चिकनी मिट्टी से बना, ग्रामीण भारत में दैनिक उपयोग का साधारण मटका एक ठोस वाद्य यंत्र है, जो देश के कई हिस्सों में पाया जाता है। कश्मीर का गढ़ा एक समरूप वाद्य यंत्र है। मटकी को दाएं हाथ से तबली पर बजाया जाता है जबकि बायां हाथ खुले सिर के कोर पर झंकृत किया जाता है। इसका कार्य लयबद्ध है। दक्षिण भारत के समरूप घटम को कर्नाटक पद्धति के शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उन्नत किया गया है।

45-माचुंगा
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माचुंगा इस्पात से बना एक ठोस वाद्य यंत्र है। यह एक लोक वाद्य यंत्र है और सिक्किम में पाया जाता है।

यह संगीत वाद्ययंत्र इस्पात में ढाला जाता है। इस वाद्य यंत्र का उत्पत्तिस्थान दक्षिण भारत से संबंधित है लेकिन कुछ माचुंग, या तो तांबे या लोहे से बने हुए, गंगटोक के आसपास की दुकानों में आसानी से उपलब्ध होते हैं। इस वाद्य यंत्र की विशेषता एक त्रिशूल के समान है। पतली केंद्रीय पट्टी को नियमित रूप से पतला किया जाता है और मुड़े हुए सिरे से तनाव दिया जाता है। केंद्रीय पट्टी मोटे आयाम के गोल धातु पर जोड़ी जाती है जो एक बिंदु पर खुली होती है जिसमें दोनो छोरों से लाये गए दो पतले तीर की नोक वाले टुकड़े होते हैं। माचुंगा एक लोकप्रिय लोक संगीत वाद्य यंत्र है और यह आमतौर पर दक्षिण भारतीय संगीतकारों द्वारा बजाया जाता है। सिक्किम में, उचित माचुंगा गाँव के लोगों द्वारा बजाया जाता है जब वे काम पर जाते हैं। माचुंगा के तीन तीर जैसी नोकों को दांतों से थोड़ा सा स्पर्श करते हुए होंठों पर रखा जाता है, और उंगली से बीच वाले तार पर धीरे से आघात किया जाता है। माचुंगा एक लयबद्ध वाद्य यंत्र है और ताल के साथ बजाया जाता है। आजकल माचुंगा को एक संगीत वाद्य यंत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है और इसकी ध्वनि और सरगम को विकसित किया जा रहा है। नेपाल के प्रसिद्ध डोहोरी संगीत में, माचुंगा अक्सर मादल और अन्य वाद्य यंत्रों के साथ बजाया जाता है।

46-मीएंग
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मीएंग बाँस का बना हुआ ठोस वाद्य यंत्र है। यह जनजातीय वाद्य यंत्र मेघालय में पाया जाता है। यह यहूदी वीणा (यहूदी हार्प) से मिलता-जुलता है, और मुख्य रूप से मेघालय और उसके पड़ोसी क्षेत्रों के चरवाहों और गड़ेरियों द्वारा इसका उपयोग किया जाता है।

बाँस की बनी हुई यहूदी वीणा (यहूदी हार्प)। इसमें हिलता हुआ जीभ नुमा टुकड़ा बीच में काटकर बनाया जाता है। इसे बजाने के लिए इसे होठों के बीच मजबूती से पकड़ा जाता है और उँगलियों से एक तरफ खींचा जाता है। इसमें मुख अनुनादक की तरह कार्य करता है। मेघालय और उसके पड़ोसी क्षेत्रों के चरवाहों और गड़ेरियों द्वारा इसका उपयोग किया जाता है।

47-मोरचंग
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मोरचंग धातु से बना एक ठोस वाद्य यंत्र होता है। यह यहूदी वीणा (यहूदी हार्प) राजस्थान में पाया जाता है। यह एक लोक वाद्य है जिसका मुख्य रूप से संगीत एवं नृत्य प्रदर्शनों के साथ संगत के रूप में उपयोग किया जाता है।

यह यहूदी वीणा (यहूदी हार्प), धातु से बनी हुई और मोर के सिर की आकृति से सजी हुई होती है। इस वाद्य यंत्र को बाएँ हाथ के अँगूठे और तर्जनी उंगली में पकड़ा जाता है। पटलिका (लामेला) के एक हिस्से को दांतों के बीच मजबूती से दबाया जाता है और दाहिने हाथ की उंगली से मुक्त जीह्वा को आगे और पीछे खींचने पर धुनें निकलती हैं। वादक का मुँह अनुनादक के रूप में कार्य करता है।"




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