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टी बैग का आविष्कार किसने और कब किया

 
tee-baig

19 वीं शताब्दी के शुरुआत की यह बात है, न्यूयॉर्क शहर में थॉमस सुलीवेन नामक एक व्यक्ति छोटे स्तर पर चाय का थोक व्यापार करता था। 

अपने चाय के इस व्यवसाय को अधिक विस्तार देने के इच्छुक सुलीवेन की राह में एक परेशानी थी। तब सुलीवेन के पास अपनी विभिन्न तरह की चाय के सेंपल अथवा नमूने भेजने का कोई पुख्ता एवं सरल तरीका न था। इस तरह से अक्सर वह अपने संभावित ग्राहकों को आकर्षित करने में विफल रहता था। 

उन दिनों चाय बनाने के लिए लोग चाय की पत्तियों को सीधे ही उबलते हुए पानी के बर्तन में डाल देते थे और तत्पश्चात उसे छानकर कपों में डाल देते थे। यदि किसी को मात्र एक कप चाय ही बनानी होती और वह इसके लिए पूरा भगोना उबालना नहीं चाहता तो इसके लिए भी कई तरीके प्रचलन में थे। इनमें से एक तरीका “टी-बेल” कहलाता था। टी-बेल-जैसा की नाम से ही विदित है, घंटी के आकार का होता था और इसमें थोड़ी मात्रा में चाय की पत्ती होती थी। इसे सीधे ही कप में डूबो दिया जाता था। 

इन कथित टी-बेल को देखकर सुलीवेन को अपने सेंपल भेजने का एक नया तरीका सूझा। उसने गॉज (कपड़े की पट्टी) के छोटे-छोटे बैग अर्थात थैले बनाकर उनमें अपनी चाय को भरकर इसे एक सेंपल के रूप में अपने विक्रेताओं को भेजना शुरू किया। 

सुलीवेन को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसके विक्रेता उसके द्वारा बनाए गए कथित टी-बैग्स को भारी मात्रा में मंगवाने लगे थे। ग्राहकों ने विक्रेताओं के पास इन टी-बैग्स को देखकर इनमें भारी रुचि दिखाई थी और और वे लोग ऐसे ही टी-बैग अपने लिए पसंद करने लगे।

सुलीवेन एक समझदार एवं होशियार व्यापारी था। उसने समय की मांग और लोगों की चाहत को पहचान कर शीघ्र ही टी-बैग्स को एक बड़े स्तर पर बनाना शुरू कर दिया। शीघ्र ही टी-बैग्स घर-घर में दिखने वाली एक आम चीज हो गए।

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