स्ट्रॉबेरी का वानस्पतिक नाम फ्रेगेरिया अननासा है. यह रोजेसी कुल का सदस्य है. इसका पौधा शाकीय, छोटा, कोमल तथा बहुवर्षीय होता है. इसका तना नाममात्र का तथा पूर्ण विकसित त्रिपत्री पत्तियां होती हैं| यह दो अन्य प्रजातियों (फ्रेगेरिया चिलयोनसिस एवं फ्रेगेरिया बरजीनियाना) के प्राकृतिक संकरण से विकसित किया गया है. स्ट्रॉबेरी के फल बडे लुभावने, रसीले एवं पौष्टिक होते हैं. ये मध्यम आकार (10 से 15 ग्राम), चित्ताकर्षक, सुवासयुक्त और सिंदूरी रंग लिए हुए बहुत ही नरम होते हैं.
इनका खाने योग्य भाग लगभग 98 प्रतिशत होता है. इन फलों में विटामिन- सी तथा लौह तत्व प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं.यह अपने विशेष स्वाद एवं रंग के साथ-साथ औषधीय गुणों के कारण भी एक महत्वपूर्ण फल है| इसका उपयोग कई मूल्य संवर्धित उत्पादों जैसे आईसक्रीम, जैम, जैली, कैंडी, केक इत्यादि बनाने के लिए भी किया जाता है. इसकी खेती अन्य फल वाली फसलों की तुलना में कम समय में ज्यादा मुनाफा दिला सकती है| यह अल्प अवधि (4 से 5 महीने) में ही फलत देने वाली फसल है.
भारत में कुछ वर्षों पूर्व तक स्ट्रॉबेरी की खेती केवल पहाड़ी क्षेत्रों जैसे उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, कश्मीर घाटी, महाराष्ट्र, कालिम्पोंग इत्यादि जगहों तक ही सीमित थी| वर्तमान में नई उन्नत प्रजातियों के विकास से इसको उष्णकटिबंधीय जलवायु में भी सफलतापूर्वक उगाया जा रहा है.इसके कारण यह मैदानी भागों जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार आदि राज्यों में अपनी अच्छी पहचान बना चुकी है.
तकनीकी जानकारी के अभाव में किसान भाई इसकी खेती करने में अपने आपको असहज महसूस करते हैं. जबकि यदि स्ट्रॉबेरी की वैज्ञानिक तकनीक से खेती की जाये, तो इसकी फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है. अतः इस लेख में स्ट्रॉबेरी की वैज्ञानिक खेती के बारे में विस्तारपूर्वक समझाया गया है. इससे किसान भाई उच्च उत्पादन व गुणवत्ता वाले फल प्राप्त करके अधिकाधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं.
यह भारत की महत्तवपूर्ण फल की फसल है। यह अत्याधिक खराब होने वाला नर्म फल है। इसे शीतोष्ण या उपउष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में व्यापारिक तौर पर उगाया जाता है। यह विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत है। इसके फलों को विभिन्न उद्देश्यों जैसे आईसक्रीम और जैम बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। भारत में स्ट्रॉबेरी की खेती पहाड़ी क्षेत्रों में की जाती है। भारत के नैनीताल, देहरादून, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कश्मीर, बैंगलोर, पश्चिमी बंगाल और हिमाचल प्रदेश राज्यों में इसे मुख्य तौर पर उगाया जाता है।
स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए मिट्टी और जलवायु :
वैसे तो इसकी खेती के लिए कोई मिट्टी तय नही है फिर भी अच्छी उपज लेने के लिए बलुई दोमट मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है। इसकी खेती के लिए ph 5.0 से 6.5 तक मान वाली मिट्टी भी उपयुक्त होती है। यह फसल शीतोष्ण जलवायु वाली फसल है जिसके लिए 20 से 30 डिग्री तापमान उपयुक्त रहता है। तापमान बढ़ने पर पौधों में नुकसान होता है और उपज प्रभावित हो जाती है।
मिट्टी
स्ट्रॉबेरी को मुख्यत: अच्छे निकाल वाली दोमट मिट्टी की आवश्यकता होती है, जिसमें जैविक तत्व उच्च मात्रा में होते हैं। मिट्टी की पी एच 5.7-6.5 होनी चाहिए, जो कि थोड़ी अम्लीय होती है। अम्लीय मिट्टी में इसकी खेती ना करें, क्योंकि इसमें इसकी जड़ों का आकार सही नहीं बनता। एक ही ज़मीन पर ज्यादा वर्षों तक स्ट्रॉबेरी की खेती नहीं करनी चाहिए। निमाटोड से प्रभावित मिट्टी में भी इसकी खेती नहीं करनी चाहिए। फंगस की बीमारियों से बचाव के लिए मिट्टी का धूमन करना चाहिए।
प्रसिद्ध किस्में और पैदावार
स्ट्राबेरी की बहुत सी किस्में उगाई जाती हैं। परन्तु मुख्यत: निम्नलिखित किस्मों का उत्पादन हरियाणा में किया जाता है।
कैमारोजा-यह एक कैलीफोर्निया में विकसित की गई किस्म है व थोड़े दिन में फल देने वाली किस्म है। इसका फल बहुत बड़ा व मजबूत होता है। इस फल की महक अच्छी होती है। यह किस्म लंबे समय तक फल देती है व वायरस रोधक है।
ओसो ग्रैन्ड-यह भी एक कैलीफोर्निया में विकसित किस्म है। जो छोटे दिनों में फल देती है। इसका फल बड़ा होता है तथा खाने व उत्पाद बनाने के लिए अच्छा होता है। परंतु इसके फल में फटने की समस्या देखी जा सकती है। यह किस्म काफी मात्रा में रनर पैदा कर सकती है।
ओफरा-यह किस्म इजराईल में विकसित की गई है। यह एक अगेती किस्म है और इसका फल उत्पादन जल्दी आरंभ हो जाता है।
चैंडलर-यह कैलीफोर्निया में विकसित किस्म है। इसका उत्पादन विभिन्न स्थितियों में किया जा सकता है। इसका फल आकर्षक होता है। परंतु इसकी त्वचा नाजुक होती है।
स्वीट चार्ली-इस किस्म के पौधे जल्दी फल देते हैं। इसका फल मीठा होता है। पौधे में कई फफूंद रोगों की रोधक शक्ति होती है।
Tioga: इसके फल का आकार बड़ा, गुद्दा और छिल्का सख्त और स्वाद, रख रखाव में उत्तम, परिवहन के लिए उपयुक्त होती है। इसमें अम्ल की मात्रा 0.70 प्रतिशत और टी एस एस की मात्रा 7.0 प्रतिशत होती है। यह विषाणु रोगों के प्रतिरोधक किस्म है।
Torrey: फल का आकार बड़ा, शंकु के आकार के, गुद्दा और छिल्का कम सख्त, स्वाद में अच्छा, परिवहन के लिए उपयुक्त और अच्छी गुणवत्ता वाला होता है। फल अप्रैल के पहले सप्ताह में पकना शुरू हो जाते हैं। इसमें अम्ल की मात्रा 0.70 प्रतिशत और टी एस एस की मात्रा 7.0 प्रतिशत होती है।
Chandler: फल शंकु के आकार के, कभी कभी लंबे व चपटे, चमकदार, नर्म और आकर्षित, गुद्दे का रंग फल के रंग जैसा, सख्त और मजबूत, मध्यम आकार का पौधा, सीधा, रनर पैदा करने की क्षमता मध्यम, स्व परागण वाली किस्म है।
Selva (mid hills): दिन की लंबाई से अप्रभावित किस्म, शंकु आकार के फल, मीठा गुद्दा, जो कि सख्त और लाल रंग का होता है, स्वाद में मीठा खट्टा, भंडारण क्षमता अधिक, कीटों और बीमारियों का हमला इस किस्म पर कम होता है। इसकी औसतन पैदावार 200-250 ग्राम प्रति पौधा होती है।
Belrubi: इसके फल बड़े आकार के, लाल रंग के साथ ठोस गुद्दा होता है।
Fern: यह जल्दी पकने वाली और जल्दी फल देने वाली किस्म है। इसके फल मध्यम से बड़े आकार के होते हैं। इसके फल का गुद्दा लाल, अच्छे स्वाद के साथ मजबूत होता है। इस किस्म के फल प्रोसेसिंग के लिए उपयुक्त होते हैं।
Pajaro: इसके फल बड़े आकार के और मजबूत गुद्दा होता है। यह किस्म वायरस को सहनेयोग्य है। इसके फल प्रोसेसिंग के लिए उपयोग किए जाते हैं।
Pusa Early dwarf: यह छोटे कद की किस्म, उत्तर भारतीय मैदानों के लिए उपयुक्त है। इसके फल नुकीले होते हैं।
दूसरे राज्यों की किस्में
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए Srinagar, Royal Sovereign और Dilpasand उपयुक्त हैं।
Katrain Sweet: यह अधिक सुगंधित और स्वाद में नर्म होती है।
Premier, red coat, local, Jeolikot, Florida 90.
ज़मीन की तैयारी
एक गहरी जोताई करें उसके बाद मिट्टी के भुरभुरा होने तक हैरो से जोताई करें। आखिरी जोताई के समय मिट्टी में रूड़ी की खाद या गाय का गला हुआ गोबर 10-12 टन प्रति एकड़ में डालें। स्ट्रॉबेरी की रोपाई एकसमान बैडों पर करने के लिए समतल बैडों की आवश्यकता होती है। 4 मीटरx3 मीटर या 4 मीटरx4 मीटर के बैड तैयार करें।
स्ट्रॉबेरी उथली जड़ वाला पौधा है. अत: रोपाई के पूर्व खेत को भली भांति तैयार कर लेना चाहिए. इसके लिए एक जुताई मृदा पलटने वाले हल से तथा 2 से 3 जुताई देसी हल से करके पाटा चलाकर मृदा को अच्छी तरह भुरभुरा बना लेना चाहिए. यदि मिटटी में किसी कवक या बीमारी का प्रकोप हो तो उसे उपचारित कर लें.इसके लिए गर्मियों में जब तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस के मध्य हो, मृदा सौरीकरण कर लेना चाहिए.
सौरीकरण करने के लिए क्यारियों को हल्का नम कर या हल्की सिंचाई कर, 200 गेज की प्लास्टिक की पारदर्शी फिल्म से 6 से 8 सप्ताह तक ढककर रखें. प्लास्टिक फिल्म के किनारों को मिटटी से ढक देना चाहिए, ताकि हवा अंदर प्रवेश नहीं कर पाए| इस प्रक्रिया से प्लास्टिक फिल्म के अंदर का तापमान 48 से 56 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. इससे मिटटी में मौजूद हानिकारक कीट, रोगों के बीजाणु तथा कुछ खरपतवारों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं. आजकल इसके लिए कई तरह के रसायनों का भी प्रयोग किया जाता है.
बिजाई
बिजाई का समय
पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी रोपाई का उपयुक्त समय सितंबर से अक्तूबर का है। मैदानी क्षेत्रों में इसकी बिजाई के लिए जनवरी से फरवरी का महीना उपयुक्त समय है। ज्यादा जल्दी और बहुत देर से की गई रोपाई उपज को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी।
फासला
बिजाई के लिए पौधे से पौधे में 45 सैं.मी. और कतार से कतार में 60 सैं.मी. से 75 सैं.मी. फासले का प्रयोग करें।
बीज की गहराई
5-7 सैं.मी. की गहराई होनी चाहिए।
बिजाई का ढंग
नए पौधों को मुख्य खेत में रोपित किया जाता है।
प्रजनन
स्ट्रॉबेरी का प्रजनन खिलने के मौसम के बाद रनर्स द्वारा किया जाता है। आमतौर पर एक अकेला पौधा 8-10 रनर्स का उत्पादन करता है लेकिन यह कई बार 15 रनर्स प्रति पौधा हो सकता है। प्रजनन शीर्षक भाग द्वारा भी किया जा सकता है लेकिन यह बहुत समय लेता है और मजदूरों की आवश्यकता होती है एक अकेले पौधे से 3-5 शीर्षक भाग प्रति पौधा।
प्रजनन के लिए, पौधे के भाग को सितंबर के महीने में काटें और इसे पॉलीथीन के बैग में लगाएं जिसमें मिट्टी, रेत और रूड़ी की खाद या गाय का गला हुआ गोबर 1:1:2 के अनुपात से डाला गया हो।
खाद
खादें (किलोग्राम प्रति एकड़)
| UREA | SSP | MOP |
| 65-90 | 200-300 |
20-32
|
तत्व (किलोग्राम प्रति एकड़)
| NITROGEN |
PHOSPHORUS
| POTASH |
| 30-40 | 32-48 | 20-32 |
खेत की तैयारी के समय रूड़ी की खाद 10-15 टन प्रति एकड़ में डालें। इसे नाइट्रोजन 30-40 किलो (यूरिया 65-90 किलो), फासफोरस 32-48 किलो (एस एस पी 200-300 किलो) और पोटाश 20-32 किलो (म्यूरेट ऑफ पोटाश 35-55 किलो) प्रति एकड़ में डालें। फासफोरस की पूरी मात्रा और पोटाश की आधी मात्रा खेत की तैयारी के समय डालें। रोपाई के एक महीने बाद नाइट्रोजन की आधी मात्रा डालें। फूल निकलने के समय नाइट्रोजन और पोटाश की बाकी बची मात्रा डालें।
सिंचाई
रनर्स की रोपाई के बाद लगातार सिंचाई की आवश्यकता होती है। बारिश के ना होने पर सितंबर अक्तूबर महीने में सप्ताह में दो बार सिंचाई करें और नवंबर में सप्ताह में एक सिंचाई की आवश्यकता होती है और दिसंबर में जनवरी महीने में प्रत्येक पखवाड़े में एक बार सिंचाई करें। फल बनने की अवस्था में सिंचाई की आवृत्ति को बढ़ा दें। इस अवस्था पर उचित सिंचाई बड़े आकार के फल देती है।
खरपतवार नियंत्रण
नदीनों की रोकथाम के लिए मलचिंग एक प्रभावी तरीका है। तैयार गड्ढों में घास या लकड़ी की एक परत डालें। इससे नदीनों को रोकने में मदद मिलेगी और मिट्टी में नमी बनाए रखने में मदद मिलेगी। एक एकड़ खेत में 6 टन मलच की आवश्यकता होती है।
पौधे की देखभाल-
हानिकारक कीट और रोकथाम
सफेद सुंडी और कतरा सुंडी : ये कीट जड़ों और नर्म तनों को काटकर पौधे को नष्ट करते हैं।
रोकथाम : क्विनलफॉस 400 मि.ली. को प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
बीमारियां और रोकथाम
पत्तों पर धब्बा रोग : गहरे जामुनी भूरे रंग के धब्बे जो कि बीच में से सफेद रंग के और गोल आकार के दिखाई देते हैं। फलों और पत्तियों के तने पर लंबे धब्बे दिखाई देते हैं।
रोकथाम : कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
सलेटी फंगस : फंगस के हमले के कारण फूल झुलसे हुए और फल गलन दिखाई देता है।
रोकथाम : एम 45 या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम की प्रति एकड़ में स्प्रे करें।
जड़ गलन : तने पर भूरे रंग की परत या धब्बे दिखाई देते हैं जो कि बाद में जड़ों पर फैल जाते हैं।
रोकथाम : एम 45 या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 400 ग्राम प्रति एकड़ में छिड़कें।
रैड स्टील रोग : प्रभावित पौधे की वृद्ध कम हो जाती है और रनर्स बहुत कम बनते हैं और ऐसे पौधे सर्दियों में मर जाते हैं। नई और किनारे वाली जड़ें सड़ जाती हैं और जड़ की बाहरी त्वचा लाल रंग की हो जाती है।
रोकथाम : प्रभावित खेतों में खेती ना करें।
फलों की तुड़ाई
स्ट्रॉबेरी के फलों की तुड़ाई का समय बाजार की दूरी के अनुसार तय करते हैं. सामान्यतः फलों की तुड़ाई आधे से तीन चौथाई भाग (2/3) के रंग बदलने के पश्चात करते हैं. फलों की तुड़ाई डंठल सहित प्रात: काल सूरज निकलने से पूर्व ही पूर्ण कर लेनी चाहिए. तोड़े हुए फलों को रखने के लिए ट्रे का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इसके फल बड़े नाजुक होते हैं. इन्हें गहरे बर्तन में रखने से फलों की ऊंची परत के दबाव के कारण नीचे भरे फलों को नुकसान पहुंच सकता है.
स्ट्रॉबेरी के फलों को 2 से 3 दिनों तक ही सुरक्षित रखा जा सकता है. अतः तोड़ने के बाद फलों को ज्यादा समय तक नहीं रखना चाहिए. बिक्री के लिए बाजार में भेजने के लिए फलों को प्लास्टिक के छोटे डिब्बों में पैक करना चाहिए तथा बाद में इन डिब्बों को कोरूगेटिड फाइबर बोर्ड (सीएफबी) से बने बड़े डिब्बों में पैक करके भेजना चाहिए.
पैदावार
स्ट्रॉबेरी के फलों की उपज कई बातों पर निर्भर करती है. इनमें उगाई जाने वाली किस्म, जलवायु, मृदा, पौधों की संख्या, फसल प्रबंधन इत्यादि प्रमुख हैं. इसके प्रति पौधे से एक मौसम में 500 से 700 ग्राम फल प्राप्त किए जा सकते हैं. एक एकड़ क्षेत्रफल में 80 से 100 क्विटल फलों का उत्पादन हो जाता है. यह उत्पादन उपरोक्त वैज्ञानिक तकनीक और अच्छे फसल प्रबंधन से बढ़ाया भी जा सकता है.
फसल की कटाई
फल अप्रैल महीने में पकना शुरू हो जाता है। 2-3 वर्ष फसल ली जा सकती है लेकिन 2 वर्ष के बाद उपज कम हो जाती है। जब छिल्के का रंग आधे से तीन चौथाई हिस्सा विकसित होने पर तुड़ाई की जाती स्थानीय बाज़ार के लिए पके फलों की तुड़ाई करें, जबकि दूर की मंडी के लिए अधपके फलों की तुड़ाई करें। तुड़ाई प्रत्येक सैकंड पर की जाती है या तीसरे दिन मुख्यत: सुबह के समय की जाती है। तुड़ाई के बाद कंटेनर में पैकिंग की जाती है और उसके बाद परिवहन के लिए भेज दिया जाता है।
भूस्तारी ( रनर्स ) उत्पादन
स्ट्रॉबेरी का प्रवर्धन भूस्तारी द्वारा होता है. अतः जैसे ही फूल व फल बनने बंद हो जाएं, क्यारियों से पलवार शीट हटा देनी चाहिए. स्ट्रॉबेरी के पौधों को भूस्तारी बनाने के लिए छोड़ देना चाहिए. पहाड़ी क्षेत्रों में तो तापमान कम होने के कारण ये आसानी से बढ़ जाते हैं, परंतु मैदानी क्षेत्रों में अधिक गर्मी एवं बरसात के कारण पौधे मर जाते हैं. इन्हें बचाने के लिए हरितगृह या किसी अनुकूल संरचना का प्रयोग करना चाहिए.

