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वह एक लालटेन श्याम सिंह बिष्ट

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अब तो गांव-गांव मैं बिजली हूआ करती है यदि कभी बिजली चली भी जाती है तो हम लोग अपनों घरों को उजाला करने के लिए मोमबत्ती या चार्जेबल बैटरी का उपयोग करते हैं, एक समय वह भी था जब यह सारी वस्तुएं उपयोग में नहीं हुआ करती थी, हम सिर्फ उस एक "लालटेन " पर निर्भर हुआ करते थे, एक किस्सा आज उस लालटेन के ऊपर आपके समक्ष रखता हूँ ।।

शाम का समय था, सूर्य देव भी अपने घर जाने की तैयारी में लगे हुए थे, मानो ऐसा लग रहा था कि आकाश के पंछियों ने भी नभ मैं उड़ना अब छोड़ दिया हो, चाँद, तारों को आज वक्त से पहले आने की जल्दबाजी लगी हूई थी, हवा की शीतल तरंगे मेरे शरीर में कंपन का एहसास करा रही थी, जुगनुओं की फुश, फुशआहट मानों जैसे कोई संगीत सुना रहे हो , तभी जैसे ही मेरा घर के आंगन मैं प्रवेश हूआ, तो घर मैं हूऐ उजाले को अंधकार ने घेराबंदी कर रखी थी, सामने बैठी मेरी माँ ने पूछा कहा से आ रहा है कोई काम, नही है तेरे पास जब देखो इधर उधर टहलता फिरता रहता है, जा अंदर कमरे मैं लालटेन रखी हुई है उसे जला ओर पढ़ाई कर, मेनें भी अपना सर् हिलाकर हाँ बोला और उस कम्भख्त लालटेन को जलाने के लिए अंदर कमरे मे चला गया ।

वह छोटी सी गोल लोहे के आकर जैसी बनी हुई के ऊपर बराबर मैं लोहे के तीन आधा इंच पटिया जो ऊपर की ओर करीब तीन इंच उठी हूई थी जिस से उसमें लगने वाले उस काँच के शीशे को आसानी से खड़ा किया जा सके, और तीन इंच के बराबर उसके अंदर मध्य मैं मिट्टी के तेल मैं भीगा हुआ सूती कपड़ा व उसके ऊपर नीचे से समतल, मध्य में थोड़ा गोलाई से उभरता हुआ, ऊपर की ओर गोलाकार जाता हूआ काँच का शीशा लगा हुआ था, ओर एक छोड़ उसपर मिट्टी का तेल डालने के लिए गोलाकार छेद व उसको बन्द करने के लिए उसका ढक्कन दिया हुआ था ।

वह लालटेन अधिक पुराना होने के कारण उसके काँच के शीशे के अंदर के चारो ओर उस पर जलती हूई सूती कपड़े के काले उठते हूऐ धुएँ के निशान लगे हूऐ थे, अब मेरे सामने विडम्बना यह थी कि मेरा हाथ की उंगलियां व कलाई उसके अंदर नही पहूँच पा रहे थे, मेने एक लकड़ी का डंडा लिया व जैसे तैसे उसको साफ कर दिया, और अंधेरा हुआ अपना घर उस लालटेन के माध्यम से रोशनीमय कर दिया ।

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