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श्री हनुमन्त स्तवन

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फणिवर उठवीला, वेग अद्भुत केला ।
त्रिभुवन जन लोकीं, कीर्तिचा घोष केला ॥
रघुपति उपकारें, दाटले थोर भारें ।
परम धिर उदारें, रक्षिलें सौख्यकारें ॥ १ ॥

सबळ दळ मिळालें, युद्ध ऊदंड झालें ।
कपिकटक निमालें, पाहतां येश गेलें
परदळ शरधातें, कोटिच्या कोटि प्रेतें ।
अभिनव रणपातें, दुःख बीभीषणातें ॥ २ ॥

कपि रिस घनदाटी, जाहली थोर दाटी ।
म्हणवुनि जगजेठी, धावणें चार कोटी ॥
मृत विर उठवीलें, मोकळें सिद्ध झालें ।
सकळ जन निवाले, धन्य सामर्थ्य चाले ॥ ३ ॥

बहुप्रिय रघुनाथा, मुख्य तूं प्राणदाता ।
उठविं मज अनाथा, दूर सारुनि व्यथा ॥
झडकरि भिमराया, तूं करी दृढ काया ।
रघुवीर भजनाया लाग वेगेसि जाया ॥ ४ ॥

तुजविण मजलागीं, पाहतां कोण आहे ।
म्हणवुनि मन माझें, तूझिरे वाट पाहे ॥
मज तु निरवीले पाहिजे आठवीले ।
सकळिक निजदासा, लागिं सांभाळविलें ॥ ५ ॥

उचित हित करावें, उद्धरावें धरावें ।
अनुचित न करावें, त्वां जनीं येश घ्यावें ॥
अघटित घडवावे, सेवका सोडवावे ।
हरिभजन घडावें दुःख ते वीघडावे ॥ ६ ॥

प्रभुवर विरराया, जाहली वज्र काया ।
परदळ निवटाया दैत्य कूळें कुटाया ॥
गिरिवर तुडवाया, रम्य वेशा न ठाया ।
तुजसि अलगडाया ठेविले मुख्य ठाया ॥ ७ ॥

बहुत सबळ साठा, मागतो अल्प वाटा ।
न करित हित काटा, थोर होईल ताठा ॥
कृपणपण नसावें, भव्य लोकीं दिसावें ।
अनुदिन करुणेचें, चिन्ह पोटीं वसावें ॥ ८ ॥

जलधर करुणेचा, अंतरामाजि राहो ।
तरि तुज करुणा हे, कां नये सांग पाहो ॥
कठिण ह्रदय झाले, काय कारुण्य केलें ।
न पवसि मज कां रे, म्यां तुझे काय नेलें ॥ ९ ॥

वडिलपण करावें, सेवकां सावरावें ।
अनहित न करावें, तूर्त हातीं धरावें ॥
निपटचि हठवावें, प्रार्थिला शब्द भेदें ।
कपि घन करुणेचा, वोळला राम तेथें ॥ १० ॥

बहुतचि करुणा ही, लोटली देवराया ।
सहजचि कफ गेलें, जाहली दृढ काया ॥
परमसुख विलासे, सर्वदा दासानुदासे ।
पवनज अनुतोषे, वंदिला सावकाशें ॥ ११ ॥

॥ इति श्री हनुमन्त स्तवन संपूर्ण ॥ 

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